अजनबी



आस- पास लोगों की भीड़ और शोर इस वक्त रुहीका
यही तो देख रही थी। 31st की रात सब जश्न मना रहे थे आँखो में कई उम्मीदे लिये लोग खुशी के साथ नये साल का स्वागत कर रहे थे हर एक के चेहरे पर मुस्कान थी लेकिन उदास चेहरा और निराश आँखे लिए रुहीका ही थी जो खामोश बैठी थी। नये साल को लेकर उसके चेहरे पर कोई उत्साह नजर नही आ रहा था। मानो जैसे उसे कोई खुशी ही ना हो।
शायद रुहीका को इस नये साल से कोई उम्मीद ही नही है की उसकी लाइफ में कुछ अच्छा होगा या ये कहे की उसकी सारी उम्मीदे खत्म हो चुकी है।
जहाँ सब नये साल के जश्न में डूबे हुए है वहीं रुहीका है की अपने आपको इस दुनिया का सबसे दुखी व्यक्ति मान शोक के समुद्र में गोते लगा रही है। न हँस रही है
न बोल रही है बस गम के अंधेरो में डोल रही है।
रुहीका के फ़्रेंड्स कितनी देर से ये कोशिश कर रहे है की रुहीका भी खुश होकर उनके साथ पार्टी इंजॉय करे। पर रुहीका है की उस पर कोई असर हो ही नही रहा। रात बढ़ रही थी और रात के साथ ही ठंड भी, हवा के ठंडे झोंके जिसका एहसास अच्छी तरह करा रहे थे। ये ठंडी हवा के झोंके रुहीका को भी छूते हुए गुजर रहे थे जिसका असर उस पर थोड़ा दिख भी रहा था अब उसका मन पार्टी से जाने को कर रहा था इसलिए नाचते गाते लोगों के बीच रुहीका अपनी दोस्त को ढूंढने लगती है वही दोस्त जिसके साथ वो इस पार्टी में आई थी और इसी बीच वो टकरा जाती है एक अजनबी से। रुहीका झट से उसे सॉरी कहकर अपनी दोस्त के पास पहुँच जाती है वो अपनी दोस्त से कुछ बात करती है और फिर वापस अपनी जगह पर आकर बैठ जाती है उदास सा चेहरा बनाये रुहीका सामने नाचते हुए लोगों की ओर देखने लगती है और तभी उसके सामने आ खड़ा होता है वही अजनबी जिससे रुहीका अभी टकराई थी। वो रुहीका के बगल में रखी खाली चेयर देख उससे पूछता है ,
क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ ? रुहीका के कुछ न कहने पर वो कहता है आपने हाँ नही कहा , तो न भी नही कहा इसलिए मैं यहाँ बैठ जाता हूँ और ऐसा कहते हुए वो बैठ जाता है। वो रुहीका को मुस्कुराते हुए हैप्पी न्यू ईयर कहता है पर रुहीका उसे बदले में कोई जवाब नही देती। खैर उस अजनबी को इस बात से कोई
फर्क नही पड़ता।
वो तो इस न्यू ईयर पार्टी को पूरे दिल से इंजॉय कर रहा था। वो कभी सबके साथ जाकर डांस कर रहा था तो कभी गले लग - लगकर सबको नये साल की
शुभकामनायें दे रहा था और जब वो रुहीका के पास बैठा हुआ था तब वो पार्टी में चल रहे गाने को गुनगुनाये जा रहा था। और रुहीका उसे देख कर मुँह बनाये जा रही थी। अजनबी समझ गया था के रुहीका को उसका गाना गुनगुनाना अच्छा नही लग रहा वो ये भी समझ गया था की इतने खुश माहौल में भी रुहीका खुश नही  है।
वो कुछ देर चुपचाप बैठ कुछ सोचता है और फिर अचानक से रुहीका से कहता है आप नये साल की
खुशी चुप रहकर मनाती है रुहीका उसकी तरफ देखती है और कुछ न कहते हुए नजरे फेर लेती है।
वो अजनबी फिर सवाल करता है आप उदास है या
फिर ये कोई नया तरीका है किसी बात की खुशी मनाने का। रुहीका अब गुस्से में उसे घूरने लगती है वो अजनबी फिर बोलता है लगता है आपको मेरी बाते अच्छी लग रही है वाकई मैं बाते इतनी अच्छि करता हूँ की सबको मेरी बाते बड़ी पसन्द आती है जैसे अभी आपको आ रही है। बिल्कुल वैसे ही।
न चाहते हुए भी रुहीका बोल पड़ती है वो कहती है पर मुझे आपकी बाते बिल्कुल अच्छि नही लग रही इसलिए प्लीज़ चुप रहिये।
वो अजनबी मुस्कुराता है और कहता है की चलिये ये तो पता चल गया के आप बोल सकती है वरना मुझे लगा था के आप बोल नही सकती।
रुहीका उसकी बात सुन और गुस्से में आ जाती है।
वो कुछ कहने वाली होती है के तभी वो अजनबी फिर
बोल पड़ता है
वो कहता है मैं आपसे अब कोई सवाल नही करूँगा बल्कि आपको कुछ बताना चाहूँगा। दो साल पहले
की बात है एक लड़का था जो की अपनी लाइफ में चल रही प्रॉब्लम्स को लेकर बड़ा उदास था वो ये मान बैठा
था की अब उसकी लाइफ में कुछ अच्छा हो ही नही सकता। एक बार वो किसी पार्टी में गया वहाँ जाकर भी उसका वही हाल था खुदको सबसे अलग कर वो
अकेले जा बैठा उदास सा बेचारा सा चेहरा बनाये
मानो जैसे सारी दुनिया के दुख बस उसी के हिस्से आये हो। तब उसके पास आकर कोई बैठता है और उससे
कहता है क्या आप अपने बीते कल को वापस ला सकते हो या आने वाले कल को आने से रोक सकते हो
नही न। इस पर हमारा कोई जोर नही है। पर अपने आज को हम अपने मर्जी से जी सकते है ये फैसला
हमे करना होता है की अपने आज को हम उदास होकर जीना चाहते है या मुस्कुराकर।
वैसे मुस्कुराकर जीने में कोई बुराई नही है। इसलिए
मुस्कुराकर जियो ।
                   
मुझे भी तुसे यही कहना है रुहीका।
और बस इतना कहने के बाद वो अजनबी उठकर चला जाता है।






कोशिश





कई देर से हाथ में किताब पकड़े मैं उसे पढ़ने की एक नाकाम कोशिश किये जा रहा हूँ मैं अभी तक ये पहला पन्ना भी पूरा न पढ़ सका। कितना मन लगाने की कोशिश
कर रहा हूँ पर फिर भी पढ़ने में मेरा मन ही नही लग रहा। अपनी इस कोशिश में नाकाम हो आखिरकार मैंने किताब को बंद कर रख ही दिया।
वैसे जिंदगी भी किताब के जैसी ही तो है जिस तरह किताब के पन्ने होते है वैसे ही जिंदगी के भी कुछ पन्ने होते है फर्क बस इतना है की किताब के पन्नो को हम अपनी मर्जी से उलट- पलट कर पढ़ सकते है पर जिंदगी के पन्नो पर हमारा कोई जोर नही ये पन्ने खुद ही पलटते है और हर एक पन्ने पर होती है ज़िन्दगी से जुड़ी एक कहानी।
मैं आज गेस्ट के तौर पर अपने ही कॉलेज आया हूँ।
ग्रेजवेशन मैंने यही से किया था। हॉल में आते ही मेरा तालियों के साथ स्वागत किया गया। फूलो का एक गुलदस्ता मेरे हाथ में देकर मेरा सम्मान किया गया और फिर जहाँ पहले से दो और गेस्ट बैठे हुए थे उनके पास मुझे भी बैठा दिया गया। प्रिंसिपल सर आये हुए सभी गेस्ट के बारे में अपने स्टूडेंट्स को बता रहे थे की उन्होंने अपनी लाइफ में कैसे मेहनत से बहुत कुछ हासिल किया। वो मेरी भी तारीफ पे तारीफ किये जा रहे थे। वो स्टूडेंट्स को कह रहे थे की उन्हें मुझसे बहुत कुछ सीखना चाहिए।
सर ने बातो ही बातो में ये भी कहा की मेरे पेरेंट्स कितने खुश होंगे मुझे इस मुकाम पर देखकर। इसके बाद सर ने और भी कई बाते की जोकि मैंने नही सुनी क्योंकि मेरा ध्यान उस वक्त कहीं और था , मुझे माँ पापा की याद आ गयी थी। मैं बार - बार उन्ही के बारे मैं सोच रहा था।
मैं बचपन से ही थोड़ा जिद्दी था। एक ही बेटा था इसलिए प्यार भी बहुत मिला और मेरी हर जिद पूरी भी हुई। सपने तो मैं बचपन से ही देखता था पर मेरे सपनो को पंख तब लगे जब मेरा ग्रेजवेशन कम्प्लीट
होने वाला था। मैं हमेशा से एक सफल बिज़नेस मेन
बनना चाहता था। जोकि मैं आज हूँ।
मैंने बहुत मेहनत की और हर वो कोशिश की जिससे मैं सक्सेस हासिल कर सकूँ। कई मुश्किले मेरे सामने आई पर मैं डगमगाया नही कोशिश करता रहा और चलता रहा। कई दिनों की मेहनत के बाद मेरी कोशिश रंग लाई और मैने अपनी खुद की एक कम्पनि खड़ी की। और वो हासिल किया जो मैं चाहता था।
लेकिन कुछ ऐसा भी है जो छूट गया।
मेरे अपने। ग्रेजवेशन पूरा करने के बाद ही मैं अपना बिज़नेज स्टार्ट करना चाहता था वो भी अलग शहर में जाकर। मेरे इस फैसले से पापा सहमत नही थे। वो नही चाहते थे की मैं उन्हें और माँ को छोड़कर किसी अलग शहर में रहने जाऊँ।
और साथ ही उन्हें ये भरोसा भी नही था की मैं इस नादानी भरी उम्र में ठीक से कुछ सम्हाल भी पाऊंगा के नही। इसलिए उनका फैसला था की मैं उनके पास ही रहकर अपना बिज़नेस स्टार्ट करूँ। पर ये मेरे लिए पॉसिबल नही था क्योंकि मेरा लक्ष्य बड़ा था जो यहाँ हमारे इस छोटे से शहर में रहकर पूरा कर पाना मुझे मुश्किल लग रहा था।
पापा और मेरी इस बात पर काफी बहस भी हुई।
उन्होंने मुझे पैसे देने से भी इंकार कर दिया था। और
हमारे बीच बहस इतनी बढ़ गई थी के मैंने गुस्से में आकर उसी दिन घर छोड़ दिया। बिना किसी की परवाह किये मैं निकल पड़ा अपना सपना पूरा करने।
      इतने दिनों में मैंने कभी भी उनसे बात करने की कोई कोशिश नही की। हाँ उनकी याद जरूर आई
पर कभी हिम्मत नही जुटा पाया। आज जब कॉलेज
में सर ने पेरेंट्स का जिक्र किया तब से ही मुझे घर की और माँ पापा की बहुत याद आ रही है। हॉटेल वापस आकर मैंने इस किताब में मन लगाने की भी कोशिश की पर मन नही लगा सका।
काफी देर तक बैठा हुआ मैं कुछ सोचता रहा अभी कुछ और भी बचा है जिसे पाने की कोशिश करनी है मुझे। मैं उठा हॉटेल से बाहर निकल टैक्सी पकड़ी।
और सीधे अपने घर पहुँचा। घर के बाहर पापा की वही पुरानी कार खड़ी थी जिसे लेकर पापा ऑफिस जाते थे पर अभी इस पर लगी धूल देख ऐसा लग रहा है जैसे कई दिनों से ये कार बस यहीं खड़ी हुई है। मैं बाहर का बड़ा वाला गेट खोलकर आगे बढ़ा घर के गार्डन के पौधे सूखे से नजर आ रहे थे सब सुनसान सा लग रहा
था अब मेरे मन में घबराहट सी होने लगी तरह-तरह के विचार मेरे दिमाग में चलने लगे घर का दरवाजा खुला हुआ था। मैं घर के अंदर गया अंदर कोई भी नही था मैं परेशान होने लगा कहीं ऐसा तो नही के वो
यहाँ से कहीं और चले गये, मुझे तो कुछ भी नही पता उनके बारे में। आज मैं खुद से सवाल कर रहा था
क्यों मैंने कोशिश नही की माँ पापा से मिलने की उनसे बात करने की, उन्हें मनाने की , काश मैंने कोशिश की होती। मैं मन ही मन ये सब कुछ सोचकर बहुत
दुखी हो रहा था लेकिन तभी मुझे सामने माँ और पापा नजर आये जोकि मुझे हैरान निगाहों से देख रहे थे पापा थोड़े बीमार भी लग रहे थे मैंने कुछ नही कहा ना कुछ पूछा बस जाकर उनसे लिपट गया और रोने लगा। मुझे लगा था की शायद वो मुझसे बहुत नाराज होंगे और हो सकता है की वो मुझसे बात भी न करे पर उन्होंने मुझे उतने ही प्यार से गले लगाया जितने प्यार से वो मुझे बचपन में गले लगाया करते थे।
अब बस मेरी कोशिश यही है कि मैं हमेशा अपनो के साथ रहूँ।




















चुपके- चुपके भाग- 2




जिसे देखनो को आँखे तरस रही हो और वो अचानक सामने आ जाये तब कैसा महसूस होता है ये बता पाना थोड़ा मुश्किल है। देविका मेरे सामने है उसने मुझे देख भी लिया है बस कुछ कह नही रही। बल्कि उसने तो अपनी नजरे ही फेर ली।
बिना बताये बिना कुछ कहे देविका मेरी जिंदगी से दूर चली गई। मैंने उसके दोस्तो से उसके बारे में जानना
चाहा पर किसी ने कुछ नही बताया। वो मुझसे नाराज थी खफा थी पता नही। लेकिन शायद उसे मुझ पर भरोसा नही था। इसीलिए तो मेरी शादी की बात जोकि किसी और से उसे पता चली वो जानते ही वो
मुझे छोड़कर चली गई बिना सच को जाने।
आज दो साल बाद हम मिले है देविका तो कुछ नही कह रही पर मैं चुप नही रह सकता लेकिन अभी अपने ऑफिस के दोस्तो के सामने कुछ कह भी नही सकता।
बस अगले स्टेशन का इंतजार है।
अगले स्टेशन पर जब गाड़ी रुकी और देविका जैसे ही गाड़ी से उतरी मैं भी फ़ौरन उसके पीछे चला गया।
देविका आगे- आगे और मैं उसके पीछे - पीछे। वो एक टी- स्टॉल के पास रुकी। वो कुछ कहती उसके पहले मैं बोल पड़ा भईया दो ग्लास चाय देना। एक ग्लास मैंने अपने हाथ में लिया और दूसरा ग्लास देविका के हाथ में थमाया। हम दोनो उस लंबी सी चियर पर जाकर बैठ गये जो स्टेशन पर यात्रियों के लिए होती है। आज बिल्कुल वैसी स्थिति थी जैसी उस दिन मॉल
में थी। बात तो करना चाहते है पर शुरू कैसे करे ये समझ ही नही आ रहा था ज्यादा ना सोचते हुए मैंने ही
बात करना शुरू किया।
कैसी हो , उसने कहा- ठीक हूँ। और तुम ?
मैंने कहा मैं भी बढ़िया हूँ।
देविका ने दबी सी आवाज में पूछा - और तुम्हारी वाइफ।
ये सुनते ही मैं पहले तो समझ ही नही पाया की मैं इसे
क्या कहूँ पर फिर मैंने कह दिया हाँ ठीक है।
देविका को देखकर लग नही रहा था की उसकी शादी हो गई है पर फिर भी मैंने जानने के लिए उससे पूछ लिया तुमने शादी की या नही ये पूछते वक्त मन में एक घबराहट सी भी हो रही थी पर जब देविका ने कहा - नही।
ये सुनकर मन में खुशी की एक लहर सी दौड़ गई
पर देविका खुश नजर नही आ रही थी
इसके बाद देविका ने मुझसे एक और सवाल किया
बहुत ही हिचकिचाते दबी-दबी आवाज में उसने मुझसे
पूछा- तुम्हारी वाइफ बहुत खूबसूरत है।
मैंने कहा हाँ वो बहुत खूबसूरत है झील सी गहरी आँखे, सुनहरे बाल और बड़ी प्यारी सी उसकी मुस्कान।
देविका का चेहरा देखने लायक था ऐसा लगा जैसे उसे कुछ खास अच्छा नही लगा मेरी बाते सुनकर।  इसके बाद तो मैंने जमकर अपनी वाइफ की तारीफ करना शुरू कर दिया।
ट्रेन चलने वाली थी देविका ने मुझे टोकते हुए कहा बस- बस बहुत है ट्रेन चलने वाली है चलते है।
हम जाकर वापस गाड़ी में बैठ गये। देविका उदास सा चेहरा बना चुपचाप बैठी हुई थी शायद मन ही मन कुछ सोचे जा रही थी उसका उदास चेहरा मुझे बिल्कुल अच्छा नही लग रहा था पर क्या करूँ दो साल तक मैं भी तो कितना परेशान रहा उदास रहा।
इसलिए इसे थोड़ा परेशान करना तो बनता है।
मैंने आने बहाने कर अपने दोस्त से अपनी जगह बदल ली। अब मैं देविका के बिल्कुल सामने बैठा हुआ था।
देविका की आँखो में मेरे लिए गुस्सा साफ नजर आ रहा था। मैं बस इस इंतजार में था की वो अपनी नाराजगी मुझ पर जताये। पर वो चुप रही। सफर खत्म होने वाला था ट्रेन कानपुर पहुँचने वाली थी।
ट्रेन के रुकते ही यात्री उतरना शुरू हो गये हम सब प्लेटफॉर्म पर थे देविका मुझसे बिना कुछ कहे चली जा रही थी मैंने उसका हाथ पकड़कर उसे रोक लिया
और कहा- पहले भी ऐसे ही बिना बताये मेरी लाइफ से चली गयी थी अभी भी बिना कुछ कहे जा रही हो।
मुझसे जिसकी इतनी तारीफ सुनी क्या एक बार उसकी फोटो भी नही देखोगी। मैंने अपने पॉकेट में से पर्स निकाला और देविका को पर्स में लगी फोटो दिखाई। देविका की आँखो से मोटे- मोटे मोती के जैसे आँसू छलकने लगे। मेरे पर्स में किसी और की नही बल्कि उसी की ही फोटो है। मैंने उससे कहा - कभी भी पूरी बात जाने बिना या सच को जाने बिना हमे कोई भी बड़ा फैसला नही लेना चाहिए।
मैंने किसी से शादी नही की। हाँ बस मेरे घर वाले मेरी शादी के लिए सोच रहे थे। लेकिन फिर मैंने देविका के बारे में अपने घर में सबको बता दिया था और उन्हें हमारे रिश्ते से कोई एतराज नही था पर ये बात मैं देविका को बता ही नही पाया क्योंकि उससे पहले ही वो जा चुकी थी।
और आज जाकर मिली है मैंने उसे सारी बात बता दी है देविका को इस बात का एहसास हो गया है की
उसे इतनी जल्दी फैसला नही लेना चाहिए था। उस वक्त मुझे इस बात से ज्यादा दुख पहुँचा था की उसने मुझ पर भरोसा क्यों नही किया। सोचा था जब भी मिलूँगा खूब गुस्सा करूँगा पर नही कर सका।
देविका को देखते ही सब भूल गया।
मैं खुश हूँ आखिर देविका और मैं फिर मिल गये।












चुपके- चुपके



जब कहीं जाना हो तब लेट जरूर होते है पर फिर भी मैंने जल्दी- जल्दी अपना सामान पैक किया और टेक्सी में बैठ स्टेशन पहुँच गई। दिवाली की पाँच दिन की छुट्टी ऑफिस से मिली ही है पर मैंने पाँच दिन की और लेली। स्टेशन पहुँची तो भीड़ का सामना करना पड़ा । कोई अपने घर अपने शहर जा रहा था तो कोई आ रहा था। कितने ऐसे लोग है जो या तो पढ़ाई के लिए या फिर जॉब की वजह से अपने घर से दूर दूसरे शहर जाकर रह रहे है। मैं भी उनमे से एक हूँ। भीड़ का सामना करते हुए मैं जैसे- तैसे गाड़ी  के पास पहुँच गई और अपनी सीट पर जा बैठी। सीट पर बैठने के बाद मैंने एक लम्बी गहरी साँस ली। बिल्कुल वैसी ही जैसी कोई रेस जितने के बाद लेते है और खुद से कहते है आखिर मैं जीत ही गयी या जीत ही गया।
   अब मन में थोड़ी खुशी महसूस हो रही है वो इसलिए के आखिरकार मैं घर जा पा रही हुँ। छूट्टी तो मिल गई थी पर रिजर्वेशन कंफर्म नही हो पा रहा था। जोकि बाद में हो ही गया। वैसे ये पहली बार ही है जो मैं अकेले जा रही हूँ वर्ना हमेशा जब भी घर जाना हो तब पापा मुझे लेने आते है।इस बार किसी वजह से वो नही आ सके तो मैंने उन्हें  कह दिया है की वो फिक्र ना करे मैं अकेले बिना किसी परेशानी के ठीक से आ जाउंगी।
घड़ी में चार बजे और ट्रेन चलना स्टार्ट हो गई। यात्री अपनी - अपनी सीट पर आकर बैठ गये।
मेरे बगल वाली सीट पर एक शादी शुदा जोड़ा बैठा हुआ है  जोकि साथ में बड़े अच्छे लग रहे है। और सामने वाली सीट पर भी कुछ लोग है जोकि आपस में खूब बाते किये जा रहे है इन्हें देखकर लगता है कि
शायद ये एक ही ऑफिस के स्टाफ मेंम्बर्स है क्योंकि वे साथ मिलकर  किसी  टॉपिक पर डिस्कशन कर रहे है इनके साथ बैठा एक और शक्स है जिसको शायद अपने साथियो के डिस्कशन में कोई दिलचस्पी नही है वह अपने हाथ में मैग्ज़ीन थामे कुछ पढ़ रहा है जिस तरह से उस व्यक्ति ने मैग्ज़ीन पकड़ी हुई है उससे उसका चेहरा नजर नही आ रहा है।
वैसे मैं कभी किसी पर ऐसे ज्यादा ध्यान नही देती हूँ  वो तो अभी मैं अकेली हूँ और थोड़ा बोर हो रही हूँ इसलिए नजर आसपास बेठे लोगों पर जा रही है।
थोड़ी देर शांत बेठे रहने के बाद मैं अपने मोबाइल से गाने सुनने लगी। गाने सुनते वक्त मेरी नजर दोबारा
सामने बैठे लोगों पर पड़ी और साथ ही उस सक्श पर भी जो मैग्ज़ीन पढ़ रहा था इस वक्त उसका चेहरा साफ नजर आ रहा था काले चमकीले बाल गेहुआ रंग और हल्की भूरी आँखे। हम दोनो की ही नजरे टकरा गई और कुछ पल के लिए तो थम सी ही गई। देवांश, ये देवांश है उसे देख साफ पता चल रहा था कि उसने भी मुझे पहचान लिया।
हमारी मुलाकात कॉलेज में युवा उत्सव फंक्शन के दौरान हुई थी। मुझे याद है मैं और मेरे फ़्रेंड्स अपनी परफॉमेंस के लिए रेडी थे और बैक स्टेज अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। तभी देवांश आया ट्रेडिशनल लुक में थोड़ा हैरान सा उसने आते ही हमसे कहा सुनिये हमारी परफॉमेंस आपसे पहले है प्लीज़ हमे आगे जाने दीजिये। देवांश और उसका ग्रुप दूसरे कॉलेज से थे। वो सिर्फ युवा उत्सव में अपनी परफॉमेंस देने आये थे। ये हम पहली बार मिले थे। हमारे ग्रुप को
सेकेंड प्राइस मिला जबकि देवांश के ग्रुप को फर्स्ट
प्राइस मिला। फिर प्रतिभागईयो की साथ में फोटो
ली जाने लगी। मैं फर्स्ट न आने की वजह से थोड़ी सेड थी इसलिए उदास सा चेहरा बनाकर खड़ी हुई थी। तब देवांश ने मुझे मुस्कुराते हुए स्माइल करने का इशारा दिया। मैं समझ गई थी कि देवांश मुझे फोटो के लिए स्माइल करने को कह रहा है मैं थोड़ा सा मुस्कुराई और फोटो क्लिक हो गई। इसके बाद सभी
प्रतिभागी एक दूसरे से मिले , जो जीते उन्हें बधाई दी गई। इसी बीच देवांश और मेरी बात भी हुई बहुत ज्यादा नही बस थोड़ी। पर मेरे लिए ये बहुत थी क्यों
ये तो पता ही नही।
इस दिन के बाद हम फिर मिले मेरे फ़्रेंड की पार्टी में। फंक्शन के दौरान शायद ऋषि और देवांश की दोस्ती हो गई थी  इसलिये तो ऋषि ने देवांश को भी बुलाया था आज हमारी बात तो नही हुई हाँ बस मुलाकात
हुई चुप-चुपके मेरी नजरे देवांश को ही देख रही थी।  करीब दो महीने बाद ,
मैं एक दिन शॉपिंग के लिए मॉल गई हुई थी तब वहीं
अचानक देवांश और मेरी एक बार फिर मुलाकात हो गई। सबसे पहले हमने एक दूसरे को हाय - हेलो कहा बिल्कुल उसी तरह जब दो लोग एक दूसरे को पहचानते तो हो बस जानते नही वैसे ही। वैसे मेरी शॉपिंग पूरी हो गई थी पर मैं थोड़ा थक भी गई थी जो शायद देवांश को मुझे देखकर समझ आ गया था। इसलिए उसने मुझे कॉफी ऑफर की और मैंने हाँ कह दिया क्योंकि मैं कुछ देर आराम से बैठना चाह रही थी मैं और देवांश कैफे में बिल्कुल आमने -सामने बैठे थे कॉफी तो पी ली थी पर अब बात क्या करे ये समझ नही आ रहा था मैं कभी यहाँ- वहाँ देखती तो कभी देवांश की ओर देखती
और देवांश , वो भी कभी कॉलेज के फंक्शन की बात करता तो कभी ऋषि की पार्टी की। कुछ देर बाद तो वो भी चुप बैठ गया। फिर मैंने ही बात करना शुरू किया।
कॉफी अच्छी थी ना, मैं पहले भी यहाँ आ चुकी हूँ फिर देवांश ने कहा हाँ। ऐसे ही धीरे-धीरे बात करते हमने दो
घन्टे तक बाते की। और क्योंकि अब दोस्ती हो गई तो कभी - कभी मुलाकाते भी होने लगी। लेकिन अब हम जब मिलते थे तो होता ये था की देवांश बाते करता और मैं चुपचाप उसे देखती रहती क्या करती मुझे उसे देखते रहना ही अच्छा लगता था। ऐसे ही ही हमारी लाइफ आगे बढ़ी जा रही थी। पर
एक दिन मुझे पता चला कि देवांश की शादी फिक्स हो गई है उसके घरवालो ने ही उसके लिए एक लड़की पसन्द कर ली है। देवांश ने मुझे इस बारे में कुछ नही
बताया पर मुझे उसके दोस्तो से ये बात मालूम हुई।
मैं नही जानती थी के देवांश का क्या फैसला है पर मैंने
एक फैसला ले लिया। मैं बिना कुछ कहे बिना कुछ बताये देवांश की लाइफ से दूर हो गई।  ना कोई बात ना मुलाकात। मुझे जबलपुर में जॉब मिल गई और मैं यहाँ आ गई। मैं नही चाहती थी की मेरी वजह से उसकी लाइफ में कोई भी प्रोब्लम आये। बस इसलिए यहाँ आ गई।
आज दो साल बाद मैंने देवांश को देखा बिल्कुल नही बदला वैसा ही है पहले जैसा। उसने भी मुझे देख लिया है पर ना वो कुछ कह रहा है और ना मैं। आज हम दोनो ही चुप है। हम एक दूसरे को पहचानते भी है और जानते भी है  पर फिर भी आज अजनबी है।















नीला आसमा



आसपास शोर दिन भर की भाग दौड़ घड़ी की सुई के
साथ - साथ मैं भी दौड़े जा रही थी। सुबह जल्दी ऑफिस जाना थक कर घर आना और आकर घर के 
काम निपटाना और इसी बीच अगर मार्केट जाना पड़
जाये फिर तो हालत ऐसी जैसे कोई फूल जो सुबह खिला रहता है और शाम होते - होते मुर्झा जाता है।
कुछ टाइम से लाइफ ऐसी ही तो चल रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे कोई भारी सी चीज मेरे सिर पर रखी हो और मैं उससे दबी जा रही हूँ। मेरा मन खुश नही था। ऐसा नही था की कोई बहुत बड़ी परेशानी हो या
कोई बड़ा दुख हो। बस रोज की भागदौड़ से थोड़ा थक गई। पाँच साल से बस ऐसी ही जिंदगी चल रही है ऑफिस से घर, घर से ऑफिस और बीच में कभी कभार मार्केट चले जाना।
एक बार ऑफिस मीटिंग में मुझे प्रजेंटेशन देनी थी वैसे मैंने हमेशा अपना काम अच्छे से ही किया है पर इस बार मैं उतना अच्छा नही कर पाई। धीरे-धीरे मेरी परफॉमेंस खराब होने लगी। मैं समझ नही पा रही थी के काम का प्रेशर ज्यादा है या मैं ही उसे ज्यादा समझ रही हुँ। कोई भी काम ठीक से नही हो पा रहा था।
आज मुझे माँ की याद आ रही है और साथ ही अपना बचपन भी और अपने घर की छत भी। मुझे घर की छत पर खड़े होकर दूर तक देखना अच्छा लगता था।
हमारे घर की छत से कुछ ही दूर सामने देखने पर हरा-भरा खेत नजर आता था जिसे देखकर बड़ा अच्छा लगता था। और साथ ही नजर आता था नीला आसमा। मैं रोज नीले आसमा को देखती रहती और सोचती रहती की ये नीला क्यों है अपने सवाल के जवाब मैं खुद ही ढूंढने की कोशिश करती लेकिन जब उत्तर नही मिला तो मैंने माँ से पूछा- माँ ये आसमा नीला क्यों  दिखाई देता है तब माँ ने कहा क्योंकि इसका रंग नीला है इसलिए। माँ को भी नही पता था के आसमा नीला क्यों है। सवाल का उत्तर भले ही न मिला हो पर मैं नीले आसमा को अभी भी बड़े गौर से देखती थी कितना चुप कितना शांत उसे देख मन को सुकुन सा महसूस होता था। मैं उस नीले आसमा से बहुत कुछ कहती थी पर वो मुझसे कुछ नही कहता था। बस मेरी सारी बात सुनता रहता था। 
आज मैने काफी देर तक बैठकर यही सोचा की ऐसा क्या करूँ की इस भागती दौड़ती लाइफ में कुछ पल मन को सुकुन मिल सके। वैसे जब घर की याद आई तो समझ आ गया था की मुझे क्या करना है।
मैंने ऑफिस से 10 दिन की छुट्टी लेली। और निकल गई अपने घर के लिए। घर पर सभी मुझे देखकर बहुत खुश हुए मुझे भी अच्छा लगा अपने घर आकर अपने अपनो से मिलकर। इन दस दिनों में लाइफ इतनी बदल गई की क्या कहूँ किसी काम की कोई चिंता नही अपनी छोटी बहन के साथ मैं हर पल खूब इंजॉय कर रही हूँ और माँ पापा सभी मुझे बहुत लाड कर रहे है। और हाँ बचपन की तरह मैं  अभी भी अपने घर की छत पर जाकर दूर तक अपनी नजरे दौड़ा रही हूँ। अच्छा लग रहा है सब कुछ। और वो खेत वो जो दूर सामने नजर आ रहा है हरा- भरा। मैं बिल्कुल सही समय पर आई हूँ इस समय खेत हरे भरे रहते है। 
जिसे देखकर बड़ा अच्छा लगता है। 
खेत के साथ - साथ मुझे नीला आसमा भी दिखाई दे रहा है। जिसे मैं बचपन मैं देखा करती थी अभी भी वैसा ही शांत चुप सा है। मैं कई देर तक इसे देखती रही पता नही क्यों इस नीले आसमा को देखकर मुझे सुकुन मिलता है। ऐसा लगता है जैसे ये अपने अंदर बहुत कुछ समाये हुए है लेकिन तब भी कितना शांत है
और बहुत खूबसूरत भी। ऐसा नही की मैं जहाँ अभी रह रही हूँ वहाँ का आसमा नीला नही है वहाँ भी आसमा ऐसा ही है बस वो अपनापन वो सुकुन वहाँ नही है जो यहाँ है।
इन दस दिनों मैं मैने बहुत सुकुन महसूस किया। अब मन खुश है मैं नई एनर्जी और खुशी लिए वापस जा रही हूँ। इन दिनों लाइफ जैसी रही उससे एक बात समझ आ गई की काम के बीच एक ब्रेक बहुत जरूरी है। ताकि आप एक नई एनर्जी के साथ खुश मन और शांत दिमाग से काम कर सके। जैसे मैंने किया।
मुझे अपने घर जाकर जो खुशी और सुकुन मिला उससे मैं बहुत अच्छा और काफी फ्रेश फील कर रही हुँ। हम सब की लाइफ में कुछ तो ऐसा होना ही चाहिए 
जिसे देखकर या जहाँ रहकर हमे खुशी मिले है ना।




आजकल



जब भी हम अपने किसी रिश्तेदार या किसी दोस्त से मिलते है तो वे ये सवाल जरूर करते है की - क्या चल रहा है आज कल। मतलब ये की आज कल आपकी लाइफ में क्या हो रहा है। अभी कल की ही बात है
सुबह- सुबह मैं वॉक पर गया था लौटते वक्त मुझे रास्ते में मिश्रा अंकल मिल गये। अंकल कहने लगे
अरे भई विपुल बडे दिनों बाद दिखे। कैसे हो ?
मैंने कहा अंकल मैं बिल्कुल ठीक हूँ। अंकल ने फिर
पूछा क्या चल रहा है आज कल। मैने उत्तर देते हुए कहा आपके आशीर्वाद से सब ठीक चल रहा है।
अंकल ने कुछ देर मुझसे बात की और फिर चले गये। मैं भी घर आ गया बाहर का गेट खोलकर अंदर जा रहा था की आवाज आई। भाई साहब ओ विपुल भाई साहब मैंने पीछे पलट कर देखा हमारे पड़ोसी विजयदास थे कहने लगे कहाँ गायब रहते है दिखते ही नही क्या चल रहा है आज कल। मैंने कहा सब बढ़िया। ये कहकर मैं सीधे घर में आ गया।
शाम को हमे एक बर्थडे पार्टी में जाना था मैं ,मेरी वाइफ और मेरा बेटा हम पार्टी में पहुँचे। क्योंकि पार्टी रिश्तेदार के घर थी तो वहाँ और अन्य रिश्तेदारों का मिल जाना कोई आश्चर्य की बात नही थी। एक के बाद एक कई रिश्तेदारों से मुलाकात हुई।
सबसे पहले मौसीजी मिल गई मेरी मौसी नही मेरी माँ की मौसी। मौसी की काफी उम्र हो चली है अब तो उन्हें ठीक से सुनाई भी नही देता इससे समस्या ये होती है की वो तो अपनी बात कह देती है और हमारी कुछ भी
नही सुनती। वो मुझसे हालचाल पूछ रही थी मैं उन्हें तेज आवाज में कह रहा था सब ठीक है, सब ठीक है पर उन्हें है की कुछ सुनाई ही नही दे रहा था उल्टा वो मुझसे बार - बार कह रही थी क्या हालचाल है कुछ कह क्यों नही रहे बेटा। मेरा तो गला ही सुख गया और मौसीजी को कुछ सुनाई ही नही दिया। और कुछ न कहते हुए मैं पार्टी में आये मेहमानों के बीच जाकर बैठ गया। मैं जहाँ बैठा था वही आगे वाली कुर्सी पर
मौसाजी बैठे थे माँ के मौसा जी नही मेरे मौसाजी।
मुझे देखते ही मौसाजी बोले विपुल बेटा कैसे हो आजकल मैने मौसाजी के पैर छुकर आशीर्वाद लिया और कहा ठीक हूँ मौसाजी। मौसाजी यूँ तो मन के अच्छे है पर उन्हें दुसरो के जीवन के बारे में जानने की बड़ी उत्सुकता रहती है कि किसके जीवन में क्या चल रहा है। मुझसे भी मौसाजी पूछ रहे थे क्या चल रहा है आज कल। घर, नौकरी सब ठीक ठाक चल रहा है के नही। कोई समस्या हो तो बताओ।
मैंने नम्रता के साथ कहा हाँ मौसाजी सब ठीक है। कुछ देर तक मौसाजी ने यहाँ- वहाँ की बाते की और फिर उठकर कही चले गये। पर मैं वही बैठा रहा। कुछ पल
शांति से बैठा था की मेरा चचेरा भाई आ गया। उसने
भी मुझसे मेरे आजकल के बारे में जाना। और फिर वो मुझे पार्टी में आये सभी रिश्तेदारों से मिलाने ले गया सभी ने मुझसे मेरे आजकल का हाल जाना। फिर मैंने भी उनसे पूछ ही लिया क्या चल रहा है आजकल।
पर जब मैं घर आया तो रात को मैं आजकल के बारे में ही सोचता रहा और आज भी सुबह उठकर मैं इसी विषय के बारे में सोच रहा हूँ। ये आजकल कितना विशेष है हर व्यक्ति आजकल को ही जानना चाह रहा है। हर किसी व्यक्ति की जबान पर आजकल ही है।
पता है ये क्यों है क्योंकि हमे अपने आजकल से ज्यादा दूसरे के आजकल को जानने में बड़ी रुचि है। मैं तो
थक ही गया कल अपने आजकल का हाल बताते अब यही सोच रहा हूँ की हे भगवान अब कोई न पूछे की क्या चल रहा है आजकल।
पर जब ऑफिस पहुँचा तब मेरे पहुँचते ही ऑफिस के एक साथी ने पूछ ही लिया विपुल जी कुछ दिनों से आपसे बात ही नही हुई क्या चल रहा है भई आजकल।
तब मैंने कहा जी सब बढ़िया है आजकल।


फूल







कई साल बाद आज अपने गाँव जा रहा हूँ गाँव की तो बात ही अलग है शहर के शोरगुल के विपरीत शांत वातावरण , पेड़ो की शुद्ध ठंड़ी हवा जो तन को छुते ही मन को सुकून पहुँचा दे। गाड़ी में बैठे- बैठे मुझे आज वो पल याद आ रहे है जो मैंने अपने गाँव में बिताये है। खिड़की से बाहर देख रहा हूँ तो सब कुछ वैसा ही लग रहा है जैसा पहले था कच्ची- पक्की सड़क, सड़क किनारे खेत, खेतो में काम करते लोग कुछ नही बदला। जैसे ही मेरी गाड़ी गाँव की सीमा पर पहुँची मैंने ड्राईवर से कहा- हाँ भईया ये जो मोड़ दिख रहा है जहाँ बोर्ड लगा है, लिखा है ग्राम सुहानपुर यही मेरा गाँव है गाड़ी इसी रास्ते पर ले चलो। इसी रास्ते पर थोड़े आगे जाकर मेरा स्कूल है पर इससे पहले कुछ और भी है जो रास्ते में पड़ता है एक बाग जिससे मेरी खास याद जुड़ी हुई है।
गाँव में घूमते-घामते आखिर मैं वहाँ आ ही गया जहाँ मुझे आना था मेरा घर , जहाँ कभी मैं और मेरा परिवार रहता था। जो सामान जहाँ जैसा छोड़कर गये थे सब वैसा ही है। मैंने घर में रखी लकड़ी की अल्मारी भी खोलकर देखी कुछ थोड़ा बहुत सामान है इसमे। सामान के बीच मेरे हाथ आई किताब।
ये किताब तब की है जब मैं दसवी कक्षा में था मैंने किताब के पन्नो को पलटना शुरू किया और तब हाथ आया एक फूल एक सूखा फूल। इस फूल से मेरी एक खास याद जुड़ी हुई है।
ये बात तब की है जब मैं स्कूल में पढ़ता था
मेरी ही क्लास में एक लड़की थी रिमझिम। जोकि मुझे अच्छी लगती थी। और रिमझिम को अच्छे लगते थे फूल वो भी फूलबाग के। हमारे स्कूल से कुछ दूर पर फूलो का बाग था उस बाग में बड़े ही खूबसूरत फूल लगते थे। मैं हर रोज फूलो की चोरी करता और रोज
रिमझिम को फूलबाग के खूबसूरत फूल लाकर देता। रिमझिम फूल लेकर बड़ी खुश हो जाती। ये सिलसिला
हर रोज का हो गया था। पर रोज -रोज चोरी करना कोई आसान बात तो है नही। कोई रोज फूल चुरा रहा है इस बात की खबर बृजेश काका जोकि वहाँ के
चौकीदार थे उन्हें हो गई थी। फिर क्या था बाग का पहरा बढ़ गया। और मेरे लिए फूल चुरा पाना थोड़ा मुश्किल हो गया। एक दिन मैं हर रोज की तरह सुबह जल्दी अपने दोस्त के साथ फूल तोड़ने चला गया। मेरा दोस्त मेरी मदद के लिए सड़क किनारे खड़ा हो गया ताकि अगर कोई आये तो वो मुझे बता सके और मैं बाग के अंदर चला गया मैं सिर्फ एक ही फूल तोड़ पाया था की आवाज आई चोर-चोर , चोर- चोर मैने देखा काका डंडा लेकर मेरी ओर ही आ रहे थे तब हालात ये थे की मैं आगे दौड़ रहा था और काका मेरे पीछे। उस दिन तो पूरे बाग के चक्कर ही लगा दिये थे मैंने। और मेरा दोस्त उसने तो ऐसी दोस्ती निभाई की मुझे छोड़कर भाग गया। खैर मैं भी जैसे- तैसे बचकर भाग निकला। और अच्छा ये था की काका ने अपना नजर वाला चश्मा नही पहना हुआ था इसलिए वो मुझे पहचान ना सके। मैं काका से तो बच निकला था पर अपने घर पर फस गया था क्योंकि पिताजी ने जो , मुझे इतनी सुबह बाहर से आते देख लिया था मैंने फूल तो छिपा लिया था पर पिताजी के सवाल से न बच सका। मैं पिताजी से बहुत डरता था उनके सामने तो मेरी आवाज भी नही निकलती थी। जब उन्होंने पूछा की कहाँ से आ रहे हो तब मैंने हिम्मत कर धीमी आवाज में उत्तर देते हुए कहा- पिताजी मैं टहलने गया था आप ही कहते है ना हमे सुबह जल्दी उठकर टहलना चाहिये सुबह उगते हुए सूरज को देखना चाहिए।
मैंने ये कह तो दिया पर डर के मारे मेरा दिल जोर- जोर से धड़के जा रहा था क्योंकि पिताजी से झूठ बोलना आसान नही है वो तो मेरी किस्मत अच्छी थी की पिताजी ने मेरी बात पर भरोसा कर लिया और मैं बाल-बाल बच गया।
आज जब मैं स्कूल पहुँचा तो मैं मन ही मन इस बात से खुश हो रहा था की चाहे कितनी भी परेशानी आई पर मैं रिमझिम के लिए फूल ले ही आया और मैंने उसे दे भी दिया और हर बार की तरह वो फूल लेकर बड़ी खुश भी हुई। उस दिन के बाद भी मैं रिमझिम के लिए फूल लाता रहा।
पर एक दिन ऐसा आया की रिमझिम मेरे लिए फूल लेकर आई थी। उस दिन मैं गाँव छोड़कर शहर जा रहा था पिताजी की सरकारी नौकरी थी उनका तबादला शहर हो गया था और इसलिए हम जा रहे थे। उस दिन रिमझिम ने मुझे फूलबाग का फूल लाकर दिया था जिसे मैंने अपनी किताब के पन्नो के बीच रख लिया था। हमारी ये फूल की कहानी उस दिन खत्म हो गई। आज रिमझिम कहाँ है ये तो मुझे नही पता पर फूल बाग में फूल अभी भी खिले हुए है।


शिकायत



कभी न कभी एक दिन ऐसा जरूर आता है जब हमारे अपनो को हमसे और हमे उनसे कोई शिकायत जरूर होती है। जिसे हम कभी ज़ाहिर कर भी देते है और कभी नही भी करते है। मैं जब छोटी थी तब मुझे अपने मम्मी पापा से शिकायत थी की वो मुझे टाइम ही नही देते  हर वक्त बस बिज़ी रहते है दोनो ही अपना-अपना अलग बिज़नेस कर रहे थे। और सबसे आगे जाने की होड़ में लगे हुए थे। ना उनके पास एक दूसरे के लिए समय था और ना ही मेरे लिए। उन्हें देखकर में यही सोचती थी के मैं कभी किसी बिज़नेस मेन से शादी नही करूँगी और ना ही मैं खुद कभी कोई भी बिज़नेस करूँगी। पर जैसे - जैसे बड़ी होती गई मुझ पर अपनी फैमली, सोसायटी का प्रभाव पड़ने लगा। मैं भी उनकी तरह बहुत प्रैक्टिकल हो गई। और एक दिन मेरी शादी हो गई प्रनव से। प्रनव भी बिज़नेस करते है जिससे मुझे अब कोई शिकायत नही थी हो भी क्यों क्योंकि मैं खुद भी यही कर रही थी। मैने शादी के पहले ही अपना खुद का बिज़नेस स्टार्ट कर दिया था जिसमे पापा ने मेरी हेल्प की थी। प्रनव को भी इससे कोई प्रोब्लम नही थी। अब हाल ये था की मैं तो हर वक्त बिज़ी थी मुझे लगा की प्रनव भी पापा की तरह होंगे बिल्कुल प्रैक्टिकल इसलिए मैं कभी ये नही सोचती थी की वो मेरा साथ चाहते है या मेरा साथ देना चाहते है।
ऐसा कई बार हो जाता था की मैं कभी-कभी ऑफिस से आने में लेट हो जाती थी तब प्रनव मुझे जागे ही मिलते थे कभी लेपटॉप पर काम करते तो कभी फोन पर किसी से बात करते तब मुझे यही लगता था की वो बिज़नेस से जुड़ा अपना कुछ काम कर रहे होंगे।
मेरे लेट आने पर प्रनव ये जरूर पूछते थे की तुमने डिनर कर लिया और तब मेरा जवाब हाँ होता था। फिर मैं भी यही सवाल उनसे कर लेती थी तब उनका हाँ ऐसा लगता था मानो जैसे हाँ में कुछ और कह गये हो। जो शायद मुझे तब समझ नही आता था।
मैंने देखा है की अक्सर त्यौहारो पर ऐसा हो जाता था के पापा को बिज़नेस मीटिंग के लिए शहर से बाहर जाना पड़ जाता था। पापा कभी भी मीटिंग केंसिल नही करते थे। और मैं ठहरी पापा की बेटी मैं भी काम को ज्यादा इम्पोर्टेंस देती थी। इसलिए चाहे कुछ भी हो मैं कभी कोई मीटिंग कोई काम केंसिल नही करती थी। पर प्रनव अलग निकले वो तो त्यौहारो के समय अपने वर्कर्स को भी तीन दिन पहले से ही छुट्टी दे देते है और खुद भी घर पर रहते है।
दिवाली का दिन था मैं घर पर ही थी पूजा शुरू होने वाली थी अचानक मुझे कुछ काम आ गया और मुझे जाना पड़ा। मैं कुछ ही देर में वापस आ गई थी पर मेरे पहुँचने के पहले ही पूजा हो गई थी। ये प्रनव और मेरी साथ में दिवाली की पहली पूजा थी मुझे लगा प्रनव शायद कुछ कहेंगे पर वो कुछ नही बोले। हमारी जिंदगी इसी तरह आगे बढ़ती रही और शादी को पूरे एक साल होने वाले थे।
मैंने अपने घर में ये देखा था की मम्मी पापा अपनी शादी की सालगिरह पर पार्टी देते थे और अपने सारे रिश्तेदारों और खास कर अपने बिज़नेस से जुड़े लोगों को ,पार्टनर्स को जरूर बुलाते थे। मुझे लगा की मुझे भी यही करना चाहिए प्रनव और मैं भी बिजनेस से जुड़े अपने फ़्रेंड्स को ,जान पहचान वालो को पार्टी में बुलाएंगे जोकि हमारे लिए अच्छा ही होगा। ये फैसला मैने खुद ही ले लिया था मुझे लगा प्रनव को इससे कोई प्रॉब्लम नही होगी मैंने तैयारी भी शुरू कर दी थी पर जब प्रनव को मैंने बताया तब वो इस बात से खुश नजर नही आये। और बिना कुछ बोले अपनी मीटिंग के लिए चले गये। मैं भी अपने ऑफिस आ गई मन नही था मेरा। पर मैं फिर भी आ गई।
आज मेरी निशि से बात हुई उसने बताया की उसके पति और उसका हमेशा झगड़ा होता रहता है उन दोनो को एक दूसरे से हमेशा शिकायतें ही रहती है।
निशि से बात करने के बाद आज मैं खुद के और प्रनव के बारे में सोच रही हूँ। मैं हर वक्त बस प्रैक्टिकल होकर ही जीती रही बिना ये जाने की प्रनव क्या सोचते है अपने काम को लेकर , रिश्तो को लेकर। उन्हें मुझसे कोई शिकायत तो नही मैंने ये कभी नही सोचा। और उन्होंने कोई शिकायत कभी की भी नही।
आज मुझे दादी माँ की बात याद आ रही है वो कहती थी के "अगर कोई शिकायत नही करता तो इसका मतलब ये नही के उसे कोई शिकायत नही " बस वो कहना नही चाहता। मैं जानती थी के कही न कही गलती मुझसे ही हुई है मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया था आज मैं जल्दी घर पहुँच गई ताकि प्रनव से बात कर सकूँ। उनके आते ही मैंने बात करना शुरू कर दिया प्रनव मुझे हैरान नजरो से देख रहे थे डिनर के बाद जब प्रनव बाहर गार्डन के झूले पर बैठे हुए थे तब मैं भी उनके पास जाकर बैठ गई आज हम बहुत देर तक साथ बैठे रहे बिना कुछ कहे चुपचाप।
 रात भर मैं यही सोचती रही की प्रनव कितने अलग है उन्हें मेरी फिक्र है मेरे लेट हो जाने पर वो मेरा इंतजार करते, काम न होते हुए भी वो लेपटॉप लेकर बैठ जाते ताकि मेरे आने तक जागे रहे। बस कभी कहते नही की मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था। कभी-कभी वो डिनर के लिये भी मेरा इंतजार करते थे पर हो ऐसा जाता था की उस दिन या तो में बाहर से कुछ खाकर आती थी या फिर लेट हो जाती थी। मैं पूजा में तक उनके साथ नही थी। पर प्रनव ने कभी कोई शिकायत ही नही की। लेकिन आज मुझे खुद, खुद से शिकायत है मैंने प्रनव और अपने रिश्ते को कोई महत्व ही नही दिया। रोना आ रहा था मुझे , ये सोचकर की मैं कितनी नादान थी जो प्रनव को समझ ही ना सकी।
सुबह मैंने प्रनव से बात करने की कोशिश की पर वो मुझसे नजर ही नही मिला रहे थे न कुछ कह रहे थे।
शिकायत तो थी उन्हें मुझसे बस वो कह नही रहे थे। मैंने ही रिश्ता ऐसा बनाया की वो अपना हक समझ मुझसे कुछ भी नही कहते।
फिर मैंने ही थोडी तेज आवाज में शब्दो पर जोर देते हुए कहा- नाराज है मुझसे, अगर कुछ शिकायत है तो कहते क्यों नही आप चुप क्यों रहते हो , मुझे पता है की कुछ शिकायते है आपको मुझसे बस आप कह नही रहे। बस इतना कह मैं चेहरा उदास कर चुपचाप बैठ
गई।
तब जाकर प्रनव बोले - शिकायत है नही , शिकायत थी वो भी तुम्हारी नादानी से तुम से नही।
धीरे -धीरे सब ठीक हो गया। वो शिकायतें जो कभी प्रनव ने की ही नही वो भी खत्म हो गई और जो मुझे खुद से थी वो भी।

अब मैंने हर वक्त प्रैक्टिकल होकर जीना छोड़ दिया है। मैं कोशिश करती हूँ कि ज्यादा से ज्यादा समय प्रनव के साथ रहूँ ताकि अब कोई शिकायत अगर हो  तो वो मुझसे कह सके अपने मन में ना रखे।




उलझन



रविवार का दिन यानी छुट्टी वाला दिन ऑफिस जाने की कोई चिंता नही। सुबह का चमकता सूरज निकल गया था उसकी किरणें खिड़की से होती हुई मेरे चेहरे पर पड़ रही थी जोकि की मुझे नींद से जगाने की कोशिश कर रही थी और मैं जागा भी। उठकर घड़ी में
देखा तो आठ बज रहे थे नताशा मुझसे पहले जाग चुकी थी और शायद किचन में थी। मैं अलसाया सा
अंगड़ाइयां लेते हुए जैसे-तैसे उठकर ब्रश कर हॉल में पहुँचा और सोफे पर जा बैठा। नताशा ने चाय लाकर मेरे सामने रख दी। मैंने चाय का कप उठाते हुए पूछा- तुमने चाय पीली। हाँ कहते हुए नताशा ने कहा तुम तैयार हो जाओ जब तक मैं अपना काम खत्म कर लेती हूँ। हम दोनो हर सन्डे को बाहर घूमने जाते है।
आज भी जायेंगे। 
मैं तैयार होने के बाद हॉल में आकर अखबार पढ़ने लगा क्योंकि अभी नताशा तैयार हो रही है जिसमे उसे काफी वक्त लगता है। इसलिए तब तक मैं अखबार ही पढ़ लेता हूँ। अखबार पढ़ना शुरू ही किया था कि डोर बेल की आवाज आई। मैंने उठकर दरवाजा खोला सामने पोस्टमेन था उसने मुझे नताशा के नाम का लेटर थमाया रजिस्टर पर साइन लिए और चला गया।नताशा के लिए उसके ऑफिस से लेटर आया था
उसका प्रमोशन लेटर। जिसमे लिखा था की उसका प्रमोशन जबलपुर हुआ है। मैंने लेटर अखबार के बीच में रख दिया। नताशा तैयार होकर आ गई थी हम दोनो घर से निकल गये। आज हम खुशी पार्क गये थे।
बहुत अच्छि जगह है ये। इसे बहुत ही बढ़िया तरह से तैयार किया गया है। यहाँ आकर हर इंसान खुशी ही महसूस करता है। बस शायद मैं ही नही कर पा रहा था।
जब हम कहीं बाहर से वापस घर आते है तो काफी थका महसूस करते है। कुछ यही हाल हमारा भी है नताशा तो थकान की वजह से जल्दी सो गई। पर मुझे
नींद नही आ रही थी। मैं काफी रात तक जागा रहा।
सुबह जब ऑफिस के लिए निकल रहा था। तब नताशा ने मुझे अपना प्रमोशन लेटर दिखाया। लेटर देखते ही मैं अपनी लड़खड़ाई जबान में बोला- अरे ये लेटर सॉरी मैं तुम्हे बताना भूल गया था ये कल आया था। अच्छा हुआ की तुम्हारे हाथ में आ गया। वैसे congratulation तुम्हारा प्रमोशन हो गया।
नताशा ने बहुत ही छोटी सी मुस्कान के साथ थैंक्यू कहा और फिर हम दोनो ऑफिस के लिए निकल गये।
मेरा आज ऑफिस में मन नही लग रहा था इसलिए मैं घर जल्दी आ गया। आज मन में कई सवाल उठ रहे है
जिनमें मैं खुद को उलझा महसूस कर रहा हूँ।
दो साल हो गये है हमारी शादी को। हमारा रिश्ता और पति पत्नी से अलग है ये एक उलझा हुआ सा रिश्ता है। हमारे रिश्ते में समझ की कोई कमी नही है समझ तो बहुत है कभी भी ऐसा नही हुआ के किसी भी वजह से हमारे बीच थोड़ी भी बहस हुई हो। हमने कभी भी एक दूसरे से किसी भी बात की कोई शिकायत ही नही की इसलिए के हम एक दूसरे को
बहुत अच्छे से समझते है। " ऐसा नही है शायद इसलिए के हम एक दूसरे पर अपना हक ही नही समझते " साथ रहते हुए भी हमारे बीच फासले रहे।
दोस्ती , प्यार ,अपनापन ये हमारे रिश्ते में कभी नही रहा। हम एक दूसरे के लिए अगर कुछ भी करते है तो अपनी जिम्मेदारी समझकर करते है अपना मानकर
कर नही। मैं नताशा से शादी नही करना चाहता था।
क्योंकि मैं किसी और को पसन्द करता था। नताशा
करियर में आगे बढ़ना चाहती थी। वो भी शादी से खुश नही थी। पर फैमली के आगे हमारी नही चली और हमारी शादी हो गई। नताशा ने मुझसे पहले ही कह दिया था की मैं कभी भी उसके कैरियर के आड़े नही आऊंगा। मैने भी ये कहते हुए हाँ कह दिया था की मुझे उससे कोई मतलब नही वो जो चाहे करे।
मैंने कभी भी उसकी लाइफ में कोई दखल नही दिया।
पर आज मैं उलझन में पड़ गया हूँ क्योंकि मैं क्या महसूस कर रहा हूँ वो मैं नही समझ पा रहा। कल मैंने
नताशा का प्रमोशन लेटर अखबार में छिपा दिया मैंने 
ऐसा क्यों किया मुझे समझ ही नही आ रहा। एक डर सा लग रहा है इस बात का के क्या नताशा चली जायेगी। मैं चाहता हूँ के वो ना जाये। पर मैं ऐसा क्यों चाहता हूँ जबकि हम दोनो के इस रिश्ते में कुछ ऐसा नही है जिसके लिए हम साथ रहे। हम तो हर सन्डे भी साथ घूमने सिर्फ इसलिए जाते है ताकि ऑफिस स्ट्रेस को कम कर अपने माइंड को थोड़ा फ्रेश कर सके। वो खामोश रिश्ता जिसमे हम जरूरत से ज्यादा एक दूसरे से बात तक भी नही करते क्या इस रिश्ते में भी कुछ ऐसा है जो हमे बांधे हुए है। शायद है। मैं नताशा को चाहता हूँ के नही ये तो नही पता पर उसके बगेर नही रह सकता ये जरूर समझ गया हूँ।
रात को डिनर के वक्त मैं नताशा से बात करना चाह रहा था जानना चाहता था की क्या वो जबलपुर जाने वाली है पर मैं नही पूछ सका पर फिर मैंने हिम्मत कर पूछ ही लिया क्या तुम जबलपुर जा रही हो। नताशा ने कहा -तुम क्या चाहते हो। मैंने घबराते हुए कह दिया मुझे कोई प्रॉब्लम नही है तुम जो चाहे फैसला लो। मैंने ऐसे जताया जैसे उसके जाने से मुझे कोई फर्क नही पड़ता। जबकि मन तो मना कर देने का था पर जब मैंने कभी अपना कोई हक समझा ही नही तो आज कैसे रोकलूँ।
आज मंडे है नताशा आज जा रही है। अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए वो मेरा सारा समान ठीक से जमाकर और मुझे बताकर जा रही है। की कौनसी चीज़ किस जगह रखी है। मैं भी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए उसे स्टेशन छोड़ने जा रहा हूँ कैसी उलझन है रोकना चाहता हूँ पर छोड़ने जा रहा हुँ  बहुत कुछ कहना चाहता हूँ पर खामोश हूँ। मैं नताशा को स्टेशन छोड़ आया रुका नही क्योंकि
उसे जाते हुए नही देख पाता। शाम हो गई थी मैं
घर आकर चुपचाप गुमसुम सा सिर झुकाए आँखे बंदकर बैठ गया। कुछ आवाज सी कानो में पड़ी मैंने देखा तो  टेबल पर चाय से भरा कप रखा हुआ था। और जब नजर उठाकर सामने देखा तो नताशा खड़ी हुई थी। ना होते हुए भी कुछ तो था हमारे रिश्ते मैं जिसकी वजह से नताशा आज नही जा सकी।

स्कूल में बचपन



बचपन , जीवन का वो हिस्सा है जो सबसे खूबसूरत माना जाता है किसी को कुछ याद हो न हो अपना बचपन सभी को याद होता है जब भी कभी किसी से ये पूछा जाता है कि अगर कुछ ऐसा हो जाये जिससे उसे अपने बीते कल को जीने का फिर से मौका मिल जाये तो वो किस पल को दोबारा जीना चाहेंगे। तब उत्तर यही होता है -बचपन। हम सब अपने बचपन को ही दोबारा जीना चाहते है पता है क्यों क्योंकि बचपन सबसे मासूम होता है बहुत मासूम।
आज नकुल का स्कूल में पहला दिन है मैंने रात को ही अलार्म सेट कर दिया था ताकि मैं सुबह जल्दी उठ जाऊ। उठते ही मैंने सारा काम जल्दी-जल्दी खत्म किया खुद भी तैयार हुई और नकुल का टिफिन तैयार किया और साथ ही उसका बैग भी जमाया पर सबसे मुश्किल नकुल को उठाना है और उसकी आँखो से नींद उड़ाना आखिर बच्चा है। बच्चे स्कूल में भी आधे नींद में रहते है। पर जैसे तैसे मैने नकुल की आँखो से नींद उड़ाई। उसे तैयार किया और हम पहुँचे स्कूल।
नन्हे- नन्हे छोटे- छोटे बच्चे बहुत ही प्यारे इन्हें देख मन इतना खुश हुआ की क्या कहूँ। नकुल भी अपनी उम्र के बच्चो को देख बड़ा खुश हो गया। पहले लग रहा था की पता नही ये स्कूल में रुकेगा भी के नही पर अब लग रहा है कि शायद रुक जायेगा। मैंने यहां की टीचर से बात करली थी की मैं कुछ वक्त यही स्कूल में रुकुंगी। मैं टीचर्स के स्टाफ रूम में बैठ गई और रूम की खिड़की से बाहर देखती रही। छोटे - छोटे बच्चे प्रेयर के लिए लाइन से खड़े हुए अपने दोनो हाथो को जोड़कर प्रेयर कर रहे वो कभी हिलते डुलते तो कभी अपनी लाइन से निकल कर दुसरो की लाइन में जाते ।
और टीचर को देखते ही बिल्कुल मासूम बनकर खड़े हो जाते। प्रेयर खत्म होते ही बच्चे अपनी क्लास में पहुँच गये। और फिर शुरू हुई पढ़ाई A फॉर एप्पल ,B फॉर बॉल शुरू में बच्चे बड़े उत्साह से पढ़ाई करते है। 
लेकिन कुछ ही देर बाद कोई बच्चा रोने लगता है ये कहकर की मम्मी के पास जाना है तो कोई बच्चा कहता है की उसकी तबियत खराब है अब उसे घर जाना है। फिर उनकी मेम बड़े प्यार से उन्हें मनाती है कई तरह की बाते बनाती। जिससे कुछ देर बच्चे बेहल जाते है। पढ़ाई के बाद समय होता है खेलने का।
लंच टाइम। बच्चे टिफिन फिनिश कर खेलने में लग जाते है और खूब उधम मचाते है। स्कूल में बच्चो को लंच टाइम ही सबसे ज्यादा पसन्द होता है। भागते दौड़ते एक दूसरे को पकड़ते। हस्ते मुस्कुराते हर बात से अंजान गम खुशी अच्छा बुरा कुछ भी नही पता।
चिंता फिक्र सबसे दूर अपने में ही मस्त और हर पल खुश। ना पढ़ाई की टेंशन ना करियर की और न ही किसी और चीज की बस हर पल मौज़ मस्ती और खूब खेलना। 
अपनी मीठी आवाज में मेम मेम बोलते 
और मासूम निगाहों से उन्हें देखते तोतली आवाज में मेम से कई तरह के सवाल पूछते कभी किसी बात पर खिलखिलाकर जोर से हँसने लगते तो कभी मुँह बनाकर रोने लगते। इन्हें देख ऐसा लगा जैसे ढेर सारे तारे एक साथ ज़मी पर आ गये। और सब चमचमा रहे हो। वैसे नकुल भी स्कूल आकर खुश था वो रोया नही। बैल बजी और सभी बच्चो के चहरे पर मुस्कान आ गई छुट्टी जो हो गई। सभी हस्ते मुस्कुराते बाहर आये जँहा उनके माता पिता उन्हें लेने के लिए खड़े थे सब दौड़कर अपने पेरेंट्स के पास गये और एक दूसरे को बाय कहकर घर चले गये।इन्हें देख मुझे तो अपना बचपन याद आ गया। सच में मैं भी इन्ही बच्चो की तरह मासूम और बड़ी  प्यारी थी अपने बचपन में। वैसे सभी का बचपन मासुमियत से भरा होता है जिसमे थोड़ी बहुत शैतानी भी शामिल है। है ना ☺️

हर बात से अंजान भोला मासुमियत भरा मन ऐसा होता है बचपन।

मेरी टीचर



कहते है बिना गुरु के ज्ञान नही मिलता अगर आप ज्ञान चाहते है शिक्षा चाहते है तो गुरु का होना जरूरी है। आज जब ऑफिस से घर आया तब मेरे बेटे ने मुझसे कहा कि पापा आपको पता है कल टीचर्स डे है हमारे स्कूल में कल टीचर्स डे मनाया जायेगा। मैं भी अपनी टीचर के लिए फूल ले जाऊंगा। मैने कहा हाँ बेटा जरूर ले जाना। इतनी बात कह वो अपने खेल में लग गया पर मुझे तो अपना बिता कल याद आ गया।
और याद आई अपनी टीचर की। लीना मेम मेरी फेवरेट टीचर। लीना मेम बहुत ही स्वीट मेम थी। मुझे आज भी याद है जब पापा मुझे होस्टल छोड़ने गये थे मैं बहुत नाराज था क्योंकि मुझे होस्टल में नही रहना था। मैं बहुत जिद कर रहा था और बार-बार पापा का हाथ छुड़ा कर भागने की कोशिश कर रहा था। मैं भागा कि सामने लीना मेम आ गई मैं उनसे टकरा गया। मेम ने मुझे रोते देख लिया था उन्होंने पहले मुझे चुप कराया और फिर पापा के पास ले गई। आप बस 5 दिन यहाँ रहकर देखो अगर आपको यहाँ अच्छा नही लगा तो मैं खुद आपको आपके घर छोड़कर आउंगी। बस इतना कहकर लीना मेम चली गई। मैं होस्टल में
रह गया अपने मन से नही बल्कि पापा आखिरकार मुझे छोड़ ही गये। सुबह जब रेडी होकर मैं अपने रूम से बाहर आया तो लीना मेम मुझे बाहर मिली उन्होंने मुझे मेश ,होस्टल और स्कूल की क्लासेस सब के बारे में अच्छे से समझा दिया। और यहाँ के रूल्स भी बताये। मेश का नाश्ता मुझे ज्यादा पसन्द तो नही आया पर भुख भी लग रही थी इसलिए मैंने खा लिया।
और उदास मन लिए जैसे - तैसे अपनी क्लास में पहुँचा बैल बज गई थी मेम आने वाली थी सबने बुक निकाल कर सामने रखली। थोड़ी देर में मेम भी आ  गईं ये कोई और नही लीना मेम ही थी पहले मैं यही सोच रहा था की मेम शायद केयर टेकर है जब कि वो यहाँ टीचर है। लीना मेम सभी बच्चो को बहुत ही प्यार से पढ़ाती थी मुझे उनकी क्लास अटेंड करना अच्छा लगने लगा। पढ़ाई में कमजोर बच्चो को लीना मेम एक्सट्रा क्लास लेकर पढाती थी धीरे-धीरे मुझे यहाँ अच्छा लगने लगा था क्योंकि हमारा स्कूल दूर था इसलिए हमारी टीचर्स के लिए भी वही पास में होस्टल था लीना मेम शाम को होस्टल के ही गार्डन में कुछ और टीचर्स के साथ मुझे अक्सर दिखा करती थी मैं भी मेम को देखकर वहाँ चला जाता था क्योंकि मुझे मेम के पास रहना अच्छा लगता था। मेम भी मुझे अपने पास बहुत ही प्यार से बैठाती थी। मैं मेम से अपनी हर बात शेयर करने लगा था मेम ने मुझे हमेशा मोटिवेट किया , क्या सही है क्या गलत ये भी मुझे मेम ने ही बताया। मेम मुझसे हमेशा कहती थी कभी भी कोशिश करना मत छोडना प्रयत्न करते रहो। और हार मत मानो रुको मत चलते रहो अपने आपको इतना सरल रखो के कभी उलझो नही मेम की सारी बाते मैंने ध्यान से सुनी। एक बार मैंने भी टीचर्स डे पर मेम को गुलाब दिया था बड़े ही खुश होते हुए तब मेम ने कहा था कि ये फूल भले ही मुझे मत दो अगर तुम मुझे कुछ देना ही चाहते हो तो बस ये करना के अपने जीवन में एक अच्छे और सफल  इंसान बनने की कोशिश करना और हो सके तो कभी किसी की पढ़ाई के लिए सहायता जरूर करना। बस यही बहुत है। मेम की बाते आज भी याद है। मैने पूरी कोशिश की उनके बताये रास्ते पर चलने की और एक अच्छा इंसान बनने की।
गुरु वो प्रकाश है जिसकी चमक से बच्चो का भविष्य उज्वल होता है। गुरु वो है जो हमे अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाते है। गुरु ज्ञान का सागर है।
अपने गुरु का हमेशा आदर करे।

कृष्ण जन्मोत्सव



भारत में कृष्ण जन्मोत्सव का बड़ा महत्व है। इस उत्सव को सभी बड़े जोर शोर से मनाते है। और कृष्ण
भक्ति में डुबे नजर आते है। वैसे तो ये उत्सव पूरे भारत में सभी जगह मनाया जाता है। पर इसका सबसे ज्यादा प्रभाव मथुरा और वृन्दावन में देखने को मिलता है। यहाँ कृष्ण जन्मोत्सव बड़े ही विशाल और भव्य तरीके से मनाया जाता है। दूर -दूर से लोग यहाँ कृष्ण के जन्म उत्सव में शामिल होने आते है। इस दिन सभी कृष्ण के रंग में रंगे नजर आते है। ये सभी जानते है कि कृष्ण जी का जन्म भादो मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को हुआ था। हर साल इसी दिन कृष्ण जन्मोत्सव कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है मंदिरो में बड़े ही श्रद्धा भाव से कृष्ण जी का भजन पूजन किया जाता है।
कृष्ण जी के लिए सुन्दर पालना सजाया जाता है और उस पालने में मोहनी सूरत वाले नन्हे से मोरपंख वाले कान्हा जी को बैठाया जाता। सभी श्रद्धालु पालने की डोर पकड़ कर पालना झूलाते है और उस आनंद को
प्राप्त करते है जो आनन्द माँ यशोधा को प्राप्त होता था जब वह नन्हे से बाल गोपाल को पालने में झुलाती थी और साथ ही कान्हा जी को उनका सबसे प्रिय माखन भी खिलाया जाता है। इस दिन एक और खास बात होती है वो ये की इस दिन दही हांडी भी फोड़ी जाती है। जगह -जगह आज दही हांडी फोड़ने की 
प्रतियोगिता रखी जाती है इस प्रतियोगिता में गोविंदाओं की टोली होती है ( प्रतियोगिता में हिस्सा लेने वाला समूह) अलग-अलग जगह से ये टोलियां प्रतियोगिता में हिस्सा लेने आती है। दर्शको की भी बड़ी भीड़ होती है सभी के अंदर उत्साह नजर आता है। वाकई में बड़ा मजा आता है दही हांडी प्रतियोगिता 
देखने में फूलो से सजी और दही से भरी मटकी को ऊँचाई पर बांधा जाता है टोली के गोविंदा एक दूसरे का सहारा लेकर ऊँचाई पर बंधी दही हांडी तक पहुँचने की कोशिश करते है इसमे वे कई बार असफल भी होते है पर आखिर
में कोई एक टोली सफल हो ही जाती है और गोविंदा
दही से भरी मटकी को फोड़ ही देते है। और फिर सब  खुशी से नाचने लगते है गोविंदा आला रे आला तेरी  मटकी सम्हाल ब्रिज बाला। सच में जो मजा इसे देखने में है उसे शब्दो में बताया ही नही जा सकता इसलिए  एक बार तो इस प्रतियोगिता को देखने जाना ही चाहिए तो जरूर जाए। 
वैसे सभी को पता है कि कृष्ण जी का जन्म रात्रि 12 बजे हुआ था इसलिए आज भी जन्माष्टमी के दिन सभी मंदिरो में घरो में रात्रि 12 बजे तक सभी लोग जागते है भजन पूजन करते है और कृष्ण जी का जन्म होते ही सभी खुशियां मनाने लगते है और फिर सभी बालगोपाल के दर्शन करते है यह उत्सव पूरी रात्रि तक चलता है। इस वक्त भक्तो के चहरे पर जो खुशी
और जो उत्साह नजर आता है वह देखने लायक होता
है सभी कृष्ण भक्ति में डूबे नाचते गाते कान्हा के जन्म की खुशी मनाते दिखाई देते है। नन्द के आनंद भयो जय हो नन्द लाल की हाथी घोड़ा पालकी जय हो नन्द लाल की, जय यशोदा लाल की।
मेरी ओर से आप सभी को कृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाये 🌼जय श्री कृष्णा🌼

ऐ जिंदगी



"तेरी बाहों में तेरी पनाहों में आज हूँ मैं। ऐ जिंदगी गले लगा मुझे अपना बना" यूँ तो जिंदगी बड़ी खूबसूरत है
पर इसकी खुबसुरती कभी- कभी हमे जल्दी नजर नही आती। क्योंकि हम अपनी छोटी-छोटी परेशानियों को
इतना बड़ा बना लेते है की बड़ी- बड़ी खुशियां भी उसके आगे छोटी नजर आने लगती है। पर मैं ऐसी नही हूँ। मैं अपनी जिंदगी उत्साह और खुशी के साथ जीती हूँ। और इसकी खुबसुरती को हर पल महसूस करती हूँ। मेरी लाइफ भी बिल्कुल वैसी ही है जैसी हर एक आम इंसान की होती है। सुबह जल्दी जागना , भागते दौड़ते नाश्ता करना और ऐसे ही ऑफिस पहुँच
जाना, दिनभर ऑफिस में काम करना और थककर शाम को घर आना। पर मेरे जीने का अंदाज़ थोड़ा अलग है। मैं जब सुबह उठती हूँ तो सबसे पहले खुद को गुड़ मॉर्निंग कहती हूँ और खुद को अपने इस नये दिन के लिए शुभकामनाये देती हूँ। फिर कुछ देर मैं अपनी माँ के साथ गार्डन में बैठती हूँ जहाँ में उगते हुए सूरज को देखती हूँ और जब उसकी किरणे मुझ पर पड़ती है तब ऐसा लगता है कि उसकी रोशनी से मैं 
भी रोशन हो रही हूँ। और फिर कुछ देर बाद फटाफट
नाश्ता कर तैयार होकर अपने ऑफिस पहुँचती हूँ और पूरे ध्यान से अपना काम करती हूँ। जैसे ही लंच 
ब्रेक होता है मैं मस्ती के मुड़ मैं आ जाती हूँ अपने कलीग्स के साथ खूब गप्पे लड़ाती हूँ हस्ती हूँ मुस्कुराती हूँ और जैसे ही लंच ब्रेक खत्म होता है मैं फिर से अपने काम में लग जाती हूँ। शाम को जब घर 
पहुँचती हूँ 10-15 मिनिट रेस्ट करने के बाद मैं अपना बाकी का समय अपने परिवार को देती हूँ। उनके साथ बैठ कर दिनभर की बाते करती हूँ साथ में टीवी देखती हूँ डिनर करती हूँ और हाँ हर वो बात करती हूँ जिससे होंटो पर मुस्कान आये। और सन्डे बाहर कही घूमने
जरूर जाती हूँ कभी परिवार के साथ तो कभी अपने दोस्तो के साथ। और खूब इंजॉय करती हूँ। ऐसा नही 
है के इस सब के बीच कभी कोई परेशानी नही आती।
आती है पर अब मैं परेशानी को इतना तवज्जो नही देती। बल्कि बिना ज्यादा परेशान हुए उन्हें हल करने की कोशिश करती हूँ।
कितनी सुलझी हुई हूँ ना मैं। पर आज से तीन साल पहले ऐसा नही था माँ की तबियत अचानक खराब हो
गई थी घर में टेशन का माहौल था। और उधर ऑफिस के काम का बोझ। मैं तो परेशानियों के तले दबी जा रही थी। ना हँसना ना मुस्कुराना बस हर वक्त परेशान रहना कुछ ऐसी हो गई थी मेरी जिंदगी। तब मुझे किसी ने समझाया की परेशानियां सबकी लाइफ में होती है पर इसके चलते जिंदगी की खुशियों को कम नही होने देना चाहिए। बल्कि खुश रहकर हर परेशानी को हल करने की कोशिश करनी चाहिए। और जिंदगी को दिल से जीना चाहिए इसकी खुबसुरती को महसूस करना चाहिए। बस तब से मैंने अपनी जिंदगी जीने का
अंदाज़ ही बदल दिया और खुश होकर जीना शुरू कर दिया। सच में वक्त के साथ सारी परेशानियां हल हो गई सब ठीक हो गया। और मुझे अपनी जिंदगी बड़ी खुबसूरत लगने लगी। अगर हम अपनी लाइफ मैं
खुशियों को ढूंढेंगे तो हमे वही मिलेगी। हर दिन एक नया दिन है जिसमे हमारे लिए बहुत कुछ नया है। बहुत कुछ अच्छा है बस जरूरत है उसे पहचानने की।
मुझे तो अपनी जिंदगी से बड़ा प्यार है मैं जब कही घूमने जाती हूँ तो यही गुनगुनाती हूँ ऐ जिंदगी गले लगा ले।
इस जिंदगी में कभी शहद की मिठास है तो कभी नीबू की खटास है। ये कभी नमकीन तो कभी बेस्वाद है।
पर तु जैसी भी है ऐ जिंदगी मुझे तुझसे प्यार है। 
ऐ जिंदगी मुझे तुझसे प्यार है।

सावन का महीना



गरजते बादल रिमझिम बरसता पानी और चारो ओर
फैली हरियाली ये बताती है की सावन की दस्तक हो गई है।
सावन का महीना यूँ तो सभी को पसन्द है पर मुझे तो ये बहुत ही पसन्द है क्योंकि इस समय जो हरियाली
रहती है और उससे प्रकृति का जो सुन्दर दृश्य बनता है। वह देखने में बड़ा ही मन मोहक लगता है।
थोड़े काले- थोड़े सफेद बादल हरे- भरे पेड़ , पेड़ो की पत्तियों पर ठहरा हुआ बारिश का पानी, पक्षियों की मधुर आवाज, सब कुछ बड़ा अच्छा लगता है। ये मन को एक अलग ही खुशी और सुकुन का एहसास कराता है।
वैसे सावन के महीने की बड़ी ही खास बात ये भी है की इस समय लड़कियों को मायके की बड़ी याद आती है।
वो घर का आँगन, वो सावन के झूले और वो गीत सब कुछ याद आता है। वैसे ये सब माँ के जमाने की बाते है क्योंकि उन्होंने ही सावन के झूलो का आनन्द लिया है
हमे तो ये अवसर मिला ही नही। क्योंकि हम शहर में रहते थे जहाँ ना तो बड़ा सा आँगन था और ना ही नीम का कोई पेड़ जिस पर रस्सी डालकर हम झूल सके। जब हम छोटे थे तब मामाजी माँ को लिवाने आते थे मतलब की वो उन्हें मायके ले जाने आते थे। क्योंकि ये रीति है की लड़कियाँ सावन में अपने मायके आती है राखी का त्यौहार मायके में ही मानती है। और फिर राखी के बाद वापस अपने ससुराल चली जाती है। तब माँ के साथ मैं भी मामाजी के घर जाती थी बड़ा मजा आता था वहाँ सबके साथ। उस वक्त मैं ये सोचती थी के जब मैं भी शादी करके ससुराल चली जाउंगी तब मुझे भी मेरा भाई ऐसे ही लेने आयेगा।
मुझे भी ऐसे ही सावन में अपने मायके की याद आयेगी। और जब मैं मायके जाउंगी तब सब मुझे बहुत लाड़ करेंगे।
आज वो वक्त आ गया। मैं अपने ससुराल में हूँ।
सावन की बुंदे बड़ी भा रही है ये मायके की याद दिला 
रही है। मैंने सावन के झूले तो नही झूले पर सावन के 
गीत जरूर माँ से सुने है जोकि आज मुझे याद आ रहे है। सावन आ गया और राखी भी करीब है। मेरे पडोस की अनिता तो मायके जा भी चुकी है बस मैं ही अभी तक नही गई। मैं इंतजार कर रही हूँ की मुझे भी मेरे मायके से कोई लेने आयेगा ये जानते हुए भी की ऐसा नही होने वाला। मैं अपनी माँ की तरह लक्की नही हूँ मेरी शादी से पहले ही पिताजी गुजर गये और मेरी शादी के बाद माँ भी तीर्थ पर चली गई। एक भाई है जोकि अमेरिका में शिफ्ट हो गया। इसलिए मुझे कोई लेने नही आने वाला। मैं राखी का त्यौहार अपने ससुराल में ही मनाऊंगी।हाँ थोड़ा बुरा जरूर लग रहा है पर मैं दुखी नही हूँ। क्योंकि मैं अकेली नही हूँ जो मायके नही जा पाई। कभी- कभी किसी ना किसी के साथ ऐसा हो ही जाता है की किसी वजह के चलते वो अपने मायके नही जा पाती। इसलिए ज्यादा दुखी नही होना चाहिए। क्योंकि हमारा  ससुराल भी तो किसी का मायका है मायके नही जा सके इसका दुख मनाने की वजह जो अपने मायके यानी आपके घर आई है उनके आने की खुशी मनाये। और सबके साथ मिलकर सावन का मजा ले।मैंने अपना सावन बड़ी ही खुशी के साथ मनाया। भाई को राखी भेज दी और वीडियो कॉल पर उससे बात भी कर ली। और साथ ही यहाँ सावन की बूंदो का जमकर मजा लिया। खूब भीगी मैं इस सावन के पानी में बस इस बार मैं अपनी सहेली के साथ नही बल्कि अपनी ननन्द के साथ हूँ पर खुशी अभी भी वही है जो हर सावन में रहती है।
मेरी यही कामना है कि आप सभी सावन की बूंदो का
जमकर मजा ले और रक्षाबन्धन का पर्व खुशी के साथ मनाये।

मेरी ईदी



रात को तो मुझे जल्दी नींद ही नही आई इस खुशी में की आज ईद है और मैं आज अप्पी और आसिफ भाई से पहले ही उठ गई। उठती भी कैसे नही मैंने रात को अलार्म जो लगा दिया था।मैंने पहले ही सोच लिया था की आज अप्पी और आसिफ भाई से पहले मैं ही अम्मी अब्बू को ईद की मुबारक बाद दूंगी। मैंने अम्मी अब्बू को ईद की मुबारक बाद दी और उन्होंने भी मुझे प्यार से गले लगाकर कहा ईद मुबारक हो जरीन। मैं सुबह से ही तैयार होकर घूम रही हूँ कॉलोनी के सारे बच्चे हम सब एक दूसरे को ईद मुबारक ,ईद मुबारक कह कर बड़े ही खुश हो रहे है। सच में बड़ा मजा आता है ईद पर। ईद की खुशी सबसे ज्यादा हमे ही तो होती है नये- नये कपड़े लजीज पकवान और जो हम बच्चो को सबसे ज्यादा अच्छा लगता है वो है ईदी मिलना। मुझे तो ईदी मिलने का बड़ा इंतजार रहता। अम्मी अब्बू  हम तीनो को साथ में ईदी देते है अप्पी आसिफ भाई और मुझे। अप्पी को मुझसे ज्यादा ईदी मिली। मामू , खाला, शमीम अप्पी , इन सब से भी अप्पी को ईदी मिली। और मैं तो बाहर खेलने गई थी इसलिए मुझे उनसे ईदी नही मिल पाई। बस मैं इस बात का गम मनाने बैठ गई। पर पता है बाद में क्या हुआ मुझे ईदी मैं बहुत अच्छा तोफा मिला। अप्पी ने भी मुझे ईदी दी और ईदी मैं उन्होंने मुझे साइकिल दी जोकि मुझे चाहिये ही थी। मैं तो अपनी ईदी का तोफा देख खुशी से उछल पड़ी।अभी थोड़ी देर पहले भले ही मुझे लग रहा था की मुझे कम ईदी मिली पर अब लग रहा है की मेरी ईदी ही सबसे बेस्ट ईदी है। मैंने सबको बताया देखो अप्पी ने मुझे ईदी मैं क्या दिया है। मेरी ईद तो बड़ी ही अच्छी रही। इतनी अच्छी ईदी जो मिली। मेरी प्यारी अप्पी ने दी। मैंने भी अप्पी को गले लग कर ईद मुबारक ईद मुबारक कहा। अप्पी ने भी जोर से गले लगकर कहा ईद मुबारक हो जरीन।
मेरे सभी दोस्तो को मेरी ओर से ईद मुबारक हो।


15 अगस्त



आज सुबह जब मैं टहलने के लिए घर से बाहर निकला देखा तो कॉलोनी के कुछ बच्चे स्कूल की यूनिफॉर्म पहने कुछ बच्चे कलर ड्रेस में हाथ में झंडा लिए अपनी स्कूल बस का इंतजार कर रहे थे। उनके मासूम चहरे की मासूम खिलती हँसी से ये साफ पता चल रहा था की वो कितने उत्साहित है। आज 15 अगस्त है।
15 अगस्त 1947 , ये वो दिन था जब भारत देश गुलामी की जंजीरो से पूरी तरह आजाद हो चुका था इस दिन हर एक देशवासी के चहरे पर आजादी की मुस्कान थी।
वो आजादी जिसे पाने के लिए ना जाने कितने देशभक्त वीरो ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। हर साल 15 अगस्त के
दिन हम अपने देश के आजाद होने की खुशी मनाते है
और साथ ही उन वीरो को याद करते है जिनके बलिदान की वजह से आज हम एक आजाद देश में रह रहे है। मुझे मालूम है की देश का हर एक व्यक्ति 15 अगस्त के बारे में बहुत अच्छे से जानता है इसलिए मुझे कुछ कहने या बताने की जरूरत नही है।
मुझे तो बस आज इन बच्चो को देख अपना बचपन याद आ गया और वो 15 अगस्त का दिन।
मैं 6-7 साल का था तब। 15 अगस्त का दिन मैं और मेरे दोस्त हम बड़े ही खुश। हम खुश इस बात से थे कि और बच्चो की तरह हम भी एक देशभक्ति गाने पर नाचने वाले है देशभक्ति गाने ये असल में क्या होते है इसका मतलब क्या होता है हमे नही पता बस हमे इतना ही समझ आ रहा था की
 हम भी और दूसरी क्लास के बच्चो की तरह एक गाने पर नाचने वाले है और इस बात पर हम खुश भी थे और साथ ही बहुत इतरा भी रहे थे। क्या करे बच्चे थे ना। ज्यादा पता कुछ होता नही है और जो थोड़ा बहुत पता होता है उसे हम बड़ा मानने लगते है। यही हमारे साथ भी हुआ।
हमारी नजर से 15 अगस्त का मतलब कुछ अलग था।  15 अगस्त को स्कूल में झंडा फहराया जाता है देशभक्ति गीत, कविता ,भाषण ,देशभक्ति गीतों पर डांस होता है और इन सब के बीच जब टीचर पूछे 15 अगस्त को क्या हुआ था तो सब बच्चे साथ में कहेंगे
15 अगस्त को भारत देश आजाद हुआ था हम बड़े ही ऊँचे स्वर में ये कहते जबकि हम इसका सही अर्थ जानते ही नही। और अपनी बात कहुँ तो मुझे तो यही इंतजार रहता की कब कार्यक्रम पूरा हो और मुझे वो स्वादिष्ठ लड्डू मिले जोकि हमेशा कार्यक्रम खत्म होने के बाद ही मिलते है उन लड्डुओं का स्वाद ही बड़ा अलग होता है। और उनके मिलने का इंतजार हम सब बच्चो को होता है।
पर अभी फिलहाल मैं और मेरे दोस्त हाथ में तिरंगा लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे अरे हम भी तो नाचने वाले थे ना। और हमारे ही पास एक और ग्रुप खड़ा था बच्चो का। वो भी अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। पर कुछ देर बाद ना जाने किस बात पर मेरे दोस्त और उस दूसरे ग्रुप के एक बच्चे के बीच झगड़ा हो गया वो दोनो आपस में भीड़ गये। सब लोग अब स्टेज की ओर देखने की वजह हमारी और ही देख रहे थे। तब एक स्कूल का बच्चा यही भाषण दे रहा था की हमारे देश में अनेकता में एकता है यहाँ सब प्रेम से भाई चारे के साथ रहते है यह हमारी विशेषता है इधर भाषण हो रहा था और उधर लड़ाई। ये सब देख हमारी टीचर जी उठकर हमारे पास आई और उन्होंने लड़ाई को खत्म कराया और बड़े ही प्यार से समझाया की हम भारतवासियो की पहचान हमारी एकता और आपसी प्रेम है हमे लड़ना नही है बल्कि एक साथ रहना है हम भविष्य है भारत का। हमे इसका गौरव बढ़ाना है। तब टीचर जी की सारी बाते हमे इतने अच्छे से समझ तो नही आ रही थी पर इतना जरूर समझ गये थे की लड़ना नही है दोस्त बनकर रहना है
टीचर जी ने कहा चलो गले मिलो फिर क्या था बच्चे गले मिले और दोस्त बन गये और फिर मिला लड्डू
अरे वहाँ मजा आ गया हमे तो आज पहले ही लड्डू मिल गया।
हम सब ने बड़े ही प्यार से आपस में मिलजुल कर लड्डू खाया और स्टेज पर नाचे भी और एक दूसरे के लिए तालिया भी बजाई सच में बहुत मजा आया। मैं तो पूरे दिन ही हाथ में तिरंगा लेकर घूमता रहा। और सबको दिखाता भी रहा की देखो मेरा वाला तिरंगा कितना अच्छा है।
आज मैं जान गया हूँ की तिरंगा मेरा या तेरा नही है ये हमारा है। और टीचर जी की भी सारी बातो का मतलब भी मैं आज अच्छी तरह जान गया हूँ। और साथ ही आजादी और बलिदान जैसे शब्दो का सही अर्थ व महत्व भी। 
मुझे गर्व है की मैंने ऐसी भूमि पर जन्म लिया जोकि हमारे वीरो की भी जन्मभूमि है। मुझे गर्व है अपने भारतीय होने पर ।
                   जय हिन्द जय भारत
धन्य है वो वीर जिनके बलिदान से सिंचित ये भारत देश है, धन्य है वो वीर जिनके आगे झुकते आज करोड़ो शिश है धन्य है वो वीर जिनके कारण आज आजाद ये भारत देश है।
धन्य है वो वीर जिन पर गर्वित आज ये पूरा देश ।
ऐसे भारत देश और ऐसे महान वीरो को मेरा शत शत नमन।

मेरा फ़्रेंडशिप डे



दोस्ती का रिश्ता बड़ा चटपटा सा होता है जिसमे रूठना मनाना झूठमूठ लड़ना परवाह करना सबकुछ शामिल है हे ना। आज सुबह उठी तब रोज की तरह मैने सबसे पहले अपने मोबाइल में मैसेज चैक किये मैं रोज मैसेजेस
देखती हूँ की कही कोई जरूरी मैसेज तो नही है। क्योंकि ज्यादातर ऐसा हो जाता है की मैं कॉल रिसीव ही नही कर पाती दिन में ऑफिस में रहती हूँ और बिजी भी तो मेरे घर वाले और फ़्रेंड्स सभी मुझे मैसेज ही कर देते है जब कुछ जरूरी बात हो तो। जैसे ही मैने मैसेज देखे तो देखा की मेरी फ़्रेंड्स के मैसेज है उन्होंने
मुझे विश किया था हैप्पी फ़्रेंडशिप डे। मुझे तो याद ही नही था कि आज फ़्रेंडशिप डे है। मैने भी झट से सबको मैसेज कर विश कर दिया।
आज मुझे अपने दोस्तो की बड़ी याद आई और वो दिन भी जब हम सब साथ हुआ करते थे। क्या दिन थे वो। आज के दिन तो हम सब मिलकर कहीं न कहीं घूमने जाया करते थे। और खुब मस्ती भी किया करते थे हमारे लिए तो हर दिन ही फ़्रेंड्स का होता था। हम हर बात पर ही पार्टी करते थे कभी बर्थडे पार्टी कभी नई स्कूटी ली उसकी पार्टी कुछ नही तो नई ड्रेस ली उसकी भी पार्टी। ये पार्टी कोई होटल में नही होती थी बल्कि कॉलेज की केंटीन में तो कभी वही कॉलेज के पास सड़क किनारे जो चौपाटी थी वहाँ। जहाँ सब कुछ मिलता था इंडियन, साउथ इंडियन, चाईनिज फूड और बड़ा स्वादिष्ट भी होता था। हम सब खूब जाया करते थे उस चौपाटी।
और फ़्रेंडशिप डे पर भी वहाँ हम जाते थे उस दिन तो रंग बिरंगे फ़्रेंडशिप बैंड से पूरी कलाई ही भर जाती थी। और आज देखो कलाई एकदम खाली है। कर भी क्या सकते है पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद हम सब दूर हो गये किसी की शादी हो गई तो किसी की जॉब लग गई मैं भी यहाँ जबलपुर आ गई मेरी जॉब यहाँ लगी इसलिए मुझे यहाँ आना पड़ा।
वैसे मैं घर पर बोर ही हो रही हूँ सोच रही हूँ कुछ नही तो शोपिंग ही कर आओ। दिन भी कट जायेगा।
मैं घर से निकली रास्ते में मुझे एक शॉप नजर आई मैं शॉप के अंदर गई वहाँ बहुत ही सुन्दर-सुन्दर फ़्रेंडशिप बैंड नजर आये जिनमे से एक मुझे बहुत ही अच्छा लगा वैसे क्योंकि यहाँ आये मुझे अभी ज्यादा समय नही हुआ और ना कोई दोस्त है इसीलिए मुझे ये बैंड लेना तो नही था पर मैने फिर भी ले लिया। मैं शॉप से बाहर आई के तभी मुझे कॉल आया जोकि मेरे ऑफिस में मेरे साथ ही जॉब करने वाली रिचा का था। उसने मुझे ऑफिस के पास जो एक होटल है वहाँ बुलाया मैं वहाँ पहुँची देखा तो मेरे ऑफिस के सारे कलीग्स वहाँ
पहले से ही मौजूद थे रिचा ने मुझे बताया की हर साल यहाँ इस दिन सब मिलकर पार्टी करते है और फ़्रेंडशिप डे सेलिब्रेट करते है और जो भी ऑफिस में नया आता है उसका वेलकम भी किया जाता है इस फ़्रेंड्स ग्रुप में। रिचा ने मुझे फ़्रेंडशिप बैंड पहनाया और अपने इस फ़्रेंड्स ग्रुप का हिस्सा बना लिया मैंने भी अपने बैग से वही फ़्रेंडशिप बैंड निकाला जो मैने उस शॉप से लिया था। शायद ये रिचा के लिए ही था मुझे नये दोस्त मिल गये वैसे कॉलेज फ़्रेंड्स की बात अलग ही होती है पर हाँ ऑफिस फ़्रेंड्स की बात भी अलग ही होती है। कॉलेज फ़्रेंड हो या ऑफिस फ़्रेंड मुझे लगता है की हर एक के पास कोई एक फ़्रेंड तो होना ही चाहिए क्योंकि लाइफ में एक फ़्रेंड तो जरूरी होता है।
तो ऐसा था मेरा फ़्रेंडशिप डे।
जो बिना वजह जाने हर वक्त आपके साथ चलने को 
तैयार होता है वो सिर्फ एक दोस्त होता है।



एक सफर



एक हाथ से अपना बैग पकड़े उसे खींचते हुए और दूसरे हाथ में फोन पकड कर अपने दोस्त से बात करते हुए मैं स्टेशन पर चला जा रहा था और मेरी ट्रेन
आ गई। जिन यात्रियों को स्टेशन पर उतरना था वो उतर गये और जिन्हें ट्रेन में बैठना था वो ट्रेन में चढ़ने लगे। मैं भी ट्रेन में चढ़ा और अपनी सीट ढूंढकर
वहाँ बैठ गया। मैं पहली बार जयपुर जा रहा हूँ इस बार मीटिंग वहाँ पर है। मैं अपने बॉस से बड़ा ही खुश हूँ। वो हमेशा अलग-अलग जगह मीटिंग फिक्स करते है ताकि काम का काम हो जाये और थोड़ा घूमना भी।आम तौर पर सफर के दौरान लोगों को नींद आने लगती है पर मुझे तो बिल्कुल भी नींद नही आती। मैं इधर - उधर देखते हुए कभी बुक पढ़ते हुए अपना समय निकालता हूँ। क्योंकि आज का सफर रात का है तो शायद मैं सो भी सकता हूँ। वैसे फिलहाल मैं अभी अपनी बुक ही पढूंगा गाड़ी भी स्टेशन से चल दी। मैंने बुक पढ़ना शुरू ही किया की आवाज आई अंकल ये सीट मेरी है। मैंने नजर उठा कर देखा तो एक लड़की दिखी जोकि सामने की सीट पर बैठे
अंकल से ये कह रही थी। अंकल जी उठकर अपनी सीट पर जा बैठे और वो लड़की अपनी सीट पर बैठ गई। मुझे तो वो लड़की गुस्से में लग रही थी। खैर मुझे क्या करना भई मैं तो वापस अपनी बुक पढ़ने लगा। कुछ देर बाद जब मेरी नजर उस लड़की पर पड़ी तो मैने देखा की वो मेरी ओर ही देख रही है कुछ देर तक मैं भी बुक की आड़ में उसकी ओर देखता रहा वो तब भी मेरी ओर ही देख रही थी पहले तो मैं मन में बड़ा ही खुश हो गया ये सोचकर की मैं इतना अच्छा लगता हूँ की लडकियाँ मुझे देखती ही रह जाती है। मैं बड़े ही इतराते हुए पीछे टिक्कर थोड़ा तिरछा होकर बैठ गया। और बड़े ही ध्यान से बुक पढ़ने लगा।  वैसे उस वक्त मैं पढ़ नही रहा था बल्कि मैं
चोरी से उस लड़की की ओर ही देख रहा था कि क्या वो मुझे अभी भी देख रही है।
               लेकिन उसने मेरी सोच को गलत साबित करते हुए मुझे इशारे में समझाते हुए बताया की वो मुझे नही बल्कि मेरे हाथ में जो बुक है उसे देख रही है।
शायद वो बुक पर लिखे लेखक का नाम पढ़ने की कोशिश कर रही थी। और मैं ना जाने क्या सोचने लगा। आधे घन्टे बाद एक स्टेशन पर गाड़ी कुछ वक्त के लिए रुकी। तभी उस लड़की ने पानी की खाली बोतल अपने बैग से निकाली और उसे पकड़ कर बैठ गई शायद उसे पानी चाहिए था पर वो उठकर जाना नही चाह रही थी। उसने बस एक बार मेरी ओर देखा तब मैं उठकर बाहर ही जा रहा था इसीलिए मैंने उसकी ओर हाथ बढ़ा दिया और उसने तुरन्त बोतल मेरे हाथ में थमा दी और मैने उसे पानी लाकर दे दिया। गाड़ी स्टेशन से चलने लगी और बाकी के यात्री भी अपनी सीट पर आकर बैठ गये रात के करीब 10 बज गये थे  मुझे भूख का एहसास हो रहा था। माँ ने जो खाना मेरे लिए रखा था मैंने वो खा लिया मैंने अपने बगल में बैठे अंकल और सामने बैठी उस लड़की से भी पूछा पर अंकल ने भी मना कर दिया और उस लड़की ने भी एक छोटी सी मुस्कुराहट के साथ ना का इशारा कर दिया। उस वक्त मैं उसकी ना से नही बल्कि इस बात से हैरान
था की शुरू में गुस्से में लग रही और बाद में एक दम चुपचाप सी बैठी लड़की अभी थोड़ा मुस्कुराई भी।
            खैर मुझे उससे क्या करना मैंने तो खाना खाया और अपनी बुक लेकर फिर पढ़ना शुरू कर दिया। पढ़ते- पढ़ते रात के 1 बज गये आसपास नजर घुमाकर देखा तो सारे यात्री सोये नजर आ रहे थे। पर जब सामने देखा तो वो लड़की जाग रही थी। शांत चुपचाप खिड़की से बाहर की ओर देख रही थी। शायद कुछ सोच रही होगी। उसने मुझे नही देखा पर मैं जरूर उसे देख रहा था
पता नही क्यों नजर बार-बार उसकी ओर जा रही थी।
वैसे मैं कभी किसी की तरफ इतने गौर से नही देखता हूँ। हाँ पर आज देख रहा था। उसकी झपकती पलके देखना मुझे अच्छा लग रहा था। लेकिन जैसे ही उसकी नजर मुझ पर पड़ी मैं घबरा गया ये सोचकर की कही वो मुझे बुरा व्यक्ति ना समझले। इसलिए मैने जल्दी से नजरे फेर ली। कुछ देर तक मैंने सामने की ओर देखा ही नही। पर ज्यादा देर तक मैं खुद को रोक ना पाया बुक को अपने चहरे के सामने कर मैं फिर से उसकी आड़ में चुपके से उस लड़की को देखने की कोशिश करने लगा ये जानने के लिए की कही उसकी नजर मेरी ओर तो नही है पर उसने मुझे देख लिया वो गुस्से में मुझे घूरे जा रही थी मैं डर गया। उसने आँखो से हाथ की ओर इशारा किया। मैंने देखा तो उसके हाथ में चाय का ग्लास था
जोकि उसने मेरी ओर बढ़ाते हुए हाथ में थमा दिया।
उसके दूसरे हाथ में भी एक चाय का ग्लास था वो फिर थोड़ा सा मुस्कुराई और चाय पीने लगी। मुझे पता ही नही चला था की कब अगला स्टेशन आ गया और सुबह के 5 बज गये। खैर मैने चाय पीली। अब हाल ये था की थोड़ी थोड़ी देर में हम दोनो की ही नजरे बार बार एक दूसरे पर पड़ रही थी और इसी तरह  कुछ घन्टो में ये सफर खत्म हो गया। गाड़ी जयपुर आ गई और हम दोनो अपनी-अपनी राह चले गये बस मन में एक बात रह गई की उसका नाम क्या था। वैसे मुझे उससे क्या करना पर फिर भी मैं यही सोच रहा हूँ की उसका नाम क्या था।
   
   



दोस्ती - एक अनमोल रिश्ता



दोस्ती , दोस्त ये शब्द सुनते ही याद आ जाती है ना अपने दोस्तो की। ये रिश्ता इतना प्यारा है की बस दोस्ती का जिक्र होते ही मन में एक खुशी की लहर सी दौड़ जाती है। और दोस्तो के साथ बिताये सारे पल याद आ जाते है आँखों में चमक आ जाती है और ज़बान में मिशरी सी घुल जाती है सारी खट्टी- मिट्ठी
यादे ताजा हो जाती है।
मेरी भी बहुत सी यादे ताजा हो गई।ऑफिस में जब
स्कूल - कॉलेज के दिनों की बात छिड़ी। और याद आई दोस्तो की। यूँ तो दोस्त कई थे पर मेरी पक्की दोस्त खुशी ही थी। मेरी प्यारी दोस्त। वैसे आज ऑफिस से मुझे जल्दी निकलना है मार्केट जाना है माँ ने कुछ सामान मंगवाया है जो मुझे ही लाना है। मैं अपना काम खत्म कर मार्केट पहुँची झटपट सामान लिया और फिर मेरी नजर पड़ी किशन स्वीट शॉप पर यहाँ की रसमलाई बड़ी ही फेमस है। मैंने सोचा घर वालो के लिए लेकर चलती हूँ मैं शॉप पर गई और वहाँ के भैया से रसमलाई पैक करने को कह दिया। रसमलाई ले मैं शॉप के भैया को पैसे दे रही थी कि मुझे पीछे से आवाज सुनाई दी। भैया रसमलाई है पैक कर दीजिये।
ये आवाज जानी पहचानी सी लगी जोकि एक लड़की की थी मैंने पीछे मुड़कर देखा। देखा तो एक कंधे पर बैग टंगे हुए और दूसरे कंधे पर चुन्नी डाले हुए अपनी बड़ी- बड़ी आँखों से घूरते हुए कोई और नही खुशी ही थी मैं उसे देख खुश हो गई मन कर रहा था कि उसे गले लगा लूँ पर खुशी शायद आज भी गुस्सा है उसने मेरी ओर एक बार भी ठीक से नही देखा उसके चेहरे पर नाराजगी साफ नजर आ रही थी वो बिल्कुल अजनबी की तरह मेरे सामने से चली गई और मैं खड़ी -खड़ी देखती रह गई। आज तीन साल बाद हमारी मुलाकात हुई। लग ही नही रहा के तीन साल बीत गये। खुशी भले ही मुझसे नाराज है पर मेरे लिए वो आज भी मेरी वही प्यारी नादान सी दोस्त है। कॉलेज में मैं और खुशी साथ- साथ ही रहते थे और खूब मस्ती भी किया करते थे। जिस दिन खुशी का मन क्लास अटेंड करने का नही होता था मैं भी उसके साथ क्लास बंक कर लेती थी फ़्रेंड सर्कल में कोई भी हमारा नाम अकेले नही लेता था सब हमारा नाम साथ में लेते थे खुशी जिया। खुशी को मीठा पसन्द है रसमलाई तो खुशी की फेवरेट है हम जब भी मार्केट जाते थे खुशी किशन स्वीट शॉप पर  रसमलाई जरूर खाती थी और पैसे मुझ से ही दिलवाती थी। लेकिन वो मेरे लिए मेरी मनपसन्द आलू चाट लेना नही भूलती थी। हम दोनो को ही एक दूसरे की पसन्द ना पसन्द अच्छे से पता है। खुशी दिल की बहुत साफ और मन की कोमल है। पर पक्के दोस्त होते हुए भी हमारे स्वभाव में काफी अंतर था खुशी चुलबुली शरारती थी ऐसे तो क्लास में वो खूब बोलती मस्ती करती पर जब किसी टॉपिक पर प्रेसेंटेशन देनी हो या स्टेज परफॉमेंस हो तो खुशी थोड़ा डर जाती थी मैं कोशिश करती थी उसका कॉन्फिडेंस बढ़ाने की। जिसका खुशी पर थोड़ा असर भी होता था मैं खुशी की हर काम में मदद करती थी। कॉलेज फंक्शन के दौरान मैं बैक स्टेज खड़ी रहती थी खुशी के लिए। और प्रोजेक्ट बनाने में भी मैं उसकी मदद करती थी धीरे- धीरे खुशी को हर काम में मेरी मदद की आदत सी पड़ गई थी वो अकेले अपना कोई भी काम करती ही नही थी। उसे लगता था की उससे अकेले कुछ भी अच्छे से हो ही नही पायेगा।  तब मैं समझ गई थी की मुझे क्या करना है मैंने आने बहाने कर खुशी की मदद करना बंद कर दिया था। जिसकी वजह से वो मुझसे नाराज भी रहने लगी। अच्छा ये था कि अब वो अकेले अपना काम करना सीखने लगी थी। साथ ही उसका खुद पर भरोसा जरूर बढ़ने लगा था। इसी बीच हमारी पढ़ाई भी पूरी हो गई। मुझे एक अच्छी जॉब मिल गई और मैं जॉब करने लगी। पर खुशी की कहीं जॉब नही लगी थी वो चाहती थी कि मैं अपने ऑफिस में उसकी जॉब के लिए कुछ कोशिश करुँ। मैं ऐसा कर सकती थी और शायद उसकी जॉब लग भी जाती। पर मैंने ऐसा नही किया। उस दिन खुशी मुझसे बहुत ज्यादा नाराज हो गई थी बहुत गुस्सा भी किया था उसने मुझ पर। उसे इस बात से दुख पहुँचा था कि मैं उसकी मदद कर सकती थी पर उसकी दोस्त होते हुए भी मैंने ऐसा नही किया। हम दोनो की दोस्ती का ये रिश्ता वैसे ही टूट गया था जैसे तेज बारिश होने पर पेड़ की नाजुक डाली टूट कर गिर जाती है। हम दोनो का उस डाली जैसा ही हाल था खुशी बहुत रोई बहुत ही रोई और चली गई और उसके जाने के बाद मेरी आँखों से भी आँसू बहना शुरू हो गये। उस दिन के बाद से खुशी ने मुझसे कभी बात नही की। पर हुआ वही जो मैने सोचा था खुशी को परेशानियों का सामना भले ही करना पड़ा हो पर उससे वो अंदर से मजबूत हो गई थी। वो अकेले चलना सीख गई अब वो पूरी तरह स्वयं पर निर्भर है उसे मेरे या किसी और के साथ की जरूरत नही है। और आत्मविश्वास की भी उसमे कोई कमी नही है। वो एक कंपनी में एक अच्छी पोस्ट पर है। उसकी तरक्की को देख में खुश हूँ।
 आज नीता ने मुझे मिलने बुलाया है  नीता मेरी कॉलेज फ़्रेंड ही है। मैं जब नीता के घर पहुँची तो मैंने देखा की खुशी भी वहाँ है खुशी गुस्से भरी निगाहों से मुझे देखते हुए मेरे पास आई और जोर से मेरे गले लग गई और रोने लगी वो सब कुछ जान चुकी थी। आज मुझे मेरी दोस्त वापस मिल गई। और खुशी जिया की जोड़ी फिर से बन गई। दोस्ती एक अनमोल रिश्ता होता है जिसमे स्वार्थ बिल्कुल नही होता है। बस सच्ची भावना होती है।
 दोस्त सिर्फ वही नही जो मुश्किले आसान बना दे
 दोस्त वो भी है जो मुश्किलो से लड़ना सिखा दे।
 दोस्त वही नही जो हाथ थाम ले, दोस्त वो भी है जो
 हाथ छोड़कर अकेले चलना सिखा दे।





अधूरी ख्वाईशें



हर एक इंसान की ना जाने कितनी ख्वाईशें होती है जिनमे से कुछ पूरी होती है और कुछ अधूरी रह जाती
है। अधूरी ख्वाईशें बनकर।
मेरी भी बचपन से ही बहुत सारी ख्वाईशें रही है
जब में छोटी थी तब मैंने दादी से परियो की कहानी सुनी थी दादी रोज नई-नई कहानियाँ सुनाती और मेरे
मन में भी रोज नई ख्वाईशें पैदा होती कभी परी बनने की तो कभी रानी बनने की। जब में थोड़ी बड़ी हुई
तब मेरी ख्वाइश बदल गई  अब मुझे मन चाही चीजो
को पाने की ख्वाइश होने लगी। जिनमे से मेरी कुछ ख्वाईशें पूरी हुई भी और कुछ नही भी। जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गई मेरी ख्वाईशें भी बदलती गई ।जब मैं स्कूल में थी तब मेरी दोस्त को उसके पापा गाड़ी से लेने आते थे उसे देख मुझे यही लगता था की पापा के पास भी जल्दी गाड़ी आ जाये और वो भी मुझे ऐसे ही लेने आये। पापा ने गाड़ी ली तो पर तब तक मैं बड़ी हो गई और अब वो खुशी नही थी जो शायद तब होती।  ऐसे ही जब गर्मियों की छुट्टियां आती थी ना। तब मेरी दोस्त और उसकी फैमली छुट्टियां मनाने कहीं बाहर जाते थे सब साथ में। कभी शिमला तो भी किसी और जगह। मेरी दोस्त जब वापस आती थी तो मुझे सब बताती थी कि वहाँ क्या है कैसा है उन्होंने कितने मजे किये सब कुछ। तब उसकी बाते सुन मेरा भी मन करता था के हम भी कभी ऐसे घूमने जायेंगे।
पर वो कभी आया ही नही। मेरी ये मन की इक्छा मन में ही रह गई। मेरी बचपन से ही डांस में बड़ी रुचि रही है मैं जब और लोगों को स्टेज पर डांस करते देखती तब मेरे मन में यही ख्वाइश होती के मैं भी कभी इसी तरह अपनी कला को सबके सामने प्रस्तुत करूँगी।और इसी तरह लोग मेरे लिए भी तालिया बजायेंगे। ये मौका मुझे अपने कॉलेज में हो रहे एक प्रोग्राम के समय मिला भी पर उस वक्त ड्रेस का अरेंजमेंट मुझे ही करना था जो मैं नही कर पाई और फिर मैं उस प्रोग्राम मैं हिस्सा ना ले सकी।मुझे बुरा तो बहुत लगा पर मैं कर भी क्या सकती थी। मुझे याद है एक बार जब मैं मम्मी पापा के साथ मार्केट गई थी हम कपड़े की शॉप पर अपने लिए कपड़े पसन्द कर रहे थे मम्मी पापा ने अपने लिए सिम्पल से कपड़े पसन्द किये पर मुझे शॉप पर टँगी एक ड्रेस बहुत भा गई थी जोकि थोड़ी महंगी थी जब कीमत पता चली तो मैंने वो लेने से मना कर दिया पर मम्मी पापा ने मुझे ड्रेस दिलाई। उन्होंने मुझे तो कपड़े दिला दिये थे पर फिर उन्होंने खुद के लिए कपड़े नही लिये। ये देख मुझे मन ही मन दुख हुआ। क्योंकि ये पहली बार नही था ऐसा पहले भी हो चुका है जब मेरी कुछ ख्वाईशो को पूरा करने के लिए उन्होंने अपनी ख्वाईशो को अनदेखा कर दिया। उस दिन रह रहकर यही ख्याल आ रहा था की हम सामान्य वर्ग के लोगों के लिए छोटी-छोटी ख्वाईशें भी पूरी करना कितना मुश्किल होता है। मैंने ठान लिया था की खुद को इतना काबिल बना लूंगी के अपनी और अपने मम्मी पापा की ख्वाईशो को पूरा कर सकूँ।
मैंने ग्रेजवेशन के बाद पोस्ट ग्रेजवेशन की और फिर
पी. एच. डी की बहुत मेहनत के बाद और काफी स्ट्रगल के बाद मैंने काफी कुछ हासिल कर लिया था
मैं इस काबिल हो चुकी थी की अपनी ख्वाईशो को और अपने मम्मी पापा की ख्वाईशो को पूरा कर सकूँ।
पर अब इस सब का कोई मतलब नही है। क्योंकि अब मन नही है और ना वो वक्त। अब मैं भले ही आज अपना मन चाहा कोई भी सामान ले सकती हूँ पर अब मन में वो खुशी नही है जो तब होती। मम्मी पापा खुश है मेरी सफलता से पर अब उनके मन में भी कोई इच्छा नही है।
"कितना अजीब है ना जब ख्वाईशें पूरी नही हो सकती थी तब ढेर सारी ख्वाईशें थी। और अब जब ये पूरी हो सकती है तो अब कोई ख्वाइश ही नही है।"
ये सच है की हर एक इंसान की सभी ख्वाईशें पूरी नही होती कोई ना कोई ऐसी ख्वाइश होती है जो अधूरी रह जाती है पर शायद ये सामान्य वर्ग के लोगों के साथ ज्यादा होता है। जिनकी कुछ ख्वाईशें ही पूरी हो पाती है बाकी सारी अधूरी रह जाती है। ख्वाईशें पूरी ना हो पाने का मतलब ये नही की उदास होकर बैठ जाये। हर रोज ही कोई नई ख्वाइश मन में आती ही है जिन्हें हम पूरा कर ही लेते है बस फर्क ये है कि जो बचपन की ख्वाईशें होती है उनका असली मजा बचपन में ही आता है। ख्वाईशें तो जीवन भर ही रहती है। क्योंकि दिल है छोटा सा छोटी सी आशा , मस्ती भरे मन की भोली से आशा।
 हर नया दिन एक नई उम्मीद है सूरज की चमकती
किरणें खुशियों का जलता दीप है। इसलिए अधूरी ख्वाईशों को याद कर दुखी ना होते हुए हर दिन खुशी से जीना चाहिए और ये बात मैंने जान ली है। आपका क्या ख्याल है।




इंतजार

   

 इंतजार कितना मुश्किल होता है ना। अगर वो कुछ
कुछ पलो का हो या कुछ घन्टो का तो हम जैसे-तैसे
समय काट ही लेते है लेकिन अगर वो कुछ सालो का
हो तो बिल्कुल आसान नही होता। पर ना चाहते हुए भी कभी-कभी हमारे पास  यही एक रास्ता रह जाता है। इंतजार इंतजार और बस इंतजार।

जैसे ही सुबह का अलार्म बजता है मेरा घर में ही दौड़
लगाना शुरू हो जाता है माँ को पूज करनी होती है तो
पूजा की तैयारी करने में मैं उनकी मदद करती हूँ  पापा
को पौधे लगाना पसन्द है उन्होंने कई अलग-अलग
किस्म के गुलाब के पौधे लगा रखे है पौधों की देख
रेख करने में मैं पापा की हेल्प करती हूँ। फिर घर का
काम जोकि मुझे 10 बजे से पहले ही खत्म करना होता
है जिसमे माँ भी मेरी मदद करती है मुझसे ज्यादा उन्हें
फिक्र होती की मैं कॉलेज के लिए लेट ना हो जाऊ। माँ
और पापा दोनो ही मुझे बहुत प्यार करते है और मेरी
फिक्र भी। वो पूरी कोशिश करते है की मुझे अकेलापन
महसूस ना हो उनकी इस कोशिश को देखते हुए मैं भी
उन्हें अपने मन की बात जाहिर नही होने देती और हर पल उनके साथ  खुशी से रहती हूँ।
 आज बहुत दिनों बाद रेशमा से बात हुई पिछले दिनों
को याद कर खूब हँस रहे थे हम दोनो। लेकिन जैसे ही
उसने रुपद का जिक्र किया मैं आगे कोई बात ही नही कर पाई। मैंने फोन रख दिया और कुछ पुरानी तस्वीरे
निकाल कर देखने लगी इन तस्वीरों में कुछ तस्वीरे
तब की भी है जब हम सारे कॉलेज फ़्रेंड साथ में पिकनिक पर गए थे खूब घूमे थे हम सब उस दिन।
बारिश का मौसम , खूबसूरत जगह, पौधों की पत्तियों
पर ठहरा हुआ पानी ,सब कुछ बहुत अच्छा लग रहा था। और साथ में हम सब की मौज़ मस्ती जो मन को और प्रसन्न किये जा रही थी सच में दोस्तो के साथ घूमने जाने का मजा ही कुछ और होता है।
लेकिन उस दिन जो सबसे ज्यादा खास हुआ वो ये
कि रुपद ने मुझे प्रपोज किया और मैने हाँ कह दिया।
हमारे प्यार की ये गाड़ी दो साल चली और फिर
अपने आखरी स्टेशन पर पहुँच गई यानी के शादी।
वैसे रुपद के माता पिता को मैं ज्यादा पसन्द नही आई
लेकिन फिर भी उन्होंने हमारा रिश्ता स्वीकार कर
लिया और हम साथ में रहने लगे तब तक हमारी जॉब भी लग गई। मैं प्राइवेट कॉलेज में बतौर टीचर जॉब करने लगी और रुपद की जॉब एक कम्पनी में लगी।
    रुपद जितना मुझे प्यार करते है उतना ही प्यार मैं भी उन्हें करती हूँ शादी को 6 महीने होने जा रहे थे।
इन 6 महीनों में हमारा रिश्ता और भी मजबूत हो गया
और रुपद के घर वाले से भी मेरा रिश्ता धीरे-धीरे जुड़ने लगा था मैंने सोचा नही था के रुपद इतने केयरिंग होंगे लेकिन शादी के बाद मुझे एहसास हुआ की वो मेरी कितनी परवाह करते है रुपद को सरप्राइस
देना बड़ा अच्छा लगता है वो मुझे कुछ न कुछ
सरप्राइस देते रहते है मैं भी उनके लिए शायरियां
लिखती हूँ और फिर उन्हें सुनाती हूँ मुझे शायरियां
पसन्द है उनका मन हो न हो पर वो मेरा मन रखने के
लिए मेरी शायरियां जरूर सुनते है और फिर तारीफ
करते है जोकि मुझे सुनकर बड़ा अच्छा लगता है।
सन्डे को हम सब घर में ही थे मैंने रुपद के पसन्द का ही
नाश्ता बनाया था उस दिन रुपद ने एक और सरप्राइस
दिया रुपद ने बताया उनका प्रमोशन हो गया है रुपद
का सपना था की वो एक बड़ी कम्पनी में जाये जहाँ वो
अपनी काबिलियत को साबित कर सके और आज वो
मौका उन्हें मिला। रुपद के इस सरप्राइस ने माँ और
पापा के साथ मुझे भी उदास कर दिया। सबका एक
सपना होता है अपने करियर को लेकर रुपद का वही सपना पूरा होने जा रहा था जिसमे में मैं रुकावट नही बनना चाहती थी रुपद ने मुझसे कहाँ भी के अगर
मेरा मन नही है तो वो नही जायेंगे पर मैंने उन्हें नही रोका बस रात भर जाग कर उन्हें देखती रही और सोच रही थी इतने दिनों में मुझे रुपद की कितनी आदत सी हो गई है कैसे रहूंगी मैं इनके बगेर यही सोचते हुए मेरी आँख लग गई और मैं सो गई। दो दिनो के बाद रुपद चले गये। रुपद 5 साल के लिए विदेश गये थे पर वँहा की कम्पनी को उनका काम पसन्द आया इसलिए वो दो साल और वहाँ रुक गये।7 साल हो गए उन्हें गये हुए। इन 7 सालो में मेरा रिश्ता माँ पापा के साथ बहुत गहरा हो गया है बस कमी है तो रुपद की। मैं हर पल
उन्हें याद करती हूँ माँ पापा के साथ-साथ मैं भी उनका
बेसब्री से इंतजार कर रही हूँ रुपद से फोन पर बात होती रहती है पर सिर्फ फोन पर बात करने से ही मेरे मन
को सुकुन नही मिलता साथ होने वाली बात अलग होती है। आज मैं भले ही घर वालो के साथ हँसते मुस्कुराते रहूँ पर मुझे उनकी कमी महसूस होती है और मैं अकेले में रो भी लेती हूँ। जब मैं किसी जोड़े को
साथ- साथ घूमते हुए हँसते हुए देखती हूँ तब मुझे रुपद की याद आ जाती है और मैं यही सोचती हूँ की वो कब
आएंगे ये इंतजार कम खत्म होगा और कब हम भी ऐसे साथ में मुस्कुरायेंगे।  ये 7 साल बड़ी ही मुश्किल
से मैने उनके इंतजार में बिताये है। अब मन बस यही कहता है की ये इंतजार अब जल्दी खत्म हो जाये और
रुपद वापस आ जाये।
           तेरी यादे कर रही है बेकरार
           हर लम्हे में है तेरा इंतजार
          खामोश मन की सुन ले पुकार
          तन्हा दिल को है तेरा इंतजार
         

नया घर और डर

गाड़ी से सामान लाकर घर में रखा जा रहा है पलक
पूरे घर में यहाँ से वहाँ दौड़ लगा रही है वो बड़ी खुश
है। और खुशी की वजह ये है की हम नये घर में आ 
गये है नये घर की खुशी हमे भी है पर साथ ही पुराना
घर छोड़ने का थोड़ा दुख भी है। उस घर से हमारी 
बहुत सी यादे जो जुड़ी हुई है। जोकि बहुत ही मीठी यादे है। पर फिलहाल यादो पर विराम लगाते हुए मैं
अपना काम शुरू कर लेती हूँ। घर में सामान की
सेटिंग। कौन सा सामान कहाँ अच्छा लग रहा है कैसे
रखना है मैं और ऋषि हम दोनो मिल कर यही सोच
रहे है धीरे-धीरे हम दोनो ने सामान की सेटिंग कर ही
ली बस कुछ तस्वीरे ही है जो दीवार पर लगानी है
इस बात पर मेरी और ऋषि की थोड़ी बहस भी हो गई
पर फिर हम दोनो ने मिलकर डिसाइड कर ही लिया
की हम तस्वीरों को हॉल की साइड वाली दीवार पर
लगाएंगे। चलो खूब मेहनत और थकान के बाद घर में
सारे समान की सेटिंग हो ही गई। पलक का रूम भी
अच्छे से तैयार कर दिया है क्योंकि मैडम भले ही अभी
सिर्फ 11 साल की है पर उसे सब परफेक्ट चाहिए वो बात अलग है की वो खुद ही बाद में पूरे रूम की हालत बिगाड़ देगी। वैसे मुझे मेरे नये घर में गार्डन ही है जो बोहोत भा रहा है मैंने यहाँ फूलो वाले पौधे लगाये है। देखते ही देखते पूरा एक सप्ताह हो गया है हमे यहाँ आये हुए। सुबह का सूरज निकल गया है और ये इशारा कर रहा है की मैं झटपट अपना काम शुरू करूँ क्योंकि ऋषि को ऑफिस और पलक को स्कूल जाना है। ऋषि के ऑफिस जाने के बाद मैं पलक को स्कूल बस में बैठाकर घर आ पलक के रूम की
सफाई करने लगी।तभी मुझे ऐसा एहसास हुआ की
जैसे कोई हॉल में है मुझे किसी के कदमो की आहट
सुनाई दे रही थी मैं तुरन्त हॉल में गई यहाँ वहाँ देखा
तो कोई नही था मैं इसे अपना वहम मानकर वापस
अपने काम में लग गई। रात को सारे काम से निपट मैं
हॉल की लाइट बंद कर अपने रुम में जा रही थी की
खिड़की की आवाज ने मुझे रोक लिया हॉल की
खिड़की खुली थी और उसी की ही आवाज आ रही थी
मैं खिड़की बंद करने गई। खिड़की बंद करते वक्त मेरी नजर गार्डन पर पड़ी मैने वहाँ किसी को देखा मैं घबरा
गई जल्दी से बाहर की लाइट ऑन की और जब मैने दुबारा वहाँ देखा तो कोई नही दिखा। तब मैंने सोचा की यहाँ वाकई में कोई था या मैं बेवजह ही डर गई।
ज्यादा ना सोचते हुए मैं अपने रूम में जाकर सो गई।
पर सच कहुँ तो मेरे मन में ना जाने कैसे-कैसे ख्याल
आ रहे थे और वही सोचते-सोचते मेरी आँख लग गई।
सुबह मेरी नींद जरा जल्दी खुल गई मैने सोचा उठ ही
जाती हूँ क्योंकि सुबह काम भी ज्यादा होता है मैं
उठकर रूम से बाहर आई हॉल की तरफ जा रही थी
की मुझे पलक के रूम से कुछ आवाज सुनाई दी मुझे
लगा पलक जाग गई है मैने पलक के रूम का दरवाजा
खोला देखा पलक तो सो रही है मुझे लगा की शायद
पलक की आवाज मेरे कानो में गूंजने लगी है इसीलिए
मुझे आवाज सुनाई दी। जबकि पलक सो रही है।
सुबह के 9 बज गये थे ऋषि ऑफिस के लिए निकल
गये थे पलक स्कूल के लिए तैयार हो रही थी लेकिन
वो मेरे पास आकर कहती है की उसकी तबियत ठीक
नही है वो आज स्कूल नही जाएगी। उसका चेहरा
देख लग रहा था की वो झूठ बोल रही है पर मैने उससे
पूछा नही और ठीक है बोल कर मैने उसे उसके रूम
में भेज दिया। वो अपना नाश्ता भी अपने रूम में ही ले
गई। मुझे पलक का बर्ताव कुछ अलग सा लग रहा है
पूरा दिन आज वो रूम में ही है बाहर ही नही आयी
और ना मुझे अपने रूम में आने दे रही है मुझे चिंता
सी होने लगी और थोड़ा डर सा भी लगने लगा आखिर हो क्या रहा है पहले मुझे घर में किसी के होने का एहसास हुआ और अब पलक ना जाने इसे क्या हो गया। मैं पलक के लिए जूस बनाकर उसके रुम की ओर ही आ रही थी तब मुझे कोई परछाई सी नजर आई। मैं दौड़कर पलक के रूम में गई और तब जो देखा वह देख में चोंक गई।
            पलक के रूम में एक छोटी सी बच्ची थी जो
करीब 5 साल की होगी। मासूम सा चेहरा थोड़े बिखरे से बाल वाइट कलर की फ्रॉक जोकि थोड़ी मेली से हो गई थी। कुछ ऐसी हालत में थी वो बच्ची। वो मुझे देख छिपने लगी। उस वक्त मेरे दिमाग में ना जाने कितने
सवाल आये जिनके जवाब मुझे ही ढूंढने है। पलक से
मैने उसके बारे में जाना वो लड़की दो दिन से घर में
है और हमे पता ही नही है। पलक को भी कल रात में
इसके बारे में पता चला। घर में जो घटनाएं हो रही थी
वो सब इसी की वजह से हो रही थी किसी के होने का
एहसास , रात में गार्डन में किसी का दिखना , और
पलक के रूम से किसी की आवाज आना। और मैं ना
जाने मन क्या- क्या सोचे जा रही थी। पलक ने
मुझे बताया की ये लड़की खो गई है ये अपने घर से
अकेली ही पार्क जाने के लिए निकली थी पर रास्ता
भटक जाने की वजह से ये यहाँ आ पहुँची और हमारे
घर में आकर छिप गई। पलक की बात सुनने के बाद
पहले तो मैने उस पर गुस्सा किया की उसने हमे
बताया क्यों नही पर फिर बाद में मैंने उसे प्यार से
समझाया की उसे हमसे ये बात नही छिपानी चाहिए
थी। मैंने ऋषि को फोन कर घर बुलाया सारी बात
बताई और फिर हम दोनो ने पुलिस को इसकी
जानकारी दी और उस बच्ची के माता- पिता को ढूंढा।
हम सब की कोशिशो ने उस बच्ची को वापस अपने
घर वालो से मिला दिया और तब जाकर मैंने चेन की
साँस ली। हम घर आ गये।मैं ऋषि और पलक हम
तीनो हॉल में बैठे हुए थे मैं बैठे- बैठे यही सोच रही थी की नये घर में आये ज्यादा वक्त भी नही हुआ और मैंने
यहाँ डर भी महसूस कर लिया। खैर अंत भला तो सब भला अब सब कुछ ठीक हो गया है और हम हमारे नये घर में खुश है।





एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE