जब कहीं जाना हो तब लेट जरूर होते है पर फिर भी मैंने जल्दी- जल्दी अपना सामान पैक किया और टेक्सी में बैठ स्टेशन पहुँच गई। दिवाली की पाँच दिन की छुट्टी ऑफिस से मिली ही है पर मैंने पाँच दिन की और लेली। स्टेशन पहुँची तो भीड़ का सामना करना पड़ा । कोई अपने घर अपने शहर जा रहा था तो कोई आ रहा था। कितने ऐसे लोग है जो या तो पढ़ाई के लिए या फिर जॉब की वजह से अपने घर से दूर दूसरे शहर जाकर रह रहे है। मैं भी उनमे से एक हूँ। भीड़ का सामना करते हुए मैं जैसे- तैसे गाड़ी के पास पहुँच गई और अपनी सीट पर जा बैठी। सीट पर बैठने के बाद मैंने एक लम्बी गहरी साँस ली। बिल्कुल वैसी ही जैसी कोई रेस जितने के बाद लेते है और खुद से कहते है आखिर मैं जीत ही गयी या जीत ही गया।
अब मन में थोड़ी खुशी महसूस हो रही है वो इसलिए के आखिरकार मैं घर जा पा रही हुँ। छूट्टी तो मिल गई थी पर रिजर्वेशन कंफर्म नही हो पा रहा था। जोकि बाद में हो ही गया। वैसे ये पहली बार ही है जो मैं अकेले जा रही हूँ वर्ना हमेशा जब भी घर जाना हो तब पापा मुझे लेने आते है।इस बार किसी वजह से वो नही आ सके तो मैंने उन्हें कह दिया है की वो फिक्र ना करे मैं अकेले बिना किसी परेशानी के ठीक से आ जाउंगी।
घड़ी में चार बजे और ट्रेन चलना स्टार्ट हो गई। यात्री अपनी - अपनी सीट पर आकर बैठ गये।
मेरे बगल वाली सीट पर एक शादी शुदा जोड़ा बैठा हुआ है जोकि साथ में बड़े अच्छे लग रहे है। और सामने वाली सीट पर भी कुछ लोग है जोकि आपस में खूब बाते किये जा रहे है इन्हें देखकर लगता है कि
शायद ये एक ही ऑफिस के स्टाफ मेंम्बर्स है क्योंकि वे साथ मिलकर किसी टॉपिक पर डिस्कशन कर रहे है इनके साथ बैठा एक और शक्स है जिसको शायद अपने साथियो के डिस्कशन में कोई दिलचस्पी नही है वह अपने हाथ में मैग्ज़ीन थामे कुछ पढ़ रहा है जिस तरह से उस व्यक्ति ने मैग्ज़ीन पकड़ी हुई है उससे उसका चेहरा नजर नही आ रहा है।
वैसे मैं कभी किसी पर ऐसे ज्यादा ध्यान नही देती हूँ वो तो अभी मैं अकेली हूँ और थोड़ा बोर हो रही हूँ इसलिए नजर आसपास बेठे लोगों पर जा रही है।
थोड़ी देर शांत बेठे रहने के बाद मैं अपने मोबाइल से गाने सुनने लगी। गाने सुनते वक्त मेरी नजर दोबारा
सामने बैठे लोगों पर पड़ी और साथ ही उस सक्श पर भी जो मैग्ज़ीन पढ़ रहा था इस वक्त उसका चेहरा साफ नजर आ रहा था काले चमकीले बाल गेहुआ रंग और हल्की भूरी आँखे। हम दोनो की ही नजरे टकरा गई और कुछ पल के लिए तो थम सी ही गई। देवांश, ये देवांश है उसे देख साफ पता चल रहा था कि उसने भी मुझे पहचान लिया।
हमारी मुलाकात कॉलेज में युवा उत्सव फंक्शन के दौरान हुई थी। मुझे याद है मैं और मेरे फ़्रेंड्स अपनी परफॉमेंस के लिए रेडी थे और बैक स्टेज अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। तभी देवांश आया ट्रेडिशनल लुक में थोड़ा हैरान सा उसने आते ही हमसे कहा सुनिये हमारी परफॉमेंस आपसे पहले है प्लीज़ हमे आगे जाने दीजिये। देवांश और उसका ग्रुप दूसरे कॉलेज से थे। वो सिर्फ युवा उत्सव में अपनी परफॉमेंस देने आये थे। ये हम पहली बार मिले थे। हमारे ग्रुप को
सेकेंड प्राइस मिला जबकि देवांश के ग्रुप को फर्स्ट
प्राइस मिला। फिर प्रतिभागईयो की साथ में फोटो
ली जाने लगी। मैं फर्स्ट न आने की वजह से थोड़ी सेड थी इसलिए उदास सा चेहरा बनाकर खड़ी हुई थी। तब देवांश ने मुझे मुस्कुराते हुए स्माइल करने का इशारा दिया। मैं समझ गई थी कि देवांश मुझे फोटो के लिए स्माइल करने को कह रहा है मैं थोड़ा सा मुस्कुराई और फोटो क्लिक हो गई। इसके बाद सभी
प्रतिभागी एक दूसरे से मिले , जो जीते उन्हें बधाई दी गई। इसी बीच देवांश और मेरी बात भी हुई बहुत ज्यादा नही बस थोड़ी। पर मेरे लिए ये बहुत थी क्यों
ये तो पता ही नही।
इस दिन के बाद हम फिर मिले मेरे फ़्रेंड की पार्टी में। फंक्शन के दौरान शायद ऋषि और देवांश की दोस्ती हो गई थी इसलिये तो ऋषि ने देवांश को भी बुलाया था आज हमारी बात तो नही हुई हाँ बस मुलाकात
हुई चुप-चुपके मेरी नजरे देवांश को ही देख रही थी। करीब दो महीने बाद ,
मैं एक दिन शॉपिंग के लिए मॉल गई हुई थी तब वहीं
अचानक देवांश और मेरी एक बार फिर मुलाकात हो गई। सबसे पहले हमने एक दूसरे को हाय - हेलो कहा बिल्कुल उसी तरह जब दो लोग एक दूसरे को पहचानते तो हो बस जानते नही वैसे ही। वैसे मेरी शॉपिंग पूरी हो गई थी पर मैं थोड़ा थक भी गई थी जो शायद देवांश को मुझे देखकर समझ आ गया था। इसलिए उसने मुझे कॉफी ऑफर की और मैंने हाँ कह दिया क्योंकि मैं कुछ देर आराम से बैठना चाह रही थी मैं और देवांश कैफे में बिल्कुल आमने -सामने बैठे थे कॉफी तो पी ली थी पर अब बात क्या करे ये समझ नही आ रहा था मैं कभी यहाँ- वहाँ देखती तो कभी देवांश की ओर देखती
और देवांश , वो भी कभी कॉलेज के फंक्शन की बात करता तो कभी ऋषि की पार्टी की। कुछ देर बाद तो वो भी चुप बैठ गया। फिर मैंने ही बात करना शुरू किया।
कॉफी अच्छी थी ना, मैं पहले भी यहाँ आ चुकी हूँ फिर देवांश ने कहा हाँ। ऐसे ही धीरे-धीरे बात करते हमने दो
घन्टे तक बाते की। और क्योंकि अब दोस्ती हो गई तो कभी - कभी मुलाकाते भी होने लगी। लेकिन अब हम जब मिलते थे तो होता ये था की देवांश बाते करता और मैं चुपचाप उसे देखती रहती क्या करती मुझे उसे देखते रहना ही अच्छा लगता था। ऐसे ही ही हमारी लाइफ आगे बढ़ी जा रही थी। पर
एक दिन मुझे पता चला कि देवांश की शादी फिक्स हो गई है उसके घरवालो ने ही उसके लिए एक लड़की पसन्द कर ली है। देवांश ने मुझे इस बारे में कुछ नही
बताया पर मुझे उसके दोस्तो से ये बात मालूम हुई।
मैं नही जानती थी के देवांश का क्या फैसला है पर मैंने
एक फैसला ले लिया। मैं बिना कुछ कहे बिना कुछ बताये देवांश की लाइफ से दूर हो गई। ना कोई बात ना मुलाकात। मुझे जबलपुर में जॉब मिल गई और मैं यहाँ आ गई। मैं नही चाहती थी की मेरी वजह से उसकी लाइफ में कोई भी प्रोब्लम आये। बस इसलिए यहाँ आ गई।
आज दो साल बाद मैंने देवांश को देखा बिल्कुल नही बदला वैसा ही है पहले जैसा। उसने भी मुझे देख लिया है पर ना वो कुछ कह रहा है और ना मैं। आज हम दोनो ही चुप है। हम एक दूसरे को पहचानते भी है और जानते भी है पर फिर भी आज अजनबी है।

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