कोशिश





कई देर से हाथ में किताब पकड़े मैं उसे पढ़ने की एक नाकाम कोशिश किये जा रहा हूँ मैं अभी तक ये पहला पन्ना भी पूरा न पढ़ सका। कितना मन लगाने की कोशिश
कर रहा हूँ पर फिर भी पढ़ने में मेरा मन ही नही लग रहा। अपनी इस कोशिश में नाकाम हो आखिरकार मैंने किताब को बंद कर रख ही दिया।
वैसे जिंदगी भी किताब के जैसी ही तो है जिस तरह किताब के पन्ने होते है वैसे ही जिंदगी के भी कुछ पन्ने होते है फर्क बस इतना है की किताब के पन्नो को हम अपनी मर्जी से उलट- पलट कर पढ़ सकते है पर जिंदगी के पन्नो पर हमारा कोई जोर नही ये पन्ने खुद ही पलटते है और हर एक पन्ने पर होती है ज़िन्दगी से जुड़ी एक कहानी।
मैं आज गेस्ट के तौर पर अपने ही कॉलेज आया हूँ।
ग्रेजवेशन मैंने यही से किया था। हॉल में आते ही मेरा तालियों के साथ स्वागत किया गया। फूलो का एक गुलदस्ता मेरे हाथ में देकर मेरा सम्मान किया गया और फिर जहाँ पहले से दो और गेस्ट बैठे हुए थे उनके पास मुझे भी बैठा दिया गया। प्रिंसिपल सर आये हुए सभी गेस्ट के बारे में अपने स्टूडेंट्स को बता रहे थे की उन्होंने अपनी लाइफ में कैसे मेहनत से बहुत कुछ हासिल किया। वो मेरी भी तारीफ पे तारीफ किये जा रहे थे। वो स्टूडेंट्स को कह रहे थे की उन्हें मुझसे बहुत कुछ सीखना चाहिए।
सर ने बातो ही बातो में ये भी कहा की मेरे पेरेंट्स कितने खुश होंगे मुझे इस मुकाम पर देखकर। इसके बाद सर ने और भी कई बाते की जोकि मैंने नही सुनी क्योंकि मेरा ध्यान उस वक्त कहीं और था , मुझे माँ पापा की याद आ गयी थी। मैं बार - बार उन्ही के बारे मैं सोच रहा था।
मैं बचपन से ही थोड़ा जिद्दी था। एक ही बेटा था इसलिए प्यार भी बहुत मिला और मेरी हर जिद पूरी भी हुई। सपने तो मैं बचपन से ही देखता था पर मेरे सपनो को पंख तब लगे जब मेरा ग्रेजवेशन कम्प्लीट
होने वाला था। मैं हमेशा से एक सफल बिज़नेस मेन
बनना चाहता था। जोकि मैं आज हूँ।
मैंने बहुत मेहनत की और हर वो कोशिश की जिससे मैं सक्सेस हासिल कर सकूँ। कई मुश्किले मेरे सामने आई पर मैं डगमगाया नही कोशिश करता रहा और चलता रहा। कई दिनों की मेहनत के बाद मेरी कोशिश रंग लाई और मैने अपनी खुद की एक कम्पनि खड़ी की। और वो हासिल किया जो मैं चाहता था।
लेकिन कुछ ऐसा भी है जो छूट गया।
मेरे अपने। ग्रेजवेशन पूरा करने के बाद ही मैं अपना बिज़नेज स्टार्ट करना चाहता था वो भी अलग शहर में जाकर। मेरे इस फैसले से पापा सहमत नही थे। वो नही चाहते थे की मैं उन्हें और माँ को छोड़कर किसी अलग शहर में रहने जाऊँ।
और साथ ही उन्हें ये भरोसा भी नही था की मैं इस नादानी भरी उम्र में ठीक से कुछ सम्हाल भी पाऊंगा के नही। इसलिए उनका फैसला था की मैं उनके पास ही रहकर अपना बिज़नेस स्टार्ट करूँ। पर ये मेरे लिए पॉसिबल नही था क्योंकि मेरा लक्ष्य बड़ा था जो यहाँ हमारे इस छोटे से शहर में रहकर पूरा कर पाना मुझे मुश्किल लग रहा था।
पापा और मेरी इस बात पर काफी बहस भी हुई।
उन्होंने मुझे पैसे देने से भी इंकार कर दिया था। और
हमारे बीच बहस इतनी बढ़ गई थी के मैंने गुस्से में आकर उसी दिन घर छोड़ दिया। बिना किसी की परवाह किये मैं निकल पड़ा अपना सपना पूरा करने।
      इतने दिनों में मैंने कभी भी उनसे बात करने की कोई कोशिश नही की। हाँ उनकी याद जरूर आई
पर कभी हिम्मत नही जुटा पाया। आज जब कॉलेज
में सर ने पेरेंट्स का जिक्र किया तब से ही मुझे घर की और माँ पापा की बहुत याद आ रही है। हॉटेल वापस आकर मैंने इस किताब में मन लगाने की भी कोशिश की पर मन नही लगा सका।
काफी देर तक बैठा हुआ मैं कुछ सोचता रहा अभी कुछ और भी बचा है जिसे पाने की कोशिश करनी है मुझे। मैं उठा हॉटेल से बाहर निकल टैक्सी पकड़ी।
और सीधे अपने घर पहुँचा। घर के बाहर पापा की वही पुरानी कार खड़ी थी जिसे लेकर पापा ऑफिस जाते थे पर अभी इस पर लगी धूल देख ऐसा लग रहा है जैसे कई दिनों से ये कार बस यहीं खड़ी हुई है। मैं बाहर का बड़ा वाला गेट खोलकर आगे बढ़ा घर के गार्डन के पौधे सूखे से नजर आ रहे थे सब सुनसान सा लग रहा
था अब मेरे मन में घबराहट सी होने लगी तरह-तरह के विचार मेरे दिमाग में चलने लगे घर का दरवाजा खुला हुआ था। मैं घर के अंदर गया अंदर कोई भी नही था मैं परेशान होने लगा कहीं ऐसा तो नही के वो
यहाँ से कहीं और चले गये, मुझे तो कुछ भी नही पता उनके बारे में। आज मैं खुद से सवाल कर रहा था
क्यों मैंने कोशिश नही की माँ पापा से मिलने की उनसे बात करने की, उन्हें मनाने की , काश मैंने कोशिश की होती। मैं मन ही मन ये सब कुछ सोचकर बहुत
दुखी हो रहा था लेकिन तभी मुझे सामने माँ और पापा नजर आये जोकि मुझे हैरान निगाहों से देख रहे थे पापा थोड़े बीमार भी लग रहे थे मैंने कुछ नही कहा ना कुछ पूछा बस जाकर उनसे लिपट गया और रोने लगा। मुझे लगा था की शायद वो मुझसे बहुत नाराज होंगे और हो सकता है की वो मुझसे बात भी न करे पर उन्होंने मुझे उतने ही प्यार से गले लगाया जितने प्यार से वो मुझे बचपन में गले लगाया करते थे।
अब बस मेरी कोशिश यही है कि मैं हमेशा अपनो के साथ रहूँ।




















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