रविवार का दिन यानी छुट्टी वाला दिन ऑफिस जाने की कोई चिंता नही। सुबह का चमकता सूरज निकल गया था उसकी किरणें खिड़की से होती हुई मेरे चेहरे पर पड़ रही थी जोकि की मुझे नींद से जगाने की कोशिश कर रही थी और मैं जागा भी। उठकर घड़ी में
देखा तो आठ बज रहे थे नताशा मुझसे पहले जाग चुकी थी और शायद किचन में थी। मैं अलसाया सा
अंगड़ाइयां लेते हुए जैसे-तैसे उठकर ब्रश कर हॉल में पहुँचा और सोफे पर जा बैठा। नताशा ने चाय लाकर मेरे सामने रख दी। मैंने चाय का कप उठाते हुए पूछा- तुमने चाय पीली। हाँ कहते हुए नताशा ने कहा तुम तैयार हो जाओ जब तक मैं अपना काम खत्म कर लेती हूँ। हम दोनो हर सन्डे को बाहर घूमने जाते है।
आज भी जायेंगे।
मैं तैयार होने के बाद हॉल में आकर अखबार पढ़ने लगा क्योंकि अभी नताशा तैयार हो रही है जिसमे उसे काफी वक्त लगता है। इसलिए तब तक मैं अखबार ही पढ़ लेता हूँ। अखबार पढ़ना शुरू ही किया था कि डोर बेल की आवाज आई। मैंने उठकर दरवाजा खोला सामने पोस्टमेन था उसने मुझे नताशा के नाम का लेटर थमाया रजिस्टर पर साइन लिए और चला गया।नताशा के लिए उसके ऑफिस से लेटर आया था
उसका प्रमोशन लेटर। जिसमे लिखा था की उसका प्रमोशन जबलपुर हुआ है। मैंने लेटर अखबार के बीच में रख दिया। नताशा तैयार होकर आ गई थी हम दोनो घर से निकल गये। आज हम खुशी पार्क गये थे।
बहुत अच्छि जगह है ये। इसे बहुत ही बढ़िया तरह से तैयार किया गया है। यहाँ आकर हर इंसान खुशी ही महसूस करता है। बस शायद मैं ही नही कर पा रहा था।
जब हम कहीं बाहर से वापस घर आते है तो काफी थका महसूस करते है। कुछ यही हाल हमारा भी है नताशा तो थकान की वजह से जल्दी सो गई। पर मुझे
नींद नही आ रही थी। मैं काफी रात तक जागा रहा।
सुबह जब ऑफिस के लिए निकल रहा था। तब नताशा ने मुझे अपना प्रमोशन लेटर दिखाया। लेटर देखते ही मैं अपनी लड़खड़ाई जबान में बोला- अरे ये लेटर सॉरी मैं तुम्हे बताना भूल गया था ये कल आया था। अच्छा हुआ की तुम्हारे हाथ में आ गया। वैसे congratulation तुम्हारा प्रमोशन हो गया।
नताशा ने बहुत ही छोटी सी मुस्कान के साथ थैंक्यू कहा और फिर हम दोनो ऑफिस के लिए निकल गये।
मेरा आज ऑफिस में मन नही लग रहा था इसलिए मैं घर जल्दी आ गया। आज मन में कई सवाल उठ रहे है
जिनमें मैं खुद को उलझा महसूस कर रहा हूँ।
दो साल हो गये है हमारी शादी को। हमारा रिश्ता और पति पत्नी से अलग है ये एक उलझा हुआ सा रिश्ता है। हमारे रिश्ते में समझ की कोई कमी नही है समझ तो बहुत है कभी भी ऐसा नही हुआ के किसी भी वजह से हमारे बीच थोड़ी भी बहस हुई हो। हमने कभी भी एक दूसरे से किसी भी बात की कोई शिकायत ही नही की इसलिए के हम एक दूसरे को
बहुत अच्छे से समझते है। " ऐसा नही है शायद इसलिए के हम एक दूसरे पर अपना हक ही नही समझते " साथ रहते हुए भी हमारे बीच फासले रहे।
दोस्ती , प्यार ,अपनापन ये हमारे रिश्ते में कभी नही रहा। हम एक दूसरे के लिए अगर कुछ भी करते है तो अपनी जिम्मेदारी समझकर करते है अपना मानकर
कर नही। मैं नताशा से शादी नही करना चाहता था।
क्योंकि मैं किसी और को पसन्द करता था। नताशा
करियर में आगे बढ़ना चाहती थी। वो भी शादी से खुश नही थी। पर फैमली के आगे हमारी नही चली और हमारी शादी हो गई। नताशा ने मुझसे पहले ही कह दिया था की मैं कभी भी उसके कैरियर के आड़े नही आऊंगा। मैने भी ये कहते हुए हाँ कह दिया था की मुझे उससे कोई मतलब नही वो जो चाहे करे।
मैंने कभी भी उसकी लाइफ में कोई दखल नही दिया।
पर आज मैं उलझन में पड़ गया हूँ क्योंकि मैं क्या महसूस कर रहा हूँ वो मैं नही समझ पा रहा। कल मैंने
नताशा का प्रमोशन लेटर अखबार में छिपा दिया मैंने
ऐसा क्यों किया मुझे समझ ही नही आ रहा। एक डर सा लग रहा है इस बात का के क्या नताशा चली जायेगी। मैं चाहता हूँ के वो ना जाये। पर मैं ऐसा क्यों चाहता हूँ जबकि हम दोनो के इस रिश्ते में कुछ ऐसा नही है जिसके लिए हम साथ रहे। हम तो हर सन्डे भी साथ घूमने सिर्फ इसलिए जाते है ताकि ऑफिस स्ट्रेस को कम कर अपने माइंड को थोड़ा फ्रेश कर सके। वो खामोश रिश्ता जिसमे हम जरूरत से ज्यादा एक दूसरे से बात तक भी नही करते क्या इस रिश्ते में भी कुछ ऐसा है जो हमे बांधे हुए है। शायद है। मैं नताशा को चाहता हूँ के नही ये तो नही पता पर उसके बगेर नही रह सकता ये जरूर समझ गया हूँ।
रात को डिनर के वक्त मैं नताशा से बात करना चाह रहा था जानना चाहता था की क्या वो जबलपुर जाने वाली है पर मैं नही पूछ सका पर फिर मैंने हिम्मत कर पूछ ही लिया क्या तुम जबलपुर जा रही हो। नताशा ने कहा -तुम क्या चाहते हो। मैंने घबराते हुए कह दिया मुझे कोई प्रॉब्लम नही है तुम जो चाहे फैसला लो। मैंने ऐसे जताया जैसे उसके जाने से मुझे कोई फर्क नही पड़ता। जबकि मन तो मना कर देने का था पर जब मैंने कभी अपना कोई हक समझा ही नही तो आज कैसे रोकलूँ।
आज मंडे है नताशा आज जा रही है। अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए वो मेरा सारा समान ठीक से जमाकर और मुझे बताकर जा रही है। की कौनसी चीज़ किस जगह रखी है। मैं भी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए उसे स्टेशन छोड़ने जा रहा हूँ कैसी उलझन है रोकना चाहता हूँ पर छोड़ने जा रहा हुँ बहुत कुछ कहना चाहता हूँ पर खामोश हूँ। मैं नताशा को स्टेशन छोड़ आया रुका नही क्योंकि
उसे जाते हुए नही देख पाता। शाम हो गई थी मैं
घर आकर चुपचाप गुमसुम सा सिर झुकाए आँखे बंदकर बैठ गया। कुछ आवाज सी कानो में पड़ी मैंने देखा तो टेबल पर चाय से भरा कप रखा हुआ था। और जब नजर उठाकर सामने देखा तो नताशा खड़ी हुई थी। ना होते हुए भी कुछ तो था हमारे रिश्ते मैं जिसकी वजह से नताशा आज नही जा सकी।
उसका प्रमोशन लेटर। जिसमे लिखा था की उसका प्रमोशन जबलपुर हुआ है। मैंने लेटर अखबार के बीच में रख दिया। नताशा तैयार होकर आ गई थी हम दोनो घर से निकल गये। आज हम खुशी पार्क गये थे।
बहुत अच्छि जगह है ये। इसे बहुत ही बढ़िया तरह से तैयार किया गया है। यहाँ आकर हर इंसान खुशी ही महसूस करता है। बस शायद मैं ही नही कर पा रहा था।
जब हम कहीं बाहर से वापस घर आते है तो काफी थका महसूस करते है। कुछ यही हाल हमारा भी है नताशा तो थकान की वजह से जल्दी सो गई। पर मुझे
नींद नही आ रही थी। मैं काफी रात तक जागा रहा।
सुबह जब ऑफिस के लिए निकल रहा था। तब नताशा ने मुझे अपना प्रमोशन लेटर दिखाया। लेटर देखते ही मैं अपनी लड़खड़ाई जबान में बोला- अरे ये लेटर सॉरी मैं तुम्हे बताना भूल गया था ये कल आया था। अच्छा हुआ की तुम्हारे हाथ में आ गया। वैसे congratulation तुम्हारा प्रमोशन हो गया।
नताशा ने बहुत ही छोटी सी मुस्कान के साथ थैंक्यू कहा और फिर हम दोनो ऑफिस के लिए निकल गये।
मेरा आज ऑफिस में मन नही लग रहा था इसलिए मैं घर जल्दी आ गया। आज मन में कई सवाल उठ रहे है
जिनमें मैं खुद को उलझा महसूस कर रहा हूँ।
दो साल हो गये है हमारी शादी को। हमारा रिश्ता और पति पत्नी से अलग है ये एक उलझा हुआ सा रिश्ता है। हमारे रिश्ते में समझ की कोई कमी नही है समझ तो बहुत है कभी भी ऐसा नही हुआ के किसी भी वजह से हमारे बीच थोड़ी भी बहस हुई हो। हमने कभी भी एक दूसरे से किसी भी बात की कोई शिकायत ही नही की इसलिए के हम एक दूसरे को
बहुत अच्छे से समझते है। " ऐसा नही है शायद इसलिए के हम एक दूसरे पर अपना हक ही नही समझते " साथ रहते हुए भी हमारे बीच फासले रहे।
दोस्ती , प्यार ,अपनापन ये हमारे रिश्ते में कभी नही रहा। हम एक दूसरे के लिए अगर कुछ भी करते है तो अपनी जिम्मेदारी समझकर करते है अपना मानकर
कर नही। मैं नताशा से शादी नही करना चाहता था।
क्योंकि मैं किसी और को पसन्द करता था। नताशा
करियर में आगे बढ़ना चाहती थी। वो भी शादी से खुश नही थी। पर फैमली के आगे हमारी नही चली और हमारी शादी हो गई। नताशा ने मुझसे पहले ही कह दिया था की मैं कभी भी उसके कैरियर के आड़े नही आऊंगा। मैने भी ये कहते हुए हाँ कह दिया था की मुझे उससे कोई मतलब नही वो जो चाहे करे।
मैंने कभी भी उसकी लाइफ में कोई दखल नही दिया।
पर आज मैं उलझन में पड़ गया हूँ क्योंकि मैं क्या महसूस कर रहा हूँ वो मैं नही समझ पा रहा। कल मैंने
नताशा का प्रमोशन लेटर अखबार में छिपा दिया मैंने
ऐसा क्यों किया मुझे समझ ही नही आ रहा। एक डर सा लग रहा है इस बात का के क्या नताशा चली जायेगी। मैं चाहता हूँ के वो ना जाये। पर मैं ऐसा क्यों चाहता हूँ जबकि हम दोनो के इस रिश्ते में कुछ ऐसा नही है जिसके लिए हम साथ रहे। हम तो हर सन्डे भी साथ घूमने सिर्फ इसलिए जाते है ताकि ऑफिस स्ट्रेस को कम कर अपने माइंड को थोड़ा फ्रेश कर सके। वो खामोश रिश्ता जिसमे हम जरूरत से ज्यादा एक दूसरे से बात तक भी नही करते क्या इस रिश्ते में भी कुछ ऐसा है जो हमे बांधे हुए है। शायद है। मैं नताशा को चाहता हूँ के नही ये तो नही पता पर उसके बगेर नही रह सकता ये जरूर समझ गया हूँ।
रात को डिनर के वक्त मैं नताशा से बात करना चाह रहा था जानना चाहता था की क्या वो जबलपुर जाने वाली है पर मैं नही पूछ सका पर फिर मैंने हिम्मत कर पूछ ही लिया क्या तुम जबलपुर जा रही हो। नताशा ने कहा -तुम क्या चाहते हो। मैंने घबराते हुए कह दिया मुझे कोई प्रॉब्लम नही है तुम जो चाहे फैसला लो। मैंने ऐसे जताया जैसे उसके जाने से मुझे कोई फर्क नही पड़ता। जबकि मन तो मना कर देने का था पर जब मैंने कभी अपना कोई हक समझा ही नही तो आज कैसे रोकलूँ।
आज मंडे है नताशा आज जा रही है। अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए वो मेरा सारा समान ठीक से जमाकर और मुझे बताकर जा रही है। की कौनसी चीज़ किस जगह रखी है। मैं भी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए उसे स्टेशन छोड़ने जा रहा हूँ कैसी उलझन है रोकना चाहता हूँ पर छोड़ने जा रहा हुँ बहुत कुछ कहना चाहता हूँ पर खामोश हूँ। मैं नताशा को स्टेशन छोड़ आया रुका नही क्योंकि
उसे जाते हुए नही देख पाता। शाम हो गई थी मैं
घर आकर चुपचाप गुमसुम सा सिर झुकाए आँखे बंदकर बैठ गया। कुछ आवाज सी कानो में पड़ी मैंने देखा तो टेबल पर चाय से भरा कप रखा हुआ था। और जब नजर उठाकर सामने देखा तो नताशा खड़ी हुई थी। ना होते हुए भी कुछ तो था हमारे रिश्ते मैं जिसकी वजह से नताशा आज नही जा सकी।

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