कभी न कभी एक दिन ऐसा जरूर आता है जब हमारे अपनो को हमसे और हमे उनसे कोई शिकायत जरूर होती है। जिसे हम कभी ज़ाहिर कर भी देते है और कभी नही भी करते है। मैं जब छोटी थी तब मुझे अपने मम्मी पापा से शिकायत थी की वो मुझे टाइम ही नही देते हर वक्त बस बिज़ी रहते है दोनो ही अपना-अपना अलग बिज़नेस कर रहे थे। और सबसे आगे जाने की होड़ में लगे हुए थे। ना उनके पास एक दूसरे के लिए समय था और ना ही मेरे लिए। उन्हें देखकर में यही सोचती थी के मैं कभी किसी बिज़नेस मेन से शादी नही करूँगी और ना ही मैं खुद कभी कोई भी बिज़नेस करूँगी। पर जैसे - जैसे बड़ी होती गई मुझ पर अपनी फैमली, सोसायटी का प्रभाव पड़ने लगा। मैं भी उनकी तरह बहुत प्रैक्टिकल हो गई। और एक दिन मेरी शादी हो गई प्रनव से। प्रनव भी बिज़नेस करते है जिससे मुझे अब कोई शिकायत नही थी हो भी क्यों क्योंकि मैं खुद भी यही कर रही थी। मैने शादी के पहले ही अपना खुद का बिज़नेस स्टार्ट कर दिया था जिसमे पापा ने मेरी हेल्प की थी। प्रनव को भी इससे कोई प्रोब्लम नही थी। अब हाल ये था की मैं तो हर वक्त बिज़ी थी मुझे लगा की प्रनव भी पापा की तरह होंगे बिल्कुल प्रैक्टिकल इसलिए मैं कभी ये नही सोचती थी की वो मेरा साथ चाहते है या मेरा साथ देना चाहते है।
ऐसा कई बार हो जाता था की मैं कभी-कभी ऑफिस से आने में लेट हो जाती थी तब प्रनव मुझे जागे ही मिलते थे कभी लेपटॉप पर काम करते तो कभी फोन पर किसी से बात करते तब मुझे यही लगता था की वो बिज़नेस से जुड़ा अपना कुछ काम कर रहे होंगे।
मेरे लेट आने पर प्रनव ये जरूर पूछते थे की तुमने डिनर कर लिया और तब मेरा जवाब हाँ होता था। फिर मैं भी यही सवाल उनसे कर लेती थी तब उनका हाँ ऐसा लगता था मानो जैसे हाँ में कुछ और कह गये हो। जो शायद मुझे तब समझ नही आता था।
मैंने देखा है की अक्सर त्यौहारो पर ऐसा हो जाता था के पापा को बिज़नेस मीटिंग के लिए शहर से बाहर जाना पड़ जाता था। पापा कभी भी मीटिंग केंसिल नही करते थे। और मैं ठहरी पापा की बेटी मैं भी काम को ज्यादा इम्पोर्टेंस देती थी। इसलिए चाहे कुछ भी हो मैं कभी कोई मीटिंग कोई काम केंसिल नही करती थी। पर प्रनव अलग निकले वो तो त्यौहारो के समय अपने वर्कर्स को भी तीन दिन पहले से ही छुट्टी दे देते है और खुद भी घर पर रहते है।
दिवाली का दिन था मैं घर पर ही थी पूजा शुरू होने वाली थी अचानक मुझे कुछ काम आ गया और मुझे जाना पड़ा। मैं कुछ ही देर में वापस आ गई थी पर मेरे पहुँचने के पहले ही पूजा हो गई थी। ये प्रनव और मेरी साथ में दिवाली की पहली पूजा थी मुझे लगा प्रनव शायद कुछ कहेंगे पर वो कुछ नही बोले। हमारी जिंदगी इसी तरह आगे बढ़ती रही और शादी को पूरे एक साल होने वाले थे।
मैंने अपने घर में ये देखा था की मम्मी पापा अपनी शादी की सालगिरह पर पार्टी देते थे और अपने सारे रिश्तेदारों और खास कर अपने बिज़नेस से जुड़े लोगों को ,पार्टनर्स को जरूर बुलाते थे। मुझे लगा की मुझे भी यही करना चाहिए प्रनव और मैं भी बिजनेस से जुड़े अपने फ़्रेंड्स को ,जान पहचान वालो को पार्टी में बुलाएंगे जोकि हमारे लिए अच्छा ही होगा। ये फैसला मैने खुद ही ले लिया था मुझे लगा प्रनव को इससे कोई प्रॉब्लम नही होगी मैंने तैयारी भी शुरू कर दी थी पर जब प्रनव को मैंने बताया तब वो इस बात से खुश नजर नही आये। और बिना कुछ बोले अपनी मीटिंग के लिए चले गये। मैं भी अपने ऑफिस आ गई मन नही था मेरा। पर मैं फिर भी आ गई।
आज मेरी निशि से बात हुई उसने बताया की उसके पति और उसका हमेशा झगड़ा होता रहता है उन दोनो को एक दूसरे से हमेशा शिकायतें ही रहती है।
निशि से बात करने के बाद आज मैं खुद के और प्रनव के बारे में सोच रही हूँ। मैं हर वक्त बस प्रैक्टिकल होकर ही जीती रही बिना ये जाने की प्रनव क्या सोचते है अपने काम को लेकर , रिश्तो को लेकर। उन्हें मुझसे कोई शिकायत तो नही मैंने ये कभी नही सोचा। और उन्होंने कोई शिकायत कभी की भी नही।
आज मुझे दादी माँ की बात याद आ रही है वो कहती थी के "अगर कोई शिकायत नही करता तो इसका मतलब ये नही के उसे कोई शिकायत नही " बस वो कहना नही चाहता। मैं जानती थी के कही न कही गलती मुझसे ही हुई है मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया था आज मैं जल्दी घर पहुँच गई ताकि प्रनव से बात कर सकूँ। उनके आते ही मैंने बात करना शुरू कर दिया प्रनव मुझे हैरान नजरो से देख रहे थे डिनर के बाद जब प्रनव बाहर गार्डन के झूले पर बैठे हुए थे तब मैं भी उनके पास जाकर बैठ गई आज हम बहुत देर तक साथ बैठे रहे बिना कुछ कहे चुपचाप।
रात भर मैं यही सोचती रही की प्रनव कितने अलग है उन्हें मेरी फिक्र है मेरे लेट हो जाने पर वो मेरा इंतजार करते, काम न होते हुए भी वो लेपटॉप लेकर बैठ जाते ताकि मेरे आने तक जागे रहे। बस कभी कहते नही की मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था। कभी-कभी वो डिनर के लिये भी मेरा इंतजार करते थे पर हो ऐसा जाता था की उस दिन या तो में बाहर से कुछ खाकर आती थी या फिर लेट हो जाती थी। मैं पूजा में तक उनके साथ नही थी। पर प्रनव ने कभी कोई शिकायत ही नही की। लेकिन आज मुझे खुद, खुद से शिकायत है मैंने प्रनव और अपने रिश्ते को कोई महत्व ही नही दिया। रोना आ रहा था मुझे , ये सोचकर की मैं कितनी नादान थी जो प्रनव को समझ ही ना सकी।
सुबह मैंने प्रनव से बात करने की कोशिश की पर वो मुझसे नजर ही नही मिला रहे थे न कुछ कह रहे थे।
शिकायत तो थी उन्हें मुझसे बस वो कह नही रहे थे। मैंने ही रिश्ता ऐसा बनाया की वो अपना हक समझ मुझसे कुछ भी नही कहते।
फिर मैंने ही थोडी तेज आवाज में शब्दो पर जोर देते हुए कहा- नाराज है मुझसे, अगर कुछ शिकायत है तो कहते क्यों नही आप चुप क्यों रहते हो , मुझे पता है की कुछ शिकायते है आपको मुझसे बस आप कह नही रहे। बस इतना कह मैं चेहरा उदास कर चुपचाप बैठ
गई।
तब जाकर प्रनव बोले - शिकायत है नही , शिकायत थी वो भी तुम्हारी नादानी से तुम से नही।
धीरे -धीरे सब ठीक हो गया। वो शिकायतें जो कभी प्रनव ने की ही नही वो भी खत्म हो गई और जो मुझे खुद से थी वो भी।
अब मैंने हर वक्त प्रैक्टिकल होकर जीना छोड़ दिया है। मैं कोशिश करती हूँ कि ज्यादा से ज्यादा समय प्रनव के साथ रहूँ ताकि अब कोई शिकायत अगर हो तो वो मुझसे कह सके अपने मन में ना रखे।

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