अधूरी ख्वाईशें



हर एक इंसान की ना जाने कितनी ख्वाईशें होती है जिनमे से कुछ पूरी होती है और कुछ अधूरी रह जाती
है। अधूरी ख्वाईशें बनकर।
मेरी भी बचपन से ही बहुत सारी ख्वाईशें रही है
जब में छोटी थी तब मैंने दादी से परियो की कहानी सुनी थी दादी रोज नई-नई कहानियाँ सुनाती और मेरे
मन में भी रोज नई ख्वाईशें पैदा होती कभी परी बनने की तो कभी रानी बनने की। जब में थोड़ी बड़ी हुई
तब मेरी ख्वाइश बदल गई  अब मुझे मन चाही चीजो
को पाने की ख्वाइश होने लगी। जिनमे से मेरी कुछ ख्वाईशें पूरी हुई भी और कुछ नही भी। जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गई मेरी ख्वाईशें भी बदलती गई ।जब मैं स्कूल में थी तब मेरी दोस्त को उसके पापा गाड़ी से लेने आते थे उसे देख मुझे यही लगता था की पापा के पास भी जल्दी गाड़ी आ जाये और वो भी मुझे ऐसे ही लेने आये। पापा ने गाड़ी ली तो पर तब तक मैं बड़ी हो गई और अब वो खुशी नही थी जो शायद तब होती।  ऐसे ही जब गर्मियों की छुट्टियां आती थी ना। तब मेरी दोस्त और उसकी फैमली छुट्टियां मनाने कहीं बाहर जाते थे सब साथ में। कभी शिमला तो भी किसी और जगह। मेरी दोस्त जब वापस आती थी तो मुझे सब बताती थी कि वहाँ क्या है कैसा है उन्होंने कितने मजे किये सब कुछ। तब उसकी बाते सुन मेरा भी मन करता था के हम भी कभी ऐसे घूमने जायेंगे।
पर वो कभी आया ही नही। मेरी ये मन की इक्छा मन में ही रह गई। मेरी बचपन से ही डांस में बड़ी रुचि रही है मैं जब और लोगों को स्टेज पर डांस करते देखती तब मेरे मन में यही ख्वाइश होती के मैं भी कभी इसी तरह अपनी कला को सबके सामने प्रस्तुत करूँगी।और इसी तरह लोग मेरे लिए भी तालिया बजायेंगे। ये मौका मुझे अपने कॉलेज में हो रहे एक प्रोग्राम के समय मिला भी पर उस वक्त ड्रेस का अरेंजमेंट मुझे ही करना था जो मैं नही कर पाई और फिर मैं उस प्रोग्राम मैं हिस्सा ना ले सकी।मुझे बुरा तो बहुत लगा पर मैं कर भी क्या सकती थी। मुझे याद है एक बार जब मैं मम्मी पापा के साथ मार्केट गई थी हम कपड़े की शॉप पर अपने लिए कपड़े पसन्द कर रहे थे मम्मी पापा ने अपने लिए सिम्पल से कपड़े पसन्द किये पर मुझे शॉप पर टँगी एक ड्रेस बहुत भा गई थी जोकि थोड़ी महंगी थी जब कीमत पता चली तो मैंने वो लेने से मना कर दिया पर मम्मी पापा ने मुझे ड्रेस दिलाई। उन्होंने मुझे तो कपड़े दिला दिये थे पर फिर उन्होंने खुद के लिए कपड़े नही लिये। ये देख मुझे मन ही मन दुख हुआ। क्योंकि ये पहली बार नही था ऐसा पहले भी हो चुका है जब मेरी कुछ ख्वाईशो को पूरा करने के लिए उन्होंने अपनी ख्वाईशो को अनदेखा कर दिया। उस दिन रह रहकर यही ख्याल आ रहा था की हम सामान्य वर्ग के लोगों के लिए छोटी-छोटी ख्वाईशें भी पूरी करना कितना मुश्किल होता है। मैंने ठान लिया था की खुद को इतना काबिल बना लूंगी के अपनी और अपने मम्मी पापा की ख्वाईशो को पूरा कर सकूँ।
मैंने ग्रेजवेशन के बाद पोस्ट ग्रेजवेशन की और फिर
पी. एच. डी की बहुत मेहनत के बाद और काफी स्ट्रगल के बाद मैंने काफी कुछ हासिल कर लिया था
मैं इस काबिल हो चुकी थी की अपनी ख्वाईशो को और अपने मम्मी पापा की ख्वाईशो को पूरा कर सकूँ।
पर अब इस सब का कोई मतलब नही है। क्योंकि अब मन नही है और ना वो वक्त। अब मैं भले ही आज अपना मन चाहा कोई भी सामान ले सकती हूँ पर अब मन में वो खुशी नही है जो तब होती। मम्मी पापा खुश है मेरी सफलता से पर अब उनके मन में भी कोई इच्छा नही है।
"कितना अजीब है ना जब ख्वाईशें पूरी नही हो सकती थी तब ढेर सारी ख्वाईशें थी। और अब जब ये पूरी हो सकती है तो अब कोई ख्वाइश ही नही है।"
ये सच है की हर एक इंसान की सभी ख्वाईशें पूरी नही होती कोई ना कोई ऐसी ख्वाइश होती है जो अधूरी रह जाती है पर शायद ये सामान्य वर्ग के लोगों के साथ ज्यादा होता है। जिनकी कुछ ख्वाईशें ही पूरी हो पाती है बाकी सारी अधूरी रह जाती है। ख्वाईशें पूरी ना हो पाने का मतलब ये नही की उदास होकर बैठ जाये। हर रोज ही कोई नई ख्वाइश मन में आती ही है जिन्हें हम पूरा कर ही लेते है बस फर्क ये है कि जो बचपन की ख्वाईशें होती है उनका असली मजा बचपन में ही आता है। ख्वाईशें तो जीवन भर ही रहती है। क्योंकि दिल है छोटा सा छोटी सी आशा , मस्ती भरे मन की भोली से आशा।
 हर नया दिन एक नई उम्मीद है सूरज की चमकती
किरणें खुशियों का जलता दीप है। इसलिए अधूरी ख्वाईशों को याद कर दुखी ना होते हुए हर दिन खुशी से जीना चाहिए और ये बात मैंने जान ली है। आपका क्या ख्याल है।




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