स्कूल में बचपन



बचपन , जीवन का वो हिस्सा है जो सबसे खूबसूरत माना जाता है किसी को कुछ याद हो न हो अपना बचपन सभी को याद होता है जब भी कभी किसी से ये पूछा जाता है कि अगर कुछ ऐसा हो जाये जिससे उसे अपने बीते कल को जीने का फिर से मौका मिल जाये तो वो किस पल को दोबारा जीना चाहेंगे। तब उत्तर यही होता है -बचपन। हम सब अपने बचपन को ही दोबारा जीना चाहते है पता है क्यों क्योंकि बचपन सबसे मासूम होता है बहुत मासूम।
आज नकुल का स्कूल में पहला दिन है मैंने रात को ही अलार्म सेट कर दिया था ताकि मैं सुबह जल्दी उठ जाऊ। उठते ही मैंने सारा काम जल्दी-जल्दी खत्म किया खुद भी तैयार हुई और नकुल का टिफिन तैयार किया और साथ ही उसका बैग भी जमाया पर सबसे मुश्किल नकुल को उठाना है और उसकी आँखो से नींद उड़ाना आखिर बच्चा है। बच्चे स्कूल में भी आधे नींद में रहते है। पर जैसे तैसे मैने नकुल की आँखो से नींद उड़ाई। उसे तैयार किया और हम पहुँचे स्कूल।
नन्हे- नन्हे छोटे- छोटे बच्चे बहुत ही प्यारे इन्हें देख मन इतना खुश हुआ की क्या कहूँ। नकुल भी अपनी उम्र के बच्चो को देख बड़ा खुश हो गया। पहले लग रहा था की पता नही ये स्कूल में रुकेगा भी के नही पर अब लग रहा है कि शायद रुक जायेगा। मैंने यहां की टीचर से बात करली थी की मैं कुछ वक्त यही स्कूल में रुकुंगी। मैं टीचर्स के स्टाफ रूम में बैठ गई और रूम की खिड़की से बाहर देखती रही। छोटे - छोटे बच्चे प्रेयर के लिए लाइन से खड़े हुए अपने दोनो हाथो को जोड़कर प्रेयर कर रहे वो कभी हिलते डुलते तो कभी अपनी लाइन से निकल कर दुसरो की लाइन में जाते ।
और टीचर को देखते ही बिल्कुल मासूम बनकर खड़े हो जाते। प्रेयर खत्म होते ही बच्चे अपनी क्लास में पहुँच गये। और फिर शुरू हुई पढ़ाई A फॉर एप्पल ,B फॉर बॉल शुरू में बच्चे बड़े उत्साह से पढ़ाई करते है। 
लेकिन कुछ ही देर बाद कोई बच्चा रोने लगता है ये कहकर की मम्मी के पास जाना है तो कोई बच्चा कहता है की उसकी तबियत खराब है अब उसे घर जाना है। फिर उनकी मेम बड़े प्यार से उन्हें मनाती है कई तरह की बाते बनाती। जिससे कुछ देर बच्चे बेहल जाते है। पढ़ाई के बाद समय होता है खेलने का।
लंच टाइम। बच्चे टिफिन फिनिश कर खेलने में लग जाते है और खूब उधम मचाते है। स्कूल में बच्चो को लंच टाइम ही सबसे ज्यादा पसन्द होता है। भागते दौड़ते एक दूसरे को पकड़ते। हस्ते मुस्कुराते हर बात से अंजान गम खुशी अच्छा बुरा कुछ भी नही पता।
चिंता फिक्र सबसे दूर अपने में ही मस्त और हर पल खुश। ना पढ़ाई की टेंशन ना करियर की और न ही किसी और चीज की बस हर पल मौज़ मस्ती और खूब खेलना। 
अपनी मीठी आवाज में मेम मेम बोलते 
और मासूम निगाहों से उन्हें देखते तोतली आवाज में मेम से कई तरह के सवाल पूछते कभी किसी बात पर खिलखिलाकर जोर से हँसने लगते तो कभी मुँह बनाकर रोने लगते। इन्हें देख ऐसा लगा जैसे ढेर सारे तारे एक साथ ज़मी पर आ गये। और सब चमचमा रहे हो। वैसे नकुल भी स्कूल आकर खुश था वो रोया नही। बैल बजी और सभी बच्चो के चहरे पर मुस्कान आ गई छुट्टी जो हो गई। सभी हस्ते मुस्कुराते बाहर आये जँहा उनके माता पिता उन्हें लेने के लिए खड़े थे सब दौड़कर अपने पेरेंट्स के पास गये और एक दूसरे को बाय कहकर घर चले गये।इन्हें देख मुझे तो अपना बचपन याद आ गया। सच में मैं भी इन्ही बच्चो की तरह मासूम और बड़ी  प्यारी थी अपने बचपन में। वैसे सभी का बचपन मासुमियत से भरा होता है जिसमे थोड़ी बहुत शैतानी भी शामिल है। है ना ☺️

हर बात से अंजान भोला मासुमियत भरा मन ऐसा होता है बचपन।

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