पुराना घर



लगभग सारा सामान नये घर पहुँचा दिया गया था लेकिन फिर भी आनन्द जी पूरे घर मे कभी यहाँ कभी वहाँ जाने क्या खोज रहे थे पापा चले बेटे मिलिंद ने पीछे से पुकारते हुए कहा। आनन्द जी मिलिन्द की ओर पलटे कुछ देर चुप खड़े रहे फिर बोले बेटा तुम लोग चलो मैं कुछ देर यही रुकूँगा कहते हुए आनन्द जी पास रखी पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर जा बैठे मिलिंद अपने पापा के भावुक होते मन को अच्छी तरह समझ रहा था ठीक है पापा आप रुक जाईये कुछ देर कहकर मिलिंद चला गया। सारा सामान ठीक से पहुँचवाना सब सेटअप करवाना सारी जिम्मेदारी मिलिंद की ही तो थी और फिर अवनी कृष और बृजेश काका इन सबको भी मिलिंद को ही नए घर छोड़कर आना था इसलिए मिलिंद चला गया जबकि मन उसका भी था अपने पापा के साथ कुछ देर रुक जाने का आख़िर उसकी भी तो यादें जुड़ी है इस घर से। 
आनन्द जी ने अपनी ज़िन्दगी के कितने साल इसी घर मे गुज़ारे है घर के हर एक कोने में बीते किसी न किसी पल की याद है कितने तूफ़ान इस घर की छत को छूकर गुजर गए पर उसकी आहट भी किसी के कानों तक न पहुँची,बहुत मज़बूत है इस घर की छत इस घर की दीवारें। आनन्द जी कुर्सी से उठकर खिड़की के पास जा खड़े हुए आँगन में उन्हें मिलिन्द और खुशी का बचपन दिखाई दे रहा है 10 साल का मिलिन्द अपनी छोटी बहन खुशी के साथ मिलकर आँगन में पौधा लगा रहा है खुशी ने कुछ इस तरह पौधा लगाया की पौधे से ज्यादा मिट्टी तो उसके हाथों और कपड़ो में ही लग गई पर जैसे भी हो दोनों बहन- भाई ने ये बड़ा काम कर ही लिया। अपनी माँ की आवाज़ सुनते ही दोनों बहन - भाई दौड़ पड़े यहाँ- वहाँ मिट्टी के हाथ लगाते हॉल से होते हुए दोनों किचन में जा पहुँचे जहाँ से आनन्द को निर्मला की चूड़ियों की खनक सुनाई देती है।आनन्द ऑफ़िस से कितना भी थककर आये हो या परेशान हो पर जब भी रोटी बेलते हुए निर्मला की चूड़ियाँ खनकती तो उसकी आवाज़ आनन्द जी के मन को कहीं न कहीं छोड़ा सुकून पहुँचाती और जब मुस्कुराते हुए निर्मला आनन्द के लिए पानी लाती तो उसके चहरे की सच्ची मुस्कान देख आनन्द की थकान जैसे कम हो जाती आनन्द निर्मला से कुछ कहते या सुनते उसके पहले पिताजी की आवाज़ सुनाई पड़ जाती आनन्द बेटा आ गए क्या हाँ कहते हुए आनन्द पिताजी के पास दौड़ जाते और कई देर तक उनके पास बैठे रहते उनसे बातें करते रहते अपनी उलझनों अपनी परेशानियों को आनन्द अपने पिता से ही तो कहते थे। भले ही अभी घर का भार आनन्द के कन्धों पर है और एक जिम्मेदार और समझदार व्यक्ति की तरह आनन्द सब कुछ सम्हाल रहा है बिल्कुल किसी पेड़ की तरह जिसकी छाया में सब है पर जब ये अपने पिता के पास होते है तो बिल्कुल उस बच्चे की तरह होते है जो अपने पिता का हाथ थामे हुए खुदको सुरक्षित महसूस करता है पिताजी जब भी आनन्द के सिर पर हाथ रखते आनन्द के मन को जैसे राहत मिल जाती ये सोचकर कि पिताजी है मेरे साथ मैं अकेला नही। अपने पिता को याद कर आनन्द जी की आँखे नम हो गई उन्हें वो वक्त याद आ गया जब पिताजी उन्हें छोड़कर चले गए थे दीवार पर टँगी अपने पिता की तस्वीर को देखते आनन्द अकेले खड़े थे तब एक ओर मिलिन्द और एक तरफ खुशी आकर खड़े हो गये दोनों ने अपने पापा का हाथ थाम लिया। आनन्द जी को आज भी वो पल अच्छी तरह याद है। ज़िन्दगी में हर तरह के पल आते है कभी खुशी तो कभी गम कभी आँखें आँसुओ से झलक जाती है तो कभी होंठ खुशी से मुस्कुराते है। इस घर मे बिताएं हर अच्छे बुरे पल को आनन्द जी आज फिर से जी रहे थे। आज जो घर एक दम खाली हो गया है खुशी की शादी के समय कितनी रौनक थी यहाँ सारा घर मेहमानों से भरा हुआ अरे भई हल्दी की तैयारी हो गई ये मिलिन्द कहाँ रह गया आनन्द जी थोड़ी ऊँची आवाज़ में निर्मला से बोले पता है ना घर मे शादी है जो सामान मंगाया था अभी तक नही लाया जी आता ही होगा आनन्द के गुस्से को ठंडा करते हुए निर्मला ने कहा। शादी वाले घर में तो अफरा- तफ़री सी रहती है सबके मन मे उथल- पुथल चल रही थी  ऐसे में बस निर्मला ही है जो अपने मन को सम्हाले शांति से काम कर रही थी वो भी तब तक जब तक खुशी की विदाई का समय नही आ गया और समय आते ही निर्मला जी ने अपना धैर्य खो दिया बेटी को विदा होते देख निर्मला जी के आँसू थम ही नही रहे थे खुद आनन्द जी भी उन्हें सम्हाल पाने में असमर्थ थे। खुशी की विदाई का वो पल जब भी आनन्द जी को याद आता है वो भावुक हो जाते है पर इस बात का सन्तोष है कि बेटी खुशी अपने ससुराल में खुश है। 
सुख - दुख का सिलसिला जीवन भर चलता रहता है वक्त कभी भी एक जैसा नही रहता हम कितना भी चाहे ले पर वक्त अपनी चाल से चलता है। घर के हर कोने को गौर से देखने, दीवारों को छूकर फिर अपने घर के अपनेपन को महसूस करने के बाद आनन्द जी आँगन के नीम की छाया में आ बैठे ये पेड़ निर्मला जी ने ही लगाया था पौधा लगाते हुए वो मिलिन्द से कह रही थी बेटा ये पेड़ जब बड़ा हो जाएगा तब हम सब इसकी छाया में बैठेंगे सच कहा था निर्मला जी ने। इस नीम की ठंडी छाया में बैठकर सबको कितना सुकून मिलता है आनन्द जी तो अख़बार भी यही बैठकर पढ़ते थे और कृष लिए तो झूला भी डाल रखा है इस नीम पर। निर्मला जी आज साथ होती है तो कृष को नीम पर झूला झूलते देख कितनी खुश होती उनके लाडले मिलिन्द के बेटे को देख उनका मन फुला न समाता पर शायद ये क़िस्मत में था ही नही मिलिन्द की शादी के कुछ वक्त बाद ही निर्मला जी ने भी आनन्द जी का साथ छोड़ दिया और उन्हें अकेला कर गयीं।
निर्मला जी भले ही आनन्द जी के साथ नही पर इस घर मे उनके होने का एहसास आनन्द जी को हमेशा होता इसलिए वो खुदको अकेला नही मानते। पिताजी भले ही उनसे दूर चले गये हो पर उन्हें अभी भी ऐसा लगता है जैसे उनका हाथ अभी भी आनन्द जी के सिर पर हो और अपने मन की हर बात को वो उनसे साझा कर रहे हो। 
ये घर बस चार दीवारों का घर नही है ये आनन्द जी का पूरा जीवन है मन बस्ता है उनका यहाँ। अपनों की यादें है , जिंदगी के उतार-चढ़ाव सब यहीं इसी घर मे ही तो रहकर देखे है। अब कैसे वो आसानी से इस घर को छोड़कर जा सकते है इस छोटे से घर मे आनन्द जी का जो है वो उन्हें किसी बड़े घर मे कहाँ मिल पायेगा। बहुत मुश्किल होता है जहाँ कभी अपनी दुनियां बसाई हो जीवन को जीना सीखा हो जहाँ कभी खूब मुस्कुराये तो कभी जी भरकर आँसू बहाये उस घर को उस जगह को छोड़ना उससे अपना नाता तोड़ना। 

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