कई साल बाद आज अपने गाँव जा रहा हूँ गाँव की तो बात ही अलग है शहर के शोरगुल के विपरीत शांत वातावरण , पेड़ो की शुद्ध ठंड़ी हवा जो तन को छुते ही मन को सुकून पहुँचा दे। गाड़ी में बैठे- बैठे मुझे आज वो पल याद आ रहे है जो मैंने अपने गाँव में बिताये है। खिड़की से बाहर देख रहा हूँ तो सब कुछ वैसा ही लग रहा है जैसा पहले था कच्ची- पक्की सड़क, सड़क किनारे खेत, खेतो में काम करते लोग कुछ नही बदला। जैसे ही मेरी गाड़ी गाँव की सीमा पर पहुँची मैंने ड्राईवर से कहा- हाँ भईया ये जो मोड़ दिख रहा है जहाँ बोर्ड लगा है, लिखा है ग्राम सुहानपुर यही मेरा गाँव है गाड़ी इसी रास्ते पर ले चलो। इसी रास्ते पर थोड़े आगे जाकर मेरा स्कूल है पर इससे पहले कुछ और भी है जो रास्ते में पड़ता है एक बाग जिससे मेरी खास याद जुड़ी हुई है।
गाँव में घूमते-घामते आखिर मैं वहाँ आ ही गया जहाँ मुझे आना था मेरा घर , जहाँ कभी मैं और मेरा परिवार रहता था। जो सामान जहाँ जैसा छोड़कर गये थे सब वैसा ही है। मैंने घर में रखी लकड़ी की अल्मारी भी खोलकर देखी कुछ थोड़ा बहुत सामान है इसमे। सामान के बीच मेरे हाथ आई किताब।
ये किताब तब की है जब मैं दसवी कक्षा में था मैंने किताब के पन्नो को पलटना शुरू किया और तब हाथ आया एक फूल एक सूखा फूल। इस फूल से मेरी एक खास याद जुड़ी हुई है।
ये बात तब की है जब मैं स्कूल में पढ़ता था
मेरी ही क्लास में एक लड़की थी रिमझिम। जोकि मुझे अच्छी लगती थी। और रिमझिम को अच्छे लगते थे फूल वो भी फूलबाग के। हमारे स्कूल से कुछ दूर पर फूलो का बाग था उस बाग में बड़े ही खूबसूरत फूल लगते थे। मैं हर रोज फूलो की चोरी करता और रोज
रिमझिम को फूलबाग के खूबसूरत फूल लाकर देता। रिमझिम फूल लेकर बड़ी खुश हो जाती। ये सिलसिला
हर रोज का हो गया था। पर रोज -रोज चोरी करना कोई आसान बात तो है नही। कोई रोज फूल चुरा रहा है इस बात की खबर बृजेश काका जोकि वहाँ के
चौकीदार थे उन्हें हो गई थी। फिर क्या था बाग का पहरा बढ़ गया। और मेरे लिए फूल चुरा पाना थोड़ा मुश्किल हो गया। एक दिन मैं हर रोज की तरह सुबह जल्दी अपने दोस्त के साथ फूल तोड़ने चला गया। मेरा दोस्त मेरी मदद के लिए सड़क किनारे खड़ा हो गया ताकि अगर कोई आये तो वो मुझे बता सके और मैं बाग के अंदर चला गया मैं सिर्फ एक ही फूल तोड़ पाया था की आवाज आई चोर-चोर , चोर- चोर मैने देखा काका डंडा लेकर मेरी ओर ही आ रहे थे तब हालात ये थे की मैं आगे दौड़ रहा था और काका मेरे पीछे। उस दिन तो पूरे बाग के चक्कर ही लगा दिये थे मैंने। और मेरा दोस्त उसने तो ऐसी दोस्ती निभाई की मुझे छोड़कर भाग गया। खैर मैं भी जैसे- तैसे बचकर भाग निकला। और अच्छा ये था की काका ने अपना नजर वाला चश्मा नही पहना हुआ था इसलिए वो मुझे पहचान ना सके। मैं काका से तो बच निकला था पर अपने घर पर फस गया था क्योंकि पिताजी ने जो , मुझे इतनी सुबह बाहर से आते देख लिया था मैंने फूल तो छिपा लिया था पर पिताजी के सवाल से न बच सका। मैं पिताजी से बहुत डरता था उनके सामने तो मेरी आवाज भी नही निकलती थी। जब उन्होंने पूछा की कहाँ से आ रहे हो तब मैंने हिम्मत कर धीमी आवाज में उत्तर देते हुए कहा- पिताजी मैं टहलने गया था आप ही कहते है ना हमे सुबह जल्दी उठकर टहलना चाहिये सुबह उगते हुए सूरज को देखना चाहिए।
मैंने ये कह तो दिया पर डर के मारे मेरा दिल जोर- जोर से धड़के जा रहा था क्योंकि पिताजी से झूठ बोलना आसान नही है वो तो मेरी किस्मत अच्छी थी की पिताजी ने मेरी बात पर भरोसा कर लिया और मैं बाल-बाल बच गया।
आज जब मैं स्कूल पहुँचा तो मैं मन ही मन इस बात से खुश हो रहा था की चाहे कितनी भी परेशानी आई पर मैं रिमझिम के लिए फूल ले ही आया और मैंने उसे दे भी दिया और हर बार की तरह वो फूल लेकर बड़ी खुश भी हुई। उस दिन के बाद भी मैं रिमझिम के लिए फूल लाता रहा।
पर एक दिन ऐसा आया की रिमझिम मेरे लिए फूल लेकर आई थी। उस दिन मैं गाँव छोड़कर शहर जा रहा था पिताजी की सरकारी नौकरी थी उनका तबादला शहर हो गया था और इसलिए हम जा रहे थे। उस दिन रिमझिम ने मुझे फूलबाग का फूल लाकर दिया था जिसे मैंने अपनी किताब के पन्नो के बीच रख लिया था। हमारी ये फूल की कहानी उस दिन खत्म हो गई। आज रिमझिम कहाँ है ये तो मुझे नही पता पर फूल बाग में फूल अभी भी खिले हुए है।

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