दोस्ती - एक अनमोल रिश्ता



दोस्ती , दोस्त ये शब्द सुनते ही याद आ जाती है ना अपने दोस्तो की। ये रिश्ता इतना प्यारा है की बस दोस्ती का जिक्र होते ही मन में एक खुशी की लहर सी दौड़ जाती है। और दोस्तो के साथ बिताये सारे पल याद आ जाते है आँखों में चमक आ जाती है और ज़बान में मिशरी सी घुल जाती है सारी खट्टी- मिट्ठी
यादे ताजा हो जाती है।
मेरी भी बहुत सी यादे ताजा हो गई।ऑफिस में जब
स्कूल - कॉलेज के दिनों की बात छिड़ी। और याद आई दोस्तो की। यूँ तो दोस्त कई थे पर मेरी पक्की दोस्त खुशी ही थी। मेरी प्यारी दोस्त। वैसे आज ऑफिस से मुझे जल्दी निकलना है मार्केट जाना है माँ ने कुछ सामान मंगवाया है जो मुझे ही लाना है। मैं अपना काम खत्म कर मार्केट पहुँची झटपट सामान लिया और फिर मेरी नजर पड़ी किशन स्वीट शॉप पर यहाँ की रसमलाई बड़ी ही फेमस है। मैंने सोचा घर वालो के लिए लेकर चलती हूँ मैं शॉप पर गई और वहाँ के भैया से रसमलाई पैक करने को कह दिया। रसमलाई ले मैं शॉप के भैया को पैसे दे रही थी कि मुझे पीछे से आवाज सुनाई दी। भैया रसमलाई है पैक कर दीजिये।
ये आवाज जानी पहचानी सी लगी जोकि एक लड़की की थी मैंने पीछे मुड़कर देखा। देखा तो एक कंधे पर बैग टंगे हुए और दूसरे कंधे पर चुन्नी डाले हुए अपनी बड़ी- बड़ी आँखों से घूरते हुए कोई और नही खुशी ही थी मैं उसे देख खुश हो गई मन कर रहा था कि उसे गले लगा लूँ पर खुशी शायद आज भी गुस्सा है उसने मेरी ओर एक बार भी ठीक से नही देखा उसके चेहरे पर नाराजगी साफ नजर आ रही थी वो बिल्कुल अजनबी की तरह मेरे सामने से चली गई और मैं खड़ी -खड़ी देखती रह गई। आज तीन साल बाद हमारी मुलाकात हुई। लग ही नही रहा के तीन साल बीत गये। खुशी भले ही मुझसे नाराज है पर मेरे लिए वो आज भी मेरी वही प्यारी नादान सी दोस्त है। कॉलेज में मैं और खुशी साथ- साथ ही रहते थे और खूब मस्ती भी किया करते थे। जिस दिन खुशी का मन क्लास अटेंड करने का नही होता था मैं भी उसके साथ क्लास बंक कर लेती थी फ़्रेंड सर्कल में कोई भी हमारा नाम अकेले नही लेता था सब हमारा नाम साथ में लेते थे खुशी जिया। खुशी को मीठा पसन्द है रसमलाई तो खुशी की फेवरेट है हम जब भी मार्केट जाते थे खुशी किशन स्वीट शॉप पर  रसमलाई जरूर खाती थी और पैसे मुझ से ही दिलवाती थी। लेकिन वो मेरे लिए मेरी मनपसन्द आलू चाट लेना नही भूलती थी। हम दोनो को ही एक दूसरे की पसन्द ना पसन्द अच्छे से पता है। खुशी दिल की बहुत साफ और मन की कोमल है। पर पक्के दोस्त होते हुए भी हमारे स्वभाव में काफी अंतर था खुशी चुलबुली शरारती थी ऐसे तो क्लास में वो खूब बोलती मस्ती करती पर जब किसी टॉपिक पर प्रेसेंटेशन देनी हो या स्टेज परफॉमेंस हो तो खुशी थोड़ा डर जाती थी मैं कोशिश करती थी उसका कॉन्फिडेंस बढ़ाने की। जिसका खुशी पर थोड़ा असर भी होता था मैं खुशी की हर काम में मदद करती थी। कॉलेज फंक्शन के दौरान मैं बैक स्टेज खड़ी रहती थी खुशी के लिए। और प्रोजेक्ट बनाने में भी मैं उसकी मदद करती थी धीरे- धीरे खुशी को हर काम में मेरी मदद की आदत सी पड़ गई थी वो अकेले अपना कोई भी काम करती ही नही थी। उसे लगता था की उससे अकेले कुछ भी अच्छे से हो ही नही पायेगा।  तब मैं समझ गई थी की मुझे क्या करना है मैंने आने बहाने कर खुशी की मदद करना बंद कर दिया था। जिसकी वजह से वो मुझसे नाराज भी रहने लगी। अच्छा ये था कि अब वो अकेले अपना काम करना सीखने लगी थी। साथ ही उसका खुद पर भरोसा जरूर बढ़ने लगा था। इसी बीच हमारी पढ़ाई भी पूरी हो गई। मुझे एक अच्छी जॉब मिल गई और मैं जॉब करने लगी। पर खुशी की कहीं जॉब नही लगी थी वो चाहती थी कि मैं अपने ऑफिस में उसकी जॉब के लिए कुछ कोशिश करुँ। मैं ऐसा कर सकती थी और शायद उसकी जॉब लग भी जाती। पर मैंने ऐसा नही किया। उस दिन खुशी मुझसे बहुत ज्यादा नाराज हो गई थी बहुत गुस्सा भी किया था उसने मुझ पर। उसे इस बात से दुख पहुँचा था कि मैं उसकी मदद कर सकती थी पर उसकी दोस्त होते हुए भी मैंने ऐसा नही किया। हम दोनो की दोस्ती का ये रिश्ता वैसे ही टूट गया था जैसे तेज बारिश होने पर पेड़ की नाजुक डाली टूट कर गिर जाती है। हम दोनो का उस डाली जैसा ही हाल था खुशी बहुत रोई बहुत ही रोई और चली गई और उसके जाने के बाद मेरी आँखों से भी आँसू बहना शुरू हो गये। उस दिन के बाद से खुशी ने मुझसे कभी बात नही की। पर हुआ वही जो मैने सोचा था खुशी को परेशानियों का सामना भले ही करना पड़ा हो पर उससे वो अंदर से मजबूत हो गई थी। वो अकेले चलना सीख गई अब वो पूरी तरह स्वयं पर निर्भर है उसे मेरे या किसी और के साथ की जरूरत नही है। और आत्मविश्वास की भी उसमे कोई कमी नही है। वो एक कंपनी में एक अच्छी पोस्ट पर है। उसकी तरक्की को देख में खुश हूँ।
 आज नीता ने मुझे मिलने बुलाया है  नीता मेरी कॉलेज फ़्रेंड ही है। मैं जब नीता के घर पहुँची तो मैंने देखा की खुशी भी वहाँ है खुशी गुस्से भरी निगाहों से मुझे देखते हुए मेरे पास आई और जोर से मेरे गले लग गई और रोने लगी वो सब कुछ जान चुकी थी। आज मुझे मेरी दोस्त वापस मिल गई। और खुशी जिया की जोड़ी फिर से बन गई। दोस्ती एक अनमोल रिश्ता होता है जिसमे स्वार्थ बिल्कुल नही होता है। बस सच्ची भावना होती है।
 दोस्त सिर्फ वही नही जो मुश्किले आसान बना दे
 दोस्त वो भी है जो मुश्किलो से लड़ना सिखा दे।
 दोस्त वही नही जो हाथ थाम ले, दोस्त वो भी है जो
 हाथ छोड़कर अकेले चलना सिखा दे।





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