गाड़ी स्टेशन पर आ चुकी थी मैं जल्दी-जल्दी चलकर
गाड़ी की ओर जा रहा था। तभी पीछे से मेरे दोस्त
अजय ने आवाज लगाई। नीरव रुकना मुझे छोड़कर
जाने वाला है क्या।
मैने पीछे पलट कर कहा जल्दी आना धीरे-धीरे
चलकर क्यों आ रहा है। यही रहने का इरादा है क्या।
इस तरह जैसे-तैसे मैं और अजय दोनो ट्रेन में बैठ
गये। शुक्र है के सीट मिल गई थी। जनरल डिब्बे में
सीट मिलना आसान नही होता है।
मैं खिड़की के पास वाली सीट पर बैठ गया था। और
अजय मेरे बगल में बैठ गया था। हम दोनो काफी
थके हुए थे। इसलिए बिना बाते किये चुपचाप बैठ
गये। अजय का तो पता नही पर हाँ मुझे मन ही मन
चिंता सी हो रही थी। सरकारी नौकरी के लिए परीक्षा
देकर आ रहे है। पिछले बार भी परीक्षा दी थी। उसमे
तो कुछ भी ना हो सका। इस बार प्रभु पास करा ही
देना। वरना बाऊजी इतना सुनाएंगे । इतना सुनाएंगे।
कि पड़ोसियों के कान के पर्दे भी हिल जाएंगे।
बाऊजी के लिए सरकारी नौकरी का मिल जाना ऐसा
है जैसे भगवान का मिल जाना। रोज पूजा कर
भगवान से यही तो मांगते है कि मेरी सरकारी नौकरी
लग जाये। हे भगवान मेरे बाऊजी की प्रार्थना जरूर
सुन लेना।
मन ही मन भगवान से ये विनती कर मैं पीछे सर
टिकाकर बैठ गया। सामने वाली सीट खाली थी।
जहाँ अभी-अभी एक अंकल व आंटी और उनके साथ
एक छोटा सा बच्चा आकर बैठ गये थे। ये बच्चा देखने
में उनका पोता लग रहा था। और वे उसे कान्हा-कान्हा
कहकर पुकार रहे थे। वह मेरे बिल्कुल सामने बैठा था
उसके हाथ मे एक स्टील का डब्बा था।
ट्रेन स्टेशन से चल चुकी थी। सब अपनी-अपनी सीट
पर आराम से बैठे हुए थे। बस अजय और मेरी ही
हालत थोडी खराब थी। दो दिन से मैं और अजय यहाँ
वहाँ दौड़े जा रहे थे। परीक्षा का सेंटर इंदौर मिला था।
इसलिए यहाँ आना पड़ा। परीक्षा तो हो गई है और
अब वापस घर भी जा रहे है। लेकिन इस दौड़ -भाग में
थोड़ी थकान सी हो गई है। अजय तो आँख बंदकर
टिक्कर आराम से बैठ गया। मेरा भी सिर थोड़ा भारी
सा हो रहा था। सोचा मैं भी थोड़ी देर आँख बंदकर
बैठ जाता हूँ। सो बैठ गया । कुछ ही देर हुई होगी।
आराम से बैठे हुए। कि आवाज सी आने लगी। जैसे
की कुछ बज रहा हो। आँख खोलकर देखा तो सामने
बैठा बच्चा अपनी गोद में रखे स्टील के डब्बे को हाथो
से बजाये जा रहा था। मेरे मना करने पर वह उसे और
जोर से बजाने लगा। कुछ देर तो मैने सहन किया। पर
फिर मैने आंटीजी से केही दिया-
'आंटीजी बच्चे से कहिये की वह इस तरह डब्बा ना
बजाये मुझे इस शोर से दिक्कत हो रही है' आंटीजी
के समझाने पर वह शांत बैठ गया। मैं भी उससे ध्यान
हटा खिड़की से बाहर की ओर देखने लगा।
अगला स्टेशन आ चुका था जहाँ गाड़ी कुछ वक्त के
लिए रुकी थी। हम जिस ओर बैठें थे वहाँ खिड़की से
थोड़ी-थोड़ी सूरज की रोशनी स्टील के डब्बे पर पड़
रही थी जिसकी चमक मेरे आँखो पर लग रही थी।
पर गाड़ी के आगे बढ़ते ही ये समस्या हल हो गई थी।
लेकिन अचानक आंटीजी ने उठकर डब्बा मेरे हाथो
में थमाते हुए कहा की- बेटा कुछ देर इसे रख लो।
कान्हा को नींद आ रही है। मैं उसे सुलादूँ फिर डब्बा
लेलूंगी। "ये लो जिस डब्बे पर चीड़ आ रही थी अब
मैं खुद उसे लेकर बैठा था" थोड़ी देर तो में उसे लेकर
बैठा रहा।लेकिन थकान की वजह से नींद आ रही थी
इसलिए मैं आंटीजी को डब्बा लेने के लिए कहने वाला था
कि उन्होंने खुद वह मेरे हाथो से ले लिया।अब में
सुकुन महसूस कर रहा था। लेकिन सुकुन कहा
मिलना था। आँख बंद कर बैठा ही था कि ना जाने
कहा से बड़ी अच्छी खुशबू सी आने लगी। मेरा मन
यह जानने के लिए आतुर होए जा रहा था की यह
खुशबू किस चीज की है और कहा से आ रही है।
जब मैने सामने बैठे अंकल आंटीजी की तरफ देखा।
तो पता चला के यह खुशबू उसी स्टील के डब्बे से आ
रही थी। दरसल आंटीजी डब्बे का ढक्कन खोल कर
उसमे से कुछ निकाल कर अंकल जी को दे रही थी।
जिसकी खुशबू बड़े जोर से आ रही थी। उसी बीच
आंटीजी ने हमारे ओर भी देखा और उन्होंने हमसे
पूछा- बेटा मूंगदाल का हलवा खाआगे।
"मूंगदाल का हलवा" वाह सुनते ही मुझे तो भूख ही
लगने लगी थी। पर में कुछ बोल पता उसके पहले
अजय ही बोल पड़ा "नही-नही " आंटीजी आप ही
लीजिये। अजय के पहले ही मना कर देने पर मैं कुछ
ना कह सका।और चुपचाप बैठा रहा। पर मेरा मन तो
बार -बार उस स्टील के डब्बे की ओर ही जा रहा था।
उससे हलवे की इतनी अच्छी खुशबू जो आ रही थी।
इस वक्त तो मुझे वह डब्बा भी बड़ा खूबसूरत नजर
आ रहा था। कितना अच्छा डब्बा है कितने काम आता
है। हलवे के साथ तो बडा ही अच्छा दिख रहा है।
ऐसे सब विचार मेरे मन में आ रहे थे। और साथ ही
अजय पर गुस्सा आ रहा था आखिर उसने क्यों मना
कर दिया उसका मन नही था पर मेरा
मन तो था हलवा खाने का।
इधर आंटी व अंकल जी को हलवा खाते देख मेरी लालसा
और बढ़ी जा रही थी पर क्या करता। इसलिए मन को
मनाये में खिड़की से बाहर की ओर देखने लगा। हलवे
की खुशबू अभी भी आ रही थी। पर में लगातार बाहर
की ओर देखे जा रहा था तभी एक स्पर्श सा महसूस
हुआ।मैंने देखा तो आंटीजी थी। आंटीजी को शायद मेरे
मन की स्थिति का आभास हो गया था।इसीलिए तो
उन्होंने बिना कुछ कहे हलवे का डब्बा मेरी ओर बढ़ा
दिया था।पहले तो मैने आंटीजी की तरफ देखा और
फिर चेहरे पर गंभीर से भाव बना मैंने चुपचाप हलवा
ले लिया। पर मन में तो बड़ी खुशी हो रही थी ठीक
वैसी ही जैसी बचपन में कोई चीज बोहोत मांगने पर
आखिर में बाऊजी दिलाही देते थे सच में आज वैसा ही
महसूस हो रहा था।
अजय ने आवाज लगाई। नीरव रुकना मुझे छोड़कर
जाने वाला है क्या।
मैने पीछे पलट कर कहा जल्दी आना धीरे-धीरे
चलकर क्यों आ रहा है। यही रहने का इरादा है क्या।
इस तरह जैसे-तैसे मैं और अजय दोनो ट्रेन में बैठ
गये। शुक्र है के सीट मिल गई थी। जनरल डिब्बे में
सीट मिलना आसान नही होता है।
मैं खिड़की के पास वाली सीट पर बैठ गया था। और
अजय मेरे बगल में बैठ गया था। हम दोनो काफी
थके हुए थे। इसलिए बिना बाते किये चुपचाप बैठ
गये। अजय का तो पता नही पर हाँ मुझे मन ही मन
चिंता सी हो रही थी। सरकारी नौकरी के लिए परीक्षा
देकर आ रहे है। पिछले बार भी परीक्षा दी थी। उसमे
तो कुछ भी ना हो सका। इस बार प्रभु पास करा ही
देना। वरना बाऊजी इतना सुनाएंगे । इतना सुनाएंगे।
कि पड़ोसियों के कान के पर्दे भी हिल जाएंगे।
बाऊजी के लिए सरकारी नौकरी का मिल जाना ऐसा
है जैसे भगवान का मिल जाना। रोज पूजा कर
भगवान से यही तो मांगते है कि मेरी सरकारी नौकरी
लग जाये। हे भगवान मेरे बाऊजी की प्रार्थना जरूर
सुन लेना।
मन ही मन भगवान से ये विनती कर मैं पीछे सर
टिकाकर बैठ गया। सामने वाली सीट खाली थी।
जहाँ अभी-अभी एक अंकल व आंटी और उनके साथ
एक छोटा सा बच्चा आकर बैठ गये थे। ये बच्चा देखने
में उनका पोता लग रहा था। और वे उसे कान्हा-कान्हा
कहकर पुकार रहे थे। वह मेरे बिल्कुल सामने बैठा था
उसके हाथ मे एक स्टील का डब्बा था।
ट्रेन स्टेशन से चल चुकी थी। सब अपनी-अपनी सीट
पर आराम से बैठे हुए थे। बस अजय और मेरी ही
हालत थोडी खराब थी। दो दिन से मैं और अजय यहाँ
वहाँ दौड़े जा रहे थे। परीक्षा का सेंटर इंदौर मिला था।
इसलिए यहाँ आना पड़ा। परीक्षा तो हो गई है और
अब वापस घर भी जा रहे है। लेकिन इस दौड़ -भाग में
थोड़ी थकान सी हो गई है। अजय तो आँख बंदकर
टिक्कर आराम से बैठ गया। मेरा भी सिर थोड़ा भारी
सा हो रहा था। सोचा मैं भी थोड़ी देर आँख बंदकर
बैठ जाता हूँ। सो बैठ गया । कुछ ही देर हुई होगी।
आराम से बैठे हुए। कि आवाज सी आने लगी। जैसे
की कुछ बज रहा हो। आँख खोलकर देखा तो सामने
बैठा बच्चा अपनी गोद में रखे स्टील के डब्बे को हाथो
से बजाये जा रहा था। मेरे मना करने पर वह उसे और
जोर से बजाने लगा। कुछ देर तो मैने सहन किया। पर
फिर मैने आंटीजी से केही दिया-
'आंटीजी बच्चे से कहिये की वह इस तरह डब्बा ना
बजाये मुझे इस शोर से दिक्कत हो रही है' आंटीजी
के समझाने पर वह शांत बैठ गया। मैं भी उससे ध्यान
हटा खिड़की से बाहर की ओर देखने लगा।
अगला स्टेशन आ चुका था जहाँ गाड़ी कुछ वक्त के
लिए रुकी थी। हम जिस ओर बैठें थे वहाँ खिड़की से
थोड़ी-थोड़ी सूरज की रोशनी स्टील के डब्बे पर पड़
रही थी जिसकी चमक मेरे आँखो पर लग रही थी।
पर गाड़ी के आगे बढ़ते ही ये समस्या हल हो गई थी।
लेकिन अचानक आंटीजी ने उठकर डब्बा मेरे हाथो
में थमाते हुए कहा की- बेटा कुछ देर इसे रख लो।
कान्हा को नींद आ रही है। मैं उसे सुलादूँ फिर डब्बा
लेलूंगी। "ये लो जिस डब्बे पर चीड़ आ रही थी अब
मैं खुद उसे लेकर बैठा था" थोड़ी देर तो में उसे लेकर
बैठा रहा।लेकिन थकान की वजह से नींद आ रही थी
इसलिए मैं आंटीजी को डब्बा लेने के लिए कहने वाला था
कि उन्होंने खुद वह मेरे हाथो से ले लिया।अब में
सुकुन महसूस कर रहा था। लेकिन सुकुन कहा
मिलना था। आँख बंद कर बैठा ही था कि ना जाने
कहा से बड़ी अच्छी खुशबू सी आने लगी। मेरा मन
यह जानने के लिए आतुर होए जा रहा था की यह
खुशबू किस चीज की है और कहा से आ रही है।
जब मैने सामने बैठे अंकल आंटीजी की तरफ देखा।
तो पता चला के यह खुशबू उसी स्टील के डब्बे से आ
रही थी। दरसल आंटीजी डब्बे का ढक्कन खोल कर
उसमे से कुछ निकाल कर अंकल जी को दे रही थी।
जिसकी खुशबू बड़े जोर से आ रही थी। उसी बीच
आंटीजी ने हमारे ओर भी देखा और उन्होंने हमसे
पूछा- बेटा मूंगदाल का हलवा खाआगे।
"मूंगदाल का हलवा" वाह सुनते ही मुझे तो भूख ही
लगने लगी थी। पर में कुछ बोल पता उसके पहले
अजय ही बोल पड़ा "नही-नही " आंटीजी आप ही
लीजिये। अजय के पहले ही मना कर देने पर मैं कुछ
ना कह सका।और चुपचाप बैठा रहा। पर मेरा मन तो
बार -बार उस स्टील के डब्बे की ओर ही जा रहा था।
उससे हलवे की इतनी अच्छी खुशबू जो आ रही थी।
इस वक्त तो मुझे वह डब्बा भी बड़ा खूबसूरत नजर
आ रहा था। कितना अच्छा डब्बा है कितने काम आता
है। हलवे के साथ तो बडा ही अच्छा दिख रहा है।
ऐसे सब विचार मेरे मन में आ रहे थे। और साथ ही
अजय पर गुस्सा आ रहा था आखिर उसने क्यों मना
कर दिया उसका मन नही था पर मेरा
मन तो था हलवा खाने का।
इधर आंटी व अंकल जी को हलवा खाते देख मेरी लालसा
और बढ़ी जा रही थी पर क्या करता। इसलिए मन को
मनाये में खिड़की से बाहर की ओर देखने लगा। हलवे
की खुशबू अभी भी आ रही थी। पर में लगातार बाहर
की ओर देखे जा रहा था तभी एक स्पर्श सा महसूस
हुआ।मैंने देखा तो आंटीजी थी। आंटीजी को शायद मेरे
मन की स्थिति का आभास हो गया था।इसीलिए तो
उन्होंने बिना कुछ कहे हलवे का डब्बा मेरी ओर बढ़ा
दिया था।पहले तो मैने आंटीजी की तरफ देखा और
फिर चेहरे पर गंभीर से भाव बना मैंने चुपचाप हलवा
ले लिया। पर मन में तो बड़ी खुशी हो रही थी ठीक
वैसी ही जैसी बचपन में कोई चीज बोहोत मांगने पर
आखिर में बाऊजी दिलाही देते थे सच में आज वैसा ही
महसूस हो रहा था।
