मनमर्जियां



हो रही कैसी ये अर्ज़ियां दिल चाहता है ये मेरा मनमर्जियां
आज की सुबह बड़ी ही अलग लग रही है ऐसा लग रहा है जैसे कई दिनों बाद आज सुबह हुई हो इस सुबह का एहसास ही बड़ा नया सा और खुशी भरा है। मन झूमकर नाचने को कर रहा है पर क्योंकि समय पर बस स्टॉप पहुँचना है तो अभी के लिए नाचना केंसिल। मैं तो बस स्टॉप पहुँच गई पर ये दोनों न जाने कहाँ रह गई। ट्रिप पर जाने वाले सारे स्टूडेंट्स आ गए है और इन दोनों का कुछ पता ही नही है। ये लो आ गई रिया और दिया। हम तीनों ही बेस्ट फ्रेंड्स है हमेशा साथ मे रहते है ऐसी कोई भी बात नही होगी जो हमारे बीच छुपी हो हम हर बात एक दूसरे से शेयर करते है।
अरे बस आ गई चलो दिया ने जोर से कहा। हम तीनों बस में चढ़ गए। ऐसा होता है ना के जब हम बस से या ट्रेन से सफर कर रहे होते है तो हमें विंडो वाली सीट ही चाहिए होती है इसलिए मैं झट से आगे बडी और विंडो वाली सीट पर जा बैठी। दिया मेरे बगल में बैठ गई और रिया हमारे आगे वाली सीट पर और हमारा सफर शुरू हो गया। वैसे इस ट्रिप पर आना मेरे लिए आसान नही था हर बार की तरह इस बार भी मम्मा ने साफ इनकार कर दिया था सभी पैरेंट्स की तरह मम्मा को भी मेरी बहुत फिक्र रहती है इसलिए वो आसानी से किसी भी बात के लिए परमिशन नही देती है। पर मेरा तो बहुत मन था इस ट्रिप पर आने का इसलिए मैंने तो कोशिश की ही साथ मे रिया,दिया ने भी अच्छी- अच्छी , मीठी- मीठी
बातें की मम्मा को मनाने की और फाइनली मम्मा मान गई।
जब कॉलेज स्टूडेंट्स साथ मे किसी सफर पर जा रहे हो तो
क्या वो सफर बोरिंग हो सकता है। बिल्कुल नही।
लास्ट सीट पर बैठे हुए गौरव और अवनीत ने अपनी गिटार बजाना शुरू कर दी है बाकी सब अपने अलग - अलग सुर के साथ एक ही गाने को साथ मे गा रहे है पर कुछ ऐसे भी है जो गा तो नही रहे पर इस आगे पीछे लगते सुर वाले गाने में कहीं
खो से जा रहे है। ये एक- दो जोड़िया है हमारे क्लास की जो एक दूसरे को देखे जा रहे है और धीमे- धीमे मुस्काये जा रहे है। और हमारी दिया वो उन्हें छेड़े जा रही है उसे बड़ा ही मज़ा आता है हमारे कपल्स को परेशान करने में। क्या करें ये थोड़ी शैतान ज्यादा है। ये कॉलेज लाइफ बड़ी ही दिलचस्प होती है
शायद इसलिए कि इस वक्त हमारी उम्र भी जरा कच्ची होती है। इस वक्त हम थोड़े समझदार थोड़े नादान से होते है। सब कुछ नया- नया और मन को बड़ा अच्छा लगता है क्योंकि हम स्कूल से कॉलेज में आ जाते है जहां हमे अपने मन का करने की थोड़ी आजादी सी मिल जाती है। हमारे मन में ख्वाइशें जगह लेने लगती है दिल दिमाग मे बहुत कुछ चलता रहता है करिअर को लेकर लाइफ को लेकर। ख्वाइशों को पंख लगने लगते है जिस पर बैठ कर दिल उड़ान भरने लगता है। कुछ हासिल करने के लिए। ये मनमर्ज़ियों का दौर होता है जहां हम सुन भले ही सबकी ले पर करना अपने मन का चाहते है
जो चाहे वो सपने बुनते है उनके पूरे होने उम्मीदे करते है
दोस्ती और यारियों का एक अलग ही रस घुलता है जिसमे शैतानियां शरारते मौज- मस्ती और खुराफातों का मिश्रण होता है जिसका स्वाद खट्टा- मीठा होता है।
कुछ नए एहसास कुछ अलग से जज्बातों का सामना होता है। दुनिया नई- नई और प्यारी सी लगती है। हमारा दिल खुशियों के पीछे दौड़ने लगता है जो मन चाहता है हम वही करने लगते है सूरज की रोशनी से चमकती सुबह ढलती शाम फूलो की खुशबू अच्छी लगने लगती है किताबों से भी दोस्ती हो जाती है वो भी सच्ची लगने लगती है।
जब सबका साथ हो तो चाहे सफर कितना भी लम्बा हो वो छोटा हो जाता है हम आ पहुँचे है एक बड़ी ही खूबसूरत जगह। ऊँचें - ऊँचे पहाड़ खूबसूरत नज़ारे और हाँ ये हसि वादियाँ सब कुछ मन को बड़ा ही खुश किये जा रहा है यहां- वहां घूमघूम कर हम तीनों ने एक दूसरे की और इस खूबसूरत नेचर की कई सारी फोटोज ली है। यहां ऊँचाई पर खड़े होकर हमने एक दूसरे का नाम भी जोर से चिल्लाया सच मे आवाज लौटकर आई। दिया , रिया , अनन्या ।
यहां आकर मैंने अपनी फ्रेंड्स के साथ खूब इंजॉय किया।
अब लग रहा है अच्छा हुआ कि थोड़ी ज़िद करके मैं इस ट्रिप पर आ गई वैसे अपने मन का करना वाकई मैं बड़ा अच्छा लगता है ये हमे खुशी देता है आज सुबह से लेकर शाम तक मैंने सिर्फ अपने मन की सुनी अपने मन का किया बड़ा ही सुकून महसूस हो रहा है इसलिए अगर थोड़ी मनमर्जियाँ कर ली जाए तो कोई बुराई नही है। हम सबकी सुनते है सबका कहा करते है पर कभी मन की भी सुन लेनी चाहिए मन का  कहा कर लेना चाहिए। ये जो दिल है बस थोड़ी आजादी चाहता है खुलकर अपनी ख्वाइशें के लिए जीना चाहता कुछ तमन्नाएँ करना चाहता है कुछ नए रंग भरना चाहता ये मनमर्जियाँ करना चाहता है।
शाम ढल गई और सब वापस बस में आ बैठे गौरव और अवनीत ने फिर से अपनी गिटार थाम ली सब मिलकर एक सुर में गाना गुनगुना रहे थे बड़ा अच्छा लग रहा था ढलती शाम गिटार की धुन और छिड़ता तराना।

 हो रही कैसी ये अर्ज़ियाँ दिल चाहता है
 ये मेरा मनमर्जियाँ ।
 ख्वाइशें बन गई के जैसे तितलियाँ
 धड़के है दिल के जैसे बिजलियाँ
 करने लगे है हम बेवकूफियाँ
 होने लगी आजकल गलतियाँ
 नई सी लगने लगी है ये दुनियाँ
शुरू जब से हुई है ये मनमर्जियाँ
मनमर्जियाँ हाँ मनमर्जियाँ।

पहली मुलाकात



आईने के सामने खड़ा होकर मैं अपने बाल सवार रहा था बेटा चलें और कितना टाइम लगेगा मम्मी ने आवाज देकर कहा।
हां बस आ रहा हूं ऐसा कहकर मैं अपने रूम से बाहर आ गया
हम सब गाड़ी में बैठे और गाड़ी चल पड़ी। मैं जा तो रहा हूं पर मन में बड़ी हलचल सी हो रही है और शायद थोड़ा नर्वस भी
हो रहा हूं जैसे कि कोई इंटरव्यू के लिए जा रहा हूं। अभी मेरे दिमाग में चाहे जो भी चल रहा हो पर मम्मी तो बड़ी खुश नजर आ रही हैं। वैसे भी मां को रिश्तेदारों समाज के लोगो से
मिलना - जुलना बड़ा पसंद हैं। उन्हें सबसे मिलकर बड़ी खुशी होती है। मम्मी को जितना सबसे मिलना पसंद है मुझे उतना ही अच्छा नहीं लगता मैं बहुत कम ही रिलेटिव्स के फंक्शन
अटेंड करता हूं। मैं तो बस अपने दोस्तो के साथ ही खुश रहता हूं। वैसे मैं ही नहीं मेरी उम्र के सभी लोग रिलेटिव्स से कम अपने दोस्तो से मिलना ज्यादा पसंद करते है।
अभी घड़ी में दस बज रहे है कुछ देर में हम वहां पहुंच जाएंगे।
गाड़ी अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ती रही और फाइनली हम पहुंच गए। हम लोग गाड़ी से बाहर आए और फिर मेहमानों का स्वागत जैसे होता है बस वैसे ही बड़े ही खुशी के साथ हमारा स्वागत हुआ। हमें हॉल में बैठाया गया। अंकल जी और आंटी भी हमारे साथ हॉल में बैठे हुए थे। अभी नजारा कुछ ऐसा था कि सब बेवजह बार - बार मुस्कुरा रहे थे और आपस में धीरे - धीरे बात किए जा रहे थे और हां लोगो के बीच इशारे भी चल रहे थे। दस मिनट तक यही सब चलता रहा। और फिर अंकल जी ने आवाज लगाते हुए कहा अरे भाई चाय ले आओ। सबकी नजरें सामने थी।
दो लड़कियां एक साथ हॉल में आई एक ने साड़ी पहन रखी थी और दूसरी ने पटियाला सलवार सूट। सूटवाली लडकी के हाथ में ही चाय की ट्रे थी और जो साथ में साड़ी वाली लड़की थी वो उसकी बड़ी बहन थी। सबको चाय देकर वो दोनों भी सामने सोफे पर बैठ गई। मम्मी ने पूर्णिमा से कुछ दो एक सवाल पूछे और बात हुई कि लड़का लड़की को आपस में बात करने देते है उन्हें जो भी एक दूसरे से पूछना है पूछ लेगें।
फिर मैं और पूर्णिमा हॉल की विंडो के पास आकर खड़े हो गए
हम दोनों ही खामोश खड़े हुए विंडो से बाहर देख रहे थे।
बड़ा अजीब लगता है ना कि अचानक ये कहा जाए कि आपको एक अजनबी जिसे आपने कभी देखा ही नहीं उससे बात करने को थोड़ा समय दे दिया जाए और लाईफ का एक बड़ा फैसला लेने को कहा जाए। हम साथ तो खड़े थे पर बात नहीं कर रहे थे क्या बात करें कैसे शुरुआत करें समझ नहीं आ रहा था। वैसे आम तौर पर ये होता है कि लड़का लड़की को एक दूसरे के बारे में बहुत कुछ जानना होता है पूर्णिमा का तो पता नहीं पर मुझे ज्यादा कुछ नहीं जानना इसलिए भी मैं खामोश खड़ा था। तो बस
 न पूर्णिमा कुछ कह रही थी और न ही मैं। कुछ देर तक चुप रहने के बाद पूर्णिमा ने ही बात करना शुरू किया। आप कुछ पूछना चाहते है तो पूछ सकते है पूर्णिमा ने कहा तो मैनें भी उत्तर देते हुए कहा नहीं, अगर तुम्हे कुछ पूछना है तो पूछ सकती हो मुझे तो कुछ नहीं जानना। पूर्णिमा मेरे इस तरह के जवाब को सुनकर थोड़ा कनफ्यूज हो गई थी शायद उसके मन में दो तरह के विचार चल रहे होंगे कि अगर मैं कुछ जानना नहीं चाहता तो हो सकता है मैं शादी के लिए तैयार न हूं , हो सकता है मेरी लाईफ में कोई और हो। या फिर ये की मैं सवाल जवाब करना जरूरी समझता ही नहीं। पूर्णिमा के चहरे को देख साफ समझ आ रहा था कि मुझे लेकर उसके मन में सवाल चल रहे है लेकिन कुछ पल रुककर फिर
पूर्णिमा ने मुझसे सिर्फ मेरे ड्रीम के बारे में पूछा मैं अपनी लाईफ में अपने भविष्य में क्या चाहता हूं क्या करना चाहता हूं। वो बस इतना जानना चाहती थी। वैसे कुछ देर पहले पूर्णिमा के पिता ने भी मुझसे यही सवाल किया था कि मेरी
फ्यूचर प्लानिंग क्या हैं। मैने उन्हे तो अपना जवाब बड़ा सोच समझकर दिया था लेकिन ऐसा होता है न कि जब हम किसी अनजान से मिलते है तो पहले थोड़ा सा शर्माए से रहते है लेकिन थोड़ी बात करने पर हमारी झिझक जरा कम हो जाती है। मैं पूर्णिमा को थोड़ा तो समझ ही गया था और अपने दोस्तो को तंग करने में मैं बड़ा ही महिर हूं। इसलिए सोचा
थोड़ा सा परेशान पूर्णिमा को भी कर लेता हूं।
तो अब बारी थी जवाब देने की, मैनें पूर्णिमा से कहा ड्रीम्स तो मेरे कई सारे है जोकि सभी पूरे नहीं हो सकते इसलिए मैनें अपने भविष्य के लिए कुछ नहीं सोचा है। पूर्णिमा ने हैरानी वाली निगाहों से मेरी ओर देखा। मैने कहा तुम कुछ और पूछना चाहती हो तो बेझिझक पूछ सकती हो। पूर्णिमा ने कहा सभी अपने फ्यूचर के लिए कुछ न कुछ सोचकर रखते है और उसे सिक्योर करके चलना चाहते हैं क्या
वाकई में आपने फ्यूचर को लेकर कुछ नहीं सोचा हैं मैनें कहा जी नहीं। पूर्णिमा थोड़ी सी उलझन में पड़ गई थी। इसके बाद हम दोनों के बीच रिश्तों , आदतों और समझ को लेकर थोड़ी और बातें हुई जिसमें हम दोनों की सोच एक दूसरे के विपरित थी जहां तक मुझे समझ आया पूर्णिमा गम्भीर और भविष्य के लिए फिक्रमंद है और मैने जिस तरह से उसे अपने जवाब दिए है उससे में बेपरवाह नजर आता हूं। इसलिए
पूर्णिमा के चहरे पर आते भाव को देख में समझ गया था कि उसके मन में क्या चल रहा होगा और हमारी मुलाकात भी अब खत्म होने वाली थी इसलिए उसकी उलझन को कम करने के लिए मैने उससे कहा कभी ऐसा होता है कि किसी के बारे में सब कुछ जानकर भी हम उसे नहीं जान पाते और कभी सिर्फ एक छोटी सी बात से सब कुछ जान लेते हैं इसलिए मैनें कुछ पूछना जरूरी नहीं समझा। और लाईफ प्लानिंग करके नहीं जियी जा सकती। पूर्णिमा से इतना कहकर में वापस सबके बीच आकर बैठ गया और कुछ देर बाद हम पूर्णिमा के घर से निकल गए और अपने घर आ पहुंचे। बस ऐसी थी ये पहली मुलाकात।










थोड़ी सी धूप




सप्ताह खत्म होने वाला होता है और सन्डे आने वाला होता है लोग पहले ही इस दिन के लिए कई तरह की प्लानिंग
कर लेते है कि सन्डे को क्या - क्या काम करने है कहाँ जाना है। मेरी भी प्लांनिग हो गई थी जोकि सबसे जरा अलग थी। रोज सुबह जल्दी ऑफिस के लिए निकल जाना और शाम को घर आना मेरा रोज का यही रूटीन है। ऑफिस जाते वक्त जब रास्ते में कुछ लोग मोर्निंग वॉक करते, पार्क में बैठे धूप लेते नजर आते है तो उन्हें देखकर मेरा मन भी धीरे से बुदबुदाते हुए कहता है इस दिसम्बर की ठंड में थोड़ी सी धूप हमें भी मिल जाती। पर क्या करें ऑफिस भी समय पर पहुंचना है नहीं तो मैं यहीं कुछ देर रुककर सुबह की इस धूप का आनंद लेता बस यही सोचकर हर रोज ऑफिस चला जाता हूं। ठंड के मौसम में हर एक व्यक्ति कुछ देर धूप में जरूर बैठना चाहता है क्योंकि इस वक़्त हमें धूप बड़ी सुखदाई सी लगती है जो ठंड से हमें कुछ देर राहत देती है।
वैसे अभी मेरी संडे यानी कल की प्लनिंग हो गई है तो बस मैं कल का ही इंतजार कर रहा हूं।
मैं सवेरे सात बजे जल्दी उठ गया नहीं तो मैं कभी भी संडे को दस बजे से पहले नहीं उठता हूं अपनी पसंदीदा ब्लैक जैकेट पहन कानों में इयर फोन लगा गाना चलाकर मोबाइल को पॉकेट में डाल मैं निकल गया मॉर्निंग वॉक पर। पहले तो मैं बड़े ही खुश होकर वॉक करता रहा लेकिन थोड़ी ही देर मैं मेरी सांस फूलने लगी और मैं रुक गया मेरे पीछे एक अंकल भी थे जो ये कहते हुए आगे निकल गए कि आजकल के जवानों की
हडि्डयां कुछ ज्यादा ही कमज़ोर हैं। वैसे ये एक ताने जैसा ही था पर मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया मैं आगे बढ़ा और पार्क मैं वो जो लोहे की लंबी वाली चेयर होती है उस पर जाकर बैठ गया। ठंड के मौसम में सुबह की गुनगुनी धूप बड़ी ही अच्छी लग रही थी। मुझ पर पड़ रही सूरज की हर एक किरण मुझे
बड़ा सुकून सा दे रही थी ठीक वैसे ही जैसे गरमियों में हम धूप से परेशान होकर एक घने से पेड़ के नीचे बैठ जाते है और उस पेड़ की छाया में आकर हमारे मन को राहत सी मिलती है।
ऐसे ही अभी मेरे मन को सुबह की इस प्यारी सी धूप से राहत मिल रही है।
मैं बड़ी ही शांति के साथ दस मिनट तक बैठा रहा फिर मुझे ज़ोर- जोर से हसने की आवाज सुनाई दी मैंने अपनी नजरों को घुमाते हुए थोड़ा तिरछा होकर पीछे देखा तो सामने सीनियर सिटीजन का ग्रुप था जोकि एक साथ जोर - जोर से हसे जा रहे थे उनके बीच मज़ाक और एक - दूसरे की टांग खिचाई का माहौल बना हुआ था जिसका मज़ा में भी यही से
बैठे - बैठे ले रहा था और साथ ही ये सोच रहा था कि कब आखरी बार मैं अपने दोस्तों के साथ ऐसे ही सच में खूब हसा था क्योंकि जब से मैं यहां आकर जॉब कर रहा हूं तब से झूठी
हसी ही हस रहा हूं। वक़्त के साथ लाईफ भी बदल जाती है जैसे की ये धूप जो गरमियों में अपने अलग ही तेवर दिखाती है और सर्दियों में बदल जाती है। मैं अभी भी आराम से धूप में बैठा हुआ था लेकिन दो आंटियां मेरे पास आकर खड़ी हो गईं।
उन्होंने कुछ कहा नहीं पर मैं अपनी जगह से उठ गया क्योंकि
भले ही उन्होंने कहा नहीं पर वो चाहती यही थी के मैं चेयर से हट जाऊं। सच कहूं अभी मेरा मन तो नहीं था वहां से उठ जाने का पर मैं करता भी क्या।
मैं अपने फ्लैट पर वापस आ गया। गरमा - गरम अदरक वाली चाय बनाकर एक घुट ही पी के ख्याल आया कि आज छत पर चलते है अपने हाथ में चाय का बड़ा सा कप लिए मैं छत पर पहुंचा और बाउंड्री वॉल के पास जाकर खड़ा हो गया। यहां भी धूप अच्छी ही आ रही थी और सूरज मुझे थोड़ा पास लग रहा था। मैं चाय का एक - एक घुट लिए जा रहा था और
दूर - दूर तक अपनी नजरें दौड़ाए जा रहा था वैसे कुछ खास नहीं सिर्फ बिल्डिंग्स ही नजर आ रही थी मुझे। लेकिन मैं फिर
भी अपनी नजरों को दूरबीन बना ऐसे देख रहा था जैसे कि मुझे कुछ पता लगाना हो।
कोई दिखाई दिया किसी ने कहा और मैं तेजी से पीछे की ओर मुड़ गया ये सेकेंड फ्लोर वाले चाचाजी थे।
जी चाचाजी मैने कहा। हमें सब पता है लड़के छत पर आते ही क्यों है चाचाजी ने कहा मैने फौरन अपनी सफाई देते हुए कहा जी नहीं चाचाजी मै तो बस यहां थोड़ी धूप लेने आया था। अरे धूप तो एक बहाना है हम भी कभी तुम्हारी उम्र के थे सब जानते है चाचाजी ने मजाकिया अंदाज में कहा। मैने कुछ नहीं कहा बस चुपचाप खड़ा रहा। चाचाजी आये तो तुलसी के पौधे को पानी देने पर मुझे समझाकर चले गए के वो भी कभी हमारी उम्र के थे। वैसे मेरे कप कि चाय भी खत्म हो गई थी और धूप में भी मैं काफी देर रह लिया था इसलिए अब सोचा कि वापस घर में चलते है मैंने इतना सोचा की छत के दरवाजे से फर्स्ट फ्लोर वाली आंटी आते नजर आयी। जब हम ये सोचते है कि किसी से हमारा सामना कम ही हो तो अक्सर ऐसा होता है कि हम उनसे जरूर टकरा जाते है। ऐसा ही कुछ अभी है फर्स्ट फ्लोर वाली आंटी मुझे देखकर चिड जाती है मुझे क्या मुझ जैसे जितने भी लड़के है जो बाहर से आए है अकेले रह रहे है उन्हें वो बिल्कुल भी अच्छा नहीं समझती है।तो बस जब कभी मैं दिख जाता हूं तो पहले तो वो मुझे ऐसे देखती है जैसे कि कहना चाह रही हो कि मेरे सामने आ कैसे गए और फिर धीरे - धीरे कुछ बूद - बुदाने लगती है। अभी भी आंटी आईं तो कपड़ों कि बाल्टी लेकर है मतलब कपड़े सुखाने आईं है पर मुझे देखकर आंटी ने बुदबुदाना शुरू कर दिया। वैसे तो मैं जाने ही वाला था पर आंटी को देखकर मैं समझ गया कि इतनी ही धूप काफी है क्योंकि अगर कुछ और देर यहां रुका तो कुछ ज्यादा ही मिल जाएंगी। जो कि मैं नहीं चाहता।

बचपन बहुत खूब है



मैं बैठकर आराम से अखबार पढ़ रहा था लेकिन बाहर से आते शौर की आवाज से मुझे अखबार पढ़ने में थोड़ी दिक्कत महसूस हो रही थी। मैं उठकर बाल्कनी में आया मेरे फ्लेट के सामने एक बहुत बड़ा मैदान है जहाँ बच्चे पकड़म पकड़ाई खेल रहे थे।
ये जो शोर सुनाई दे रहा है ये इन बच्चो का ही शोर है।
बच्चे जहाँ भी हो वहाँ हल्ला- गुल्ला तो होता ही है
मैं कुछ देर बाल्कनी में ही खड़ा रहा और बच्चों को देखने लगा। बच्चे एक - दूसरे के पीछे दौड़ रहे थे और साथ ही चिल्लाये जा रहे थे। बच्चों को ज़ोर - ज़ोर से
चिल्लाना बड़ा अच्छा लगता है उन्हें इसमे बड़ा मज़ा आता है।
इन्हें देखकर मुझे अपना बचपन याद आ रहा है। मैं और मेरे दोस्त हम भी कोई कम शैतान नही थे बड़ी शैतानियां किया करते थे और उसमें बड़ा मज़ा भी आता था। किसी बात की कोई फिक्र और परवाह नही रहती थी हमे, के स्कूल में एग्जाम है या घर पर कोई मेहमान है। हर वक्त बस अपनी मस्ती में मस्त।
हम तो बस नई- नई खुराफातों में लगे रहते थे कैसे किसको परेशान करना है और आगे क्या करना है इस सबकी हम प्लांनिग किया करते थे। पड़ोस में जो शर्मा आंटी रहती थी वो हम बच्चों के शौर मचाने से बड़ा चिड़ा करती थी। इसलिए हम उन्हें और परेशान किया करते थे। बार- बार उनके घर की डोर बेल बजाकर भाग जाते और जब वो बाहर निकलकर गुस्सा करती तो हम अच्छे बच्चे बनकर उनके पास जाते और जिस भी दोस्त से लड़ाई चल रही होती उसका नाम लगा देते। और बाद में अपनी ही शरारत पर खूब हस्ते।
वैसे अपने सारे दोस्तों में मैं कुछ ज्यादा ही शैतान था
इसलिये मैं बहुत डाँट भी खाता था और अपने दोस्तों का लीडर बनकर रहता था। मैं अपने आपको बड़ा समझदार और होशियार समझता था और अपने छोटे से दिमाग को बहुत दौड़ता रहता था हर बात का पता लगाने के लिए जैसे की मैं कोई डिटेक्टिव हूँ तो मुझे पता लगाना है की अगर माँ ने तीस पापड़ सुखाने के लिए रखे थे तो पाँच कहाँ गायब हो गये, पड़ोस वाली आंटी स्टील का डब्बा लेकर आयीं थी तो उसमे क्या लायीं या फिर क्या माँगकर ले गयी। मिश्रा अंकल ऑटो से कहीं जा रहे है ये कहाँ जा रहे है वो भी इतना बड़ा बैग लेकर। किसी बात का मुझसे मतलब हो न हो पर मुझे उसका पता लगाना बड़ा जरूरी सा रहता था।
ऐसे ही कोई भी खिलौना कैसे बना है ये पता करने के लिए मैं उसे पूरा खोल दिया करता था मलबत तोड़ दिया करता था पर दिक्कत तब हो जाती थी जब मेरे भाई को पता चल जाता था की मैंने उसके खिलौने भी तोड़ दिये तब हम टॉम एंड जैरी की तरफ दौड़ लगाते थे मेरा भाई जब मुझे पकड़ नही पाता था तो रोने लगता था फिर माँ उसको चुप करती और मुझको डाँट लगाती। वैसे मुझ पर माँ की डाँट का कोई असर नही होता था। क्योंकि तब मेरे दिमाग में कुछ और ही चलता रहता था। मैं रोज रात को आसमान में देखकर तारे भी गिनता था और सोचता था की ये तारे आसमान में किसने लगाये होंगे ये नीचे क्यों नही गिरते। मेरे छुटकू से दिमाग में कई सवाल चलते रहते थे ये चाँद तारों से बड़ा क्यों है, रात में अंधेरा कैसे हो जाता है, मैं इतना छोटा क्यों हूँ। ऐसे कई सवाल मेरे दिमाग में आते और मैं खुद ही उसके उत्तर ढूंढता रहता या फिर माँ से पूछता रहता। कभी तो माँ मेरे सवालो के उत्तर बड़े अच्छे से देती और कभी डाँट देती। लेकिन तब भी मेरा सवालों का पूछना बंद नही होता। मैं तो बारिश देखकर भी यही सोचता था की आखिर पानी ऊपर से कैसे बरसता है क्या बादल में पानी भरा रहता है। खैर अपने सवाल का जवाब मिले न मिले पर मैं बारिश के मज़े बहुत लेता था अपने दोस्तो के साथ उछल- उछलकर झूमझूम कर बारिश में खूब नहाता था। और कागज की नाँव बनाकर पानी में चलाता था मेरी नाँव ही सबसे आगे रहती थी क्योंकि मैं उसे आगे ही रखता था। इस बात पर मेरी मेरे दोस्तो से लड़ाई भी हो जाती थी। मैं तो लड़ता भी खूब था और फिर अगले ही दिन अपने दोस्तो के साथ खेलने भी लगता था। ये तो आये दिन की बात रहती थी आज कट्टी होते तो दूसरे दिन चुप्पी। ऐसे ही जब घर में कोई मुझे डाँट देता था तो मैं थोड़ी देर के लिए मुँह फुलाकर बैठ जाता था पर जैसे ही पापा मुझे चौपाटी ले जाने की बात करते तो मैं खुशी से उछलने लगता जैसे कि वो मुझे आगरा का ताजमहल दिखाने ले जा रहे हो। बात कितनी ही छोटी हो या बड़ी हो
मेरे लिए तो हर बात खुशी मनाने वाली होती थी।
बचपन बड़ा ही खूब होता है अपनी ही धुन में रहना, हर बात में खुश होना, बेफ़िक्री में जीना।
कितना प्यारा होता है न बचपन। अपने बचपन को याद कर मैं वैसे ही मुस्कुरा रहा हूँ जैसे बचपन में कोई शैतानी करने के बाद मुस्कुराता था। शायद फिर से दिमाग में कोई खुराफ़ात चल रही है।

  न कोई फिक्र न कोई परेशानी, बस थोड़ी समझ
  और नादानी।
  पता नही है के किस रास्ते जाना है , फिर भी चलते है
  कभी गिरते है , तो कभी सम्हलते है।
  हस्ते भी बहुत है और खूब मुस्कुराते है ,
  पर जरा डाँट पड़ जाये तो आँसू भी बहाते है।
  धूप को समझते छाँव और छाँव को समझते धूप है,
  बचपन बहुत खूब है बचपन बहुत खुब है।





परेशान



परेशान जो देखन मैं चला परेशान मिला हर कोई जो दिल खोजा आपना मुझसा परेशान न कोई।
भागते - दौड़ते मैं ऑफिस तो पहुँच गई पर मैं थोड़ा
लेट हो ही गई जैसे ही मैंने ऑफिस में इंटर किया बॉस सामने ही खड़े नजर आये। और मोबाइल में बजते अलार्म से मेरी नींद खुल गई अच्छा हुआ की ये सपना था पर अगर मैं अभी जल्दी से रेडी नही हुई तो ये सच भी हो सकता है। आज माँ को न जाने क्या हो गया है
मैं उठ भी गई तैयार भी हो गई पर माँ ने अभी तक मुझसे कोई बात ही नही की। मैं नाश्ता करते हुए बाल्कनी की ओर ही देख रही हूँ जहाँ माँ कुर्सी पर बैठे हुए दोनो हाथो में सलाइयां लिए कुछ बुने जा रही है।
वो बार - बार पहले कुछ बुन रही है और फिर उसे उधेड़ रही है। मुझसे रहा नही गया और मैंने जाकर पूछ ही लिया के ये आप क्या कर रही है दरसल माँ एक स्वेटर बना रही है और उसमे एक सुन्दर सी डिजाइन बनाना चाह रही है जोकि अभी उनसे नही बन पा रही है इसलिए वो बार- बार स्वेटर बुन रही है और फिर उसे उधेड़ रही है इस तरह माँ परेशान हो रहीं है। मेरा ऑफिस जाने का टाइम हो गया था। इसलिए मैं ऑफिस के लिए निकल गई और बिना लेट हुए टाइम पर पहुँच भी गई। लंच ब्रेक में रुचि से बात हुई रुचि थोड़ी परेशान है वो होम लोन लेना चाह रही है पर होम लोन मिलने में उसे थोड़ी मुश्किले हो रहीं है। शाम को झूले पर अकेले बैठे हुए मैं माँ और रुचि के बारे में ही सोच रही हूँ। माँ परेशान है क्योंकि उनसे
वो डिजाइन नही बन पा रही जो वो चाहती है और रुचि इसलिए परेशान है क्योंकि उसे लोन नही मिल पा रहा। जब मैंने ध्यान से अपने और उन लोगों के बारे में सोचा जो मुझसे जुड़े हुए है या मैं जिन्हें जानती हूँ तो मुझे यही समझ आया की हम सब किसी न किसी वजह से परेशान है हम बड़ी से लेकर हर छोटी बात पर परेशान हो जाते है ये कही न कहीं हमारी आदत सी होती जा रही है। हम वजह बेवजह परेशान होने लगते है। जरा थोड़ी दिक्कत आई नही के हम परेशानी महसूस करने लगते है फिर उस परेशानी के बारे में सोच- सोचकर हम उसको बड़ा बना लेते है और फिर ये मान लेते है की इस दुनिया में हम ही है जो सबसे ज्यादा परेशान है। पर हम परेशान क्यों है? जब हम कुछ चाहते है या जिस तरह से चाहते है वो अगर वैसे न हो पाये या हमे न मिल पाये तो हम परेशान होने लगते है जैसे की माँ।
वो एक सिम्पल स्वेटर आसानी से बुन सकती है लेकिन वो उसमे डिजाइन चाहती है रुचि को एक अच्छे फ्लेट के लिए लोन चाहिये, अनु को 90% मार्क्स चाहिए, विवेक का कहना है ये जॉब अच्छी नही है वो जॉब ज्यादा अच्छी है, ये बाइक ठीक नही है वो वाली बाइक ज्यादा अच्छी है।
सभी की यही सोच है हम इसलिये परेशान नही है की हमारे पास कुछ नही है हम इसलिए परेशान है की हमारे पास जो है हमे उससे अच्छा चाहिए।
और जब वो अच्छा मिल जाएगा तब हम उससे भी अच्छा पाने के लिए परेशान रहेंगे।
हमे बेहतर , बेहतर और उससे और बेहतर चाहिए।




शुभ दिवाली




त्यौहार के पहले ही बाजार जो जगमगाता है वो देखकर ही मन बड़ा उत्साहित हो जाता है। झिलमिल करती लाइट घर के सजावट का सामान , नये- नये प्रकार के दिये, अलग-अलग रंगों की रंगोली। दिवाली
की रोनक ऐसी होती है की हर एक घर रोशन हो जाता है। चारो ओर प्रकाश ही नजर आता है। आँगन में बनी सुन्दर रंगोली उसमे रखे जलते दिये अपनी रोशनी बिखरते अच्छे लगते है। बचपन में दिवाली पर लक्ष्मी माता की पूजा करने के लिए मैं सबसे ज्यादा उत्साहित रहता था क्योंकि मैंने अपनी दादी को कहते सुना था की लक्ष्मी माता की पूजा करने से लक्ष्मी आती है। मैं तब यही सोचता था के मैं पहले पूजा करूँगा तो सबसे ज्यादा पैसे मेरे पास ही आयेंगे। तब ज्यादा समझ तो थी नही। उस वक्त हर बच्चे ही तरह मेरे लिए भी दिवाली का मतलब नये कपड़े लेना पटाखे चलना और घर में बनी मिठाई गुजिया शक्करपारे का आनन्द लेना था। लेकिन जब बड़ा हुआ तब दिवाली का सही महत्व समझ आया।
दिवाली खुशियों का त्यौहार है हम खुशियां मनाते है खुशियां बाँटते है बड़े जोश और उत्साह के साथ परिवार के सभी सदस्य मिलकर साथ में इस त्यौहार को मनाते है ये त्यौहार फैमली मेंम्बर्स के लिए भी आपस में मिलने का एक बहुत अच्छा मौका होता है। ज्यादातर फैमली मेंम्बर्स किसी न किसी वजह से अपनी फैमली से दूर रह रहे है सब इस तरह बिज़ी है की उनके लिए अपने ही परिवार से मिल पाना मुश्किल हो जाता है।
ऐसे में हमारे ये त्यौहार ही है जो इस मुश्किल को हल करते है दिवाली पर न जाने कितने लोग अपने घर वापस जाते है भले ही बहुत ज्यादा नही पर कुछ वक्त अपने परिवार के साथ बिता पाते है। उनके अपने भी उनका इंतजार कर रहे होते है ये सोचकर की इस बार
दिवाली के बहाने उनका अपना जो उनसे दूर है वो घर आयेगा और खुशी के  कुछ पल उनके साथ बिताएगा।
मैं ये सब बाते इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मैं भी अपनो से, अपने परिवार से दूर हूँ आठ साल हो गये है उनके बिना रहते हुए। इन आठ साल में मैं दो बार ही दिवाली पर घर जा सका। लेकिन पिछली दिवाली मैंने डिसाइड कर लिया था की इस दिवाली अपने घर जरूर जाऊंगा। ऑफिस से छुट्टी भी मिल गई थी मैं बिल्कुल रेडी था लेकिन जिस फ्लाइट से मैं जाने वाला था किसी वजह से उसका जाना केंसिल हो गया। और इतने अचानक से
जाने का कुछ और अरेंजमेंट नही हो सका। मैं मन ही मन उदास हो गया। जब हम कहीं जाने वाले होते है तो पहले से ही बहुत कुछ प्लानिंग मन में कर लेते है मैंने भी की थी सभी के लिए गिफ्ट्स लिए थे की सबको गिफ्ट्स दूँगा और हमेशा की तरह पापा से अपना मन चाहा कुछ लूँगा। पर ये होना सका। मैं अपने फ्लेट की बाल्कनी में बहुत देर उदास हुए बैठा रहा। जब मुड़ थोड़ा ठीक हुआ तो अपने उदास मन को ठीक करने के लिए
मैं घर से बाहर घूमने निकल पड़ा। मैं एक पार्क में जाकर बैठ गया यहाँ मैं अक्सर आता रहता हूँ  मैं बैठे हुए वहाँ आते - जाते हुए लोगों को देख रहा था। कुछ देर बाद मेरे मन मैं कुछ ख्याल आया मैंने अपने दोस्त को कॉल किया और फटाफट अपने फ्लेट पर जा पहुँचा और 20 मिनिट मैं वापस पार्क मैं आ गया। तब तक मेरा दोस्त भी आ गया था मैंने जो गिफ्ट्स अपनी फैमली के लिए थे वो मैंने यहाँ आये लोगों को शुभ दिवाली कहते हुए दे दिये और वीडियो कॉल पर अपनी फैमली से बात करते हुए मैंने अपने दोस्त के साथ मिलकर  दिवाली के दिये भी जलाएं इस तरह मैंने पार्क में ही दिवाली सेलिब्रेट की जिसमे वहाँ मौजूद लोग भी इस सेलिब्रेशन में शामिल हुए।
घर जैसी खुशी भले न मिली हो पर खुशी मिली।
मगर हाँ इस बार मैं दिवाली पक्का अपनी फैमली के साथ ही मनाऊंगा क्योंकि मैं अपने घर आ गया हूँ।
और सबके लिए गिफ्ट्स भी लाया हूँ। मैं बहुत खुश हूँ
अपनो के साथ दिवाली ही मेरे लिए शुभ दिवाली है।

 


मेला



ये जो दुनिया है ये एक भीड़ भरा मेला है जहाँ चलना तुझे अकेला है। ये दुनिया बहुत बड़ी है जिसमे लोगों की भीड़ है जैसे किसी मेले में होती है वैसे ही। यहां कोई समान नही है बल्कि सबका अपना एक अलग प्रकार है और हर एक अपने प्रकार को चमकाने में लगा हुआ है। ताकि मेले की इस भीड़ में उसकी चमक सबसे तेज़ हो जिससे कि वो आकर्षण का केंद्र बन सके। जब हम किसी मेले में जाते है तो किसी एक जगह ज्यादा देर खड़े नही रहते हम चलते रहते है एक शॉप से दूसरी शॉप इस स्टॉल से उस स्टॉल।
ऐसा ही कुछ हाल इस दुनिया वाले मेले का है। यहाँ कोई कहीं रुका हुआ नही है सब चल रहे है कोई आगे चल रहा है तो कोई पीछे चल रहा है और जिसे भीड़ में चलने में कोई दिक्कत हो रही है तो वो किसी और को धक्का देते हुए चल रहा है। सब अपनी सहूलियत अनुसार चल रहे है।
ये दुनिया का मेला बड़ा रंगीन और अजब गजब है।
यहाँ मन को लुभाने वाली कई चीजें है। कुछ लोभ में आकर फंस जाते है तो कुछ बचकर निकल जाते है।
यहाँ लोग तो कई मिलते है पर कितने सही मिलते है ?
 जो सच्चा है तो वो अभी बच्चा है , जो चालाक है वो अच्छा है। जिसके पास बटर है ब्रेड वही खायेगा दूसरा तो बस चने चबाएगा।
दोस्त यार रिश्तेदार साथी संगी तो कई है पर साथ कोई भी नही है। वैसे तो सब साथ नजर आते है पर धूप के पड़ते ही सब अकेला कर जाते है।
इस मेले में मेरे आसपास लोग तो कई है बस अपना ही कोई नही है। समझदार तो यहां  बहुत है बस किसी को समझने ने की समझ ही नही है।
भीड़ चाहे यहां कितनी हो पर चलना तुझे अकेला है। यहाँ साथ छोड़ने वाले तो बहुत है पर साथ देने वाले बहुत ही कम है। सही राह दिखाने वाले बहुत कम है पर राह से भटकाने वाले ज्यादा है।
किस ओर जाना है किस मोड़ मुड़ना है ये तुझे खुद ही तय करना है अपना रास्ता तुझे खुद चुनना है।
गुरु कोई नही मिलेगा तुझे यहाँ अपना गुरु तुझे खुद ही बनना है। कोई रोशनी नही करेगा तेरे रास्ते पर अपना रास्ता खुद तुम्हे ही रोशन करना है।
मदद की उम्मीद किसी से मत करना खुद का सहारा खुद ही बनना। इस मेले के लोग बड़े अजीब है हर बात को गोल-गोल घुमाते है सही कभी कुछ भी नही बताते है। गलत खुद किये जाते है पर गलती दूसरे की बताते है। किसी के खुश होने पर मुँह बनाते है किसी के रोने पर खुश हुए जाते है। झूठ का रायता बनाते है और उसमे सच का नमक स्वाद अनुसार मिलाकर आनन्द के साथ पिये जाते है। बड़े जोश में आकर दूसरो से सवाल किये जाते है और जब खुद जवाब देने की बारी आये तो बहाने पर बहाने लिए जाते है। बड़े निराले रूप है यहाँ लोगों के। भले ही कोई किसी को नही भाता है पर अपनेपन का दिखावा करना यहाँ सबको आता है। इस मेले में भीड़ तो बहुत है लोग भी कई है
पर कोई किसी का नही है। तु खुद ही तेरा साथी है ,तु ही तेरा गुरु है ,अंधेरे रास्तो पर तु ही तेरी रोशनी है
तु ही तेरा सहारा है। हमेशा याद रख ये भीड़ भरा मेला है जहाँ चलना तुझे अकेला है।







फैसला



वैसे तो पैकिंग में बहुत समय लगता है पर मुझे कुछ ज्यादा सामान रखना ही नही है जो जरूरी लगा बस वो रख लिया। और साथ में ये फ़ैमिली फोटो रख ली।
जब सबकी याद आयेगी तो इसे देख लूंगी। माँ गाड़ी आ गई है उदास स्वर में आर्यन ने कहा। आसान मेरे लिए भी नही है पर मैं अब पीछे नही हट सकती। मेरी बेटी अवनि भी आज अपने ससुराल से आई है अपनी माँ से मिलने। सबसे मिलने के बाद मैं गाड़ी में बैठ गई। ड्रायवर ने गाड़ी स्टार्ट कर आगे बढ़ाई जैसे - जैसे गाड़ी आगे जा रही थी मेरा परिवार मुझसे दूर होता जा रहा था मैं गाड़ी की खिड़की से उन्हें देख रही थी। वो अपना हाथ ऊपर कर मुझे बाय कर रहे थे।
अब घर का रास्ता पीछे छूट गया और मैं एक नये रास्ते की ओर बढ़ रही हूँ। तीस साल पहले शादी कर मैं अपने ससुराल आई थी। बहुत सारे ख्वाब तो कभी थे ही नही बस छोटे - छोटे कुछ अरमान थे। मेरा ग्रेजवेशन नही हुआ था उसके पहले ही पापा ने मेरी शादी कर दी। तब मैं फर्स्ट ईयर में थी। मेरे पापा बहुत स्ट्रीक थे और उस समय लड़कियों को ज्यादा आज़ादी मिलती भी नही थी इसलिए मुझे भी नही मिली। मैं जब स्कूल में थी तब मुझे साइकिल चलाने का बड़ा शौक था पर मेरा साइकिल चलाना ना दादी को पसन्द था और न पापा को। उस वक्त हालात ऐसे थे की हर बात में डर लगता था के अगर कोई गलती हो गई तो कितनी डाट पड़ेगी। ये परिस्थितियां मेरे बड़े होने तक ऐसी ही रही। और फिर एक दिन शादी हो गई। अभी मैं फर्स्ट ईयर में ही थी पर पापा के फैसले के आगे किसी की नही चलती थी। ससुराल में पहला दिन ग्रह प्रवेश हुआ मुँह दिखाई हुई सभी ने सुखी जीवन की दुआएं दी। सब कुछ ठीक ही लग रहा था मुझे। शादी को दो महीने होने जा रहे थे सबके अच्छे व्यवहार से मेरे मन में कुछ अरमान पलने लगे थे मेरी सासुमां ने मुझे आगे पढ़ने के लिए सपोर्ट किया। और मैं फिर से पढ़ने लगी। पर दीपेश को मेरा फिर से पढ़ाई शुरू करना मंजूर नही था। धीरे- धीरे उनका बर्ताव बदलने लगा था वो हर बात में बस अपना फैसला मुझे सुनाते। मेरी किसी भी बात को नही सुनते जैसे की मैं उनके लिए कुछ हूँ ही नही। हर बात पर बहस करना , लड़ना उनकी आदत सी हो गई थी। मैंने जैसे तैसे ग्रजवेशन तो कर लिया था पर  चुनोतियों से भरा जीवन मेरे सामने था। मुझे हर वक्त दीपेश के इशारो पर ही चलना पड़ता था अब तो आर्यन और अवनि भी मेरी ज़िन्दगी में आ गये थे। जिनके लिए मुझे जीना था। दीपेश के अंदर न तो एहसास थे और न ही जज़्बात मेरे मन को समझने की उन्होंने कभी कोई कोशिश नही की। उनके लिये तो शायद मैं कठपुतली थी जो उनकी परमिशन के बिना मुस्कुरा भी नही सकती थी। दीपेश के हर दिन के बेरुखे व्यवहार से मेरे मन को ठेस तो बहुत पहुँची पर मैं टूटी नही। मैं यही सोचती रही के अभी नही कुछ वक्त बाद सही दीपेश में बदलाव जरूर आयेगा। दिन गुजरते रहे वक्त बीतता गया। शादी को बीस साल हो गये पर कुछ नही बदला
उनका हर बात पर गुस्सा करना मुझ पर नाराज होना अभी भी जारी रहा। अभी भी बस खुद का फैसला सुनाना बाकी सब क्या चाहते है ये वो नही जानना चाहते। घर के माहौल का असर मैंने अवनि और आर्यन पर कभी नही पड़ने दिया। दोनो बड़े हो रहे थे और अब कॉलेज भी जाने लगे थे। दोनो की पढ़ाई पूरी होते ही सबकी सहमति से दोनो बच्चो की शादी हो गई। तीस साल मुझसे जितना हो सका मैंने अपना हर फ़र्ज निभाने की पूरी कोशिश की। अब इतने साल बाद मैंने दीपेश को अपना एक फैसला सुनाया। और ना ये जानने की कोशिश की वो क्या चाहते है। मैं अपने ननिहाल कानपुर जा रही हूँ अब वही रहूंगी। मेरी एक सहेली है जो घरेलू उधोग चलाती है मैं भी उसके साथ मिलकर काम करने वाली हूँ। मैं अपने आगे का जीवन अपने मन मुताबिक जीना चाहती हूँ किसी के सुनाये फैसलों पर नही चलना चाहती। मैं जानती हूँ की हर व्यक्ति का स्वभाव अलग होता है सब एक जैसे नही होते कुछ सख्त होते है तो कुछ नरम होते है। हम सिर्फ
कोशिश कर सकते है उनके स्वभाव में बदलाव लाने की पर उन्हें बदल नही सकते।
मुझे ये समय ही सही लगा नया रास्ता चुनने के लिए।
तो बस चल पड़ी। मैं किसी को अकेला करके नही आयी हूँ बस खुद अकेले आयी हूँ।






यादें




समंदर किनारे बैठकर पानी की आती लहरों को देखना उन लहरों की आवाज सुनना अच्छा लगता है।
ये लहरें पानी को तेज़ उछाल के साथ आगे की ओर
धकेलती है। ऐसा लगता है जैसे कुछ पुराना जो पीछे रह गया हो उसे समेटकर ये लहरें आगे ला रही हो और हमे फिर से उसकी याद दिला रही हो।
वैसे मुझे नही पता के मेरे अलावा ये समंदर की लहरे किसी ओर को कुछ याद दिलाती है भी के नही पर इतना जरूर पता है कि मन के समंदर में उठती लहरे सभी को कुछ न कुछ याद दिलाती है। यूँ तो मेरे पास वक्त की कमी रहती है पूरे समय व्यस्त रहता हूँ पर जब भी समय मिलता है मैं यहाँ आ जाता हूँ। मुझे यहाँ
चुपचाप बैठकर पानी को देखते रहना अच्छा लगता है। पर हमेशा की तरह आज मैं अकेला नही हूँ। 
ये फोटो एल्बम मेरे साथ है सुबह अपने कपड़ो की अल्मारी देखी पूरी अस्त- व्यस्त नजर आ रही थी क्यों
न हो रोज बस जो कपड़े पसन्द आये वो निकाल लेता हूँ और बाकी कपड़ो को बिखर देता हूँ और न ही मैं उन्हें बाद में दोबारा ठीक करके रखता हूँ। इसलिए कपड़ो के ये हाल है आज पूरी अल्मारी की सफाई की। सफाई करते वक्त नीचे वाली रॉ में कपड़ो के नीचे दबी पड़ी पुरानी फोटो एल्बम हाथ में आई। इसे देखकर मेरे होंटो पर
मुस्कान आ गई। यहाँ आते वक्त मैं ये एल्बम भी साथ ले आया सोचा यहाँ के सुकुन में अपनी यादों से मिलना
ज्यादा सही रहेगा। एल्बम में जो ये सबसे पहले ब्लैक एंड वाइट सी फोटो नजर आ रही है ये मेरे दादा - दादी की फोटो है। हर बच्चे की तरह मैं भी अपने दादा - दादी का लाडला रहा हूँ जो जिद मम्मी पापा के पास पूरी नही हो पाती है वो दादा - दादी के पास जाकर झट से पूरी हो जाती है। ज्यादा मेहनत भी नही करनी पड़ती थोड़ा सा रोतलु मुँह बनाया और दादी की गोद में जाकर सो जाओ या फिर दोनो बाहों को दादी के गले में डाल उनकी पीठ से चिपक जाओ और कुछ बोलो नही बस चुपचाप रहो फिर दिखो कैसे आपके सारे काम बनते है दादी तो मेरा मुरझया चहरा देख सारे घर के सदस्य की क्लास ही ले लेती थी। और मैं मासूम बच्चा बना उनसे लिपटा रहता था। और मेरे दादा तो मुझे हर जगह अपने साथ ले जाया करते थे।
मेरी मनपसन्द जलेबियाँ भी मुझे खिलाया करते थे।
वो मुझे बहुत प्यार करते थे।
अगली फोटो में पापा अपनी मिलेट्री ड्रेस में है वो अपने साथी से कुछ कहते नजर आ रहे है। पापा को किसी भी काम में किसी भी तरह की लापरवाही बिल्कुल पसन्द नही थी। वो हमेशा एक्टिव रहे है और आज भी उतने एक्टिव है वो अब रिटायर्ड है पर अभी भी सख्त शेड्यूल को फॉलो करते है।
ये जो फोटो है जिसमे मम्मी पापा साथ में है इसमे पीछे जो सुन्दर वादियाँ है वो शिमला की है। हम सब साथ में शिमला गये थे। वैसे पापा ज्यादा वक्त हमारे साथ नही रह पाते थे पर जितना भी रहते थे वो उतने समय में बाकी वक्त की भरपाई कर देते थे।
कैरी देखकर मुँह में पानी आ गया। ये फोटो मैंने ही अपने कैमरे से ली थी। छत पर धूप में माँ और दादी दोनो मिलकर कैरियाँ सूखा रही है आम का अचार बनाने के लिए।
घर में कभी भी बाजार का अचार आया ही नही। माँ और दादी घर पर ही अचार बनाती थी। दादी के हाथ का बना अचार और माँ के बनाये दाल-चावल
खाकर मज़ा आता था। दादी के हाथ का अचार याद आते ही आज भी मेरे मुँह में उसका स्वाद घुल जाता है।
ये जो सब इमोशनल नजर आ रहे है ये फोटो मेरी दीदी की शादी की है। रीति दीदी मुझसे तीन साल बड़ी है। पर फिर भी सब कुछ मुझसे ही पूछती थी।
ये गेम कैसे खेलते है , ये ऐप क्या काम करता है, जा मेरे लिए मार्केट से ये ले आ। ये अच्छा नही है अब जाओ इस बदलकर लाओ। बस दीदी का यही काम रहता मुझे दौड़ाते रहना। कभी- कभी तो मैं गुस्सा हो जाता था। पर जब दीदी की शादी हो गई तो मैं उन्हें मिस भी करता हूँ।
ये फोटो तो मेरे बर्थडे की है जब मैंने अपनी लाइफ के बीस साल पूरे कर लिए थे। बड़ा ही यादगार बर्थडे रहा है मेरा। सभी फैमली मेम्बर मेरे सभी फ़्रेंड्स सबके साथ मैंने अपना बर्थडे सेलिब्रेट किया था। उसके बाद से फिर कभी ऐसे बर्थडे सेलिब्रेट कर ही नही पाया।
आगे पढ़ने के लिए पहले पुणे चला गया था और फिर उसके बाद जॉब करने यहाँ मुम्बई आ गया और यही  सेटल हो गया। चार साल पहले दादी हम सबको छोड़कर चली गयी। तब मैं बहुत रोया था। दादी से मैं हर बात शेयर करता था और जब मुझे किसी भी बात की परमिशन पापा से चाहिए होती थी तो मैं दादी से ही बोलता था। वो मेरे दिल के बहुत करीब थी। अभी काफी वक्त से मैं यहीं रह रहा हूँ। कभी - कभी जब मौका मिलता है तो घर कानपुर हो आता हूँ अभी लास्ट टाइम जब गया था तो शायद तभी ये फोटो एल्बम भी कपड़ो के साथ आ गई होगी। कितनी सारी यादें है जो मेरे मन में इकट्ठी है। मेरा बचपन , दीदी और मेरी बचपन में हुई लड़ाईयाँ,  पापा का हर गलत बात पर टोकना। मम्मी का मुझे लड्डू बेटा कहना, दादा- दादी का हर ज़िद पूरी कर देना , दीदी का चिढाना, और दोस्तो के साथ कुल डूड बनकर घूमना यादें तो इतनी सारी है कि पूरी एक किताब ही लिख दूँ। यादें भूली नही जाती वो हमेशा याद आती है। हमारा आज कल बनकर यादों में बदल जाता है और फिर जरा जिक्र होते ही सब कुछ याद आ जाता है कभी यादों से चहरे पर मुस्कान आ जाती है तो कभी आँखे नम हो जाती है। यादें ऐसी ही होती है। हम सभी के पास यादों का पिटारा होता है जिसके खुलते ही कई यादें ताज़ा हो जाती है।















हिन्दी




मेरी हिन्दी शुरु से ही बढ़िया रही है स्कूल में एक यही
विषय तो था जो मुझे बहुत पसन्द था। मास्टरजी जब भी हिन्दी का कोई भी पाठ शुरू करते थे तो वो हम छात्रों  को भी एक- एक कर पाठ पढ़ने को कहते और सभी छात्रों में मैं सबसे आगे रहता। और जब मास्टरजी पाठ को खुद पढ़कर हमे समझाते तो मैं बड़े ही ध्यान से सुनता। मुझे हिन्दी की कहानियां, कविताएँ , मुहावरें पढ़ना बड़ा अच्छा लगता था। मैं जब भी कोई हिन्दी की कहानी अपने मास्टर जी से सुनता था तो मेरी आँखो के सामने उसका चित्र सा बन जाता था और मुझे ऐसा लगता था जैसे की मैं अपने सामने उस पूरी कहानी को देख रहा हूँ। ऐसी कोई हिन्दी की कहानी या कविता नही होगी जो मैंने पढ़ी या सुनी हो और मुझे याद न हो। हिन्दी बढ़ी ही रोचक है जितना इसे जानोगे उतना ही इसके करीब आते जाओगे और वो तुम्हारे मन को भाती जायेगी।
हिन्दी व्याकरण के अलंकार, रस , उसके छंद ये सब पढ़ने में बढ़ी ही खुशी होती है। ऐसे कई महान कवि है जिन्होंने अलग - अलग रसो में , अलग-अलग काल में अपनी रचनायें की है जोकि प्रसिद्ध भी हुई है।
सुभद्रा कुमारी चौहान , सूरदास, तुलसीदास, मैथिलीशरण गुप्त, महादेवी वर्मा,  कबीरदास
और कई महान कवि और रचनाकार है जिन्होंने अपनी रचना के द्वारा हिन्दी को हमारे मन में बसाया है।
हिन्दी में कितना अपनापन है। शायद ये अपनापन इसलिए भी है क्योंकि ये हमारी राष्ट्रभाषा है। अपनी - अपनी भाषा से हमे लगाव ज्यादा होता ही है।
हिन्दी के प्रति मेरे लगाव ने मुझे बहुत कुछ दिया।
स्कूल में था तो कहानी कविताएँ पढ़ने का बड़ा शौक था जब कॉलेज में आया तो खुद ही कविताएँ गढ़ने लगा। मन ही मन कल्पना करता रहता और कॉपी के पन्नो को भरता रहता। ऐ चाँद तु क्यों चमकता है, क्या सब पर नजर तु रखता है। तारो को अपने पास क्यों रखता है, क्या अकेले रहने से डरता है। कुछ इस तरह
मैं लिखने लगा। अभी मैं कोई बहुत अच्छा लेखक तो नही बना था पर टूटी- फूटी कवितायें लिखने लगा था।
और यही कवितायें मैं अपने दोस्तो को सुनाता रहता।
एक दिन ऐसे ही मैं अपनी नई लिखी हुई कविता केंटीन
में बैठे हुए अपने दोस्तो को सुना रहा था कि तभी वही
पास में दांये तरफ लड़कियों के ग्रुप में से अनुराधा ने पलटकर हमारे ओर ध्यान से देखा और वापस मुड़ गई। शायद अनुराधा को मेरी कविता अच्छी लगी।
ऐसा मुझे लगा। अनुराधा मेरे ही क्लास में मेरे साथ पढ़ती थी। बस हमारे बीच कभी बातचीत नही होती थी।दरसल उस समय का ऐसा था के लड़को और लड़कियों का ग्रुप अलग ही रहता था। दोनो के बीच कोई दोस्ती नही।
इस बार के वार्षिक उत्सव में मैंने भी हिस्सा लिया एक के बाद एक सबको स्टेज पर बुलाया जा रहा था मैं भी
इंतजार कर रहा था अपने नाम के आने का। कुछ देर बाद मेरा नाम लेकर मुझे स्टेज पर बुलाया गया। मेरा उत्साह बढ़ाने के लिए मेरे दोस्तो ने मेरा नाम लेकर जोर-जोर से ताली बजाई। और फिर मैंने अपनी कविता पढ़ना शुरू किया। जितने मन से मैं कविता पढ़ रहा था उतने मन से सभी मेरी कविता को सुन भी रहे थे। मेरे आखरी लाइन पढ़ते ही सभी ने जोरो मेरे लिए ताली बजाई। तभी सामने बैठे मेरे मित्रगण में से किसी एक ने मुझसे शायरी सुनाने की दरख्वास की।
और मैंने अपने शिक्षको से स्वीकृति लेकर  उनकी  इस ख्वाईश को पूरा करते हुए एक शायरी सुना दी।
उनकी तारीफ क्या करें उनकी तारीफ के लिए तो हमारे पास शब्द ही नही है। के उनकी तारीफ क्या करें उनकी तारीफ के लिए तो हमारे पास शब्द ही नही है।
फिर सोचा के कुछ तो कह दे , फिर सोचा के कुछ तो कह दे। पर हम फिर रुक गये, पर फिर हम रुक गये ये सोचकर के उन पर तो हमारा कोई हक ही नही है।
 बस इतना कहा ही था के जोरों से तालियों की आवाज गूंज उठी। और बस तब से मैं शायरियाँ भी करने लगा। और अनुराधा वो कहीं न कहीं मेरी कवितओं और शायरियों की वजह से मेरी और आकर्षित होने लगी थी। जोकि मैं जानता था इसीलिए तो आजकल मेरी कल्पना में अनुराधा की झलक भी आने लगी थी।
और गुपछुप के आखिर हमारे बीच रिश्ता जुड़ ही गया और मैंने प्रेमरस की कवितायें भी लिख ही डाली। इसके साथ ही
मैं अपने लेखन में ही आगे बढ़ता गया।
आगे ये हुआ के अनुराधा से मेरी शादी हो गई। अब मैं अपनी हर कहानी ,कविता ,शायरी पहले अनुराधा को ही सुनाता था। वो खामोश मुझे सुनती रहती और फिर मेरे लिए ताली बजाती। अब तो मेरी लिखी किताबे बाजार में भी आने लगी थी। मेरे हिन्दी के प्रति मेरे लगाव ने मुझे लेखक बना ही दिया। इस तरह मैंने अपना सारा जीवन एक हिन्दी लेखक के रूप में जिया।
मेरी उम्र भले ही हो गई है पर मैं आज भी उतने ही मन से लिखता हूँ और अनुराधा आज भी मेरी रचना को सुन मेरी तारीफ करती है।





बस एक पल जिंदगी



कभी खुशियों से भरी तो कभी आँसुओ से भीगी कुछ ऐसी हैं जिंदगी।
ज़िन्दगी आसान नही है पर मुश्किल भी नही है हाँ इसके रास्ते टेढ़े मेढ़े जरूर है पर कठनाइयों के साथ ही सही हम इन्हें पार कर ही लेते है।
मुश्किलों से घबराना नही चाहिए न ही उनसे दूर भागना चाहिए। ये मुश्किले तो इस ज़िन्दगी का हिस्सा है दरसल ये एक नया रास्ता है जैसे सड़क के रास्ते बदलते रहते है कभी दांये मुड़ते है तो कभी हम बाएँ मुड़ते है ऐसे ज़िन्दगी के रास्ते भी बदलते रहते है कभी
खुशियों भरे रास्ते होते है तो कभी गम भरे। चलना तो हमे दोनो पर ही पड़ता है। जब चलना तय है तो क्यों ना मुस्कुराकर चले। ये गम ये खुशी तो ज़िन्दगी के खेल है और खेल में तो मज़ा आता है। इसलिए जिंदगी जो भी है जैसी भी है उसे पूरे दिल से जिओ। क्योंकि ये लगती भले ही लम्बी है पर अगर सोचा जाये तो ये बस एक पल की ज़िन्दगी है। जिन पलो में हम अपनो के साथ हो दिल खोलकर मुस्कुरा रहे हो बस वही पल ज़िन्दगी है। बस एक पल जिंदगी है। बाकी की तो दौड़ है कुछ हासिल करने की, कुछ पाने की , खुशियों को अपने जीवन में लाने की दौड़।
मैंने बचपन से ही अपने पापा को मेहनत करते देखा है। वो दिन - रात काम में लगे रहते थे। और हर वक्त किसी न किसी परेशानी में उलझे रहते थे उन्होंने हमे कभी किसी चीज़ की कमी महसूस नही होने दी हमारे बिना कहे वो सब मिल जाता था जिसकी हमे जरूरत होती थी। पर कुछ था जिसकी कमी रह गई वो था उनका साथ। मैं यही सोचता रहता था के पापा हमारे साथ अपना वक्त बिताये हमसे बाते करें हमारे साथ खेलें पर ऐसा मुश्किल से ही हो पाता था वो जब मेरे लिए चॉकलेट लाते थे तो मैं खुश होता था पर उससे ज्यादा खुश में इस बात से होता की वो मुझे गोद में उठाकर प्यारी- प्यारी बातें किया करते थे कुछ पलो के लिए ही सही मेरे पापा मेरे साथ होते थे।
आगे भी ऐसा ही चलता रहा वो दिन ब दिन बिज़ी होते गये। अब तो मेरे स्कूल फंक्शन में भी मम्मा अकेले ही आती थी। पापा तरक्क़ी की के रास्ते पर आगे बढ़ते जा रहे थे और जिंदगी की छोटी- छोटी खुशियों से दूर होते जा रहे थे। उन्होंने कभी खुद को भी वक्त नही दिया की दो पल बिना किसी फिक्र के, जो उनका मन चाहता है वो करें , एक पल खुदके लिए भी जियें।
पापा ने अपना सारा जीवन खुद को काम में बिज़ी रखकर ही बिता दिया।
पर मैंने ऐसा नही किया। मैं अपना काम पूरी लगन से करता हूँ पर उसके साथ ही मैं कुछ समय अपने अपनो को भी देता हूँ उनके साथ वक्त बिताता  हूँ उनकी बातो को सुनता हूँ अपनी कुछ बाते शेयर करता हूँ उनके साथ मुस्कुराता हूँ। पल खुशी के हो या गम के मैं उनके साथ उस पल को साझा करता हूँ। साथ ही मैं अपने आपको भी वक्त देता हूँ मेरा दिल जो चाहता है मुझे जो पसन्द है मैं वो करता हूँ मैं इन कुछ पलो को ऐसे
जीता हूँ जैसे इसी में पूरी ज़िन्दगी समाई हो। मैं अपनी पूरी ज़िन्दगी काम के पीछे दौड़ते हुए या फिक्र करते हुए नही बिताना चाहता मैं कुछ पल ठहरना चाहता हूँ
बेपरवाह होकर जीना चाहता। हमारी लाइफ कितनी लम्बी या छोटी है हम नही जानते। आने वाला कल कैसा है हम ये भी नही जानते हम बस अपने आज को जानते है इसका मतलब इसी पल में ही सब कुछ है हमारे आज को ही हम अच्छे से जीयें इस पल में ही है जिंदगी।
बस एक पल ज़िन्दगी है।


राखी



हमेशा की तरह आज भी कृपा ने अपने मायके राखी स्पीड पोस्ट के ज़रिये पहुँचा दी। हर साल यही होता है
कृपा राखी पर अपने मायके नही जाती बस राखी पहुँचा देती है। और कृपा का भाई कल्पेश अपनी बहन की भेजी हुई राखी को खुद ही अपने हाथ में बांध लेता है। कितने सालों से यही सिलसिला चला आ रहा है।
कृपा और कल्पेश दोनो बहन- भाई राखी पर एक दूसरे को बहुत याद करते है पर मजबूरी ये है की वो मिल नही सकते। जैसे - जैसे वक्त आगे बढ़ता है हमारे जीवन में सब बदलता जाता है। अभी कृपा के साथ कुछ ऐसा ही है।
कृपा की शादी को 12 साल हो गये है। वो अपने घर परिवार की जिम्मेदारियों में कुछ ऐसी उलझी हुई है की उसके बाहर उसे कुछ और नजर ही नही आता। शादी के बाद तीन या चार बार ही ऐसा हुआ होगा की कृपा राखी पर अपने मायके गई हो। उसके बाद तो उसका मायके जाना मुश्किल सा रहा।
रक्षाबन्धन को दो दिन रह गये है कृपा तैयारियों में लगी हुई। कृपा की दो ननन्द भी है। हर राखी पर वो अपने मायके जरूर आती है। उनके आने से कृपा के  घर में रौनक सी छा जाती है। कृपा सभी का ख्याल बड़े अच्छे से रखती है और सभी के साथ बड़े प्यार से रहती है एक लौती बहु होने के कारण घर की सारी जिम्मेदारियां कृपा के कन्धों पर ही है।
कृपा अपने ससुराल में राखी का त्यौहार हँसी- खुशी के साथ ही मनाती है उसकी दोनो ननन्द उसे भाभी राखी बांधती है और फिर कृपा उन्हें अपनी ओर से कोई तोफा देती है। और सभी के साथ मुस्कुराते हुए वो अपने भाई को राखी न बांध पाने के दुख को छुपा जाती है। वैसे कृपा ने एक- दो बार कोशिश की राखी पर अपने मायके जाने की पर किसी न किसी वजह के चलते उसका जाना हो न सका। कृपा का मायका दूर भी है वहाँ पहुँचने में समय थोड़ा ज्यादा लगता है ये भी एक वजह है के कृपा नही जा पाती।
कृपा आज सुबह से जिन तैयारियों में लगी थी वो सारा काम शाम तक पूरा हो गया। काम से फ्री हो कृपा कुछ देर आराम करने के लिए सोफे पर बैठी ही थी के डोर बेल की आवाज आई। दरवाज़े पर कृपा की दोनो ननन्द थी मीना और जया। दोनो सबसे पहले अपनी माँ से मिली फिर कृपा को अपना मनपसन्द नाश्ता बनाने को कहकर वो कुछ देर आराम करने कृपा के कमरे में चली गयीं। कुछ देर बाद फिर डोर बेल की आवाज आई। जया ने जाकर दरवाजा खोला कोई शक्स दरवाजे पर था जिसे जया हॉल में ले आई। फिर मीना ने कृपा को आवाज देकर नाश्ता ले आने को कहा कृपा जब हॉल में आई तो चकित हो गई क्योंकि हॉल में सबके साथ कृपा का भाई कल्पेश भी बैठा था।
अपने भाई को सामने देख कृपा भावुक हो गई। अभी कुछ अजीब सी स्थिति हो रही थी कृपा खुशी से मुस्कुरा रही थी और आँखे आँसू से नम हो रही थी।
खैर कुछ ही पलो में कृपा ने खुद को सम्हाल लिया। इसके बाद सभी ने साथ में शाम का नाश्ता किया। और फिर जया कृपा का सामान से भरा बैग हॉल में ले आई। मीना और जया दोनो ने कृपा से मुस्कुराते हुए कहा भाभी इस बार आप खुद अपने भाई की कलाई पर राखी बांधेंगी। मीना और जया के द्वारा मिले इस सरप्राइस से कृपा बहुत खुश हुई। और फिर कृपा अपने भाई कल्पेश के साथ अपने मायके चली गई।
इस बार कृपा ने अपने भाई की कलाई पर इस रक्षाबन्धन की राखी तो बांधी ही पर पिछले उन सालो की राखी भी बांधी जो वो खुद नही बांध सकी थी।
आज कृपा और कल्पेश दोनो भाई - बहन बहुत खुश थे। क्योंकि आज बहुत वक्त बाद वो साथ में राखी का तैयार मना रहे है।





बरसता सावन



यूँ तो बारिश के शुरू होते ही हवा में ठंडक घुल जाती है और गर्मी से राहत मिल जाती है। सूरज के तीखे तेवर के बाद बरसता बादल बड़ा अच्छा लगता है वैसे बारिश का मौसम है ही ऐसा जो सभी के मन को भाता
है। मन बड़ा खुश हो जाता है जब ये सावन आता है।
ऐसा लगता है जैसे ये बरसता सावन प्रकृति का रूप निखारने ही आया हो। इस समय प्रकृति बड़ी सुन्दर और हरीभरी नजर आती है। बेहद खूबसूरत।
मैं अपने दोस्तो के साथ आज इस बरसते सावन के भीगते दिन में भीगने निकली हूँ। रास्ते में सड़क किनारे मुझे वो पेड़ नजर आ रहे है जो गर्मी में मुरझाये से नजर आ रहे थे और अब सावन का पानी लगते ही  वो फिर खिल उठे है मानो उनमे दोबारा जान पड़ गई हो।
सड़क के दोनो ओर सुन्दर लाल फूल खिले नजर आ रहे है मुझे इन फूलो का नाम तो नही पता पर ये दिखने में बड़े ही सुन्दर है इनकी कलियां कुछ हरी पीली सी है लेकिन फिर भी खिले हुए फूलों का रंग लाल है। रास्ते के दोनो
ओर झाड़ियों में लगे ये फूल ऐसे लग रहे है जैसे ये मुस्कुराकर हमारा स्वागत कर रहे हो। कुछ देर बाद  हम कांची वन आ पहुँचे। है तो ये पिकनिक स्पॉट पर ये जंगल के बीचों बीच है लेकिन यहाँ लोगों की भीड़ हमेशा लगी रहती है यहाँ तेजी से गिरते हुए पानी का झरना भी है जिसका पानी बहुत ठंडा है और अभी क्योंकि बारिश का समय है तो पानी का बहाव और तेज है।
वैसे तो इस झरने को मैंने पहले भी देखा है पर अभी ये कुछ ज्यादा ही अच्छा लग रहा है।
मैं यहां अपने आस- पास उन लोगों को भी देख रही हूँ
जो यहां आये हुए है कुछ लोग अपनी फ़ैमिली के साथ है तो कुछ मेरी तरह अपने दोस्तो के साथ है और कुछ कपल्स भी है जोकि रिमझिम बारिश की फुआरो का लुफ्त उठा रहे है वैसे बरसते सावन का असर प्रेमी जोड़ो पर भी खूब नजर आता है जैसे बारिश की बूंदो से धरती हरी -भरी हो जाती है वैसे ही शायद प्रेमी जोड़ो का दिल भी हरा-भरा सा हो जाता है। दिल की ज़मी पर प्यार की बूंदे बरस जाती है और उनकी आँखे
किसी के लिए तरस जाती है धीरे-धीरे प्यार के फूल खिलने लगते है और प्यार भरे मौसम में दो दिल मिलने लगते है। कुछ ऐसा ही असर होता है प्रेमी जोड़ो पर बारिश का।
वैसे सावन बच्चो को भी रास आता है बारिश में झूम-झूमकर नाचने में उन्हें बड़ा मजा जो आता है। बारिश में भीगने की सबसे ज्यादा खुशी अगर किसी को होती है तो वो बच्चे ही है। बारिश का लुफ्त बच्चा पार्टी भी बड़े जोरों से उठाती है।
ये ऐसा मौसम है जो उदास मन को भी खुश कर देता है। थोड़े काले थोड़े सफेद बादल, हरे- भरे पेड़ - पौधे , पतियों पर ठहरा बारिश का पानी, बहते झरने , पक्षियों की मीठी आवाज और रिमझिम बरसात,  सावन में है कितना कुछ खास।
ये मौसम है ही ऐसा की हम सब का मन बारिश में झूमकर नाचने को करता है। मैं तो अपने दोस्तो के साथ बारिश के खूब मज़े ले रही हूँ। बारिश की बूंदो को अपने हाथ की हथेली पर लेकर देख रही हूँ, की कितनी ठंडी है ये बारिश की बूंदे।
सुहाना मौसम खूबसूरत नज़ारे सावन के ये दिन है कितने प्यारे।

अधूरा




ऐसा क्यों होता है की सब कुछ होने के बावजूद भी हमे कुछ अधूरा सा लगता है। खुश होते हुए भी दिल के किसी कोने में एक खामोशी सी होती है।
 विनय और नीता की शादी को आज पाँच साल हो गये है और इसी खुशी में एक शानदार पार्टी भी रखी गई है उन दोनो ने मुझे भी इन्वाइट किया है जाना तो पड़ेगा ही आखिर कॉलेज फ़्रेंड्स है हम। पार्टी के सभी फोटोज मैंने ही क्लिक किये बिल्कुल वैसे ही जैसे पहले किया करता था मुझे फोटो क्लिक करने का बड़ा ही शौक था उस वक्त मेरे पास एक साधारण सा कैमरा हुआ करता था। आज विनय और नीता से मिलकर कॉलेज टाइम की सारी बाते ताजा हो गयी। हम अपने दोस्तो से दो दिन बाद मिले , कुछ महीनों बाद मिलें या कुछ सालो बाद मिलें हमारे बीच कुछ नही बदलता जब भी मिलते है बिल्कुल वैसे ही हो जाते है जैसे पहले थे शरारती और बेपरवाह से।
पार्टी तो मैंने बहुत इंजॉय की पर घर आकर मैं थकान सी महसूस कर रहा हूँ थका हुआ सा मैं सोफे से अपनी पीठ टिकाकर बैठ गया। घर में कितनी खामोशी सी लग रही है कोई हलचल , कोई आवाज नही।
यूँ तो मैं पूरे दिन ही बड़ा खुश रहता हूँ कई फोटोज खिंचता हूँ कई फोटोज देखता हूँ अपने साथियो के साथ मजाक -मस्ती तो रोज की ही बात है मैं कभी - कभी रिशेप्शन पर बैठी जूही के साथ थोड़ा -फ्लर्ट भी कर लेता हूँ। और न जाने दिनभर कितने लोगों से मिलता हूँ।
पर जब घर आता हूँ तब मैं खुद से मिलता हूँ अपने अंदर के आदित्य से। जोकि अकेला है।आज विनय और नीता को साथ में खुश देख ऐसा लगा जैसे की दो फूल जो एक दूसरे का साथ पाकर मुस्कुरा रहे हो। नीता ने मुझसे स्वर्णा के बारे में पूछा मैंने कुछ नही कहा खामोश रह गया। वैसे तो मुझे रोज ही स्वर्णा की याद आती है पर आज कुछ ज्यादा आ रही है।
उसके बिना घर खाली सा लगता है।
स्वर्णा और मैं कॉलेज फ़्रेंड्स थे मुझे तभी से ही फोटोग्राफी का बड़ा शौक था मैं एक फेमस फोटोग्राफर बनना चाहता था इसलिए कभी अपने दोस्तो की कभी कॉलेज कैम्पस की , तो कभी बदलो में उड़ते पंछी की फोटो ले लेता। और स्वर्णा की तो मैं न जाने कितनी फोटो लेता कभी मुस्कुराती हुई कभी गुस्से में मुँह बनाती हुई तो कभी एग्जाम के टेंशन में बैठी हुई। उसके हर एक लम्हे खुशी, नाराजगी ,फिक्र सबकी फोटो मेरे कैमरे में कैद हो जाती। हमारा रिश्ता अब सिर्फ दोस्ती का नही रह गया था बल्कि उससे आगे बढ़ गया। पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद मैं अपने सपने को पूरा करने मुम्बई आ गया। यहाँ आकर मेरा स्ट्रगल
शुरू हुआ। स्वर्णा कभी - कभी मुझसे मिलने यहाँ आने लगी। मेरे साथ वो भी मेरे सपने को जीने लगी हमेशा मुझे इनकरेज करती। अभी मैं अपनी मंजिल के पास नही था पर ज्यादा दूर भी नही था। धीरे- धीरे मुझे ऑफ़र्स मिलने लगे थे। और इसी बीच मैंने और स्वर्णा ने शादी भी करली। अब स्वर्णा हर वक्त मेरे साथ थी मेरे फैसलों में मेरी खुशी में मेरी उदासी में। वक्त आगे बढ़ने लगा और उसके साथ मैं भी मुझे अब बड़े -बड़े ऑफ़र्स मिलने लगे मेरी खिची हुई तस्वीरे अब खास होने लगी थी। बेस्ट फोटोग्राफर की लिस्ट में मेरा नाम भी शामिल हो गया था बड़ी- बड़ी मैग्ज़ीनस के फोटोशूट के लिए मुझे कॉल आने लगे। आठ सालों में मैंने वो हासिल कर लिया था जो मैं चाहता था मैं एक फेमस फोटोग्राफर बन चुका था। मैं क़ामयाबी की सीढ़ी तो चढ़ रहा था पर शायद स्वर्णा से दूर भी होता जा रहा था। मेरे पास उसके लिए वक्त ही नही था दिन में अपने काम में व्यस्त रहता और रात को किसी न किसी पार्टी में। मेरे अंदर गुरुर आने लगा था अपनी क़ामयाबी का। एक ही घर में साथ होते हुए भी कितने वक्त से मैंने उसे गौर से देखा भी नही ना कुछ पल उसके पास बैठकर उसके मन की कोई बात जानी न अपने मन का कुछ कहा।
आज ब्रेकफास्ट के समय स्वर्णा मुझसे कुछ बात कर रही थी। लेकिन मेरा ध्यान उसकी बातो में बिल्कुल नही था स्वर्णा शायद समझ गई थी इसलिए बात करते-करते चुप हो गई। ब्रेकफास्ट के बाद जब मैं घर से निकलने लगा तब स्वर्णा ने मुझे रोकते हुए कहा
कितने वक्त से हमने साथ डिन्नर नही किया है आज शाम को जल्दी आ जाना प्लीज़। ये स्वर्णा की हमारे बीच आई दूरी को कम करने की कोशिश थी ओके कहकर मैं चला तो गया पर रात को देर से घर पहुँचा वो भी डिन्नर करके। क्योंकि स्वर्णा भी आज गुस्से में थी तो बात तो आगे बढ़नी ही थी और बहस छिड़नि ही थी बहस के दौरान मैंने कुछ ऐसी बाते कह दी जिससे ऐसा लग रहा था की जैसे मेरी लाइफ में उसकी कोई अहमियत नही।
मेरी बातो में इतना घमंड था जो ये साफ कह रहा था की स्वर्णा की पहचान मुझसे है वो मेरे बिना अधूरी है मैं उसके बिना नही। वो हो या ना हो मुझे कोई फर्क नही पड़ता। बहस के बाद मैं गुस्से में अपने रूम में चला गया स्वर्णा रातभर जागी रही या फिर सो गई मुझे नही पता।
अगले दिन स्वर्णा उदास भले ही थी पर ब्रेकफास्ट उसने बनाया था लेकिन मैंने गुस्से में ब्रेकफास्ट नही एक फोटोशूट के लिए मुझे जाना था मैं चला गया। बिना स्वर्णा से कुछ बात किये। रात को जब घर आया तो स्वर्णा नही थी वो चली गई थी घर छोड़कर, मुझे छोड़कर। मैंने भी उसे फोन कर वापस आने को नही कहा। कुछ दिनो तक तो मुझे उसके जाने से कोई फर्क नही पड़ा। क्योंकि मैं अभी भी घमंड से भरा हुआ था पर कुछ दिनों बाद मुझे घर सुना सा लगने लगा स्वर्णा की कमी मुझे खलने लगी , हर छोटी - छोटी बात पर मुझे उसकी याद आने लगी मुझे उसकी कितनी आदत हो गई है ये मैं खुद ही नही जानता था। मैंने कैसे उसे खुद से दूर कर दिया जिसके हर एक पल की फोटो मैं अपने कैमरे में कैद कर लिया करता था उसका अकेलापन मैं कैसे नही देख सका।आज जब मैं घर से बाहर निकलता हूँ तो फोटोग्राफर आदित्य बनकर निकलता हूँ दिनभर खुश भी रहता हूँ। लेकिन घर आकर मैं सिर्फ आदित्य होता हूँ वो आदित्य जो स्वर्णा के बिना अधूरा है नाखुश है।मैंने स्वर्णा को मैसेज कर उसे लौट आने को कहा है कॉल इसीलिए नही किया क्या पता वो मुझसे बात करती या नही। मुझे उम्मीद है की वो मुझे जरूर माफ कर देगी और जल्द ही लौट आएगी अपने घर अपने आदित्य के लिये।




क़ामयाब






ऑफिस के लंच ब्रेक में सभी आराम से बैठकर गपशप कर रहे थे ये लंच ब्रेक ही तो होता है जिसमे कुछ पल  अपने ऑफिस के काम से थोड़ी आजादी मिलती है।
बातो ही बातो में बात निकली क़ामयाब होने की।
लाइफ मे क़ामयाब होना कितना जरूरी है इसी टॉपिक पर बड़ी गम्भीरता के साथ बात शुरू हो गई। 
निधि , अतुल , निशा मेम सभी कह रहे थे की क़ामयाब होना बहुत ही जरूरी है क़ामयाब होकर ही तुम सब कुछ हासिल कर सकते हो वरना कुछ भी नही। यहाँ हर एक शक्स जी तोड़ मेहनत क़ामयाबी हासिल करने के लिए ही कर रहा है। और इस क़ामयाबी की रेस में हम भी शामिल है। 
मैं सबकी बातो को चुपचाप बैठकर सुने जा रही थी।
घर आकर मैं उन सब बातो को सोच रही हूँ जो आज ऑफिस में हुई थी। मेरे मन में सवाल ये आ रहा है की आखिर क़ामयाब होने का असल बतलब क्या है ?
बड़ा सा बंगला बड़ी सी गाड़ी और अच्छा बैंक बैलेंस।
ये सब है तो हम क़ामयाब है ऐसा कुछ। या अपने सपनो को हासिल कर लेने का मतलब क़ामयाब होना है।
कुछ लोगों के लिए शायद ये सब हासिल कर लेना ही क़ामयाबी है। पर सबके लिए नही।
सभी की लाइफ का अपना एक अलग मक़सद होता है
कुछ हासिल करने का, कुछ बनने का।
मैं जब छोटी थी तो अपने पापा के कज़िन अरविंद अंकल से बड़ी प्रभावित थी वो बिज़नेस मेन थे अंकल जब कभी घर आते थे और पापा से बिज़नेस की बाते किया करते थे तो मुझे उनकी बातो में बड़ा इंटरेस्ट आता था कॉलेज टाइम में मैंने ये डिसाइड कर लिया था की मुझे बिज़नेस फील्ड में ही जाना है। मैंने बी. कॉम, एम. कॉम और फिर एम.बीए किया। और फिर वक्त था अपने लक्ष्य की और आगे बढ़ने का।
मैं अपना बिज़नेस स्टार्ट करने वाली थी जिसमे मुझे मेरी फैमली का पूरा सपोर्ट था पर अचानक कुछ ऐसे हालत बने की जो मैं चाहती थी वो हो ना सका।
पापा की तबियत खराब हो गई थी ये वो वक्त था जब मेरे अपनो को मेरे साथ की जरूरत थी अगर मैं इस वक्त अपना बिज़नेस स्टार्ट करती तो मुझे अपने बिजनेज़ पर फोकस करना पड़ता जोकि मैं अभी कर नही सकती थी इसलिए अपने काम को शुरू करने से पहले ही रोक देना मैंने ठीक समझा।
मैंने और माँ ने मिलकर पापा का ख्याल रखा उन्हें ठीक होने में थोड़ा ज्यादा समय लग गया। इसी बीच मैंने भी जॉब की लिए एप्लाय कर दिया और मुझे एक अच्छी पोस्ट पर जॉब मिल गई। अभी फाइनेंशियल
कन्डीशन ऐसी नही थी कि मैं कोई अच्छा बिज़नेस शुरू कर सकूँ। इसलिए मैंने जॉब करना ही बेहतर समझा।
मुझे इस कम्पनी को जॉइन किये दो साल हो गये है शुरुआत में जरूर थोड़ा बुरा लगा क्योंकि मैं कुछ और करना चाहती थी कुछ और बनना चाहती थी मेरा मकसद कुछ और था लेकिन धीरे- धीरे मुझे यहाँ अच्छा लगने लगा। ऐसा बहुत कुछ है जो मैंने यहाँ आकर सीखा, मुझे सबके साथ काम करना अच्छा लगने लगा है। मैं खुश हूँ।
एक अच्छी पोस्ट , अच्छी सैलरी, अच्छे कलीग्स और इस सब से ज्यादा ये की मैं खुश हूँ।
 मेरा रास्ता भले ही बदल गया पर इसका मतलब ये नही के मैं क़ामयाब नही।
सब कुछ हासिल कर हम क़ामयाब हो ये जरूरी नही
जरूरी ये की जो हमने पाया हम उससे खुश है या नही। बदले रास्तो पर चलकर भी अगर हम खुश है तो हम क़ामयाब है।


फ़िक्र



मैंने कोशिश की पर फिर भी में लेट हो ही गई। रोज कोई न कोई काम ऐसा आ ही जाता है जिसकी वजह से मुझे ऑफिस से निकलने में देरी हो ही जाती है।
और शाम के वक्त ट्राफिक भी कोई कम नही रहता इसलिए फिर घर पहुँचने में समय ज्यादा लग जाता है और फिर घर पहुँच कर मुझे अरनव के बिन पूछे सवालो का उत्तर देना होता है।
अभी भी यही होगा वो सोफे पर अपनी गोद में लेपटॉप लिए बैठे होंगे और बार- बार घड़ी की सुई की ओर देखे जा रहे होंगे। घर पहुँचकर मैंने दरवाजा खोला
अरनव अपना लेपटॉप लिए ही बैठे थे शायद कोई बहुत जरूरी काम कर रहे है इसलिए तो उन्हें पता ही नही चला के मैं आ गई। मैं धीमे पैर से अपने कमरे की ओर जाने लगी तभी अरनव ने कहा तुम्हारे तेज कदमो की आवाज से मेरे काम में कोई खलल नही पड़ेगा इसलिए इतने धीमे चलकर जाने की जरूरत नही है निष्ठा। मैंने मुड़कर अरनव की ओर देखा और धीरे से मुस्करा दी। अरनव ने झूठी नाराज़गी दिखाते हुए मेरी तरफ देखा और फिर नजरे , अपने लेपटॉप की ओर कर ली। डिनर के वक्त आज भी अरनव ने मुझसे लेट हो जाने की वजह नही पूछी पर मैं फिर भी बताने लगी। ये काम आ गया था फिर वो काम आ गया था ट्रेफिक इतना ज्यादा था की मैं क्या बताऊ
फिर भोला सा चहरा कर मैंने कहा ऐसे तो फिर देरी हो ही जाती है न घर आने में।
जी मैडम आप सही कह रही है अरनव ने हँसते हुए कहा। अरनव कभी भी नाराज नही होते है हाँ बस कभी कभार थोड़ा गुस्सा हो जाते है मेरे देर से आने पर वो भी कुछ देर के लिए।
अरनव को ऑफिस बहुत कम ही जाना पड़ता है वो घर ही लैपटॉप पर अपना सारा काम कर लेते है।
लेकिन मेरा काम ऐसा नही है मुझे तो रोज़ ऑफिस जाना ही रहता है अरनव को मेरे जॉब करने से कोई प्रॉब्लम नही है बस जब कभी मैं ज्यादा लेट हो जाती हूँ तो वो थोड़ा गुस्सा हो जाते है उन्हें मेरी फिक्र कुछ ज्यादा ही रहती है। इसलिए अगर थोड़ी देर हो जाये आने में तो पहले तो उन्हें मेरी फिक्र होने लगती है और बाद में थोड़ा सा गुस्सा भी आने लगता है जोकि ज्यादातर सबके साथ होता ही है।
पर एक बार मुझे गुस्सा आ गया था हुआ ये था की ऑफिस से तो में जल्दी निकल गई थी पर रास्ते में मुझे मेरी फ़्रेंड मिल गई और जब दो दोस्त मिलते है तो बातें तो बहुत सारी होती ही है बस मैं अरनव को बताना भूल गई के मुझे आने में जरा देर हो जायेगी और मेरे मोबाइल की बैटरी भी लो हो गई थी इसलिए जब अरनव ने मुझे कॉल किया तो वो लगा ही नही।
मेरे घर पहुँचने पर अरनव मुझ पर थोड़े नाराज हुए तो मुझे भी गुस्सा आ गया और गुस्से में मैंने भी एक दो बातें कह दी।
अभी घर में बिल्कुल वैसी ही शांति थी जैसी किसी युद्ध के बाद होती है डिनर टेबल पर भी खामोशी छाई हुई थी न अरनव कुछ बोल रहे थे और न ही मैं।
मुझे मन ही मन बुरा लग रहा था खाना खाने का मन भी नही कर रहा था मैंने अरनव की तरफ देखा और अपनी इस लड़ाई को खत्म करते हुए मैंने उन्हें सॉरी कह दिया इट्स ओके कहते हुए अरनव ने मेरी प्लेट की ओर इशारा करते हुए मुझे खाना खाने के लिए कहा। वो नाराज भले ही है पर उन्हें अभी भी मेरी फिक्र है। अरनव बहुत ही अच्छे हसबैंड है।
इस सन्डे अरनव को अपने ऑफिस के ही काम से शहर से बाहर जाना पड़ा खैर अरनव शाम तक वापस आ जायेंगे पर मुझे ये एक दिन इतना बड़ा लग रहा है जैसे ये एक दिन चार दिन के बराबर हो गया हो। घर पर अकेले रहना कितना मुश्किल होता है। आज मुझे पता चल रहा है की अरनव को भी कितना अकेलापन महसूस होता होगा। आज अरनव की नही बल्कि मेरी नजरे घड़ी की सुई पर है की कब शाम के 6-7 बजे और अरनव घर आयें। मैंने तो डिनर की तैयारी भी अभी से कर ली। आज सब कुछ मैंने अरनव की पसंद का ही बनाया है शाम हो ही गई है बस अरनव का इंतजार कर रही हूँ। उनका इंतजार करते
मेरी नजरे कभी घड़ी की ओर जा रही थी तो कभी दरवाजे की ओर ऐसा करते मुझे 7 से 9 बज गये पर अरनव अभी तक नही आये। मैंने अरनव को एक दो बार कॉल भी किया पर नेटवर्क प्रॉब्लम की वजह से उन्हें कॉल नही लग पाया।
घड़ी में 11.30 बज रहे थे मुझे अब थोड़ी बेचैनी भी हो रही थी और साथ में फिक्र भी। कुछ पता नही है की इस वक्त वो कहाँ होंगे मेरे दिमाग में न जाने कितने ख्याल आने लगे अब तो मुझे गुस्सा भी आ रहा था वो गुस्सा जिसमे किसी के लिए फिक्र होती है। पर इंतजार करने के अलावा मेरे पास कोई ऑप्शन नही है। करीब दस मिनिट बाद डोरबेल बजी अरनव घर आ गये और काफी खुश नजर आ रहे थे पर मैं गुस्से में थी क्या हुआ तुम ठीक हो अरनव के इतना कहते ही मैंने उनपर गुस्सा करना शुरू कर दिया मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रही हूँ कितनी फिक्र हो रही थी मुझे। इसके बाद मैंने बहुत कुछ कहा अरनव सब सुनते रहे और बाद में हँसने लगे मुझे निकलने में देर हो गयी थी और फिर ट्रेफिक ऐसे में तो लेट हो ही जाते है ना निष्ठु।अरनव की बात सुनकर मुझे हँसी आ गई क्योंकि ऐसे तो मैं अरनव से कहती हूँ आज वो मुझे कह रहे है।फिर अरनव ने बहुत प्यार से मुझसे कहा जब हमारा अपना कोई समय पर घर नही आता तो हमे चिंता होने ही लगती है तुम्हे मेरी वैसे ही फिक्र हो रही थी जैसे मुझे तुम्हारी होती है। और पता है ये फिक्र क्यों होती है क्योंकि हम एक दूसरे से बहुत प्यार करते है हम जिससे जितना ज्यादा प्यार करते है हमे उसकी परवाह भी उतनी ज्यादा होती है।
अरनव को मेरी फिक्र रहती है ये तो मुझे पता था पर फिक्र का असल एहसास मुझे आज हुआ।




इत्तेफ़ाक






 कम्प्यूटर के सामने बैठे हुए मैं कीबोर्ड पर अपनी उंगलियो को ऐसे चलाये जा रहा था  जैसे की रेस के मैदान में कोई घोड़ा दौड़े जा रहा हो तभी पीछे से आवाज आई तेजस सर बॉस बुला रहे है आपको, ये हमारे ऑफिस के पियून संजू की आवाज थी। ओके मैंने कहा। फिर मैं उठकर अपने बॉस के केबिन में गया
बॉस ने कहा की मनीष को अभी वापस आने में और वक्त लगेगा इसलिए अब तुम्हे जाना होगा पुणे। पुणे
सुनकर मुझे कोई खुशी नही हुई।
मुझे रात को ही पुणे के लिए निकलना था इसलिए मैं ऑफिस से जल्दी घर आ गया अपना सामान पैक किया और रात की ट्रेन से रवाना हो गया। सफर भले ही रात का था पर मुझे नींद नही आ रही थी। आती भी कैसे इन सात सालो में मैंने कभी वहाँ का जिक्र तक नही किया सोच लिया था कभी वापस नही जाऊंगा पर आज सात साल बाद फिर पुणे जा रहा हूँ। ये ट्रेन भले ही अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रही हो पर मुझे ऐसा लगा रहा है जैसे की ये खीचकर मुझे पीछे ले जा रही है मेरे अतीत की ओर। फिक्र सी हो रही है की कहीं ऐसा न होकि वहाँ पहुँचकर वो तेजस मिल जाये जिसे छोड़ आया था मैं हमेशा के लिए। मनीष का न आना और उसके बदले मेरा पुणे जाना एक इत्तेफ़ाक सा लग रहा है।
अगले दिन मैं पुणे पहुँच गया गाड़ी से नीचे पैर रखते ही ऐसा लगा जैसे पिछली जिन्दगी में कदम रख दिया हो। वो तो इस मोबाइल की रिंग ने मुझे वापस मेरे वर्तमान में ला दिया। मैंने कॉल रिसीव किया मेरे कलीग्स का कॉल था उसने मुझे होटेल का नाम बताया जहाँ मुझे ठहरना था। मैं होटेल पहुँचा कुछ वक्त रेस्ट किया और टाइम हो गया था उस काम का जिसके लिये में यहां आया हूँ दरसल मैं यहाँ एक शक्स से मिलने आया हूँ जिनका आर्टिकल इस सन्डे हमारे न्यूज़ पेपर में आने वाला है। पूरे एक घन्टे चले इंटरव्यू   में मेरा आखरी सवाल ये था की आपकी जिंदगी बदली कैसे? उनका जवाब था एक इत्तेफ़ाक से, कुछ इत्तेफ़ाक ऐसे होते है जो ज़िन्दगी बदल देते है।
मैं इंटरव्यू के बाद वापस अपने कमरे में आ गया कुछ देर चुपचाप बैठा रहा। उस शक्स का वो जवाब सच ही तो है इत्तेफ़ाक से वाकई ज़िन्दगियाँ बदल जाया करती है।
मेरी ज़िन्दगी भी तो बदल गई थी। उस वक्त मैं पुणे के ही एक कॉलेज में पढ़ाई कर रहा था। मैं पुणे से नही था मैं बस यहां पढ़ने के लिए आया था। तब मैं स्मार्ट तेजस नही था एक बहुत ही सिम्पल सा लड़का था जो ये जानता था की मैं सिर्फ यहां पढ़ने के लिये आया हूँ इसलिए मेरा पूरा फोकस मेरी पढ़ाई पर था। मेरा एक दोस्त था जिसे अलग - अलग तरह की बुक्स पढ़ना बडा पसन्द था वो मुझे भी हमेशा कहता रहता था की यार तु भी बुक्स पढ़ा कर कोई एक बुक पढ़कर देख तो। मैं हमेशा हाँ , हाँ , कहकर बात को टाल दिया करता। जिस जगह पर मेरा कॉलेज था उसके पास ही एक छोटा सा मार्केट था और उसके आगे जाकर ही मेरा बस स्टॉप था। मैं रोज़ वहीं से निकलकर अपने कॉलेज जाता और वहीं से होकर बस स्टॉप तक जाता। एक दिन कॉलेज से लौटते वक्त मेरी नजर बुक शॉप पर पड़ी नजाने क्यों उस दिन मेरे कदम अपने आप ही उस ओर मुड़ गये वैसे मुझे किसी अच्छे राइटर के बारे में पता तो नही था फिर भी मैंने दो चार
बुक्स देखी और उनमे से एक बुक लेली।
अगले दिन थोड़ा परेशान सा मैं वापस उसी शॉप पर पहुँचा मैंने शॉप वाले अंकल से कुछ पूछा जिसके जवाब में उन्होंने न कहा। मैं शॉप से वापस लौटकर जाने लगा तभी किसी ने मुझे मेरे नाम से पुकारा तेजस
मैं हैरान होकर पलटा तो सामने एक लड़की खड़ी थी वाइट चूड़ीदार सलवार पर प्रिंटेड ब्लैक कुर्ता पहने कानो में बालियां और लंबे खुले बाल वो मुझे देखकर बोली तुम ही तेजस हो तेजस शर्मा। मैंने झट से हाँ कहा फिर मेरी बुक दिखाते हुए उसने मुझसे कहा ये तुम्हारी ही बुक है बड़े केयरलेस हो तुम अपनी बुक ही शॉप पर छोड़ गये थे इसमे तुम्हारा आई डी कार्ड भी है। हाँ मैं इसे ही देखने यहां शॉप पर आया था मैंने उससे कहा। अच्छा वैसे तो मैं ये बुक कल ही शॉप वाले अंकल को देने वाली थी पर फिर मैंने सोचा की मैं खुद ही तुम्हे ये बुक वापस कर दूंगुनी और ये समझा भी दूंगी के अपने किसी भी सामान को ऐसे लापरवाही से छोड़ते नही है बल्कि सम्हाल कर रखते है।
उसने बड़े इतराते हुए मुझसे कहा। हुआ ये था की जब मैं बुक खरीदने आया था तब मेरे हाथ में मेरी कोर्स बुक थी जिसमें मेरा कॉलेज आई डी कार्ड भी रखा था जोकि मैं गलती से यहां भूल गया। और इत्तेफ़ाक से ये इस लड़की के हाथ में आ गई। शुक्रिया बुक लौटाने के लिए मैंने उससे कहा, बस शुक्रिया वो बोली फिर थोड़ा सा मुस्कुराई और जाने लगी। मुझे लगा के हाँ सही बात है सिर्फ शुक्रिया से काम नही चलेगा सुनिये मैंने उसे रोका अगर आपको ठीक लगे तो हम शाम को यहाँ मिल सकते है सिर्फ एक कॉफ़ी मेरी तरफ से ऐसे शुक्रिया चलेगा। वो दो पल रुककर सोचने लगी और फिर पलको को झपकाते हुए उसने ओके कहा। शाम को हम मिले उसी बुक शॉप के सामने, कॉफी शॉप भी वहीं पास ही था हम दोनो वहाँ जाकर बैठ गये मैंने कॉफ़ी ऑडर कर दी और फिर अपनी सफाई देना शुरू कर दिया वो मोर्निंग में मैं कॉलेज के लिए लेट हो रहा था और उसके बाद शाम को ही मैं फ्री हो पता हूँ इसलिए मैंने आपसे शाम का कहा। उसने एक समझदार व्यक्ति की तरह एक्सप्रेशन देते हुए मेरी बात सुनी और कुछ नही कहा। हर रोज़ से वो शाम ज़रा अलग थी धीरे- धीरे बाते करते हमने ढेर सारी बाते कर ली थी।
तुम पुणे से ही हो ,नही
तो बाहर से आये हो, हाँ
बुक्स पढ़ना पसन्द है ,आप को पसन्द है ,हाँ मुझे तो अच्छा लगता है , हाँ मुझे भी बस यही था जो मैंने झूठ बोला था बाकी सब सच कहा।
इतनी देर बात की पर मैंने उससे उसका नाम तक नही पूछा। फिर उसी ने मुझसे कहा अजीब हो तुम मैं इतनी देर से तुमसे बात कर रही हूँ और तुमने अभी तक मुझसे मेरा नाम भी नही जाना ठीक है मैं खुद ही बता देती हूँ बरखा। मेरा नाम बरखा है। उस दिन हमारी थोड़ी सी दोस्ती हो गई थी। इसके बाद हम ऐसे ही हर कभी मिलने लगे कभी मैं उसका उस बुक शॉप के पास इंतजार करता तो कभी वो मेरा इंतजार करती। मैंने अभी तक किसी लड़की से दोस्ती नही की थी बरखा ही वो पहली लड़की थी जो मेरी दोस्त बनी।अब मेरी पढ़ाई तो पूरी हो गई थी पर मेरा मन वापस जाने का नही था इसलिए मैं यहीं रुककर जॉब करने लगा।बरखा और मैं अब रोज़ ही मिलते थे लाइफ बदलने लगी थी मेरी। इस सिम्पल से लड़के का दिल उस तेज चंट सी लड़की बरखा लिए धड़कने लगा था। बरखा मेरी ज़िन्दगी में इस कदर शामिल हो गई थी जैसे पानी में चीनी जो उसमें घुलकर उसे मीठा कर देती है और नजर भी नही आती जबकि वो उसमे होती है। बरखा भी मेरी ज़िन्दगी की चीनी है। मैं और बरखा आजकल ऐसी दुनियाँ में थे जहाँ हम दोनो थे और हमारा प्यार था हम तो अपने भविष्य के लिए सपने भी संजोने लगे थे। तब हमे खबर नही थी के हमारे सारे सपने काँच के जैसे निकलेंगे जो ज़मी पर गिरते ही टुकड़ो में बदल जायेंगे। बरखा के पिता हमारे रिश्ते से नाखुश थे उन्होंने अपने तीखे शब्दो में साफ कह दिया था की मैं उनकी बेटी के लायक नही उस दिन उन्होंने अपने कड़वे शब्दो के प्रहार से मेरे मन और मस्तिष्क दोनो को ही घायल कर दिया। उन्होंने तो बरखा का रिश्ता भी तय कर दिया था उस दिन शादी से पहले बरखा आखरी बार मुझसे मिलने आई थी एक आखरी कॉफी साथ पीने कुछ बोल नही रही थी बस खामोश थी और जब मैंने उससे पूछा की क्या मैं वाकई तुम्हारे लायक नही वो चुप रही, बरखा के पिता की बातो से इतना दुख नही पहुँचा था जितना बरखा की चुप्पी से पहुँचा।
जाते वक्त उसकी आँखो में आँसू थे वो रुकी पलट कर
मेरे पास आई और बोली कितने केयरलेस हो अपना दिल खो बैठें सम्हाल कर रखना चाहिए था ना, अब मैं कैसे वापस करूँ। और बस वो चली गई।
मैं उसी दिन ये शहर छोड़कर चला गया कभी न लौट के आने के लिये। उसकी शादी किससे हुई वो कहाँ है पुणे में है भी के नही मुझे कुछ नही पता। मैं अपने कल में ऐसा खोया के कुछ पता ही नही चला समय का, शाम होने को है मेरा मन मुझे बार - बार उस ओर खींच रहा है जहाँ मैं नही जाना चाहता मैं  कोशिश कर रहा हूँ खुद को रोकने की पर रोक नही पा रहा। काफी कोशिश के बाद भी मैं खुद को नही रोक सका और आ पहुँचा वहीं उस बुक शॉप के सामने मैं शॉप के नजदीक नही गया दूर से ही खड़ा होकर उस जगह को देख रहा हूँ जहाँ बरखा पहली बार मेरा इंतजार कर रही थी। वहाँ अचानक कोई नजर आया शाम हो जाने की वजह से मुझे चहरा साफ नजर नही आ रहा इसलिए मैं थोड़ा आगे बढ़ा लंबे खुले बाल कानो में बालियाँ  बरखा जैसी कोई नजर आई। मुझे अपनी आँखो पर यकीन नही हुआ अपनी आँखो को मसलकर मैंने दुबारा देखा मुझे अभी भी वही दिख रही है वो चलकर मेरे करीब आई मैंने पास से उसे देखा ये बरखा ही तो है उसे देख मेरी आँखें थम सी गई और साँस ठहर सी गई कितने केयरलेस हो किसी अपने को छोड़कर ऐसे चले जाते है क्या, सात सालो से रोज यहां आकर तुम्हारा इंतजार करती हूँ पता था मुझे के जरूर आओगे पर इतनी देर से आओगे ये नही पता था रोती हुई बरखा ये कहकर मुझसे ऐसे गले लगी की जैसे अब कभी वो मुझसे जुदा नही होगी हमेशा मेरे साथ रहेगी हमेशा मेरे पास रहेगी। अपने पिता के कहने पर बरखा शादी के लिए राज़ी तो हो गई थी पर उसने शादी की नही थी सात सालो तक वो मेरा इंतजार करती रही। हम दोनो अभी उसी कॉफी शॉप में है बरखा मेरे सामने ही बैठी है पर मुझे अभी भी सब सपने जैसा लग रहा है लेकिन ये सच है मेरी ज़िन्दगी का खूबसूरत सच।




नये शहर में





नन्दिता दीदी ने तो कहा था की स्टेशन से कुल तीस मिनिट ही लगेंगे कॉलोनी पहुँचने में पर ये टैक्सी वाले भईया ने तो पूरा एक घन्टा लगा दिया यहाँ से वहाँ , वहाँ से यहाँ ये गली वो सड़क और न जाने कितने मोड़
 ऐसा लग रहा है जैसे टैक्सी वाले भईया हर एक रास्ते से मेरी पहचान करा रहे हो , जाने कितना गोल घुमाये जा रहे है। मैंने भी सोच लिए था की ये चाहे मीटर का कितना भी चार्ज
बताये मैं इन्हें एक पैसा भी ज्यादा नही देने वाली हूँ।
पूरे एक घन्टे बाद टैक्सी वाले भईया ने मुझे पुरानी कॉलोनी पहुँचा ही दिया। और जोकि मैंने पहले से तय कर रखा था वैसा ही किया टैक्सी का किराया भईया ने तो ज्यादा ही बताया पर स्टेशन से यहाँ तक आने का जो असल किराया बनता है मैंने उतने ही पैसे दिये।
ये टैक्सी वाले भी ना कोई अजनबी जो इस शहर में नया हो उसे यहाँ के रास्तो के बारे में कुछ मालूम न हो अगर वो टैक्सी मैं बैठ जाये तो ये पूरा शहर घुमाए बिना उसे सीधा उसकी मंजिल तक पहुँचा दे ऐसा तो
हो ही नही सकता। खुद से ही बाते करते में नन्दिता दीदी के दिये पते पर पहुँची और बेल बजाई। बहुत ही धीरे से दरवाजा खोलते हुए एक आंटी सामने नजर आई उम्र 55- 60 के बीच लगभग होगी। मैंने उन्हें नन्दिता दीदी के बारे में बताया आंटी ने इसके बाद दो चार सवाल किये और फिर  मुझे ऊपर वाले कमरे की चाबी दे दी। चलो इस अंजान शहर में नन्दिता दीदी की मदद से रहने का इंतजाम तो हो गया थोड़ी राहत की साँस लेते हुए मैंने कहा।
अगले दिन सुबह जल्दी उठकर मैं कमरे को ठीक करने में लग गई मैंने कमरे का सामान अपने हिसाब से
सेट कर लिया। मुझे कुछ सामान मार्केट से भी लाना था इसलिए आंटी से मैंने आस- पास के मार्केट के बारे में पता किया और मार्केट के लिए निकल गई घर से बाहर निकलते वक्त मेरी नजर पड़ोस के घर की बाल्कनी पर पड़ी जहाँ एक अंकल कुर्सी पर बैठे हुए हाथ में अखबार लिए उसे पढ़ने की वो कोशिश कर रहे थे जोकि शायद वो करना ही नही चाहते क्योंकि उनकी निगाहे तो सामने टिकी हुई थी। रास्ते से कौन निकल रहा है सामने वाले घर से किसकी आवाज आ रही है और ये बच्चे यहाँ क्यों खेल रहे है उनके चहरे पर बार- बार बदलते भाव को देखकर यही लग रहा था की अंकल जी के माइंड में कुछ इस तरह की ही बाते चल रही है
ऐसा नही था कि मैंने ही अंकल जी को देखा उनकी नजर सब से होते हुए मुझ पर भी आ पड़ी और उन्होंने जैसे मुझे घूर कर देखा ऐसा लग रहा था जैसे की मैं कोई पुरानी दुश्मन हूँ जिससे वो आज भी अपना हिसाब बराबर करने के लिए बैठे हो। खैर मुझे तो मार्केट जाना था तो वक्त और न जाया करते हुए मैं मार्केट चली गई।
कानो में सुनाई पड़ता गायत्री मन्त्र मुझे ये बता रहा था की सुबह हो गई आंटी रोज़ सुबह गायत्री मन्त्र सुनती है। मैंने अपने लिए बढ़िया सा नाश्ता और लंच बनाया
और तैयार हो गई आज मेरा ऑफिस में पहला दिन है।
वैसे काम तो ठीक है बस मेरे कलीग्स ही थोड़े अजीब है या फिर वो मुझे ऐसे लग रहे है।
दो सप्ताह होने जा रहे है मुझे अभी तक यहाँ के लोगों
का व्यवहार समझ ही नही आया। कोई अपनापन नही सबका रवैया मेरे लिये बहुत बेरुखा सा लगता है मुझे। इस कॉलोनी का नाम जो पुरानी कॉलोनी है वो यहाँ के लोगों पर बिल्कुल फिट बैठता है ज्यादातर लोग पुराने ख्यालो वाले ही तो है। जब भी बाहर निकलती हूँ मुझे देखकर न जाने क्या आपस में  बुदबुदाने लगते है बड़ी चीड़ होती है मुझे। और यहां ऑफिस में भी यही हाल मुझे यहां के बारे में ज्यादा कुछ पता है नही कभी बातो के बीच कुछ पूछ लेती हूँ तो मेरे कलीग्स ऐसे करते जैसे दूसरे शहर से नही आई हूँ मानो दूसरे ग्रह से आई हूँ जो कुछ नही जानती। और फिर मुझ पर हँसने लगते है।
यहाँ सब कुछ मेरे शहर से अलग है। सब पराया सा लगता है कुछ अपना नही है यही सोच - सोचकर काफी देर तक मुझे नींद नही आई पर फिर ऑफिस का ख्याल आया तो अपनी पलकों को मुंध कर मैं सो गई।
रविवार का दिन था कॉलोनी के कुछ लोग साथ में सुबह की सैर पर जा रहे थे मेरी मकान मालकिन आंटी ने मुझे भी चलने को कहा हालांकि उनके साथ वाली अंटियों का मन नही था पर मैं फिर भी चली गई।
बातो बातो में जब पड़ोस की नीलू आंटी ने मुरब्बे की बात की तो मैं भी बीच में बोल पड़ी की मेरी माँ के हाथ का मुरब्बा सबसे बेस्ट है आंटी ने अपनी भौहों को ऊपर उचकाते हुए कहा अच्छा खिलाना तब देखेंगे कितना अच्छा है। नीलू आंटी को मुरब्बा वाकई अच्छा लगा और शायद अब मैं भी थोड़ी अच्छी लगी। ऐसे ही जब पड़ोस के अंकल जी वही बाल्कनी वाले उनको किसी पॉलिसी के बारे में जानकारी चाहिए थी तब मैंने सारा कुछ सर्च किया और उन्हें बताया।
वैसे वो कुछ खास खुश तो नही हुए पर अब वो मुझे उतने नाराज से नही लगते जितना पहले लगते थे। अब मैं कभी किसी की हेल्प करती तो कोई कभी मेरी हेल्प कर देता।
धीरे- धीरे ऑफिस में भी मेरी सबके साथ बनने लगी थी दो चार अच्छे फ़्रेंड्स भी बन गये।इधर कॉलोनी वालो को मेरी और मुझे उनकी आदत अब होने लगी आहिस्ता- आहिस्ता ही सही पर मैंने सबके मन मैं थोड़ी सी जगह पा भी ली और अपने मन में सबके लिए जगह बना भी ली। सच कहुँ तो पहले मुझे भी यहाँ के लोग कुछ खास अच्छे नही लगते थे पर अब अच्छे लगने लगे है। पहले सुबह - सुबह गायत्री मन्त्र सुनना यानी नींद का खराब होना पर अब वही सुनकर मुझे बड़ा सुकुन सा लगता है। पहले यहाँ के लोगों को देख जो चीड़ वाला भाव था वो अब मुस्कुराहट में बदल गया है।इस नये शहर में कहीं दबा छुपा सा मुझे अपना शहर दिखने लगा है इन अनजाने की भीड़ में कुछ अपनो का साथ अब मिलने लगा है।











माँ की ख्वाईश



बचपन में मुझे जब कोई खिलौना या कोई भी सामान चाहिये होता था तो मुझे कभी कहना नही पड़ता था मेरे बिन कहे माँ समझ जाती थी की मुझे क्या चाहिए
और किसी भी तरह वो मेरे लिए वो खिलौना ला ही देती थी। वो मेरी किसी भी ख्वाईश को अधूरा नही रहने देती थी।और आज भी कुछ बदला नही है वैसा ही है। 
शुभम ने नई कार ली क्योंकि वो मेरा बेस्ट फ़्रेंड है तो वो सबसे पहले अपनी कार लेकर मुझे दिखाने लाया है वो जब भी कुछ लेता है तो मुझे ही पहले बताता है और इसलिए आज भी वो शोरूम से सीधा मेरे घर ही आ पहुँचा। मुझे तो उसकी गाड़ी बढ़िया लगी। माँ और पापा ने भी शुभम को उसकी नई कार के लिए बधाई दी। शुभम के जाने के बाद मैं अपना लेपटॉप लेकर बैठ गया माँ अपने काम में व्यस्त हो गई और पापा अखबार लेकर बैठ गये। माँ हर संडे मेरे बालो में बादाम का तेल लगाकर मेरे सिर की मालिश करती है और अभी जैसे ही वो अपने काम से फ्री हुई वो बादाम तेल लेकर मेरे बालो में लगाने लगी माँ को मेरी फिक्र है वो कहती है इतना काम करता है लेपटॉप लिए बैठा रहता है तनाव तो होता ही होगा सर में। मैं सिर की मालिश कर दूँगी तो थोड़ा आराम महसूस होगा। वैसे बचपन से ही माँ ऐसे ही मेरे सिर की मालिश करती रही है माँ का हाथ सर पर आते ही जो सुकुन मुझे तब मिलता था आज भी वैसा ही सुकुन मिलता है माँ जब होले होले बालो को सहलाती है तब मुझे तो धीरे- धीरे ठंडी ठंडी नींद सी आती। मेरी पलको में नींद के झोंके
समा रहे थे की माँ ने कहा चिंकू मैं सोच रही हूँ के तु भी एक चार पहिये वाली गाड़ी ले ही ले। तुझे कभी - कभी दूर भी जाना पड़ता है मीटिंग के लिए , तो आसानी रहेगी जाने में। मैं समझ गया था की माँ ऐसा क्यों कह रही है हाँ माँ सोचेंगे इस बारे में , मैंने माँ से कहा और  माँ की गोद में सर रखकर सो गया।
आज ऑफिस में बैठे हुए मैं यही सोच रहा था की माँ ने कैसे मेरी आँखो में पनपती एक नई ख्वाईश को झट से जान लिया। वो हमेशा मेरे मन में आने वाली कोई भी बात मुझसे पहले ही जान लेती है। और उनकी कोशिश यही रहती है की मेरी हर ख्वाईश पूरी हो।
मैं ये सोच रहा हूँ की ख्वाईशें तो माँ की भी रही होंगी
और उनमे से शायद ही कोई पूरी हो पाई हो।
पापा की सरकारी नौकरी भले ही थी पर वो किसी बडी पोस्ट पर नही थे उनकी सैलरी उतनी ही थी जितने में घर खर्च चल जाता था और कुछ बचत के पैसे भी बच जाते थे। इसलिए माँ बहुत बचत करके ही चलती थी उन्होंने कभी अपनी इक्छा या ख्वाईशों के बारे में सोचा ही नही माँ और पापा हमेशा मेरी ख्वाईशो को पूरा करने में लगे रहे।
बचपन की ही बात है माँ जब मुझे स्कूल छोड़ने जाया
करती थी। तब रास्ते में एक बड़ा ही सुन्दर घर दिखाई देता था। माँ की नजर एक बार उस घर पर जरूर ही पड़ती थी और उसके बगीचे का झूला माँ को बड़ा अच्छा लगता था शायद उनके मन में यही रहा होगा  की उनका भी एक ऐसा घर होता जिसमे ऐसा बगीचा होता और जिसमे ऐसा झूला होता ये एक भोली सी ख्वाइश थी। उस वक्त माँ का चहरा उस बच्चे जैसा लगता था जोकि खिलौनों की शॉप के बाहर खड़ा किसी खिलौने को देख खुश तो होता है पर वो जानता है की वो खिलौना उसे नही मिल सकता। माँ के मन में भी उस घर को देख कोई ख्वाइश पनपी तो थी पर वो जानती थी की उस वक्त उसका पूरा हो पाना मुश्किल था। वैसे माँ ने कभी अपनी किसी भी तरह की कोई ख्वाईश ज़ाहिर की ही नही।
 मेरे दिमाग में एक बात आ रही है मैंने एक दो जगह कॉल किया कुछ सर्च किया 15 दिन बाद जाकर मेरा काम हो पाया।
शुभम ने घर के बाहर आकर हॉर्न बजाना शुरू कर दिया मैं माँ और पापा को लेकर बाहर पहुँचा हम गाड़ी में बैठे और गाड़ी इस रास्ते उस रास्ते से होते हुए वहाँ पहुँची जहाँ हमे जाना था हम गाड़ी से बाहर आये पापा को तो सब पहले ही बता था ही। मैंने माँ का हाथ थामा और सामने वाला बड़ा गेट खोल कर उन्हें अंदर ले गया माँ का हाथ थामे हुए ही मैंने उन्हें पूरा घर दिखाया माँ मुझसे पूछे जा रही थी की हम यहाँ क्यों आये है ये किसका घर है पर मैं उन्हें कुछ नही बता रहा था और आखरी में बारी आई बाहर के गार्डन की और वहाँ के झूले की मैंने माँ को उस झूले पर बैठाया और उन्हें झुलाने लगा माँ हसने लगी और कहने लगी मैंने तुझे बचपन में खूब झूला झूलाया है और अब तु मुझे झूला रहा है बहुत बड़ा हो गया है। है ना। मैंने कहा हाँ और अब आप रोज इस झूले पर बैठना मैं ऐसे ही पीछे खड़े हो आपको झूला दूँगा।
माँ आश्चर्य भरी नजरो से मुझे देखने लगी। मैं माँ के सामने आकर बैठा उनका हाथ अपने दोनो हाथो की हथेलियों के बीच लिया और उनसे कहा माँ ये तुम्हारा अपना घर है तुलसी निवास।
माँ भावुक हो गयीं उनकी आँखें भर आयीं।
मैं ये तो नही जानता की मैं अपनी कोशिश में कितना सफल हुआ ये घर पूरा वैसा तो नही है पर उसके जैसा जरूर है।
आज चार महीने होने जा रहे है इस घर में आये मैं ये तो नही जानता की माँ कितनी खुश है या नही है पर मैं जब भी उन्हें गार्डन के इस झूले पर बैठा देखता हूँ तो मुझे जरूर खुशी मिलती है। मैं कोशिश करता रहूँगा माँ की उन ख्वाईशों को पूरा करने की जो मन में कहीं दबी सी रह गई। जो शायद अब उन्हें भी याद नही।






थोड़ी सी समझ




भीड़ को पीछे छोड़ते हुए अपने लक्ष्य को सामने रखते हुए बड़ी जद्दो जेहद के बाद आखिर मैं ट्रेन में चढ़ ही गया। यहां एक सेकेंड की भी देरी का मतलब पूरा एक घन्टे का इंतजार शुक्र है की मुझे ये इंतजार नही करना पड़ा। मेरी मंजिल यानी अगला स्टेशन आ गया और मैं गाड़ी से उतर गया। मैं कुछ कदम ही आगे बढ़ा की मेरी नजर प्लेटफॉर्म की लम्बी वाली कुर्सी जो यात्रियो के लिये है उस पर बैठे एक यात्री पर पड़ी बगल में एक सफर बैग रखा हुआ हाथ में एक बुक लिए ये नीलिमा है मेरे कदम ठहर गये मन किया नजर भर कर देख लुँ। नीलिमा ने भी मुझे देख लिया और कुछ पल उसकी नजरे मुझ पर ठहरी भी पर फिर उसने अपनी नजरे फेर ली ठीक वैसे ही जैसे हम किसी अजनबी को देख नजरे फेर लेते है। तब मेरे कदम चल पड़े मैं स्टेशन के बाहर आया टेक्सी ली और होटेल पहुँचा। आठ महीने बाद नीलिमा को देखा उसकी उड़ती जुल्फें अभी भी उसकी आँखों पर पड़ रहीं थी ठीक वैसे जब मैं पहली बार नीलिमा से उसके घर मिलने गया था वो मेरे सामने बैठी थी और तब बार- बार उसकी जुल्फे उसकी आँखो पर पड़ रही थी।और वो अपने हाथो की उंगलियो से अपनी जुल्फों को कान के पीछे किये जा रही थी हम दोनो की अरेंज मैरेज थी शुरुआत के दिनों की बात है नीलिमा ज्यादा बाते तो नही करती थी पर एक बार उसने मुझसे कहा था कि रिश्ते आपसी समझ और विश्वास पर टिके होते है तब मैंने मुस्कुराते हुए कहा था हाँ बिल्कुल सही है। हम दोनो एक दूसरे के साथ से खुश थे बहुत ही कम वक्त में नीलिमा ने मुझसे जुड़ी सारी बाते जान ली थी मेरी आदते मेरी पसन्द सब कुछ। हम दोनो के बीच प्यार तो था बस समझ की कमी रह गई।
शादी को तीन साल होने जा रहे थे कुछ दिनों से नीलिमा ऑफिस से लेट आ रही थी उसने मुझे बता दिया था के अभी ऑफिस में काम ज्यादा है इसलिए सभी एक्सट्रा टाइम दे रहे है। ऑफिस के इस एक्सट्रा टाइम की वजह से नीलिमा मुझे टाइम नही दे पा रही थी। कुछ दिनो तक तो सब ठीक रहा पर बाद में मुझे जरा बुरा लगने लगा और ऐसा होता ही है जब हमारा अपना हमे वक्त नही दे पाता तो हमारे मन में उसके लिये नाराजगी आ ही जाती है। और कुछ वक्त से तो ऐसा लग रहा है जैसे नीलिमा कुछ बदल सी गई है उसे मेरी कोई फिक्र ही नही है पहले तो उसे मेरी छोटी से छोटी बात का ख्याल रहता था लेकिन आजकल उसे
मेरी कही बाते भी याद नही रहती। हम दोनो के बीच  दूरियां अपनी जगह बना रही थी।
मेरे नाराजगी भरे मन ने न जाने कितनी बाते सोचली
और ये मान लिया की नीलिमा मुझसे दूर हो रही है।
शायद उसके मन में मेरे लिए प्यार कम हो गया है।
और आखिर एक दिन मेरे मन की नाराजगी बाहर आ ही गयी नीलिमा और मैं साथ में डिनर कर रहे थे अभी मौसम जरा ठीक नही चल रहा था तो इसी को लेकर नीलिमा मुझसे कहने लगी
ये मौसम का भी कोई भरोसा नही है कभी भी बदलता रहता है , मौसम का क्या कहे आजकल तो अपने भी बहुत जल्द बदल जाते है उन्ही को समझना मुश्किल है फिर ये तो मौसम है मैंने नीलिमा से रूखे अंदाज़ में कहा। वो हैरान निगाहों से मुझे देखने लगी क्या हुआ कोई बात है नीलिमा ने मुझसे पूछा।
बात हो भी तो क्या मैंने फिर तीखे अंदाज़ में कहा। इसके बाद मेरे अंदर भरा गुस्सा बाहर आ गया मैं लगातार अपने कड़वे शब्दो का प्रहार नीलिमा पर करता गया नीलिमा ने कुछ नही कहा वो सुनती रही
ये रात मेरे और नीलिमा के लिए बड़ी ही मुश्किल रही
न उसे नींद आई और ना मुझे। सुबह जब हॉल में आया तो नीलिमा अपना बेग लिए नजर आई
हम दोनो ने ही अपने रिश्ते में समझदारी नही दिखाई
कुछ वक्त अलग रहेंगे तो शायद ये मालूम हो जाये कहाँ गलती हुई कुछ दिन का सफर है मंजिल मेरी अपना घर है नीलिमा ने कहा और वो चली गई।
मुझे इस बात का एहसास हो गया है की गलती हम दोनो से ही हुई नीलिमा अपने ऑफिस वर्क में  इतना ज्यादा व्यस्त हो गई के उसे हमारे बीच आती दूरियां नजर ही नही आई और मैं ना समझ भी नही समझ पाया की नीलिमा अगर अभी बिज़ी है अगर वो मुझे वक्त नही दे पा रही तो इसका मतलब ये नही की उसे मेरी परवाह नही है।
सब कुछ याद कर मेरा मन बेचैन हो रहा है नीलिमा ने जाते वक्त कहा था मंजिल उसकी अपना घर है बस ये याद आते ही मैं बिना मीटिंग अटेंड किये झट से दौड़ पड़ा टेक्सी वाले भैया को जल्दी स्टेशन चलने को कहा साँसे तेज - तेज चल रही है नीलिमा क्या अभी भी वहीं होगी मेरे दौड़ते कदम सीधे वही रुके प्लेटफॉर्म के पास। नीलिमा यही है शायद वो मेरा इंतजार कर रही थी मैंने नीलिमा को सॉरी कहा और वो रोते हुए मेरे गले लग गई।
हर एक रिश्ता परफेक्ट है चाहिए तो बस थोड़ी सी समझ।😊







गुलाल भाग - 2




खनक और मेरी मुलाकात कुछ इस तरह हुई थी कि हर बार की तरह इस बार भी मेरे दोस्तो ने होली पार्टी रखी थी जोकि होली के एक दिन पहले ही थी। हमने पार्टी के लिए अमृत गार्डन बुक किया और पार्टी का सारा अरेंजमेंट हमने मिलकर किया। रात को अपने बेड पर लेटे- लेटे मैं यही प्लानिंग कर रहा था की इस बार अपने दोस्तो को ऐसा रंग लगाऊंगा ऐसा रंग लगाऊंगा की कई दिनों तक नही छुटेगा।
सुबह हुई और रोज की तरह आज भी मैं लेट ही उठा मैंने जल्दी - जल्दी नाश्ता किया तैयार हुआ और अपनी गाड़ी लेकर पार्टी के लिए निकल गया। पार्टी का टाइम 11 बजे से था और मैं 11.30 बजे गार्डन के बाहर आ पहुँचा। अपनी गाड़ी पार्क की और फिर मन ही मन ये सोचते हुए की आज तो सबको अच्छे से रंग देना है मैं गेट पर पहुँचा और ढेर सारा गुलाल मुझ पर आ गिरा मैं पूरा गुलाल में हो गया ये काम और किसका होगा मेरे चतुर दोस्तो के अलावा , ये सोचकर मैंने जैसे ही सामने देखा तो सॉरी सॉरी कहती हुई एक लड़की सामने नजर आई भोली सी सूरत चंचल सी आँखे अपनी पलको को झपका - झपका कर वो मुझे सॉरी कह रही थी। उसने मुझसे कहा की उसने गलती से मुझ पर गुलाल डाल दिया। मैं तो कुछ बोल ही नही पाया उसने अपनी सफाई दी फिर से सॉरी कहा और चली गई और मैं उसे देखता ही रह गया। 
इस वक्त मेरे दिल में धीरे से  कुछ हुआ पर ये क्या हुआ वो मुझे समझ नही आया। मैं आगे बढ़ा और अपने दोस्तो के पास पहुँचा , ये हम से पहले किसने रंग दिया तुझे अजित ने मेरी ओर देखते हुए कहा मैंने अपने फिसलते हुए शब्दो के साथ जावब देते हुए कहा कुछ नही अंदर आते वक्त किसी ने मुझ पर गलती से ये गुलाल डाल दिया। मैंने उन्हें नही बताया की एक लड़की आकर मुझे रंग गई।
इसके बाद मैं अपने दोस्तो के पास जा बैठा एक तरफ होली के गाने दूसरी तरफ मस्ती का मूड फिर क्या था सबने जमकर मस्ती की और खूब होली खेली। लेकिन
होली खेलते वक्त मुझे झलक नजर आई गुलाल वाली लड़की की। वो मेरे सामने ही थी दरसल यहां एक नही दो ग्रुप्स की पार्टी चल रही थी ये गार्डन बड़ा है जिसके आधे हिस्से में हम और दूसरे आधे हिस्से में दूसरा ग्रुप
था और वो गुलाल वाली लड़की उसी ग्रुप में थी मैं सामने की ओर थोड़ा आगे बढ़ा। खनक चले उसकी फ़्रेंड ने उससे कहा और वो चली गई।
एक सप्ताह बाद मुझे खनक दोबारा नजर आई उसके होस्टल के बाहर। और ये कोई इत्तफाक नही था मैंने पता लगा लिया था की खनक यहाँ रहती है। मैं करता भी क्या मेरे मन ने मुझे दौड़ाया और खनक का पता लगाय। अब तो दो तीन बार मेरा उस रास्ते से गुजरना हो गया था और खनक ने ना सिर्फ मुझे देख लिया था बल्कि पहचान भी लिए था। और एक दिन ऐसा हुआ की मैं होस्टल के पास वाली शॉप के बाहर खड़ा था आज मैं वाकई कुछ काम से ही यहाँ आया था लेकिन खनक ने मुझे देख लिया और वो गुस्से में मेरी ओर चली आ रही थी मैं समझ गया था की आज तो गये ये जरूर मेरी खबर लेने वाली है खनक मेरे पास आई , मैं थोड़ा घबरा तो रहा था पर फिर हिम्मत करते हुए मैंने कहा कॉफी पीते हुए बात करे यहाँ पास में कॉफी शॉप है खनक ने हाँ कह दिया और हम सब कॉफी शॉप पहुँच गये हम सब यानी मैं, खनक और उसकी फ़्रेंड्स। खनक कुछ बोल नही रही थी मैंने अपनी बात को ज्यादा बड़ा न करते हुए सिर्फ इतना कहा
क्या हम दोस्त बन सकते है।
मैं खनक के लिए अंजान था इसलिए उसने इस बारे में सोचने के लिए थोड़ा समय लिया लेकिन वो मान गई। और मैं प्यार की पहली सीढ़ी जोकि दोस्ती होती है चढ़ गया था। अब
कभी कभार हम दोस्त के तौर पर मिल लिया करते थे। लेकिन बहुत कम ही मिला करते थे क्योंकि अभी हमारा ये दोस्ती का रिश्ता जरा कच्चा था। पर वक्त के साथ धीरे- धीरे ये दोस्ती का रिश्ता गहराया।
और हम अच्छे दोस्त बन गये , भले ही वक्त ज्यादा लगा हो पर मैंने खनक का भरोसा हासिल कर लिया था कहीं न कहीं खनक अब मुझे अपना समझने लगी थी
एक दोस्त के रूप में ही सही मैंने उसके दिल में जगह पा ली थी और मेरे दिल में तो उसके लिए बेपनाह प्यार था ही , वो प्यार जिसे मैं जाहिर नही कर  सकता था
खनक ने उस दिन साफ कह दिया था सिर्फ दोस्त बन सकते है। इसलिये कुछ कहने का मतलब दोस्ती भी खो देना था। तो बस मैं अकेले ही प्यार की कश्ती में सवार था। जैसे- जैसे वक्त बीतता जा रहा था मेरा प्यार और गहराता जा रहा था मैं चोरी - चोरी खनक को प्यार से देखता और अकेले मुस्कुराता , यही सोचता के जिस तरह उसे देख कर मेरा दिल जोर जोर से धक धक करता है काश उसका दिल कभी मेरे लिए ऐसे धड़के। इसी तरह ही एक साल पूरा होने जा रहा था आज खनक से मुलाकात हुई उसका  बर्ताव कुछ बदला हुआ सा लग रहा था। ऐसा लगा जैसे की खनक के दिल में कुछ - कुछ तो हुआ। ऐसे खनक को देख मेरे मन में उम्मीद जागी। वैसे खनक ने पूरी कोशिश की अपने दिल की बात को अनसुना करने की पर कब तक दिल की न सुनती।
आखिरकार ये दोस्ती की गाड़ी प्यार की पटरी चढ़ ही गयी मैंने भी देर न करते हुए कर दिया इज़हार और खनक को भी हो गया प्यार। मुझ पर तो खनक के प्यार का रंग चढ़ ही गया था तो मैंने भी इस होली उसे अपने गुलाल से रंग दिया
वैसे मेरे प्यार का रंग भी उस पर नजर आ रहा था  और ये जो प्यार का रंग अगर लग जाता है तो कोई और रंग चढ़ ही नही पाता। खुश था मैं इस बात से के खनक मेरे साथ है।
लेकिन वो साथ हमारा आखरी था जो खनक को अच्छी तरह मालूम था वो यहाँ इस शहर सिर्फ अपनी इंटर्नशिप के लिए आई थी जोकि पूरी हो गई थी उसके अपनी फैमली से किये कुछ वादे और कुछ सपने थे जो
की उसे पूरे करने थे इसलिए उसका वापस जाना तय था ये बात खनक जानती थी इसिलये तो खनक अपने दिल की बात को अनसुना किये जा रही थी लेकिन नही कर सकी। खनक मुझसे ये नही कहकर गई के मैं उसका इंतजार करूँ शायद उसका वापस लौटना मुश्किल है पर जाते वक्त अपनी याद के तौर पर वो मुझे थोड़ा गुलाल दे गई ताकि जब कभी ये मेरे हाथ आये तो वो मुझे जरूर याद आये वो खुद को मेरी यादो में महफ़ूज कर गई।




एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE