आईने के सामने खड़ा होकर मैं अपने बाल सवार रहा था बेटा चलें और कितना टाइम लगेगा मम्मी ने आवाज देकर कहा।
हां बस आ रहा हूं ऐसा कहकर मैं अपने रूम से बाहर आ गया
हम सब गाड़ी में बैठे और गाड़ी चल पड़ी। मैं जा तो रहा हूं पर मन में बड़ी हलचल सी हो रही है और शायद थोड़ा नर्वस भी
हो रहा हूं जैसे कि कोई इंटरव्यू के लिए जा रहा हूं। अभी मेरे दिमाग में चाहे जो भी चल रहा हो पर मम्मी तो बड़ी खुश नजर आ रही हैं। वैसे भी मां को रिश्तेदारों समाज के लोगो से
मिलना - जुलना बड़ा पसंद हैं। उन्हें सबसे मिलकर बड़ी खुशी होती है। मम्मी को जितना सबसे मिलना पसंद है मुझे उतना ही अच्छा नहीं लगता मैं बहुत कम ही रिलेटिव्स के फंक्शन
अटेंड करता हूं। मैं तो बस अपने दोस्तो के साथ ही खुश रहता हूं। वैसे मैं ही नहीं मेरी उम्र के सभी लोग रिलेटिव्स से कम अपने दोस्तो से मिलना ज्यादा पसंद करते है।
अभी घड़ी में दस बज रहे है कुछ देर में हम वहां पहुंच जाएंगे।
गाड़ी अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ती रही और फाइनली हम पहुंच गए। हम लोग गाड़ी से बाहर आए और फिर मेहमानों का स्वागत जैसे होता है बस वैसे ही बड़े ही खुशी के साथ हमारा स्वागत हुआ। हमें हॉल में बैठाया गया। अंकल जी और आंटी भी हमारे साथ हॉल में बैठे हुए थे। अभी नजारा कुछ ऐसा था कि सब बेवजह बार - बार मुस्कुरा रहे थे और आपस में धीरे - धीरे बात किए जा रहे थे और हां लोगो के बीच इशारे भी चल रहे थे। दस मिनट तक यही सब चलता रहा। और फिर अंकल जी ने आवाज लगाते हुए कहा अरे भाई चाय ले आओ। सबकी नजरें सामने थी।
दो लड़कियां एक साथ हॉल में आई एक ने साड़ी पहन रखी थी और दूसरी ने पटियाला सलवार सूट। सूटवाली लडकी के हाथ में ही चाय की ट्रे थी और जो साथ में साड़ी वाली लड़की थी वो उसकी बड़ी बहन थी। सबको चाय देकर वो दोनों भी सामने सोफे पर बैठ गई। मम्मी ने पूर्णिमा से कुछ दो एक सवाल पूछे और बात हुई कि लड़का लड़की को आपस में बात करने देते है उन्हें जो भी एक दूसरे से पूछना है पूछ लेगें।
फिर मैं और पूर्णिमा हॉल की विंडो के पास आकर खड़े हो गए
हम दोनों ही खामोश खड़े हुए विंडो से बाहर देख रहे थे।
बड़ा अजीब लगता है ना कि अचानक ये कहा जाए कि आपको एक अजनबी जिसे आपने कभी देखा ही नहीं उससे बात करने को थोड़ा समय दे दिया जाए और लाईफ का एक बड़ा फैसला लेने को कहा जाए। हम साथ तो खड़े थे पर बात नहीं कर रहे थे क्या बात करें कैसे शुरुआत करें समझ नहीं आ रहा था। वैसे आम तौर पर ये होता है कि लड़का लड़की को एक दूसरे के बारे में बहुत कुछ जानना होता है पूर्णिमा का तो पता नहीं पर मुझे ज्यादा कुछ नहीं जानना इसलिए भी मैं खामोश खड़ा था। तो बस
न पूर्णिमा कुछ कह रही थी और न ही मैं। कुछ देर तक चुप रहने के बाद पूर्णिमा ने ही बात करना शुरू किया। आप कुछ पूछना चाहते है तो पूछ सकते है पूर्णिमा ने कहा तो मैनें भी उत्तर देते हुए कहा नहीं, अगर तुम्हे कुछ पूछना है तो पूछ सकती हो मुझे तो कुछ नहीं जानना। पूर्णिमा मेरे इस तरह के जवाब को सुनकर थोड़ा कनफ्यूज हो गई थी शायद उसके मन में दो तरह के विचार चल रहे होंगे कि अगर मैं कुछ जानना नहीं चाहता तो हो सकता है मैं शादी के लिए तैयार न हूं , हो सकता है मेरी लाईफ में कोई और हो। या फिर ये की मैं सवाल जवाब करना जरूरी समझता ही नहीं। पूर्णिमा के चहरे को देख साफ समझ आ रहा था कि मुझे लेकर उसके मन में सवाल चल रहे है लेकिन कुछ पल रुककर फिर
पूर्णिमा ने मुझसे सिर्फ मेरे ड्रीम के बारे में पूछा मैं अपनी लाईफ में अपने भविष्य में क्या चाहता हूं क्या करना चाहता हूं। वो बस इतना जानना चाहती थी। वैसे कुछ देर पहले पूर्णिमा के पिता ने भी मुझसे यही सवाल किया था कि मेरी
फ्यूचर प्लानिंग क्या हैं। मैने उन्हे तो अपना जवाब बड़ा सोच समझकर दिया था लेकिन ऐसा होता है न कि जब हम किसी अनजान से मिलते है तो पहले थोड़ा सा शर्माए से रहते है लेकिन थोड़ी बात करने पर हमारी झिझक जरा कम हो जाती है। मैं पूर्णिमा को थोड़ा तो समझ ही गया था और अपने दोस्तो को तंग करने में मैं बड़ा ही महिर हूं। इसलिए सोचा
थोड़ा सा परेशान पूर्णिमा को भी कर लेता हूं।
तो अब बारी थी जवाब देने की, मैनें पूर्णिमा से कहा ड्रीम्स तो मेरे कई सारे है जोकि सभी पूरे नहीं हो सकते इसलिए मैनें अपने भविष्य के लिए कुछ नहीं सोचा है। पूर्णिमा ने हैरानी वाली निगाहों से मेरी ओर देखा। मैने कहा तुम कुछ और पूछना चाहती हो तो बेझिझक पूछ सकती हो। पूर्णिमा ने कहा सभी अपने फ्यूचर के लिए कुछ न कुछ सोचकर रखते है और उसे सिक्योर करके चलना चाहते हैं क्या
वाकई में आपने फ्यूचर को लेकर कुछ नहीं सोचा हैं मैनें कहा जी नहीं। पूर्णिमा थोड़ी सी उलझन में पड़ गई थी। इसके बाद हम दोनों के बीच रिश्तों , आदतों और समझ को लेकर थोड़ी और बातें हुई जिसमें हम दोनों की सोच एक दूसरे के विपरित थी जहां तक मुझे समझ आया पूर्णिमा गम्भीर और भविष्य के लिए फिक्रमंद है और मैने जिस तरह से उसे अपने जवाब दिए है उससे में बेपरवाह नजर आता हूं। इसलिए
पूर्णिमा के चहरे पर आते भाव को देख में समझ गया था कि उसके मन में क्या चल रहा होगा और हमारी मुलाकात भी अब खत्म होने वाली थी इसलिए उसकी उलझन को कम करने के लिए मैने उससे कहा कभी ऐसा होता है कि किसी के बारे में सब कुछ जानकर भी हम उसे नहीं जान पाते और कभी सिर्फ एक छोटी सी बात से सब कुछ जान लेते हैं इसलिए मैनें कुछ पूछना जरूरी नहीं समझा। और लाईफ प्लानिंग करके नहीं जियी जा सकती। पूर्णिमा से इतना कहकर में वापस सबके बीच आकर बैठ गया और कुछ देर बाद हम पूर्णिमा के घर से निकल गए और अपने घर आ पहुंचे। बस ऐसी थी ये पहली मुलाकात।

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