परेशान



परेशान जो देखन मैं चला परेशान मिला हर कोई जो दिल खोजा आपना मुझसा परेशान न कोई।
भागते - दौड़ते मैं ऑफिस तो पहुँच गई पर मैं थोड़ा
लेट हो ही गई जैसे ही मैंने ऑफिस में इंटर किया बॉस सामने ही खड़े नजर आये। और मोबाइल में बजते अलार्म से मेरी नींद खुल गई अच्छा हुआ की ये सपना था पर अगर मैं अभी जल्दी से रेडी नही हुई तो ये सच भी हो सकता है। आज माँ को न जाने क्या हो गया है
मैं उठ भी गई तैयार भी हो गई पर माँ ने अभी तक मुझसे कोई बात ही नही की। मैं नाश्ता करते हुए बाल्कनी की ओर ही देख रही हूँ जहाँ माँ कुर्सी पर बैठे हुए दोनो हाथो में सलाइयां लिए कुछ बुने जा रही है।
वो बार - बार पहले कुछ बुन रही है और फिर उसे उधेड़ रही है। मुझसे रहा नही गया और मैंने जाकर पूछ ही लिया के ये आप क्या कर रही है दरसल माँ एक स्वेटर बना रही है और उसमे एक सुन्दर सी डिजाइन बनाना चाह रही है जोकि अभी उनसे नही बन पा रही है इसलिए वो बार- बार स्वेटर बुन रही है और फिर उसे उधेड़ रही है इस तरह माँ परेशान हो रहीं है। मेरा ऑफिस जाने का टाइम हो गया था। इसलिए मैं ऑफिस के लिए निकल गई और बिना लेट हुए टाइम पर पहुँच भी गई। लंच ब्रेक में रुचि से बात हुई रुचि थोड़ी परेशान है वो होम लोन लेना चाह रही है पर होम लोन मिलने में उसे थोड़ी मुश्किले हो रहीं है। शाम को झूले पर अकेले बैठे हुए मैं माँ और रुचि के बारे में ही सोच रही हूँ। माँ परेशान है क्योंकि उनसे
वो डिजाइन नही बन पा रही जो वो चाहती है और रुचि इसलिए परेशान है क्योंकि उसे लोन नही मिल पा रहा। जब मैंने ध्यान से अपने और उन लोगों के बारे में सोचा जो मुझसे जुड़े हुए है या मैं जिन्हें जानती हूँ तो मुझे यही समझ आया की हम सब किसी न किसी वजह से परेशान है हम बड़ी से लेकर हर छोटी बात पर परेशान हो जाते है ये कही न कहीं हमारी आदत सी होती जा रही है। हम वजह बेवजह परेशान होने लगते है। जरा थोड़ी दिक्कत आई नही के हम परेशानी महसूस करने लगते है फिर उस परेशानी के बारे में सोच- सोचकर हम उसको बड़ा बना लेते है और फिर ये मान लेते है की इस दुनिया में हम ही है जो सबसे ज्यादा परेशान है। पर हम परेशान क्यों है? जब हम कुछ चाहते है या जिस तरह से चाहते है वो अगर वैसे न हो पाये या हमे न मिल पाये तो हम परेशान होने लगते है जैसे की माँ।
वो एक सिम्पल स्वेटर आसानी से बुन सकती है लेकिन वो उसमे डिजाइन चाहती है रुचि को एक अच्छे फ्लेट के लिए लोन चाहिये, अनु को 90% मार्क्स चाहिए, विवेक का कहना है ये जॉब अच्छी नही है वो जॉब ज्यादा अच्छी है, ये बाइक ठीक नही है वो वाली बाइक ज्यादा अच्छी है।
सभी की यही सोच है हम इसलिये परेशान नही है की हमारे पास कुछ नही है हम इसलिए परेशान है की हमारे पास जो है हमे उससे अच्छा चाहिए।
और जब वो अच्छा मिल जाएगा तब हम उससे भी अच्छा पाने के लिए परेशान रहेंगे।
हमे बेहतर , बेहतर और उससे और बेहतर चाहिए।




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