थोड़ी सी धूप




सप्ताह खत्म होने वाला होता है और सन्डे आने वाला होता है लोग पहले ही इस दिन के लिए कई तरह की प्लानिंग
कर लेते है कि सन्डे को क्या - क्या काम करने है कहाँ जाना है। मेरी भी प्लांनिग हो गई थी जोकि सबसे जरा अलग थी। रोज सुबह जल्दी ऑफिस के लिए निकल जाना और शाम को घर आना मेरा रोज का यही रूटीन है। ऑफिस जाते वक्त जब रास्ते में कुछ लोग मोर्निंग वॉक करते, पार्क में बैठे धूप लेते नजर आते है तो उन्हें देखकर मेरा मन भी धीरे से बुदबुदाते हुए कहता है इस दिसम्बर की ठंड में थोड़ी सी धूप हमें भी मिल जाती। पर क्या करें ऑफिस भी समय पर पहुंचना है नहीं तो मैं यहीं कुछ देर रुककर सुबह की इस धूप का आनंद लेता बस यही सोचकर हर रोज ऑफिस चला जाता हूं। ठंड के मौसम में हर एक व्यक्ति कुछ देर धूप में जरूर बैठना चाहता है क्योंकि इस वक़्त हमें धूप बड़ी सुखदाई सी लगती है जो ठंड से हमें कुछ देर राहत देती है।
वैसे अभी मेरी संडे यानी कल की प्लनिंग हो गई है तो बस मैं कल का ही इंतजार कर रहा हूं।
मैं सवेरे सात बजे जल्दी उठ गया नहीं तो मैं कभी भी संडे को दस बजे से पहले नहीं उठता हूं अपनी पसंदीदा ब्लैक जैकेट पहन कानों में इयर फोन लगा गाना चलाकर मोबाइल को पॉकेट में डाल मैं निकल गया मॉर्निंग वॉक पर। पहले तो मैं बड़े ही खुश होकर वॉक करता रहा लेकिन थोड़ी ही देर मैं मेरी सांस फूलने लगी और मैं रुक गया मेरे पीछे एक अंकल भी थे जो ये कहते हुए आगे निकल गए कि आजकल के जवानों की
हडि्डयां कुछ ज्यादा ही कमज़ोर हैं। वैसे ये एक ताने जैसा ही था पर मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया मैं आगे बढ़ा और पार्क मैं वो जो लोहे की लंबी वाली चेयर होती है उस पर जाकर बैठ गया। ठंड के मौसम में सुबह की गुनगुनी धूप बड़ी ही अच्छी लग रही थी। मुझ पर पड़ रही सूरज की हर एक किरण मुझे
बड़ा सुकून सा दे रही थी ठीक वैसे ही जैसे गरमियों में हम धूप से परेशान होकर एक घने से पेड़ के नीचे बैठ जाते है और उस पेड़ की छाया में आकर हमारे मन को राहत सी मिलती है।
ऐसे ही अभी मेरे मन को सुबह की इस प्यारी सी धूप से राहत मिल रही है।
मैं बड़ी ही शांति के साथ दस मिनट तक बैठा रहा फिर मुझे ज़ोर- जोर से हसने की आवाज सुनाई दी मैंने अपनी नजरों को घुमाते हुए थोड़ा तिरछा होकर पीछे देखा तो सामने सीनियर सिटीजन का ग्रुप था जोकि एक साथ जोर - जोर से हसे जा रहे थे उनके बीच मज़ाक और एक - दूसरे की टांग खिचाई का माहौल बना हुआ था जिसका मज़ा में भी यही से
बैठे - बैठे ले रहा था और साथ ही ये सोच रहा था कि कब आखरी बार मैं अपने दोस्तों के साथ ऐसे ही सच में खूब हसा था क्योंकि जब से मैं यहां आकर जॉब कर रहा हूं तब से झूठी
हसी ही हस रहा हूं। वक़्त के साथ लाईफ भी बदल जाती है जैसे की ये धूप जो गरमियों में अपने अलग ही तेवर दिखाती है और सर्दियों में बदल जाती है। मैं अभी भी आराम से धूप में बैठा हुआ था लेकिन दो आंटियां मेरे पास आकर खड़ी हो गईं।
उन्होंने कुछ कहा नहीं पर मैं अपनी जगह से उठ गया क्योंकि
भले ही उन्होंने कहा नहीं पर वो चाहती यही थी के मैं चेयर से हट जाऊं। सच कहूं अभी मेरा मन तो नहीं था वहां से उठ जाने का पर मैं करता भी क्या।
मैं अपने फ्लैट पर वापस आ गया। गरमा - गरम अदरक वाली चाय बनाकर एक घुट ही पी के ख्याल आया कि आज छत पर चलते है अपने हाथ में चाय का बड़ा सा कप लिए मैं छत पर पहुंचा और बाउंड्री वॉल के पास जाकर खड़ा हो गया। यहां भी धूप अच्छी ही आ रही थी और सूरज मुझे थोड़ा पास लग रहा था। मैं चाय का एक - एक घुट लिए जा रहा था और
दूर - दूर तक अपनी नजरें दौड़ाए जा रहा था वैसे कुछ खास नहीं सिर्फ बिल्डिंग्स ही नजर आ रही थी मुझे। लेकिन मैं फिर
भी अपनी नजरों को दूरबीन बना ऐसे देख रहा था जैसे कि मुझे कुछ पता लगाना हो।
कोई दिखाई दिया किसी ने कहा और मैं तेजी से पीछे की ओर मुड़ गया ये सेकेंड फ्लोर वाले चाचाजी थे।
जी चाचाजी मैने कहा। हमें सब पता है लड़के छत पर आते ही क्यों है चाचाजी ने कहा मैने फौरन अपनी सफाई देते हुए कहा जी नहीं चाचाजी मै तो बस यहां थोड़ी धूप लेने आया था। अरे धूप तो एक बहाना है हम भी कभी तुम्हारी उम्र के थे सब जानते है चाचाजी ने मजाकिया अंदाज में कहा। मैने कुछ नहीं कहा बस चुपचाप खड़ा रहा। चाचाजी आये तो तुलसी के पौधे को पानी देने पर मुझे समझाकर चले गए के वो भी कभी हमारी उम्र के थे। वैसे मेरे कप कि चाय भी खत्म हो गई थी और धूप में भी मैं काफी देर रह लिया था इसलिए अब सोचा कि वापस घर में चलते है मैंने इतना सोचा की छत के दरवाजे से फर्स्ट फ्लोर वाली आंटी आते नजर आयी। जब हम ये सोचते है कि किसी से हमारा सामना कम ही हो तो अक्सर ऐसा होता है कि हम उनसे जरूर टकरा जाते है। ऐसा ही कुछ अभी है फर्स्ट फ्लोर वाली आंटी मुझे देखकर चिड जाती है मुझे क्या मुझ जैसे जितने भी लड़के है जो बाहर से आए है अकेले रह रहे है उन्हें वो बिल्कुल भी अच्छा नहीं समझती है।तो बस जब कभी मैं दिख जाता हूं तो पहले तो वो मुझे ऐसे देखती है जैसे कि कहना चाह रही हो कि मेरे सामने आ कैसे गए और फिर धीरे - धीरे कुछ बूद - बुदाने लगती है। अभी भी आंटी आईं तो कपड़ों कि बाल्टी लेकर है मतलब कपड़े सुखाने आईं है पर मुझे देखकर आंटी ने बुदबुदाना शुरू कर दिया। वैसे तो मैं जाने ही वाला था पर आंटी को देखकर मैं समझ गया कि इतनी ही धूप काफी है क्योंकि अगर कुछ और देर यहां रुका तो कुछ ज्यादा ही मिल जाएंगी। जो कि मैं नहीं चाहता।

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