हिन्दी




मेरी हिन्दी शुरु से ही बढ़िया रही है स्कूल में एक यही
विषय तो था जो मुझे बहुत पसन्द था। मास्टरजी जब भी हिन्दी का कोई भी पाठ शुरू करते थे तो वो हम छात्रों  को भी एक- एक कर पाठ पढ़ने को कहते और सभी छात्रों में मैं सबसे आगे रहता। और जब मास्टरजी पाठ को खुद पढ़कर हमे समझाते तो मैं बड़े ही ध्यान से सुनता। मुझे हिन्दी की कहानियां, कविताएँ , मुहावरें पढ़ना बड़ा अच्छा लगता था। मैं जब भी कोई हिन्दी की कहानी अपने मास्टर जी से सुनता था तो मेरी आँखो के सामने उसका चित्र सा बन जाता था और मुझे ऐसा लगता था जैसे की मैं अपने सामने उस पूरी कहानी को देख रहा हूँ। ऐसी कोई हिन्दी की कहानी या कविता नही होगी जो मैंने पढ़ी या सुनी हो और मुझे याद न हो। हिन्दी बढ़ी ही रोचक है जितना इसे जानोगे उतना ही इसके करीब आते जाओगे और वो तुम्हारे मन को भाती जायेगी।
हिन्दी व्याकरण के अलंकार, रस , उसके छंद ये सब पढ़ने में बढ़ी ही खुशी होती है। ऐसे कई महान कवि है जिन्होंने अलग - अलग रसो में , अलग-अलग काल में अपनी रचनायें की है जोकि प्रसिद्ध भी हुई है।
सुभद्रा कुमारी चौहान , सूरदास, तुलसीदास, मैथिलीशरण गुप्त, महादेवी वर्मा,  कबीरदास
और कई महान कवि और रचनाकार है जिन्होंने अपनी रचना के द्वारा हिन्दी को हमारे मन में बसाया है।
हिन्दी में कितना अपनापन है। शायद ये अपनापन इसलिए भी है क्योंकि ये हमारी राष्ट्रभाषा है। अपनी - अपनी भाषा से हमे लगाव ज्यादा होता ही है।
हिन्दी के प्रति मेरे लगाव ने मुझे बहुत कुछ दिया।
स्कूल में था तो कहानी कविताएँ पढ़ने का बड़ा शौक था जब कॉलेज में आया तो खुद ही कविताएँ गढ़ने लगा। मन ही मन कल्पना करता रहता और कॉपी के पन्नो को भरता रहता। ऐ चाँद तु क्यों चमकता है, क्या सब पर नजर तु रखता है। तारो को अपने पास क्यों रखता है, क्या अकेले रहने से डरता है। कुछ इस तरह
मैं लिखने लगा। अभी मैं कोई बहुत अच्छा लेखक तो नही बना था पर टूटी- फूटी कवितायें लिखने लगा था।
और यही कवितायें मैं अपने दोस्तो को सुनाता रहता।
एक दिन ऐसे ही मैं अपनी नई लिखी हुई कविता केंटीन
में बैठे हुए अपने दोस्तो को सुना रहा था कि तभी वही
पास में दांये तरफ लड़कियों के ग्रुप में से अनुराधा ने पलटकर हमारे ओर ध्यान से देखा और वापस मुड़ गई। शायद अनुराधा को मेरी कविता अच्छी लगी।
ऐसा मुझे लगा। अनुराधा मेरे ही क्लास में मेरे साथ पढ़ती थी। बस हमारे बीच कभी बातचीत नही होती थी।दरसल उस समय का ऐसा था के लड़को और लड़कियों का ग्रुप अलग ही रहता था। दोनो के बीच कोई दोस्ती नही।
इस बार के वार्षिक उत्सव में मैंने भी हिस्सा लिया एक के बाद एक सबको स्टेज पर बुलाया जा रहा था मैं भी
इंतजार कर रहा था अपने नाम के आने का। कुछ देर बाद मेरा नाम लेकर मुझे स्टेज पर बुलाया गया। मेरा उत्साह बढ़ाने के लिए मेरे दोस्तो ने मेरा नाम लेकर जोर-जोर से ताली बजाई। और फिर मैंने अपनी कविता पढ़ना शुरू किया। जितने मन से मैं कविता पढ़ रहा था उतने मन से सभी मेरी कविता को सुन भी रहे थे। मेरे आखरी लाइन पढ़ते ही सभी ने जोरो मेरे लिए ताली बजाई। तभी सामने बैठे मेरे मित्रगण में से किसी एक ने मुझसे शायरी सुनाने की दरख्वास की।
और मैंने अपने शिक्षको से स्वीकृति लेकर  उनकी  इस ख्वाईश को पूरा करते हुए एक शायरी सुना दी।
उनकी तारीफ क्या करें उनकी तारीफ के लिए तो हमारे पास शब्द ही नही है। के उनकी तारीफ क्या करें उनकी तारीफ के लिए तो हमारे पास शब्द ही नही है।
फिर सोचा के कुछ तो कह दे , फिर सोचा के कुछ तो कह दे। पर हम फिर रुक गये, पर फिर हम रुक गये ये सोचकर के उन पर तो हमारा कोई हक ही नही है।
 बस इतना कहा ही था के जोरों से तालियों की आवाज गूंज उठी। और बस तब से मैं शायरियाँ भी करने लगा। और अनुराधा वो कहीं न कहीं मेरी कवितओं और शायरियों की वजह से मेरी और आकर्षित होने लगी थी। जोकि मैं जानता था इसीलिए तो आजकल मेरी कल्पना में अनुराधा की झलक भी आने लगी थी।
और गुपछुप के आखिर हमारे बीच रिश्ता जुड़ ही गया और मैंने प्रेमरस की कवितायें भी लिख ही डाली। इसके साथ ही
मैं अपने लेखन में ही आगे बढ़ता गया।
आगे ये हुआ के अनुराधा से मेरी शादी हो गई। अब मैं अपनी हर कहानी ,कविता ,शायरी पहले अनुराधा को ही सुनाता था। वो खामोश मुझे सुनती रहती और फिर मेरे लिए ताली बजाती। अब तो मेरी लिखी किताबे बाजार में भी आने लगी थी। मेरे हिन्दी के प्रति मेरे लगाव ने मुझे लेखक बना ही दिया। इस तरह मैंने अपना सारा जीवन एक हिन्दी लेखक के रूप में जिया।
मेरी उम्र भले ही हो गई है पर मैं आज भी उतने ही मन से लिखता हूँ और अनुराधा आज भी मेरी रचना को सुन मेरी तारीफ करती है।





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