बचपन में मुझे जब कोई खिलौना या कोई भी सामान चाहिये होता था तो मुझे कभी कहना नही पड़ता था मेरे बिन कहे माँ समझ जाती थी की मुझे क्या चाहिए
और किसी भी तरह वो मेरे लिए वो खिलौना ला ही देती थी। वो मेरी किसी भी ख्वाईश को अधूरा नही रहने देती थी।और आज भी कुछ बदला नही है वैसा ही है।
शुभम ने नई कार ली क्योंकि वो मेरा बेस्ट फ़्रेंड है तो वो सबसे पहले अपनी कार लेकर मुझे दिखाने लाया है वो जब भी कुछ लेता है तो मुझे ही पहले बताता है और इसलिए आज भी वो शोरूम से सीधा मेरे घर ही आ पहुँचा। मुझे तो उसकी गाड़ी बढ़िया लगी। माँ और पापा ने भी शुभम को उसकी नई कार के लिए बधाई दी। शुभम के जाने के बाद मैं अपना लेपटॉप लेकर बैठ गया माँ अपने काम में व्यस्त हो गई और पापा अखबार लेकर बैठ गये। माँ हर संडे मेरे बालो में बादाम का तेल लगाकर मेरे सिर की मालिश करती है और अभी जैसे ही वो अपने काम से फ्री हुई वो बादाम तेल लेकर मेरे बालो में लगाने लगी माँ को मेरी फिक्र है वो कहती है इतना काम करता है लेपटॉप लिए बैठा रहता है तनाव तो होता ही होगा सर में। मैं सिर की मालिश कर दूँगी तो थोड़ा आराम महसूस होगा। वैसे बचपन से ही माँ ऐसे ही मेरे सिर की मालिश करती रही है माँ का हाथ सर पर आते ही जो सुकुन मुझे तब मिलता था आज भी वैसा ही सुकुन मिलता है माँ जब होले होले बालो को सहलाती है तब मुझे तो धीरे- धीरे ठंडी ठंडी नींद सी आती। मेरी पलको में नींद के झोंके
समा रहे थे की माँ ने कहा चिंकू मैं सोच रही हूँ के तु भी एक चार पहिये वाली गाड़ी ले ही ले। तुझे कभी - कभी दूर भी जाना पड़ता है मीटिंग के लिए , तो आसानी रहेगी जाने में। मैं समझ गया था की माँ ऐसा क्यों कह रही है हाँ माँ सोचेंगे इस बारे में , मैंने माँ से कहा और माँ की गोद में सर रखकर सो गया।
आज ऑफिस में बैठे हुए मैं यही सोच रहा था की माँ ने कैसे मेरी आँखो में पनपती एक नई ख्वाईश को झट से जान लिया। वो हमेशा मेरे मन में आने वाली कोई भी बात मुझसे पहले ही जान लेती है। और उनकी कोशिश यही रहती है की मेरी हर ख्वाईश पूरी हो।
मैं ये सोच रहा हूँ की ख्वाईशें तो माँ की भी रही होंगी
और उनमे से शायद ही कोई पूरी हो पाई हो।
पापा की सरकारी नौकरी भले ही थी पर वो किसी बडी पोस्ट पर नही थे उनकी सैलरी उतनी ही थी जितने में घर खर्च चल जाता था और कुछ बचत के पैसे भी बच जाते थे। इसलिए माँ बहुत बचत करके ही चलती थी उन्होंने कभी अपनी इक्छा या ख्वाईशों के बारे में सोचा ही नही माँ और पापा हमेशा मेरी ख्वाईशो को पूरा करने में लगे रहे।
बचपन की ही बात है माँ जब मुझे स्कूल छोड़ने जाया
करती थी। तब रास्ते में एक बड़ा ही सुन्दर घर दिखाई देता था। माँ की नजर एक बार उस घर पर जरूर ही पड़ती थी और उसके बगीचे का झूला माँ को बड़ा अच्छा लगता था शायद उनके मन में यही रहा होगा की उनका भी एक ऐसा घर होता जिसमे ऐसा बगीचा होता और जिसमे ऐसा झूला होता ये एक भोली सी ख्वाइश थी। उस वक्त माँ का चहरा उस बच्चे जैसा लगता था जोकि खिलौनों की शॉप के बाहर खड़ा किसी खिलौने को देख खुश तो होता है पर वो जानता है की वो खिलौना उसे नही मिल सकता। माँ के मन में भी उस घर को देख कोई ख्वाइश पनपी तो थी पर वो जानती थी की उस वक्त उसका पूरा हो पाना मुश्किल था। वैसे माँ ने कभी अपनी किसी भी तरह की कोई ख्वाईश ज़ाहिर की ही नही।
मेरे दिमाग में एक बात आ रही है मैंने एक दो जगह कॉल किया कुछ सर्च किया 15 दिन बाद जाकर मेरा काम हो पाया।
शुभम ने घर के बाहर आकर हॉर्न बजाना शुरू कर दिया मैं माँ और पापा को लेकर बाहर पहुँचा हम गाड़ी में बैठे और गाड़ी इस रास्ते उस रास्ते से होते हुए वहाँ पहुँची जहाँ हमे जाना था हम गाड़ी से बाहर आये पापा को तो सब पहले ही बता था ही। मैंने माँ का हाथ थामा और सामने वाला बड़ा गेट खोल कर उन्हें अंदर ले गया माँ का हाथ थामे हुए ही मैंने उन्हें पूरा घर दिखाया माँ मुझसे पूछे जा रही थी की हम यहाँ क्यों आये है ये किसका घर है पर मैं उन्हें कुछ नही बता रहा था और आखरी में बारी आई बाहर के गार्डन की और वहाँ के झूले की मैंने माँ को उस झूले पर बैठाया और उन्हें झुलाने लगा माँ हसने लगी और कहने लगी मैंने तुझे बचपन में खूब झूला झूलाया है और अब तु मुझे झूला रहा है बहुत बड़ा हो गया है। है ना। मैंने कहा हाँ और अब आप रोज इस झूले पर बैठना मैं ऐसे ही पीछे खड़े हो आपको झूला दूँगा।
माँ आश्चर्य भरी नजरो से मुझे देखने लगी। मैं माँ के सामने आकर बैठा उनका हाथ अपने दोनो हाथो की हथेलियों के बीच लिया और उनसे कहा माँ ये तुम्हारा अपना घर है तुलसी निवास।
माँ भावुक हो गयीं उनकी आँखें भर आयीं।
मैं ये तो नही जानता की मैं अपनी कोशिश में कितना सफल हुआ ये घर पूरा वैसा तो नही है पर उसके जैसा जरूर है।
आज चार महीने होने जा रहे है इस घर में आये मैं ये तो नही जानता की माँ कितनी खुश है या नही है पर मैं जब भी उन्हें गार्डन के इस झूले पर बैठा देखता हूँ तो मुझे जरूर खुशी मिलती है। मैं कोशिश करता रहूँगा माँ की उन ख्वाईशों को पूरा करने की जो मन में कहीं दबी सी रह गई। जो शायद अब उन्हें भी याद नही।
समा रहे थे की माँ ने कहा चिंकू मैं सोच रही हूँ के तु भी एक चार पहिये वाली गाड़ी ले ही ले। तुझे कभी - कभी दूर भी जाना पड़ता है मीटिंग के लिए , तो आसानी रहेगी जाने में। मैं समझ गया था की माँ ऐसा क्यों कह रही है हाँ माँ सोचेंगे इस बारे में , मैंने माँ से कहा और माँ की गोद में सर रखकर सो गया।
आज ऑफिस में बैठे हुए मैं यही सोच रहा था की माँ ने कैसे मेरी आँखो में पनपती एक नई ख्वाईश को झट से जान लिया। वो हमेशा मेरे मन में आने वाली कोई भी बात मुझसे पहले ही जान लेती है। और उनकी कोशिश यही रहती है की मेरी हर ख्वाईश पूरी हो।
मैं ये सोच रहा हूँ की ख्वाईशें तो माँ की भी रही होंगी
और उनमे से शायद ही कोई पूरी हो पाई हो।
पापा की सरकारी नौकरी भले ही थी पर वो किसी बडी पोस्ट पर नही थे उनकी सैलरी उतनी ही थी जितने में घर खर्च चल जाता था और कुछ बचत के पैसे भी बच जाते थे। इसलिए माँ बहुत बचत करके ही चलती थी उन्होंने कभी अपनी इक्छा या ख्वाईशों के बारे में सोचा ही नही माँ और पापा हमेशा मेरी ख्वाईशो को पूरा करने में लगे रहे।
बचपन की ही बात है माँ जब मुझे स्कूल छोड़ने जाया
करती थी। तब रास्ते में एक बड़ा ही सुन्दर घर दिखाई देता था। माँ की नजर एक बार उस घर पर जरूर ही पड़ती थी और उसके बगीचे का झूला माँ को बड़ा अच्छा लगता था शायद उनके मन में यही रहा होगा की उनका भी एक ऐसा घर होता जिसमे ऐसा बगीचा होता और जिसमे ऐसा झूला होता ये एक भोली सी ख्वाइश थी। उस वक्त माँ का चहरा उस बच्चे जैसा लगता था जोकि खिलौनों की शॉप के बाहर खड़ा किसी खिलौने को देख खुश तो होता है पर वो जानता है की वो खिलौना उसे नही मिल सकता। माँ के मन में भी उस घर को देख कोई ख्वाइश पनपी तो थी पर वो जानती थी की उस वक्त उसका पूरा हो पाना मुश्किल था। वैसे माँ ने कभी अपनी किसी भी तरह की कोई ख्वाईश ज़ाहिर की ही नही।
मेरे दिमाग में एक बात आ रही है मैंने एक दो जगह कॉल किया कुछ सर्च किया 15 दिन बाद जाकर मेरा काम हो पाया।
शुभम ने घर के बाहर आकर हॉर्न बजाना शुरू कर दिया मैं माँ और पापा को लेकर बाहर पहुँचा हम गाड़ी में बैठे और गाड़ी इस रास्ते उस रास्ते से होते हुए वहाँ पहुँची जहाँ हमे जाना था हम गाड़ी से बाहर आये पापा को तो सब पहले ही बता था ही। मैंने माँ का हाथ थामा और सामने वाला बड़ा गेट खोल कर उन्हें अंदर ले गया माँ का हाथ थामे हुए ही मैंने उन्हें पूरा घर दिखाया माँ मुझसे पूछे जा रही थी की हम यहाँ क्यों आये है ये किसका घर है पर मैं उन्हें कुछ नही बता रहा था और आखरी में बारी आई बाहर के गार्डन की और वहाँ के झूले की मैंने माँ को उस झूले पर बैठाया और उन्हें झुलाने लगा माँ हसने लगी और कहने लगी मैंने तुझे बचपन में खूब झूला झूलाया है और अब तु मुझे झूला रहा है बहुत बड़ा हो गया है। है ना। मैंने कहा हाँ और अब आप रोज इस झूले पर बैठना मैं ऐसे ही पीछे खड़े हो आपको झूला दूँगा।
माँ आश्चर्य भरी नजरो से मुझे देखने लगी। मैं माँ के सामने आकर बैठा उनका हाथ अपने दोनो हाथो की हथेलियों के बीच लिया और उनसे कहा माँ ये तुम्हारा अपना घर है तुलसी निवास।
माँ भावुक हो गयीं उनकी आँखें भर आयीं।
मैं ये तो नही जानता की मैं अपनी कोशिश में कितना सफल हुआ ये घर पूरा वैसा तो नही है पर उसके जैसा जरूर है।
आज चार महीने होने जा रहे है इस घर में आये मैं ये तो नही जानता की माँ कितनी खुश है या नही है पर मैं जब भी उन्हें गार्डन के इस झूले पर बैठा देखता हूँ तो मुझे जरूर खुशी मिलती है। मैं कोशिश करता रहूँगा माँ की उन ख्वाईशों को पूरा करने की जो मन में कहीं दबी सी रह गई। जो शायद अब उन्हें भी याद नही।

No comments:
Post a Comment