इत्तेफ़ाक






 कम्प्यूटर के सामने बैठे हुए मैं कीबोर्ड पर अपनी उंगलियो को ऐसे चलाये जा रहा था  जैसे की रेस के मैदान में कोई घोड़ा दौड़े जा रहा हो तभी पीछे से आवाज आई तेजस सर बॉस बुला रहे है आपको, ये हमारे ऑफिस के पियून संजू की आवाज थी। ओके मैंने कहा। फिर मैं उठकर अपने बॉस के केबिन में गया
बॉस ने कहा की मनीष को अभी वापस आने में और वक्त लगेगा इसलिए अब तुम्हे जाना होगा पुणे। पुणे
सुनकर मुझे कोई खुशी नही हुई।
मुझे रात को ही पुणे के लिए निकलना था इसलिए मैं ऑफिस से जल्दी घर आ गया अपना सामान पैक किया और रात की ट्रेन से रवाना हो गया। सफर भले ही रात का था पर मुझे नींद नही आ रही थी। आती भी कैसे इन सात सालो में मैंने कभी वहाँ का जिक्र तक नही किया सोच लिया था कभी वापस नही जाऊंगा पर आज सात साल बाद फिर पुणे जा रहा हूँ। ये ट्रेन भले ही अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रही हो पर मुझे ऐसा लगा रहा है जैसे की ये खीचकर मुझे पीछे ले जा रही है मेरे अतीत की ओर। फिक्र सी हो रही है की कहीं ऐसा न होकि वहाँ पहुँचकर वो तेजस मिल जाये जिसे छोड़ आया था मैं हमेशा के लिए। मनीष का न आना और उसके बदले मेरा पुणे जाना एक इत्तेफ़ाक सा लग रहा है।
अगले दिन मैं पुणे पहुँच गया गाड़ी से नीचे पैर रखते ही ऐसा लगा जैसे पिछली जिन्दगी में कदम रख दिया हो। वो तो इस मोबाइल की रिंग ने मुझे वापस मेरे वर्तमान में ला दिया। मैंने कॉल रिसीव किया मेरे कलीग्स का कॉल था उसने मुझे होटेल का नाम बताया जहाँ मुझे ठहरना था। मैं होटेल पहुँचा कुछ वक्त रेस्ट किया और टाइम हो गया था उस काम का जिसके लिये में यहां आया हूँ दरसल मैं यहाँ एक शक्स से मिलने आया हूँ जिनका आर्टिकल इस सन्डे हमारे न्यूज़ पेपर में आने वाला है। पूरे एक घन्टे चले इंटरव्यू   में मेरा आखरी सवाल ये था की आपकी जिंदगी बदली कैसे? उनका जवाब था एक इत्तेफ़ाक से, कुछ इत्तेफ़ाक ऐसे होते है जो ज़िन्दगी बदल देते है।
मैं इंटरव्यू के बाद वापस अपने कमरे में आ गया कुछ देर चुपचाप बैठा रहा। उस शक्स का वो जवाब सच ही तो है इत्तेफ़ाक से वाकई ज़िन्दगियाँ बदल जाया करती है।
मेरी ज़िन्दगी भी तो बदल गई थी। उस वक्त मैं पुणे के ही एक कॉलेज में पढ़ाई कर रहा था। मैं पुणे से नही था मैं बस यहां पढ़ने के लिए आया था। तब मैं स्मार्ट तेजस नही था एक बहुत ही सिम्पल सा लड़का था जो ये जानता था की मैं सिर्फ यहां पढ़ने के लिये आया हूँ इसलिए मेरा पूरा फोकस मेरी पढ़ाई पर था। मेरा एक दोस्त था जिसे अलग - अलग तरह की बुक्स पढ़ना बडा पसन्द था वो मुझे भी हमेशा कहता रहता था की यार तु भी बुक्स पढ़ा कर कोई एक बुक पढ़कर देख तो। मैं हमेशा हाँ , हाँ , कहकर बात को टाल दिया करता। जिस जगह पर मेरा कॉलेज था उसके पास ही एक छोटा सा मार्केट था और उसके आगे जाकर ही मेरा बस स्टॉप था। मैं रोज़ वहीं से निकलकर अपने कॉलेज जाता और वहीं से होकर बस स्टॉप तक जाता। एक दिन कॉलेज से लौटते वक्त मेरी नजर बुक शॉप पर पड़ी नजाने क्यों उस दिन मेरे कदम अपने आप ही उस ओर मुड़ गये वैसे मुझे किसी अच्छे राइटर के बारे में पता तो नही था फिर भी मैंने दो चार
बुक्स देखी और उनमे से एक बुक लेली।
अगले दिन थोड़ा परेशान सा मैं वापस उसी शॉप पर पहुँचा मैंने शॉप वाले अंकल से कुछ पूछा जिसके जवाब में उन्होंने न कहा। मैं शॉप से वापस लौटकर जाने लगा तभी किसी ने मुझे मेरे नाम से पुकारा तेजस
मैं हैरान होकर पलटा तो सामने एक लड़की खड़ी थी वाइट चूड़ीदार सलवार पर प्रिंटेड ब्लैक कुर्ता पहने कानो में बालियां और लंबे खुले बाल वो मुझे देखकर बोली तुम ही तेजस हो तेजस शर्मा। मैंने झट से हाँ कहा फिर मेरी बुक दिखाते हुए उसने मुझसे कहा ये तुम्हारी ही बुक है बड़े केयरलेस हो तुम अपनी बुक ही शॉप पर छोड़ गये थे इसमे तुम्हारा आई डी कार्ड भी है। हाँ मैं इसे ही देखने यहां शॉप पर आया था मैंने उससे कहा। अच्छा वैसे तो मैं ये बुक कल ही शॉप वाले अंकल को देने वाली थी पर फिर मैंने सोचा की मैं खुद ही तुम्हे ये बुक वापस कर दूंगुनी और ये समझा भी दूंगी के अपने किसी भी सामान को ऐसे लापरवाही से छोड़ते नही है बल्कि सम्हाल कर रखते है।
उसने बड़े इतराते हुए मुझसे कहा। हुआ ये था की जब मैं बुक खरीदने आया था तब मेरे हाथ में मेरी कोर्स बुक थी जिसमें मेरा कॉलेज आई डी कार्ड भी रखा था जोकि मैं गलती से यहां भूल गया। और इत्तेफ़ाक से ये इस लड़की के हाथ में आ गई। शुक्रिया बुक लौटाने के लिए मैंने उससे कहा, बस शुक्रिया वो बोली फिर थोड़ा सा मुस्कुराई और जाने लगी। मुझे लगा के हाँ सही बात है सिर्फ शुक्रिया से काम नही चलेगा सुनिये मैंने उसे रोका अगर आपको ठीक लगे तो हम शाम को यहाँ मिल सकते है सिर्फ एक कॉफ़ी मेरी तरफ से ऐसे शुक्रिया चलेगा। वो दो पल रुककर सोचने लगी और फिर पलको को झपकाते हुए उसने ओके कहा। शाम को हम मिले उसी बुक शॉप के सामने, कॉफी शॉप भी वहीं पास ही था हम दोनो वहाँ जाकर बैठ गये मैंने कॉफ़ी ऑडर कर दी और फिर अपनी सफाई देना शुरू कर दिया वो मोर्निंग में मैं कॉलेज के लिए लेट हो रहा था और उसके बाद शाम को ही मैं फ्री हो पता हूँ इसलिए मैंने आपसे शाम का कहा। उसने एक समझदार व्यक्ति की तरह एक्सप्रेशन देते हुए मेरी बात सुनी और कुछ नही कहा। हर रोज़ से वो शाम ज़रा अलग थी धीरे- धीरे बाते करते हमने ढेर सारी बाते कर ली थी।
तुम पुणे से ही हो ,नही
तो बाहर से आये हो, हाँ
बुक्स पढ़ना पसन्द है ,आप को पसन्द है ,हाँ मुझे तो अच्छा लगता है , हाँ मुझे भी बस यही था जो मैंने झूठ बोला था बाकी सब सच कहा।
इतनी देर बात की पर मैंने उससे उसका नाम तक नही पूछा। फिर उसी ने मुझसे कहा अजीब हो तुम मैं इतनी देर से तुमसे बात कर रही हूँ और तुमने अभी तक मुझसे मेरा नाम भी नही जाना ठीक है मैं खुद ही बता देती हूँ बरखा। मेरा नाम बरखा है। उस दिन हमारी थोड़ी सी दोस्ती हो गई थी। इसके बाद हम ऐसे ही हर कभी मिलने लगे कभी मैं उसका उस बुक शॉप के पास इंतजार करता तो कभी वो मेरा इंतजार करती। मैंने अभी तक किसी लड़की से दोस्ती नही की थी बरखा ही वो पहली लड़की थी जो मेरी दोस्त बनी।अब मेरी पढ़ाई तो पूरी हो गई थी पर मेरा मन वापस जाने का नही था इसलिए मैं यहीं रुककर जॉब करने लगा।बरखा और मैं अब रोज़ ही मिलते थे लाइफ बदलने लगी थी मेरी। इस सिम्पल से लड़के का दिल उस तेज चंट सी लड़की बरखा लिए धड़कने लगा था। बरखा मेरी ज़िन्दगी में इस कदर शामिल हो गई थी जैसे पानी में चीनी जो उसमें घुलकर उसे मीठा कर देती है और नजर भी नही आती जबकि वो उसमे होती है। बरखा भी मेरी ज़िन्दगी की चीनी है। मैं और बरखा आजकल ऐसी दुनियाँ में थे जहाँ हम दोनो थे और हमारा प्यार था हम तो अपने भविष्य के लिए सपने भी संजोने लगे थे। तब हमे खबर नही थी के हमारे सारे सपने काँच के जैसे निकलेंगे जो ज़मी पर गिरते ही टुकड़ो में बदल जायेंगे। बरखा के पिता हमारे रिश्ते से नाखुश थे उन्होंने अपने तीखे शब्दो में साफ कह दिया था की मैं उनकी बेटी के लायक नही उस दिन उन्होंने अपने कड़वे शब्दो के प्रहार से मेरे मन और मस्तिष्क दोनो को ही घायल कर दिया। उन्होंने तो बरखा का रिश्ता भी तय कर दिया था उस दिन शादी से पहले बरखा आखरी बार मुझसे मिलने आई थी एक आखरी कॉफी साथ पीने कुछ बोल नही रही थी बस खामोश थी और जब मैंने उससे पूछा की क्या मैं वाकई तुम्हारे लायक नही वो चुप रही, बरखा के पिता की बातो से इतना दुख नही पहुँचा था जितना बरखा की चुप्पी से पहुँचा।
जाते वक्त उसकी आँखो में आँसू थे वो रुकी पलट कर
मेरे पास आई और बोली कितने केयरलेस हो अपना दिल खो बैठें सम्हाल कर रखना चाहिए था ना, अब मैं कैसे वापस करूँ। और बस वो चली गई।
मैं उसी दिन ये शहर छोड़कर चला गया कभी न लौट के आने के लिये। उसकी शादी किससे हुई वो कहाँ है पुणे में है भी के नही मुझे कुछ नही पता। मैं अपने कल में ऐसा खोया के कुछ पता ही नही चला समय का, शाम होने को है मेरा मन मुझे बार - बार उस ओर खींच रहा है जहाँ मैं नही जाना चाहता मैं  कोशिश कर रहा हूँ खुद को रोकने की पर रोक नही पा रहा। काफी कोशिश के बाद भी मैं खुद को नही रोक सका और आ पहुँचा वहीं उस बुक शॉप के सामने मैं शॉप के नजदीक नही गया दूर से ही खड़ा होकर उस जगह को देख रहा हूँ जहाँ बरखा पहली बार मेरा इंतजार कर रही थी। वहाँ अचानक कोई नजर आया शाम हो जाने की वजह से मुझे चहरा साफ नजर नही आ रहा इसलिए मैं थोड़ा आगे बढ़ा लंबे खुले बाल कानो में बालियाँ  बरखा जैसी कोई नजर आई। मुझे अपनी आँखो पर यकीन नही हुआ अपनी आँखो को मसलकर मैंने दुबारा देखा मुझे अभी भी वही दिख रही है वो चलकर मेरे करीब आई मैंने पास से उसे देखा ये बरखा ही तो है उसे देख मेरी आँखें थम सी गई और साँस ठहर सी गई कितने केयरलेस हो किसी अपने को छोड़कर ऐसे चले जाते है क्या, सात सालो से रोज यहां आकर तुम्हारा इंतजार करती हूँ पता था मुझे के जरूर आओगे पर इतनी देर से आओगे ये नही पता था रोती हुई बरखा ये कहकर मुझसे ऐसे गले लगी की जैसे अब कभी वो मुझसे जुदा नही होगी हमेशा मेरे साथ रहेगी हमेशा मेरे पास रहेगी। अपने पिता के कहने पर बरखा शादी के लिए राज़ी तो हो गई थी पर उसने शादी की नही थी सात सालो तक वो मेरा इंतजार करती रही। हम दोनो अभी उसी कॉफी शॉप में है बरखा मेरे सामने ही बैठी है पर मुझे अभी भी सब सपने जैसा लग रहा है लेकिन ये सच है मेरी ज़िन्दगी का खूबसूरत सच।




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