यादें




समंदर किनारे बैठकर पानी की आती लहरों को देखना उन लहरों की आवाज सुनना अच्छा लगता है।
ये लहरें पानी को तेज़ उछाल के साथ आगे की ओर
धकेलती है। ऐसा लगता है जैसे कुछ पुराना जो पीछे रह गया हो उसे समेटकर ये लहरें आगे ला रही हो और हमे फिर से उसकी याद दिला रही हो।
वैसे मुझे नही पता के मेरे अलावा ये समंदर की लहरे किसी ओर को कुछ याद दिलाती है भी के नही पर इतना जरूर पता है कि मन के समंदर में उठती लहरे सभी को कुछ न कुछ याद दिलाती है। यूँ तो मेरे पास वक्त की कमी रहती है पूरे समय व्यस्त रहता हूँ पर जब भी समय मिलता है मैं यहाँ आ जाता हूँ। मुझे यहाँ
चुपचाप बैठकर पानी को देखते रहना अच्छा लगता है। पर हमेशा की तरह आज मैं अकेला नही हूँ। 
ये फोटो एल्बम मेरे साथ है सुबह अपने कपड़ो की अल्मारी देखी पूरी अस्त- व्यस्त नजर आ रही थी क्यों
न हो रोज बस जो कपड़े पसन्द आये वो निकाल लेता हूँ और बाकी कपड़ो को बिखर देता हूँ और न ही मैं उन्हें बाद में दोबारा ठीक करके रखता हूँ। इसलिए कपड़ो के ये हाल है आज पूरी अल्मारी की सफाई की। सफाई करते वक्त नीचे वाली रॉ में कपड़ो के नीचे दबी पड़ी पुरानी फोटो एल्बम हाथ में आई। इसे देखकर मेरे होंटो पर
मुस्कान आ गई। यहाँ आते वक्त मैं ये एल्बम भी साथ ले आया सोचा यहाँ के सुकुन में अपनी यादों से मिलना
ज्यादा सही रहेगा। एल्बम में जो ये सबसे पहले ब्लैक एंड वाइट सी फोटो नजर आ रही है ये मेरे दादा - दादी की फोटो है। हर बच्चे की तरह मैं भी अपने दादा - दादी का लाडला रहा हूँ जो जिद मम्मी पापा के पास पूरी नही हो पाती है वो दादा - दादी के पास जाकर झट से पूरी हो जाती है। ज्यादा मेहनत भी नही करनी पड़ती थोड़ा सा रोतलु मुँह बनाया और दादी की गोद में जाकर सो जाओ या फिर दोनो बाहों को दादी के गले में डाल उनकी पीठ से चिपक जाओ और कुछ बोलो नही बस चुपचाप रहो फिर दिखो कैसे आपके सारे काम बनते है दादी तो मेरा मुरझया चहरा देख सारे घर के सदस्य की क्लास ही ले लेती थी। और मैं मासूम बच्चा बना उनसे लिपटा रहता था। और मेरे दादा तो मुझे हर जगह अपने साथ ले जाया करते थे।
मेरी मनपसन्द जलेबियाँ भी मुझे खिलाया करते थे।
वो मुझे बहुत प्यार करते थे।
अगली फोटो में पापा अपनी मिलेट्री ड्रेस में है वो अपने साथी से कुछ कहते नजर आ रहे है। पापा को किसी भी काम में किसी भी तरह की लापरवाही बिल्कुल पसन्द नही थी। वो हमेशा एक्टिव रहे है और आज भी उतने एक्टिव है वो अब रिटायर्ड है पर अभी भी सख्त शेड्यूल को फॉलो करते है।
ये जो फोटो है जिसमे मम्मी पापा साथ में है इसमे पीछे जो सुन्दर वादियाँ है वो शिमला की है। हम सब साथ में शिमला गये थे। वैसे पापा ज्यादा वक्त हमारे साथ नही रह पाते थे पर जितना भी रहते थे वो उतने समय में बाकी वक्त की भरपाई कर देते थे।
कैरी देखकर मुँह में पानी आ गया। ये फोटो मैंने ही अपने कैमरे से ली थी। छत पर धूप में माँ और दादी दोनो मिलकर कैरियाँ सूखा रही है आम का अचार बनाने के लिए।
घर में कभी भी बाजार का अचार आया ही नही। माँ और दादी घर पर ही अचार बनाती थी। दादी के हाथ का बना अचार और माँ के बनाये दाल-चावल
खाकर मज़ा आता था। दादी के हाथ का अचार याद आते ही आज भी मेरे मुँह में उसका स्वाद घुल जाता है।
ये जो सब इमोशनल नजर आ रहे है ये फोटो मेरी दीदी की शादी की है। रीति दीदी मुझसे तीन साल बड़ी है। पर फिर भी सब कुछ मुझसे ही पूछती थी।
ये गेम कैसे खेलते है , ये ऐप क्या काम करता है, जा मेरे लिए मार्केट से ये ले आ। ये अच्छा नही है अब जाओ इस बदलकर लाओ। बस दीदी का यही काम रहता मुझे दौड़ाते रहना। कभी- कभी तो मैं गुस्सा हो जाता था। पर जब दीदी की शादी हो गई तो मैं उन्हें मिस भी करता हूँ।
ये फोटो तो मेरे बर्थडे की है जब मैंने अपनी लाइफ के बीस साल पूरे कर लिए थे। बड़ा ही यादगार बर्थडे रहा है मेरा। सभी फैमली मेम्बर मेरे सभी फ़्रेंड्स सबके साथ मैंने अपना बर्थडे सेलिब्रेट किया था। उसके बाद से फिर कभी ऐसे बर्थडे सेलिब्रेट कर ही नही पाया।
आगे पढ़ने के लिए पहले पुणे चला गया था और फिर उसके बाद जॉब करने यहाँ मुम्बई आ गया और यही  सेटल हो गया। चार साल पहले दादी हम सबको छोड़कर चली गयी। तब मैं बहुत रोया था। दादी से मैं हर बात शेयर करता था और जब मुझे किसी भी बात की परमिशन पापा से चाहिए होती थी तो मैं दादी से ही बोलता था। वो मेरे दिल के बहुत करीब थी। अभी काफी वक्त से मैं यहीं रह रहा हूँ। कभी - कभी जब मौका मिलता है तो घर कानपुर हो आता हूँ अभी लास्ट टाइम जब गया था तो शायद तभी ये फोटो एल्बम भी कपड़ो के साथ आ गई होगी। कितनी सारी यादें है जो मेरे मन में इकट्ठी है। मेरा बचपन , दीदी और मेरी बचपन में हुई लड़ाईयाँ,  पापा का हर गलत बात पर टोकना। मम्मी का मुझे लड्डू बेटा कहना, दादा- दादी का हर ज़िद पूरी कर देना , दीदी का चिढाना, और दोस्तो के साथ कुल डूड बनकर घूमना यादें तो इतनी सारी है कि पूरी एक किताब ही लिख दूँ। यादें भूली नही जाती वो हमेशा याद आती है। हमारा आज कल बनकर यादों में बदल जाता है और फिर जरा जिक्र होते ही सब कुछ याद आ जाता है कभी यादों से चहरे पर मुस्कान आ जाती है तो कभी आँखे नम हो जाती है। यादें ऐसी ही होती है। हम सभी के पास यादों का पिटारा होता है जिसके खुलते ही कई यादें ताज़ा हो जाती है।















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