फैसला



वैसे तो पैकिंग में बहुत समय लगता है पर मुझे कुछ ज्यादा सामान रखना ही नही है जो जरूरी लगा बस वो रख लिया। और साथ में ये फ़ैमिली फोटो रख ली।
जब सबकी याद आयेगी तो इसे देख लूंगी। माँ गाड़ी आ गई है उदास स्वर में आर्यन ने कहा। आसान मेरे लिए भी नही है पर मैं अब पीछे नही हट सकती। मेरी बेटी अवनि भी आज अपने ससुराल से आई है अपनी माँ से मिलने। सबसे मिलने के बाद मैं गाड़ी में बैठ गई। ड्रायवर ने गाड़ी स्टार्ट कर आगे बढ़ाई जैसे - जैसे गाड़ी आगे जा रही थी मेरा परिवार मुझसे दूर होता जा रहा था मैं गाड़ी की खिड़की से उन्हें देख रही थी। वो अपना हाथ ऊपर कर मुझे बाय कर रहे थे।
अब घर का रास्ता पीछे छूट गया और मैं एक नये रास्ते की ओर बढ़ रही हूँ। तीस साल पहले शादी कर मैं अपने ससुराल आई थी। बहुत सारे ख्वाब तो कभी थे ही नही बस छोटे - छोटे कुछ अरमान थे। मेरा ग्रेजवेशन नही हुआ था उसके पहले ही पापा ने मेरी शादी कर दी। तब मैं फर्स्ट ईयर में थी। मेरे पापा बहुत स्ट्रीक थे और उस समय लड़कियों को ज्यादा आज़ादी मिलती भी नही थी इसलिए मुझे भी नही मिली। मैं जब स्कूल में थी तब मुझे साइकिल चलाने का बड़ा शौक था पर मेरा साइकिल चलाना ना दादी को पसन्द था और न पापा को। उस वक्त हालात ऐसे थे की हर बात में डर लगता था के अगर कोई गलती हो गई तो कितनी डाट पड़ेगी। ये परिस्थितियां मेरे बड़े होने तक ऐसी ही रही। और फिर एक दिन शादी हो गई। अभी मैं फर्स्ट ईयर में ही थी पर पापा के फैसले के आगे किसी की नही चलती थी। ससुराल में पहला दिन ग्रह प्रवेश हुआ मुँह दिखाई हुई सभी ने सुखी जीवन की दुआएं दी। सब कुछ ठीक ही लग रहा था मुझे। शादी को दो महीने होने जा रहे थे सबके अच्छे व्यवहार से मेरे मन में कुछ अरमान पलने लगे थे मेरी सासुमां ने मुझे आगे पढ़ने के लिए सपोर्ट किया। और मैं फिर से पढ़ने लगी। पर दीपेश को मेरा फिर से पढ़ाई शुरू करना मंजूर नही था। धीरे- धीरे उनका बर्ताव बदलने लगा था वो हर बात में बस अपना फैसला मुझे सुनाते। मेरी किसी भी बात को नही सुनते जैसे की मैं उनके लिए कुछ हूँ ही नही। हर बात पर बहस करना , लड़ना उनकी आदत सी हो गई थी। मैंने जैसे तैसे ग्रजवेशन तो कर लिया था पर  चुनोतियों से भरा जीवन मेरे सामने था। मुझे हर वक्त दीपेश के इशारो पर ही चलना पड़ता था अब तो आर्यन और अवनि भी मेरी ज़िन्दगी में आ गये थे। जिनके लिए मुझे जीना था। दीपेश के अंदर न तो एहसास थे और न ही जज़्बात मेरे मन को समझने की उन्होंने कभी कोई कोशिश नही की। उनके लिये तो शायद मैं कठपुतली थी जो उनकी परमिशन के बिना मुस्कुरा भी नही सकती थी। दीपेश के हर दिन के बेरुखे व्यवहार से मेरे मन को ठेस तो बहुत पहुँची पर मैं टूटी नही। मैं यही सोचती रही के अभी नही कुछ वक्त बाद सही दीपेश में बदलाव जरूर आयेगा। दिन गुजरते रहे वक्त बीतता गया। शादी को बीस साल हो गये पर कुछ नही बदला
उनका हर बात पर गुस्सा करना मुझ पर नाराज होना अभी भी जारी रहा। अभी भी बस खुद का फैसला सुनाना बाकी सब क्या चाहते है ये वो नही जानना चाहते। घर के माहौल का असर मैंने अवनि और आर्यन पर कभी नही पड़ने दिया। दोनो बड़े हो रहे थे और अब कॉलेज भी जाने लगे थे। दोनो की पढ़ाई पूरी होते ही सबकी सहमति से दोनो बच्चो की शादी हो गई। तीस साल मुझसे जितना हो सका मैंने अपना हर फ़र्ज निभाने की पूरी कोशिश की। अब इतने साल बाद मैंने दीपेश को अपना एक फैसला सुनाया। और ना ये जानने की कोशिश की वो क्या चाहते है। मैं अपने ननिहाल कानपुर जा रही हूँ अब वही रहूंगी। मेरी एक सहेली है जो घरेलू उधोग चलाती है मैं भी उसके साथ मिलकर काम करने वाली हूँ। मैं अपने आगे का जीवन अपने मन मुताबिक जीना चाहती हूँ किसी के सुनाये फैसलों पर नही चलना चाहती। मैं जानती हूँ की हर व्यक्ति का स्वभाव अलग होता है सब एक जैसे नही होते कुछ सख्त होते है तो कुछ नरम होते है। हम सिर्फ
कोशिश कर सकते है उनके स्वभाव में बदलाव लाने की पर उन्हें बदल नही सकते।
मुझे ये समय ही सही लगा नया रास्ता चुनने के लिए।
तो बस चल पड़ी। मैं किसी को अकेला करके नही आयी हूँ बस खुद अकेले आयी हूँ।






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