क़ामयाब






ऑफिस के लंच ब्रेक में सभी आराम से बैठकर गपशप कर रहे थे ये लंच ब्रेक ही तो होता है जिसमे कुछ पल  अपने ऑफिस के काम से थोड़ी आजादी मिलती है।
बातो ही बातो में बात निकली क़ामयाब होने की।
लाइफ मे क़ामयाब होना कितना जरूरी है इसी टॉपिक पर बड़ी गम्भीरता के साथ बात शुरू हो गई। 
निधि , अतुल , निशा मेम सभी कह रहे थे की क़ामयाब होना बहुत ही जरूरी है क़ामयाब होकर ही तुम सब कुछ हासिल कर सकते हो वरना कुछ भी नही। यहाँ हर एक शक्स जी तोड़ मेहनत क़ामयाबी हासिल करने के लिए ही कर रहा है। और इस क़ामयाबी की रेस में हम भी शामिल है। 
मैं सबकी बातो को चुपचाप बैठकर सुने जा रही थी।
घर आकर मैं उन सब बातो को सोच रही हूँ जो आज ऑफिस में हुई थी। मेरे मन में सवाल ये आ रहा है की आखिर क़ामयाब होने का असल बतलब क्या है ?
बड़ा सा बंगला बड़ी सी गाड़ी और अच्छा बैंक बैलेंस।
ये सब है तो हम क़ामयाब है ऐसा कुछ। या अपने सपनो को हासिल कर लेने का मतलब क़ामयाब होना है।
कुछ लोगों के लिए शायद ये सब हासिल कर लेना ही क़ामयाबी है। पर सबके लिए नही।
सभी की लाइफ का अपना एक अलग मक़सद होता है
कुछ हासिल करने का, कुछ बनने का।
मैं जब छोटी थी तो अपने पापा के कज़िन अरविंद अंकल से बड़ी प्रभावित थी वो बिज़नेस मेन थे अंकल जब कभी घर आते थे और पापा से बिज़नेस की बाते किया करते थे तो मुझे उनकी बातो में बड़ा इंटरेस्ट आता था कॉलेज टाइम में मैंने ये डिसाइड कर लिया था की मुझे बिज़नेस फील्ड में ही जाना है। मैंने बी. कॉम, एम. कॉम और फिर एम.बीए किया। और फिर वक्त था अपने लक्ष्य की और आगे बढ़ने का।
मैं अपना बिज़नेस स्टार्ट करने वाली थी जिसमे मुझे मेरी फैमली का पूरा सपोर्ट था पर अचानक कुछ ऐसे हालत बने की जो मैं चाहती थी वो हो ना सका।
पापा की तबियत खराब हो गई थी ये वो वक्त था जब मेरे अपनो को मेरे साथ की जरूरत थी अगर मैं इस वक्त अपना बिज़नेस स्टार्ट करती तो मुझे अपने बिजनेज़ पर फोकस करना पड़ता जोकि मैं अभी कर नही सकती थी इसलिए अपने काम को शुरू करने से पहले ही रोक देना मैंने ठीक समझा।
मैंने और माँ ने मिलकर पापा का ख्याल रखा उन्हें ठीक होने में थोड़ा ज्यादा समय लग गया। इसी बीच मैंने भी जॉब की लिए एप्लाय कर दिया और मुझे एक अच्छी पोस्ट पर जॉब मिल गई। अभी फाइनेंशियल
कन्डीशन ऐसी नही थी कि मैं कोई अच्छा बिज़नेस शुरू कर सकूँ। इसलिए मैंने जॉब करना ही बेहतर समझा।
मुझे इस कम्पनी को जॉइन किये दो साल हो गये है शुरुआत में जरूर थोड़ा बुरा लगा क्योंकि मैं कुछ और करना चाहती थी कुछ और बनना चाहती थी मेरा मकसद कुछ और था लेकिन धीरे- धीरे मुझे यहाँ अच्छा लगने लगा। ऐसा बहुत कुछ है जो मैंने यहाँ आकर सीखा, मुझे सबके साथ काम करना अच्छा लगने लगा है। मैं खुश हूँ।
एक अच्छी पोस्ट , अच्छी सैलरी, अच्छे कलीग्स और इस सब से ज्यादा ये की मैं खुश हूँ।
 मेरा रास्ता भले ही बदल गया पर इसका मतलब ये नही के मैं क़ामयाब नही।
सब कुछ हासिल कर हम क़ामयाब हो ये जरूरी नही
जरूरी ये की जो हमने पाया हम उससे खुश है या नही। बदले रास्तो पर चलकर भी अगर हम खुश है तो हम क़ामयाब है।


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