गुलाल भाग - 2




खनक और मेरी मुलाकात कुछ इस तरह हुई थी कि हर बार की तरह इस बार भी मेरे दोस्तो ने होली पार्टी रखी थी जोकि होली के एक दिन पहले ही थी। हमने पार्टी के लिए अमृत गार्डन बुक किया और पार्टी का सारा अरेंजमेंट हमने मिलकर किया। रात को अपने बेड पर लेटे- लेटे मैं यही प्लानिंग कर रहा था की इस बार अपने दोस्तो को ऐसा रंग लगाऊंगा ऐसा रंग लगाऊंगा की कई दिनों तक नही छुटेगा।
सुबह हुई और रोज की तरह आज भी मैं लेट ही उठा मैंने जल्दी - जल्दी नाश्ता किया तैयार हुआ और अपनी गाड़ी लेकर पार्टी के लिए निकल गया। पार्टी का टाइम 11 बजे से था और मैं 11.30 बजे गार्डन के बाहर आ पहुँचा। अपनी गाड़ी पार्क की और फिर मन ही मन ये सोचते हुए की आज तो सबको अच्छे से रंग देना है मैं गेट पर पहुँचा और ढेर सारा गुलाल मुझ पर आ गिरा मैं पूरा गुलाल में हो गया ये काम और किसका होगा मेरे चतुर दोस्तो के अलावा , ये सोचकर मैंने जैसे ही सामने देखा तो सॉरी सॉरी कहती हुई एक लड़की सामने नजर आई भोली सी सूरत चंचल सी आँखे अपनी पलको को झपका - झपका कर वो मुझे सॉरी कह रही थी। उसने मुझसे कहा की उसने गलती से मुझ पर गुलाल डाल दिया। मैं तो कुछ बोल ही नही पाया उसने अपनी सफाई दी फिर से सॉरी कहा और चली गई और मैं उसे देखता ही रह गया। 
इस वक्त मेरे दिल में धीरे से  कुछ हुआ पर ये क्या हुआ वो मुझे समझ नही आया। मैं आगे बढ़ा और अपने दोस्तो के पास पहुँचा , ये हम से पहले किसने रंग दिया तुझे अजित ने मेरी ओर देखते हुए कहा मैंने अपने फिसलते हुए शब्दो के साथ जावब देते हुए कहा कुछ नही अंदर आते वक्त किसी ने मुझ पर गलती से ये गुलाल डाल दिया। मैंने उन्हें नही बताया की एक लड़की आकर मुझे रंग गई।
इसके बाद मैं अपने दोस्तो के पास जा बैठा एक तरफ होली के गाने दूसरी तरफ मस्ती का मूड फिर क्या था सबने जमकर मस्ती की और खूब होली खेली। लेकिन
होली खेलते वक्त मुझे झलक नजर आई गुलाल वाली लड़की की। वो मेरे सामने ही थी दरसल यहां एक नही दो ग्रुप्स की पार्टी चल रही थी ये गार्डन बड़ा है जिसके आधे हिस्से में हम और दूसरे आधे हिस्से में दूसरा ग्रुप
था और वो गुलाल वाली लड़की उसी ग्रुप में थी मैं सामने की ओर थोड़ा आगे बढ़ा। खनक चले उसकी फ़्रेंड ने उससे कहा और वो चली गई।
एक सप्ताह बाद मुझे खनक दोबारा नजर आई उसके होस्टल के बाहर। और ये कोई इत्तफाक नही था मैंने पता लगा लिया था की खनक यहाँ रहती है। मैं करता भी क्या मेरे मन ने मुझे दौड़ाया और खनक का पता लगाय। अब तो दो तीन बार मेरा उस रास्ते से गुजरना हो गया था और खनक ने ना सिर्फ मुझे देख लिया था बल्कि पहचान भी लिए था। और एक दिन ऐसा हुआ की मैं होस्टल के पास वाली शॉप के बाहर खड़ा था आज मैं वाकई कुछ काम से ही यहाँ आया था लेकिन खनक ने मुझे देख लिया और वो गुस्से में मेरी ओर चली आ रही थी मैं समझ गया था की आज तो गये ये जरूर मेरी खबर लेने वाली है खनक मेरे पास आई , मैं थोड़ा घबरा तो रहा था पर फिर हिम्मत करते हुए मैंने कहा कॉफी पीते हुए बात करे यहाँ पास में कॉफी शॉप है खनक ने हाँ कह दिया और हम सब कॉफी शॉप पहुँच गये हम सब यानी मैं, खनक और उसकी फ़्रेंड्स। खनक कुछ बोल नही रही थी मैंने अपनी बात को ज्यादा बड़ा न करते हुए सिर्फ इतना कहा
क्या हम दोस्त बन सकते है।
मैं खनक के लिए अंजान था इसलिए उसने इस बारे में सोचने के लिए थोड़ा समय लिया लेकिन वो मान गई। और मैं प्यार की पहली सीढ़ी जोकि दोस्ती होती है चढ़ गया था। अब
कभी कभार हम दोस्त के तौर पर मिल लिया करते थे। लेकिन बहुत कम ही मिला करते थे क्योंकि अभी हमारा ये दोस्ती का रिश्ता जरा कच्चा था। पर वक्त के साथ धीरे- धीरे ये दोस्ती का रिश्ता गहराया।
और हम अच्छे दोस्त बन गये , भले ही वक्त ज्यादा लगा हो पर मैंने खनक का भरोसा हासिल कर लिया था कहीं न कहीं खनक अब मुझे अपना समझने लगी थी
एक दोस्त के रूप में ही सही मैंने उसके दिल में जगह पा ली थी और मेरे दिल में तो उसके लिए बेपनाह प्यार था ही , वो प्यार जिसे मैं जाहिर नही कर  सकता था
खनक ने उस दिन साफ कह दिया था सिर्फ दोस्त बन सकते है। इसलिये कुछ कहने का मतलब दोस्ती भी खो देना था। तो बस मैं अकेले ही प्यार की कश्ती में सवार था। जैसे- जैसे वक्त बीतता जा रहा था मेरा प्यार और गहराता जा रहा था मैं चोरी - चोरी खनक को प्यार से देखता और अकेले मुस्कुराता , यही सोचता के जिस तरह उसे देख कर मेरा दिल जोर जोर से धक धक करता है काश उसका दिल कभी मेरे लिए ऐसे धड़के। इसी तरह ही एक साल पूरा होने जा रहा था आज खनक से मुलाकात हुई उसका  बर्ताव कुछ बदला हुआ सा लग रहा था। ऐसा लगा जैसे की खनक के दिल में कुछ - कुछ तो हुआ। ऐसे खनक को देख मेरे मन में उम्मीद जागी। वैसे खनक ने पूरी कोशिश की अपने दिल की बात को अनसुना करने की पर कब तक दिल की न सुनती।
आखिरकार ये दोस्ती की गाड़ी प्यार की पटरी चढ़ ही गयी मैंने भी देर न करते हुए कर दिया इज़हार और खनक को भी हो गया प्यार। मुझ पर तो खनक के प्यार का रंग चढ़ ही गया था तो मैंने भी इस होली उसे अपने गुलाल से रंग दिया
वैसे मेरे प्यार का रंग भी उस पर नजर आ रहा था  और ये जो प्यार का रंग अगर लग जाता है तो कोई और रंग चढ़ ही नही पाता। खुश था मैं इस बात से के खनक मेरे साथ है।
लेकिन वो साथ हमारा आखरी था जो खनक को अच्छी तरह मालूम था वो यहाँ इस शहर सिर्फ अपनी इंटर्नशिप के लिए आई थी जोकि पूरी हो गई थी उसके अपनी फैमली से किये कुछ वादे और कुछ सपने थे जो
की उसे पूरे करने थे इसलिए उसका वापस जाना तय था ये बात खनक जानती थी इसिलये तो खनक अपने दिल की बात को अनसुना किये जा रही थी लेकिन नही कर सकी। खनक मुझसे ये नही कहकर गई के मैं उसका इंतजार करूँ शायद उसका वापस लौटना मुश्किल है पर जाते वक्त अपनी याद के तौर पर वो मुझे थोड़ा गुलाल दे गई ताकि जब कभी ये मेरे हाथ आये तो वो मुझे जरूर याद आये वो खुद को मेरी यादो में महफ़ूज कर गई।




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