छोटी सी आशा





गुनगुनाती हुई मेहक छत की दीवार पर चित्र बनाते हुए अपने चित्रकारी के हुनर को निशु दीदी को दिखा रही थी मेहक ने चित्र पूरा कर जब निशु दीदी से पूछा की चित्र कैसा लग रहा है तो निशु दीदी मुस्कुराते हुए बोलीं अरे वाह ! मेहक कितना सुंदर चित्र बनाया है बड़ा ही अच्छा लग रहा है तुम तो बहुत होशियार हो निशु दीदी के ये कहने पर मेहक खुशी से उछल पड़ी और बड़े प्यार से बोली तो फिर मैं और बनाऊ तब मेहक को समझाते हुए निशु बोली तुम सब कुछ आज ही बना लोगी तो फिर कल क्या बनाओगी और तुम्हारे ये छोटे - छोटे हाथ भी तो थक जायेंगे ना।किसी बड़े की तरह सोचने की एक्टिंग करते हुए मेहक बोली हाँ वो तो है तभी मेहक की माँ ने मेहक को आवाज लगाई तो मेहक झट से दौड़ती हुई अपनी माँ के पास चली गई। 
मेहक के जाने के बाद निशु उसकी बनाई ड्रॉइंग में कुछ सुधार करने लगी , मेहक ने अपनी ड्रॉइंग में छत के पास वाला आम का पेड़ बनाया था और वो चिड़िया जिसे वो रोज़ देखती है पेड़ की टहनी पर बैठे हुए। मेहक का बनाया हुआ पेड़ कुछ - कुछ आम के पेड़ के जैसा था पर उस पर बैठी चिड़िया आम के पेड़ वाली चिड़िया से मेल नही खा रही थी जिसमें निशु ने सुधार कर उसे सुंदर चिड़िया में बदल दिया। निशु रोज़ यही करती है मेहक जो भी बनाती है वो पहले उसकी तारीफ करती है और फिर बातों ही बातों में उसकी ड्रॉइंग को ठीक भी करती है। जब से निशा आई है तब से निशु दीदी , निशु दीदी करते हुए मेहक निशा के आस- पास ही रहती है। मेहक अनिता की बेटी है जिसे निशा की माँ वैजंती ने घर की रेख- देख के लिए नौकरी पर रखा है अब इस उम्र में अकेले पूरे घर को सम्हालना निशा की माँ के लिए थोड़ा मुश्किल हो रहा था तब निशा ने ही कहा था माँ आप अपनी मदद के लिए किसी को नौकरी पर रख लो ना तब निशा की बात मानकर वैजंती जी ने अपने आस- पड़ोस और जान- पहचान के लोगो से बात की और तब अनिता घर आई।  अनिता के आने से वैजंती जी को बड़ा सहारा मिला और घर में रौनक भी बढ़ गई क्योंकि अनिता रोज़ अपनी बेटी को भी अपने साथ लाती है जिसके आने से वैजंती जी और उनके पति दोनों का ही मन लगा रहता है और अब तो निशा भी आ गई है भले ही कुछ दिनों के लिए आई है पर अपनी बेटी के आने से निशा के मम्मी - पापा दोनों ही बहुत खुश है और मेहक भी क्योंकि निशु दीदी के आने से मेहक को कितने सारे ड्रॉइंग कलर्स जो मिले है। घर आने के बाद जब निशा अपने कमरे में बैग से सामान निकाल रही थी तब दरवाजे के पास खड़े होकर मेहक निशा को बड़े ही ध्यान से टुकुर- टुकुर देखे जा रही थी और जब निशा के पास मेहक ने कलर्स देखे तो खुशी से आँखें बड़ी करती हुई बोली कलर, मेहक के बोलने पर निशा ने मेहक की ओर देखा तो मेहक किसी मासूम बच्चे की तरह बिल्कुल चुपचाप खड़ी हो गई,  निशा ने मेहक को अपने पास बुलाया इधर आओ मेहक तुम्हें कलर्स पसन्द है मेहक ने तुरंत अपना सिर हिला दिया तुम्हें ड्रॉइंग करना आता है हाँ मैं बहुत अच्छा चित्र बनाती हूँ निशा के पूछने पर मेहक बोली, अच्छा तो मुझे बनाकर दिखाना फिर मैं तुम्हें कलर्स दूँगी ठीक है। बस तब से मेहक रोज ही निशु दीदी को अपनी चित्रकारी दिखाती रहती है और निशा उसकी खूब तारीफ़ करती है। अपने प्रॉमिस को पूरा करते हुए निशा ने मेहक को कलर्स और साथ मे ड्रॉइंग बुक भी दी है जिसे लेकर मेहक बहुत खुश है , तब से निशु दीदी उसे और भी अच्छी लगने लगी है अरे भई कलर जो दिए है दीदी ने। बच्चों का मन कितना भोला होता है ना, ज़रा से अपनेपन छोटी सी खुशी से भी कितना खुश हो जाता है। निशा मेहक से बातें करती है उसके साथ खेलती है उसे ड्रॉइंग करना सिखाती है,  इससे मेहक को कितनी खुशी मिलती है उसका खिलखिलाता हुआ चेहरा मीठी सी मुस्कान ये साफ कह रही है कि छोटी सी मेहक निशु दीदी के आने से और भी ज्यादा मेहक रही है। अब तो निशा को भी मेहक से बहुत लगाव हो गया है उसकी भोली- भोली सी बातें और छोटी- छोटी ख्वाइशें सुन निशा को हँसी आ जाती है और कभी आँख भी भर आती है क्योंकि मेहक को देखकर निशा को अक्सर अपना बचपन याद आ जाता है बचपन मे उसकी भी कुछ नन्ही सी आशायें थी जो पूरी ना हो सकी क्योंकि उस वक्त हालात बहुत अलग थे जब हालात सही नही होते तो ख्वाइशें छोटी हो या बड़ी सब सिमट जाया करतीं है जैसे उनकी पूरी हो पाने की कोई उम्मीद ही ना हो। 
कल जब निशा कैनवास पर पेंटिंग कर रही थी तो,  तब मेहक खामोशी के साथ ध्यान लगाकर निशा को देख रही थी निशु दीदी कैसे ब्रश को कैनवास पर चला रही है कैसे कलर कर रही है, बीच - बीच में मेहक कुछ - कुछ पूछ भी रही थी और निशा उसको समझाती जा रही थी दीदी ये दोनों कलर को क्यों?  मिलाया, ऐसे कलर मिलाकर भी रंग भरते है क्या ? हाँ ऐसे भी रंग भरते है दो अलग- अलग कलर्स को मिलाने से एक नया कलर बन जाता है और पेंटिंग में जहाँ उसकी जरूरत होती है हम उसे वहाँ भर देते है मेहक को समझाते हुए निशा बोली। इसके बाद निशा ने मेहक से कुछ देर तक कोई बात नही की क्योंकि उसका सारा ध्यान अब पेंटिंग बनाने में था निशा जब भी पेंटिंग करती है तो उसमें इस तरह खो जाती है की उसके आस- पास की किसी भी चीज़ पर उसका कोई ध्यान नही होता। बचपन से ही निशा को पेंटिंग का बड़ा शौक रहा है उस वक्त निशा के पास ना अच्छे कलर्स हुआ करते थे और ना ही पेंटिंग ब्रश। निशा के पास थोड़े खराब हो चुके पुराने पेंटिंग ब्रशेस थे जोकि उसे उसकी किसी सहेली ने दिये थे निशा उन्हें अच्छे से सम्हाल कर रखती और बड़े चाव से मन लगाकर उन्ही पेंटिंग ब्रशेस से पेंटिंग किया करती जबकि निशा उस वक्त ये भी नही जानती थी कि ब्रश से पेंटिंग करते समय उसे किस तरह पकड़ना होता है और अलग - अलग तरह के ब्रश आखिर होते क्यों है कैसे उनसे पेंटिंग की जाती है वो कुछ भी नही जानती थी पर फिर भी किसी भी सादे कागज़ पर ,तो कभी कॉपी के पीछे के पन्नो पर या घर की दीवार पर वो कुछ भी बनाती और उसमें रंग भरने लगती तब कोई नही जानता था कि निशा का ये शौक उसे एक दिन आर्टिस्ट बना देगा। पेन्टिंग पूरी होने के बाद निशा थोड़ा दूर खड़े होकर अपनी बनाई पेंटिंग को देखने लगी तभी मेहक बोल पड़ी निशु दीदी ये बना लिए आपने , ये पूरा बन गया ना, हाँ पेंटिंग पूरी हो गई देखो कैसी बनी है , मेहक कैनवास पर नजरें टिकाकर गौर से देखने लगी अरे ! इसमें तो एक लड़की बनी है ये तो मेरे जैसे दीवार पर कुछ बना रही है इसकी फ्रॉक भी मेरी फ्रॉक जैसी है , हाँ ये पूरी तुम्हारे जैसी ही है मेहक निशा ने मेहक के गालों को छूते हुए कहा। अच्छा ये पूरी मेरे जैसी है मैं मम्मी को भी बता कर आऊँ मेहक ने कहा छोटी सी स्माइल देते हुए निशा बोली ठीक है जाओ बता दो। अगले दिन निशा छत पर पौधों में पानी डाल रही थी और साथ ही मेहक के आने का इंतज़ार कर रही थी मेहक अभी तक ऊपर क्यों नही आई नीचे हॉल में खेलने तो नही लग गई कुछ देर इंतजार करने के बाद निशा मेहक को देखने हॉल में चली आई यहाँ निशा के मम्मी- पापा और पड़ोस वाली आंटी साथ  बैठ कर कुछ बात कर रहे थे पर निशा को मेहक उनके आसपास हॉल में कहीं नजर नही आई निशा ने किचन में अनिता के पास भी देखा पर मेहक वहाँ भी नही थी निशा जब अपने कमरे में गई तो मेहक उसे वहाँ मिली वो निशा के पेंटिंग के सामान को देख रही थी पेंटिंग ब्रश को कैनवास पर चलाते हुए झूठ- मुठ की पेंटिंग कर रही थी मेहक तुम यहाँ हो निशा ने कहा तो मेहक निशा को देखकर चौंक गई और जल्दी से ब्रश को स्टूल पर रख दिया। निशा मेहक के पास गई और बोली तुम्हें ब्रश से पेंटिंग करनी है चलो मैं सिखाती हूँ। आज निशा और मेहक दोनों ने साथ मिलकर पेंटिंग की जिसमे मेहक को बड़ा मज़ा आया वो बहुत खुश हुई और उसे खुश होता देख निशा के मन को सुकून सा मिल रहा था मेहक और निशा का कोई रिश्ता नही है ना मेहक निशा की रिश्तेदार लगती है ना ही बहन और ना ही दोस्त लेकिन फिर भी मेहक को खुश करके निशा को खुशी मिलती है हमारा बिता कल जब हमें किसी के आज में नज़र आता है तो ना होते हुए भी उससे हमारा नाता सा जुड़ जाता है वो हमें अपना सा लगने लगता है। मेहक को खुशी देकर उसकी छोटी सी ख्वाइश पूरी कर निशा को ऐसा लगता गया जैसे उसने खुदको कोई खुशी दी हो उसने मेहक की नही बल्कि खुदकी किसी ख्वाइश को पूरा किया हो। 
जब बचपन मे छोटे से मन की कोई छोटी सी आशा पूरी होती है तो उसकी खुशी के आगे सारी दुनिया की दौलत भी बड़ी फीकी सी नज़र आती है। निशा इस बात को अच्छी तरह समझती है इसलिए मेहक को वो खुशी देने की कोशिश करती है जो उसका मन चाहता है क्योंकि सभी की आशायें पूरी नही होती,  होते है कुछ लोग जिनकी छोटी - छोटी आशायें भी अधूरी रह जाती है।निशा की तरह। 
वक्त बहुत तेज़ी से गुज़रता है ये 15 दिन कैसे बीत गए पता ही नही चला अपने लौटने की तैयारी करती हुई निशा मन ही मन यही सोच रही है बैग में सामान रखते हुए निशा का मन भारी सा हो रहा था जब कई दिनों बाद हम घर लौटते है तो मन कितना खुश होता है और वही मन घर से जाते वक्त कितना उदास हो जाता है वैसे उदास तो निशा के घर वालों का भी मन भी हो रहा है पर वो फिर भी मुस्कुरा रहे है ताकि निशा दुखी ना हो। निशा जो भी पेंटिंग का सामान अपने साथ लाई थी वो सब आज उसने मेहक को दे दिया ये लो मेहक ये सब तुम रखलो ये मेरी तरफ़ से गिफ्ट है तुम्हारे लिये, ये सब रख लूँ मेहक खुश होते हुए बोली, हाँ मुस्कुराते हुए निशा ने कहा।मेरे पास भी गिफ्ट है  कहते हुए मेहक ने एक कागज़ निशा को दिया जिसमे मेहक ने ड्रॉइंग की थी निशा ने खुश होते हुए अपना गिफ्ट अपने पास सम्हाल कर रख लिया। निशा जब गाड़ी में बैठी तो मेहक ज़ोर- ज़ोर से चिल्लाकर कह रह थी बाय निशु दीदी , बाय निशु दीदी जल्दी आना निशा की गाड़ी जब तक दिखती रही मेहक उछल- उछल कर कहती रही बाय निशु दीदी बाय और निशा चली गई मेहक को कुछ पलों की छोटी- छोटी खुशियाँ देकर।

आईना




इस आईने के सामने मैं रोज़ खड़ा होता हूँ रोज़ खुदको देखता हूँ खुदकी तारीफ भी करता हूँ पर आज, आज बात अलग है आज आईने में सिर्फ मैं नज़र आ रहा हूँ मैं निखिल , निखिल व्यास। कितने दिनों बाद मैंने अपनी फेवरेट टीशर्ट पहनी है अपने उसी अंदाज में तैयार हुआ हूँ जिस तरह मैं रहा करता था। ये सही है कि वक्त के साथ हम बदल जाते है और कुछ जगाहों पर हमें खुदको बदलना भी पड़ता है क्योंकि हमें दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलना होता है पर सबके साथ चलने की कोशिश में हम खुदको ही कही पीछे छोड़ आते है खुद ही खुदको भूल जाते है , और जीने लगते है एक ऐसी ज़िंदगी जिसमे हर एक के लिए हमारी पहचान अलग- अलग होती है। कुछ ऐसे ही तो जीने लगा था मैं। 
चार साल पहले जब मैं पटना आया तब मैं निखिल ही था पर धीरे- धीरे बदलने लगा सबसे पहले तो मैं ओम अंकल का किरायेदार बना वो भी अच्छा और सभ्य किरायेदार। दरसल जब यहाँ आया तो मुझे जल्दी में कोई अच्छा रूम किराये पर मिल ही नही रहा था और जो मिल रहे थे वो मेरे बजट से बाहर थे तब मेरे एक दोस्त ने मुझे ओम अंकल का पता दिया और मैं यहाँ आ पहुँचा ओम अंकल किराये पर रूम तो देते है पर यहाँ रहने की कुछ कंडीशन्स भी थी मुझे रूम की जरूरत थी इसलिए मैंने अपना सिर हाँ में हिला दिया। ओम अंकल को नेक और सभ्य किरायेदार चाहिए था और मैं बन गया। वैसे ऐसा नही है कि मैं एक अच्छा लड़का नही हूँ बस मेरे जीने का तरीका थोड़ा अलग था लेकिन मुझे ओम अंकल के सामने ये साबित करने के लिए की मैं अच्छा और सभ्य लड़का हूँ उनके सभी रूल्स को खुशी के साथ फॉलो करना पड़ा। ये मेरे बदलने की पहली शुरुआत थी। बचपन से बड़े होने तक हमारी लाइफ में बहुत कुछ होता है जो पहली बार होता है और उसका अनुभव हमे हमेशा याद रहता है जैसे पहली बार स्कूल जाना , पहली बार साइकिल चलाना, पहली बार कॉलेज जाना और पहली बार ऑफिस जाना। यहाँ आने के दो दिन बाद ही मुझे ऑफिस जॉइन करना था ये मेरी पहली जॉब थी और आज पहला दिन। जब पहली बार कॉलेज गया था तो मन ही मन  बड़ा खुश था और थोड़ा सा डरा हुआ भी कि ना जाने जो नए दोस्त बनेंगे वो कैसे होंगे, टीचर्स कैसे होंगे ज्यादा स्ट्रिक्ट हुए तो उस दिन की तरह मैं आज भी थोड़ा नर्वस था पर जब ऑफ़िस स्टाफ से अपने बॉस से मिला तो नर्वसनेस ज़रा कम हो गई। शुरू के कुछ दिनों तक मैं ट्रेनिंग पर रहा मुझे सिखाया गया समझाया गया कि काम कैसे करना है और उसके बाद शुरू हुआ मेरा हार्डवर्क। मैं अपने काम को बेहतर तरीके से करने की कोशिश किया करता था पर फिर भी मुझसे कुछ गलतियाँ हो जाया करती थी और फिर एक बार मेरे बॉस ने मुझे केबिन में बुलाकर समझाया कि मुझे अपने आपको थोड़ा बदलना होगा। मैं बदला भी। मेरा बिहेवियर पूरी तरह प्रोफेशनल हो गया था और मैं अब ज्यादा प्रैक्टिकल होकर सोचने लगा था और मेरे बॉस वो मेरे इस बदले हुए बिहेवियर से खुश थे मैंने अपनी पहली जॉब के दौरान बहुत कुछ सीखा जो मेरी दूसरी जॉब के वक्त मेरे बहुत काम आया। जैसे - जैसे हम अपनी लाइफ में आगे बढ़ते जाते है वैसे- वैसे ही हम बदलते भी जाते है ,धीरे- धीरे अब तो मेरी आदतें भी बदल गई थी प्रोफेशनल लाइफ होती ही ऐसी है जो हमे पूरी तरह बदल कर रख देती है। पर अब कोई और भी था जिसका मेरे जीवन पर असर हो रहा था। ऑफ़िस इवेंट के दौरान हुई दिव्यांशा और मेरी छोटी सी मुलाकात एक लंबे रिलेशनशिप में बदल गई। दिव्यांशा बहुत प्यारी है इंटेलिजेंट है फिक्र करती है मेरी, जिस तरह मैं उसके लिए बहुत खास हूँ उसी तरह वो भी बहुत अहम है मेरे लिए। वैसे तो हम दोनों में अंडरस्टैंडिंग अच्छी है पर कभी - कभी उसकी ख्वाइशों के चलते मुझे उसके मन के मुताबिक़ चलना पड़ता है। दिव्यांशा के मेरे लाइफ में आने पर कुछ - कुछ है ऐसा जो बदला है कुछ नई आदतें शामिल हुई तो कुछ बदल गईं। मेरा शेड्यूल मेरी डाइट मेरी वीकेंड प्लांनिग क्या होनी चाहिए कैसी होनी चाहिए मेरा लुक कैसा होना चाहिए मुझसे ज्यादा इन सब बातों पर दिव्यांशा का ध्यान होता है और बातों ही बातों में वो मुझे समझाती भी रहती है कि ऐसा ठीक रहेगा वैसा ठीक रहेगा कभी - कभी तो उसकी बातों को सुन मुझे हँसी आ जाती है और कभी मैं चुप सा हो जाता हूँ। मैं अक्सर तब चुप हो जाया करता हूँ जब मैं कुछ कहना नही चाहता। वैसे हम क्या चाहते है क्या नही चाहते है इसकी परवाह शायद ही कोई करता हो क्योंकि मैंने अभी तक जो जाना और समझा है उससे यहीं मालूम हुआ है कि सबको फर्क इस बात से पड़ता है की वो क्या चाहते है जैसे कि मेरे फ्रेंड्स, वो हमेशा ये चाहते थे कि मैं भी उनके तरह सोचूँ ,  वैसे रहूँ जैसे वो रहते है  जबकि सच कहूँ तो मुझे उनके थोट्स उनका स्टाइल थोड़ा कम पसन्द था लेकिन फिर भी मैं थोड़ा बहुत उनके जैसे रहने की कोशिश करता था क्योंकि मुझे अपने दोस्तों के साथ रहना था हाँ मेरी चॉइस उनसे अलग थी और मेरी पसन्द को लेकर एक- दो बार मेरे दोस्तों ने मेरा मज़ाक भी उड़ाया उनका इरादा मेरी इंसल्ट करना भले ही नही था पर मुझे चिढ़ाने का जरूर था और मैं चिढ़ा भी था चिढ़ा तो मैं तब भी था जब मेरे ऑफ़िस के कलीग्स को मेरे काम करने के तरीके से प्रॉब्लम होने लगी थी वो बेवज़ह मुझसे ज़रा नाराज़ से रहते और उनके ऐसे बिहेवियर का असर कुछ- कुछ मेरे वर्क पर भी हो रहा था और फिर आखिर मेरे सीनियर्स ने मुझे प्रॉब्लम का सॉल्यूशन दिया। और मैने वैसा ही किया जो उन्होंने कहा था । मैंने अपने कलीग्स के तौर तरीकों को भी अपने काम मे कुछ - कुछ जगाहों पर शामिल करना शुरू कर दिया और कुछ छोटे- मोटे सब्जेक्ट्स पर मैं उनके साथ डिस्कशन भी करने लगा था धीरे- धीरे सब नॉर्मल हो गया। इस तरह मैं सबके लिए खुदको थोड़ा- थोड़ा बदलता गया। ओम अंकल के लिए मैं उनका अच्छा किरायेदार बन गया, दिव्यांशा के लिए अच्छा बॉयफ्रेंड , दोस्तों का उनके जैसा दोस्त और अपने कलीग्स के लिए उनका अच्छा साथी। मैं बदला जरूर पर पूरी तरह नही बस सबके लिए अलग- अलग किरदार में जीने लगा था ना मैंने अपनी पसंद बदली ना ही अपनी सोच बस जब जिसके साथ रहता उस वक्त के लिए थोड़ा सा खुदको बदल लेता पर इस सबके बीच मैं खुदको वक्त नही दे पा रहा था ना ही खुदके लिए अपनी ख़्वाइशों के लिए जी पा रहा था मैं जब भी आईने के सामने खड़ा होकर तैयार होता हूँ तो मुझे आईने में कभी एक इंजीनियर नज़र आता तो कभी दिव्यांशा का बॉयफ्रेंड कभी विशाल अर्जुन का दोस्त तो कभी अपने ऑफ़िस के साथियों का कलीग, निखिल तो जैसे आजकल दिखता ही नही। ये आईना ही तो है जो मुझे बता रहा है कि मैं क्या? था क्या? हूँ और अब क्या? हो गया हूँ। ऊब गया था मैं , ऐसा लग रहा था जैसे मैं जो हूँ वो मैं हूँ ही नही। अब मैं कुछ वक्त बस खुदके साथ रहना चाहता था। इसलिए जब ओम अंकल कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर गए तो मैंने भी ऑफिस से छुट्टी ले ली हाँ मैं अभी भी ओम अंकल का किरायेदार हूँ यहाँ रहते - रहते अब मुझे यहीं रहने की आदत हो गई है और शायद लगाव भी, इसलिए मैंने कोई और घर ढूंढा ही नही। जब हम जानते हो कि अभी आने वाले कुछ दिन बड़े मौज़ के निकलने वाले है तो ये सोचकर ही मन कितना खुश हो जाता है अब दस दिनों तक मैं सिर्फ मैं रहने वाला हूँ अपनी मनमर्जी से जीने वाला हूँ और इस बीच कोई भी मुझे डिस्टर्ब नही करेगा दिव्यांशा भी नही। इसलिए तो आज मैंने अपनी फेवरेट टीशर्ट पहनी मेरा फेवरेट कलर जो मेरे दोस्तों को बिल्कुल भी पसन्द नही था पर मुझे , आज भी ये कलर उतना ही पसन्द है। आज सब कुछ मेरी मनमर्ज़ी का, कितना आज़ाद और कितना हल्का महसूस कर रहा हूँ मैं, जैसे किसी बोझ तले जी रहा था और अब हर एक साँस सुकून भरी है। 
ये सच है कि कभी अपनो के लिए तो कभी मजबूरी में हमें खुद को थोड़ा बदलना पड़ता है पर फिर भी हमे खुदके लिए वो कुछ पल चुरा लेने चाहिए जो सिर्फ हमारे हो जहाँ हम वैसे नही जी रहे हो जैसा कोई हमसे चाहता है बल्कि वैसे जी रहे हो जैसा हम चाहते है,  हम वो हो जो हम है वो नही जो कोई और हमे बनाना चाहता है। दिन में हम आईने के सामने चाहे जितने बार खड़े हो पर एक बार तो ऐसा हो कि सामने हमे सिर्फ हम ही नज़र आये बिना किसी बदलाव बिना किसी बनावट के एक दम असली।  

वो रोशनी


कहीं मिली थी वो रोशनी मुझे, जो चमक रही थी खेतों पर , पेड़ों पर फूलों पर और पत्तों पर।

देखा था मैंने उसे कैसे नटखट अंदाज़ में वो पानी मे झिलमिला रही थी तेज़ चमक कर मेरी आँखों पर जाने कुछ कहना चाह रही थी। फेंका जो कंकड़ किसी ने तालाब में अब वो डुपकी भी खा रही थी पल में पड़ती आंखों पे और पल में ओझल हो जा रही थी। मैंने नज़र हटा ली छोड़ पानी को अब सीधे पहाड़ पर  डाली। 

दूर विशाल सा वो खामोश खड़ा था कुछ नही कह रहा था सालों से जैसे बस गहरी नींद में सो रहा था पर वो वहाँ भी थी , चोटी पर खड़ी रोशनी मुस्कुरा रही थी धीरे- धीरे चंचल पहाड़ पर बिखरी जा रही थी स्पर्श से अपने पर्वत को वो गुदगुदा रही थी कोरों पर उसकी चमचमाती उछलती सी जा रही थी। मैं उठ खड़ा हुआ और चल दिया। 

अब मैं रास्ते पर था रोशनी भी मेरे साथ पथ पर आगे बढ़ रही थी धूप के साथ-साथ ये भी मेरे तन पर पड़ रही थी मैं चला जा रहा था।चिलचिलाती हुई सी ये रास्तों पर चली जा रही थी कंकड़ ,पत्थर ,रेत पर भी इसकी चमक नज़र आ रही थी मोड़ों पर ऐसी इठला रही थी कि देख उसे आँखें धुंधला रही थी। ये रोशनी हर ओर छाई है जिधर भी देखूँ दी ये मुझे दिखाई है। 

मैंने अपने सिर को ऊपर उठाया आँखों को आकाश पर टिकाया आकाश प्रकाश से उज्ज्वल हो रहा था कितने अदभुत नज़ारे में मैं खो रहा था आकाश में उड़ते पंछी भी रोशनी पा रहे थे जितनी तेज़ी से वो अपने पंख चला रहे थे लग रहा था रोशन होते आकाश में उत्साह से झूमते जा रहे थे ये रोशनी उमंग भरी है आशा की उजियारी लाई है अब तो मेरे चेहरे पर भी आई है।

तेज़ मद्धम होती रोशनी मेरे चेहरे पर पड़ रही थी जैसे लुक्का- छुप्पी का खेल कोई कर रही थी तेज़ी से आते हुए धीमे से कुछ कहना चाह रही है शायद अब ये मेरे मन में रहना चाह रही है। मैंने आँखों को बंद कर लिया, रोशनी मैंने अपने अंदर भी पाई है इसकी चमक मुझमे भी आई है। चहुँ ओर है ये समाई बात उसने ये मुझे बताई। जग में जिसकी जैसी जो हो काया रही है, रहेगी रोशनी की माया। 

कहीं मिली थी वो रोशनी मुझे,जो चमक रही थी खेतों पर , पेड़ों पर फूलों पर और पत्तों पर।

नाराज़गी तेरी


लगातार हो रही बारिश से सारा हाल बेहाल सा नज़र आ रहा था रास्ते भीगे हुए थे और कहीं - कहीं सड़को पर पानी भी भर गया था कार ड्राइव करने में थोड़ी दिक्कत तो हो रही थी लेकिन फिर भी ये सफर मुझे अच्छा लग रहा था वैसे बारिश बहुत तेज़ नही हो रही थी लेकिन रुक भी नही रही थी कभी पानी धीमे- धीमे गिरता तो कभी अचानक थोड़ा तेज़ बरसने लगता और फिर वापस बारिश धीमी हो जाती, लग रहा था मानो जैसे बारिश का अपना ही एक अलग मूड बन रहा हो जोकि बार - बार बदले जा रहा था। वैसे मूड तो मेरा भी कुछ - कुछ बदल रहा था ड्राइव करते हुए मैं रास्तों को बड़े गौर से देख रहा था ये भीगी हुई सी सड़के ये भीगे रास्ते ना जाने क्यों मुझे अच्छे लग रहे थे बारिश में भीगे ये पेड़ रात में ठीक से नज़र तो नही आ रहे थे पर फिर भी मुझे लगा जैसे ये होले से मुस्कुराएं हो, अब मैं धीरे- धीरे गुनगुनाने लगा। गुनगुनाते हुए चोरी- चोरी मेरी नजरें आयुषी को भी देख रहीं थी आयुषी मेरे बगल वाली सीट पर ही थी कोशिश बहुत की आयुषी ने की उसकी नींद ना लगे पर थकान और रात का लम्बा सफर है तो नींद तो आनी ही थी। वैसे भले ही अभी वो नींद में है पर लग रहा है जैसे अभी मुझे गुस्से में घूरने ने लगेगी पूरे टाइम नाराज़ - नाराज़ सी ही तो रहती है। वैसे अच्छा है की आयुषी अभी सोइ हुई है कुछ पल ही सही मैं उसे मन भर कर देख पा रहा हूँ नही तो मेरी ज़रा गलती से भी नज़र इसकी ओर हो जाये तो कितना चिढ़ जाती , पर सोते हुए कितनी शांत लग रही है कोई गुस्सा या नाराज़गी चेहरे पर नही दिखाई दे रही लेकिन उसकी ज़ुल्फ़ें जरूर उसके चहरे पर आ रही है एक बार मन किया कि उसकी ज़ुल्फों को अपने हाथों से उसके कान के पीछे कर दूँ पर आँखों ने मना कर दिया इसे ऐसे ही रहने दो गालों को छूती इन ज़ुल्फों से आयुषी कितनी खूबसूरत लग रही है उतनी ही प्यारी जितनी तब लगी थी जब पहली बार देखा था सादगी से भरी होले से अपनी पलकों को उठाती - गिराती धीरे से मुस्कुराती हुई उस वक्त कितनी सौम्यता थी आयुषी की आँखों मे और आज सिर्फ गुस्सा और नाराज़गी दिखाई देती है। ओह! क्या हुआ? सॉरी वो सड़क पर गढ्ढ़ा था मैंने देखा नही तुम सो जाओ मैंने कहा तो आयुषी बोली नही मैं सो नही रही थी बस ऐसे ही आँखें बंद की हुई थी कहकर आयुषी खिड़की के बाहर देखने लगी। मैं भी ना रास्ते पर ध्यान नही दिया जाग गई वो अब फिर किसी पुरानी फ़िल्म की भूतनी की तरह मुझे तिरछी निगाहों से देखेगी।वैसे जिसे नही जागना चाहिए था उसकी नींद खुल गई और जिन्हें जागना चाहिए था उन्हें बड़ी ज़ोरों की नींद आ रही है। कुशल और देविका दोनों की ऐसी नींद लगी हुई है जैसे ये अपने घर मे ही हो कुशल , कुशल, उठना कुशल क्या हुआ? घबरा कर आँख खोलते हुए कुशल बोला , तूने कहा था ना आधे रास्ते तू कार ड्राइव करेगा हाँ कहा तो था हाँ तो चल अब आ। गाड़ी रोककर मैंने और कुशल ने अपनी सीट बदल ली कुशल ड्राइविंग सीट पर बैठ गया और मैं पीछे की सीट पर जा बैठा क्योंकि अब कुशल गाड़ी ड्राइव कर रहा था तो देविका भी उसके पास जा बैठी और आयुषी को पीछे बैठना पड़ा। मैं और आयुषी पीछे साथ बैठे जरूर थे पर दूर - दूर ,गाड़ी की एक खिड़की की ओर मैं बैठ गया और दूसरी तरफ आयुषी। आयुषी की निगाहें गाड़ी से बाहर रास्ते की ओर थी शायद अब उसे नींद नही आ रही थी मैंने अपने हाथ मे पहनी घड़ी में देखा तो तीन बजे रहे थे अभी पुणे पहुँचने में हमे और कुछ घन्टे बाकी थे। वैसे अब बारिश पूरी तरह थम गई थी अचानक से सब कुछ खामोश सा लगने लगा था और आयुषी वो तो पहले से ही चुपचाप थी। लगता है बारिश थम गई है मैंने आयुषी की ओर देखते हुए कहा हाँ पता है मुझे आयुषी बोली उसके ये कहने में भी कितनी बेरुखी थी। मैं अच्छी तरह जानता हूँ अगर ऑफिस रिलेटेड वर्क नही होता और उसका मीटिंग अटेंड करना जरूरी नही होता तो ना तो आयुषी हमारे साथ जाती और ना ही अभी मेरे साथ इस गाड़ी में बैठी होती। लेकिन उसे प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ को अलग रखना आता है तभी तो वो मेरे ही ऑफिस में है,असिस्टेंट मैनेजर बनकर। उस दिन इंटरव्यू में उसे अपने सामने देख मैं चौक गया था मैं इन्टरव्यूवर के साथ था सबके साथ मैंने भी आयुषी से दो- तीन सवाल पूछे और आयुषी ने सभी सवालों के जवाब पूरे कॉन्फिडेंस से दिये मुझे अपने सामने देख ज़रा भी हिचकिचाई नही बस एक पल के लिए खामोश जरूर हो गई थी। बाद में मैं सोचता रहा अगर आयुषी सिलेक्ट हुई तो क्या वो जॉइन करेगी या मना कर देगी एक सप्ताह बाद अपने केबिन में उसे देख मुझे अपने सवाल का जवाब मिल गया। मिस आयुषी आप , येस सर दिवेश सर ने कहा है मुझे आपके गाइडडेन्स में वर्क करना है ओके आयुषी की बात सुनने के बाद मैंने कहा उसके बाद आयुषी और मेरे बीच ऑफिस वर्क रिलेटिड डिस्कशन शुरू हो गया। 6 महीने हो गये है आयुषी और मुझे साथ काम करते हुए पर इन 6 महीनों में किसी भी दिन कुछ पल के लिए भी ऐसा नही हुआ की कभी आयु और तन्मय के बीच बात हुई हो हर वक्त बस एक एच आर मैनेजर और असिस्टेंड मैनेजर के बीच ही बात हुई है। मैं कभी - कभार आयुषी का नाम पहले की तरह पुकार लेता तो उसकी आँखें मुझे ऐसे देखती जैसे कह रही हों कि कैसे,  तुम कैसे मुझे इस तरह पुकार सकते हो और तब मैं अपनी पलकें झुका लेता। सफर अगर रात का हो तो रात लम्बी लगने लगती है ऐसा लग रहा है जैसे रास्ते पर बस आगे चलें जा रहे हो और मंजिल आ ही नही रही हो और ये रात , ये हमारे साथ सफर में आगे बढ़ती जा रही हो। धीरे- धीरे मेरी पलकें बंद होने लगी थी मेरी आँखों पर नींद का कब्ज़ा हो रहा था साथ ही खिड़की से आती ठंडी हवा मुझे कुछ हल्की सी ठंड का एहसास दिला रही थी। फिर ऐसा लगा जैसे रात ने अपनी शॉल मुझ पर डाल दी हो जो ठंड के एहसास को ज़रा कम रही थी, और फिर मुझे नींद आ गई। मोबाइल में लगे सुबह 6 बजे के अलार्म ने मुझे नींद से जगाया आँख खुलते ही जब नज़र आयुषी पर पड़ी तो मैंने झट से अलार्म बंद कर दिया आँखें बंद किये खिड़की से अपना सिर टिकाये आयुषी सो रही थी अच्छा हुआ कि अलार्म से उसकी नींद नही खुली। ये दुप्पटे जैसा क्या है? मैं देखने लगा तो कुशल बोला स्टॉल है आयुषी का, वो तुझे नींद में ठंड लग रही थी तो आयुषी ने अपना स्टोल तुझे ओडा दिया दरसल मैंने ही उससे कहा था दबी सी आवाज़ में कुशल बोला मैंने कुशल को ज़रा सा घूरा और फिर स्टोल आयुषी को ओढ़ा दिया। हम सब एक साथ एक ही कम्पनी ने में काम करते है पर कुशल मेरा दोस्त भी है और देविका उसकी वाईफ, तीन महीने पहले ही दोनों ने शादी की है। अच्छा सुन गाड़ी रोक अब मैं ड्राइव करता हूँ तू भी थक गया होगा वैसे अब एक - दो घन्टे ही बाकी है ना पहुँचने में मैंने कुशल से कहा, ठीक है मैं ऐसा करता हूँ किसी ढाबे या रेस्टुरेंट के पास गाड़ी रोक लेता हूँ कुशल बोला। इसके बाद कुशल ने पहले देविका को आवाज देकर जगाया और फिर एक ढाबे के पास गाड़ी रोक ली गाड़ी के रुकते ही आयुषी की नींद भी खुल गई आयुषी नींद हो गई पूरी चलो हम कुछ देर यहाँ रुकने वाले है देविका आयुषी से बोली आयुषी धीमी सी मुस्कान के साथ मुस्कुरा दी और फिर हम चारों ढाबे के अंदर जाकर बैठ गए। कुशल जल्दी कुछ ऑर्डर करो ना लेकिन पहले मुझे चाय भी पीनी है अरे हाँ बाबा मैं वही सोच रहा हूँ पर मेन्यू तो दिख ही नही रहा कुशल मुझे लगता है हमे वहां काउन्टर के पास जाकर पता करना चाहिए मैंने कहा। ठीक है तो चलो फिर चलो हम दोनों चलकर देखते है कुशल ने कहा। नही मैं भी चलूँगी तुम दोनों जाओगे तो पता नही क्या ऑर्डर करके आओगे देविका तुम आयुषी के पास ही बैठो मैं देख लूँगा मेन्यू में तुम्हारी पसन्द का कुछ , नही कुशल मुझे भी साथ चलना है। कुशल ऐसा करो तुम दोनों ही चले जाओ ठीक है अरे यार तन्मय ओके, चलो मैडम। कुशल और देविका मेन्यू देखने चले गये और अब मैं और आयुषी हम दोनों साथ बैठे हुए थे हमारे बगल वाली टेबल पर एक कपल भी बैठा हुआ था जो देखने में अनमैरिड लग रहा था लड़का हाथ में गुलाबों भरा बुके लिए लड़की से कुछ कह रहा था लड़की मुस्कुराते हुए उसकी बातों को सुन रही थी मैं और आयुषी उन दोनों को ही देख रहे थे और अब तो कुशल और देविका भी आ गये थे उस लड़के ने बुके लड़की की ओर बढाया और कहा मैं हमेशा तुम्हें खुश रखूँगा आय प्रॉमिस लड़की ने बुके अपने हाथ में लिया और बोली मैं भी हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगी आय प्रॉमिस। कितना क्यूट कपल है खुश होते हुए देविका ने कहा, हाँ बिल्कुल हमारी तरह कुशल हँसते हुए बोला इस कपल को देख कुशल और देविका दोनों अपनी ही बातों में उलझ गए पर मैं और आयुषी हम दोनों कुछ नही कह रहे थे हम तो चुप से बैठे हुए एक - दूसरे को देख रहे थे सारे प्रॉमिसेस पूरे नही होते कुछ अधूरे भी रह जाते है मेरी तरह शायद आयुषी भी यही सोच रही होगी इस कपल की तरह मैं और आयुषी भी ऐसे ही साथ बैठे हुए थे हमारा रिश्ता तय होने के बाद ये हम पहली बार मिल रहे थे क्योंकि हमारी फैमली एक - दूसरे को पहले से ही जानती थी तो फ़ैमिली फंक्शन्स में हमारी मुलाकातें पहले भी हुई थी पर इस तरह नही, लग रहा था जैसे आज हम पहली बार मिल रहें हो क्योंकि इतने गौर से मैंने आयुषी को पहले देखा ही नही था। हम दोनों आमने- सामने बैठे हुए थे दोनों को ही समझ नही आ रहा था कि बात कैसे शुरू करें आयुषी होले से अपनी पलकों को झपकाती थोड़ा सा मुस्कुराती और फिर कुछ भी नही कहती उसे इतना हिचकिचाता देख मैं खुद भी कुछ नही कह पाता और कुछ देर बाद जैसे - तैसे ही सही हमारे बीच बात शुरू हुई आयुषी मुझे एक सिंपल सी लड़की लगी जो अपनी लाइफ और अपने से जुड़े रिश्तों को लेकर काफी संजीदा थी आयुषी की सीधी- साफ बातों ने और उसकी सादगी ने मेरे मन को छू लिया। तन्मय अरे कहाँ खो गये कुछ खा क्यों नही रहे हो कुशल ने कहा ,हाँ खा रहा हूँ ना मैंने कहा। इस वक्त हमारे सामने खाने की जो भी चीजें रखी हुई थी वो सब देविका की पसन्द की ही थी इसलिए तो इतना खुश होकर चटकारे लेते हुए खाये जा रही थी पर आयुषी की तो आँखे भर आयीं और चेहरा लाल पड़ गया क्योंकि चाट बहुत तीखी थी पानी तो पिया उसने पर फिर भी जुबान जल रही थी उसे ऐसे देख मैं धीरे से मुस्कुरा दिया तो उसकी आँखें गुस्से से बड़ी हो गई मैं उठकर चला गया और 2 मिनिट में ही वापस आ गया ये लो इसे खालो मैंने कहा नही जरूरत नही है अब ठीक हूँ मैं आयुषी बोली, अरे लेलो ना आयुषी देखो क्या हालत हो गई है वो भी मेरी वजह से मैंने ही कहा था तीखा बनाने के लिये प्लीज़ लेलो। देविका की बात मान कर आयुषी ने रसमलाई लेली। अब हम वापस अपनी गाड़ी में थे बस कुछ देर में घर पहुँचने वाले थे लो भई मेरा घर तो आ गया कुशल आ जाओ ड्राइविंग सीट पर अब तुम ड्राइव करना और आयुषी को ठीक से घर छोड़ देना ओके बाय, बाय देविका बाय आयुषी , बाय आयुषी धीरे से बोली। 

सफ़र में जाते वक्त हम जितने तरो- ताज़ा होते है लौटते वक्त उतने ही थके हुए भी रहते है मेरा पूरा शरीर थकान से भर गया था मन बस कुछ देर आराम करने को कह रहा था इसलिए नहाने के बाद मैं सीधा अपने बेड पर जाकर लेट गया आँख ज़रा लगी ही थी कि अचानक आयुषी का ख्याल आ गया और आँख खुल गई सुबह जब आयुषी ने बाय कहा था तब, तब उसकी आवाज में बेरुखी ज़रा कम थी ये रसमलाई का असर था क्या? सोचते हुए मेरे होंठों पर छोटी सी स्माइल आ गई फिर अगले ही पल सोचने लगा कि कितनी अजीब बात है कभी आयुषी मुस्कुराते हुए मुझसे ढेरों बातें किया करती थी और मैं उसकी बातों को सुनकर खुश हुआ करता था और आज , आज मैं इस बात से खुश हो रहा हूँ कि उसकी आवाज में आज मेरे लिए बेरुखी कम थी वक्त किस तरह बदल जाता है। 4 साल पहले सब कुछ कितना अलग था कैसे मैं और आयुषी छिप- छिपकर बातें किया करते थे चोरी- चोरी मिला करते थे जबकि कुछ दिनों बाद हमारी शादी होने वाली थी पर शादी के पहले छुप- छुपके मिलने का मज़ा ही कुछ और होता है उन कुछ दिनों के साथ में मैं आयुषी के मन को पढ़ना सिख गया था उसका तेज़ - तेज़ पलकें झपकाकर किसी बात को बेधड़क कह जाना और फिर कहते हुए एक दम से चुप रह जाना ज़ुबान के साथ- साथ उसकी पलकें भी ठहर जाती थी और फिर धीरे से अपनी नज़र मेरी ओर करते हुए कहती अब तुम भी तो कुछ बोलो फिर मैं कहता हाँ आयु मैं बोल तो रहा हूँ बस तुमने सुना ही नही। हाँ मैं आयुषी के मन के इतने पास आ गया था कि मुझे उसे आयुषी से आयु कहना का हक मिल गया था जो सिर्फ उसके अपनो का था अब मैं भी उसके अपनो में शामिल हो गया था। ये चाहत का एहसास बड़ा प्यारा होता है ऐसा लगता है जैसे हर तरफ बहार आ गई हो हर चीज बड़ी प्यारी और खूबसूरत दिखाई देने लगती है मन खुशी के पंख लगाकर मन मानी उड़ान भरने लगता है बिना ये सोचे कि वो किस दिशा में आगे बढ़ रहा है क्योंकि उसे तो अभी, हर एक दिशा एक जैसी ही नज़र आ रही होती है ,आसमान में चमकते तारे भी ऐसे लगते है जैसे अभी - अभी इनकी चमक पहले से और बढ़ गई हो,सब कुछ बहुत अलग सा लगने लगता है आयुषी और मुझे तो अब दिन भी कुछ बदले हुए से लगने लगे थे नई धूप नई छाँव एक नई डगर जिस पर हाथ थामे हम साथ चलने वाले थे। पर आने वाले कल के बारे में क्या कोई बता सकता है कि कल क्या? होगा या कल कैसा? होगा, नही ना। अब शादी को बस कुछ दिन रह गये थे हम दोनों के घरों में तैयारियाँ शुरू हो गई थी लेकिन दादाजी और आयुषी के मौसाजी के बीच मज़ाक में शुरू हुई एक छोटी सी बहस से सब कुछ बदल गया बड़ो के गुस्से और अहम के आगे एक रिश्ता जुड़ने से पहले ही टूट गया, खुशी से खिलते हुए चेहरों पर खामोशी ने अपनी जगह बना ली थी। तब सिर्फ रिश्ता ही नही टूटा था किसी का विश्वास और दिल भी टूट गया था टूटे हुए दिल की तखलिफ़ सही जा सकती है पर टूट हुए विश्वास का दर्द बहुत गहरा होता है आयुषी की आँखों मे दिखता है वो दर्द मुझे, बुरा लगता है उसे ऐसे देखकर पर कहूँ भी तो क्या।    

अगले दिन मैं रेडी होकर ऑफिस के लिए निकल रहा था जब अपना वॉलेट निकालने के लिए ड्रॉअर खिंचा तो मेरा वॉलेट नही था उसमें , घर मे सब जगह देख लिया पर कहीं नही मिला मैं ऑफ़िस चला गया। अपने केबिन में बैठे हुए मैं याद करने की कोशिश कर रहा था कि लास्ट टाइम मैंने अपना वॉलेट कहाँ रखा था हाँ कल जब मैं कार ड्राइव कर रहा था तब मैंने वॉलेट निकालकर वहीं सामने रख दिया था ओह! नो कहीं कुशल की गाड़ी में तो मेरा वॉलेट नही रह गया वो तो आज आने भी नही वाला उसे कॉल करता हूँ मैंने अपना फोन उठाया कि तभी आयुषी आ गई। सर, आयुषी कहो, सर कुशल सर ने कल ये आपका वॉलेट मुझे दिया था आपको देने के लिए। अच्छा थैंक्यू मैंने कहा। आयुषी को देख लग रहा था जैसे वो कुछ कहना चाहती है, क्या? हुआ आयुषी कुछ कहना है तुम्हें आयुषी ने अपना सिर हिला दिया, बोलो ना। मुझे बस इतना कहना है की जिससे आपका कोई रिश्ता ही नही है उसकी तस्वीर आपको अपने पास नही रखनी चाहिए क्योंकि आपको कोई हक नही है कहकर आयुषी जाने लगी तो मैंने उसे रोक लिया आयुषी रुको प्लीज़ एक बार मेरी बात सुन लो। क्या किसी को अपना मानने के लिए किसी रिश्ते या किसी तरह के हक का होना जरूरी है कहते हुए मैं उसके सामने जा खड़ा हुआ सॉरी, सॉरी जो कुछ भी हुआ उस सब के लिए तुम्हारा विश्वास टूटा उसके लिए मैंने अपना प्रॉमिस तोड़ा उसके लिए। उस दिन जब तुमने मिलने के लिये कहा तब आने वाला था मैं, पर नही आ सका क्योंकि मैं मजबूर था सॉरी आयुषी मैं चाहकर भी कुछ नही कर सका। जो हुआ उसे हम बदल नही सकते पर उस वक्त की कड़वाहट को हर पल साथ लेकर चल भी तो नही सकते क्योंकि इससे हमें ही तखलिफ़ होगी,आयु अपने मन मे भरे गुस्से और नाराजगी से खुद को और दुख मत पहुँचाओ चाहो तो मुझे पर अपना सारा गुस्सा निकाल लो। इस वक्त आयुषी की आँखों से सिर्फ आँसू नही बह रहे थे ये उसके मन का वो दर्द भी था जिसे आयुषी कब से मन ही मन महसूस कर रही थी। मैं नही कह रहा कि मुझसे नाराज़ मत रहो बस इस नाराज़गी से खुद को आज़ाद कर दो। तब सिर्फ तुम्हें ही दुख नही पहुँचा था आयु, दिल तो मेरा भी टूटा था आयुषी की आँखों में देखते हुए मैंने कहा। जब किसी से अपने मन की बात कह देते है तो मन कितना हल्का सा महसूस करने लगता है जैसे दिल पर कोई बोझ था जो उतर गया हो आयुषी से बात करने के बाद मुझे ऐसा ही लग रहा था।

आज सुबह ऑफिस में जब आयुषी और मेरा सामना हुआ तो आयुषी कुछ बदली सी लगी हमेशा उसके चेहरे पर दिखने वाला वो गुस्सा आँखों मे नाराज़गी आज थी नही या फिर दिखी नही मुझे। आयुषी जब फाइल लेकर केबिन में आई तब भी वो उखड़ी सी नज़र नहीआई, उसे ऐसे देख मन को सुकून मिल रहा था वरना उसकी आँखों की वो नाराज़गी कितनी चुभती थी मुझे। अब बस एक ही विश है, फ्लॉवर पॉट में रखे इन फूलों की तरह आयु भी ऐसे ही महकती रहे और कभी ना मुरझाये।

मेरे दोस्त



मेरे दोस्त,

मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ ,  तुम्हारी ज़िदंगी के हर पल में नही पर कुछ पल में ही सही मैं तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ। एक बार फिर से उन बीते लम्हों को तुम्हारे साथ जीना चाहता हूँ फिरसे हाथों में एक- दूसरे का हाथ लिये मस्तमौला चाल में तुम्हारे साथ चलना चाहता हूँ चाहे मेरे गले मे बंधी टाई तिरछी जा रही हो या फिर तुम्हारी शर्ट कमर में बेल्ट होते हुए भी थोड़ी बाहर आ रही हो पर तब भी मुस्कुराते हुए हम यूँ चल रहे हो जैसे हमारा ये मतवाला अंदाज देख सब हमसे जल रहे हो। 

हम फिर से मस्ती में एक - दूसरे के बाल बिगाड़ें और फिर अपने हाथों की उँगलियों से होले - होले उन्हें सुधारें , मेरी पेंसिल गुम हो जाने पर तुम अपनी पेंसिल मुझको दे देना , हो गई मुझसे गुम ये अपने घर पर कह देना। मैं फिरसे दो लड्डू चुपके से अपने बस्ते में छिपाकर तुम्हारे लिए ले आऊँगा तुम खाते हुए कहना हम्म अच्छा लगा मैं कल भी खाऊँगा। जब मैं होमवर्क करके ना लाऊँ तो तुम भी अपनी कॉपी छिपा लेना मेरे साथ - साथ तुम भी डाँट खा लेना। 

थोड़े बड़े होने पर जब हमारी क्लासें अलग हो जाएंगी तुम साइंस पढ़ रहे होंगे और मेरे बस्ते में कॉमर्स की किताबें आ जाएंगी। अब हम साथ नही बैठ पाएंगे पर फिर भी लंच में हम टिफ़िन एक - दुसरे का ही खाएंगे। कुछ तुम अपनी क्लास की बातें मुझसे कहना कुछ मैं तुम को सुनाऊँगा। भले ही दोस्त कुछ नये बन जाये पर छुट्टी के बाद तुम्हारे पीछे साइकिल पर बैठकर मैं ही साथ जाऊँगा। रास्तेभर हम बातें करतें जाएंगे जो कुछ नई - नई बातें अभी हमने सीखी है हम एक - दूसरे को समझाते जाएंगे।

धीरे- धीरे दिन आगे बढ़ेंगे और थोड़ा- थोड़ा वक्त बदल जायेगा। हमे एक - दूसरे का साथ पहले जैसा नही मिल पायेगा। हम कॉलेज में आ जायेंगे हमें मुस्कुराते खूबसूरत नए चहरे मिल जायेंगे अब हम दोनों की दुनिया बदलने लगेगी दोस्तों के साथ मौज - मस्ती , कभी पढ़ाई , करियर जिंदगी कुछ ऐसे चलने लगेगी। अब हम कभी - कभार ही मिल पायेंगे लेकिन फिर भी एक दिन में ही बीते दिनों की सारी कथा सुना देंगे जो कुछ भी होगा मन मे सब बता देंगे। इतने दिनों बाद हुई इस मुलाकत में बातें बहुत होंगी कुछ- कुछ कहकर हम खूब मुस्कुरायेंगे और फिर बाद में गले लगकर बाय फिर मिलेंगे यार, कहकर हम अपने - अपने रास्ते चले जायेंगे।

दिन अब तेज़ी से गुजरेंगे और वक्त पूरा बदल जायेगा हमारा साथ अब पूरी तरह छूट जाएगा। हम दोनों अपने - अपने सपनो अपनी- अपनी मंजिल की ओर दौड़ जायेंगे हम दूर और दूर होते जायेंगे। अपने साथ बिताए उन प्यारे लम्हों को हम अब कल के हाथों मे छोड़ जायेंगे। अभी एक शहर में रहते हुए भी हमे महीनों हो जाया करता था मिले हुए, अब तो सालों हो जायेंगे दो दोस्त मिल नही पायेंगे। अपनी मंजिल की ओर बढ़ते हुए हम बहुत आगे निकल जायेंगे हमारा अपना एक नया जहाँ बसायेंगे जिसमे हमारे अपने होंगे कई दोस्त होंगे जिनके साथ हम खुश होंगे और शायद तब तक हम एक- दूसरे को भूल भी चुके होंगे। 

मुझे नही पता कि मैं तुम्हे याद हूँ कि नही मेरे दोस्त पर, हाँ तुम मुझे याद हो। दोस्त तो मेरे कई है सब अच्छे है पर तुम , तुम हो जब सबके साथ होते हुए भी बोर मैं होने लगता हूँ या तन्हा सा महसूस करता हूँ तो बस झुकाकर अपनी पलके मन मे झाँक लिया करता हूँ और तब पहने स्कूल की यूनिफार्म सबके बीच खड़ा कोई मुझे देख मुस्कुराता है भोला सा चेहरा बिखरे से बाल शर्ट की तो उसके बड़े ही बुरे हाल, देखते ही उसे आँखें मेरी चमक उठती है और दिल मुस्कुराने लगता है यार मेरा मुझे नज़र आने लगता है।   

मैं नही कहता कि तुम हर पल मुझे याद रखो मैं तो इतना चाहता हूँ कि अपनी यादों में बस एक पल मुझे भी अपने साथ रखो। मैं नही कह रहा कि सिर्फ़ मैं ही तुम्हारा दोस्त हूँ बस इतना याद रखो की मैं भी तुम्हारा दोस्त हूँ। मैं नही कहता हर दम मेरा ख़्याल रखना बस इतना चाहता हूँ कि ख्यालों में अपने थोड़ी सी ही मगर जगह मेरे लिए भी रखना। मैं नही कह रहा की अपने नये दोस्तों के साथ वक्त मत बिताना मैं तो इतना चाहता हूँ  की कभी वक्त निकालकर आज नही कुछ सालों बाद ही सही पर मुझसे मिलने एक बार तो आना।  

मेरे दोस्त, मैं तुमसे कहना चाहता हूँ कि एक बार फिर से मैं तुम्हारे साथ बेपरवाह होकर जीना चाहता हूँ , अपने दिल की कुछ बातें कहना चाहता हूँ कुछ तुम्हारे मन का हाल मैं सुनना चाहता हूँ। फिर मनमौजी अंदाज में थामे तुम्हारा हाथ उसी रास्ते पर चलना चाहता हूँ जहाँ से हम कभी रोज़ गुजरा करते थे। मैं बेफ़िक्री के उस कल को आज के इस पल में लाना चाहता हूँ। माना कि अब वक्त पहले जैसा नही रहा और दोस्त हम पुराने है पर दोस्ती के तो आज भी ज़माने है। मेरे दोस्त मैं बस इतना कहना चाहता हूँ मैं दोस्त हूँ तुम्हारा और सदा रहना चाहता हूँ।


कुल्फ़ी भाग - 2



चार महीने पहले की बात है प्रोफेसर कुलदीप गुस्से में घर से निकल रेस्टुरेंट जा रहे थे आज प्रोफेसर साहब की कार की रफ़्तार रोज़ से थोड़ी ज्यादा थी पर इस बात का उन्हें ज़रा भी  अंदाजा नही हो पाया वो तो गुस्से में ये भी नही देख पाए कि रेस्टोरेंट पीछे छूट गया और वो गाड़ी चलाते हुए आगे निकल आये और नुक्क्ड़ वाले रास्ते पर आ पहुँचे जब प्रोफेसर साहब ने रास्ते पर गौर किया तब उन्हें पता चला की रेस्टुरेंट तो पीछे रह गया और वो कितना आगे निकल आये। अपनी गाड़ी को रोककर प्रोफेसर साहब कुछ देर कार में ही बैठे हुए नुक्क्ड़ पर लगी स्टॉल और यहाँ खड़े लोगो को देख रहे थे एक तरफ लोगों को देख मन कर रहा था कि एक बार यहाँ की चाय टेस्ट कर कर देखूँ दूसरी ओर मन कहता अरे! नही, पता नही कैसा होगा सब कुछ मुझे शायद अच्छा ना लगे लेकिन और भी तो लोग है यहाँ, अपने आप को समझाते खुद से कहते हुए प्रोफेसर साहब नुक्क्ड़ की टी स्टॉल आ पहुँचे और बाकी की लगी और स्टॉल को भी ध्यान से देखने लगे वही लकड़ी की बेंच थी तो प्रोफेसर साहब उस पर बैठ गए सर जी चाय , चाय वाले भईया के हेल्पर दीपू ने कहा, हाँ अ मुझे प्रोफेसर कुलदीप ने कुछ सोचते हुए इतना कहा और दीपू ने चाय का ग्लास ये कहते हुए हाथ मे दे दिया की भईया के हाथ की चाय है सबको बहुत पसन्द है। प्रोफेसर साहब कुछ कह नही पाए थोड़े हिचकते हुए ही सही पर उन्होंने चाय पी ली और सच में चाय का टेस्ट अच्छा था। क्योंकि बारिश का मौसम था तो पानी की हल्की- हल्की फ़ुहारें तो आ रही थी पर अब बादल गरजने भी लगा था प्रोफेसर साहब गरजते बदलों की ओर ध्यान लगाकर देख रहे थे जैसे ये गर्जना बादलों की नही उनके मन की हो, बारिश की बूंदे अब तेज हो गई थी और प्रोफेसर उन बूंदों में भीग रहे थे तब अचानक पानी की आती बूंदे रुक गई प्रोफेसर साहब ने जब पलकें ऊपर कर देखा तो किसी ने अपना छाता उनकी ओर भी किया हुआ था। ये अनुराग था जो प्रोफेसर कुलदीप के बगल में बैठा हुआ था जब उन्होंने अनुराग की तरफ देखा तो अनुराग बोला आप भीग रहे थे ना तो मैंने छाता थोड़ा आपकी तरफ भी कर दिया। अनुराग को देख उन्हें लगा जैसे उनका कोई अपना सा हो थैंक यूँ प्रोफ़ेसर साहब बोले। अब एक छाते के नीचे अनुराग और प्रोफेसर साहब दोनों थे अब प्रोफ़ेसर साहब का तो चलो ठीक है पर अनुराग कब तक चुप बैठता , तो बस उसने बोलना शुरू कर दिया आपको भी भईया के हाथ की चाय पसन्द है अनुराग ने पूछा हाँ वैसे अभी तक तो नही थी पर अब है क्यों तुम भी यहाँ चाय पीने आये हो प्रोफेसर साहब ने कहा अरे! नही नही मैं चाय नही पीता, अच्छा तो फिर ऐसा क्यों पूछा आपको भी चाय पसन्द है , वो वो तो इसलिए क्योंकि ये दीपक भईया जो है वो बोलते है भईया के हाथ की चाय है सबको बहुत पसंद है। अनुराग ने दीपू के अंदाज़ में कहा तो प्रोफेसर साहब को हँसी आ गई अनुराग भी खिल - खिलाकर हँस पड़ा। अरे बारिश रुक गई कहते हुए अनुराग ने अपना छाता बंद कर लिया। तुम्हरा नाम क्या है मेरा नाम अनुराग है प्रोफेसर साहब के पूछने पर अनुराग बोला। तुम चाय नही पीते तो यहाँ क्या? कर हो मैं कुल्फ़ी खाने आया हूँ कुल्फ़ी वाले अंकल की मावा कुल्फ़ी बड़ी टेस्टी होती है पर अभी वो आये नही है इसलिये मैं उनके आने का इंतजार कर रहा हूँ कुछ देर बाद जब कुल्फ़ी वाला आया तो अनुराग दौड़कर गया और कुल्फ़ी लेकर वापस प्रोफ़ेसर साहब के पास आ बैठा दोनों ही काफी देर तक जाने क्या- क्या बातें करते रहे ,इस 9 -10 साल के लड़के से बातें कर प्रोफ़ेसर साहब को ऐसा क्या महसूस हुआ जो उनके मन में गुस्से और नाराज़गी का उठा तूफ़ान अब शांत हो गया था। जब अनुराग उठकर घर जाने लगा तब प्रोफ़ेसर कुलदीप ने उसे जाते देख पूछ लिया अनुराग कल भी आओगे कुल्फ़ी खाने जबकि बाद में वो खुद सोच में पड़ गये कि उन्होंने आखिर ये क्यों ? पूछा अनुराग से। चमकती आँखों और बड़ी सी स्माइल के साथ अनुराग बोला हाँ आऊँगा ना। अगले दिन प्रोफेसर साहब चाय की स्टॉल पर बैठे अनुराग के आने का इंतज़ार कर रहे थे अनुराग जब वहाँ पहुँचा तो प्रोफेसर को देखते ही बोला अरे! आप आज भी आये है। हाँ प्रोफेसर साहब बोले, मैं अभी आता हूँ कहकर अनुराग कुल्फ़ी लेने चला गया और दो कुल्फ़ी ले आया। आज दो कुल्फ़ी एक साथ खाओगे प्रोफेसर कुलदीप ने पूछा तो अनुराग बोला अरे नही एक कुल्फ़ी तो मैं आपके लिए लाया हूँ, मेरे लिए पर क्यों ? मुझे देखकर आपका मन भी तो करेगा ना कुल्फ़ी खाने का इसलिए। अनुराग की बात सुन प्रोफेसर कुलदीप हँसने लगे और हँसते हुए बोले हाँ बिल्कुल सही है तो फिर लाओ कुल्फ़ी ,अनुराग ने कुल्फ़ी प्रोफेसर साहब के हाथ मे पकड़ा दी दोनों ने साथ - साथ मज़े से कुल्फ़ी खाई और फिर खूब सारी बातें कीं। इस भोले से चेहरे वाले अनुराग की बातों जाने क्या खास था जो प्रोफेसर साहब उसकी बातों को इतना गौर से सुने जा रहे थे । अनुराग ने बातों - बातों में कहा कि उसके दोस्त तो कई सारे है पर कोई भी बहुत समझदार नही है उसकी तरह, लेकिन उसे एक समझदार दोस्त चाहिये। अनुराग को ऐसे कहते सुन प्रोफेसर साहब को मन मे हँसी तो आई पर फिर बोले अनुराग मुझे अपना दोस्त बना लो मैं बहुत समझदार तो नही हूँ पर हाँ थोड़ा समझदार तो हूँ थोड़े शरारती अंदाज़ में कहते हुए प्रोफेसर कुलदीप अपने एक पैर को मोड़ते हुए दूसरे पैर पर रखकर एकदम सीधे होकर बैठ गए। अनुराग ने प्रोफेसर की ओर ध्यान से देखा कुछ देर मन ही मन कुछ सोचा फिर बोला वैसे हम दोस्त बन सकते है तो ठीक है दोस्त फिर मिलाओ हाथ, अपना हाथ बढ़ाते हुए अनुराग बोला अनुराग से हाथ मिलाते हुए प्रोफेसर साहब बोले क्यों नही दोस्त। बस तब से ही दोनों दोस्त बन गये वो भी बड़े पक्के वाले, हर रोज दोनों का नुक्क्ड़ पर मिलना तय रहता है दोनों के पास ही ढेर सारी बातें होती है एक - दूसरे को बताने के लिए, अनुराग कभी स्कूल की बात करता तो कभी मोहल्ले की आज स्कूल ऐसे लड़ाई हुई टीचर ने किसी को पनिश किया स्कूल फ्रेंड्स और उसने मिलकर कितनी मस्ती की , मोहल्ले में क्या नई बात हुई क्रिकेट में किसकी टीम जीती और भी बहुत कुछ। अनुराग की बात सुनने के बाद प्रोफेसर साहब फिर अपना दिनभर का हाल उसे बताते है आज मॉर्निंग वॉक पर जाते हुए क्या देखा सुबह कैसी थी नाश्ते में क्या खाया आज कॉलेज का दिन कैसा रहा एनुअल फ़ंक्शन कैसा होने वाला है आजकल के स्टूडेंट्स कैसे है इसके अलावा प्रोफेसर साहब अनुराग को ये भी बताते है कि लोग कैसे है कैसा होना चाहिए फ्यूचर के लिए क्या करना चाहिए और हाँ अनुराग को कैसे पढ़ाई करनी चाहिए एग्जाम के की तैयारी के लिए उसे टिप्स भी देते है और उसकी इंग्लिश में तो कितना सुधार ला दिया है प्रोफेसर जी ने। दोनों दोस्त अपने मन की बातें एक - दूसरे से कहते है सुनते है और अपनी राय भी देते है और अगर कोई प्रॉब्लम हो तो मिलकर उसका हल निकालते है मुड़ ऑफ होने पर एक - दूसरे को खुश करने की कोशिश भी करते है। जब अनुराग को अपने पापा की याद आती है तो प्रोफेसर साहब उसका मन भटकाने को पूरी कोशिश करते है और जब कभी अपने बेटे अपने पोते को याद कर प्रोफेसर साहब दुखी होते है तो अनुराग उन्हें हँसाने के लिए अलग - अलग मस्ती भरे जतन करता है। इसलिए तो दोनों एक - दूसरे के लिए किसी रोशनी की तरह है। वो रोशनी जिसके होने से उनके मन की उदासी कहीं दूर जा खड़ी होती है, जिसके होने से होंठों पर खामोशी ज्यादा देर ठहर नही पाती वो खिलखिलाती हँसी में बदल जाती। ये दोनों दोस्त एक - दूसरे से हैं तो अलग पर एक बात है जो दोनों में एक जैसी है दोनों के पास किसी अपने की कमी है उस अपने की बहुत याद आती है दोनों को और दोनों ही चाहते है कि उनका अपना उनके पास रहे लेकिन चाहा हुआ हमेशा पूरा कहाँ होता है। एक तरफ अनुराग के पापा उसके साथ नही और दूसरी ओर प्रोफेसर कुलदीप का बेटा उनसे दूर है ये वो दुख ही तो है जो एक जैसा है अनुराग और प्रोफेसर कुलदीप के बीच। 

अनुराग है तो एक बच्चा पर मन तो उसका भी है जब भी वो अपने दोस्तों को उनके पापा के साथ देखता या अपने मन की कोई बात उसे पापा से करनी होती तो उस वक्त उसे अपने पापा की बहुत याद आती बहुत दुखी होता है वो, ये सोचकर कि सब की तरह उसके पापा भी उनके साथ क्यों नही रहते।अनुराग के पिता दूसरे शहर में रखकर नौकरी करते है बस दीवाली ही तो है जब वो घर आते है और वो भी सिर्फ 3- 4 दिनों के लिए, अनुराग को अपने पापा से कितनी सारी बातें करनी होती है पर इतने कम समय मे उसके पापा ठीक से उसके साथ वक्त गुजार ही नही पाते और उसके मन की बातें मन मे ही रह जाती है इसलिए अनुराग फिर उदास हो जाता है। अनुराग की तरह प्रोफेसर साहब भी उम्मीद लगाये किसी के आने की राह देखते रहे है पर जिसकी राह देखी वो आया ही नही और अब तो उम्मीद भी खत्म हो गई। अपने बेटे विकल्प को लेकर प्रोफेसर साहब ने कई सपने देखे थे वो सपने पूरे भी हुए पर उन्होंने कभी ये नही सोचा था कि उनका बेटा उनके पास नही रहेगा दूसरे देश जाकर वही बस जायेगा। पहले तो विकल्प फोन पर बात कर लिया करता था पर धीरे- धीरे इतना बिज़ी हो गया कि उसके पास अब फोन पर बात करने का भी समय नही रहा। अपने पोते को देखने उसके साथ खेलने का प्रोफेसर साहब का बहुत मन करता है पर वो जानते कि उनकी ये इक्छा पूरी नही हो सकती। अपनी पत्नी उषा के  चले जाने के बाद प्रोफेसर कुलदीप बिल्कुल अकेले हो गये। सब कुछ है उनके पास किसी चीज़ की कोई कमी नही है, कमी है तो बस किसी अपने की। कोई घर , घर तभी लगता है जब वहाँ परिवार रह रहा हो नही तो वो सिर्फ एक मकान होता है प्रोफेसर साहब का घर भी मकान की तरह ही है । प्रोफेसर कुलदीप ने विकल्प को कितनी बार कहा कि कुछ दिनों के लिए ही सही पर आ जाये लेकिन हर बार उसका एक बहाना तैयार रहता उस दिन तो प्रोफेसर साहब को गुस्सा आ गया था जब विकल्प ने आने से साफ इनकार कर दिया वो भी ये कहते हुए की पापा आप मुझे समझने की कभी कोशिश क्यों नही करते ये सुनकर बहुत बुरा लगा था प्रोफेसर कुलदीप को, मैं नही समझता बचपन से लेकर आज तक बस उसकी ख्वाइशों उसकी इक्छाओ को ही तो समझता आया हूँ। उससे उसका कुछ समय ही तो माँग था क्या एक पिता अपने बेटे से इतनी उम्मीद भी नही कर सकता। गुस्से में गाड़ी चलाते हुए प्रोफेसर कुलदीप जाने कितनी बातें सोचते जा रहे थे और तब नुक्क्ड़ की ओर आ पहुँचे जहाँ अनुराग उन्हें मिला। एक दोस्त जिसने उदास हो चुके प्रोफेसर साहब के मन को अपनी सच्ची भोली और शरारती बातों से बुदबुदाया और उन्हें फिरसे हँसना सिखाया। प्रोफ़ेसर साहब अनुराग में अपने पोते को देखने की कोशिश करते है अभी भले ही वो तीन साल का है पर जब अनुराग जितना बड़ा होगा तब वो भी ऐसा ही तो होगा ना, इतनी सारी बातें करेगा प्रोफ़ेसर साहब जानते है कि उन्हें अपने पोते के साथ ऐसे वक्त बिताने को कभी नही मिल पायेगा इसलिए अनुराग को देखकर खुश हो लिया करते है। उतना ही खुश अनुराग भी होता है अपने दोस्त को देखकर और उनका ख्याल कभी रखता है अभी कुछ दिन पहले जब प्रोफेसर साहब की तबियत खराब हो गई थी तो अनुराग उनसे मिलने उनके घर जाया करता था और जल्दी ठीक हो जाये इसके लिए भगवान से प्रार्थना भी किया करता था। 

आज पूरे 5 दिन बाद प्रोफ़ेसर साहब नुक्क्ड़ की ओर आये अनुराग चाय की स्टॉल के पास बैठा हुआ उनका इंतजार कर रहा था दोस्त आ गए तुम प्रोफेसर साहब को देखते ही खुश होकर अनुराग बोला, हाँ दोस्त तुम मेरा इंतजार करो और मैं ना आऊँ ऐसा हो सकता है भला प्रोफेसर साहब बोले। मैं कुल्फ़ी लेकर आता हूँ इतना कहा और अनुराग झट से कुल्फ़ी वाले अंकल की ओर दौड़ गया। ये लो दोस्त आज कुल्फ़ी मेरी तरफ से खुश हो जाओ अच्छा किस खुशी में अनुराग के कहने पर प्रोफेसर साहब ने पूछा तुम्हारे ठीक हो जाने की खुशी में मुस्कुराते हुए अनुराग बोला। ओह! शुक्रिया मेरे दोस्त। अनुराग की वजह से ही प्रोफेसर साहब ने कुल्फ़ी खाना शुरू किया वरना उन्हें कुल्फ़ी कब पसन्द थी। इन दोनों दोस्तों में उम्र और समझ का बड़ा फर्क है पर फिर भी कितना मजबूत रिश्ता है दोनों के बीच ,अपनेपन का एक प्यार भरा रिश्ता जिसमे रिश्ता निभाने के लिए कोई शर्त या स्वार्थ नही है पर फिर भी दोनों दोस्त खुशी से मुस्कुराते हुए साथ है बस कुल्फ़ी का मीठा- मीठा स्वाद है जो अभी इनकी जुबान चख रही है कैसी लग रही है? मज़ा आया अच्छी लग रही है ना कुल्फ़ी, एक - एक और खायेंगे ठीक है। 



कुल्फ़ी




माँ मैं जा रहा हूँ आवाज लगाकर अनुराग बोला और अपनी साइकिल लेकर नुक्कड़ की ओर चल दिया। नुक्कड़ पर दिनु भईया के चाय के स्टॉल के पास अपनी साइकिल खड़ी कर अनुराग लकड़ी के स्टूल पर बैठ गया और इंतजार करने लगा। इस नुक्कड़ पर लाइन से स्टॉल लगी हुई है दिनु भईया की चाय की स्टॉल , पोहे जलेबी की स्टॉल उसके बगल में चना जोर गर्म वाले भईया उनके बगल में जूस वाले भैया उनके बगल में आइसक्रीम वाले भईया और उनके बगल में है कुल्फ़ी वाले अंकल जिनकी मावा कुल्फ़ी पूरी कॉलोनी में बड़ी फेमस है अनुराग और उसके दोस्त को तो ये मावा कुल्फ़ी बड़ी ही पसन्द है रोज़ कुल्फ़ी खाने ही तो आता है अनुराग यहाँ, पर अपने दोस्त के बिना कभी भी अनुराग अकेले कुल्फ़ी नही खाता वो अपने दोस्त के आने का इंतज़ार करता है जैसे अभी कर रहा है।अनुराग अपने दोस्त का इंतज़ार कर रहा था और साथ ही बढ़ती लोगो की भीड़ देख उसे फ़िक्र भी हो रही थी कि कहीं कुल्फ़ी खत्म ना हो जाये अनुराग लोगो के बीच से निकलता हुआ कुल्फ़ी वाले अंकल के पास जा पहुँचा अंकल दो कुल्फी, नही अभी नही चाहिए मेरा दोस्त आ जाये फिर लूँगा पर आप दो कुल्फ़ी बचाकर रखना अनुराग कुल्फ़ी वाले अंकल से बोला, हाँ बेटा मैं जरूर बचाकर रखूँगा कुल्फ़ी वाले अंकल ने कहा। अब अनुराग रास्ते की ओर नजरें टिकाये देख रहा था कि शायद उसका दोस्त उसे आता दिखाई दे रास्ते से कई लोग आते तो दिख रहे थे पर अनुराग को उसका दोस्त नज़र नही आया कुछ देर बाद कोई स्कूटी नुक्क्ड़ की ओर आती दिखी,  एक 55 - 60 वर्ष का शख्स स्कूटी चलाकर लाया सड़क के किनारे अपनी स्कूटी खड़ी कर वो चाय के स्टॉल के पास आया, कितनी देर लगा दी दोस्त मैं कब से इंतज़ार कर रहा था सॉरी दोस्त वो कुछ काम आ गया था इसलिए देरी हो गई अनुराग के पूछने पर  उसके दोस्त ने कहा। ठीक है, चलो पहले कुल्फ़ी ले लेंते है नही तो खत्म हो जायेगी अनुराग ने कहा , इसके बाद कुल्फ़ी लेकर दोनों दोस्त चाय के स्टॉल के पास बैठ गये अनुराग को कुुल्फ़ी 
खाकर जो खुशी मिलती है उतनी तो तब भी नही मिलती जब वो अपनी टीचर से डाँट खाने से बच जाता है अनुराग बड़े चाव से कुल्फ़ी खा रहा था मज़ा आया अच्छी लग रही है ना कुल्फ़ी खाते हुए अनुराग ने अपने दोस्त से पूछा, हाँ बड़ी अच्छी लग रही है अनुराग के दोस्त ने खुश होते हुए कहा। तो बताओ आज का दिन कैसा रहा किसी से झगड़ा तो नही हुआ या फिर आज भी हुआ अनुराग के कन्धे पर हाथ रखते हुए उसके दोस्त ने पूछा। दोस्त मेरी कुल्फ़ी खत्म हो गई मैं एक और लेकर आता हूँ इतना कहकर अनुराग झट से कुल्फ़ी वाले के पास पहुँचा और एक और कुल्फ़ी ले आया। क्या बात है दोस्त आज बात करने का मूड नही है क्या कुछ बोल ही नही रहे हो अनुराग के दोस्त ने कहा। अनुराग उसे देखकर मुस्कुराया और बोला अरे ! नही दोस्त आज मेरा तो क्या किसी का किसी से झगड़ा नही हुआ , अच्छा क्यों? क्योंकि आज तो रिजल्ट था बहुत डर लग रहा था ऐसा लग रहा था कि आज इंग्लिश टीचर के हाथों फिर से पिटाई होने वाली है और हथेलियाँ टमाटर से भी ज्यादा लाल होने वाली है पर बच गया गहरी साँस भरते हुए अनुराग बोला, इस बार रिजल्ट पहले अच्छा रहा दोस्त थैंक यू ये तुम्हारी वजह से ही हो पाया । ऐसी बात नही है तुमने भी तो मेहनत की ना अनुराग के दोस्त ने कहा, और फाइनल एग्जाम के लिए हम और भी अच्छे से तैयारी करेंगे। ठीक है अब बताओ तुम्हारा दिन कैसा रहा अनुराग ने पूछा , मेरा दिन वैसा ही रहा जैसा रोज़ रहता है सुबह उठकर मॉर्निंग वॉक पर गया फिर वापस आकर कॉलेज के लिए रेडी हुआ दीपेश के हाथों का बना नाश्ता किया और अपना लंच लेकर कॉलेज के लिए निकल गया स्टूडेंट्स की क्लासेस ली और फिर शाम को घर लौट आया उसके बाद कुछ काम था मुझे, मैंने वो खत्म किया और फिर यहाँ तुमसे मिलने चला आया। क्या तुम्हारे स्टूडेंट्स तुम से डरते है अनुराग ने पूछा , अब ये तो मेरे स्टुडेंट्स ही बता पायेंगे पर मुझे नही लगता की वो डरते है। वैसे मुझे भी नही लगता कि वो तुमसे डरते होंगे अनुराग ने शरारती अंदाज में कहा। हाँ तुम भी कहाँ डरते हो अपनी टीचर से कुलदीप ने मुस्कुराकर अनुराग को छेड़ते हुए कहा। चलो बातें बहुत हो गई थोड़ी सी पढ़ाई करें कुलदीप और अनुराग नुक्क्ड़ के पास वाले गार्डन एरिया में जाकर बैठ गए, आज कुलदीप ने अनुराग को कुछ और इंग्लिश वर्ड्स बताये। ये सारे वर्ड्स जो है इनका बहुत यूज़ होता है इसलिए मैंने तुम्हें अच्छे से समझा दिए है इनको रिवाइज़ कर लेना ओके , ओके दोस्त अनुराग ने कहा।  अरे प्रोफेसर चतुरर्वेदी आप यहाँ, कैसे है आप एक शख्स ने कुलदीप से आकर पूछा ,  बढ़िया हूँ मैं अक्सर यहाँ आता रहता हूँ आप बताइये कैसे है आप, मैं भी ठीक हूँ अपने पोते- पोती को लेकर आया हूँ वो देखिए वहाँ खेल रहे है ये आपका पोता है , नही मैं तो इनका दोस्त हूँ अनुराग कुलदीप के कहने से पहले बोल पड़ा। अच्छा ठीक है तो प्रोफेसर साहब मिलते है कभी, अभी पोता- पोती वहाँ खेल रहे है ज़रा उनके साथ वक्त गुजरता हूँ। जी बिल्कुल। दोस्त ये कौन थे ये भी प्रोफेसर है संस्कृत के पर दूसरे कॉलेज में,  मीटिंग दौरान हमारी मुलाकात होती रहती है। कुछ देर पहले प्रोफेसर कुलदीप जो अनुराग से इतनी बातें कर रहे थे अब ज़रा खामोश से हो गए थे क्या हुआ दोस्त कुछ नही अनुराग के पूछने पर प्रोफेसर चतुरर्वेदी ने कहा। विकल्प भईया का फोन आज भी नही आया क्या?  अपने दोस्त के चेहरे की तरफ देखते हुए अनुराग ने पूछा नही कुलदीप ने कहा। तुम्हारी बात हुई तुम्हारे पापा से कुलदीप ने अनुराग से पूछा तो उदास होते हुए अनुराग ने भी कहा नही। जहाँ अभी सब कुछ ठीक था वहाँ अचानक से उदासी सी छा गई अनुराग और कुलदीप दोनों के मन मे आज फिर से एक उम्मीद के टूट जाने का दुख उभर आया। अनुराग और कुलदीप के आसपास अब लोगो की भीड़ बढ़ने लगी थी क्योंकि अब शाम गहराने लगी थी और इस वक्त कॉलोनी के लोग इस गार्डन एरिया में कुछ वक्त गुजारने आते है। अनुराग अब शाम बढ़ रही है इसलिए अब तुम्हे घर जाना चाहिए नही तो तुम्हारी मम्मी फ़िक्र करेंगी ,ओक दोस्त पर तुम , मैं कुछ देर बाद चला जाऊँगा लेकिन अभी तुम घर जाओ कुलदीप ने कहा। ओके बाये कहकर अनुराग चला गया। लेकिन प्रोफेसर कुलदीप वो बैठे रहे आसमान को देख रहे थे कितना दूर है ये आसमान जमीं से, देखने मे ये भले ही ये पास नजर आता हो पर जमीन ही जानती है की उनके बीच कितनी दूरी है। कुछ देर तक प्रोफेसर कुलदीप अकेले बैठे रहे ,घर जाने का उनका मन नही कर रहा था पर मन हो ना हो घर तो जाना पड़ेगा अपने मन को मनाते हुए प्रोफेसर साहब अपनी गाड़ी के पास आ गये और गाड़ी स्टार्ट कर घर की ओर चले गए। चार महीने पहले ऐसे ही शाम के वक्त प्रोफेसर साहब की गाड़ी यहाँ नुक्क्ड़ के पास रुकी थी चाय पीने आये थे वो यहाँ बेमन से दरसल प्रोफेसर साहब को ऐसे नुक्क्ड़ पर लगी स्टॉल के पास बैठकर चाय पीने की बिल्कुल भी आदत नही थी पर उस दिन फिर भी वो आये थे और तभी उनकी मुलाकात अनुराग से हुई थी जोकि अब उनका दोस्त है हाँ उम्र का फक्र है पर फिर भी दोनों दोस्त है। 

विदाई






वो दिन आ ही गया जिस दिन का सपना जगदीश जी और उनकी पत्नी विमला ने देखा था सामने दुल्हन के जोड़े में खड़ी चंचल अचानक से बड़ी नज़र आ रही थी हमारी छोटी सी गुड़िया बड़ी हो गई विमला जी धीरे से बोली , हाँ हमारी चंचल बड़ी हो गई अपनी बेटी को प्यार से देखते हुए जगदीश जी ने कहा। अपनी बेटी को दुल्हन बने देख जगदीश जी और विमला जी का मन बहुत ही भावुक हो रहा था जिस दिन का इंतज़ार इतने वक्त से था आज वो पल आया तो पर मन कमजोर पड़ रहा था आँखे बार - बार नम हो जा रहीं थी जगदीश जी और विमला जी जयमाला के लिए खुद चंचल को उसके कमरे में लेने आये चंचल अपनी बहनों और सहेलियों के बीच बैठी थी विमला और जगदीश दरवाजे के पास खड़े कुछ पल ठहर कर अपनी बेटी को देख रहे थे पापा, मम्मी नजर पड़ते ही चंचल बोली विमला जी चंचल के पास आई और नजर का काला टिका लगाते हुए उसका सिर चुम लिया,  जगदीश जी ने भी चंचल के पास आकर उसके सिर पर प्यार से हाथ रखा बोले- हो गई दुल्हन तैयार चंचल ज़रा सा मुस्कुराई और धीरे से अपना सिर हिला दिया। चलो बेटा जयमाला के लिए सब इंतजार कर रहे है विमला ने चंचल से कहा। चंचल धीरे- धीरे कदम बढ़ाती हुई मंडप की तरफ आ रही थी उसके एक ओर माँ विमला और दूसरी ओर पिता जगदीश थे और पीछे उसकी बहने और सहेलियां खुश होती हुई उसके साथ - साथ आ रही थी। चंचल अपने पिता जगदीश जी का हाथ पकड़कर चल रही थी उसका एक - एक आगे बढ़ता कदम पिता जगदीश जी को पीछे गुजरे वक्त की ओर ले जा रहा था जिसमें उन्हें छोटी सी चंचल दिख रही थी जो अपने पिता की उंगली पकड़कर नन्हे कदमों से आगे बढती हुई चलना सिख रही है और उसकी हँसी की किलकारी पूरे घर मे गूँज रही है ,वक्त कितनी तेज़ी से निकलता है देखते ही देखते चंचल कितनी बड़ी हो गई इतनी सयानी के आज उसकी शादी होने जा रही है जिसके नन्हे- नन्हे हाथों से ठीक से आइसक्रीम भी नही पकड़ी जाती थी आज वो घर- गृहस्ती की बाग डोर अपने हाथ मे लेने जा रही है, जो अपने कंधों पर स्कूल का बैग टाँगने में रोने लगती थी अब वो अपने कंधों पर घर- परिवार की जिम्मेदारियां लेने को तैयार है अपने मन मे सोचते हुए जगदीश जी अपनी बेटी चंचल को देख रहे थे। चंचल के मंडप में पहुँचने के बाद पहले जयमाला हुई और फिर शादी की रस्मे शुरू हुई पंडित जी मन्त्र पढ़ते हुए दूल्हा - दुल्हन को कुछ कहते समझाते जा रहे थे फिर आवाज लगाई कन्यादान के लिए माता पिता आगे आये ये पल बड़ा नाजुक होता है हर माता- पिता के लिए विमला इस वक्त इतनी भावुक हो रही थी कि चाहकर भी उनके आँसू ठहर नही रहे थे चंचल की आँखे भी भर आयीं पर पिता जगदीश जी अपने मन को सम्हाले हुए अपनी बेटी का कन्यादान पंडित जी कहे अनुसार पूरी विधि से कर रहे थे आज जगदीश जी ने भरोसे और विश्वास के साथ अपनी लाडली बेटी का हाथ किसी ओर के हाथ मे सौंप दिया  जीवनभर के लिए। बड़ा मुश्किल होता है जिसे बचपन से लेकर आज तक अपने प्यार से सींचा हो ,हर पल जिसे अपनी छाया में रखा हो और अचानक किसी और को उसे सौंप देना ,आसान नही होता अपने कलेजे के टुकड़े को किसी और को दे देना। शादी भी कैसा बन्धन है कुछ नए रिश्ते जुड़ते है और कुछ पीछे छूट जाते है अभी चंचल और वीरेन्द्र अग्नि के फेरे ले रहे थे बचपन मे चंचल की अपनी सहेली से छोटी- छोटी बात पर लड़ाई हो जाया करती थी बार - बार कट्टी चुप्पी होती रहती थी बस, वो नासमझ बच्ची जो थोड़ी- थोड़ी देर में कट्टी- चुप्पी करती थी आज कितना पक्का रिश्ता जोड़ने जा रही है किसी की जीवनसंगिनी बनकर। चंचल और वीरेंद्र के सात फेरे होते देख विमला जगदीश जी की ओर देखने लगी क्या?  हुआ।जगदीश जी ने पूछा जी आपको कुछ याद आया हाँ आया कैसे चंचल अपने गुड्डे- गुड़िया की शादी कराया करती थी वो भी सारी रस्मों के साथ कितना ज़िद करके हमे भी अपने खेल में शामिल कर लिया करती थी जगदीश जी बोले, तब हम भी उसके साथ कितने खुश होते थे उसकी गुड़िया की शादी कराकर ,पर आज अपनी गुड़िया की शादी देख खुशी के साथ मन भारी हो रहा है कहते हुए विमला जी की आँखों से आँसू बह गए। वो इसलिए क्योंकि तब हम जानते थे कि गुड़िया की शादी हो जाने के बाद भी वो हमारी चंचल के पास रहेगी पर हमारी चंचल , वो चली जायेगी अपने मम्मी - पापा को छोड़कर हमारा आँगन सुना करके। अपने आँसुओ को सम्हालो विमला नही तो हमे ऐसे देख चंचल भी रो पड़ेगी जगदीश जी विमला जी को समझाते हुए बोले। सभी रस्मो और रिवाज़ो के साथ शादी सम्पन्न हुई चंचल और वीरेंद्र ने सभी का आशीर्वाद लिया। सभी ने नए जोड़े को आशीर्वाद दिया और उनके मंगल जीवन की कामना की। शादी पूरी हो जाने के बाद लड़की वालों की कुछ और रस्मे थी जो अभी बाकी थी जगदीशजी की बुआजी चाचीजी और घर की बाकी सभी महिलाएं रस्मो को पूरा करवा रही थीं कुछ मेहमान रस्में पूरी होने का इंतजार कर रहे थे और कुछ उसका आनन्द ले रहे थे इस सबके बीच जगदीश जी सबसे दूर अकेले खड़े कुछ सोच रहे थे। जब चंचल का जन्म हुआ था तो जगदीश जी ने पूरे मौहल्ले में मिठाई बाटी थी बड़ी मन्नतों के बाद ये नन्ही परी इनके घर आई थी और इसके आने से सारा घर खुशियों से भर गया चंचल के होने से घर मे रोनक बनी रहती बड़े जतन और लाड़ प्यार से अपनी बेटी चंचल को जगदीश जी ने पाला है। वो अभी उतने ही खुश है जितने चंचल के जन्म के समय हुए थे जब चंचल उनकी बगिया में किसी फूल की तरह खिली थी। अब उनकी बगिया का ये फूल किसी और के घर को महकाने जा रहा है बस इसलिए जगदीश जी अपने मन को मजबूत करने की कोशिश कर रहे है, क्योंकि कुछ देर बाद चंचल की विदाई हो जाएगी। रस्में पूरी हो गई विदाई से पहले चंचल अपने घर को अपनी आँखों मे बसा लेना चाहती थी वो उठकर घर के अंदर चली गई और सबसे पहले अपने कमरे में जा पहुँची जिसमे अपने हर एक समान को चंचल ने बड़े अच्छे से सहज कर रखा है उसके बचपन से लेकर अब तक कि बहुत सी चीजें है जो चंचल ने अपने कमरे में सजा रखी है फिर चाहे वो उसकी गुड़िया हो किताबें हो या बचपन मे पापा की लाई हुए लकड़ी की बैलगाड़ी हो या फिर वो कौड़ियाँ जो माँ ने लाकर दी थी खेलने के लिए। चंचल ने तो चुन्नी भी सम्हालकर रखी है जिस पर उसकी माँ ने अपने हाथों से कढ़ाई की थी। अपने कमरे से निकलकर चंचल रसोईघर में जा पहुँची माँ कैसे मेरे लिए प्यार से खाना बनाती थी और जब मैं खाना बनाना सीख रही थी तो माँ के इस सुंदर से रसोईघर का क्या हाल किया था मैंने एक भी रोटी गोल नही बनी थी और जब पहली बार चाय बनाई थी तो पापा को देने उनके कमरे गई थी वो भी बड़ी खुश होकर , पापा ने मुझे पैसे भी दिए थे और मम्मी - पापा के कमरे का रिनोवेशन मैंने ही तो कराया था तब कितना अजीब लग रहा था मम्मी- पापा को उनका बदला हुआ रूम देखकर। अपने घर की दीवारों को छूकर चंचल उसके एहसास को अपने मन मे बसा लेना चाहती थी घर का ये आँगन जहाँ खेल कर चंचल बड़ी हुई वो कितनी यादों की याद दिला रहा था इसी आँगन में बारिश में उछल- उछल कर भीगा करती थी चंचल। माँ कितना समझाती पर चंचल एक ना मानती। वो छत का झूला जिस पर सिर्फ चंचल का ही राज  रहता था किसी और को झूलने का मौका ही नही देती थी और गमलों में लगे ये फूल चंचल के होते कोई इन्हें हाथ भी नही लगा सकता, आँगन में यही इसी जगह माँ चंचल को बैठाकर उसकी चोटी किया करती थी और वो साइकिल जो अमरूद के पेड़ के पास दीवार से टिकी खड़ी है जब साइकिल चलाना सिख रही तब पापा ने पीछे से साइकिल को पकड़ा हुआ था और मैं साइकिल चलाती जा रही थी उस वक्त पता नही चला था कि कब उन्होंने साइकिल छोड़ दी जब मैने मुड़कर देखा तो हड़बड़ा कर मैं गिर गई , तब गिर जरूर गई थी पर साइकिल चलाना सिख गई थी। चंचल चलो विदाई का वक्त हो गया चंचल के चचरे भाई देवेश ने आकर कहा दोनों भाई- बहन बचपन मे खूब लड़ा करते थे पर अभी देवेश कैसा उदास लग रहा है चंचल से तो नजर भी नही मिला रहा कि कहीं उसे उसकी आँखों मे आँसू न दिख जाए नही तो बाद में बहुत चिड़ायेगी। विदाई की तैयारियां हो चुकी थी और बारात अब दुल्हन के साथ लौटने को तैयार थी हँसते खिलखलाते चेहरों पर नमी आ गई थी माहौल अब थोड़ा ग़मगीन हो गया था चंचल के चाचा- चाची,  मामा -मामी, वर्षा दीदी , भाई देवेश सबकी आँखे नम हो गई थी चंचल के साथ बिताए पल सभी को याद आ रहे थे चंचल के जीवन के इस नए सफर के लिए मन से सभी खुश थे पर वो उसने दूर जा रही है इस बात थोड़ा दुख भी था चंचल सबके गले लगकर रो रही थी अपना घर जहाँ वो छोटे से बड़ी हुई वो मायका जहाँ अपने भाई - बहनों के साथ हँसी ठिठोली की अपने परिवार के लाड़- दुलार में पली बड़ी वो मायका वो घर आँगन सब छूट जाएगा मम्मी- पापा भाई चाचा- चाची सबकी कितनी याद आएगी सोच- सोचकर चंचल को रोना आ रहा था चंचल जब अपने भाई देवेश के गले मिली तो वो अपने आँसू रोक न सका और रोने लगा,  देवेश जो बचपन से आज तक चंचल से लड़ता रहा उसे बात - बात पर रुलाता रहा अब जब चंचल विदा हो रही है तो कैसे गले लगकर रो रहा है चंचल को ससुराल जाते देख देवेश को अब बुरा लग रहा है उसे लग रहा है कि उसकी बहन उससे दूर जा रही है। रोती हुई चंचल के कन्धे पर जब विमला जी ने हाथ रखा तो चंचल जोर से अपनी माँ से लिपट गई अपनी बेटी को विदा होते देख भला किस माँ के आँसू रुक पाये है जो विमला जी के रुक जाते मेरी चंचल ,मेरी बच्ची कहकर विमला जी रोये जा रही थी चंचल भी बहुत रो रही थी और साथ ही रोते हुए उसकी नजरें अपने पापा को ढूंढ रही थी। जगदीश जी गाड़ी के पास खड़े थे जिसमें बैठकर चंचल ससुराल जाने वाली थी वो ना कुछ कह रहे थे न सबकी तरह रो रहे थे बस खामोश खड़े अपनी बेटी को निहार रहे थे चंचल अपने पापा के सामने जा खड़ी हुई दो पल रुककर अपने पापा की आँखों मे देखने लगी पापा और बेटी की बिना बोले शायद मन ही मन कुछ बात हो रही थी और फिर चंचल पापा कहते हुए कसकर अपने पापा के गले लग गई। जगदिश जी ने बहुत कोशिश की , की उनकी आँखों से आँसू न झलके अपने मन को बहुत पक्का किया पर जब चंचल गले लगी तो उन्हें लगा जैसे फिर से छोटी सी चंचल अपने पापा के ऑफिस से आते ही उनकी गोद मे आ गई और चटर- पटर कर दिनभर की सारी बातें उन्हें बताने वाली हो। जगदीश जी की आँखों के किनारों से लम्बे- लम्बे आँसू बहने लगे एक पिता का दिल अपनी बेटी की विदाई पर इतना भर आया कि उनकी जुबान से कोई लब्ज़ भी बाहर न आ सका,  की वो अपनी बेटी से कह सके कि मेरी प्यारी बच्ची हमेशा खुश रहना। इतने नाजुक पल में भी भरे नैनो से रीत निभाते हुए जगदिश जी ने चंचल को गाड़ी के अंदर बैठाया चंचल कार की खिड़की से बाहर सबको देखे जा रही थी और उसकी आँखों से आँसू बहे जा रहे थे सभी ने मिलकर गाड़ी को धक्का लगाया और चंचल अपने जीवन के नये सफर की ओर आगे बढ़ चली। जगदीश और विमला दूर तक अपनी बेटी को जाते हुए देख रहे थे उनकी लाडली बेटी अपना मायका छोड़ अब अपने ससुराल जा रही थी।

मन करेला


दिन ब दिन जैसे गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था हर बात में बस गुस्सा आने लगा था मन की नाराज़गी किसी खाई की तरह गहरी हो रही थी कोई अपना सा नही लग रहा था वो अपना, जो मेरे मन की बात को समझे मुझे खोमोशी से सुन सके। मेरे मन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी जैसे अंदर ही अंदर कोई ज्वालामुखी तैयार हो रहा हो जो किसी भी वक्त चीख़कर बाहर आने वाला हो। मन ही मन जाने कौन सी घुटन हो रही थी बीते कल की कुछ कडवी बातें आज में भी अपनी कड़वाहट घोल रही थी। मेरा बर्ताव बदलता जा रहा था तीखे शब्द हर वक्त मेरी जुबान पर रहने लगे थे और मन पर तो जैसे नफ़रत ने कब्ज़ा कर लिया था जो तिल- तिल मुझे जला रही थी और मैं कमज़ोर  होती जा रही थी बहुत कमज़ोर। हर दिन मेरे लिए किसी जंग के मैदान जैसा हो गया था जहाँ मेरा जीत हासिल करना मेरे लिए जरूरी हो गया था जैसे ये मेरी ज़िंदगी का कोई बड़ा युद्ध हो और हर हाल में मुझे इसे जितना हो। कुछ अलग ही हो गई थी मैं, आँखों मे गुस्सा चेहरे पर उदासी मन मे शिकायतें नाराज़गी छोटी सी बात पर चीखना चिल्लाना और हर बात पर लड़ने को तैयार मैं अब मैं नही रही थी कुछ और हो गई थी मन की शांति होंठों की हँसी दिल का सुकून सब कुछ खो गया था आजकल मुझे पता नही क्या हो गया था। अकेलेपन ने दिमाग़ मे घर कर लिया था आँसुओ से मैने अपना मन भर लिया था। ये कौनसी उदासी या नाराज़गी दिलों दिमाग़ पर छा रही थी जिससे मेरे मन की खुशी दूर, कहीं दूर, बड़ी दूर जा रही थी। बार- बार मेरे मन के भाव जाने क्यों बदल रहे थे बिना बात के दिल और दिमाग दहकती भट्टी में जल रहे थे। अचानक से मेरी दुनिया कितनी बदल गई थी जो कल तक सुबह के सूरज सी चमक रही थी वो अब रात के अंधेरे में ढल गई थी मेरा मन न जाने किस फ़िक्र में खो रहा था ना ठीक से जाग रहा था ना सुकून से सो रहा था। अभी तो किसी रेस में मैं दौड़ी भी नही थी फिर भी साँसे फूल रहीं थी पता नही किन उलझनों के झूले में मैं झूल रही थी बड़ा मुश्किल सा लगने लगा था अब ,  हँसकर कैसे जीते है कैसे मुस्कुराते है कैसे जिन्दगी में रंग भरे जाते है धीरे- धीरे मैं ये सब भूल रही थी। ऐसा क्यों? हो रहा था क्यों सब कुछ छूट रहा था ?। क्यों हर कोई मुझसे दूर हो रहा था ? जो मन कभी मिश्री था वो अब क्यों? करेला हो रहा था।

बड़ा ही कठिन दौर था ये, अचानक भागती - दौड़ती जिंदगी में ठहराव आ गया वो भी कुछ पल के लिए या एक दो दिन के लिए नही पूरे चार महीनों के लिए। शहर में लगे लॉकडाउन से कितना कुछ बदल गया था दिनभर का जो शेड्यूल था वो तो पूरी तरह चेंज हो गया था हर काम का समय ही बदल गया। वैसे शुरू के दिन बड़े ही अच्छे निकले लगा जैसे कुछ दिन सुकून के मिल गए जिसमे मैं अपने मन के मुताबिक चल सकती हूँ ऑफिस जाने की कोई झंझट नही और टाइम की कोई लिमिट नही। कुछ दिनों तक मैंने अपने मन का हर वो काम किया जो मैं अपने बिज़ी शेड्यूल के रहते नही कर पाई फिर चाहे वो पेंटिंग हो आर्ट क्राफ्ट हो या फिर अपने पसन्द के गाने सुनना या मूवी देखना,  मैंने तो खुशी - खुशी में कुछ नई रेसिपीज़ भी ट्राय कर ली बड़ा अच्छा लग रहा था कितने दिनों बाद ऐसा वक्त आया था जब मैं अपनी फैमली के साथ इतने इत्मीनान से वक्त गुजार पा रही थी दो दिन दो दिन आठ दिन और देखते ही देखते 15 दिन बीत गए अब मन के हौसले ज़रा कमज़ोर होने लगे थे। सूरज जैसा सुबह निकलता वैसे ही शाम को ढल जाता कुछ अलग नही लग रहा था अब कोई भी दिन, हर दिन एक जैसा था चार दीवार की अंदर, जैसे किसी पिंजरे में बंद हो गए हो। कुछ वक्त पहले मैंने प्लानिंग की थी कि अपनी फैमली के साथ किसी खूबसूरत सी जगह पर घूमने जाऊँगी पर लॉकडाउन की वजह से ये हो नही पाया इसलिए हम सबने मिलकर घर पर पिकनिक जैसा माहौल बनाने की कोशिश की पर खुले आसमान के नीचे खूबसूरत नेचर के बीच जाकर जो खुशी मिलती है वो चार दीवारों के अंदर कैसे मिल सकती है। अब तो घर में रहकर मैं ऊबने लगी थी ना ऑफिस जाना ,ना किसी दोस्त या रिश्तेदार से मुलाक़ात कर पाना, ना कहीं आउटिंग के लिए जा पाना, कितने टाइम से मैंने मेन रोड का चौराहा तक नही देखा था खिड़की से बाहर देखो तो सड़के सुनी नज़र आ रही थीं कोई चहलपहल नही जितनी दूर तक नज़र जा रही थी बस खामोशी ही दिखाई दे रही थी। अपने घर की खिड़की से बाहर झाँकते हुए मेरी नज़र पड़ोसियों के घर की खिड़कियों पर भी पड़ी वो भी मेरी तरह खिड़की के पास खड़े बाहर देख रहे थे सबको ऐसे देख कितना अजीब लग रहा था इस वक्त हमारी स्थिति पिंजरे में कैद उन पंछियों जैसी थी जो पिंजरे से बाहर झाँकते हुए आज़ाद होने की राह देख रहे होते है बड़ा मुश्किल होता है एक जगह पर कैद होकर रह पाना। धीरे- धीरे दिन गुजरते हुए एक महीना हो गये अब मन मे घबराहट सी होने लगी थी और दिमाग कुछ चिड़चिड़ा सा हो गया था कुछ अच्छा नही लग रहा था फैमिली मेम्बर्स के बीच भी छोटी- छोटी बातों पर टकराव और तनाव होने लगा था मुझे तो हर बात में अब गुस्सा आने लगा था कितनी अच्छी लाइफ थी मेरी सुबह मॉर्निंग वॉक पर जाना फिर ऑफिस के लिए निकल जाना नये- नये प्रोजेक्ट्स पर काम करना लंच ब्रेक में अपने कलीग्स से डिसकशन करना ऑफिस से लौटते हुए कभी - कभी मार्केट या कभी चौपाटी चले जाना और घर लौटते वक्त घर वालों के लिए भी कुछ न कुछ जरूर ले जाना। शाम को कभी कभार मैं मम्मी के साथ कॉलोनी वाले पार्क में भी चली जाती थी कॉलोनी के सब लोग आते है वहाँ, अच्छा लगता उस हरे- भरे पार्क में जाकर पर कितने दिनों से वो पार्क भी बंद है। अब तो बड़ा बुरा लगने लगा था सबके होते हुए भी जाने क्यों खुद को अकेली महसूस कर रही थी ऐसा लग रहा था जैसे कोई मुझे समझता ही नही। मैं अंदर - अंदर गुस्से से भरने लगी थी और मन उदासी में डूबने लगा था पता नही क्यों मुझे घर वालों की बातों से चीड़ आने लगी थी कुछ बातों पर तो मैं नाराज़ भी हो जाती थी अब मेरे दिमाग मे जाने कौन- कौन सी बातें चलने लगी थीं कुछ कड़वी- मीठी यादें एक साथ याद आने लगी थी मन दुखी हो रहा था और मन मे खड़वाहत सी घुल गई थी मैं उखड़ी- उखड़ी और नाराज सी रहने लगी थी मन बिल्कुल किसी कड़वे करेले जैसा कड़वा हो गया था कोई कुछ भी कहे मुझे सबकी बातें कड़वी ही लग रही थी। औरों की गलतियाँ उनकी बुराइयाँ मुझे ज्यादा नज़र आने लगी थी कितनी अलग हो गई थी मैं,  मेरी सोच भी कैसी हो गई थी। अब तो मन कई सारी उलझनों से घिरा हुआ महसूस करता ऐसा लगता जैसे वक्त के साथ आगे नही पीछे जा रही हूँ सब कुछ छूटता चला जा रहा हो। मेरा मन मुझे थका और हारा हुआ सा लगने लगा था कब ये लॉकडाउन खत्म हो और मैं खुली हवा में साँस ले पाऊँ दिल बस यही चाह रहा था। बड़े सब्र और मुश्किलों के बाद वो दिन आ ही गया जिसका सब इंतज़ार कर रहे थे लॉकडाउन हट गया सब अनलॉक हो गया अब सब आज़ाद थे इतनी खुशी पहले कभी नही हुई जितनी आज हुई पड़ोस में रहने वाले बच्चे नकुल ने अपने पिंजरे में बंद तोते को आजाद कर दिया और वो खुशी से अपने पँखो को फैलाये आसमान में उड़ गया। कुछ दिनों में सब कुछ पहले जैसा हो गया पर ये एक्सपीरियंस हमेशा याद रहेगा। सबके साथ होते हुए भी मैं खुदको अकेला महसूस करने लगी थी जिन लोगो ने वाकई इस वक्त को अकेले काटा होगा उनके लिए कितना मुश्किल रहा होगा उनके लिए तो घर के बाहर और अंदर दोनों ही ओर खामोशी रहे होगी। वक्त कठिन जरूर था पर बहुत कुछ सीखा गया उस बीते वक्त में मैं कितनी बदल गई थी क्योंकि अब सब पहले जैसा है तो बेहतर महसूस कर रही हूं। कल हम सब रानी झरना देखने गए थे ऊँचाई से गिरते इस झरने का पानी इतना ठंडा था जैसे बारिश का पानी हो, ये वाटरफॉल इतना खूबसूरत है कि देखते ही मन खुश हो जाये आसपास की हरियाली भी मन मोह रही थी बहुत अच्छा लग रहा था खुले आसमान के नीचे नेचर के करीब लगा जिंदगी फिर लौट आई। सबकुछ हमारे लिए कितना जरूरी और कितना खास है इस बात का एहसास हो गया है मुझे। मेरा मन भी पहले जैसा खुश रहने लगा है मैं फिरसे खुशमिजाज़ हो गई हूँ मन की कड़वाहट झरने के ठंडे पानी मे भीगकर धूल गई और गुस्से से भरा दिमाग़ ठंडा हो गया अब मन करेला नही रहा वो फिरसे मिश्री हो गया।

साथी



वो रेड जैकेट रख ली थी ना और मेरे ग्लब्स अच्छा वो गॉगल्स जो परसो लेकर आया था और वो स्कार्फ जो मैं तुम्हारे लिए लाया था हाँ ,हाँ सब रख लिया मनन के बार - बार पूछने पर चिढ़ते हुए काव्या ने कहा। मनन जब से हम ट्रेन में बैठे है तब से तुम बस कुछ न कुछ पूछ ही रहे हो ये रखा कि नही वो रखा की नही, हम हनीमून पर जा रहे है कोई हमेशा के लिए रहने नही जा रहे है सुबह से अभी तक एक बार भी गौर से देखा मुझे काव्या रूठते हुए बोली ओह! सॉरी कब्बू तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो ये ड्रेस तुम पर अच्छी लग रही है मनन ने काव्या को मनाते हुए प्यार से कहा तो काव्या धीमे से मुस्कुरा दी। काव्या का हाथ थामते हुए मनन ने अपनी उंगलियाँ काव्या की उंगलियों में फसा ली और काव्या ने अपना सिर मनन के कंधे से टिका लिया। शादी के बाद सब कुछ कितना अलग सा लगने लगता है एक नया रिश्ता नया सफर आँखों मे मीठे- मीठे सपने ,काव्या और मनन की आँखें भी अपनी नई जिन्दगी के लिए सपने बुन रही है। काव्या तुम खुश तो हो ना, हाँ और तुम , मेरी खुशी तो तुम ही हो आय प्रॉमिस मैं तुम्हे कभी दुखी नही होने दूँगा हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा कहते हुए मनन ने काव्या का हाथ कसकर पकड़ लिया मैं जानती हूँ मनन, मनन की आँखों मे देखते हुए काव्या ने कहा, अच्छा अब ज्यादा मत सोचो मेरे प्यारे पतिदेव कहते हुए काव्या ने दोबारा मनन के कन्धे से अपना सिर टिका लिया। मुझे पता है मनन तुमने ये सवाल क्यों किया पर कुछ जवाब अधूरे ही सही होते है मनन से टिककर बैठी काव्या मन मे सोच रही थी। आधे घन्टे बाद ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी काव्या मैं अभी आता हूँ मनन ये कहकर ट्रेन से उतर गया काव्या खिड़की से बाहर स्टेशन पर खड़े लोगो को देख रही थी तभी उसकी नजर लड़के- लड़कियों के एक ग्रुप पर पड़ी देखने मे कॉलेज स्टूडेंट्स लग रहे थे इन्हें देख काव्या को सपने स्कूलटाइम का वक्त याद आ गया। हमारा भी तो स्कूल में ऐसा ग्रुप बना हुआ था जिसमे मैं और मनन भी थे। स्कूल यूनिफार्म में दो चोटी बाँधे हुए स्कूल बैग टांगे हुए कितने घमंड के साथ मैं क्लास में इंटर होती थी पूरी क्लास में सबसे होशियार जो थी पढ़ने में, इस बात का बड़ा गुमान था मुझे। पढ़ाई में तो मनन भी अच्छा था पर मेरे जितना अकड़ू नही था। शुरू में दोस्ती नही थी हमारे बीच बस क्लासमेट थे लेकिन बाद में दोस्त बन गए और शायद ज्यादा ही खास दोस्त। काव्या ये लो अच्छा कॉफ़ी लेने गए थे हाँ तुम्हारे लिए कॉफ़ी अपने लिए चाय और ये और भी कुछ लाया हूँ रखलो मनन ने पैकेट काव्या को दिया ओके कहते हुए काव्या ने पैकेट बैग में रख दिया। इसके बाद मनन मोबाइल पर बुक की हुई होटल की कुछ डिटेल्स वगैहरा चेक करने लगा और काव्या फिर अपनी स्कूल में जा पहुँची। 

क्लास कि होशियार लड़की जिसका मन किताबों में लगा रहता था अब कुछ - कुछ कहीं और भी लगने लगा था मेरी नज़रे जो किताब कॉपियों में ज्यादा ठहरी रहती थी वो थर्ड रो में फोर्थ बैंच पर बैठे मनन की ओर दौड़ने लगी थी जैसे कोई डोर मुझे खींच रही हो उसकी ओर।इस कच्ची उम्र में ये कौनसा पक्का रिश्ता बनने लगा था मेरे और मनन के बीच ये सोचकर में परेशान हो रही थी ये सब क्या हो रहा है मैं मनन के बारे में इतना क्यों सोचने लगी हूँ हम दोनों दोस्त ही तो है फिर क्यों कुछ अलग सा लगता है। तीन दिन हो गये,  मैंने मनन को अनदेखा करने की कोशिश की ना उससे बात की और ना उसकी तरफ देखा मेरे ऐसे बर्ताव से मनन को बहुत बुरा लगा और मुझे उससे भी ज्यादा। इसके बाद मनन खुद मुझसे दूर हो गया उसने मुझसे बात करना जैसे पूरी तरह ही बंद कर दिया बिल्कुल भी बात नही करता था वो मुझे से हाय हेलो भी नही, आज तो लंच भी वो अकेले क्लास में बैठकर कर रहा था जबकि बाकी हम सब बाहर ग्राउंड में पेड के नीचे, साथ में बैठकर अपना लंच कर रहे थे। अब मेरी और मनन की दोस्ती टूट रही थी बहुत दुख हो रहा था मुझे ये देखकर। काव्या, मेरी सबसे अच्छी दोस्त आरती ने धीरे से कहा मुझे लगता है तुझे एक बार मनन से बात कर लेना चाहिए जो भी बात है उसे समझाएगी तो शायद वो समझ जाये। शायद आरती ठीक कह रही है अपना लंच बॉक्स आरती को देकर में क्लास में चली आई। गुस्सा हो मैने मनन से पूछा, नही तो मनन ने कहा , तो फिर बाहर क्यों नही आये, वो तुम नाराज़ हो ना बस इसलिए , तुम्हारा गुस्सा होना मुझे अच्छा नही लग रहा है बुरा- बुरा सा लग रहा है मनन ने इतना कहा तो मेरी आँखों मे पानी की बूंद भर आई सॉरी मनन मैं तुम्हे दुख नही पहुँचना चाहती थी कहते हुए मैैं रो पड़ी क्या ? हुआ काव्या देखो प्लीज़, प्लीज़ प्लीज़ मत रोओ क्यों तुम्हे बुरा लग रहा है तो क्या मुझे बुरा नही लग रहा मैंने रोते हुए कहा,  देखो सॉरी मैंने जो कहा उसके लिए प्लीज़ चुप हो जाओ नही तो मैं भी रोने लगूँगा मनन ने कहा तो रोते - रोते मुझे हँसी आ गई और फिर मैं चुप हो गई। छोटी उम्र में मन किसी नन्हे फूल की तरह कोमल होता है जो सुबह के सूरज को देख खिल उठता है और ज़रा धूप बढ़ जाने पर मुरझाने भी लगता है। लंच ब्रेक खत्म हो गया था साथ ही मेरे और मनन के बीच की प्रॉब्लम भी। उस दिन हम दोनों ने मिलकर एक फैसला लिया था जब तक हम बड़े नही हो जाते समझदार नही हो जाते किसी रिश्ते को कैसे जिया जाता किसे निभाया जाता है, जब तक इन बातों को ठीक से जानने और समझने लायक नही हो जाते तब तक हमारे रिश्ते में हम दोस्ती को ज्यादा रखेंगे और प्यार वो दोस्ती के पीछे धीरे- धीरे अपने कदम बढ़ाएगा। अब सब कुछ ठीक चल रहा था हम अच्छे दोस्त की तरह साथ थे हम साथ पढ़ते, खेलते ,लड़ते झगड़ते पर आँखों- आँखों वाला वो प्यारा सा एहसास भी किसी इत्र की तरह मन मे महकते हुए साथ रहता। फेयरवेल स्कूल में हमारा आखरी दिन, हमारे जूनियर्स ने स्कूल में हमारे इस आखरी दिन को अपनी परफॉमेंस से खास बना दिया हम सब खुश भी थे और थोड़ा सा दुखी भी क्योंकि हम सब अब बिछड़ने वाले थे लेकिन मनन और मैं थोड़ा ज्यादा भावुक थे क्योंकि अब रोज़ की तरह हम नही मिल पायेंगे जूनियर्स की परफॉमेंस के वक्त भले ही मनन मुस्कुरा रहा था पर उसके चेहरे पर एक उदासी भी थी मैने चुपके से उसका हाथ थाम लिया हम मिलते रहेंगे सच भूल तो नही जाओगी ना मेरे कहने पर मनन ने पूछा। नही कभी नही अपना सिर ना में हिलाते हुए मैंने उससे कहा। इसके बाद हम सब फ्रेंड्स ने सारा स्कूल घूमते हुए यहाँ बिताई अपनी यादों को एक फिर से ताज़ा किया। हँसी - खुसी और बिछड़ने के थोड़े से दुख के साथ ये दिन बीत गया। काव्या काव्या हाँ कुछ कहा तुमने , इतनी देर से मैं ही तो कह रहा हूँ कहाँ खो जाती हो यार अच्छा वो जो पैकेट मैंने दिया था वो बताओ हाँ ये रहा, खोलो इसे मनन ने कहा इमली मैं खुश होते हुए बोली स्कूल में इतनी इमलियाँ तोड़ी है तुम्हारे लिये इसका सबूत आज भी है अपने हाथ मे लगी चोट का निशान दिखाते हुए मनन ने कहा। हाँ तो मैंने थोड़ी कहा था कि पेड़ पर चढ़ जाओ मैंने कहा हाँ वो तो मेरा ही मन किया था पेड़ से गिरने का ठीक है चलो ,अब खालो इमली मनन ने कहा। मैंने चटकारे लेते हुए इमली खाने लगी। 

स्कूल से निकलने के बाद अब हम कॉलेज स्टूडेंट हो गए थे पर मनन और मेरा कॉलेज अलग - अलग था मनन के बिना मुझे बहुत बुरा लगता था याद आती थी मुझे उसकी,  वैसे कभी - कभी हम मुलाकात कर लिया करते थे पर फिर भी अब हमारे बीच दूरियाँ आती जा रही थी क्योंकि हम अपनी - अपनी लाइफ में बिज़ी होते जा रहे थे एक शहर में होते हुए भी हम दूर हो गए थे कभी - कभी तो मैं मनन का कॉल आने पर उसे रिसीव भी नही कर पाती थी कल मेरा और मनन का किसी बात पर छोटा सा झगड़ा हो गया पता नही वो मुझसे मिलने आज आएगा भी की नही नाराज़ होगा शायद, लेक के पास झील की ओर देखते हुए मैं बैठी उसका इंतज़ार कर रही थी काव्या मनन आ गया अच्छा मैं खाने के लिए कुछ लेकर आती हूँ कहकर आरती चली गई। ऐसे खोमोश क्यों? बैठी हो मनन ने कहा, वो तुम नाराज हो ना बस इसलिए मैंने कहा। मनन मेरे करीब आकर बैठ गया बोला ,तो तुम मुझे मना लो ना कैसे मैंने उसे देखते हुए पूछा इसे लेकर ,मनन ने गुलाब का एक फूल मेरी ओर बढ़ाया अब तो रेड रोज़ दे सकता हूँ ना अब हम थोड़े बड़े हो गए है बड़ी सी मुस्कुराहट के साथ अपना सिर हिलाते हुए मैंने रोज़ ले लिया। ह, हाथ रख लूँ तुम्हारे कन्धे पर मनन ने थोड़ी काँपती हुई सी आवाज़ में पूछा मैंने अपनी पलकों से हाँ का इशारा दिया तो मनन ने झट से अपना हाथ मेरे कन्धे पर रख लिया ये देख मुझे हँसी आ गई। आरती नही आई अभी तक वो घर चली गई मनन ने कहा। मनन मैंने मनन को घूरते हुए कहा जाने दो ना यार उसे किसी बच्चे की तरह मनन बोला।वो हमारी दोस्त है इसलिए हमारे लिए सोचती है हम कितने दिन बाद मिल रहे है पता है उसे भी। इसके बाद मनन और मैं बहुत देर साथ बैठकर बातें करते रहे काव्या एक बात पूछूँ हाँ बोलो ना शादी करोगी ना मुझसे ,हाँ करूँगी।वो शाम हर शाम से बहुत खूबसूरत थी मेरे लिए, ढलता सूरज कुछ सिंदूरी सी होती ये शाम, झील का ठहरा हुआ पानी किनारे पर खड़ी मैं और मेरा साथी। मुझे एक फ़िल्म का गाना याद आ गया ये रातें ये मौसम नदी का किनारा ये चंचल हवा। बस गाने के बोल के हिसाब से अभी रात नही शाम हो रही थी। 

जिन्दगी की कहानी वैसी नही होती जैसा हम चाहते है जिंदगी में आते मोड़ के साथ कहानी को भी मुड़ना पता है कहीं ओर  किसी अलग दिशा में। प्यार हुआ इज़हार हुआ और अब इंतज़ार था 5 साल हो गए थे मैं और मनन मिले नही थे वो इंदौर जा चुका था एक सॉफ्टवेयर कम्पनी में सीनियर डेवलपर की पोस्ट पर मनन जॉब कर रहा था और मैं भोपाल की ही एक कम्पनी में थी। प्रोफेशनल लाइफ इतनी आसान नही होती आगे बढ़ने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है मैंने और मनन ने भी की पर सबसे मुश्किल था एक - दूसरे से बिना मिले ये 5 साल गुजार पाना। इन 5 सालों ने हमे ये एहसास दिलाया कि कितने अधूरे से है हम एक - दूसरे के बिना। आज की सुबह मुझे बहुत प्यारी लग रही है जैसे लम्बी रात के बाद आज सवेरा हुआ हो, सुबह के निकलते इस सूरज के साथ मेरी जिन्दगी की रोशनी फिर लौट आई हो, हाँ आज खुशी से जो मेरा चेहरा गुलाबी हो रहा है उसकी वजह मनन ही है कल शाम मनन लौट आया हमेशा के लिए और आज ही मिलने की ज़िद कर रहा है मैं ना नही कह पाई जितना बेचैन उसका मन मुझसे मिलने के लिए है उतनी ही बेचैन मेरी आँखें भी है उसे देखने के लिए । मैं बनसवर कर अपने कमरे से बाहर निकली मम्मी के चेहरे पर थोड़ी घबराहट और थोड़ी मुस्कुराहट दोनों ही एक साथ दिख रही थी और बाकी घर वाले वो खुश थे  खास मेहमान जो आये हुए थे। आज मनन से मिलने से पहले लग रहा था ना जाने कितना बदल गया होगा वो, फोन पर बातें तो बड़ी समझदारों वाली करता है , कई बातें चल रही थी दिमाग़ में और तभी मनन सामने आ खड़ा हुआ। ये,ये पल कैसा है मनन मेरे सामने है और मैं उसे कुछ बोल ही नही पा रही मनन भी खामोश खड़ा है मानो लम्हा ठहर गया हो , मेरी पलकें झपकी मैं कुछ कहना चाह रही थी कि मनन ने रोक दिया उसने मेरा हाथ पकड़ लिया अपना पैर घुटने से मोड़ते हुए जमीन पर बैठ गया और एक खूबसूरत सी अंगूठी मेरी उंगली में पहना दी। जिसकी तमन्ना की हो अगर वो मिल जाए तो मन खुशी के पंख लगाकर आसमान में उड़ेगा ही, मेरा मन भी खुशी के पंख लगाकर उड़ गया मनन के साथ प्यार के खूबसूरत आसमान में और भूल गया सब कुछ। अपने कमरे में यहाँ से वहाँ चक्कर लगाती मैं परेशान हो रही थी कल उसे बताने का मौका ही नही मिला वैसे मौका मिला था मुझे, पर मैंने जानबूझकर कुछ नही बताया अब क्या करूँ?मैं। मैं सोच रही थी तभी मेरे फोन की रिंगटोन बजने लगी मनन का ही कॉल था कॉल रिसीव करते ही मैंने उसे सब बता दिया मनन मेरा रिश्ता तय हो गया है परसो जब तुम से मिलने आने वाली थी उस दिन विशाल और उसकी फैमिली वो घर आये थे। सॉरी मैंने तुम्हें कल नही बताया मैंने रोते हुए कहा। आज रात सोई नही थी मैं बस सुबह होने का इंतज़ार कर रही थी और हिम्मत जुटा रही थी कुछ कहने के लिए, सुबह होते ही मैंने घर मे मनन के बारे में सबको बता दिया और फैसला हो गया शादी एक महीने बाद होगी। ट्रेन के रुकने की आवाज सुनी तो पता चला कि उसने हमें मंजिल तक पहुँचा दिया हम मनाली आ गए स्टेशन से सीधा होटेल पहुँचे। तो मैडम सुबह ज़रा जल्दी तैयार हो जाइयेगा आपको अपनी खूबसूरत आँखों से मनाली के दर्शन करने है मनन ने कहा तो मैंने भी कह दिया जी सर जैसा अपने कहा है वैसा ही होगा मनन ने किसी बॉस की तरह अकड़ते हुए अपना सिर ज़रा सा हिला दिया और हम दोनों मुस्कुरा दिए। मुझे होटेल के मैनेजर से कुछ पूछना है ठीक है आता हूँ अभी कहकर मनन मैनेजर से मिलने चला गया। उस दिन जब फैसला हुआ उसके बाद मनन आया था घर सबसे मिलने। शादी की तारीख नज़दीक थी उससे पहले मनन एक बार मिलना चाहता था हम लेक के पास मिले हाँ वहीं जहाँ मनन ने पूछा था शादी करोगी ना मुझसे। कुछ मुश्किलों के बाद ही सही मैंने अपना प्रॉमिस पूरा किया एक साल के इंतज़ार के बाद मैंने मनन से शादी करली। तब शादी की डेट नज़दीक थी पर शादी नही हुई क्योंकि मैंने विशाल को बता दिया था कि मैं खुश नही हुँ इस रिश्ते से। मनन ने जब उस दिन मिलने बुलाया तब उसने मुझे हर वादे और अपने रिश्ते से आज़ाद कर दिया कोई शिकायत न करते हुए उसने कहा बीते सालों को भूल जाओ और सबकी बात मान लो। 13 साल जिस एहसास को जिया है क्या उसे आसानी से भुलाया जा सकता है इतनी कच्ची डोर तो नही है हमारे रिश्ते की जो कहने भर से टूट जाये मनन ने भले कह दिया पर मैं नही भूल सकती ना मनन के साथ को ना उसके लिए किए इंतज़ार को और ना ही मनन को। मैंने एक साल तक सबको मानने की पूरी कोशिश की और आखिर सब मान गए पर दिल से नही बस मेरी ज़िद से। मैं जानती हूँ अभी भले ही दिलों में थोड़ी नाराज़गी है पर एक दिन वो जरूर खत्म हो जाएगी और सब ठीक हो जाएगा।

मैं खुश हूँ मनन मेरे साथ है हर सफर खूबसूरत हो जाता जब किसी साथी का साथ मिल जाता है। बस ऐसे ही मनन का हाथ मेरे हाथों में रहे और जिंदगी चलती जाए ,चाहे तेज़ बारिश आये या तीखी धूप पड़ जाए बस तेरे साथ ये जिंदगी चलती जाए बस चलती जाए मनन को प्यार देखती हुई काव्या का मन यही कह रहा है।


आदत


सुबह की होती भोर में रात का अंधेरा धीमे - धीमे गायब होने लगता है और उम्मीदों की किरणें दरवाज़े पर दस्तक देने लगती है, पक्षियों की आवाज़ कानों में मीठी गुदगुदी करती हुई वृन्दा को कब से जगाने की कोशिश कर रहीं थी और वृन्दा जाग गई पक्षियों की आवाज़ से नही बजती डोर बेल की आवाज़ से। वृन्दा देख तो कौन है दरवाज़े पर हाँ जा रही हूँ ,पता था मुझे, दरवाज़ा खोलने मुझे ही जाना पड़ेगा जैसे कि मेरे अलावा तो कोई और घर मे है ही नही धीरे- धीरे बड़बड़ाती हुई कुछ नींद में अलसाई सी वृन्दा दरवाज़े के पास जा पहुँची और दरवाज़ा खोल दिया दरवाज़े पर एक लड़का खड़ा था जिसका क़द 5 फुट 6 इंच होगा और रंग गेहुँआ था वृन्दा कौन है बेटा माँ ने आवाज लगाकर पूछा आप खुद ही देखलो कौन है वृन्दा ने थोड़ी नाराज़गी भरी आवाज़ में कहा। वृन्दा की माँ ने दरवाज़े पर आकर देखा तो उनका चेहरा खुशी से खिल उठा अधीश बेटा, अरे बाहर क्यों खड़े हो अंदर आओ, वृन्दा जाओ अधीश के लिए पानी ले आओ तब तक वृन्दा की माँ संध्या ने अधीश को हॉल में बैठाया और घर - परिवार का हालचाल पूछने लगीं तभी  वृन्दा पानी ले आई जिस तरह से वो पानी लेकर आयी लग नही रहा था कि वो ये पानी अधीश के पीने के लिए लाई है ऐसा लग रहा था जैसे कि वो गिलास का पानी अधीश के मुँह पर फेंक देगी पर ऐसा नही हुआ ये देख अधीश ने गहरी साँस ली और पानी पी लिया। अधीश बेटा अपने खाने- पीने का ख़्याल नही रखते हो क्या कितने दुबले- पतले दिख रहे हो वृन्दा की माँ ने कहा। नही मैं अपना ख़्याल रखता हूँ पर शायद किसी की नज़र लग गई है , वो क्या है कि मुझे लोगों की नज़र बहुत जल्दी लग जाती है अधीश ने कहा तो वृन्दा उसे घुरने लगी। कुछ देर बाद वृन्दा का छोटा भाई लक्ष्य भी आधी नींद में चलता हुआ अपनी आँखों को मसलता हुआ हॉल में आ पहुँचा कैसे हो लक्ष्य। आप, कहते हुए लक्ष्य मुस्कुराया और जाकर अधीश के गले लग गया मैं ठीक हूँ आप बताइये मेरी याद आ रही थी क्या? आपको ,इसलिए मुझसे मिलने आये है लक्ष्य ने छेड़ने वाले अंदाज़ में कहा। अधीश मुस्कुराया अरे! नही दरसल मैं यहाँ पटना ऑफिस के कुछ काम से आया हूँ सोचा आप सबसे मिलता हुआ चलूँ अभी थोड़ी देर में मुझे होटल भी पहुँचना है क्यों? लक्ष्य ने पूछा। मैं पटना 5 दिनों के लिए आया हूँ। अपना घर होते हुए तुम होटल में क्यों रहोगे भला मैंने कह दिया तुम्हें यही रहना होगा वृन्दा की माँ ने आदेश देते हुए अंदाज में कहा  पर मैं अधीश बोला। पर मैं मगर कुछ नही तुम यही रहोगे माँ ने कहा तो अधीश ने खुशी - खुशी उनकी बात मान ली पर वृन्दा अधीश के यहाँ रुकने से खुश नही थी वो इतनी गुस्सा थी कि उसके उसने सबके साथ नाश्ता भी नही किया। नाश्ते के बाद जब अधीश मीटिंग के लिए जा रहा था तब वृन्दा अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी उसे देख रही थी लेकिन जब अधीश की नज़र उस पर पड़ी तो वृन्दा ने अपनी नजरें फेर लीं। शाम को डिनर के वक्त माँ लक्ष्य और अधीश तीनो खूब बातें किये जा रहे थे और वृन्दा मुँह फुलाये इन तीनो को देखे जा रही थी। लक्ष्य अपने कॉलेज फ्रेंड्स के बारे में अधीश को कुछ बता रहा था जो सुन अधीश भी अपने कॉलेज के वक्त के किस्से सुनाने लगा। वृन्दा को किसी से बात न करते देख अधीश ने कोशिश की उससे बात करने की पर उसने उसकी बात का कोई जवाब नही दिया। दो दिनों तक ऐसे ही चलता रहा वृन्दा नाराज़- नाराज़ रही और अधीश उससे बात करने की कोशिश करता रहा। आज सुबह अधीश जब हॉल में बैठे हुए फोन पर बात कर रहा था तब वृन्दा चोरी-  छुपे अधीश की बातें सुनने की कोशिश कर रही थी क्योंकि अधीश उस वक्त किसी लड़की से बात कर रहा था। वैसे अधीश जान गया था कि वृन्दा उसकी बातें सुन रही है इसलिए उसे परेशान करने के लिए अधीश फोन कट हो जाने के बाद भी बड़े इतराते हुए बात करता रहा जैसे किसी खास दोस्त से बात कर रहा हो। और इसके बाद घर से लक्ष्य को ये कहकर चला गया कि वो ऑफिस के ही किसी काम से जा रहा है। जबकि उसने कल ही लक्ष्य को बताया था कि सन्डे को उसकी कोई भी मीटिंग नही है वो घर पर ही रहेगा फिर अचानक अधीश कहाँ चला गया वृन्दा टेरिस पर यहाँ से वहाँ वहाँ से यहाँ घूम - घूमकर यही सोचकर परेशान हुए जा रही थी। शाम को जब अधीश घर आया तब वृन्दा का चेहरा देखने लायक था हॉल में बैठे हुए सब साथ मे टीवी देख रहे थे वृन्दा अधीश को इस तरह घूरे जा रही थी जैसे चोर की दाढ़ी में तिनके को खोज ही लेगी पर ऐसा कुछ हुआ नही। माँ और लक्ष्य से बात करते हुए अधीश के चेहरे पर ऐसे कोई भाव नही थे और ना ही उसने ऐसी कोई बात की जिससे ये कहा जाये कि उसका कोई झूठ पकड़ा गया। वृन्दा थोड़ा उदास हो गई , क्योंकि अधीश की वो चोरी जोकि खुद वृन्दा के मन की कल्पना है वो उसे पकड़ नही पाई लेकिन अधीश खुश था किसी बहाने ही सही वृन्दा उसके के बारे सोच तो रही है बस उसका उदास सा चेहरा देख अधीश को थोड़ा बुरा लग रहा था अ ,  वृन्दा रिमोर्ट देना प्लीज़ अधीश ने कहा तो बिना कुछ बोले वृन्दा ने टीवी का रिमोर्ट टेबल पर रख दिया और उठकर अपने कमरे में चली गई। एक बार फिर अधिश की कोशिश नाकाम हो गई। वृन्दा छोटी - छोटी बातों पर बहुत जल्दी उदास हो जाती है आदत है उसकी, लेकिन जब कोई अपना उदास हो तो भला अपने मन को सुकून कैसे से मिल सकता है। रात को काफी कोशिश के बाद भी अधीश को नींद नही आ रही थी तीन दिन गुजर गए अब सिर्फ दो दिन ही बाकी है जैसा सोचा था अगर वैसा नही हो पाया तो , एक के बाद एक ना जाने कितने सवाल कितनी बातें अधीश को परेशान करने लगी। रात के 2 बज गए नींद तो नही आई पर भूख का एहसास जरूर होने लगा अधीश उठकर किचन में चला आया और खाने के लिए कुछ ढूंढने लगा। तभी पीछे से वृन्दा भी आ पहुँची उसे देख अधीश झिझकते हुए बोला वो मैं पानी लेने आया था अधीश ने पानी की बोतल ली और अपने कमरे में चला आया। अब तो नींद और कोसों दूर हो गई पेट मे चूहे जो दौड़ने लगे। अधीश बार - बार लेटता और फिर उठकर बैठ जाता। 10 मिनिट बाद वृन्दा कुछ लेकर आई और अधीश को दे दिया ये क्या? है अधीश ने पूछा,  सेवई अब इतनी जल्दी तो यही बन सकती थी यहाँ - वहाँ की बातें सोचकर देर तक जागते हो और जब भूख लगने लगती है तो आधी रात में किचन की ओर भागते हो आदत है ना तुम्हारी , फिर भले ही कोई तुम्हारी वजह से परेशान हो तुम्हे उससे क्या झूठा गुस्सा दिखाते हुए वृन्दा बोली। जब मेरी आदत इतने अच्छे से मालूम है तो क्यों? चली आयीं अधीश ने वृन्दा को देखते हुए कहा। वृन्दा ने एक नज़र अधीश को देखा और जाने लगी अधीश ने झट से वृन्दा का हाथ पकड़ लिया एक बार तो बात कर लो,अच्छा सुन तो लो प्लीज़।वृन्दा चुपचाप बैठ गई। सॉरी , मुझे गुस्सा नही करना चाहिए था कभी - कभी न चाहते हुए भी हमसे कुछ गलतियाँ हो जाती है हम अपना पेशेन्स खो देते है मैंने भी खो दिया था आय एम सॉरी अधीश ने बोला, इसके बाद वृन्दा उठकर चली गई। 

जब हम किसी से नाराज़ होते है तो हम ये तो नही जानते कि हमारी नाराज़गी का सामने वाले पर क्या असर हो रहा है,  पर हाँ हमारा खुद का मन जरूर बेचैन रहता है और चाह कर भी हम अपने मन को खुश नही रख पाते वृन्दा का मन भी बेचैन है। इस तरह नाराज़ होकर मैं अधीश को सज़ा दे रही हूँ या खुदको मुझे कुछ समझ नही आ रहा अपने कमरे में बैठे हुए वृन्दा मन ही मन सोच रही थी। सुबह जब वृन्दा की माँ उसके कमरे में आई तो वृन्दा बेड से टिके हुए फर्श पर बैठी हुई थी वृन्दा क्या?  हुआ बेटा कहते हुए माँ वृन्दा के पास जा बैठी वृन्दा ने अपना सिर माँ के कन्धे पर रख दिया मैंने गलत किया क्या, मुझे इस तरह नाराज़ होकर नही आना चाहिए था हम अपनो पर ही तो गुस्सा होते है किसी पराये पर नही और गलती मेरी भी तो थी उसने सॉरी भी कहा मम्मा, वो मन का बहुत अच्छा है वृन्दा बोले जा रही थी और माँ उसकी बातों को खामोश होकर सुन रही थी  बचपन मे भी जब वृन्दा को अपनी किसी गलती पर अफसोस होता था तब भी वो ऐसे ही अपनी मम्मा को धीरे - धीरे थोड़ा रो - रोकर सारी बात बताती थी अभी भी वैसे ही है जल्दी गुस्सा हो जाना नाराज होना और फिर दुखी होकर रोने लगना नादानियाँ अभी भी भरी हुई है वृन्दा में। वृन्दा की बातों को बीच मे रोकते हुए माँ ने उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया जो गलती होने , ना होने पर भी खुद माफ़ी मांगे वो मन का अच्छा ही होता है माँ ने कहा। आज नाश्ते के वक्त वृन्दा थोड़ी बदली हुई सी थी उसके चेहरे पर कोई गुस्सा जो नज़र नही आ रहा था पर अधीश कुछ जल्दी में था माँ के पूछने पर उसने बताया वो मुझे ज़रा जल्दी जाना है जिस काम के लिए मैं आया था शायद वो आज पूरा हो जाएगा तो फिर मैं कल वापस चला जाऊँगा। जबसे वृन्दा ने अधीश के वापस लौटने की बात सुनी है उसका मन परेशान सा हो गया है शाम को खिड़की के पास बैठकर वृन्दा रास्ते की ओर देख रही थी शायद अधीश के आने का इंतजार कर रही है। 

उस शाम भी वृन्दा इंतज़ार ही तो कर रही थी अधीश जल्दी घर आने वाला था पर शाम बीत गई और अधीश रात को घर पहुँचा वो भी 10 बजे के बाद अधीश के आते ही वृन्दा ने उस पर नाराज़ होना शुरू कर दिया कुछ देर अधीश चुप रहा लेकिन फिर अपना पेशेन्स खो बैठा और वृन्दा पर उसका सारा गुस्सा निकल पड़ा वो गुस्सा जो कुछ दिनों से अधीश की प्रोफेशनल लाइफ में चल रही प्रॉब्लम्स की वजह से था उस रात जब अधीश घर लौटा तब वो परेशान था शायद कुछ हुआ था ऑफिस में जिसका असर अधीश पर इतना हुआ कि वो भूल गया कि वृन्दा उसका इंतज़ार कर रही होगी। अधीश के इस तरह गुस्सा करने पर वृन्दा को बहुत दुख पहुँचा वो नाराज़ होकर पटना चली आई। जब किसी अपने से हमेशा हँसाने की उम्मीद हो और वो रुला दे तो दुख तो होता ही है। रात को खुले आसमान के नीचे बैठने से मन को सुकून मिलता है,है ना लक्ष्य ने कहा तो वृन्दा और अधीश धीमे से मुस्कुरा दिये जैसे ज्यादा मुस्कुराए तो उन्हें टैक्स देना पड़ जायेगा। रात के डिनर के बाद अधीश, वृन्दा और लक्ष्य टेरिस पर थे लक्ष्य ही दोनों तो को ले आया ये कहकर की रात में चलती ठंडी हवा जब दिमाग़ से टकराती है तो वी एक दम शांत हो जाता है और हम बड़ा रिलैक्स फील करते है। अधीश और लक्ष्य दोनों आपस मे खूब गपशप किये जा रहे थे कि तभी लक्ष्य को किसी का कॉल आ गया लक्ष्य कॉल रिसीव करते हुए टेरिस पर ही थोड़ा दूर जाकर खड़ा हो गया। अधीश वृन्दा से बात करना चाह रहा था पर उसे समझ नही आ रहा था शुरू कैसे करें वो आज की मीटिंग बहुत अच्छी रही अधीश ने कहा , अच्छा वृन्दा ने कहा ,हाँ मैं फिर कल चला जाऊँगा अधीश ने कहा , तो फिर वृन्दा बोली तो फिर क्या?  अधीश ने पूछा वृन्दा चाह रही थी अधीश कुछ बोले पर वो समझ ही नही पा रहा था वृन्दा को थोड़ा गुस्सा आ गया अधीश वृन्दा को देख सोचने लगा अब क्यों? गुस्सा हो गई। थोड़ी देर दिमाग लड़ाने पर अधीश समझ गया सॉरी अब कभी गुस्सा नही करूँगा मैं तुम्हे फोर्स तो नही कर सकता पर तुम अपनी नाराज़गी खत्म करके मेरे साथ अधीश ने इतना कहा और वृन्दा ने उसके हाथ मे इलायची दे दी तुम्हे डिनर के बाद इलायची खाने की आदत है वृन्दा ने कहा। आदत तो तुम्हारी भी है जब हम किसी के साथ रहते है तो हमें उसकी और उसकी आदतों की आदत होने लगती है मुझे भी तो हो गई है तुम्हारे साथ रहने की आदत अधीश ने बोला और टेरिस से चला गया। सच ही तो है आदत ही तो हो गई है अधीश को वृन्दा के साथ कि उसकी नादानियों की उसके रूठ जाने की और उसे मनाने की। वृन्दा अधीश जितनी मैच्योर नही है अभी भी थोड़ी सी नासमझ है ये बात अधीश जानता है इसलिए वो खुद उससे नाराज़ कभी नही होता। सुबह जब अधीश अपना बैग लेकर दरवाज़े पर पहुँचा तो पीछे से वृन्दा ने आवाज़ लगा कर रोक लिया अकेले ही जाओगे अपनी वाइफ को साथ नही ले जाओगे बस तुम्हे ही मेरी आदत है और मुझे नही है अधीश होले से मुस्कुराकर वृन्दा को देखने लगा वृन्दा ने पास आकर कहा ज्यादा मत मुस्कुराओ घर चलकर तुमसे पूछना है क्या? अधीश ने पूछा दो दिन पहले फोन पर किस खास दोस्त से बात कर रहे थे।



 



विजया



एक बार चलना शुरू कर दो तो वो रास्ते भी नज़र आने लगते है जो कुछ देर पहले दिख भी नही रहे थे। किसी एक जगह खड़े रहकर ये कहना कि आगे रास्ता है ही नही ये खुद को चलने से रोकने का एक अच्छा बहाना है जो मुझे किसी रास्ते या किसी मंजिल तक कभी नही ले जाएगा,  मैं अभी जहाँ हूँ ये मुझे वहीं खड़े रखेगा और मैं ये नही चाहती थी इसलिए रास्ते पर चल पड़ी थी इस वक्त मेरे मन मे मंजिल तक ना पहुँच पाने का कोई डर नही था क्योंकि मेरा लक्ष्य मंजिल को पाना नही था मेरा लक्ष्य तो चलते जाने का था, नये रास्ते बनाने का था वो रास्ते जो किसी को उसकी मंजिल तक पहुँचा सके। बिल्कुल मुश्किल नही था सब आसान रहा मैं अपने रास्ते पर चलती गई और सब हासिल होता गया ये कहना भले ही आसान हो पर इसे मान लेना आसान नही है। सच यही है आसान कुछ भी नही होता है हमे उसे आसान बनाना पड़ता है। जैसे कोई कच्ची सड़क, ऊँची- नीची कहीं- कहीं पर गढ्ढ़े कहीं सकरी ऐसे रास्ते पर चलना ज़रा कठिन होता है लेकिन जब उसे पक्की सड़क में बदल दिया जाता है तो उस पर चलना आसान हो जाता है। हमारे जीवन की सड़क भी ऐसी ही है कच्ची , जिस पर होसलों की गिट्टी और विश्वास की रेत को डालकर उसे पक्का और मजबूत बनाना है ताकि हमारा उस पर चलना आसान हो सके। 
सिर्फ रास्ते ढूंढने में ही दिमाग़ मत लगाओ रास्ते बनाने की भी कोशिश करो। कौन तुम्हारे साथ है ये तलाशना बंद कर दो तुम खुद , कितने साथ हो खुदके ये देखना शुरू कर दो क्योंकि खुद से बेहतर साथी तुम्हारा कोई और हो ही नही सकता। इसलिए ज्यादा सोचो नही बस खुद का हाथ थामकर खड़े हो जाओ और चल पड़ो उस राह पर जो तुम्हारी है उस रास्ते पर जो तुमने बनाया है उस मंजिल की ओर जो सिर्फ तुम्हारी है विजया की इन बातों ने रात के अंधेरे में पस्त होकर सोए हौसलों को जैसे सुबह के उजाले मे तेज़ आवाज़ लगाकर फिर जगा दिया हो।हॉल में बैठा हर एक शक़्स अपनी आँखें विजया पर टिकाये खोमशी के साथ उसकी बातों को सुनता जा रहा था।अपनी बात खत्म कर जैसे ही विजया ने अपने हाथ का माइक टेबल पर रखा तालियाँ गूँज उठी और दस मिनट तक ये गूँज हॉल में बनी रही। सब विजया से बहुत प्रभावित हुए उसकी बातों में वो असर या कहे जादू है जो उस शख्स को भी दौड़ की रेस में खड़ा कर सकता है जिसके चलने की उम्मीद भी न के बराबर हो। कितने साहस और विश्वास से भरी है विजया शर्मा हर एक शक़्स विजया को देख यही सोच रहा था। कॉलेज इवेंट से जाते वक्त फूल एनर्जी के साथ विजया ने सबको शुभकामनाएं दी उनकी भविष्य की जीत के लिए और बड़ी सी मुस्कुराहट के साथ बाय जल्द ही मिलेंगे कहकर विजया चली गई पर सबके मन की आवाज़ में वो कहीं न कहीं खुदको थोड़ा छोड़ गयी। 
हेलो आई एम विजया शर्मा आँखों मे चमक और चेहरे पर तेज़, कॉन्फिडेंट से भरी ये आवाज़ जब लोगो के कानों में पड़ती है तो जोश की एक तरंग दिल और दिमाग से होती हुई पूरे शरीर मे दौड़ पड़ती है और एक नया जज़्बा जगा देती है। कितने लोगो की जिन्दगी बदली है विजया की वजह से ,हजारों लोग है जो विजया को सुनना चाहते है सुनते है उसे पसन्द करते है उसकी बातें इतनी पावरफुल होती है कि सुनने वाले का नज़रिया बदल देती है। कहाँ से आया विजया में इतना आत्मविश्वास शायद बचपन से ही विजया ऐसी ही होगी निडर।
कॉलेज इवेंट से घर आने के बाद विजया धृति के रूम में गई पर धृति सो गई थी और आई धृति के पास बैठी हुई थी तुम आ गई आई ने कहा हाँ बस अभी आई हूँ आई विजया ने आई से कहा। 
अच्छा आप कॉफी पियोगी विजया ने आई से पूछा विजया बेटा मैं बना देती हूँ ना रोज़ तो तुहि बनाकर पीती है थक गई होगी तू, नही आई आज भी मैं ही बनाऊँगी। विजया ने दोनों के लिए कॉफी बनाई और कॉफी का मग आई के हाथ मे देते हुए बोली आई आप आराम करलो मैं हूँ यहाँ धृति के पास ,ठीक है कहकर आई अपने रूम में चली गई। हाथ मे कॉफी का मग लिए विजया खिड़की के पास जा बैठी और सोती हुई धृति को देखने लगी कितने सुकून और बेफ़िक्री के साथ सो रही है धृति, अभी जागी हुई होती तो सबको दौड़ा रही होती अपने पीछे- पीछे पर सोते हुए कितनी शांत लग रही है बिल्कुल मासूस जबकि एक नम्बर की शैतान है। मेरी प्यारी बच्ची कहते हुए विजया ने धृति का सिर चुम लिया। इसके बाद विजया कुछ देर आई के पास बैठी आज का दिन कैसा रहा क्या हुआ सब कुछ बताया जितने चाँव से विजया सारी बातें बताती है उतने ही मन लगाकर आई उसकी सारी बातों को सुनती है आई को भी विजया की बातें सुनना अच्छा लगता है। आसमान में अकेला चाँद होता तो आसमान कितना खाली- खाली लगता चाँद के साथ तारों का होना भी जरूरी है , चाँद के साथ टिमटिमाते तारों से आसमान किसी खूबसूरत चादर की तरह लगता है। भले ही तारे चाँद से छोटे नज़र आते है पर चमकते वो भी है वजूद उनका भी है। 
खिड़की के पास खड़ी आसमान की ओर देख रही विजया यही सोच रही थी तभी मोबाइल स्क्रीन पर लाइट चमकती दिखाई दी आज जिस कॉलेज इवेंट में विजया गई थी वहाँ की प्रिंसिपल का कॉल था हेलो विजया जी आज आपके आने से स्टूडेंट्स बहुत मोटिवेट हुए ऐसे ही सभी को प्रेरित करती रहे, आप एक आत्मविश्वासी और साहसी महिला है अपने कार्य मे इसी तरह आगे बढ़ती रहे हमारी शुभकामना आपके साथ है जी शुक्रिया प्रिंसिपल की बात सुनने के बाद जवाब देते हुए विजया ने कहा। जब कोई तारीफ़ करता है तो हमारा चेहरा खुशी से खिल उठता है पर विजया वो तो किसी गहरी सोच में पड़ गई उसे कॉलेज का वो एग्जाम हॉल नज़र आ रहा है जहाँ स्टूडेंट अपना एग्जाम दे रहे है दो टीचर्स भी है जो स्टूडेंट्स पर नजर रखे हुए है एक स्टूडेंट अपने काँपते हुए हाथों से जल्दी- जल्दी अंसर शीट में कुछ लिखने की कोशिश कर रही है हॉल में लगी घड़ी का काँटा जैसे- जैसे आगे बढ़ रहा था उसके मन की बेचैनी और घबराहट भी उसके साथ बढ़ती जा रही थी तभी पैन हाथ से छूटकर नीचे गिर गया विजया ऐनी प्रॉब्लम, मैम वो पैन विजया धीमी आवाज में बोली ठीक है उठा लो टीचर ने कहा। तब पैन उठाकर मैंने फिर लिखना शुरू कर दिया कुछ देर बाद बैल बज गई एग्जाम का समय खत्म हो गया मैं तेज़ी से हॉल से बाहर आ गई और जल्दी- जल्दी कॉलेज से बाहर निकल टैक्सी में जा बैठी मैंने क्या लिखा कुछ याद नही जो भी सब पढ़ा वो एक साथ दिमाग़ में ऐसे घूमने लगा कि कुुुछ समझ ही नही आ रहा था किस सवाल के लिए मुझे क्या लिखना था मैं भूल गई बहुत कन्फ्यूज हो गई थी। घर पहुँचते ही मैं सीधा माँ के पास गई कहा कुछ नही बस जाकर उनके पास बैठ गई माँ की तबियत ठीक नही हुई थी वो अभी भी बीमार थी। मैं बचपन से ही डरपोक रही हूँ मैं डरती रही और माँ मुझे हिम्मत देती रही। जब भी माँ- पापा के बीच झगड़ा होता तो मैं डर जाती पापा मुझ पर चिल्ला पड़ते तो मैं सहम जाती। स्कूल में मैं ना किसी के साथ खेलती थी और न ही झगड़ती थी ,डरती थी खेलते हुए अगर किसी ने धक्का दे दिया तो में गिर जाऊँगी अगर किसी बच्चे से झगड़ा हुआ तो पनिशमेंट मिलेगी। जब भी मैडम बुक पढ़ने के लिए मुझे क्लास में खड़ा करती तो में ये सोचकर डर जाती की अगर कुछ गलत पढ़ दिया तो मैडम कितना डाँटेगी मुझे उस डर से मैं बुक पढ़ ही नही पाती। एग्जाम में फेल न हो जाऊँ इसलिये दिनरात खूब पढ़ाई करती पर एग्जाम पेपर देखते ही सब भूल जाती। मुझे लेकर माँ को फिक्र होती थी पर वो कभी मुझे पर नाराज़ नही हुई बस हमेशा मुझे समझाती रही। माँ मन से बहुत मजबूत थी पापा ने उन्हें डिवोर्स देकर दूसरी शादी कर ली पर माँ इस बात से टूटी नही, वो मुझे अच्छी परवरिश देने की कोशिश करती रहीं
वो न तो बीते कल को याद करके रोतीं और न ही हमारे आज की प्रोबल्स को देखकर दुखी होती। जब जीवन हमारा है तो चलना भी हमे ही होगा ना, दुखी होकर बैठने और डर कर घबराने से कुछ नही होगा तुम जहाँ हो वही रह जाओगे जबकि जीवन का मतलब चलते जाना है रुकना नही इसलिए घबराना डरना छोड़ दो हिम्मत करके आगे बढ़ना सीखो समझ गई ना बेटा माँ ने जब मुझसे कहा था तो मैंने हाँ में सिर हिला दिया था। पर समझ तब आया जब माँ मुझे छोड़कर चलीं गई अपने आख़री पल में माँ ने मुझसे कहा था जिनकी साँसे थम जातीं है सफर उनका खत्म होता है लेकिन अगर तुम्हारी साँसे चल रही है मतलब तुम्हारा सफ़र जारी है तुम्हे चलना होगा रास्ता न मिले तो घबराना नही खुद रास्ता बनाना पर चलना जरूर।
माँ जाते- जाते मुझे आत्मविश्वास से जीना सीखा गई। मैं अपने कॉलेज एग्जाम में फेल हो गई थी पर दुखी होकर बैठी नही मैंने फिर से तैयारी की फिर एग्जाम दिया इस बार मे पास हो गई कुछ दिन बाद मैं रजनी ताई जोकि माँ की सहेली थी।माँ जहाँ  नौकरी करती थी ताई भी वहीं नौकरी करती थी माँ के बीमार होने पर बहुत साथ दिया था उन्होंने हमारा , वो अकेली थी कोई नही था उनका अपना इसलिए मैं उन्हें घर ले आई। इसके बाद मैंने पार्ट टाइम जॉब जॉइन करली और साथ ही आगे की पढ़ाई करती रही।पर मैं कुछ अलग करना चाहती थी मैंने अलग- अलग तरह के लोगो से मिलना शुरू किया उनकी लाइफ की प्रोबल्स को समझने की कोशिश की , जब उनके जीवन मे कोई दिक्कत या परेशानी होती है तो वो क्या सोचते है उसे लेकर। मैंने सबसे मुलाकातें की शिक्षित अशिक्षति ,स्टूडेंट्स ऑफ़िस वर्कर ,हाउस वाइफ, बिज़नेसमेन ,चिल्ड्रन्स सबको समझने की कोशिश की। ये सब आसान नही था क्योंकि कोई बात करने को तैयार होता और कोई नही भी होता पर मैं हार नही मानती थी मैंने आप के जीवन के सात साल इसी में लगा दिए और इसी बीच मुझे धृति भी मिली मैंने उसे अडॉप्ट कर लिया। मैं अपनी बनाई राह पर चलती गई और कब लोगो के लिए प्रेरक बन गई मुझे पता ही नही चला आज मेरी पहचान एक मोटिवेटर की है। मैं किसी का हाथ पकड़कर उसे चलाना नही चाहती थी मैं बस इतना चाहती थी लोग अपने हौसलों से चलना सीखे। रात आज छोटी हो गई या मैं ही कुछ ज्यादा सोचने बैठ गई 1 बज गये मुझे पता ही नही चला आई को पता चलेगा तो डाँट लगाएँगी मैं और धृति रजनी ताई को आई कहकर बुलाते है आई ही तो है वो हमारे लिए। 
आज फिर एक सैमिनार ,हैलो आई एम विजया शर्मा कोई तुम्हे तराशेगा तुम तभी चमकोगे ये सोचकर मत बैठो तुम खुद , खुदको तराशना शुरू कर दो तुमसे अच्छा तुम्हे कोई और नही निखार सकता। मुश्किलें देखकर तुम कल भले ही लड़खड़ा गए हो पर आज तुम चलना सिख गए हो,  मतलब कल चाहे जैसा भी रहा है जिसका भी रहा हो पर आज तुम्हारा है सिर्फ तुम्हारा।

एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE