
वो दिन आ ही गया जिस दिन का सपना जगदीश जी और उनकी पत्नी विमला ने देखा था सामने दुल्हन के जोड़े में खड़ी चंचल अचानक से बड़ी नज़र आ रही थी हमारी छोटी सी गुड़िया बड़ी हो गई विमला जी धीरे से बोली , हाँ हमारी चंचल बड़ी हो गई अपनी बेटी को प्यार से देखते हुए जगदीश जी ने कहा। अपनी बेटी को दुल्हन बने देख जगदीश जी और विमला जी का मन बहुत ही भावुक हो रहा था जिस दिन का इंतज़ार इतने वक्त से था आज वो पल आया तो पर मन कमजोर पड़ रहा था आँखे बार - बार नम हो जा रहीं थी जगदीश जी और विमला जी जयमाला के लिए खुद चंचल को उसके कमरे में लेने आये चंचल अपनी बहनों और सहेलियों के बीच बैठी थी विमला और जगदीश दरवाजे के पास खड़े कुछ पल ठहर कर अपनी बेटी को देख रहे थे पापा, मम्मी नजर पड़ते ही चंचल बोली विमला जी चंचल के पास आई और नजर का काला टिका लगाते हुए उसका सिर चुम लिया, जगदीश जी ने भी चंचल के पास आकर उसके सिर पर प्यार से हाथ रखा बोले- हो गई दुल्हन तैयार चंचल ज़रा सा मुस्कुराई और धीरे से अपना सिर हिला दिया। चलो बेटा जयमाला के लिए सब इंतजार कर रहे है विमला ने चंचल से कहा। चंचल धीरे- धीरे कदम बढ़ाती हुई मंडप की तरफ आ रही थी उसके एक ओर माँ विमला और दूसरी ओर पिता जगदीश थे और पीछे उसकी बहने और सहेलियां खुश होती हुई उसके साथ - साथ आ रही थी। चंचल अपने पिता जगदीश जी का हाथ पकड़कर चल रही थी उसका एक - एक आगे बढ़ता कदम पिता जगदीश जी को पीछे गुजरे वक्त की ओर ले जा रहा था जिसमें उन्हें छोटी सी चंचल दिख रही थी जो अपने पिता की उंगली पकड़कर नन्हे कदमों से आगे बढती हुई चलना सिख रही है और उसकी हँसी की किलकारी पूरे घर मे गूँज रही है ,वक्त कितनी तेज़ी से निकलता है देखते ही देखते चंचल कितनी बड़ी हो गई इतनी सयानी के आज उसकी शादी होने जा रही है जिसके नन्हे- नन्हे हाथों से ठीक से आइसक्रीम भी नही पकड़ी जाती थी आज वो घर- गृहस्ती की बाग डोर अपने हाथ मे लेने जा रही है, जो अपने कंधों पर स्कूल का बैग टाँगने में रोने लगती थी अब वो अपने कंधों पर घर- परिवार की जिम्मेदारियां लेने को तैयार है अपने मन मे सोचते हुए जगदीश जी अपनी बेटी चंचल को देख रहे थे। चंचल के मंडप में पहुँचने के बाद पहले जयमाला हुई और फिर शादी की रस्मे शुरू हुई पंडित जी मन्त्र पढ़ते हुए दूल्हा - दुल्हन को कुछ कहते समझाते जा रहे थे फिर आवाज लगाई कन्यादान के लिए माता पिता आगे आये ये पल बड़ा नाजुक होता है हर माता- पिता के लिए विमला इस वक्त इतनी भावुक हो रही थी कि चाहकर भी उनके आँसू ठहर नही रहे थे चंचल की आँखे भी भर आयीं पर पिता जगदीश जी अपने मन को सम्हाले हुए अपनी बेटी का कन्यादान पंडित जी कहे अनुसार पूरी विधि से कर रहे थे आज जगदीश जी ने भरोसे और विश्वास के साथ अपनी लाडली बेटी का हाथ किसी ओर के हाथ मे सौंप दिया जीवनभर के लिए। बड़ा मुश्किल होता है जिसे बचपन से लेकर आज तक अपने प्यार से सींचा हो ,हर पल जिसे अपनी छाया में रखा हो और अचानक किसी और को उसे सौंप देना ,आसान नही होता अपने कलेजे के टुकड़े को किसी और को दे देना। शादी भी कैसा बन्धन है कुछ नए रिश्ते जुड़ते है और कुछ पीछे छूट जाते है अभी चंचल और वीरेन्द्र अग्नि के फेरे ले रहे थे बचपन मे चंचल की अपनी सहेली से छोटी- छोटी बात पर लड़ाई हो जाया करती थी बार - बार कट्टी चुप्पी होती रहती थी बस, वो नासमझ बच्ची जो थोड़ी- थोड़ी देर में कट्टी- चुप्पी करती थी आज कितना पक्का रिश्ता जोड़ने जा रही है किसी की जीवनसंगिनी बनकर। चंचल और वीरेंद्र के सात फेरे होते देख विमला जगदीश जी की ओर देखने लगी क्या? हुआ।जगदीश जी ने पूछा जी आपको कुछ याद आया हाँ आया कैसे चंचल अपने गुड्डे- गुड़िया की शादी कराया करती थी वो भी सारी रस्मों के साथ कितना ज़िद करके हमे भी अपने खेल में शामिल कर लिया करती थी जगदीश जी बोले, तब हम भी उसके साथ कितने खुश होते थे उसकी गुड़िया की शादी कराकर ,पर आज अपनी गुड़िया की शादी देख खुशी के साथ मन भारी हो रहा है कहते हुए विमला जी की आँखों से आँसू बह गए। वो इसलिए क्योंकि तब हम जानते थे कि गुड़िया की शादी हो जाने के बाद भी वो हमारी चंचल के पास रहेगी पर हमारी चंचल , वो चली जायेगी अपने मम्मी - पापा को छोड़कर हमारा आँगन सुना करके। अपने आँसुओ को सम्हालो विमला नही तो हमे ऐसे देख चंचल भी रो पड़ेगी जगदीश जी विमला जी को समझाते हुए बोले। सभी रस्मो और रिवाज़ो के साथ शादी सम्पन्न हुई चंचल और वीरेंद्र ने सभी का आशीर्वाद लिया। सभी ने नए जोड़े को आशीर्वाद दिया और उनके मंगल जीवन की कामना की। शादी पूरी हो जाने के बाद लड़की वालों की कुछ और रस्मे थी जो अभी बाकी थी जगदीशजी की बुआजी चाचीजी और घर की बाकी सभी महिलाएं रस्मो को पूरा करवा रही थीं कुछ मेहमान रस्में पूरी होने का इंतजार कर रहे थे और कुछ उसका आनन्द ले रहे थे इस सबके बीच जगदीश जी सबसे दूर अकेले खड़े कुछ सोच रहे थे। जब चंचल का जन्म हुआ था तो जगदीश जी ने पूरे मौहल्ले में मिठाई बाटी थी बड़ी मन्नतों के बाद ये नन्ही परी इनके घर आई थी और इसके आने से सारा घर खुशियों से भर गया चंचल के होने से घर मे रोनक बनी रहती बड़े जतन और लाड़ प्यार से अपनी बेटी चंचल को जगदीश जी ने पाला है। वो अभी उतने ही खुश है जितने चंचल के जन्म के समय हुए थे जब चंचल उनकी बगिया में किसी फूल की तरह खिली थी। अब उनकी बगिया का ये फूल किसी और के घर को महकाने जा रहा है बस इसलिए जगदीश जी अपने मन को मजबूत करने की कोशिश कर रहे है, क्योंकि कुछ देर बाद चंचल की विदाई हो जाएगी। रस्में पूरी हो गई विदाई से पहले चंचल अपने घर को अपनी आँखों मे बसा लेना चाहती थी वो उठकर घर के अंदर चली गई और सबसे पहले अपने कमरे में जा पहुँची जिसमे अपने हर एक समान को चंचल ने बड़े अच्छे से सहज कर रखा है उसके बचपन से लेकर अब तक कि बहुत सी चीजें है जो चंचल ने अपने कमरे में सजा रखी है फिर चाहे वो उसकी गुड़िया हो किताबें हो या बचपन मे पापा की लाई हुए लकड़ी की बैलगाड़ी हो या फिर वो कौड़ियाँ जो माँ ने लाकर दी थी खेलने के लिए। चंचल ने तो चुन्नी भी सम्हालकर रखी है जिस पर उसकी माँ ने अपने हाथों से कढ़ाई की थी। अपने कमरे से निकलकर चंचल रसोईघर में जा पहुँची माँ कैसे मेरे लिए प्यार से खाना बनाती थी और जब मैं खाना बनाना सीख रही थी तो माँ के इस सुंदर से रसोईघर का क्या हाल किया था मैंने एक भी रोटी गोल नही बनी थी और जब पहली बार चाय बनाई थी तो पापा को देने उनके कमरे गई थी वो भी बड़ी खुश होकर , पापा ने मुझे पैसे भी दिए थे और मम्मी - पापा के कमरे का रिनोवेशन मैंने ही तो कराया था तब कितना अजीब लग रहा था मम्मी- पापा को उनका बदला हुआ रूम देखकर। अपने घर की दीवारों को छूकर चंचल उसके एहसास को अपने मन मे बसा लेना चाहती थी घर का ये आँगन जहाँ खेल कर चंचल बड़ी हुई वो कितनी यादों की याद दिला रहा था इसी आँगन में बारिश में उछल- उछल कर भीगा करती थी चंचल। माँ कितना समझाती पर चंचल एक ना मानती। वो छत का झूला जिस पर सिर्फ चंचल का ही राज रहता था किसी और को झूलने का मौका ही नही देती थी और गमलों में लगे ये फूल चंचल के होते कोई इन्हें हाथ भी नही लगा सकता, आँगन में यही इसी जगह माँ चंचल को बैठाकर उसकी चोटी किया करती थी और वो साइकिल जो अमरूद के पेड़ के पास दीवार से टिकी खड़ी है जब साइकिल चलाना सिख रही तब पापा ने पीछे से साइकिल को पकड़ा हुआ था और मैं साइकिल चलाती जा रही थी उस वक्त पता नही चला था कि कब उन्होंने साइकिल छोड़ दी जब मैने मुड़कर देखा तो हड़बड़ा कर मैं गिर गई , तब गिर जरूर गई थी पर साइकिल चलाना सिख गई थी। चंचल चलो विदाई का वक्त हो गया चंचल के चचरे भाई देवेश ने आकर कहा दोनों भाई- बहन बचपन मे खूब लड़ा करते थे पर अभी देवेश कैसा उदास लग रहा है चंचल से तो नजर भी नही मिला रहा कि कहीं उसे उसकी आँखों मे आँसू न दिख जाए नही तो बाद में बहुत चिड़ायेगी। विदाई की तैयारियां हो चुकी थी और बारात अब दुल्हन के साथ लौटने को तैयार थी हँसते खिलखलाते चेहरों पर नमी आ गई थी माहौल अब थोड़ा ग़मगीन हो गया था चंचल के चाचा- चाची, मामा -मामी, वर्षा दीदी , भाई देवेश सबकी आँखे नम हो गई थी चंचल के साथ बिताए पल सभी को याद आ रहे थे चंचल के जीवन के इस नए सफर के लिए मन से सभी खुश थे पर वो उसने दूर जा रही है इस बात थोड़ा दुख भी था चंचल सबके गले लगकर रो रही थी अपना घर जहाँ वो छोटे से बड़ी हुई वो मायका जहाँ अपने भाई - बहनों के साथ हँसी ठिठोली की अपने परिवार के लाड़- दुलार में पली बड़ी वो मायका वो घर आँगन सब छूट जाएगा मम्मी- पापा भाई चाचा- चाची सबकी कितनी याद आएगी सोच- सोचकर चंचल को रोना आ रहा था चंचल जब अपने भाई देवेश के गले मिली तो वो अपने आँसू रोक न सका और रोने लगा, देवेश जो बचपन से आज तक चंचल से लड़ता रहा उसे बात - बात पर रुलाता रहा अब जब चंचल विदा हो रही है तो कैसे गले लगकर रो रहा है चंचल को ससुराल जाते देख देवेश को अब बुरा लग रहा है उसे लग रहा है कि उसकी बहन उससे दूर जा रही है। रोती हुई चंचल के कन्धे पर जब विमला जी ने हाथ रखा तो चंचल जोर से अपनी माँ से लिपट गई अपनी बेटी को विदा होते देख भला किस माँ के आँसू रुक पाये है जो विमला जी के रुक जाते मेरी चंचल ,मेरी बच्ची कहकर विमला जी रोये जा रही थी चंचल भी बहुत रो रही थी और साथ ही रोते हुए उसकी नजरें अपने पापा को ढूंढ रही थी। जगदीश जी गाड़ी के पास खड़े थे जिसमें बैठकर चंचल ससुराल जाने वाली थी वो ना कुछ कह रहे थे न सबकी तरह रो रहे थे बस खामोश खड़े अपनी बेटी को निहार रहे थे चंचल अपने पापा के सामने जा खड़ी हुई दो पल रुककर अपने पापा की आँखों मे देखने लगी पापा और बेटी की बिना बोले शायद मन ही मन कुछ बात हो रही थी और फिर चंचल पापा कहते हुए कसकर अपने पापा के गले लग गई। जगदिश जी ने बहुत कोशिश की , की उनकी आँखों से आँसू न झलके अपने मन को बहुत पक्का किया पर जब चंचल गले लगी तो उन्हें लगा जैसे फिर से छोटी सी चंचल अपने पापा के ऑफिस से आते ही उनकी गोद मे आ गई और चटर- पटर कर दिनभर की सारी बातें उन्हें बताने वाली हो। जगदीश जी की आँखों के किनारों से लम्बे- लम्बे आँसू बहने लगे एक पिता का दिल अपनी बेटी की विदाई पर इतना भर आया कि उनकी जुबान से कोई लब्ज़ भी बाहर न आ सका, की वो अपनी बेटी से कह सके कि मेरी प्यारी बच्ची हमेशा खुश रहना। इतने नाजुक पल में भी भरे नैनो से रीत निभाते हुए जगदिश जी ने चंचल को गाड़ी के अंदर बैठाया चंचल कार की खिड़की से बाहर सबको देखे जा रही थी और उसकी आँखों से आँसू बहे जा रहे थे सभी ने मिलकर गाड़ी को धक्का लगाया और चंचल अपने जीवन के नये सफर की ओर आगे बढ़ चली। जगदीश और विमला दूर तक अपनी बेटी को जाते हुए देख रहे थे उनकी लाडली बेटी अपना मायका छोड़ अब अपने ससुराल जा रही थी।
No comments:
Post a Comment