मन करेला


दिन ब दिन जैसे गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था हर बात में बस गुस्सा आने लगा था मन की नाराज़गी किसी खाई की तरह गहरी हो रही थी कोई अपना सा नही लग रहा था वो अपना, जो मेरे मन की बात को समझे मुझे खोमोशी से सुन सके। मेरे मन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी जैसे अंदर ही अंदर कोई ज्वालामुखी तैयार हो रहा हो जो किसी भी वक्त चीख़कर बाहर आने वाला हो। मन ही मन जाने कौन सी घुटन हो रही थी बीते कल की कुछ कडवी बातें आज में भी अपनी कड़वाहट घोल रही थी। मेरा बर्ताव बदलता जा रहा था तीखे शब्द हर वक्त मेरी जुबान पर रहने लगे थे और मन पर तो जैसे नफ़रत ने कब्ज़ा कर लिया था जो तिल- तिल मुझे जला रही थी और मैं कमज़ोर  होती जा रही थी बहुत कमज़ोर। हर दिन मेरे लिए किसी जंग के मैदान जैसा हो गया था जहाँ मेरा जीत हासिल करना मेरे लिए जरूरी हो गया था जैसे ये मेरी ज़िंदगी का कोई बड़ा युद्ध हो और हर हाल में मुझे इसे जितना हो। कुछ अलग ही हो गई थी मैं, आँखों मे गुस्सा चेहरे पर उदासी मन मे शिकायतें नाराज़गी छोटी सी बात पर चीखना चिल्लाना और हर बात पर लड़ने को तैयार मैं अब मैं नही रही थी कुछ और हो गई थी मन की शांति होंठों की हँसी दिल का सुकून सब कुछ खो गया था आजकल मुझे पता नही क्या हो गया था। अकेलेपन ने दिमाग़ मे घर कर लिया था आँसुओ से मैने अपना मन भर लिया था। ये कौनसी उदासी या नाराज़गी दिलों दिमाग़ पर छा रही थी जिससे मेरे मन की खुशी दूर, कहीं दूर, बड़ी दूर जा रही थी। बार- बार मेरे मन के भाव जाने क्यों बदल रहे थे बिना बात के दिल और दिमाग दहकती भट्टी में जल रहे थे। अचानक से मेरी दुनिया कितनी बदल गई थी जो कल तक सुबह के सूरज सी चमक रही थी वो अब रात के अंधेरे में ढल गई थी मेरा मन न जाने किस फ़िक्र में खो रहा था ना ठीक से जाग रहा था ना सुकून से सो रहा था। अभी तो किसी रेस में मैं दौड़ी भी नही थी फिर भी साँसे फूल रहीं थी पता नही किन उलझनों के झूले में मैं झूल रही थी बड़ा मुश्किल सा लगने लगा था अब ,  हँसकर कैसे जीते है कैसे मुस्कुराते है कैसे जिन्दगी में रंग भरे जाते है धीरे- धीरे मैं ये सब भूल रही थी। ऐसा क्यों? हो रहा था क्यों सब कुछ छूट रहा था ?। क्यों हर कोई मुझसे दूर हो रहा था ? जो मन कभी मिश्री था वो अब क्यों? करेला हो रहा था।

बड़ा ही कठिन दौर था ये, अचानक भागती - दौड़ती जिंदगी में ठहराव आ गया वो भी कुछ पल के लिए या एक दो दिन के लिए नही पूरे चार महीनों के लिए। शहर में लगे लॉकडाउन से कितना कुछ बदल गया था दिनभर का जो शेड्यूल था वो तो पूरी तरह चेंज हो गया था हर काम का समय ही बदल गया। वैसे शुरू के दिन बड़े ही अच्छे निकले लगा जैसे कुछ दिन सुकून के मिल गए जिसमे मैं अपने मन के मुताबिक चल सकती हूँ ऑफिस जाने की कोई झंझट नही और टाइम की कोई लिमिट नही। कुछ दिनों तक मैंने अपने मन का हर वो काम किया जो मैं अपने बिज़ी शेड्यूल के रहते नही कर पाई फिर चाहे वो पेंटिंग हो आर्ट क्राफ्ट हो या फिर अपने पसन्द के गाने सुनना या मूवी देखना,  मैंने तो खुशी - खुशी में कुछ नई रेसिपीज़ भी ट्राय कर ली बड़ा अच्छा लग रहा था कितने दिनों बाद ऐसा वक्त आया था जब मैं अपनी फैमली के साथ इतने इत्मीनान से वक्त गुजार पा रही थी दो दिन दो दिन आठ दिन और देखते ही देखते 15 दिन बीत गए अब मन के हौसले ज़रा कमज़ोर होने लगे थे। सूरज जैसा सुबह निकलता वैसे ही शाम को ढल जाता कुछ अलग नही लग रहा था अब कोई भी दिन, हर दिन एक जैसा था चार दीवार की अंदर, जैसे किसी पिंजरे में बंद हो गए हो। कुछ वक्त पहले मैंने प्लानिंग की थी कि अपनी फैमली के साथ किसी खूबसूरत सी जगह पर घूमने जाऊँगी पर लॉकडाउन की वजह से ये हो नही पाया इसलिए हम सबने मिलकर घर पर पिकनिक जैसा माहौल बनाने की कोशिश की पर खुले आसमान के नीचे खूबसूरत नेचर के बीच जाकर जो खुशी मिलती है वो चार दीवारों के अंदर कैसे मिल सकती है। अब तो घर में रहकर मैं ऊबने लगी थी ना ऑफिस जाना ,ना किसी दोस्त या रिश्तेदार से मुलाक़ात कर पाना, ना कहीं आउटिंग के लिए जा पाना, कितने टाइम से मैंने मेन रोड का चौराहा तक नही देखा था खिड़की से बाहर देखो तो सड़के सुनी नज़र आ रही थीं कोई चहलपहल नही जितनी दूर तक नज़र जा रही थी बस खामोशी ही दिखाई दे रही थी। अपने घर की खिड़की से बाहर झाँकते हुए मेरी नज़र पड़ोसियों के घर की खिड़कियों पर भी पड़ी वो भी मेरी तरह खिड़की के पास खड़े बाहर देख रहे थे सबको ऐसे देख कितना अजीब लग रहा था इस वक्त हमारी स्थिति पिंजरे में कैद उन पंछियों जैसी थी जो पिंजरे से बाहर झाँकते हुए आज़ाद होने की राह देख रहे होते है बड़ा मुश्किल होता है एक जगह पर कैद होकर रह पाना। धीरे- धीरे दिन गुजरते हुए एक महीना हो गये अब मन मे घबराहट सी होने लगी थी और दिमाग कुछ चिड़चिड़ा सा हो गया था कुछ अच्छा नही लग रहा था फैमिली मेम्बर्स के बीच भी छोटी- छोटी बातों पर टकराव और तनाव होने लगा था मुझे तो हर बात में अब गुस्सा आने लगा था कितनी अच्छी लाइफ थी मेरी सुबह मॉर्निंग वॉक पर जाना फिर ऑफिस के लिए निकल जाना नये- नये प्रोजेक्ट्स पर काम करना लंच ब्रेक में अपने कलीग्स से डिसकशन करना ऑफिस से लौटते हुए कभी - कभी मार्केट या कभी चौपाटी चले जाना और घर लौटते वक्त घर वालों के लिए भी कुछ न कुछ जरूर ले जाना। शाम को कभी कभार मैं मम्मी के साथ कॉलोनी वाले पार्क में भी चली जाती थी कॉलोनी के सब लोग आते है वहाँ, अच्छा लगता उस हरे- भरे पार्क में जाकर पर कितने दिनों से वो पार्क भी बंद है। अब तो बड़ा बुरा लगने लगा था सबके होते हुए भी जाने क्यों खुद को अकेली महसूस कर रही थी ऐसा लग रहा था जैसे कोई मुझे समझता ही नही। मैं अंदर - अंदर गुस्से से भरने लगी थी और मन उदासी में डूबने लगा था पता नही क्यों मुझे घर वालों की बातों से चीड़ आने लगी थी कुछ बातों पर तो मैं नाराज़ भी हो जाती थी अब मेरे दिमाग मे जाने कौन- कौन सी बातें चलने लगी थीं कुछ कड़वी- मीठी यादें एक साथ याद आने लगी थी मन दुखी हो रहा था और मन मे खड़वाहत सी घुल गई थी मैं उखड़ी- उखड़ी और नाराज सी रहने लगी थी मन बिल्कुल किसी कड़वे करेले जैसा कड़वा हो गया था कोई कुछ भी कहे मुझे सबकी बातें कड़वी ही लग रही थी। औरों की गलतियाँ उनकी बुराइयाँ मुझे ज्यादा नज़र आने लगी थी कितनी अलग हो गई थी मैं,  मेरी सोच भी कैसी हो गई थी। अब तो मन कई सारी उलझनों से घिरा हुआ महसूस करता ऐसा लगता जैसे वक्त के साथ आगे नही पीछे जा रही हूँ सब कुछ छूटता चला जा रहा हो। मेरा मन मुझे थका और हारा हुआ सा लगने लगा था कब ये लॉकडाउन खत्म हो और मैं खुली हवा में साँस ले पाऊँ दिल बस यही चाह रहा था। बड़े सब्र और मुश्किलों के बाद वो दिन आ ही गया जिसका सब इंतज़ार कर रहे थे लॉकडाउन हट गया सब अनलॉक हो गया अब सब आज़ाद थे इतनी खुशी पहले कभी नही हुई जितनी आज हुई पड़ोस में रहने वाले बच्चे नकुल ने अपने पिंजरे में बंद तोते को आजाद कर दिया और वो खुशी से अपने पँखो को फैलाये आसमान में उड़ गया। कुछ दिनों में सब कुछ पहले जैसा हो गया पर ये एक्सपीरियंस हमेशा याद रहेगा। सबके साथ होते हुए भी मैं खुदको अकेला महसूस करने लगी थी जिन लोगो ने वाकई इस वक्त को अकेले काटा होगा उनके लिए कितना मुश्किल रहा होगा उनके लिए तो घर के बाहर और अंदर दोनों ही ओर खामोशी रहे होगी। वक्त कठिन जरूर था पर बहुत कुछ सीखा गया उस बीते वक्त में मैं कितनी बदल गई थी क्योंकि अब सब पहले जैसा है तो बेहतर महसूस कर रही हूं। कल हम सब रानी झरना देखने गए थे ऊँचाई से गिरते इस झरने का पानी इतना ठंडा था जैसे बारिश का पानी हो, ये वाटरफॉल इतना खूबसूरत है कि देखते ही मन खुश हो जाये आसपास की हरियाली भी मन मोह रही थी बहुत अच्छा लग रहा था खुले आसमान के नीचे नेचर के करीब लगा जिंदगी फिर लौट आई। सबकुछ हमारे लिए कितना जरूरी और कितना खास है इस बात का एहसास हो गया है मुझे। मेरा मन भी पहले जैसा खुश रहने लगा है मैं फिरसे खुशमिजाज़ हो गई हूँ मन की कड़वाहट झरने के ठंडे पानी मे भीगकर धूल गई और गुस्से से भरा दिमाग़ ठंडा हो गया अब मन करेला नही रहा वो फिरसे मिश्री हो गया।

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