आदत


सुबह की होती भोर में रात का अंधेरा धीमे - धीमे गायब होने लगता है और उम्मीदों की किरणें दरवाज़े पर दस्तक देने लगती है, पक्षियों की आवाज़ कानों में मीठी गुदगुदी करती हुई वृन्दा को कब से जगाने की कोशिश कर रहीं थी और वृन्दा जाग गई पक्षियों की आवाज़ से नही बजती डोर बेल की आवाज़ से। वृन्दा देख तो कौन है दरवाज़े पर हाँ जा रही हूँ ,पता था मुझे, दरवाज़ा खोलने मुझे ही जाना पड़ेगा जैसे कि मेरे अलावा तो कोई और घर मे है ही नही धीरे- धीरे बड़बड़ाती हुई कुछ नींद में अलसाई सी वृन्दा दरवाज़े के पास जा पहुँची और दरवाज़ा खोल दिया दरवाज़े पर एक लड़का खड़ा था जिसका क़द 5 फुट 6 इंच होगा और रंग गेहुँआ था वृन्दा कौन है बेटा माँ ने आवाज लगाकर पूछा आप खुद ही देखलो कौन है वृन्दा ने थोड़ी नाराज़गी भरी आवाज़ में कहा। वृन्दा की माँ ने दरवाज़े पर आकर देखा तो उनका चेहरा खुशी से खिल उठा अधीश बेटा, अरे बाहर क्यों खड़े हो अंदर आओ, वृन्दा जाओ अधीश के लिए पानी ले आओ तब तक वृन्दा की माँ संध्या ने अधीश को हॉल में बैठाया और घर - परिवार का हालचाल पूछने लगीं तभी  वृन्दा पानी ले आई जिस तरह से वो पानी लेकर आयी लग नही रहा था कि वो ये पानी अधीश के पीने के लिए लाई है ऐसा लग रहा था जैसे कि वो गिलास का पानी अधीश के मुँह पर फेंक देगी पर ऐसा नही हुआ ये देख अधीश ने गहरी साँस ली और पानी पी लिया। अधीश बेटा अपने खाने- पीने का ख़्याल नही रखते हो क्या कितने दुबले- पतले दिख रहे हो वृन्दा की माँ ने कहा। नही मैं अपना ख़्याल रखता हूँ पर शायद किसी की नज़र लग गई है , वो क्या है कि मुझे लोगों की नज़र बहुत जल्दी लग जाती है अधीश ने कहा तो वृन्दा उसे घुरने लगी। कुछ देर बाद वृन्दा का छोटा भाई लक्ष्य भी आधी नींद में चलता हुआ अपनी आँखों को मसलता हुआ हॉल में आ पहुँचा कैसे हो लक्ष्य। आप, कहते हुए लक्ष्य मुस्कुराया और जाकर अधीश के गले लग गया मैं ठीक हूँ आप बताइये मेरी याद आ रही थी क्या? आपको ,इसलिए मुझसे मिलने आये है लक्ष्य ने छेड़ने वाले अंदाज़ में कहा। अधीश मुस्कुराया अरे! नही दरसल मैं यहाँ पटना ऑफिस के कुछ काम से आया हूँ सोचा आप सबसे मिलता हुआ चलूँ अभी थोड़ी देर में मुझे होटल भी पहुँचना है क्यों? लक्ष्य ने पूछा। मैं पटना 5 दिनों के लिए आया हूँ। अपना घर होते हुए तुम होटल में क्यों रहोगे भला मैंने कह दिया तुम्हें यही रहना होगा वृन्दा की माँ ने आदेश देते हुए अंदाज में कहा  पर मैं अधीश बोला। पर मैं मगर कुछ नही तुम यही रहोगे माँ ने कहा तो अधीश ने खुशी - खुशी उनकी बात मान ली पर वृन्दा अधीश के यहाँ रुकने से खुश नही थी वो इतनी गुस्सा थी कि उसके उसने सबके साथ नाश्ता भी नही किया। नाश्ते के बाद जब अधीश मीटिंग के लिए जा रहा था तब वृन्दा अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी उसे देख रही थी लेकिन जब अधीश की नज़र उस पर पड़ी तो वृन्दा ने अपनी नजरें फेर लीं। शाम को डिनर के वक्त माँ लक्ष्य और अधीश तीनो खूब बातें किये जा रहे थे और वृन्दा मुँह फुलाये इन तीनो को देखे जा रही थी। लक्ष्य अपने कॉलेज फ्रेंड्स के बारे में अधीश को कुछ बता रहा था जो सुन अधीश भी अपने कॉलेज के वक्त के किस्से सुनाने लगा। वृन्दा को किसी से बात न करते देख अधीश ने कोशिश की उससे बात करने की पर उसने उसकी बात का कोई जवाब नही दिया। दो दिनों तक ऐसे ही चलता रहा वृन्दा नाराज़- नाराज़ रही और अधीश उससे बात करने की कोशिश करता रहा। आज सुबह अधीश जब हॉल में बैठे हुए फोन पर बात कर रहा था तब वृन्दा चोरी-  छुपे अधीश की बातें सुनने की कोशिश कर रही थी क्योंकि अधीश उस वक्त किसी लड़की से बात कर रहा था। वैसे अधीश जान गया था कि वृन्दा उसकी बातें सुन रही है इसलिए उसे परेशान करने के लिए अधीश फोन कट हो जाने के बाद भी बड़े इतराते हुए बात करता रहा जैसे किसी खास दोस्त से बात कर रहा हो। और इसके बाद घर से लक्ष्य को ये कहकर चला गया कि वो ऑफिस के ही किसी काम से जा रहा है। जबकि उसने कल ही लक्ष्य को बताया था कि सन्डे को उसकी कोई भी मीटिंग नही है वो घर पर ही रहेगा फिर अचानक अधीश कहाँ चला गया वृन्दा टेरिस पर यहाँ से वहाँ वहाँ से यहाँ घूम - घूमकर यही सोचकर परेशान हुए जा रही थी। शाम को जब अधीश घर आया तब वृन्दा का चेहरा देखने लायक था हॉल में बैठे हुए सब साथ मे टीवी देख रहे थे वृन्दा अधीश को इस तरह घूरे जा रही थी जैसे चोर की दाढ़ी में तिनके को खोज ही लेगी पर ऐसा कुछ हुआ नही। माँ और लक्ष्य से बात करते हुए अधीश के चेहरे पर ऐसे कोई भाव नही थे और ना ही उसने ऐसी कोई बात की जिससे ये कहा जाये कि उसका कोई झूठ पकड़ा गया। वृन्दा थोड़ा उदास हो गई , क्योंकि अधीश की वो चोरी जोकि खुद वृन्दा के मन की कल्पना है वो उसे पकड़ नही पाई लेकिन अधीश खुश था किसी बहाने ही सही वृन्दा उसके के बारे सोच तो रही है बस उसका उदास सा चेहरा देख अधीश को थोड़ा बुरा लग रहा था अ ,  वृन्दा रिमोर्ट देना प्लीज़ अधीश ने कहा तो बिना कुछ बोले वृन्दा ने टीवी का रिमोर्ट टेबल पर रख दिया और उठकर अपने कमरे में चली गई। एक बार फिर अधिश की कोशिश नाकाम हो गई। वृन्दा छोटी - छोटी बातों पर बहुत जल्दी उदास हो जाती है आदत है उसकी, लेकिन जब कोई अपना उदास हो तो भला अपने मन को सुकून कैसे से मिल सकता है। रात को काफी कोशिश के बाद भी अधीश को नींद नही आ रही थी तीन दिन गुजर गए अब सिर्फ दो दिन ही बाकी है जैसा सोचा था अगर वैसा नही हो पाया तो , एक के बाद एक ना जाने कितने सवाल कितनी बातें अधीश को परेशान करने लगी। रात के 2 बज गए नींद तो नही आई पर भूख का एहसास जरूर होने लगा अधीश उठकर किचन में चला आया और खाने के लिए कुछ ढूंढने लगा। तभी पीछे से वृन्दा भी आ पहुँची उसे देख अधीश झिझकते हुए बोला वो मैं पानी लेने आया था अधीश ने पानी की बोतल ली और अपने कमरे में चला आया। अब तो नींद और कोसों दूर हो गई पेट मे चूहे जो दौड़ने लगे। अधीश बार - बार लेटता और फिर उठकर बैठ जाता। 10 मिनिट बाद वृन्दा कुछ लेकर आई और अधीश को दे दिया ये क्या? है अधीश ने पूछा,  सेवई अब इतनी जल्दी तो यही बन सकती थी यहाँ - वहाँ की बातें सोचकर देर तक जागते हो और जब भूख लगने लगती है तो आधी रात में किचन की ओर भागते हो आदत है ना तुम्हारी , फिर भले ही कोई तुम्हारी वजह से परेशान हो तुम्हे उससे क्या झूठा गुस्सा दिखाते हुए वृन्दा बोली। जब मेरी आदत इतने अच्छे से मालूम है तो क्यों? चली आयीं अधीश ने वृन्दा को देखते हुए कहा। वृन्दा ने एक नज़र अधीश को देखा और जाने लगी अधीश ने झट से वृन्दा का हाथ पकड़ लिया एक बार तो बात कर लो,अच्छा सुन तो लो प्लीज़।वृन्दा चुपचाप बैठ गई। सॉरी , मुझे गुस्सा नही करना चाहिए था कभी - कभी न चाहते हुए भी हमसे कुछ गलतियाँ हो जाती है हम अपना पेशेन्स खो देते है मैंने भी खो दिया था आय एम सॉरी अधीश ने बोला, इसके बाद वृन्दा उठकर चली गई। 

जब हम किसी से नाराज़ होते है तो हम ये तो नही जानते कि हमारी नाराज़गी का सामने वाले पर क्या असर हो रहा है,  पर हाँ हमारा खुद का मन जरूर बेचैन रहता है और चाह कर भी हम अपने मन को खुश नही रख पाते वृन्दा का मन भी बेचैन है। इस तरह नाराज़ होकर मैं अधीश को सज़ा दे रही हूँ या खुदको मुझे कुछ समझ नही आ रहा अपने कमरे में बैठे हुए वृन्दा मन ही मन सोच रही थी। सुबह जब वृन्दा की माँ उसके कमरे में आई तो वृन्दा बेड से टिके हुए फर्श पर बैठी हुई थी वृन्दा क्या?  हुआ बेटा कहते हुए माँ वृन्दा के पास जा बैठी वृन्दा ने अपना सिर माँ के कन्धे पर रख दिया मैंने गलत किया क्या, मुझे इस तरह नाराज़ होकर नही आना चाहिए था हम अपनो पर ही तो गुस्सा होते है किसी पराये पर नही और गलती मेरी भी तो थी उसने सॉरी भी कहा मम्मा, वो मन का बहुत अच्छा है वृन्दा बोले जा रही थी और माँ उसकी बातों को खामोश होकर सुन रही थी  बचपन मे भी जब वृन्दा को अपनी किसी गलती पर अफसोस होता था तब भी वो ऐसे ही अपनी मम्मा को धीरे - धीरे थोड़ा रो - रोकर सारी बात बताती थी अभी भी वैसे ही है जल्दी गुस्सा हो जाना नाराज होना और फिर दुखी होकर रोने लगना नादानियाँ अभी भी भरी हुई है वृन्दा में। वृन्दा की बातों को बीच मे रोकते हुए माँ ने उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया जो गलती होने , ना होने पर भी खुद माफ़ी मांगे वो मन का अच्छा ही होता है माँ ने कहा। आज नाश्ते के वक्त वृन्दा थोड़ी बदली हुई सी थी उसके चेहरे पर कोई गुस्सा जो नज़र नही आ रहा था पर अधीश कुछ जल्दी में था माँ के पूछने पर उसने बताया वो मुझे ज़रा जल्दी जाना है जिस काम के लिए मैं आया था शायद वो आज पूरा हो जाएगा तो फिर मैं कल वापस चला जाऊँगा। जबसे वृन्दा ने अधीश के वापस लौटने की बात सुनी है उसका मन परेशान सा हो गया है शाम को खिड़की के पास बैठकर वृन्दा रास्ते की ओर देख रही थी शायद अधीश के आने का इंतजार कर रही है। 

उस शाम भी वृन्दा इंतज़ार ही तो कर रही थी अधीश जल्दी घर आने वाला था पर शाम बीत गई और अधीश रात को घर पहुँचा वो भी 10 बजे के बाद अधीश के आते ही वृन्दा ने उस पर नाराज़ होना शुरू कर दिया कुछ देर अधीश चुप रहा लेकिन फिर अपना पेशेन्स खो बैठा और वृन्दा पर उसका सारा गुस्सा निकल पड़ा वो गुस्सा जो कुछ दिनों से अधीश की प्रोफेशनल लाइफ में चल रही प्रॉब्लम्स की वजह से था उस रात जब अधीश घर लौटा तब वो परेशान था शायद कुछ हुआ था ऑफिस में जिसका असर अधीश पर इतना हुआ कि वो भूल गया कि वृन्दा उसका इंतज़ार कर रही होगी। अधीश के इस तरह गुस्सा करने पर वृन्दा को बहुत दुख पहुँचा वो नाराज़ होकर पटना चली आई। जब किसी अपने से हमेशा हँसाने की उम्मीद हो और वो रुला दे तो दुख तो होता ही है। रात को खुले आसमान के नीचे बैठने से मन को सुकून मिलता है,है ना लक्ष्य ने कहा तो वृन्दा और अधीश धीमे से मुस्कुरा दिये जैसे ज्यादा मुस्कुराए तो उन्हें टैक्स देना पड़ जायेगा। रात के डिनर के बाद अधीश, वृन्दा और लक्ष्य टेरिस पर थे लक्ष्य ही दोनों तो को ले आया ये कहकर की रात में चलती ठंडी हवा जब दिमाग़ से टकराती है तो वी एक दम शांत हो जाता है और हम बड़ा रिलैक्स फील करते है। अधीश और लक्ष्य दोनों आपस मे खूब गपशप किये जा रहे थे कि तभी लक्ष्य को किसी का कॉल आ गया लक्ष्य कॉल रिसीव करते हुए टेरिस पर ही थोड़ा दूर जाकर खड़ा हो गया। अधीश वृन्दा से बात करना चाह रहा था पर उसे समझ नही आ रहा था शुरू कैसे करें वो आज की मीटिंग बहुत अच्छी रही अधीश ने कहा , अच्छा वृन्दा ने कहा ,हाँ मैं फिर कल चला जाऊँगा अधीश ने कहा , तो फिर वृन्दा बोली तो फिर क्या?  अधीश ने पूछा वृन्दा चाह रही थी अधीश कुछ बोले पर वो समझ ही नही पा रहा था वृन्दा को थोड़ा गुस्सा आ गया अधीश वृन्दा को देख सोचने लगा अब क्यों? गुस्सा हो गई। थोड़ी देर दिमाग लड़ाने पर अधीश समझ गया सॉरी अब कभी गुस्सा नही करूँगा मैं तुम्हे फोर्स तो नही कर सकता पर तुम अपनी नाराज़गी खत्म करके मेरे साथ अधीश ने इतना कहा और वृन्दा ने उसके हाथ मे इलायची दे दी तुम्हे डिनर के बाद इलायची खाने की आदत है वृन्दा ने कहा। आदत तो तुम्हारी भी है जब हम किसी के साथ रहते है तो हमें उसकी और उसकी आदतों की आदत होने लगती है मुझे भी तो हो गई है तुम्हारे साथ रहने की आदत अधीश ने बोला और टेरिस से चला गया। सच ही तो है आदत ही तो हो गई है अधीश को वृन्दा के साथ कि उसकी नादानियों की उसके रूठ जाने की और उसे मनाने की। वृन्दा अधीश जितनी मैच्योर नही है अभी भी थोड़ी सी नासमझ है ये बात अधीश जानता है इसलिए वो खुद उससे नाराज़ कभी नही होता। सुबह जब अधीश अपना बैग लेकर दरवाज़े पर पहुँचा तो पीछे से वृन्दा ने आवाज़ लगा कर रोक लिया अकेले ही जाओगे अपनी वाइफ को साथ नही ले जाओगे बस तुम्हे ही मेरी आदत है और मुझे नही है अधीश होले से मुस्कुराकर वृन्दा को देखने लगा वृन्दा ने पास आकर कहा ज्यादा मत मुस्कुराओ घर चलकर तुमसे पूछना है क्या? अधीश ने पूछा दो दिन पहले फोन पर किस खास दोस्त से बात कर रहे थे।



 



No comments:

Post a Comment

एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE