आईना




इस आईने के सामने मैं रोज़ खड़ा होता हूँ रोज़ खुदको देखता हूँ खुदकी तारीफ भी करता हूँ पर आज, आज बात अलग है आज आईने में सिर्फ मैं नज़र आ रहा हूँ मैं निखिल , निखिल व्यास। कितने दिनों बाद मैंने अपनी फेवरेट टीशर्ट पहनी है अपने उसी अंदाज में तैयार हुआ हूँ जिस तरह मैं रहा करता था। ये सही है कि वक्त के साथ हम बदल जाते है और कुछ जगाहों पर हमें खुदको बदलना भी पड़ता है क्योंकि हमें दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलना होता है पर सबके साथ चलने की कोशिश में हम खुदको ही कही पीछे छोड़ आते है खुद ही खुदको भूल जाते है , और जीने लगते है एक ऐसी ज़िंदगी जिसमे हर एक के लिए हमारी पहचान अलग- अलग होती है। कुछ ऐसे ही तो जीने लगा था मैं। 
चार साल पहले जब मैं पटना आया तब मैं निखिल ही था पर धीरे- धीरे बदलने लगा सबसे पहले तो मैं ओम अंकल का किरायेदार बना वो भी अच्छा और सभ्य किरायेदार। दरसल जब यहाँ आया तो मुझे जल्दी में कोई अच्छा रूम किराये पर मिल ही नही रहा था और जो मिल रहे थे वो मेरे बजट से बाहर थे तब मेरे एक दोस्त ने मुझे ओम अंकल का पता दिया और मैं यहाँ आ पहुँचा ओम अंकल किराये पर रूम तो देते है पर यहाँ रहने की कुछ कंडीशन्स भी थी मुझे रूम की जरूरत थी इसलिए मैंने अपना सिर हाँ में हिला दिया। ओम अंकल को नेक और सभ्य किरायेदार चाहिए था और मैं बन गया। वैसे ऐसा नही है कि मैं एक अच्छा लड़का नही हूँ बस मेरे जीने का तरीका थोड़ा अलग था लेकिन मुझे ओम अंकल के सामने ये साबित करने के लिए की मैं अच्छा और सभ्य लड़का हूँ उनके सभी रूल्स को खुशी के साथ फॉलो करना पड़ा। ये मेरे बदलने की पहली शुरुआत थी। बचपन से बड़े होने तक हमारी लाइफ में बहुत कुछ होता है जो पहली बार होता है और उसका अनुभव हमे हमेशा याद रहता है जैसे पहली बार स्कूल जाना , पहली बार साइकिल चलाना, पहली बार कॉलेज जाना और पहली बार ऑफिस जाना। यहाँ आने के दो दिन बाद ही मुझे ऑफिस जॉइन करना था ये मेरी पहली जॉब थी और आज पहला दिन। जब पहली बार कॉलेज गया था तो मन ही मन  बड़ा खुश था और थोड़ा सा डरा हुआ भी कि ना जाने जो नए दोस्त बनेंगे वो कैसे होंगे, टीचर्स कैसे होंगे ज्यादा स्ट्रिक्ट हुए तो उस दिन की तरह मैं आज भी थोड़ा नर्वस था पर जब ऑफ़िस स्टाफ से अपने बॉस से मिला तो नर्वसनेस ज़रा कम हो गई। शुरू के कुछ दिनों तक मैं ट्रेनिंग पर रहा मुझे सिखाया गया समझाया गया कि काम कैसे करना है और उसके बाद शुरू हुआ मेरा हार्डवर्क। मैं अपने काम को बेहतर तरीके से करने की कोशिश किया करता था पर फिर भी मुझसे कुछ गलतियाँ हो जाया करती थी और फिर एक बार मेरे बॉस ने मुझे केबिन में बुलाकर समझाया कि मुझे अपने आपको थोड़ा बदलना होगा। मैं बदला भी। मेरा बिहेवियर पूरी तरह प्रोफेशनल हो गया था और मैं अब ज्यादा प्रैक्टिकल होकर सोचने लगा था और मेरे बॉस वो मेरे इस बदले हुए बिहेवियर से खुश थे मैंने अपनी पहली जॉब के दौरान बहुत कुछ सीखा जो मेरी दूसरी जॉब के वक्त मेरे बहुत काम आया। जैसे - जैसे हम अपनी लाइफ में आगे बढ़ते जाते है वैसे- वैसे ही हम बदलते भी जाते है ,धीरे- धीरे अब तो मेरी आदतें भी बदल गई थी प्रोफेशनल लाइफ होती ही ऐसी है जो हमे पूरी तरह बदल कर रख देती है। पर अब कोई और भी था जिसका मेरे जीवन पर असर हो रहा था। ऑफ़िस इवेंट के दौरान हुई दिव्यांशा और मेरी छोटी सी मुलाकात एक लंबे रिलेशनशिप में बदल गई। दिव्यांशा बहुत प्यारी है इंटेलिजेंट है फिक्र करती है मेरी, जिस तरह मैं उसके लिए बहुत खास हूँ उसी तरह वो भी बहुत अहम है मेरे लिए। वैसे तो हम दोनों में अंडरस्टैंडिंग अच्छी है पर कभी - कभी उसकी ख्वाइशों के चलते मुझे उसके मन के मुताबिक़ चलना पड़ता है। दिव्यांशा के मेरे लाइफ में आने पर कुछ - कुछ है ऐसा जो बदला है कुछ नई आदतें शामिल हुई तो कुछ बदल गईं। मेरा शेड्यूल मेरी डाइट मेरी वीकेंड प्लांनिग क्या होनी चाहिए कैसी होनी चाहिए मेरा लुक कैसा होना चाहिए मुझसे ज्यादा इन सब बातों पर दिव्यांशा का ध्यान होता है और बातों ही बातों में वो मुझे समझाती भी रहती है कि ऐसा ठीक रहेगा वैसा ठीक रहेगा कभी - कभी तो उसकी बातों को सुन मुझे हँसी आ जाती है और कभी मैं चुप सा हो जाता हूँ। मैं अक्सर तब चुप हो जाया करता हूँ जब मैं कुछ कहना नही चाहता। वैसे हम क्या चाहते है क्या नही चाहते है इसकी परवाह शायद ही कोई करता हो क्योंकि मैंने अभी तक जो जाना और समझा है उससे यहीं मालूम हुआ है कि सबको फर्क इस बात से पड़ता है की वो क्या चाहते है जैसे कि मेरे फ्रेंड्स, वो हमेशा ये चाहते थे कि मैं भी उनके तरह सोचूँ ,  वैसे रहूँ जैसे वो रहते है  जबकि सच कहूँ तो मुझे उनके थोट्स उनका स्टाइल थोड़ा कम पसन्द था लेकिन फिर भी मैं थोड़ा बहुत उनके जैसे रहने की कोशिश करता था क्योंकि मुझे अपने दोस्तों के साथ रहना था हाँ मेरी चॉइस उनसे अलग थी और मेरी पसन्द को लेकर एक- दो बार मेरे दोस्तों ने मेरा मज़ाक भी उड़ाया उनका इरादा मेरी इंसल्ट करना भले ही नही था पर मुझे चिढ़ाने का जरूर था और मैं चिढ़ा भी था चिढ़ा तो मैं तब भी था जब मेरे ऑफ़िस के कलीग्स को मेरे काम करने के तरीके से प्रॉब्लम होने लगी थी वो बेवज़ह मुझसे ज़रा नाराज़ से रहते और उनके ऐसे बिहेवियर का असर कुछ- कुछ मेरे वर्क पर भी हो रहा था और फिर आखिर मेरे सीनियर्स ने मुझे प्रॉब्लम का सॉल्यूशन दिया। और मैने वैसा ही किया जो उन्होंने कहा था । मैंने अपने कलीग्स के तौर तरीकों को भी अपने काम मे कुछ - कुछ जगाहों पर शामिल करना शुरू कर दिया और कुछ छोटे- मोटे सब्जेक्ट्स पर मैं उनके साथ डिस्कशन भी करने लगा था धीरे- धीरे सब नॉर्मल हो गया। इस तरह मैं सबके लिए खुदको थोड़ा- थोड़ा बदलता गया। ओम अंकल के लिए मैं उनका अच्छा किरायेदार बन गया, दिव्यांशा के लिए अच्छा बॉयफ्रेंड , दोस्तों का उनके जैसा दोस्त और अपने कलीग्स के लिए उनका अच्छा साथी। मैं बदला जरूर पर पूरी तरह नही बस सबके लिए अलग- अलग किरदार में जीने लगा था ना मैंने अपनी पसंद बदली ना ही अपनी सोच बस जब जिसके साथ रहता उस वक्त के लिए थोड़ा सा खुदको बदल लेता पर इस सबके बीच मैं खुदको वक्त नही दे पा रहा था ना ही खुदके लिए अपनी ख़्वाइशों के लिए जी पा रहा था मैं जब भी आईने के सामने खड़ा होकर तैयार होता हूँ तो मुझे आईने में कभी एक इंजीनियर नज़र आता तो कभी दिव्यांशा का बॉयफ्रेंड कभी विशाल अर्जुन का दोस्त तो कभी अपने ऑफ़िस के साथियों का कलीग, निखिल तो जैसे आजकल दिखता ही नही। ये आईना ही तो है जो मुझे बता रहा है कि मैं क्या? था क्या? हूँ और अब क्या? हो गया हूँ। ऊब गया था मैं , ऐसा लग रहा था जैसे मैं जो हूँ वो मैं हूँ ही नही। अब मैं कुछ वक्त बस खुदके साथ रहना चाहता था। इसलिए जब ओम अंकल कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर गए तो मैंने भी ऑफिस से छुट्टी ले ली हाँ मैं अभी भी ओम अंकल का किरायेदार हूँ यहाँ रहते - रहते अब मुझे यहीं रहने की आदत हो गई है और शायद लगाव भी, इसलिए मैंने कोई और घर ढूंढा ही नही। जब हम जानते हो कि अभी आने वाले कुछ दिन बड़े मौज़ के निकलने वाले है तो ये सोचकर ही मन कितना खुश हो जाता है अब दस दिनों तक मैं सिर्फ मैं रहने वाला हूँ अपनी मनमर्जी से जीने वाला हूँ और इस बीच कोई भी मुझे डिस्टर्ब नही करेगा दिव्यांशा भी नही। इसलिए तो आज मैंने अपनी फेवरेट टीशर्ट पहनी मेरा फेवरेट कलर जो मेरे दोस्तों को बिल्कुल भी पसन्द नही था पर मुझे , आज भी ये कलर उतना ही पसन्द है। आज सब कुछ मेरी मनमर्ज़ी का, कितना आज़ाद और कितना हल्का महसूस कर रहा हूँ मैं, जैसे किसी बोझ तले जी रहा था और अब हर एक साँस सुकून भरी है। 
ये सच है कि कभी अपनो के लिए तो कभी मजबूरी में हमें खुद को थोड़ा बदलना पड़ता है पर फिर भी हमे खुदके लिए वो कुछ पल चुरा लेने चाहिए जो सिर्फ हमारे हो जहाँ हम वैसे नही जी रहे हो जैसा कोई हमसे चाहता है बल्कि वैसे जी रहे हो जैसा हम चाहते है,  हम वो हो जो हम है वो नही जो कोई और हमे बनाना चाहता है। दिन में हम आईने के सामने चाहे जितने बार खड़े हो पर एक बार तो ऐसा हो कि सामने हमे सिर्फ हम ही नज़र आये बिना किसी बदलाव बिना किसी बनावट के एक दम असली।  

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