साथी



वो रेड जैकेट रख ली थी ना और मेरे ग्लब्स अच्छा वो गॉगल्स जो परसो लेकर आया था और वो स्कार्फ जो मैं तुम्हारे लिए लाया था हाँ ,हाँ सब रख लिया मनन के बार - बार पूछने पर चिढ़ते हुए काव्या ने कहा। मनन जब से हम ट्रेन में बैठे है तब से तुम बस कुछ न कुछ पूछ ही रहे हो ये रखा कि नही वो रखा की नही, हम हनीमून पर जा रहे है कोई हमेशा के लिए रहने नही जा रहे है सुबह से अभी तक एक बार भी गौर से देखा मुझे काव्या रूठते हुए बोली ओह! सॉरी कब्बू तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो ये ड्रेस तुम पर अच्छी लग रही है मनन ने काव्या को मनाते हुए प्यार से कहा तो काव्या धीमे से मुस्कुरा दी। काव्या का हाथ थामते हुए मनन ने अपनी उंगलियाँ काव्या की उंगलियों में फसा ली और काव्या ने अपना सिर मनन के कंधे से टिका लिया। शादी के बाद सब कुछ कितना अलग सा लगने लगता है एक नया रिश्ता नया सफर आँखों मे मीठे- मीठे सपने ,काव्या और मनन की आँखें भी अपनी नई जिन्दगी के लिए सपने बुन रही है। काव्या तुम खुश तो हो ना, हाँ और तुम , मेरी खुशी तो तुम ही हो आय प्रॉमिस मैं तुम्हे कभी दुखी नही होने दूँगा हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा कहते हुए मनन ने काव्या का हाथ कसकर पकड़ लिया मैं जानती हूँ मनन, मनन की आँखों मे देखते हुए काव्या ने कहा, अच्छा अब ज्यादा मत सोचो मेरे प्यारे पतिदेव कहते हुए काव्या ने दोबारा मनन के कन्धे से अपना सिर टिका लिया। मुझे पता है मनन तुमने ये सवाल क्यों किया पर कुछ जवाब अधूरे ही सही होते है मनन से टिककर बैठी काव्या मन मे सोच रही थी। आधे घन्टे बाद ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी काव्या मैं अभी आता हूँ मनन ये कहकर ट्रेन से उतर गया काव्या खिड़की से बाहर स्टेशन पर खड़े लोगो को देख रही थी तभी उसकी नजर लड़के- लड़कियों के एक ग्रुप पर पड़ी देखने मे कॉलेज स्टूडेंट्स लग रहे थे इन्हें देख काव्या को सपने स्कूलटाइम का वक्त याद आ गया। हमारा भी तो स्कूल में ऐसा ग्रुप बना हुआ था जिसमे मैं और मनन भी थे। स्कूल यूनिफार्म में दो चोटी बाँधे हुए स्कूल बैग टांगे हुए कितने घमंड के साथ मैं क्लास में इंटर होती थी पूरी क्लास में सबसे होशियार जो थी पढ़ने में, इस बात का बड़ा गुमान था मुझे। पढ़ाई में तो मनन भी अच्छा था पर मेरे जितना अकड़ू नही था। शुरू में दोस्ती नही थी हमारे बीच बस क्लासमेट थे लेकिन बाद में दोस्त बन गए और शायद ज्यादा ही खास दोस्त। काव्या ये लो अच्छा कॉफ़ी लेने गए थे हाँ तुम्हारे लिए कॉफ़ी अपने लिए चाय और ये और भी कुछ लाया हूँ रखलो मनन ने पैकेट काव्या को दिया ओके कहते हुए काव्या ने पैकेट बैग में रख दिया। इसके बाद मनन मोबाइल पर बुक की हुई होटल की कुछ डिटेल्स वगैहरा चेक करने लगा और काव्या फिर अपनी स्कूल में जा पहुँची। 

क्लास कि होशियार लड़की जिसका मन किताबों में लगा रहता था अब कुछ - कुछ कहीं और भी लगने लगा था मेरी नज़रे जो किताब कॉपियों में ज्यादा ठहरी रहती थी वो थर्ड रो में फोर्थ बैंच पर बैठे मनन की ओर दौड़ने लगी थी जैसे कोई डोर मुझे खींच रही हो उसकी ओर।इस कच्ची उम्र में ये कौनसा पक्का रिश्ता बनने लगा था मेरे और मनन के बीच ये सोचकर में परेशान हो रही थी ये सब क्या हो रहा है मैं मनन के बारे में इतना क्यों सोचने लगी हूँ हम दोनों दोस्त ही तो है फिर क्यों कुछ अलग सा लगता है। तीन दिन हो गये,  मैंने मनन को अनदेखा करने की कोशिश की ना उससे बात की और ना उसकी तरफ देखा मेरे ऐसे बर्ताव से मनन को बहुत बुरा लगा और मुझे उससे भी ज्यादा। इसके बाद मनन खुद मुझसे दूर हो गया उसने मुझसे बात करना जैसे पूरी तरह ही बंद कर दिया बिल्कुल भी बात नही करता था वो मुझे से हाय हेलो भी नही, आज तो लंच भी वो अकेले क्लास में बैठकर कर रहा था जबकि बाकी हम सब बाहर ग्राउंड में पेड के नीचे, साथ में बैठकर अपना लंच कर रहे थे। अब मेरी और मनन की दोस्ती टूट रही थी बहुत दुख हो रहा था मुझे ये देखकर। काव्या, मेरी सबसे अच्छी दोस्त आरती ने धीरे से कहा मुझे लगता है तुझे एक बार मनन से बात कर लेना चाहिए जो भी बात है उसे समझाएगी तो शायद वो समझ जाये। शायद आरती ठीक कह रही है अपना लंच बॉक्स आरती को देकर में क्लास में चली आई। गुस्सा हो मैने मनन से पूछा, नही तो मनन ने कहा , तो फिर बाहर क्यों नही आये, वो तुम नाराज़ हो ना बस इसलिए , तुम्हारा गुस्सा होना मुझे अच्छा नही लग रहा है बुरा- बुरा सा लग रहा है मनन ने इतना कहा तो मेरी आँखों मे पानी की बूंद भर आई सॉरी मनन मैं तुम्हे दुख नही पहुँचना चाहती थी कहते हुए मैैं रो पड़ी क्या ? हुआ काव्या देखो प्लीज़, प्लीज़ प्लीज़ मत रोओ क्यों तुम्हे बुरा लग रहा है तो क्या मुझे बुरा नही लग रहा मैंने रोते हुए कहा,  देखो सॉरी मैंने जो कहा उसके लिए प्लीज़ चुप हो जाओ नही तो मैं भी रोने लगूँगा मनन ने कहा तो रोते - रोते मुझे हँसी आ गई और फिर मैं चुप हो गई। छोटी उम्र में मन किसी नन्हे फूल की तरह कोमल होता है जो सुबह के सूरज को देख खिल उठता है और ज़रा धूप बढ़ जाने पर मुरझाने भी लगता है। लंच ब्रेक खत्म हो गया था साथ ही मेरे और मनन के बीच की प्रॉब्लम भी। उस दिन हम दोनों ने मिलकर एक फैसला लिया था जब तक हम बड़े नही हो जाते समझदार नही हो जाते किसी रिश्ते को कैसे जिया जाता किसे निभाया जाता है, जब तक इन बातों को ठीक से जानने और समझने लायक नही हो जाते तब तक हमारे रिश्ते में हम दोस्ती को ज्यादा रखेंगे और प्यार वो दोस्ती के पीछे धीरे- धीरे अपने कदम बढ़ाएगा। अब सब कुछ ठीक चल रहा था हम अच्छे दोस्त की तरह साथ थे हम साथ पढ़ते, खेलते ,लड़ते झगड़ते पर आँखों- आँखों वाला वो प्यारा सा एहसास भी किसी इत्र की तरह मन मे महकते हुए साथ रहता। फेयरवेल स्कूल में हमारा आखरी दिन, हमारे जूनियर्स ने स्कूल में हमारे इस आखरी दिन को अपनी परफॉमेंस से खास बना दिया हम सब खुश भी थे और थोड़ा सा दुखी भी क्योंकि हम सब अब बिछड़ने वाले थे लेकिन मनन और मैं थोड़ा ज्यादा भावुक थे क्योंकि अब रोज़ की तरह हम नही मिल पायेंगे जूनियर्स की परफॉमेंस के वक्त भले ही मनन मुस्कुरा रहा था पर उसके चेहरे पर एक उदासी भी थी मैने चुपके से उसका हाथ थाम लिया हम मिलते रहेंगे सच भूल तो नही जाओगी ना मेरे कहने पर मनन ने पूछा। नही कभी नही अपना सिर ना में हिलाते हुए मैंने उससे कहा। इसके बाद हम सब फ्रेंड्स ने सारा स्कूल घूमते हुए यहाँ बिताई अपनी यादों को एक फिर से ताज़ा किया। हँसी - खुसी और बिछड़ने के थोड़े से दुख के साथ ये दिन बीत गया। काव्या काव्या हाँ कुछ कहा तुमने , इतनी देर से मैं ही तो कह रहा हूँ कहाँ खो जाती हो यार अच्छा वो जो पैकेट मैंने दिया था वो बताओ हाँ ये रहा, खोलो इसे मनन ने कहा इमली मैं खुश होते हुए बोली स्कूल में इतनी इमलियाँ तोड़ी है तुम्हारे लिये इसका सबूत आज भी है अपने हाथ मे लगी चोट का निशान दिखाते हुए मनन ने कहा। हाँ तो मैंने थोड़ी कहा था कि पेड़ पर चढ़ जाओ मैंने कहा हाँ वो तो मेरा ही मन किया था पेड़ से गिरने का ठीक है चलो ,अब खालो इमली मनन ने कहा। मैंने चटकारे लेते हुए इमली खाने लगी। 

स्कूल से निकलने के बाद अब हम कॉलेज स्टूडेंट हो गए थे पर मनन और मेरा कॉलेज अलग - अलग था मनन के बिना मुझे बहुत बुरा लगता था याद आती थी मुझे उसकी,  वैसे कभी - कभी हम मुलाकात कर लिया करते थे पर फिर भी अब हमारे बीच दूरियाँ आती जा रही थी क्योंकि हम अपनी - अपनी लाइफ में बिज़ी होते जा रहे थे एक शहर में होते हुए भी हम दूर हो गए थे कभी - कभी तो मैं मनन का कॉल आने पर उसे रिसीव भी नही कर पाती थी कल मेरा और मनन का किसी बात पर छोटा सा झगड़ा हो गया पता नही वो मुझसे मिलने आज आएगा भी की नही नाराज़ होगा शायद, लेक के पास झील की ओर देखते हुए मैं बैठी उसका इंतज़ार कर रही थी काव्या मनन आ गया अच्छा मैं खाने के लिए कुछ लेकर आती हूँ कहकर आरती चली गई। ऐसे खोमोश क्यों? बैठी हो मनन ने कहा, वो तुम नाराज हो ना बस इसलिए मैंने कहा। मनन मेरे करीब आकर बैठ गया बोला ,तो तुम मुझे मना लो ना कैसे मैंने उसे देखते हुए पूछा इसे लेकर ,मनन ने गुलाब का एक फूल मेरी ओर बढ़ाया अब तो रेड रोज़ दे सकता हूँ ना अब हम थोड़े बड़े हो गए है बड़ी सी मुस्कुराहट के साथ अपना सिर हिलाते हुए मैंने रोज़ ले लिया। ह, हाथ रख लूँ तुम्हारे कन्धे पर मनन ने थोड़ी काँपती हुई सी आवाज़ में पूछा मैंने अपनी पलकों से हाँ का इशारा दिया तो मनन ने झट से अपना हाथ मेरे कन्धे पर रख लिया ये देख मुझे हँसी आ गई। आरती नही आई अभी तक वो घर चली गई मनन ने कहा। मनन मैंने मनन को घूरते हुए कहा जाने दो ना यार उसे किसी बच्चे की तरह मनन बोला।वो हमारी दोस्त है इसलिए हमारे लिए सोचती है हम कितने दिन बाद मिल रहे है पता है उसे भी। इसके बाद मनन और मैं बहुत देर साथ बैठकर बातें करते रहे काव्या एक बात पूछूँ हाँ बोलो ना शादी करोगी ना मुझसे ,हाँ करूँगी।वो शाम हर शाम से बहुत खूबसूरत थी मेरे लिए, ढलता सूरज कुछ सिंदूरी सी होती ये शाम, झील का ठहरा हुआ पानी किनारे पर खड़ी मैं और मेरा साथी। मुझे एक फ़िल्म का गाना याद आ गया ये रातें ये मौसम नदी का किनारा ये चंचल हवा। बस गाने के बोल के हिसाब से अभी रात नही शाम हो रही थी। 

जिन्दगी की कहानी वैसी नही होती जैसा हम चाहते है जिंदगी में आते मोड़ के साथ कहानी को भी मुड़ना पता है कहीं ओर  किसी अलग दिशा में। प्यार हुआ इज़हार हुआ और अब इंतज़ार था 5 साल हो गए थे मैं और मनन मिले नही थे वो इंदौर जा चुका था एक सॉफ्टवेयर कम्पनी में सीनियर डेवलपर की पोस्ट पर मनन जॉब कर रहा था और मैं भोपाल की ही एक कम्पनी में थी। प्रोफेशनल लाइफ इतनी आसान नही होती आगे बढ़ने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है मैंने और मनन ने भी की पर सबसे मुश्किल था एक - दूसरे से बिना मिले ये 5 साल गुजार पाना। इन 5 सालों ने हमे ये एहसास दिलाया कि कितने अधूरे से है हम एक - दूसरे के बिना। आज की सुबह मुझे बहुत प्यारी लग रही है जैसे लम्बी रात के बाद आज सवेरा हुआ हो, सुबह के निकलते इस सूरज के साथ मेरी जिन्दगी की रोशनी फिर लौट आई हो, हाँ आज खुशी से जो मेरा चेहरा गुलाबी हो रहा है उसकी वजह मनन ही है कल शाम मनन लौट आया हमेशा के लिए और आज ही मिलने की ज़िद कर रहा है मैं ना नही कह पाई जितना बेचैन उसका मन मुझसे मिलने के लिए है उतनी ही बेचैन मेरी आँखें भी है उसे देखने के लिए । मैं बनसवर कर अपने कमरे से बाहर निकली मम्मी के चेहरे पर थोड़ी घबराहट और थोड़ी मुस्कुराहट दोनों ही एक साथ दिख रही थी और बाकी घर वाले वो खुश थे  खास मेहमान जो आये हुए थे। आज मनन से मिलने से पहले लग रहा था ना जाने कितना बदल गया होगा वो, फोन पर बातें तो बड़ी समझदारों वाली करता है , कई बातें चल रही थी दिमाग़ में और तभी मनन सामने आ खड़ा हुआ। ये,ये पल कैसा है मनन मेरे सामने है और मैं उसे कुछ बोल ही नही पा रही मनन भी खामोश खड़ा है मानो लम्हा ठहर गया हो , मेरी पलकें झपकी मैं कुछ कहना चाह रही थी कि मनन ने रोक दिया उसने मेरा हाथ पकड़ लिया अपना पैर घुटने से मोड़ते हुए जमीन पर बैठ गया और एक खूबसूरत सी अंगूठी मेरी उंगली में पहना दी। जिसकी तमन्ना की हो अगर वो मिल जाए तो मन खुशी के पंख लगाकर आसमान में उड़ेगा ही, मेरा मन भी खुशी के पंख लगाकर उड़ गया मनन के साथ प्यार के खूबसूरत आसमान में और भूल गया सब कुछ। अपने कमरे में यहाँ से वहाँ चक्कर लगाती मैं परेशान हो रही थी कल उसे बताने का मौका ही नही मिला वैसे मौका मिला था मुझे, पर मैंने जानबूझकर कुछ नही बताया अब क्या करूँ?मैं। मैं सोच रही थी तभी मेरे फोन की रिंगटोन बजने लगी मनन का ही कॉल था कॉल रिसीव करते ही मैंने उसे सब बता दिया मनन मेरा रिश्ता तय हो गया है परसो जब तुम से मिलने आने वाली थी उस दिन विशाल और उसकी फैमिली वो घर आये थे। सॉरी मैंने तुम्हें कल नही बताया मैंने रोते हुए कहा। आज रात सोई नही थी मैं बस सुबह होने का इंतज़ार कर रही थी और हिम्मत जुटा रही थी कुछ कहने के लिए, सुबह होते ही मैंने घर मे मनन के बारे में सबको बता दिया और फैसला हो गया शादी एक महीने बाद होगी। ट्रेन के रुकने की आवाज सुनी तो पता चला कि उसने हमें मंजिल तक पहुँचा दिया हम मनाली आ गए स्टेशन से सीधा होटेल पहुँचे। तो मैडम सुबह ज़रा जल्दी तैयार हो जाइयेगा आपको अपनी खूबसूरत आँखों से मनाली के दर्शन करने है मनन ने कहा तो मैंने भी कह दिया जी सर जैसा अपने कहा है वैसा ही होगा मनन ने किसी बॉस की तरह अकड़ते हुए अपना सिर ज़रा सा हिला दिया और हम दोनों मुस्कुरा दिए। मुझे होटेल के मैनेजर से कुछ पूछना है ठीक है आता हूँ अभी कहकर मनन मैनेजर से मिलने चला गया। उस दिन जब फैसला हुआ उसके बाद मनन आया था घर सबसे मिलने। शादी की तारीख नज़दीक थी उससे पहले मनन एक बार मिलना चाहता था हम लेक के पास मिले हाँ वहीं जहाँ मनन ने पूछा था शादी करोगी ना मुझसे। कुछ मुश्किलों के बाद ही सही मैंने अपना प्रॉमिस पूरा किया एक साल के इंतज़ार के बाद मैंने मनन से शादी करली। तब शादी की डेट नज़दीक थी पर शादी नही हुई क्योंकि मैंने विशाल को बता दिया था कि मैं खुश नही हुँ इस रिश्ते से। मनन ने जब उस दिन मिलने बुलाया तब उसने मुझे हर वादे और अपने रिश्ते से आज़ाद कर दिया कोई शिकायत न करते हुए उसने कहा बीते सालों को भूल जाओ और सबकी बात मान लो। 13 साल जिस एहसास को जिया है क्या उसे आसानी से भुलाया जा सकता है इतनी कच्ची डोर तो नही है हमारे रिश्ते की जो कहने भर से टूट जाये मनन ने भले कह दिया पर मैं नही भूल सकती ना मनन के साथ को ना उसके लिए किए इंतज़ार को और ना ही मनन को। मैंने एक साल तक सबको मानने की पूरी कोशिश की और आखिर सब मान गए पर दिल से नही बस मेरी ज़िद से। मैं जानती हूँ अभी भले ही दिलों में थोड़ी नाराज़गी है पर एक दिन वो जरूर खत्म हो जाएगी और सब ठीक हो जाएगा।

मैं खुश हूँ मनन मेरे साथ है हर सफर खूबसूरत हो जाता जब किसी साथी का साथ मिल जाता है। बस ऐसे ही मनन का हाथ मेरे हाथों में रहे और जिंदगी चलती जाए ,चाहे तेज़ बारिश आये या तीखी धूप पड़ जाए बस तेरे साथ ये जिंदगी चलती जाए बस चलती जाए मनन को प्यार देखती हुई काव्या का मन यही कह रहा है।


No comments:

Post a Comment

एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE