कुल्फ़ी भाग - 2



चार महीने पहले की बात है प्रोफेसर कुलदीप गुस्से में घर से निकल रेस्टुरेंट जा रहे थे आज प्रोफेसर साहब की कार की रफ़्तार रोज़ से थोड़ी ज्यादा थी पर इस बात का उन्हें ज़रा भी  अंदाजा नही हो पाया वो तो गुस्से में ये भी नही देख पाए कि रेस्टोरेंट पीछे छूट गया और वो गाड़ी चलाते हुए आगे निकल आये और नुक्क्ड़ वाले रास्ते पर आ पहुँचे जब प्रोफेसर साहब ने रास्ते पर गौर किया तब उन्हें पता चला की रेस्टुरेंट तो पीछे रह गया और वो कितना आगे निकल आये। अपनी गाड़ी को रोककर प्रोफेसर साहब कुछ देर कार में ही बैठे हुए नुक्क्ड़ पर लगी स्टॉल और यहाँ खड़े लोगो को देख रहे थे एक तरफ लोगों को देख मन कर रहा था कि एक बार यहाँ की चाय टेस्ट कर कर देखूँ दूसरी ओर मन कहता अरे! नही, पता नही कैसा होगा सब कुछ मुझे शायद अच्छा ना लगे लेकिन और भी तो लोग है यहाँ, अपने आप को समझाते खुद से कहते हुए प्रोफेसर साहब नुक्क्ड़ की टी स्टॉल आ पहुँचे और बाकी की लगी और स्टॉल को भी ध्यान से देखने लगे वही लकड़ी की बेंच थी तो प्रोफेसर साहब उस पर बैठ गए सर जी चाय , चाय वाले भईया के हेल्पर दीपू ने कहा, हाँ अ मुझे प्रोफेसर कुलदीप ने कुछ सोचते हुए इतना कहा और दीपू ने चाय का ग्लास ये कहते हुए हाथ मे दे दिया की भईया के हाथ की चाय है सबको बहुत पसन्द है। प्रोफेसर साहब कुछ कह नही पाए थोड़े हिचकते हुए ही सही पर उन्होंने चाय पी ली और सच में चाय का टेस्ट अच्छा था। क्योंकि बारिश का मौसम था तो पानी की हल्की- हल्की फ़ुहारें तो आ रही थी पर अब बादल गरजने भी लगा था प्रोफेसर साहब गरजते बदलों की ओर ध्यान लगाकर देख रहे थे जैसे ये गर्जना बादलों की नही उनके मन की हो, बारिश की बूंदे अब तेज हो गई थी और प्रोफेसर उन बूंदों में भीग रहे थे तब अचानक पानी की आती बूंदे रुक गई प्रोफेसर साहब ने जब पलकें ऊपर कर देखा तो किसी ने अपना छाता उनकी ओर भी किया हुआ था। ये अनुराग था जो प्रोफेसर कुलदीप के बगल में बैठा हुआ था जब उन्होंने अनुराग की तरफ देखा तो अनुराग बोला आप भीग रहे थे ना तो मैंने छाता थोड़ा आपकी तरफ भी कर दिया। अनुराग को देख उन्हें लगा जैसे उनका कोई अपना सा हो थैंक यूँ प्रोफ़ेसर साहब बोले। अब एक छाते के नीचे अनुराग और प्रोफेसर साहब दोनों थे अब प्रोफ़ेसर साहब का तो चलो ठीक है पर अनुराग कब तक चुप बैठता , तो बस उसने बोलना शुरू कर दिया आपको भी भईया के हाथ की चाय पसन्द है अनुराग ने पूछा हाँ वैसे अभी तक तो नही थी पर अब है क्यों तुम भी यहाँ चाय पीने आये हो प्रोफेसर साहब ने कहा अरे! नही नही मैं चाय नही पीता, अच्छा तो फिर ऐसा क्यों पूछा आपको भी चाय पसन्द है , वो वो तो इसलिए क्योंकि ये दीपक भईया जो है वो बोलते है भईया के हाथ की चाय है सबको बहुत पसंद है। अनुराग ने दीपू के अंदाज़ में कहा तो प्रोफेसर साहब को हँसी आ गई अनुराग भी खिल - खिलाकर हँस पड़ा। अरे बारिश रुक गई कहते हुए अनुराग ने अपना छाता बंद कर लिया। तुम्हरा नाम क्या है मेरा नाम अनुराग है प्रोफेसर साहब के पूछने पर अनुराग बोला। तुम चाय नही पीते तो यहाँ क्या? कर हो मैं कुल्फ़ी खाने आया हूँ कुल्फ़ी वाले अंकल की मावा कुल्फ़ी बड़ी टेस्टी होती है पर अभी वो आये नही है इसलिये मैं उनके आने का इंतजार कर रहा हूँ कुछ देर बाद जब कुल्फ़ी वाला आया तो अनुराग दौड़कर गया और कुल्फ़ी लेकर वापस प्रोफ़ेसर साहब के पास आ बैठा दोनों ही काफी देर तक जाने क्या- क्या बातें करते रहे ,इस 9 -10 साल के लड़के से बातें कर प्रोफ़ेसर साहब को ऐसा क्या महसूस हुआ जो उनके मन में गुस्से और नाराज़गी का उठा तूफ़ान अब शांत हो गया था। जब अनुराग उठकर घर जाने लगा तब प्रोफ़ेसर कुलदीप ने उसे जाते देख पूछ लिया अनुराग कल भी आओगे कुल्फ़ी खाने जबकि बाद में वो खुद सोच में पड़ गये कि उन्होंने आखिर ये क्यों ? पूछा अनुराग से। चमकती आँखों और बड़ी सी स्माइल के साथ अनुराग बोला हाँ आऊँगा ना। अगले दिन प्रोफेसर साहब चाय की स्टॉल पर बैठे अनुराग के आने का इंतज़ार कर रहे थे अनुराग जब वहाँ पहुँचा तो प्रोफेसर को देखते ही बोला अरे! आप आज भी आये है। हाँ प्रोफेसर साहब बोले, मैं अभी आता हूँ कहकर अनुराग कुल्फ़ी लेने चला गया और दो कुल्फ़ी ले आया। आज दो कुल्फ़ी एक साथ खाओगे प्रोफेसर कुलदीप ने पूछा तो अनुराग बोला अरे नही एक कुल्फ़ी तो मैं आपके लिए लाया हूँ, मेरे लिए पर क्यों ? मुझे देखकर आपका मन भी तो करेगा ना कुल्फ़ी खाने का इसलिए। अनुराग की बात सुन प्रोफेसर कुलदीप हँसने लगे और हँसते हुए बोले हाँ बिल्कुल सही है तो फिर लाओ कुल्फ़ी ,अनुराग ने कुल्फ़ी प्रोफेसर साहब के हाथ मे पकड़ा दी दोनों ने साथ - साथ मज़े से कुल्फ़ी खाई और फिर खूब सारी बातें कीं। इस भोले से चेहरे वाले अनुराग की बातों जाने क्या खास था जो प्रोफेसर साहब उसकी बातों को इतना गौर से सुने जा रहे थे । अनुराग ने बातों - बातों में कहा कि उसके दोस्त तो कई सारे है पर कोई भी बहुत समझदार नही है उसकी तरह, लेकिन उसे एक समझदार दोस्त चाहिये। अनुराग को ऐसे कहते सुन प्रोफेसर साहब को मन मे हँसी तो आई पर फिर बोले अनुराग मुझे अपना दोस्त बना लो मैं बहुत समझदार तो नही हूँ पर हाँ थोड़ा समझदार तो हूँ थोड़े शरारती अंदाज़ में कहते हुए प्रोफेसर कुलदीप अपने एक पैर को मोड़ते हुए दूसरे पैर पर रखकर एकदम सीधे होकर बैठ गए। अनुराग ने प्रोफेसर की ओर ध्यान से देखा कुछ देर मन ही मन कुछ सोचा फिर बोला वैसे हम दोस्त बन सकते है तो ठीक है दोस्त फिर मिलाओ हाथ, अपना हाथ बढ़ाते हुए अनुराग बोला अनुराग से हाथ मिलाते हुए प्रोफेसर साहब बोले क्यों नही दोस्त। बस तब से ही दोनों दोस्त बन गये वो भी बड़े पक्के वाले, हर रोज दोनों का नुक्क्ड़ पर मिलना तय रहता है दोनों के पास ही ढेर सारी बातें होती है एक - दूसरे को बताने के लिए, अनुराग कभी स्कूल की बात करता तो कभी मोहल्ले की आज स्कूल ऐसे लड़ाई हुई टीचर ने किसी को पनिश किया स्कूल फ्रेंड्स और उसने मिलकर कितनी मस्ती की , मोहल्ले में क्या नई बात हुई क्रिकेट में किसकी टीम जीती और भी बहुत कुछ। अनुराग की बात सुनने के बाद प्रोफेसर साहब फिर अपना दिनभर का हाल उसे बताते है आज मॉर्निंग वॉक पर जाते हुए क्या देखा सुबह कैसी थी नाश्ते में क्या खाया आज कॉलेज का दिन कैसा रहा एनुअल फ़ंक्शन कैसा होने वाला है आजकल के स्टूडेंट्स कैसे है इसके अलावा प्रोफेसर साहब अनुराग को ये भी बताते है कि लोग कैसे है कैसा होना चाहिए फ्यूचर के लिए क्या करना चाहिए और हाँ अनुराग को कैसे पढ़ाई करनी चाहिए एग्जाम के की तैयारी के लिए उसे टिप्स भी देते है और उसकी इंग्लिश में तो कितना सुधार ला दिया है प्रोफेसर जी ने। दोनों दोस्त अपने मन की बातें एक - दूसरे से कहते है सुनते है और अपनी राय भी देते है और अगर कोई प्रॉब्लम हो तो मिलकर उसका हल निकालते है मुड़ ऑफ होने पर एक - दूसरे को खुश करने की कोशिश भी करते है। जब अनुराग को अपने पापा की याद आती है तो प्रोफेसर साहब उसका मन भटकाने को पूरी कोशिश करते है और जब कभी अपने बेटे अपने पोते को याद कर प्रोफेसर साहब दुखी होते है तो अनुराग उन्हें हँसाने के लिए अलग - अलग मस्ती भरे जतन करता है। इसलिए तो दोनों एक - दूसरे के लिए किसी रोशनी की तरह है। वो रोशनी जिसके होने से उनके मन की उदासी कहीं दूर जा खड़ी होती है, जिसके होने से होंठों पर खामोशी ज्यादा देर ठहर नही पाती वो खिलखिलाती हँसी में बदल जाती। ये दोनों दोस्त एक - दूसरे से हैं तो अलग पर एक बात है जो दोनों में एक जैसी है दोनों के पास किसी अपने की कमी है उस अपने की बहुत याद आती है दोनों को और दोनों ही चाहते है कि उनका अपना उनके पास रहे लेकिन चाहा हुआ हमेशा पूरा कहाँ होता है। एक तरफ अनुराग के पापा उसके साथ नही और दूसरी ओर प्रोफेसर कुलदीप का बेटा उनसे दूर है ये वो दुख ही तो है जो एक जैसा है अनुराग और प्रोफेसर कुलदीप के बीच। 

अनुराग है तो एक बच्चा पर मन तो उसका भी है जब भी वो अपने दोस्तों को उनके पापा के साथ देखता या अपने मन की कोई बात उसे पापा से करनी होती तो उस वक्त उसे अपने पापा की बहुत याद आती बहुत दुखी होता है वो, ये सोचकर कि सब की तरह उसके पापा भी उनके साथ क्यों नही रहते।अनुराग के पिता दूसरे शहर में रखकर नौकरी करते है बस दीवाली ही तो है जब वो घर आते है और वो भी सिर्फ 3- 4 दिनों के लिए, अनुराग को अपने पापा से कितनी सारी बातें करनी होती है पर इतने कम समय मे उसके पापा ठीक से उसके साथ वक्त गुजार ही नही पाते और उसके मन की बातें मन मे ही रह जाती है इसलिए अनुराग फिर उदास हो जाता है। अनुराग की तरह प्रोफेसर साहब भी उम्मीद लगाये किसी के आने की राह देखते रहे है पर जिसकी राह देखी वो आया ही नही और अब तो उम्मीद भी खत्म हो गई। अपने बेटे विकल्प को लेकर प्रोफेसर साहब ने कई सपने देखे थे वो सपने पूरे भी हुए पर उन्होंने कभी ये नही सोचा था कि उनका बेटा उनके पास नही रहेगा दूसरे देश जाकर वही बस जायेगा। पहले तो विकल्प फोन पर बात कर लिया करता था पर धीरे- धीरे इतना बिज़ी हो गया कि उसके पास अब फोन पर बात करने का भी समय नही रहा। अपने पोते को देखने उसके साथ खेलने का प्रोफेसर साहब का बहुत मन करता है पर वो जानते कि उनकी ये इक्छा पूरी नही हो सकती। अपनी पत्नी उषा के  चले जाने के बाद प्रोफेसर कुलदीप बिल्कुल अकेले हो गये। सब कुछ है उनके पास किसी चीज़ की कोई कमी नही है, कमी है तो बस किसी अपने की। कोई घर , घर तभी लगता है जब वहाँ परिवार रह रहा हो नही तो वो सिर्फ एक मकान होता है प्रोफेसर साहब का घर भी मकान की तरह ही है । प्रोफेसर कुलदीप ने विकल्प को कितनी बार कहा कि कुछ दिनों के लिए ही सही पर आ जाये लेकिन हर बार उसका एक बहाना तैयार रहता उस दिन तो प्रोफेसर साहब को गुस्सा आ गया था जब विकल्प ने आने से साफ इनकार कर दिया वो भी ये कहते हुए की पापा आप मुझे समझने की कभी कोशिश क्यों नही करते ये सुनकर बहुत बुरा लगा था प्रोफेसर कुलदीप को, मैं नही समझता बचपन से लेकर आज तक बस उसकी ख्वाइशों उसकी इक्छाओ को ही तो समझता आया हूँ। उससे उसका कुछ समय ही तो माँग था क्या एक पिता अपने बेटे से इतनी उम्मीद भी नही कर सकता। गुस्से में गाड़ी चलाते हुए प्रोफेसर कुलदीप जाने कितनी बातें सोचते जा रहे थे और तब नुक्क्ड़ की ओर आ पहुँचे जहाँ अनुराग उन्हें मिला। एक दोस्त जिसने उदास हो चुके प्रोफेसर साहब के मन को अपनी सच्ची भोली और शरारती बातों से बुदबुदाया और उन्हें फिरसे हँसना सिखाया। प्रोफ़ेसर साहब अनुराग में अपने पोते को देखने की कोशिश करते है अभी भले ही वो तीन साल का है पर जब अनुराग जितना बड़ा होगा तब वो भी ऐसा ही तो होगा ना, इतनी सारी बातें करेगा प्रोफ़ेसर साहब जानते है कि उन्हें अपने पोते के साथ ऐसे वक्त बिताने को कभी नही मिल पायेगा इसलिए अनुराग को देखकर खुश हो लिया करते है। उतना ही खुश अनुराग भी होता है अपने दोस्त को देखकर और उनका ख्याल कभी रखता है अभी कुछ दिन पहले जब प्रोफेसर साहब की तबियत खराब हो गई थी तो अनुराग उनसे मिलने उनके घर जाया करता था और जल्दी ठीक हो जाये इसके लिए भगवान से प्रार्थना भी किया करता था। 

आज पूरे 5 दिन बाद प्रोफ़ेसर साहब नुक्क्ड़ की ओर आये अनुराग चाय की स्टॉल के पास बैठा हुआ उनका इंतजार कर रहा था दोस्त आ गए तुम प्रोफेसर साहब को देखते ही खुश होकर अनुराग बोला, हाँ दोस्त तुम मेरा इंतजार करो और मैं ना आऊँ ऐसा हो सकता है भला प्रोफेसर साहब बोले। मैं कुल्फ़ी लेकर आता हूँ इतना कहा और अनुराग झट से कुल्फ़ी वाले अंकल की ओर दौड़ गया। ये लो दोस्त आज कुल्फ़ी मेरी तरफ से खुश हो जाओ अच्छा किस खुशी में अनुराग के कहने पर प्रोफेसर साहब ने पूछा तुम्हारे ठीक हो जाने की खुशी में मुस्कुराते हुए अनुराग बोला। ओह! शुक्रिया मेरे दोस्त। अनुराग की वजह से ही प्रोफेसर साहब ने कुल्फ़ी खाना शुरू किया वरना उन्हें कुल्फ़ी कब पसन्द थी। इन दोनों दोस्तों में उम्र और समझ का बड़ा फर्क है पर फिर भी कितना मजबूत रिश्ता है दोनों के बीच ,अपनेपन का एक प्यार भरा रिश्ता जिसमे रिश्ता निभाने के लिए कोई शर्त या स्वार्थ नही है पर फिर भी दोनों दोस्त खुशी से मुस्कुराते हुए साथ है बस कुल्फ़ी का मीठा- मीठा स्वाद है जो अभी इनकी जुबान चख रही है कैसी लग रही है? मज़ा आया अच्छी लग रही है ना कुल्फ़ी, एक - एक और खायेंगे ठीक है। 



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