ख़ैरियत


सुबह का सूरज अपने साथ सिर्फ एक नये दिन को ही नही लाता है वो कुछ नये रास्ते भी लाता है, वो रास्ते जिनसे मन पूरी तरह अनजान होता है उस पर कैसे चलना है ये उसे मालूम नही होता। अपने घर की छत पर खड़े हुए मैं सूरज को निकलते हुए देख रही थी रोज़ सुबह सूरज के निकलने से पहले ही मैं छत पर आकर आसमान की ओर देखने लगती हूँ और इंतज़ार करती हूँ सूरज के निकलने का। अच्छा लगता है मुझे सुबह के सूरज को देखना और उसे देखते रहना तपस की तरह। जब हमारी किसी से मुलाक़ात होती है तो कुछ देर हम उससे बात करते है साथ मे थोड़ा वक्त बिताते है और अपने - अपने रास्ते लौट जाते है ये सोचकर कि मुलाक़ात खत्म हो गई पर क्या वाकई ऐसा होता या फिर कुछ रह जाता है। सुबह का उजाला चारो ओर फैल गया था और मेरे अलावा अब घर के बाकी लोग भी जाग गए थे। वनिका नीचे आ जाओ बेटा। पता था मुझे की अब माँ आवाज़ लगाने वाली होंगी इसलिए मैं पहले ही सीढ़ीयाँ उतरने लगी और माँ के पास जा पहुँची पैकिंग हो गई चाय का कप देते हुए माँ ने पूछा हाँ माँ सब हो गया फिर भी एक बार और दोबारा सब देखलो ओके माँ कहते हुए मैंने माँ का हाथ थाम लिया आप फिक्र मत करो माँ मैं अपना ख्याल रखूँगी और सुरभि भी तो है ना वहाँ। माँ ने प्यार से मुझे देखते हुए पलके झपका दी। शाम के 7 बज रहे थे मैं ट्रेन में बैठे हुए माँ और पापा को देख रही थी जो मुस्कुराते हुए मुझे बाय तो कर रहे थे पर उनके माथे पर फिक्र की लकीरें मुझे साफ नज़र आ रही थी हर माता-पिता को अपने बच्चों की फिक्र होती है और मैं तो उनसे दूर जा रही थी तो फिक्र और भी ज़्यादा थी। ट्रेन चल पड़ी थी और मैं नये रास्ते की ओर बढ़ गई थी। सफर थोड़ा लम्बा था इसलिए वक्त काटने के लिए मैं अपना लैपटॉप ऑन करके बैठ गई और फोटोज़ देखने लगी। घर की,  फ़ैमिली की , फ्रेंड्स ,कॉलेज , पिकनिक,  सुरभि की मैरिज की और भी ढेर सारी कई फोटोज़ थी मेरे पास जिन्हें मैं बस एक झलक देखते जा रही थी लेकिन एक फोटो ऐसी भी थी जिस पर मेरी नज़र जरा ठहर गई। इस फोटो में वॉटर फॉल के पास मैं सुरभि ,अनुभव , और तपस एक साथ खड़े है और ये फोटो मयूरी ने ली थी। बहुत ज़िद करके सुरभि मुझे अपने साथ पचमढ़ी ले गई थी मैं तो तेरे कॉलेज फ्रेंड्स को जानती भी नही हूँ मैं अलग थलग महसूस करूँगी मैंने कहा तो सुरभि ने विश्वास दिलाते हुए कहा ऐसा कुछ भी नही होगा तुझे चलना ही पड़ेगा। फाइनली हम 6 लोग ट्रिप के लिए निकल ही गये पंचमढ़ी पहुँचते हुए रास्ता बड़ा ही खूबसूरत लगा ऊँचे - ऊँचे पहाड़ ख़ामोश घने जंगल जो कि हवा के कम ज्यादा होने पर थोड़ा लह-लहाते और फिर खामोश खड़े हो जाते जंगलो को देखते हुए शाम तक हम पचमढ़ी पहुँच गये और एक रिजॉर्ट में जाकर ठहरे। अपने ट्रिप के पहले दिन हम जटाशंकर , बडेमहादेव और भी कई धार्मिक स्थलों पर गए सुरभि पूरे दिन मेरे साथ- साथ ही रही वैसे सुरभि के फ्रेंड्स अच्छे है लेकिन फिर भी मेरे अंदर थोड़ी झिझक सी रही। अगले दिन हम प्रियदर्शनी पॉइन्ट पर थे सुरभि के फ्रेंड्स हमसे थोड़ा दूर खड़े फ़ोटो क्लिक कर रहे थे मैं सुरभि और अनुभव के साथ थी लेकिन मैं फिर उनसे थोड़ा दूर जाकर खड़ी हो गई कुछ दिनों में दोनों की शादी होने वाली है ये पल इन दोनों के लिए खास है और मैं नही चाहती कि मेरी वजह से वो इन पलों को खो दे। मैं हरे - भरे पहाड़ों को देख रही थी अच्छा नज़ारा है कहते हुए  तपस मुझसे कुछ दूर आकर खड़े हो गया और अपने मोबाइल में फ़ोटो क्लिक करने लगा साथ ही वो मुझसे बातें भी करता जा रहा था और मैं हाँ हूँ में जवाब देती जा रही थी। काफी जगह घूमने के बाद लास्ट में हम धूपगढ़ पहुँचे सनसेट देखने आसपास केसरी बादलो के बीच मे पीला तेज चमकता हुआ सूरज जिससे आसमान दमक उठा था और उसकी रोशनी सुनहरी होकर हम पर पड़ रही थी वाकई ये बहुत खूबसूरत था। सभी खामोशी से अस्त होते सूरज को देख रहे थे।आज का दिन थका देने वाला रहा रात को सुरभि और अनुभव गार्डन एरिया में साथ टहल रहे थे मयूरी जिगर तपस और मैं हम चारो साथ बैठे बातें कर रहे थे मैं सुबह यहाँ से जो वो पास में माउंटेन है वहाँ जाने वाला हूँ सनराइज़ देखने तुम सब चलोगे तपस ने पूछा मयूरी और जिगर ने पहले एक दूसरे की ओर देखा और बोले हम इतनी जल्दी सुबह नही उठ पाएंगे तपस की नज़रें अब मेरी तरफ थी वैसे मुझे खुद भी सुबह जल्दी जागने की आदत नही है पर फिर मैंने ओके कह दिया। सुबह तपस और मैं माउंटेन की ओर जा रहे थे मुझे तो लग रहा था जैसे मैं नींद में ही चल रही हूँ क्या जरूरत थी मुझे हाँ कहने की सुरभि भी नही आई साथ बस मुझे ही देखना था सनराइज़ सोचते हुए मैं तपस के पीछे- पीछे चल रही थी कुछ देर बाद तो मैं एक जगह रुक ही गई तपस ने मुझे मुड़कर देखा मेरे पास आया और मेरा हाथ पकड़ कर चलने लगा यहाँ एक लिफ्ट होनी चाहिए थी तपस बोला,  क्यों मैंने पूछा कुछ लोगो के लिए आसान हो जाता ना ऊपर तक पहुँचना बस इसलिए हँसते हुए तपस बोला। बातें करते हुए हम ऊपर आ पहुँचे लाल दिख रहे आसमान पर पीली रोशनी चमक रही थी जो धीरे- धीरे बढ़ती जा रही थी कुछ हल्का सा सूरज नज़र आ रहा था कुछ देर में बहुत तेज़ रोशनी के साथ चमकता हुआ सूरज बादलों से बाहर निकल आया ऐसा लगा जैसे उसने अपनी रोशनी की चादर फैला दी हो और सब कुछ रोशन हो गया हो, सूरज के रोशनी बिखरते ही पक्षियों की चहचाहट शुरू हो गई थी। मैं और तपस खामोश बैठे हुए इस खूबसूरत सुबह को देख रहे थे। ये मेरे लिए एक अलग एक्सपीरियंस है मैंने पहली बार सूरज को अपनी किरणें बिखेरते हुए देखा कहते हुए मेरी आँखों मे चमक सी आ गई, मैं रोज़ देखता हूँ तपस ने कहा। हम रिजॉर्ट वापस आ गये आज के दिन के प्लानिंग के मुताबिक जो जगह घूमने के लिए रह गई थी हम वहाँ घूमे और फिर अगले दिन घर वापसी के लिए निकल गये पचमढ़ी जाते वक्त जो मेरे लिए अजनबी थे वो घर लौटते वक्त मेरे दोस्त बन गए थे। 

 ट्रेन की आवाज़ से मेरा ध्यान जरा टूटा ट्रेन स्टेशन पर आकर रुकी हुई थी अभी कुछ घंटे और बाकी थे मेरे दिल्ली पहुँचने में।मैंने लेपटॉप बंद करके रख दिया और कुछ देर बाद मेरी आँख लग गई। सुबह मैं दिल्ली स्टेशन पर थी सुरभि मुझे लेने आने वाली थी पहले मैं सुरभि के साथ उसके घर गई उसकी फैमली से मिली और कुछ देर वहाँ रुकने के बाद फाइनली मैं अपने फ्लैट पर आ गई सुरभि के घर से कुछ दूर ही मेरा फ्लैट है मैंने ही सुरभि को कहा था कि वो आसपास ही मेरे लिए फ्लैट देखे।  नया शहर नई जगह और नई सुबह के साथ आज मेरे दिन की शुरुआत हुई नये ऑफ़िस में नये कलीग्स के साथ मुझे अच्छा लगा। लगा ही नही के आज यहाँ मेरा पहला दिन है। दिल्ली की रौनक मेरे शहर से अलग है सोचते हुुुए बाल्कनी में खड़ी हुुुई मैं पूरे शहर को देेेखने की कोशिश कर रही थी सुबह का सूरज दस्तक दे रहा था मैं इस सुबह को देख रही थी किसी की आवाज़ अभी- अभी मेरे कानों में पड़ी मैंने आसपास देखा बगल वाली बिल्डिंग में मेरे सामने वाली जो बाल्कनी दिख रही है शायद कोई है वहाँ ,सूरज की रोशनी जब उस शख्स पर पड़ी तो चेहरा साफ नज़र आया जोकि तपस का था। तपस को देख ऐसा लगा जैसे कुछ छूटा हुआ आज अचानक फिर मिल गया हो। उसने इशारे में मुुस्कुराते हुुुए हेलो कहा तो मैैंने भी बस उसे हाय कह दिया इतने वक्त बाद अचानक मुलाकात होनेे पर क्या कहूँ क्या बात करूं मुझे कुुुछ समझ नही आ रहा था बस मेरी नजर ठहर गई कुुुछ पल तपस पर। घड़ी की सुुुई के साथ दौड़ना आसान नही होता पर मैं दौड़ रही थी और ऑफिस के लिये तैयार हो रही थी लेकिन मेरे मन मे कुुुछ चल रहा था तपस वो यहां कैसे ? ऑफ़िस जाते वक्त भी ये सवाल मेरे अंदर चल रहा था मैं बिल्डिंग से बाहर आई तो तपस अपनी बाइक से टिककर खड़ा नज़र आया मुझे देखते ही मुस्कुराया मैं ड्रॉप कर दूँ तपस ने कहा,लेकिन मेरा ऑफिस तो मैंने कहा तो मेरी बात को बीच मे रोकते हुए तपस बोला हाँ मुझे पता है अभी तुम नई हो शहर में इसलिए कुुुुछ दिनों तक मैं ही तुम्हे ड्राप करूँगा ओके। न कहूँगी तो क्या ये बुरा मान बैठेगा सोचते हुए मैं गाड़ी पर बैठ गई। पूरे रास्ते तपस ने कोई बात नही की और ना ही मैंने वनिका हाँ हम पहुँच गये मैं झट से बाइक से उतर गई बाय कहकर वो चला गया। अभी मुझे प्रियदर्शनी पॉइन्ट याद आ गया तपस मयूरी और जिगर के साथ फोटोज़ क्लिक कर रहा था मैं अकेेली खड़ी पहाडों को देेेख रही थी तब तपस मेरे बगल में आकर खड़ा हो गया वो भी बिना ये जताए की मैं खुद को अकेले फील ना करूँ बस इसलिए तपस मेरे साथ खड़ा है लेकिन मैं समझ गई थी। और ये भी की तपस को परवाह है उनकी ही नही जिनसे उसका रिश्ता है उनकी भी जो उसके कुुुछ नही लगते।शाम को सुुरभि से बात हुुुई बताया उसने की तपस तो पिछले दो साल से यहाँ है और सुुरभि के कहने पर उसी ने ये फ्लैट देखा था मेरे लिए।                                  

 कुछ दिन बाद अपने ऑफ़िस आने-जाने के लिए मैंने टैक्सी का इंतज़ाम कर लिया और तपस को भी बता दिया। वैसे क्योंकि हम एक ही कॉलोनी में रह रहे है तो हमारी मुलाकातें और बातें होती रहती है। और कभी - कभी हम अपनी - अपनी बाल्कनी में खड़े होकर ईशारों से भी बात कर लेेेते है और जब बात समझ ना आये तो कॉल कर लिया करते है वैसे भी तपस हमेशा सिर्फ इतना ही बोलता है हाय, हेलो ,ऑफ़िस में सब कैसा चल रहा है कुछ न्यू फ्रेंड्स बने , ये फ्लैट ठीक लगा तुम्हें बस कुछ ऐसी ही बातें करता है।पर अच्छी लगती है मुझे उसकी ये सादी बातें और उन बातों में कहीं न कहीं मेरी फिक्र। वक्त हमेशा आगे चलता चला जाता है और उसके साथ हम भी आगे बढ़ते जाते है। 6 महीने बीत गए मुझे यहाँ आये,अब ऑफ़िस के कलीग्स से भी थोड़ी दोस्ती हो गई थी मेरी और जो दूर के दोस्त थे अब थोड़े करीब के हो गए थे हाँ अब तपस पहले से थोड़ी ज़्यादा बातें करने लगा था कभी - कभी अपने मन की बातों को मुुझसे कहने लगा था और मेरा झुकाव तपस की तरफ पहले से और भी ज्यादा हो गया था बाल्कनी में खड़े रहकर उसके बाल्कनी में आने का इंतजार करना हर छोटी- छोटी बात उसे बताने के लिए बेसब्र रहना ,सुरभि मेरे साथ नही जा पाएगी बिज़ी है वो कहकर मेरा उदास होकर बैठ जाना और फिर तपस का मेरे साथ चल देना, किसी सुुुबह अगर वो बाल्कनी में नजऱ न आये तो लगे जैसे सुुुुबह हुुुई ना हो मेरी। ये किस राह पर चल पड़ी थी मैं जिसकी कोई मंजिल थी ही नही। कल सुरभि की मैरिज एनिवर्सरी है मैं सारी ड्रेसेस निकालकर बैठी हुई थी तभी तपस का कॉल आ गया वनिका कहीं बाहर हो नही मैं घर पर ही हूँ कहते हुए मैं बाल्कनी मैं जा खड़ी हुई अब मैं और तपस एक दूसरे को देखते हुए फोन पर बात कर रहे थे तपस के पूछने पर मैंने अपनी प्रॉब्लम उसे बताई ओके तुम अपनी ड्रेसस मुझे दिखाती जाओ मैं हेल्प करता हूँ तपस ने कहा मैं एक बाद एक ड्रेस तपस को दिखाती गई तुमने कभी साड़ी ट्राय की है तपस ने पूछा। मैने कहा नही, तो वो ट्राय कर लो। पर कौनसा कलर सूट होगा मुझ पर मैंने पूछा तपस ज़रा सोचने लगा फिर बोला ब्लैक मुझे मन ही मन हँसी आ गई दरसल ब्लेक कलर मुझे ज्यादा पसंद नही है। अगली शाम तपस गाड़ी के पास मेरा वेट कर रहा था ब्लैक साड़ी पहने मैं सीढ़ीयाँ उतर रही थी ये साड़ी पहनकर चलना कितना मुश्किल होता है बड़बड़ाते हुए मैं एक - एक कदम बहुत होले से रख रही थी तभी अचानक तपस ने आकर मेरा हाथ थाम लिया और मेरे साथ सीढ़ीयाँ उतरने लगा मुझे पचमढ़ी ट्रिप का वो दिन याद आ गया जब चलते हुए मैं रुक गई थी और तपस मेरा हाथ पकड़कर चलने लगा था।गाड़ी में बैठने से लेकर सुरभि के घर पहुँचने तक मैं यही सोचती रही क्या तपस से पूछूँ एक बार की मैं कैसी लग रही हूँ फिर सोचा रहने दो एक बार भी गौर से देखा ही कब उसने मुझे जो कुछ कहे। इतने पास रहते हुए भी मैं सुरभि से कितने दिनों बाद मिल रही थी सुरभि मुझसे बातें किये जा रही थी लेकिन फिर भी मेरा ध्यान तपस पर था वो ज़रा दिखाई नही देता तो मेरी नज़रे उसे ढूंढने लगती जबकि उसकी नज़र एक बार भी मुुुुझ तक नही आई। पार्टी मेंं जाते वक्त मैंं जितनी खुश थी लौटते वक्त उतनी ही खामोश तपस शायद समझ गया था कि मेरा मुड़ ऑफ है वनिका पार्टी में कुछ हुआ क्या तपस ने पूछा , नही कहते हुए मैंने अपनी नजरें तपस से फेर ली। रात को आँखों से नींद जैसे कहीं दूर टहलने निकल गई हो कोशिश करने के बावजूद मुझे नींद नही आ रही थी एक तरफा प्यार शायद ऐसा ही होता है मन ही मन किसी को चाहते रहो और वो पूरी तरह अंजान हो आपके एहसासों से और दिल मे जगह बनाती ख्वाइशों से। मेरी आँखें थोड़ी नम हो गयी थी अभी एक सवाल था जो दर्द बनकर चुभ रहा था मुझे क्या तपस की आँखों में मुझे वो कभी नज़र नही आयेगा जो मैं देखना चाहती हूँ पाँच साल पहले जब मैं पहली बार तपस से मिली थी तब भी तपस ऐसा ही तो था अपने मे ही गुम और आज भी शायद ऐसा ही है कुछ खबर नही उसे। दो-तीन दिनों तक मैंने तपस से ठीक से बात नही की नाराज़ थी मैं उससे।लेकिन ये नाराज़गी ज्यादा वक्त तक चल न सकी। शाम को माँ का कॉल आया उनसे बात करते हुए मैं बाल्कनी में आ पहुँची कानों में एयरफोन लगाये तपस अपनी बाल्कनी में टहल रहा था शायद गाने सुन रहा था इसलिये चेहरे के अलग- अलग एक्सप्रेशन बनाये जा रहा था उसे ऐसे देेेख मुझे हँसी आ गई तपस की नज़र मुझ पर पड़ी तो वो मुस्कुराकर दिया फिर मैं भी ज़रा सी मुस्कुरा दी। काश मन को बांधने के लिए भी कोई रस्सी होती तो कमसे कम अपने मन को किसी की ओर जाने से रोक तो पाते और ज़रा जो अपने से ही हम रूठकर बैैठे थे तो रूठे तो रह पाते मगर ऐसा ना हो सका। माँ से बात करने के बाद मैं तपस के बारे में सोच रही थी मैं भी कितनी नासमझ हूँ किस से नाराज थी जिसे पता ही नही की मैं उससे ख़फा हूँ जब  उठती लहरों की उसे कोई खबर नही हुई तो उन लहरों के शांत हो जाने का भला उसे क्या पता चलेगा। चार दिन की नाराज़गी के बाद अब सब पहले जैसा ही था अच्छे दोस्त की तरह हाय हैलो करना यहाँ - वहाँ की बातें करना किसी बात पर साथ हँसना - मुस्कुराना और मेरा मन ही मन उसे चाहना और उम्मीद करना कभी तो पूछे ये मेरे मन का हाल मेरी खैैैरियत। सब ऐसे ही चलते रहा और 1 साल बीत गया और मेरे वापस लौटने का वक्त आ गया। कटनी से दिल्ली मैं 1 साल के लिए ही तो आई थी अपने सामान के साथ मैं बिल्डिंग से बाहर निकली तो सुरभि और अनुभव दिखाई दिये वो मुझे बाय कहने आये थे कुछ देर बाद तपस गाड़ी लेकर आ गया और हम स्टेशन के लिए निकल गए। आज भी मुझे वैसा ही लग रहा है जैसा पचमढ़ी से लौटते वक्त लग रहा था ये रास्ता और लंबा हो जाये, वक्त की चाल ज़रा धीमी पड़ जाये और सफ़र बस चलता जाये। पाँच साल पहले जो आँखों मे रह गया था वो आज दिल में उतर गया है तब मैं खुद कुछ समझ नही पाई और आज चाहते हुए भी कुछ कह नही पाई बस लग रहा है कि कुछ छूट रहा है कुछ है जो अधुरा रह गया। हम फ्लेटफॉर्म पर थे ट्रेन कुछ देर में आने वाली थी हम बैैैठकर इंतजार कर रहे थे तपस को कह दूँ के नही कहूँ शायद कह देना चाहिये नही कहूँगी तो हमेशा ये अफसोस रहेगा कि काश कह दिया होता मैं हाँ ना में उलझी हुई एक तरफ अपने हाथ में पकड़ी हुुुई ट्रेन की टिकट को देख रही थी और दूसरी ओर तपस को , पानी की खाली बोतल लेेकर जब तपस मेरे पास से उठा तो मैंने कसकर उसका हाथ पकड़ लिया वो हैरान होकर मुझे देेेखने लगा क्या हुुुआ वनिका तुम ठीक हो कहते हुए तपस वापस मेरे पास बैठ गया तुम किसी बात से परेशान हो? अगर तुम चाहो तो अपने मन की बात मुुझसे कह सकती हो मैं हूँ तुुुुुम्हारे साथ तपस कह रहा था अपनी खामोश नज़रों से मैं बस तपस को देेखे जा रही थी शायद ये आख़री पल है मेरा तपस के साथ ये सोचते हुुुए मैं बोल पड़ी एक साल में जो नही कह सकी कभी एक सांस में आज वो सब कह दिया बस आँखें ज़रा नम हो गयीं।      

  धीमे- धीमे अंधेरे में आहिस्ते - आहिस्ते अपनी रोशनी को फैलाते हुए बादलों में छिपा सूरज निकल आया उसकी तेज़ चंचल किरणें हमारे चेहरे पर चमक रही थी तपस का हाथ थामे हुए मैं इस खूबसूरत सुबह को देख रही थी और तपस मुझे।

राहत



पिछोला झील के पास खड़ा मैं दूर तक देखने की कोशिश कर रहा था झील में भरे पानी को भी और उस पर चलती बोट को भी। ये बोट जहाँ से चलना शुरू करती है पूरी झील घूमने के बाद वापस आकर वहीं रुकती है और बोट में बैठे लोग बोट से उतरकर अपनी राह चले जाते है। यहाँ की सभी फ़ेमस जगहों में से एक नाम पिछोला झील का भी है इसलिए हर रोज़ यहाँ कई टूरिस्ट नज़र आते है जो मेरी तरह इस झील की खूबसूरती को निहारते दिखाई देते है। वैसे मुझे आये काफी देर हो गई थी रोज़ की तरह सूरज धीरे- धीरे ढलता जा रहा था और शाम ने अपनी चादर फैलाना शुरू कर दी थी आसमान का रंग कुछ बदल रहा था हल्का आसमानी कुछ सुनहेरा और कहीं - कहीं कुछ काला सा नजर आ रहा था ऐसे ही तो रोज़ शाम होती है।
दिनभर में जो कुछ भी बिता होता है उसे दिन अपने साथ लेकर डुब जाता है हमारे दिन की सारी बातें गुजरे पल में बदल जाती है दिनभर की भागदौड़ थकान शाम की ठंडक में कहीं पनाह लेने लगती है वैसे शाम को हम वापसी का वक्त भी कह सकते है सुबह से अपने घर से निकले लोग शाम को घर लौट आते है दाना ढूंढने गए पंछी भी शाम तक अपने घोसलें में वापस आ जाते है। पर क्या सभी घर वापस लौटते है शायद नही, होते है कुछ मेरी तरह जो कभी नही लौटते। 
अपने से हुए कुछ शिकवे गिले हमें चाहकर भी कभी वापस लौटने नही देते मुश्किल होता है उस बीते वक्त की कड़वाहट को अपने दिल से मिटा पाना। ऐसा नही है कि मुझे कभी अपनो की याद आती ही नही। आती है याद अपने बिते बचपन की कुछ  खुशी के पलों की तब आँख भर आती है मेरी, लेकिन साथ ही बीतें पलों की कुछ कड़वी बातें भी मुझे याद आ जाती है और एक आँसू दर्द का भी मेरी आँखों से निकल जाता है। 
 जब सब साथ होते है अच्छा लगता है लेकिन कभी -कभी यही साथ परेशानी की वजह बन जाता है। हम सब साथ रहा करते थे ताऊजी चाचाजी पापा और पापा के कज़िन बड़े ताऊजी। हम एक छत के नीचे साथ नही थे पर हमारे घर पास- पास थे इसलिए हम सब भाई - बहनों का बचपन साथ ही गुजरा है तब खूब मज़ा आता था साथ मे खूब मस्ती किया करते थे हम। लेकिन बचपन हमेशा तो नही रहता एक दिन सब बड़े और समझदार हो जाते है हम भी हो गए थे तब मन की मासूमियत कम हो गई थी और हम से हम सब मैं पर आ गये थे।  
ताऊजी के बेटे अमित भईया की सरकारी नौकरी थी और चाचाजी का बेटा धैर्य चाचाजी के साथ उनके बिज़नेस में हेल्प करने लगा था पलक दीदी की शादी के बाद बड़े ताऊजी ने अपने बड़े- बड़े सपने वैभव को सौंप दिए थे उम्र में वैभव भले ही हम सबसे छोटा था लेकिन बड़े ताऊजी उसे बड़ी पोस्ट पर देखना चाहते थे इसलिए उसे कॉम्पेटिटिव एग्जाम की तैयारी में लगा दिया था या ये कहूँ की उस पर बोझ डाल दिया था और इन सबके बीच मैं था जोकि ग्रेजुएट तो था लेकिन फिलहाल कुछ नही कर रहा था  मतलब ना तो मैं किसी तरह का बिज़नेस कर रहा था ना ही कोई ऐसी जॉब जिसमे मैं किसी अच्छी बड़ी पोस्ट पर था मेरी अपनी कोई पहचान नही थी अभी मैं कुछ नही था। इसलिए कभी पापा के गुस्से का सामना करना पड़ता तो कभी अपनो के ताने भरी बातों से गुजरना पड़ता लेकिन मैं हमेशा की तरह कुछ नही कहता। कहता भी क्या जब कोई तुम्हे समझना ही नही चाहता तो समझाना कैसा। 
पापा को तो मुझे छोड़कर बाकी सब होशियार ही नज़र आते थे मेरा जब भी रिजल्ट आता मैं हमेशा डाँट खाता क्योंकि मेरे मार्क्स कम होते थे पढ़ाई में ज़्यादा मन नही लगता था मेरा। मैं न तो बिज़नेस करना चाहता था और न ही सरकारी नौकरी मैं तो आर्टिस्ट बनना चाहता था काम चाहे जो भी हो उसमे समय और मेहनत दोनों लगते है मेरा एक अच्छा और क़ामयाब आर्टिस्ट बनना इतना भी आसान नही था। लेकिन उस वक्त कोई मुझे समझना ही नही चाहता था मेरे वो भाई जो बचपन मे मेरे बिना कभी कोई खेल शुरू नही करते थे अब मेरे बिना ही वो सेलिब्रेशन कर लिया करते थे। बल्कि हाल अब तो ये था कि मौका मिलने पर वो मुझे ये जरूर एहसास दिलाते की वो कितना आगे है मुझसे और मैं कितना पीछे रह गया। बुरा लगता था मुझे ये सोचकर नही की मैं सबसे पीछे रह गया बल्कि ये सोचकर कि मेरे अपने कितना बदल गए है। जब हमारे अपने हमे छोटा महसूस कराने लगे तब वो अपने से नही पराये से लगने लगते है। सबके साथ होते हुए भी मैं अकेला था बिल्कुल अकेला। सिर्फ माँ ही थी जो मुझे समझती थी। और पापा उन्होंने कभी मेरा सपोर्ट किया ही नही वो हमेशा बस मेरे भाइयों की तारीफ़ किया करते और कहते रहते की मुझे भी उनकी तरह आगे बढ़ना चाहिए नाकि समय बर्बाद करना चाहिए हाँ आर्टिस्ट बनने के लिए मैं दिनरात जो मेहनत कर रहा था वो उन्हें समय की बर्बादी ही तो लगती थी मेरी फैमली में मैं ही था जो आर्टिस्ट बनने चला था और किसी ने ये राह कभी चुनी ही नही थी। वक्त आगे बढ़ रहा था और साथ ही सबकी बेरुखी भी।
अपनो की बेरुख़ी तेज़ धूप से भी ज्यादा तीखी होती है ये उस खीर की तरह होती है जिसमे शक्कर तो बहुत होती है पर उसकी मिठास कहीं गुम हो जाती है। कठिन दौर था वो मेरे लिए एक तरफ मेरे करियर की मुश्किलें और दूसरी तरफ मेरे अपनो की मुझसे दूरियाँ। ऐसा लग रहा था जैसे किसी रास्ते पर एक ओर तूफान हो ओर दूसरी ओर तेज़ बारिश और बीच मे मैं था जो अकेले चला जा रहा था। लेकिन कहते है ना कि वक्त की
एक ख़ासियत होती है वक्त अच्छा हो या बुरा वो कट जाता है।
मुश्किलों भरे बादल अब धीरे- धीरे छटने लगे थे उम्मीद का राहत भरा सूरज नजऱ आने लगा था खुदको तराशने के लिए कभी इस शहर से उस शहर घुमा अलग- अलग लोगो के साथ काम किया बहुत कुछ सीखा मैंने और एक दिन बतौर आर्टिस्ट मुझे एक बड़ा कॉन्ट्रैक्ट मिला जिसके लिए मुझे उदयपुर आना पड़ा पिछले 12 साल से मैं यही रह रहा हूँ यहाँ की कला यहाँ की खूबसूरती सब कुछ मेरे मन मे बस गया है। एक आर्टिस्ट होने के तौर पर नई- नई चीजें सीखता रहता हूँ कुछ नया कुछ अलग करने की कोशिश करता रहता हूँ और जब थक जाता हूँ तो यहाँ आ जाता हूँ अच्छा लगता है कुछ देर यहाँ रुककर,  दिल और दिमाग की थकान कम हो जाती है और मन को थोड़ी राहत मिल जाती है।
 
 

ग़लती







कॉफी का मग हाथ मे लिए मैं अपनी छोटी सी बाल्कनी में आकर खड़ा हो गया ये मेरी रोज शाम की आदत है मुझे मेरे घर की ये जगह बड़ी प्यारी है यहाँ चार- पाँच गमले है जिनमे अलग- अलग किस्म के फूलों के पौधे लगे हुए है और एक तुलसी का पौधा भी है माँ कहती है कि तुलसी का पौधा घर मे होना चाहिए शुभ होता है यहाँ दो लेम्प भी है शाम के वक्त जब ये जलते है तो इसकी धीमी - धीमी रोशनी से मेरे घर की ये बाल्कनी और भी खूबसूरत लगने लगती है साथ ही यहाँ एक बहुत ही सुंदर वाइंड चाइम भी लगी हुई है हवा के टकराने पर जब ये अचानक बजने लगती है तो ऐसा लगता है जैसे मेरे दिल के तारों में बेवजह ही हलचल गई हो। कॉफ़ी का पहला घुट लेते वक्त भले ही मेरा मन बेचैन या परेशान हो लेकिन आख़री घुट तक मेरा मन शांत हो जाता है और मैं रिलेक्स फील करने लगता हूँ। शाम के वक्त कॉलोनी के ज़्यादातर लोग बाहर वॉक करते और बच्चे खेलते नज़र आते है मैं बाल्कनी में खड़ा सबको देखता रहता हूँ कोशिश करता हूँ उनके चेहरों को पढ़ने की उनके मन मे छिपी बातों को जानने की ताकि थोड़ा समझदार हो सकूँ।किसी ने जो कहा हम वो तो समझ लेते है पर जो नही कहा क्या उसे समझ पाते है किसी की अनकही बातों को जानना उसे समझना आसान नही होता और मेरे लिए तो ये और भी मुश्किल था मैं अपनी ही दुनिया मे था जहाँ मैं मेरे सपने और कामयाबी बस इसमें ही सिमटी हुई थी मेरी दुनियां। मुझे मेरे सपने पूरे करने थे अपनी मेहनत अपने जुनून और अपनी कोशिशों से मुझे हर वो मुश्किल रास्ता तय करना था जो मेरी मंज़िल तक जाता हो मुझे क़ामयाबी के शिखर तक पहुँचाता हो इसलिए तो दिल मे जोश और आँखों मे सपने लिए मैं आ पहुँचा दिल वालों की दिल्ली में। चार साल पहले जब मैं इस कॉलोनी में आया था तब सब अजनबी थे मेरे लिए और मैं उनके लिए लेकिन धीरे- धीरे सब मुझे पहचानने लगे और इसका ज्यादा श्रेय निम्मी आंटी को जाता है कैसे भूल सकता हूँ वो दिन मुझे दो दिन ही हुए थे यहाँ आये हुए मैं एक इन्टरव्यू के लिए जा रहा था सीढ़ियों से उतरते वक्त निम्मी आंटी मिल गईं।
ज़रा ठहरो तुम क्या नये आये हो हमारी बिल्डिंग में आंटी ने डराने वाले अंदाज़ में पूछा।जी मैंने कहा। अच्छा किस फ्लोर पर है तुम्हारा फ्लैट जी थर्ड फ्लोर पर ओह मेरा फोर्थ फ्लोर है ज़रा ये सामान ऊपर ले जाने में मेरी हेल्प कर दो बेटा बड़े मीठे से अंदाज़ में आंटी ने कहा मेरा मन तो नही था पर फिर मैंने उनकी मदद कर दी। वैसे बेटा नाम क्या बताया तुमने अपना जी अनघ बड़ा अच्छा नाम है और तुम भी अच्छे लड़के हो।निम्मी आंटी की वजह से ही सबको मेरा नाम मालूम हुआ और ये भी की मैं अच्छा लड़का हूँ और तब से ही निम्मी आंटी किसी न किसी काम में मुझसे हेल्प लेती रहती थी और मजबूरन मुझे हेल्प करनी पड़ती थी क्योंकि अच्छा लड़का जो था मैं। 
जब एक पँछी नई- नई उड़ान भरना सीखता है तो वो अपनी पहली उड़ान में ही आकाश तक नही पहुँच पाता कभी वो थोड़ा - थोड़ा ऊपर उड़ता है और कभी डगमगा कर गिर भी जाता है अभी मेरा हाल भी ऐसा ही था अपने सपनों की उड़ान भरते हुए मैं कभी थोड़ा ऊपर तक पहुँच जाता और कभी गिर भी जाता शुरू के दो साल मेरे लिए बहुत मुश्किल भरे रहे। माँ और पापा भले ही कानपुर में थे पर उन्हें मेरी फिक्र लगी रहती थी लेकिन निम्मी आंटी की वजह से ये फिक्र थोड़ी कम हो गई थी बहुत अच्छी है निम्मी आंटी , ख्याल रखतीं थी वो मेरा बिल्कुल मिंटू के जैसा। निम्मी आंटी का बेटा मिंटू उम्र में भले ही 12 साल का था लेकिन दिमाग़ उसका किसी 15 साल के लड़के की तरह था हर बात में दो कदम आगे। वैसे वक्त के साथ धीरे - धीरे आगे तो मैं भी बढ़ रहा था पर अभी अपनी मंजिल से दूर था। हमारे कल में क्या होने वाला है हमे कहाँ पता होता है हम जैसा सोचते है जैसा चाहते है वो उससे अलग होता है और हम उससे अनजान। वो सर्दी की सुबह थी मैं मॉर्निंग वॉक पर निकला था ठंड वाली सुबह की ठंडी- ठंडी हवा जैसे- जैसे मेरे हाथों से टकराती मेरे शरीर मे कपकपी सी छा जाती और मैं थोड़ा सा ठिठुर जाता पर अच्छा लग रहा था मुझे ऐसे ठिठुरना। अनघ भईया रुको तो मिंटू ने आवाज़ लगाते हुए कहा तुम रोज़ देर से ही क्यों आते हो वॉक पर जल्दी उठा करो ना अरे तुम लोगो की वजह से मेरा रूटीन ही बिगड़ जाता है मैंने थोड़ा खीजते हुए बोला मत रुका करो हमारे लिए हम थोड़ी कहते है पंखुड़ी ने मुँह बिगाड़ते हुए कहा। अच्छा अब चलें कहते हुए मिंटू हमारे आगे चल दिया और मैं और पंखुड़ी उसके पीछे - पीछे। पंखुड़ी निम्मी आंटी की भतीजी है अपनी इंटर्नशिप के लिए यहाँ आई हुई है हम दोनों की ज़रा कम ही बनती है हमेशा नोकझोंक होती रहती है। वॉक के बाद मैं घर आ गया और थककर सोफे पर बैठ गया बस कुछ मिनिट ही हुए की डोर बेल बज गई मैंने उठकर दरवाज़ा खोला सामने पंखुड़ी खड़ी थी डब्बा दिखाते हुए बोली ये बुआ ने भेजा है तुम्हारे लिए कहते हुए मेरे बिना कहे ही अंदर आ गई मैं उसे कुछ कहता कि उससे पहले मेरा मोबाइल बज उठा माँ का कॉल था मैंने पंखुड़ी को चुप रहने का इशारा किया और कॉल रिसीव किया माँ से कुछ देर बात हुई और ओके कहकर मैंने फोन रख दिया। क्या हुआ कोई प्रॉब्लम है हाँ पापा की तबियत ठीक नही है वो बीमार है पंखुड़ी के पूछने पर मैंने कहा। मैंने पंखुड़ी के हाथ से डब्बा लिया और उसे जाने को कह दिया पर पंखुड़ी गई नही उल्टा ये कहकर बैठ गई कि अगर अभी निम्मी आंटी होती तो क्या उन्हें भी जाने को कह देते थोड़ी ज़िद्दी थी पंखुड़ी। उस दिन एक दोस्त की तरह उसने मेरी उलझन को सुना समझा और मेरी उलझनों को सुलझाने की कोशिश भी की। बहुत मुश्किल होता है अपनी मंज़िल के करीब आकर वापस लौट जाना न जाने ऐसे कितने ख्याल थे जो मेरे अंदर चल रहे थे रातभर मैं फ़िक्र में ठीक से सो भी न सका और अगले दिन वापस कानपुर लौट गया।
ज़ोर - ज़ोर से बजती डोर बेल की आवाज़ ने मुझे अतीत से खींचकर वर्तमान में ला दिया वैसे इस तरह डोर बेल मिंटू ही बजाता है। मिंटू ही था गर्मा- गरम आलू के पराठे भिजवाए है आंटी ने मेरे लिए नही मेरी वाइफ के लिए। सात बज गए है पर तीनों अभी तक आये नही मैं वापस बाल्कनी मैं जाकर खड़ा हो गया और रास्ते की ओर देखने लगा लो तीनो नजऱ आ गए। जैसे ही वो घर में आये मैने बोलना स्टार्ट कर दिया कब से वेट कर रह हूँ मैं आप लोगो का मेरी किसी को कोई फिक्र है कि नही पँखु ने इतराते हुए कहा वो हम वॉक करते हुए ज़रा दूर निकल गए थे वैसे आइसक्रीम लाये है तुम्हे खाना हो तो ठीक है वरना हम तो है ही मेरी वाइफ को मुझे चिढ़ाने में बड़ा मज़ा आता है खैर मुझे चिढ़ाने लेने के बाद वो डिनर की तैयारी में लग गई और माँ - पापा वो हॉल में टीवी ऑन करके बैठ गए और वापस अपने फेवरेट जगह पर था अपनी बाल्कनी में। 
उस वक्त मैं कानपुर वापस तो गया था लेकिन कुछ दिनों बाद ही लौट आया माँ और पापा को साथ लेकर। जब मैं अपने सपनो को पूरा करने यहाँ कानपुर से यहाँ आया था पापा की तबियत तभी भी थोड़ी खराब थी लेकिन उनका ट्रीटमेंट चल रहा था और पापा ने कहा भी था कि वो ठीक है मुझे ज्यादा फिक्र करने की जरूरत नही है इसलिए मैं आ गया था वैसे भी मेरी बात होती रहती थी माँ- पापा से और वो ठीक भी हो गए थे। उस दिन जब पंखुड़ी के सामने माँ का कॉल आया था तब पापा की तबियत दोबारा खराब हो गई थी इतनी मेहनत इतनी इतनी कोशिशों के बाद मैं अपनी मंजिल तक पहुंचा था ऐसे में मेरा घर वापस लौटना मुश्किल था मैं कहीं न कहीं थोड़ा स्वार्थी हो रहा था लेकिन पंखुड़ी की कुछ बातों ने मुझे वो समझा दिया जो जरूरी था मेरे लिए कहा उसने तुमने वो सुना जो उन्होंने हमेशा तुमसे कहा लेकिन वो नही जो नही कहा। माँ और पापा से जब भी बात होती थी वो कहते थे हम ठीक है तुम फिक्र मत करना लेकिन मैं कभी न उनके मन की बातों को समझ पाया और न ही उनके चहरे को पढ़ पाया नही जान सका कि वो अकेले है उन्हें जरूरत है अपने बेटे के साथ की। कभी - कभी अपने सपनो को पूरा करने के लिए हम अपने अपनो की तखलीफ़ो की अनदेखी कर जाते है क्योंकि उस वक्त हमे सिर्फ वही दिखता है जो हम पाना चाहते है। अपनो को खोकर सपने पूरे नही किये जाते ऐसा पंखुड़ी ने कहा था। मैं माँ और पापा को अपने साथ ले आया एक साल तक उनका ट्रीटमेंट चला हम सबने मिलकर उनका ख्याल रखा इसी बीच मैने ये जाना कि माँ अकेले कितना कुछ सम्हाल रही थी। तब से माँ और पापा मेरे साथ ही है। बहुत मुश्किल वक्त था वो मेरे लिये 5 साल गुजर गए है पर सब कुछ ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात हो। अब सब कुछ ठीक है मैंने अपनी मेहनत से वो हासिल किया जो मैं चाहता था और माँ पापा को जब कभी उन्हें कानपुर के घर की याद आती है तो हम सब ही कुछ दिनों के लिए वहाँ चले जाते है वैसे भी पंखुड़ी को तो कानपुर वाला घर बड़ा ही अच्छा लगता है। पंखुड़ी ने मुझे वो गलती करने से बचा लिया था जो अक्सर सब कर जाते है अपनो को खोने की गलती। 
दिनभर का शोर रात को कैसे खामोशी में बदल जाता है मैं बाल्कनी में खड़ा यही सोच रहा था की मेरी फूल सी खूबसूरत वाइफ पंखुड़ी कॉफी ले आई आदत है मुझे डिनर के बाद कॉफी लेने की।

कच्ची कैरी



सूरज आसमान में धीरे- धीरे ऊपर चढ़ रहा था और सुबह अब दोपहर में बदल गई थी दोपहर की वजह से पेड़ कुछ अलसाये से हो गए थे हर एक पत्ती खोमोश थी जैसे कि सारे के सारे पेड़ सो गए हो और इतनी गहरी नींद में की मेरे आने का उन्हें एहसास ही नही हुआ क्या इतनी जल्दी भूल गए ये मुझे। आम बाग में मैं जब भी आता था तब आम के ये पेड़ हवा से झूमते नजऱ आते थे मुझे लगता मानो मेरे आने से ये मुस्कुरा रहे हो दादाजी के साथ मैं भी आम बाग का खूब ख्याल रखता था
आम बाग में जब भी कैरियाँ आतीं तो उसकी महक कुछ ऐसी फैलती की बाग से गुजरते लोगों के मुंह मे पानी आ जाता और मन कैरी खाने को ललचा जाता। वैसे हमारे आम बाग के आम का स्वाद आस - पड़ोस के लोगो को भी भरपूर मिलता था क्योंकि दादाजी कहते थे कि हर चीज़ मिलबांट कर खानी चाहिए फिर वो भले ही बाग के आम ही क्यों न हो। इसलिए बाग के आम सभी के घर पहुंचाये जाते थे लेकिन थी एक चोरनी जिसे कच्ची कैरियाँ चुराकर खाना अच्छा लगता था।
मेरी बचपन की दोस्त मीरु।
मानस इन आम के पेडों को ही देखते रहेगा कि अपने दादाजी से भी मिलेगा कापती सी आवाज़ में दादाजी ने कहा उनके बाल पहले से और ज्यादा सफेद हो गए थे, चेहरे पर झुर्रियाँ भी दिख रही थीं और अब वो छड़ी का सहारा लेकर चल रहे थे अरे देख क्या रहा है तेरा दादा अब बुढ़ा हो गया है मैं दादाजी के गले लग गया और थोड़ा सा इमोशनल हो गया। बचपन से ही मैं अपने दादाजी के बहुत करीब रहा हूँ अपनी हर बात सिर्फ दादाजी को ही बताता था अभी भी हम दोनों ने ढेर सारी बातें की और अपने सीक्रेट्स भी शेयर करें।आज बचपन से जुड़ी न जाने कितनी बातें याद आई और उन यादों में मीरु भी थी कैसी होगी वो।
सुबह- सुबह कोयल की आवाज़ कानों में जैसे कोई मीठा रस घोलती हुई सीधे मेरे मन तक जा पहुँची और मेरी आँख खुल गई। आज दादी ने मेरे लिए खीर बनाई और वैसे ही खिलाई जैसे बचपन में खिलाया करतीं थी आसमान में सूरज ऊपर चढ़ गया था अब दोपहर हो आई थी खिड़की के पास खड़ा होकर मैं बाग की तरफ ही देख रहा था मुझे अचानक पत्ते हिलते नजर आए ऐसा लगा जैसे कोई है वहाँ मैं जल्दी से बाग की ओर गया आसमानी रंग की साड़ी जिस पर सफेद फूल बने थे पहने एक लड़की थी जो पत्थर मार कर पेड़ से कैरियाँ तोड़ने की कोशिश कर रही थी कौन हो तुम बिना पूछे हमारे बाग में कैसे आईं वो मेरी ओर पलटी और बोली क्यों आपकी इजाज़त लेनी पड़ेगी। बड़ी - बड़ी आँखों वाली ये लड़की कुछ पहचानी सी लग रही है मीरु क्या ये मीरु है हाँ मानस तुम्हारे सामने खड़ी ये लड़की मीरु ही है मुझे पता चला कि बाग का पुराना पहरेदार आया हुआ है तो आ गई मैं। बचपन की आदत गई नही कैरियाँ चुराने ने की , तुम्हारी आदत भी तो नही गई चोर को पकड़ने की। जब बचपन के दोस्तों से मुलाक़ात होती है तो ऐसा लगता है जैसे हम अपने बचपन मे दोबारा लौट गये हो बचपन को याद करते हुए हम एक बार फिर उस पल को जी रहे थे मैं और मीरु।
बचपन में मीरु जब भी कैरियाँ तोड़ने आती तो मैं मीरु चोरनी को तुरन्त पकड़ने पहुंच जाता। दरसल आम बाग घर के पीछे ही है मैं और दादाजी खिड़की में से ही आम बाग पर नज़र रखे रहते थे मुझे पता रहता था कि मीरु कब आने वाली है तभी तो खिड़की में से देखते रहता और जैसे ही वो आती जाकर उसे पकड़ लेता दो - तीन बातें सुनाता चोरनी कहकर चिल्लाता और एक भी कैरी लेने नही देता बोल पहले खेलेंगी मेरे साथ तभी कैरी ले जाने दूँगा वो पहले लड़ती- झगड़ती और फिर उसे हाँ कहना ही पड़ता। हम दिनभर आम बाग में यहाँ - वहाँ खूब दौड़ लगाते साथ खेलते और फिर कैरियाँ भी तोड़ते कब दोपहर से शाम हो जाती पता ही नही चलता।
मोबाइल रिंग बजी तो मैं और मीरु वापस अपने वर्तमान में आ गये। मीरा के घर से कॉल था। मीरु सॉरी अब तो तुम बड़ी हो गई हो मीरा कल भी आओगी न। पहले तो मीरा ने कुछ सोचा और फिर हाँ कह दिया और जाते हुए बोली मानस तुम अभी भी मुझे मीरु ही कहो।
शाम गहरी हो रही थी और अंधेरे बढ़ रहा था मैं आँगन वाले झूले पर बैठा हुआ आसमान देख रहा था अभी आसमान एक दम खाली था एक भी तारा दिखाई नही दे रहा था और मैं आसमान में तारे ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा था पर मुझे मीरु की बात याद आ गई जब मैं स्कूल में कभी उसे मीरु कहता था तो कैसे गुस्सा हो जाती थी वैसे भी मीरु की हर बात में मुँह फुला लेनी की आदत थी हाँ अब हम थोड़े बडे हो गए थे वो फोर्टिन की हो गई थी और मैं फिफ्टीन का। आम बाग में बैठे हुए हम सिर्फ कैरियाँ ही नही तोड़ते थे बल्कि कभी - कभार पढ़ाई भी कर लिया करते थे उस वक्त हम बेस्ट फ्रेंड जैसे ही थे मीरु का मेरे घर भी आना - जाना रहता था क्योंकि मीरु की दादी भी मेरी दादी के गाँव से ही थी वो जब भी आतीं मीरु को साथ लातीं। दोनों दादियाँ बैठकर बातें करती रहती और मैं और मीरु झूले पर साथ में झूलते रहते पर ये साथ ज्यादा दिन का नही था मेरे टेंथ के एग्जाम होते ही मैं और मम्मी मुम्बई चले गए थे पापा के पास। अब 9 साल बाद लौटा हूँ वो भी सिर्फ कुछ दिनों के लिए।
जब किसी खास अपने से मिलने वाले हो तो वो इंतज़ार भी मीठा सा लगने लगता है क्योंकि मिलने की वो खुशी इतनी ज्यादा होती है कि इंतज़ार का समय भी छोटा लगने लगता है। कुछ देर से आम बाग में बैठा हुआ मैं मीरु का इंतज़ार कर रहा था सोच रहा था की उसे कितनी सारी बातें बतानी है कितना कुछ पूछना है। तभी मीरु आ गई मानस मीरु ने पुकारा लाइट पिंक कलर की साड़ी पहने मीरु मेरे सामने खड़ी थी तुम्हे अभी भी ये कलर पसन्द है मीरु, हाँ पसन्द है मेरे पूछने पर मीरु ने कहा। खूबसूरत लग रही हो मैंने छेड़ने वाले अंदाज़ में कहा थैंक्यू मानस मीरु ने इतराते हुए बोली। इसके बाद मैंने मीरु को बताना शुरू कर दिया कि यहाँ से जाने के बाद मैंने किस स्कूल में एडमिशन लिया किस कॉलेज में पढ़ाई की कहाँ जॉब करता हूँ अब मेरी नई- नई होबिस क्या है मेरे मुम्बई के दोस्त कैसे है मैं बोलता जा रहा था और मीरु चुपचाप बस मुझे सुन रही थी। मीरु बस सुनती ही जाओगी क्या? तुम भी तो कुछ बताओ। अच्छा बताओ अपनी मैरिड लाइफ में तुम खुश हो ना मीरु एक फिक्रमंद दोस्त की तरह मैंने पूछा उससे। धीरे से मुस्कुराते हुए मीरु ने कहा मानस मेरा डिवोर्स हो गया है। अजित ने मीरु को कभी एक्सेप्ट किया ही नही था वाईफ होते हुए भी वो कुछ नही थी उसके लिए क्योंकि वो अपनी ज़िंदगी किसी और के साथ जीना चाहता था जब मीरु की कोई भी कोशिश काम न आ सकी तो उसने अजित के फैसले को मंजूरी दे दी। एक मुस्कुराते हुए चेहरे के पीछे क्या है ये समझ पाना वाकई मुश्किल होता है। जब हम अपने बीते दुख के पलों को याद करते है या किसी से बयां करते है तो चहरे पर वो दर्द झलक आता है जो दिल मे छुपा होता है पर मीरु वो एक दम शांत दिख रही थी बिल्कुल किसी शांत बहती नदी की तरह। पक्षियों की चहचहाहट और पत्तियों की सरसराहट की आवाज शाम को झूले पर खामोश बैठा मैं साफ सुन पा रहा था। जब कोई भी रिश्ता टूटता है तो घायल हमेशा मन ही होता है क्योंकि हर रिश्ता दिल से ही जुड़ा होता है इसलिए रिश्ते के टूट जाने पर सबसे ज्यादा दुख भी दिल को ही पहुँचता है।
रात काफी गहरा गई थी पर मेरी आँखों से जैसे नींद कहीं गायब थी उस रात भी ऐसे ही जागता रहा था मैं। एक साल पहले, तब आने वाला था मै लेकिन जब फोन पर दादी ने कहा मीरु की शादी है तो मैं नही आ सका। अभी न मेरी आँखों मे नींद है और न ही मन में सुकून , है तो ज़ेहन में ढेर सारी बातें जो मुझे बेचैन किये हुए है समझ नही आ रहा है मैं क्या करूँ। दिल और दिमाग़ के बीच चलती लड़ाई में आखिर रात में मुझे  नींद आ ही गई। अब सिर्फ दो दिन रह गए है मेरे मुम्बई वापस लौटने में बीते तीन दिनों में मेरी मीरु से कोई बात नही हुई इसलिए मैंने खुद उसे कल मिलने बुला लिया।
सुबह - सुबह की पेड़ों की ठंडी हवा मेरे दिल और दिमाग को ठंडक पहुँचा रही थी मैं आम के पेड़ से कैरियाँ तोड़ रहा था ये सुबह - सुबह किसके लिए कैरियाँ तोड़ रहे हो मीरु ने पीछे से आवाज़ लगाते हुए पूछा मैंने पलट कर कहा तुम्हारे लिए।
अच्छा कहते हुए मीरु मेरे पास आ गई मैंने मीरु के हाथों को थाम लिया हाँ मीरु और मैं चाहता हूं कि मैं हमेशा ऐसे ही तुम्हारे लिए कैरियाँ तोड़ता रहूँ और तुम्हारे हाथो को ऐसे ही थामे रहूँ क्या दो अच्छे दोस्त अच्छे हमसफ़र नही बन सकते।
मीरु की ठहरी हुई पलकों और खामोश लब्ज़ों में छुपी हाँ को मैंने महसूस कर लिया था इस वक्त मैं और मीरु चुप थे लेकिन हमारी खामोशी वो बात कर रही थी। मौसम बदल गया तेज़ हवा चल रह थी पेड़ो से पत्ते टूटकर मुझ पर और मीरु पर गिरने लगे थे लग रहा था मानो, जैसे हमारे इस बदलते रिश्ते से खुश होकर वो हम पर बरस पड़ें हो।








एक दोस्त



पार्टी के बाद हॉल का जो हाल था वो बड़ा ही बेहाल था हॉल की हर एक चीज़ अस्त- व्यस्त थी क्या जरूरत थी ये पार्टी करने की देखा आपका काम और बढ़ गया मैंने नाराज़ होते हुए माँ से कहा।अच्छा तू कर तो रहा है मेरी मदद माँ ने मुस्कुराते हुए कहा हाँ पर आप प्रॉमिस करिये की आप सब अब कभी मेरे लिए पार्टी नही रखोगे आप जानती हो न माँ मुझे नही पसन्द अपना बर्थडे सेलिब्रेट करना कहते हुए मैं थोड़ा उदास हो गया। माँ ने प्यार से अपने हाथ को मेरी ओर बढ़ाया और मेरे गाल को छूते हुए बोली नही करेंगे कोई पार्टी खुश। मैंने पलके झपका दी। माँ और मैंने हॉल में हर एक चीज़ वैसे ही रख दी जैसे पहले रखी हुई थी अपने काम से फ्री हो जाने के बाद माँ तो अपने रूम में चली गयीं पर मैं यहीं बैठ गया कुछ देर इस खामोशी में बैठने को जी कर रहा था मेरा। कुछ वक्त पहले कैसे मैं सबसे घिरा हुआ था और अब एक दम अकेला हूँ । मेरे साथ अभी है तो सिर्फ ये खामोशी जो मुझे रास आने लगी है अच्छा लगता है मुझे अकेले बैठना खुद से बातें करना , खुद से सवाल करना और फिर उनका जवाब ढूंढना। नही पसन्द मुझे वो भीड़ जहाँ लोग झूठ के नकाब के साथ होते है। माँ ने पार्टी में मेरे कॉलेज फ्रेंड्स मेरे ऑफिस के कलीग्स सबको बुलाया और सब आये भी अपने कॉलेज फ्रेंड्स से तो मैं कितने वक्त बाद मिला पर फिर भी मुझे उनसे मिलकर न ज्यादा खुशी हुई और न ही मन को कोई सुकून मिला। कहते है कि सच्चे दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते है उनका हाथ हमेशा थामे रहना चाहिए ताकि जब भीड़ में आप अकेले पड़ जाएं तो वो हो आपके साथ आपका हाथ थामे हुए ये कहने को मैं हूँ ना यार जैसे शिवांश कहा करता था
मैं जब भी किसी प्रॉब्लम में पड़ जाता या मुझे जरूरत होती किसी के साथ कि तो कहता था वो क्यों परेशान हो रहा है मैं हूँ ना यार चल केंटीन चलते है चाय पीने तब मैं उसे घूरते हुए पूछता पैसे वो कौन देगा पैसे वो तो तू देगा ना वो सीरियस होकर कहता और फिर हँसने लगता। पर मैं मन ही मन गुस्सा करने लगता हमेशा मुझसे ही चाय के पैसे दिलवाता है खुद तो कभी देता ही नही है। ना जाने क्या खुशी मिलती थी उसे मुझसे पैसे दिलवा कर जबकि मेरे बर्थडे पर पार्टी वही देता था और मेरे क्लास में टॉप करने पर मुझसे ज्यादा खुश वो होता था।
कल रात मैंने हॉल में ही गुजारी कुछ देर अकेले बैठना चाहता था पर कब सोफे पर बैठे हुए मैं लेट गया मुझे भी पता नही चला और फिर आँख लग गई। मैं सुबह घर मे दस्तक देते सूरज के उजाले से नही बल्कि हम काले है तो क्या हुआ दिल वाले है हम तेरे तेरे चाहने वाले है पापा के रेडियो में चल रहे इस गाने से जागा। उन्हें ओल्ड सॉन्ग्स बहुत पसंद है और उनकी रोज़ सुबह ऐसे ही होती है गानो के साथ। वैसे मेरा सन्डे का कभी कोई प्लान नही होता पर न जाने क्यों फिर आज मन टेकरी जाने को कर रहा है बस मुड़ बना और मैं घर से निकल गया। ये पिकनिक स्पॉट ही है पर भीड़ यहां बारिश के मौसम में ज्यादा होती है ऊँचाई पर होने की वजह से यहां से शहर खूबसूरत नजर आता है नीले सफेद बादल भी यहाँ से पास दिखाई पड़ते है ऐसा लगता है जैसे हम ज़मीन से दूर और बादलों के करीब आ गए हों। मैं बदलों को निहार रहा था कि मोबाइल की रिग बज उठी फोन पर जयस था हेलो। हाँ अभिकल्प मिले तुम शिवांश से जयस ने पूछा। हाँ,  नही अच्छा सुन मैं टेकरी आया हूँ अपने कुछ फ्रेंड्स के साथ बाद में बात करते है कहकर मैंने फ़ोन काट दिया। कितना मुश्किल होता है ना जब कोई वो सवाल करले जिसका जवाब हम देना नही चाहते। एक महीने पहले मैंने ही जयस को कॉल किया था एक उम्मीद से और जयस वाक़ई बहुत अच्छा है उसने मेरी उम्मीद को टूटने नही दिया। इसके बाद मैं लखनऊ के लिए निकल गया खुशी और डर इस वक्त ये दोनों ही एहसास एक साथ मेरे मन में थे जैसे की दिल दो भागों में बट गया हो एक तरफ खुशी हो और दूसरी तरफ मेरे मन का डर। लखनऊ पहुँचने के बाद मैं उस जगह पर था जहाँ का एड्रेस मुझे जयस ने दिया था मैं दरवाज़े पर खड़ा हुआ सोच रहा था कि क्या होगा मुझे देखकर खुश होगा गले लग जायेगा या फिर नाराज़ होकर मुझसे मुँह मोड़ लेगा। हिचकिचाते हुए मैंने डोर बेल बजाई दरवाज़ा खुला मेरे सामने जीन्स और वाइट् टीशर्ट में एक शख्स खड़ा था जोकि शिवांश नही था।मुझे अपनी कहि बात याद आ गई मुझसे कभी नही मिलना और यही हुआ नही मिला वो मुझे मेरे आने से पहले ही वो लखनऊ छोड़ कर जा चुका था। मेरा हाल अभी उस पंछी जैसा था जो अपने साथियों से बिछड़ जाने पर उन्हें खोजने उड़कर दूसरे देस तो निकल जाता है पर जब तक वो पहुँचता है तब तक उसके साथी अपना खोसला छोड़ नई मंजिल की ओर निकल पड़ते है और पंछी अपने साथियों से मिल ही नही पाता रह जाता है अकेला मेरी तरह। एक हारे और निराश मन के साथ मैं घर वापस लौट आया। जयस अभी मुझसे सवाल करता क्यों नही मिल पाया कैसे क्या हुआ लेकिन मन नही था मेरा अभी किसी सवाल का जवाब देने का इसलिए फोन ही कट कर दिया।
शिवांश को ये जगह पसन्द थी मैं उसी के साथ तो टेकरी आया करता था बारिश के मौसम में ये जगह इतनी खूबसूरत हो जाती है कि यहाँ से जाने का मन ही नही करता। आसमान में छाए काले बादल एक साथ निकलता पक्षियों का छुंड हवा से  झूमते पेड़ भीगे हुए पत्थर और बारिश की बूंदे जो तुम्हे भी छूकर अपने आने का एहसास करा रही हो। तू हमेशा यहां क्यों आता है सुकून मिलता है मुझे यहाँ मेरे पूछने पर वो कहता था। शिवांश और मैं नेचर में अलग थे पर फिर भी हम अच्छे दोस्त थे वो शायद इसलिए क्योंकि वो हमेशा झुक जाया करता था मान लिया करता था मेरी हर बात और मैं अपने घमंड में खुश हो जाता था। आदत पड़ गई थी शिवांश से मुझे अपनी बातों को मनवाने की और अपनी तारीफ सुनने की। शिवांश मेरी हर बात में तारीफ़ किया करता था मुझे सराहा करता था फिर वो चाहे पढ़ाई को लेकर हो,
मेरी पर्सनालिटी को लेकर हो या अदर एक्टिविटीज को लेकर अभिकल्प तू हर काम में होशियार है यार। मैं बड़ा ही खुश हूं कि मेरा दोस्त इतना टेलेंटेड है वो मुझसे कहता और मैं अपने गुरुर के साथ मुस्कुरा देता। शिवांश बहुत फ्रेंक था आसानी से सबके साथ घुलना - मिलना आता था उसे इसलिए बाकी क्लासमेट के साथ भी थी उसकी दोस्ती पर उसका खास दोस्त मैं ही था मैं जब कभी कहता कि मुझे लाइब्रेरी में ही बैठकर पढ़ना है तब मन न होते हुए भी वो मेरे साथ बुक लेकर बैठ जाता पड़ता नही था बस पन्ने पलटता रहता उसे लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ना बिल्कुल पसंद नही था वो तो कॉलेज के गार्डन एरिया में आसमान के नीचे खुली हवा में बैठकर पढ़ना पसन्द किया करता था।
अब हमारे थर्ड ईयर के एग्जाम हो चुके थे और रिजल्ट आने वाला था मैं शिवांश से पहले कॉलेज आ गया था बहुत गुस्से में था मैं उस दिन।अभिकल्प रुकना क्या हुआ इतने गुस्से में क्यों लग रहा है देख शिवांश मुझे कुछ जरूरी काम है इसलिए मैं घर जा रहा हूँ प्लीज़ कोई सवाल मत करना तू ठीक तो है ना शिवांश ने पूछा पर मैं बिना कुछ कहे चला गया। ठीक ही तो नही था मैं। दो सालों से क्लास का टॉपर मैं था सही कहा है किसी ने की दोस्त के फेल हो जाने से ज्यादा दुख उसके टॉप कर जाने का होता है। मुझे भी हुआ। चाहकर भी मैं खुश नही हो पा रहा था अब धीरे- धीरे सब बदलने लगा था या फिर मैं। मैं और शिवांश अदर एक्टिविटीज़ मैं भी पार्टिसिपेट किया करते थे लेकिन आजकल शिवांश मुझसे बेहतर परफॉर्म कर रहा था जब सब उसकी तारीफ़ करते तो मैं होंठों से तो मुस्कुराता पर मेरा मन जैसे बैठ सा जाता। खटक रही थी ये बात मुझे की शिवांश मुझसे आगे निकल गया। मैं अपने आपको शिवांश से बहुत बेहतर मानता था और घमंड था मुझे अपने इंटेलिजेंट होने पर। इसलिए अब मैं मन ही मन शिवांश से जेलिस होने लगा था चिड़ने लगा था मैं उससे और शिवांश सब बातों से बेखबर था। उसके लिए मैं अभी भी उसका दोस्त था पर मेरे लिए वो मेरा कम्पेटिटर बन गया था जिससे मुझे आगे निकलना था हर हाल में। नोट्स छुपाना कुछ शेयर न करना रूढ़ बिहेव करना और तंज कसना कुछ ऐसा हो गया था मैं।
अब लास्ट एयर था कॉलेज में फेयरवेल पार्टी चल रही थी अपने मस्तीभरे अंदाज़ से पार्टी में रौनक शिवांश ही बिखेर रहा था शिवांश आज बहुत हैंडसम और डेशिंग लग रहा है पीहुँ ने कहा तो मुझे बुरा लग गया लाइक करता था मैं पीहुँ को। लेकिन उसे शिवांश अच्छा लग रहा था। ये वो वक्त था जब मेरे अंदर की जलन उफान पर थी यानी बाहर आने को रेडी थी शिवांश मेरे पास आया और अपने साथ डांस करने लिए कहने लगा बहुत खुश था वो, इसलिए मेरे मना करने पर भी मेरा हाथ पकड़ कर खिंचने लगा और मुझे गुस्सा आ गया
मेरे मन की नाराज़गी आज बाहर आ गई थी बहुत कुछ कह दिया था मैंने शिवांश को। शिवांश को छोड़कर बाकी सब मुझे हैरानी से देख रहे थे पर शिवांश क्यों नही ? एक सच्चा दोस्त अपने दोस्त की उलझनों को , परेशानियों को बिना कहे जान लेता है शिवांश को सब मालूम था लेकिन फिर भी वो चुप रहा।
समुद्र में जब तेज़ लहरें आतीं है तो ऐसा लगता है जैसे अपने साथ जाने क्या- क्या बहा लें जाएँगी लेकिन कुछ देर बाद वो शान्त हो जाती है एक दम खामोश। ऐसे ही मेरे अंदर भी सब कुछ खामोश हो गया था। पार्टी के अगले दिन मुझे जयस मिला बहुत भड़क रहा था मुझ पर गुस्सा किये जा रहा था क्योंकि मैंने उसके स्कूल फ्रेंड को दुख जो पहुँचाया था। जयस मेरा नही शिवांश का फ्रेंड है और वो उसे मुझसे ज्यादा अच्छी तरह से जानता है। जयस से मिलने के बाद मैं पूरे कॉलेज में शिवांश को ढूंढ रहा था पर शिवांश मुझे कहीं नही मिला। दौड़ता- भागता में टेकरी जा पहुँचा बैठा था शिवांश टेकरी के पहाड़ पर पैर लटकाये आसमान देख रहा था। शिवांश मैंने  पुकारा अभिकल्प तू यहाँ क्या कर रहा है कहते हुए शिवांश के चेहरे पर मुझे कोई नाराज़गी नजऱ नही आ रहा थी। मैं उसके गले लगकर रोने लगा और वो मुझे सम्हालने की कोशिश कर रहा था शिवांश एक प्रॉमिस करेगा हाँ बोल ना। उस दिन मैंने उससे वादा लिया और उसने वो पूरा किया। शिवांश ने पूरे कॉलेज में टॉप किया और चला गया मुझसे दूर। मैंने कहा था उससे की मुझसे कभी न मिले, अभिकल्प ने शिवांश से कहा था भला शिवांश अभिकल्प की बात कैसे नही मानता। वो हमेशा से मुझसे ज्यादा बेहतर था लेकिन मैंने कभी देखने की कोशिश ही नही की और न उसने जताने की।  मैं जब भी उससे स्मार्ट बनकर कोई सवाल करता तो वो जानबूझकर अंसर नही देता था बेवकूफ़ था मैं जो ये मान बैठता था कि मैं बड़ा होशियार हूँ जबकि ये शिवांश का बड़प्पन था। वो मेरे मन की उत्सुकता को भाप लेता था समझ जाता था कि मैं जवाब देना चाहता हूँ।इसलिए चुप रह जाता क्योंकि वो मेरे कॉन्फिडेंस को कम नही होने देना चाहता था। एक अच्छा दोस्त ऐसा ही होता है जो अपने दोस्त को ये एहसास न होने दे की वो उससे कुछ कम है।
मैंने शिवांश को खुद से दूर इसीलिए जाने को कहा क्योंकि अब खुद पर भरोसा नही था मुझे , कब किस बात पर मैं फिर से उससे जेलिस होने लगूँ या कब मेरे मन मे उसके लिए कड़वाहट आ जाये ये विश्वास खो चुका था मैं। जब एक दोस्त के मन मे अपने दोस्त के लिए जलन पैदा होने लगती है तो धीरे- धीरे वो उसे उसका दुश्मन बना देती है और एक सच्चा प्यारा रिश्ता हमेशा के लिए खत्म हो जाता है जो मैं नही चाहता था और साथ ही मेरी सज़ा भी यही थी कि मेरा सबसे अच्छा दोस्त मुझे छोड़कर चला जाये। शिवांश के जाने के बाद मैंने सबसे दूरी बना ली बिज़ी कर लिया खुदको अपने काम मे। सोचता रहता था कि शिवांश जहाँ होगा ठीक होगा। लेकिन मैं उसे बस एक बार देखना चाहता हूं मिलना चाहता हूं उससे,  कहना चाहता हूँ उसे की कितना मिस करता हूँ मैं अपने दोस्त को। क्यों परेशान हो रहा है मैं हूँ न यार चल चाय पीते है किसी ने पीछे से कहा मैं फ़ौरन पलटा शिवांश जयस के साथ मेरे सामने खड़ा था उसे अचानक अपने सामने देख  मेरी आँखें नम हो गई और जुबान खामोश शिवांश हँस पड़ा ये कहकर की पैसे तुझे ही देने होंगे।
जब हमारा सबसे अच्छा दोस्त जो हमसे दूर चला जाये और एक दिन अचानक वापस लौट आये तो उस खुशी को बयां कर पाना मुश्किल होता है उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। इतने साल बाद अपने दोस्त से मिलने की कुछ ऐसी ही खुशी को अभी महसूस कर रहा था मैं।





कुल्हड़ वाली चाय



गहरा घना जंगल जहाँ पेड़ो की पत्तियों पर ठहरा हुआ पानी ये बता रहा था कि बारिश होकर यहाँ कुछ वक्त पहले ही थमी है। पैरों की आहट किये बिना मैं होले से आगे बढ़ा और इस खूबसूरत सी नन्ही गौरैया को अपने कैमरे में कैद कर लिया। फुलों की , पत्तियों की, तितलियों की, मैं एक के बाद एक बहुत फ़ास्ट फ़ोटो क्लिक करता जा रहा था। कुछ देर तक यहाँ - वहाँ घूमकर मैंने और भी कई फोटोज़ क्लिक की। लेकिन काले गरजते बादलों का इशारा होते ही मैं और अविनाश वहाँ से निकल गए। हम गाड़ी में बैठे ही थे कि जोरों की बारिश होना शुरू हो गई। अविनाश गाड़ी ड्राइव कर रहा था और मैं उसके बगल वाली सीट पर बैठा था खिड़की से पानी अंदर आ रहा था तो मैंने काँच ऊपर चढ़ा लिया। बारिश की बूंदे शीशे पर पड़ती और बेह जातीं तेजी से पड़ती इन बूंदों की वजह से शीशे से कुछ दिख नही रहा था पर मैं फिर भी देखने की कोशिश कर रहा था सब कुछ धुंधला सा नजर आ रहा था कभी - कभी हम अपने अंदर भी कुछ देखने की कोशिश करते है कुछ तलाशते है पर वो साफ नजर नही आता धुंधला सा पड़ जाता है मैं यादों में कहीं खोने लगा था कि अविनाश ने गाड़ी रोक दी तेज़ बारिश अब हल्की फुआरों में बदल गई थी। अविनाश ने गाड़ी टी स्टॉल के पास रोकी वैसे मुझे चाय ज्यादा पसंद नही है पर अविनाश चाय का शौकीन है मेरे मना करने पर भी उसने मेरे लिए चाय बुलावा ली। हमारी टी स्टॉल फ़ेमस है सर एक बार चाय पियेगें तो टेस्ट भूल ना पायेंगे कहते हुए चाय वाले भईया ने कुल्हड़ हमारे हाथ मे थमा दिए। कुल्हड़ में चाय का टेस्ट अलग ही आता है। है ना अविनाश ने मेरी ओर देखते हुए कहा मैंने हाँ में सिर हिला दिया। चाय के दीवानों से पूछो की चाय क्या चीज़ है और कुल्हड़ में तो चाय का टेस्ट ही अलग है किसी की कही ये बातें मेरे कानों में गूंज उठी। तेजस चलें अविनाश ने कहा हम होटेल के लिए निकल गए खिड़की से मेरे चेहरे पर पड़ते ठंडी हवा के खोंके मेरी धुँधली हो चुकी यादों पे से जैसे पर्दा हटा रहे थे हम जा तो होटेल ही रहे थे पर मेरा मन किसी और रास्ते निकल पड़ा। हमारे दिल मे न जाने कितने राज़ होते है जिन्हें हम सबसे तो छुपा लेतें है पर खुद से नही छुपा पाते। एक सच जिससे हम भाग रहे होते है पर वो हर पल हमारे साथ होता है।
होटेल पहुँचने के बाद मैंने अपने मन को बहलाने की बहुत कोशिश की पर ऐसा हो ना सका। मैंने अपना फोटोग्राफी वाला बैग उठाया अलग - अलग तरह के कैमरे कुछ फोटोग्राफ्स और मेरी डायरी। मैं जहाँ भी जाता हूँ ये सब साथ लेकर चलता हूँ।
मैंने डायरी के उस पन्ने को खोला जब मैं शिमला गया था। इस पन्ने पर लगी ये फोटो बहुत खास है मेरी अभी तक कि ली हुई तस्वीरों में सबसे खूबसूरत।
तब मैं शिमला घूमने गया था अलग - अलग जगहों पर घूमना और फोटोग्राफी करना मेरा शौक है। हम दोनों दोस्त यानी मैं और अविनाश गये तो साथ में थे पर कुछ अर्जेंट काम की वजह से अविनाश को शिमला से दूसरे ही दिन लौटना पड़ा। पर मैं वही रहा क्योंकि मुझे तो शिमला घूमना था। दो दिनों में मैंने शिमला पूरी तरह तो नही देखा पर शिमला रिज़,  मॉल रॉड ,  ग्रीन वेली और भी कुछ जगाहों की सैर करली थी।आज शिमला में मेरा ये तीसरा दिन है शिमला की खूबसूरती को करीब से देखने मैं सुबह जल्दी अपने होटेल से पैदल ही निकल पड़ा। देवदार के पेड़ , बर्फ से ढके पहाड़, नीला आसमान और रोशनी बिखेरता सूरज सब कुछ बहुत सुंदर था। पैदल चलते हुए मैं थोड़ा दूर आ पहुँचा और थक भी गया इसीलिए जब चाय की शॉप नजर आई तो यहाँ आकर बैठ गया। चाय पीते हुए मैं कैमरे में अभी की ली हुई तस्वीरे देख रहा था कि मेरी आँखों पर कुछ चमका मेरे सामने अभी - अभी एक लड़की आकर बैठी जिसके गले का स्टार वाला लॉकेट मेरी आँखों पर चमक रहा था मैं अपनी जगह से थोड़ा आगे शिफ्ट होकर बैठ गया और दोबारा अपने कैमरे में देखने लगा पर अब मेरा ध्यान भटकर उस लड़की की बातों पर अटक गया। तुझे पता है मैं घर से भी चाय पीकर आ रही हूँ पर जब तक ये कुल्हड़ वाली चाय न पियूँ तो चाय का मज़ा ही नही आता और वो रेड दुप्पटा उसे धोते ही उसका पूरा प्रिंट निकल गया चलेंगे वो शॉप वाले भईया से लड़ाई करने। दुप्पटे का प्रिंट ये तो ऐसे बोल रही थी जैसे दुप्पटे का प्रिंट नही मानो दुनिया की वो चमक ही चली गई हो जिससे दुनिया खूबसूरत लगती है मैं ये सोचने लगा और वो फिर अपनी सहेली से बोली। कितनी बातें कर रहे थे ऐसा दुपट्टा वैसा दुपट्टा और देखा तूने कैसा निकला दुपट्टा। कितना बोले जा रही थी वो और मुझे उसकी बातों पर हँसी आ रही थी क्योंकि मैं चोरी से उसक चेहरे की तरफ भी देख रहा था उसके चेहरे के एक्सप्रेशन इतने कमाल के थे कि जिसे देख मेरी हँसी रुक ही न सकी और मैं ज़ोर से हँस पड़ा। मेरे ऐसे हँसने पर वो और उसकी सहेली दोनों मुझे घूरने लगी मैं डर गया कि कहीं शॉप वाले को छोड़ ये मुझसे ही न झगड़ बैठे पर जैसे ही वो मुस्कुराई तो बच गये मन मे कहते हुए मैंने लम्बी साँस खींची। अब मेरे दिमाग मे कुछ चल रहा था पूछूँ या न पूछूँ पूछ ही लेता हूँ आप शिमला से है मैंने पूछा तो उसने जी हाँ कहते हुए सवाल किया पर आप क्यों पूछ रहे है वैसे आप तो यहाँ के नही लगते। हाँ मैं शिमला घूमने आया हूँ यहां की कुछ फेमस प्लेसेस तो मैंने देख लिए है पर और भी तो अच्छी - अच्छी जगहें होंगी जहाँ मैं जा सकता हूँ मैंने कहा। हाँ बिल्कुल है कहते हुए उसने दो - तीन जगहों के नाम मुझे बता दिये। फिर मैंने एक - दो सवाल और किये और उसने उसका जवाब दिया फिर मैंने और पूछा , और उसने फिर बताया वो अपने शहर की तारीफ़ करे जा रही थी ठीक वैसे ही जैसे एक बच्चा अपने घर की तारीफ करता है मेरे घर मे ये भी है ऐसा भी है हाँ। उसका उसके शहर के लिए लगाव उसकी बातों में साफ नज़र आ रहा था। आधे घन्टे तक हम ऐसे ही बात करते रहे और फिर अचानक उसे कुछ याद आया और वो चली गई। आज में दिनभर खूब घुमा उसने जितनी तारीफ की थी वाकई हर एक जगह उतनी ही खूबसूरत थी।
अगले दिन मैं फिर उस चाय शॉप पर गया मेरी नींद जरा देर से खुली पता नही वो मिलेगी भी के नही। मैं जब पहुँचा तो बालों का जुड़ा बनाये हाथ में कुल्हड़ थामे बैठी थी वो वहाँ अपनी सहेली के साथ। हाय मैंने कहा अरे आप! वो पूछते हुए बोली। हाँ मुझे यहाँ की चाय अच्छी लगी इसलिए आज भी आ गया और आपको थैंक्स कहना चाहता था इसलिए भी।
थैंक्यू मुझे यहां के और भी प्लेसेस के बारे में बताने के लिये।
वो हल्की सी मुस्कुराई और कुछ नही बोली।
मैंने अपनी चाय ली और बैठकर आगे की प्लानिंग करने लगा  क्या- क्या बाकी रह गया,  और कहाँ जाना है, क्या लेना मैं सोचने लगा। तो आपने घूम लिया शिमला वो बोली , हाँ पर यहाँ का मार्केट अभी अच्छे से देखना चाहता हूँ कुछ और भी प्लेसेस घूमना चाहता हूं वैसे आप बुरा न माने तो आपका नाम जान सकता हूँ मैंने पूछा
प्यारी सी मुस्कुराहट के साथ उसने कहा तारा। तारा यानी स्टार नाइस नेम आय एम तेजस। ओह तेजस वो इस तरह बोली जैसे मेरे नाम से अच्छी तरह परिचित हो।
वैसे हम भी मार्केट जाने वाले है तारा की सहेली बोली ओह ग्रेट तो क्या मैं आप लोगो को जॉइन कर सकता हूँ दरसल मुझे फैमिली और फ्रेंड्स के लिए गिफ्ट्स भी लेने है तो शायद मेरी थोड़ी हेल्प हो जाए । तारा और उसकी फ्रेंड दोनों ने एक दूसरे को देख और फिर हामी भरते हुए अपनी पलके झपका दी।
आज का पूरा दिन फूल एंजॉयमेंट वाला रहा लोअर मार्केट , लक्कड़ बाजार, तिब्बितियन मार्केट,  फूड जॉन सबका फूल आनंद लिया और शाम तक तो तारा और उसकी दोस्त नीति
हम काफी घुल मिल गए जैसे कि अच्छे दोस्त हो और हमारी कोई पुरानी पहचान हो।अगले दिन मैं फिर चाय शॉप पर पहुँचा आज तारा अकेली ही चाय पी रही थी नीति वन वीक तक नही आएगी क्योंकि उसके घर मे कोई फैमली फंक्शन है। इसलिए वो अभी क्लासेस भी नही आ पायेगी। तारा ने मुझे बताया। तारा और नीति दोनों ही कॉम्पेटिटिव एग्जाम की तैयारी कर रही है। आज तारा नीति को मिस कर रही थी वैसे ही जैसे मैं अविनाश को कर रहा था। इसलिए उसका मुड़ ठीक करने के लिए मैंने अपने कैमरे में उसे शिमला की कुछ तस्वीरें दिखा दी बड़े ध्यान से वो एक के बाद एक सारी फोटोज़ देखती जा रही थी और मैं उसे। मेरी ट्रिप 5 दिनों की थी लेकिन पता नही क्यों मैं कुछ दिन और रुक गया। अब हर रोज़ की चाय मेरी तारा के साथ ही होती थी कुल्हड़ वाली चाय। तारा के साथ - साथ मैं भी चाय का शौकीन होने लगा था और वो कैमरे की शौकीन। हम देर तक साथ बैठकर बातें करते रहते और न जाने कितनी चाय पी लिया करते। चाय का हर एक घुट लेते हुए मेरे मन को न जाने कौनसी खुशी होने लगी थी। तारा के साथ एक बार फिर मैं शिमला घूमने निकल पड़ा और सब कुछ मुझे पहले से भी ज्यादा खूबसूरत नज़र आ रहा था। तारा न बेहद खूबसूरत थी और न ही स्टालिश। जींस के साथ सिंपल सी कुर्ती ,  कानो में बड़े से इयररिंग और बालों का जुड़ा कुछ ऐसा ही लुक रहता था उसका। तारा है तो आम लड़कियों जैसी पर उसकी बातें सबसे कुछ अलग ही थी जो मुझे अच्छी लगने लगी थी गरमा- गर्म चाट को चटकारे लेकर खाना
पानी पूरी का तीखा - तीखा पानी पी जाना मॉल की जगह मार्केट में घूम - घूम कर शॉपिंग करना वो भी पूरे मोलभाव के साथ जैसे तारा मैडम सब जानती है, आकाश में पंछियों को उड़ते देखना और शाम को निहारना पसन्द था उसे। शाम के वक्त बादलो का तेज सुनहरा और हल्का लाल रंग जिसके बीच सूरज का सफेद रोशनी के साथ चमकना ऐसा लग रहा था जैसे सुनहरे लाल बादलो के बीच उसे खुशी मिल रही और उस खुशी से वो चमक रहा है। जिसे मैं और तारा साथ मे देख रहे थे। इन सात दिनों में न जाने क्या कुछ बदल गया था मेरा दिल मेरे सपने मेरी आदतें जो कहीं न कहीं तारा से जुड़ने लगीं थी।
होटेल आकर मैं अपने कैमरे में तारा की कुछ तस्वीरें देख रहा था मुस्कुराती हुई , चाय पीती और अलग - अलग एक्सप्रेशन देती हुई मैं उसकी तस्वीरों को देखकर मुस्कुरा रहा था तभी मोबाइल की रिंग बज उठी फोन पर तारा थी। तारा क्या हुआ क्यों कॉल किया पहले खिड़की के पास जाओ। ओके आ गया। अब आसमान में चाँद को देखो और उसके पास वाले तारे को भी हाँ देख रहा हूँ तो बताओ वो दोनों साथ मे कैसे लग रहे है खूबसूरत मैंने तारा से कहा। उसने फिर पूछा वो आसमान वाला तारा तुम्हे ज्यादा पसंद है या फिर मैं। तुम। तारा ने मेरे दिल की बात को एक सवाल से जुबां पर ला दिया था खुश होते हुए तारा ने गुड़ नाइट कहकर फोन रख दिया। लेकिन मैं खिड़की के पास खड़े होकर आसमान में चाँद और तारे को ही देख रहा रातभर। शिमला में आज मेरा लास्ट डे है गुलाबों वाला बुके लेकर मैं तारा से मिलने पहुँचा। रोज़ की तरह वो चाय शॉप पर मेरा इंतज़ार कर रही थी तारा ये तुम्हारे लिए थैंक्स तारा इस अनजान शहर में मेरी इतनी अपनी बन जाने के लिए। उसने फिकी सी मुस्कान के साथ बुके लेकर अपने पास रख लिया आज वो ज्यादा कुछ भी नही बोल रही थी आख़री मुलाकात शायद ऐसी ही होती है जब शब्द हमारे अंदर ही रह जाते है और ज़बान खामोश हो जाती है होता है तो सिर्फ एहसास। मैं तारा से कुछ कहने वाला था कि मोबाइल स्क्रीन पर विशाखा का मैसेज दिखा।
उसके मैसेज को इग्नोर करते हुए मैंने तारा को सब कह दिया अपनी फीलिंग्स अपने जज़्बात और अपना सच।
सच कहना बहुत मुश्किल होता है और उसके दर्द को सह पाना उससे भी मुश्किल। आज पहली बार तारा ने मुझे गले लगाया ये कहते हुए की उसने मुझे माफ़ किया वो मुझसे नाराज़ नही है हम सब दिल के हाथों मजबूर हो जाते है क्योंकि इस पर हमारा कोई ज़ोर नही होता।
शाम को मैं शिमला से निकल गया अपने शहर के लिए लेकिन तारा के साथ बिताए हर लम्हे को मैंने अपने दिल मे कैद कर लिया हमेशा के लिए।
मैंने उसकी हर एक फ़ोटो अपने कैमरे से डिलीट कर दी। बस अपनी डायरी में ये तस्वीर लगा रखी है जिसमें हम दोनों के हाथ नज़र आ रहे है और हाथों में पकड़ा हुआ चाय का कुल्हड़। और उसका ये स्टार वाला लॉकेट आज भी मेरे पास है मैंने तारा को एक स्टार वाला लॉकेट गिफ्ट किया था तब उसने अपने गले से पुराना लॉकेट निकालकर मुझे दे दिया था। अपनी याद के तौर पर।
कभी - कभी सोचता हूँ कि ख़्वाइशों के परिंदे कितने आज़ाद होते है ना। जहाँ चाहे वहीं उड़ जाते है वो हमारी तरह किसी वादे या रिश्तों के आगे मजबूर नही होते बस आज़ाद होते है।
दिल जिसे चाहता है खुद उसकी ओर खीचने लगता है शायद इसीलिए विशाखा से इंगेजमेंट हो जाने के बाद भी मैं तारा से प्यार कर बैठा क्योंकि विशाखा तो कभी मेरे दिल मे थी ही नही। मैंने कभी चाहा ही नही था उसे। वो बचपन की दोस्त थी घर मे सबको पसन्द थी तो बस शादी के लिए हाँ कह दिया। तब नही पता था मुझे की मेरी ज़िंदगी मे कभी तारा भी आएगी और मेरे मन मे इस कदर बस जाएगी के किसी और के लिए वो जगह पाना नामुमकिन हो जाएगा। आज विशाखा मेरी वाइफ़ है जिसकी मैं बहुत केयर करता हूँ लेकिन मेरे दिल मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ तारा है एक चमकते तारे की तरह और इस सच को मैं कभी झुठला नही सकता बस इसे छुपाने की पूरी कोशिश करता रहता हूँ।










बारिश की बूंदे



पानी की छोटी - छोटी बूंदे जब आसमान से ज़मीन पर आकर गिरती है तो मौसम का मिज़ाज ही बदल देती है नमी के साथ हवाओं में ठंडक घुल जाती है और भीगती मिट्टी की सोंधी खुशबू मन मे किसी मिश्री की तरह घुल जाती है मन बड़ा ही मीठा मीठा सा हो जाता है। ये मीठा - मीठा सा मन चाय के साथ कुछ गरमा - गर्म मिल जाये इसकी ख़्वाईश करने लगता है। वैसे मेरी प्यारी वाइफ़ समीक्षा बहुत समझदार है वो मेरे मन को अच्छी तरह पढ़ लेती है तभी तो मेरे बिना कहे सब समझ लेती है इसलिए जब भी बादल गरजता है और पानी बूंदों में बरसता है तो वो किचन की ओर चल पड़ती है और फिर किचन से आती महक ये पैगाम मुझ तक लाती है कि सब्र रखो आपके मन की ख़्वाईश बहुत जल्द ही पूरी होने वाली है।
मैं तब तक खिड़की के पास जा खड़ा हुआ बारिश की बूंदे हवा के साथ खिड़की से अंदर आकर मुझे भी छू रही थी इन ठंडी बूंदों की छुहन मुझे अच्छी लग रही थी जैसे मन को कोई सुकून मिल रहा हो शायद इन बूंदों में कोई जादू है जिसके तन को छूते ही मन खुशी का अनुभव करने लगता है।
बाहर कॉलोनी के कुछ बच्चे बारिश में उछल - उछलकर भीग रहे थे कभी एक दूसरे के पीछे दौड़ लगाते तो कभी बारिश के पानी को हाथों में इकट्ठा कर एक दूसरे पर उछालते। हम भी तो ऐसा ही करते थे मैं मानसी और हार्दिक भईया।
जब भी बारिश होती हम तीनों घर के आँगन में खूब दौड़ लगाते और खूब भीगते , बारिश के ठंडे- ठंडे पानी मे भीगने का मज़ा ही कुछ और होता है और ठहरे हुए पानी मे छपाक- छपाक करने में तो मज़ा और दुगुना हो जाता है। माँ और दादी चाहे कितनी भी आवाज लगा ले पर जब तक मन न भर जाए हम बारिश में भीगते रहते और जब भीगते- भीगते देर हो जाती और पानी तब भी बरसता रहता तो मैं एक डिटेक्टिव की तरह पूछता भईया हम जब घर के शॉवर में देर तक नहाते है तो छत की टँकी खाली हो जाती है पर अभी कितनी देर से हम बारिश के पानी मे नहा रहे है पर पानी अभी भी आ रहा है आसमान की टँकी में क्या बहुत सारा पानी है।
तब भईया मेरी बात पर जोर से हँस पड़ते और किसी बड़े व्यक्ति की तरह समझदार बनते हुए कहते अरे बुद्धू
आसमान में कोई टँकी थोड़ी न है वहाँ तो बादलों में पानी भरा होता है बहुत सारा पानी, जो कभी खत्म नही होता तब मानसी भी अपनी आंखों को बड़ा कर भईया की हाँ में हाँ मिलाते हुए बड़ा सा हूँहूहूहू कर देती। उस वक्त तो मैं कुछ भी नही कहता पर मुझे भईया की बातों पर जरा भी भरोसा नही होता अरे इन्हें खुद भी ज्यादा कुछ मालूम नही है पर बनते ऐसे जैसे सब पता है मैं मन में यही सोचता, दरसल मुझे मैं अपने आप में बड़ा ही होशियार लगा करता था। इसलिए तो अपनी कागज की नाव मैं खुद ही बनाता था भईया और मानसी तो उनकी नाव को पानी से भरे टब में चलाते पर मैं तो अपनी नाव सड़क में जो गड्ढ़ा हो जाता है ना जिसमे बारिश से पानी भर जाता है उसी में चलाया करता था पता नही क्या खुशी मिलती थी मुझे गड्ढ़े में अपनी नाव दौड़ा ने में।
वैसे तो बारिश में घर से बाहर ही मज़ा आता है लेकिन जब झमा- झम बारिश धीमी- धीमी फुआरो में बदल जाती और बारिश में नहाते भीगते उछल - कूद करके मन भर जाता तो पूरे भीगे- भागे हम घर मे चले आते हम इतने भीगे रहते की हमे देखते ही दादी नाराज़ होने लगती भर गया मन के और भिगोगे बारिश में बताओ, अरे ठंड बैठ जाएगी बहु तो तुम्हे डाँटती नही बस ये कहते हुए तौलिया हमारे सिर पर रगड़ने लगती। हार्दिक भईया और मानसी दादी की बात सुनते रहते पर मैं मुझे तो रसोई से आती बड़ी अच्छी महक अपनी ओर खींच लेती मैं भीगा हुआ गीले कपड़ो में रसोई में जाता तो माँ
पकोड़े तलती नजर आती मैं उनकी साड़ी के पल्लू को पकड़ खुदको उसमे लपेट लेता और कहता माँ मेरे लिए बना रही हो ना माँ कहती नही तो , नही मेरे लिए ही बना रही हो ये कहते हुए थोड़ा इतरा कर उनका प्यारा बच्चा बनकर मैं माँ को लाड़ दिखाते हुए दोनों हाथों से उन्हें पकड़ लेता माँ मुझे पहले गोद में उठाती और फिर अपने पास बैठा लेती और अपने हाथ से मुझे प्याज के पकौड़े खिलातीं मैं बड़ा खुश होता। माँ के हाथों से बने प्याज पकौड़े और आलू पूरी मेरी फेवरेट थी दरसल मेरी ही नही हम तीनों भाई- बहन की ही फेवरेट थी माँ के हाथों से बने खाने का स्वाद ही अलग होता है जो किसी और के हाथो से बने खाने से कभी मैच नही हो सकता।
बचपन मे इसलिए भी मुझे बारिश की बूंदे बड़ी पसन्द थी क्योंकि जब आसमान से ये बूंदे बरसती तो माँ हमेशा हमारे लिए गरमा - गर्म पकौड़े जो तलती थी।
ये खिड़की में धुँआ क्यों नज़र आ रहा है ओह ! समीक्षा मेरी धर्म पत्नी गर्म चाय का कप लिए खड़ी है सॉरी समी मेरा ध्यान कहीं और था। वाह गरमा- गरम चाय उसके साथ पकोड़े भी मुड़ और भी अच्छा हो गया मेरी वाइफ़ के हाथों में जादू है मैंने समीक्षा की तारीफ करते हुए कहा तो समीक्षा मुस्कुरा दी। वो अपनी तारीफ़ से खुश होकर नही मुस्कुराई बल्कि मेरे इस तरह तारीफ़ करने पर मुस्कुराई क्योंकि वो अच्छी तरह जानती है कि मैंने जो भी कहा सिर्फ उसे खुश करने के लिए कहा वरना मुझे तो जादू माँ के हाथों में ही लगता है और सच कहूं तो ये बारिश की बूंदे मुझे माँ की याद दिलाती है उनके हाथों से बने पकौड़े आलू पूरी खाकर जो खुशी मिलती थी वो अब नही मिलती। मैं कभी - कभी सोचता हूँ कि हम क्यों बड़े हो गए कितना अच्छा होता कि हम छोटे ही रहते मैं भईया मानसी हम खूब मस्ती करते खूब उछल- कूद करते और माँ हमारे लिए आलू पूरी बनाती और उतने ही प्यार से हमे खिलाती जैसे बचपन मे खिलाया करती थी।
भले ही बारिश की ये बूंदे किसी को अपने प्यार मेरा मतलब अपने प्रेमी या प्रेमिका की याद दिलाती हो पर मुझे तो ये अपने परिवार अपने बचपन की याद दिलाती है सड़क के उस गड्ढ़े की भी जिसमे नाव चलाना मेरे लिए खुशी की बात हुआ करती थी।





अनकही बात



कल जब घर से कॉल आया तो पहली फ्लाइट पकड़ कर सीधा घर आ पहुंचा। ये बाहर वाला गेट अभी भी वही पुराना है खोलने पर आवाज जरूर करता है इतने दिनों में पापा ने इसे चेंज क्यों नही कराया । बाउंड्री वॉल के पास लाइन से अभी भी फूलों के पौधे लगे हुए है और ये अमरूद का पेड़ कितना बड़ा हो गया है जब इसमें पहली बार अमरूद आये थे तो कितना खूश हुआ था मैं। आज भी पेड़ पर चढ़कर अमरूद तोड़ने को जी कर रहा है मैंने अपनी शर्ट की बाहों को फोल्ड किया और पेड़ पर चढ़ गया कुछ अमरूद तोड़े की माँ बाहर आ गई ।
आशु बेटा आते ही अमरूद तोड़ने लगे। मैं मुस्कुराया और पेड़ से नीचे उतर आया। माँ मुझे देखकर खुश हुई पर मैं खुश न हो सका माँ के काले बाल सफेद हो गए थे और उनकी आंखों के नीचे काले घेरे आ गए थे ऐसा लग रहा है जैसे कई दिनों से माँ सोई न हो। पापा कहाँ है मैंने पूछा तो माँ ने कहा अंदर है अपने रूम में। हॉल में अपना बैग रख मैं पापा के रूम में चला गया उनसे मिलने। रूम में खामोशी सी छाई हुई थी खिड़की से होते हुए रोशनी कमरे में आ रही थी पर फिर भी थोड़ा अंधेरा सा था। पापा तकिये का सहारा लिए टिककर बैड पर बैठे हुए थे मुझे देखते ही बहुत खुश हो गए मेरी ओर पापा ने हाथ बढ़ाया तो मैंने उनका हाथ थाम लिया और वहीं उनके पास बैठ गया। आप ठीक है हाँ मैंने पूछा तो पापा ने कहा। लेकिन उनकी हाँ मुझे ना सी लग रही थी कितने कमज़ोर से लग रहे है पापा उनके चेहरे पर मुझे थकान नज़र आ रही थी कई मिलों अकेले चलने के बाद जब हम थककर ठहरते है तो
हमारी सारी थकान सिमट कर हमारे चेहरे पर आ जाती है और हमारा हाल बयाँ कर देती है पापा भी ऐसे ही लग रहे थे थके हुए। मैं कुछ देर पापा के पास बैठा रहा और वो सवाल करते रहे मैं कैसा हूँ मेरा ऑफिस का काम कैसा चल रहा है मैं अपना ख्याल रखता हूँ कि नही और भी बहुत कुछ।
शाम को डिनर के बाद अपने कमरे में बैठा हुआ मैं उसे गौर से देख रहा था सब कुछ वैसा ही रखा है मेरा डेक्सटॉप मेरी गिटार मेरी बुक्स मेरा हर सामान वहीं है जहाँ था।
कितना नाराज़ था मैं तब पापा से नही जाना चाहता था अपने घर से अपने शहर से दूर। लेकिन पापा यही चाहते थे कि मैं एक अच्छी यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी करूँ इसलिए भेज दिया था मुझे घर से सबसे दूर। मैं मन ही मन दुखी था कहना चाहता था कि मैं नही जाना चाहता पर नही कह सका। दिल्ली में मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की और फिर बैंगलोर चला गया। इन दस सालों में मैं घर नही आया। फोन पर माँ से बात होती रहती थी पर कुछ दिनों तक मैंने पापा से बात नही की थी क्योंकि मैं उनसे नाराज था कुछ वक्त तक घर से दूर दूसरे शहर में मुझे अच्छा तो नही लग रहा था पर धीरे- धीरे वहां की आदत हो गई। उसके बाद बैंगलोर में मैंने एक कम्पनी जॉइन करली और वही रहने लगा जैसे अपने घर अपने शहर को भूल ही गया। दो दिन पहले जब माँ ने फ़ोन पर कहा आशु बेटा कुछ दिनों के लिए घर आ जाओ मैं कुछ पल खामोश रहा न हाँ कहा और न ही ना कह सका अपना ख्याल रखना कहकर माँ ने फ़ोन रख दिया। मैं अपने कैबिन में बैठे हुए सोचने लगा कि मैं क्यों कुछ नही बोल पाया क्या मैं अपने घर नही जाना चाहता क्या मैं अब बदल गया हूँ वो आशुतोष नही रहा जिसे अपने घर अपने शहर से लगाव था। खुद से कई सवाल करने के बाद मैंने टिकिट बुक कराई और अपने घर आ पहुँचा। मैं एक सप्ताह के लिए आया हूँ चार रोज बीत गए है और मैंने ये महसूस किया कि मेरे आने से माँ - पापा बहुत खुश है और पापा की तबियत भी धीरे- धीरे ठीक हो रही है। इसलिये तो माँ ने मुझे बुलाया दरसल कुछ वक्त से पापा को कुछ हेल्थ प्रॉबलम्स होने लगी थी जिसकी वजह से माँ भी थोड़ी परेशान थी मेरे घर आने के बाद ही मुझे सब मालूम हुआ। वक्त ऐसे निकल गया जैसे कि हाथों से रेत। कल मैं चला जाऊँगा और सब कुछ मिस करूँगा माँ रोज मेरी पसंद का ही खाना बनाती है मैं रोज पापा के साथ बैठकर चेस खेलता हूँ
परसो चौपाटी भी गया था शहर की गलियां अभी भी मुझे पहचानती है सब कुछ उतना ही अपना सा है जितना पहले था। शाम को जब माँ मेरे पास आकर बैठीं तो मैं उनकी गोद मे सिर रखकर लेट गया वो अपने हाथों की उंगलियों से मेरे बालों को सहलाये जा रही थी मैं उन्हें अपने ऑफ़िस के बारे में बैंगलोर के बारे में बता रहा था वो सुनती जा रही थी मेरी हर बात को। माँ मुझे पैकिंग करनी है कल निकलना है ना। मेरे बालो को सहलाते माँ के हाथ कुछ पल के लिए रुक गए कुछ कहा नही पर शायद कुछ कहना था। शाम को डिनर के वक्त माँ - पापा दोनों ही ये जताने की कोशिश कर रहे थे कि वो खुश है शायद इसलिए की मैं फ़िक्र न करूं। रात को नींद नही आ रही थी तो उठकर बाहर आ गया। देखा तो माँ- पापा भी लॉन में थे मैं उन्हें देखकर वापस रूम में आ गया आज शायद उन्हें भी नींद नही आ रही। सुबह अपने सामान के साथ मैं जाने के लिए खड़ा था और टैक्सी का वेट कर रहा था पापा कह रह थे अपना ख्याल रखना ठीक से रहना माँ- पापा दोनों बहुत कुछ कह रहे थे और बार- बार मुझे देखे जा रहे थे। टैक्सी आ गई थी और अपना सामान रख मैं उसमे बैठ गया माँ की आँखे थोड़ी नम थी लेकिन फिर भी उन्होंने मुस्कुराते हुए मुझे बाय किया और पापा वो सिर्फ मुझे देख रहे थे ऐसा लगा जैसे पापा कुछ कहना चाहते थे पर नही कह पाए । जो पापा कह ना सके वो मैं समझ गया था इसलिए लौट आया। लौट आया अपने घर हमेशा के लिए।

पहला क्रश



ऑफिस से छुट्टी लेकर अगर शहर से बाहर कहीं घूमने निकल जाओ तो छुट्टी लेने की खुशी दुगुनी हो जाती है जैसे कि मै।बस एक घन्टे में मैं विन्नी के घर पहुंच जाऊंगी। लेकिन उससे पहले ही टैक्सी में बैठे- बैठे रास्ते को देखते हुए विन्नी को लेकर मेरे मन मैं कितने ख्याल आया रहे है अब तक हल्दी तो लग गई होगी विन्नी को ,चेहरा तो खूब दमक रहा होगा और आंखे तारो से भी तेज़ चमक रही होंगी। फोन पर कितना नाराज़ हो रही थी अब फुर्सत मिली मुझसे बात करने की मेरी शादी है और तुम्हे अपनी दोस्त की फिक्र ही नही। विन्नी जी आ रही हूं मैं कल शाम तक पहुँच जाऊंगी मैंने विन्नी से कहा तो वो खुश हो गई। ये मेरी बहुत प्यारी और जल्दी रुठ जाने वाली दोस्त है पर मनाने पर मान भी जल्दी जाती है कितने वक्त से मैं खुद भी भोपाल आने का सोच रही थी किसी न किसी वजह से मेरा आना टल जाता लेकिन विन्नी की वजह से ये पॉसिबल हो ही गया। गाड़ी का ब्रेक लगते ही मेरे दिमाग मे चल रही बातों पर भी ब्रेक लग गया मैं गाड़ी से बाहर आई अपना सामान लिया और विन्नी विन्नी करती घर के अंदर आ गई हाथो में मेहंदी लगाये विन्नी हॉल में आई और खुश होकर मेरे गले लग गई मेरा सारा सामान विन्नी ने अपने रूम में ही रखवाया ताकि मैं उसके साथ रह सकूँ। क्योंकि शादी वाला घर है तो काफी देर तक सब जागते रहे नाचना- गाना , मौज- मस्ती लेकिन मैं तो सफर से थकी हुई थी और आंखों में नींद भी भर आईं इसलिए रूम में चली आई नींद लगने वाली थी कि धीरे से विन्नी कानो में फुसफुसाई बानी सो गई क्या। मैं जानती थी कि विन्नी को मुझसे ढेर सारी बातें करनी है इसलिए अपनी नींद को बाय कहते हुए मैं उठकर बैठ गई फिर विन्नी ने खूब बातें की
अपने होने वाले हसबैंड की , वो कौनसा लहंगा पहनेगी, रिश्तेदारों की , इसकी - उसकी न जाने कितनी बातें रात के 2 बज गए पर बातें है कि खत्म ही नही हो रही थी और बात आई आर्ट्स क्लासेस की जहाँ विन्नी और मैं पैंटिंग सीखा करते थे। विन्नी ने बताया कि आर्ट्स क्लासेस के सभी फ्रेंड्स को इन्विटेशन दिया है साथ ही शरारती अंदाज में बोली साहिल को भी। मैं समझ गई की ये मुझे छेड़ रही है इसे पता है कि वो मेरा पहला क्रश था। इसके बाद बातें करते हुए विन्नी तो सो गई पर मैं जागी रह गई। साहिल के नाम से फिर मन मे गुदगुदी सी हो गई ठीक वैसे ही जैसे तब उसे देखकर होती थी। साहिल के सामने आते ही न जाने क्या हो जाता था कि मेरे हाथों का पेंटिग ब्रश कुछ इस तरह कैनवास पर चलता की कुछ अलग ही आकृति उकेर देता रंगों को कुछ ऐसे आपस मे मिला देती की खुद मैं ही नही समझ पाती की कौन सा रंग किस रंग में मिला है और ये क्या नया रंग बना है  जबकि बनाने में कुछ और जाती थी और बन न जाने क्या जाता था मैं अपनी ही पैंटिंग को देख मुस्कुराने लगती और चुपके से एक नजर साहिल को देख लेती क्या उसने मेरी पैंटिंग देखी हँस रहा होगा न देखकर भले ही जनाब ने तिरछी नजर भी न देखा हो पर मैं खुद से ही सब मान लेती।
जब कभी रीता दी अपने क्लासमेट विनीत के बारे मैं मुझे बताती थी तो मैं यही सोचा करती की ये क्रश व्रश जैसा भी कुछ होता है क्या। लेकिन जब साहिल को पहली बार आर्ट्स क्लास में देखा तो जैसे कुछ हुआ रीता दी के जैसे मेरी आँखें भी जरा तेज चमक उठी और अब ये चमक रोज ही मेरी आँखों मे रहती। उस 5 फुट 6 इंच वाले गोरे लड़के में जाने क्या था कि वो मेरा ही नही क्लास की ओर लड़कियों का भी क्रश बन गया था साहिल की आंखे काली नही थी हल्की भूरी थी जोकि मुझे अच्छी लगती थी या अब लगने लगी थी। मेरे इस पहले पहले क्रश का असर बहुत ज्यादा हुआ था मुझ पर।
साहिल के क्लास में आने का इंतजार करना,  चोरी- चोरी उसे तकना ,बेवजह मुस्कुराना , उसके ख्यालों में खो जाना , धीरे- धीरे गुनगुनाना पहला नशा पहला खुमार। सब कुछ पहली बार ही तो था एक अलग एहसास जिसमे खुशी की नयी महक थी।
अच्छा लग रहा था मुझे इन पलो में जीना। मैं जब भी कोई पैंटिंग बनाती और ब्रश में अलग - अलग रंगों को लेकर कैनवास पर चलाती तो ऐसा लगता जैसे हर रंग मुझमे ही घुल रहा हो और क्लास में जब कभी साहिल मेरे करीब से गुजर जाता तो मानो जैसे ठंडी हवा का कोई झोंका मुझे छूकर निकल गया हो जिसकी ठंडक ने मेरे मन को भी शीतल कर दिया हो । साहिल के चक्कर में मैं तो बावरी ही हो गई थी। उम्र भी तो कम थी सिर्फ 21 की ही तो थी तब समझ तो ज्यादा होती नही है पर तमन्नाएं जरूर होने लगती है। कुछ अंजानी सी ख्वाइशें जो दिल मे जगह बनाने लगती है। उस वक्त साहिल को देखकर मुझे जितनी खुशी होती थी उतनी तो अपना बर्थडे सेलिब्रेट करने पर भी नही होती थी। और जब कभी साहिल मेरी ओर देख लेता तो वो दिन मेरे लिए लक्की डे बन जाता।
वैसे साहिल थोड़ा अकड़ू सा था किसी से बात नही करता था
पर पैंटिंग जरूर वो अच्छी करता था और पेंटिंग करते वक्त उसके चेहरे के एक्सप्रेशन इतने बदलते कि कोशिश करते हुए भी मैं कभी समझ ही नही पाई की उसके माइंड में क्या चल रहा है कभी तीन - चार रंगों को मिलाकर कैनवास पर तेज़- तेज ब्रश चलाने लगता तो कभी अपने हाथों को रोक लेता फिर कुछ सोचने लगता तो कभी अपनी नज़रों को घुमाकर आसपास  देखने लागत मेरा आधा समय तो उसे देखने मे ही निकल जाता। खटपट की आवाज आई तो मैं अपने बीते कल से बाहर आ गई घड़ी में 5 बज रहे थे मैं आंख बंदकर सो गई। अगले दिन दिनभर सभी लोग किसी न किसी काम मे व्यस्त रहे लेकिन विन्नी वो तो फिर शुरू हो गई बानी तुझे क्या लगता है साहिल अभी भी वैसा ही लगता होगा और क्या पहले जैसा अकड़ू होगा या बदल गया होगा मैंने कुछ नही कहा बस चुप रही।शाम होते ही सब शादी वाले गेटअप में आ गए दुल्हन भी रेडी थी और मैं भी तैयार , पर मुझे बारात का नही साहिल का इंतज़ार था दूल्हा दुल्हन स्टेज पर थे मैं विन्नी के पास ही खड़ी थी जब मैंने उसे आते देखा तो धीरे से विन्नी से कहा देख साहिल आ गया। वो अभी भी वैसा ही लगता है पर उतना अकड़ू नही है थोड़ा बदल गया है। विन्नी ने अपनी भोहों को उचकाते हुए पूछा तुझे कैसे पता। मैं जोर से मुस्कुरा दी। एक साल पहले एक पेंटिंग एग्सीविशन के दौरान हमारी मुलाकात हो गई थी साहिल और मैंने साथ बैठकर बहुत देर तक बातें की और तभी बातों ही बातों में जब आर्ट्स क्लासेस की लड़कियों की बात निकली तो हँसते हुए मैंने कह दिया उन्ही को नही मुझे भी क्रश हो गया था बस तब से ही हमारी मुलाकातें होती रहती है। और सीक्रेट ये है कि मुझे फिर से उससे क्रश हो गया है। और शायद उसे भी।






अंग्रेजी




टेबल पर पड़े हुए इस लेटर पर बार- बार मेरी नजर जा रही है मन हाँ और ना दोनों में ही जवाब दे रहा है। दरसल ये लेटर मेरे कॉलेज से आया है कॉलेज में एक फंक्शन है जिसमे कुछ पुराने स्टूडेंट्स को भी बुलाया गया है मेरा बहुत ज्यादा मन तो नही है क्योंकि मैं नही जाना चाहता। फिर कुछ देर बाद जाने क्या दिमाग में आया कि मेरा मन अचानक ही मान गया।
सुबह सूटबूट डटाकर अपने आप को आईने में कई बार देख लेने और खुद से ये पूछ लेने के बाद कि लग रहा हूँ न स्टाइलिश बन्दा, मैं कॉलेज के लिए निकल गया न जाने कितनी पुरानी यादें ताजा हो जाएंगी कुछ मीठी और कुछ कड़वी यादें। कॉलेज में इंटर होते ही मैं पहले प्रिंसिपल से नही मिला क्योंकि मेरे कदम तो क्लासरूम की ओर मुड़ गए थे वही क्लासरूम जिसमे दौड़कर सबसे पहले मैं ही जाता था। 
अंदर पैर रखते ही लगा जैसे फिर से संजू ही क्लास में एंटर हो रहा हो अपने उसी अंदाज में बोलते हुए मैं आई कम इन मेम। 
मुझे आज भी वैसे ही लग रहा है जैसे कि मैं फिर से पहली बार आ रहा हूँ पर कुछ बदला सा नही लग रहा वही ढेर सारी लाइन से रखी बैंच- डेस्क आज भी पेन से इन पर कुछ लिखा हुआ है ब्लैकबोर्ड वो भी पहले जैसा ही है। और दीवारों पर स्टूडेंट्स के तैयार किये पोस्टर्स लगे हुए है। आगे बढ़ते हुए मैं लास्ट रो की उस पीछे वाली बैंच के पास आ खड़ा हुआ हूँ इस पर थोड़ी धूल दिख रही है लगता है कि शायद इस लास्ट बैंच पर अब कोई नही बैठता। मैंने अपनी उंगलियों को उस धूल पर चलाते हुए संजू लिख दिया। मैं इतने गौर से इस क्लासरूम को देख रहा था किेे मुझे चारों ओर बीते वक्त की तस्वीरें नजर आने लगी वो सारे मेरे क्लासमेट्स , मेरे दोस्त , मेरे टीचर्स सब कुछ।
बाहर से आता स्टुडेंट्स का शोर जैसे ही कानो में पड़ा तो याद आया की मुझे तो ओडिटोरिम की ओर जाना है मैं वहां पहुँचा  बिल्कुल एक प्रोफेशनल पर्सन की तरह प्रिंसिपल से मिला और गेस्ट सीट पर जा बैठा जहाँ पहले से मेरे कुछ पुराने परिचित बैठे हुए थे। सूरज , लतिका , आदेश , ऋषि ,रुपाली , जयस , सीमा। जयस और सीमा कॉमर्स वाले थे सूरज ,लतिका , और रुपाली ये मेरे क्लासमेट थे ऋषि और आदेश ये दोनों मेरे सीनियर। लतिका ने मुस्कुराकर मेरी ओर देखा तो मैंने भी उसकी मुस्कुराहट का जवाब अपनी स्माइल से दे दिया।
मुझे कॉलेज का वो पहला दिन याद आ रहा है जब मैं क्लासरुम के बाहर खड़ा अपने टीचर से पूछ रहा था मैं आई कम इन तब पता नही क्यों कुछ स्टुडेंट्स मुझ पर हँस पड़े।
पर मैं तो अपने कॉलेज के पहले दिन को लेकर इतना खुश था कि मैंने किसी बात पर कोई ध्यान नही दिया सीधा लास्ट वाली बैंच पर जा बैठा क्योंकि पूरी क्लास फुल थी और लास्ट सीट ही खाली थी। टीचर ने पढ़ाना शुरू किया वो हर टॉपिक को बारीकी से बता रही थी कभी बुक में दिखाकर कुछ समझाती तो कभी बोर्ड पर लिखकर या ड्रॉ करके हमे बतातीं सारे  स्टूडेंट्स अपने सिर को हिलाकर ये जता रहे थे कि वो सब समझ रहे है पर मुझे तो कुछ समझ नही आ रहा था लेकिन सबको देखकर मैं भी सिर हिलाने लगा। बड़ा ही भयंकर दिन था ये मेरे लिए हर बेल के बाद दूसरे टीचर आते पढ़ाते और चले जाते। वो क्या कहते मुझे कुछ समझ ही नही आता क्योंकि वो अंग्रेजी में कह रहे थे। मैं तो बचपन से ही अपने गाँव के हिंदी मीडियम स्कूल में पढ़ा हूँ मुझे टूटी- फूटी अंग्रेजी पढ़ना आती है पर समझ पाना मेरे बस के बाहर था। एक दिन पहले मैं जितना खुश था आज उतना ही परेशान क्योंकि सब कुछ अंग्रेजी में ही पढ़ना था और अंग्रेजी में ही लिखना था
मेरे लिए तो बड़ी चुनौती ही थी। अब मेरा हाल ये था कि मैं क्लास में सबसे पहले आता और सबसे पीछे जाकर बैठ जाता क्योंकि मुझे डर लगता था डर इस बात का के कहीं टीचर ने मुझे खड़ाकर कुछ पूछ लिया तो मैं क्या करूँगा। करीब एक सप्ताह बीत गया अब तो मेरा एक दोस्त भी बन गया मोहन जोकि मेरे ही जैसा था। लेकिन मैं कोशिश कर रहा था क्लास में कोई ऐसा दोस्त बनाने की जो मेरी अंग्रेजी में मदद भी कर सके पर मेरी भाषा मेरा पहनावा उनसे अलग था और इसलिए मैं उनके लिए एक फुलिश बॉय था कोई मुझसे बात करने में इंट्रेस्टेड नही था और अगर कभी कोई मुझसे बात करता तो भी सूरज और रुपाली जोकि क्लास के एक्स्ट्रा स्मार्ट स्टूडेंट्स थे ये उनको बड़ा ही खटकता इसलिए वो कभी मेरा मजाक उड़ाते तो कभी कुछ तंज सा कसकर चले जाते जिसकी वजह जो मेरे साथ होता वो भी मुझसे दूर हो जाता।
न तो मैं स्टाइलिश था और ना ही मैं अंग्रेजी में गिटपिट कर पाता था सूरज और रुपाली को लगता था कि उन जैसे स्मार्ट स्टूडेंट्स के बीच मैं कहाँ से आ गया और इसलिए वो मुझसे चिड़ते थे।
कॉलेज में एक इवेंट रखा गया था जिसमे अलग- अलग कॉम्पटीशन में स्टूडेंट्स ने पार्टिसिपेट किया मैं सरप्राईज़ तब हुआ जब नोटिस बोर्ड पर बाकी स्टूडेंट्स के साथ मैंने अपना नाम भी देखा।
मिस्टर संजय सोनी प्लीज़ कम ऑन स्टेज पुकारा गया मैं एक गेस्ट के तौर पर आया हूँ तो मुझे कुछ शब्द तो कहने पड़ेंगे बस आज मैं फर्स्ट हूँ क्योंकि सभी गेस्ट में मुझे ही सबसे पहले बुलाया गया अपने बारे में कुछ कहने के लिए अपनी सक्सेस के बारे में बताने के लिए मैं 20 मिनिट तक लगातार बिना अटके बोलता रहा कुछ स्टूडेंट्स ने कुछ सवाल भी करें मैंने सरल शब्दों में उनका अंसर दिया और लास्ट में हिंदी मैं बस इतना कहा धन्यवाद। पूरा ऑडिटोरियम तालियों से गूंज उठा।
ये वही जगह है जहाँ कभी सब मुझ पर हँस रहे थे उस दिन इवेंट में मुझे अपने कॉलेज , अपनी स्टूडेंट लाइफ पर ही तो बोलना था वो भी सब इंग्लिश में। मेरा नाम कॉम्पिटिशन में सूरज ने लिखाया था मैं अपने टीचर के पास अपना नाम हटाने को कहने जा रहा था क्योंकि मैं अच्छी तरह जानता था कि अंग्रेजी में मेरा डब्बा गुल है तब आदेश और ऋषि जोकि मेरे सीनियर थे उन दोनों ने मुझे रोक लिया ये कहकर की वो मेरी हेल्प करेंगे।
और उन्होंने मेरी हेल्प की भी। चार दिनों तक उन दोनों ने मेरी प्रैक्टिस कराई और कंटेंट भी उन्हीं ने तैयार किया। और जब मैं स्टेज पर आने से डर रहा था तब मेरा हौसला बढ़ाते हुए उन्होंने मुझे स्टेज पर पहुँचाया। और फिर मैंने अटक - अटक कर पढ़ना शुरू किया मैं घबराहट के साथ कभी अपनी साँसों को तेजी से खिंचता तो कभी एक साथ सांसो को छोड़ देता मानो अपने डर को बाहर निकाल रहा हूँ और जैसे ही पन्ने की लास्ट लाइन पढ़कर थैंक्यू कहा सब जोर- जोर से हँसने लगे मैं आँखे झुकाकर वहां से बाहर आ गया तब लतिका ने मुझे बताया कि सब सिर्फ मेरी अटकती इंग्लिश पर ही नही बल्कि जो मैंने पढ़ा उस पर भी हँस रहे थे क्योंकि उसमें शब्दो की हेरा- फेरी थी। बाद में पता चला कि आदेश और ऋषि सूरज के फ्रेंड है। अब कुछ और जानने की जरूरत थी ही नही। अगले दिन लायब्रेरी के बाहर ऋषि और आदेश जब मुझसे टकराये तो मेरे पास आकर बोले सॉरी यार हम तो बस छोटा सा मजाक कर रहे थे तुम्हे हर्ट करने का कोई इरादा नही था हमारा ,सॉरी। तब मैंने उनसे कुछ नही कहा , कहा तो बस खुदसे
कुछ गलत नही है मुझे अंग्रेजी नही आती बस इतना ही गलत है।
आज मेरी नजर झुकी हुई नही है और न ही कोई मेरी अंग्रेजी पर हँसने वाला है आय एम इंग्लिश ट्रेनर। कितने लोग आज मेरे इंस्टीट्यूशन में सिर्फ इंग्लिश सीखने आते है संजू से अंग्रजी सीखने।
अंग्रेजी मेरे जैसे कई लोगो के लिए एक समस्या है जो कि मुश्किलें खड़ी करती है सिर्फ भाषा के न आने से हम लोगो के लिए अलग हो जाते है जो अंग्रेजी बोलता है वो इंटेलिजेंट है और इससे उसे सम्मान मिलता है ये कुछ बहुत समझदार लोगो का नज़रिया है और 'शायद संजय को भी यही लगता है पर संजू को नही'।





कभी - कभी




        कभी - कभी जाने क्यों कुछ अजीब लगता है
        कभी सब सही तो , कभी गलत लगता है।
        कभी सब अपना तो, कभी पराया लगता है।
        कभी अच्छा तो , कभी सब बेकार लगता है।
        कभी कोई पास तो , कभी दूर लगता है।
        कभी जाना कोई तो , कोई अनजाना सा लगता है।
        कभी सब सच तो , कभी सब झूठ लगता है।
        कभी मुश्किल कुछ तो , कुछ आसान लगता है।
        कभी कोई खुश तो , कोई कभी नाराज़ सा लगता है।
        कभी मन उत्साहित तो , कभी हताश लगता है।
        कभी दिन नया तो , कभी वही पुराना सा लगता है।
        कभी कुछ भागता हुआ तो , कभी ठहरा सा लगता है।
        कभी जैसे कैद तो , कभी आजाद सा लगता है।
        कभी हर पल ख़ुशनुमा तो , कभी उदास लगता है।
        कभी - कभी जाने क्यों कुछ अजीब लगता है।
       
        

माफ़ी



सूरज ढल गया था शाम धीरे- धीरे गहरा रही थी तेज रफ़्तार से दौड़ती मेरी कार में एफ एम रेडियो ऑन था एक के बाद एक लेटिस्ट सॉन्ग चल रहे थे मैं सॉन्ग सुन तो रहा था पर शायद ज्यादा ध्यान से नही इसलिए बार- बार चेनल बदले जा रहा था लेकिन इस बार मैंने गाना नही बदला 'तन्हा दिल तन्हा सफर ढूंढे तुझे फिर क्यों नजर' रेडियो पर चल रहे इस गाने को सुनना मुझे अच्छा लग रहा था ऐसा लग रहा था जैसे की ये सॉन्ग मेरे लिए ही प्ले किया हो। मैंने अपनी गाड़ी की रफ़्तार जरा कम कर ली इस गाने के साथ मेरा मन भी कहीं खोने लगा ख्यालों की कुछ धुंधली परछाइयाँ मुझे भी हल्की- हल्की नजर आ रही थी और फिर अचानक एक पल में ही सब गायब सा हो गया साथ ही रेडियो पर दूसरा गाना शुरू हो गया मैंने रेडियो ऑफ कर दिया। वैसे मैं लेक के करीब पहुँच ही गया था सड़क किनारे अपनी गाड़ी लगाकर मैं भी सब की तरह इस सुंदर डिजाइन किए हुए फुटपाथ पर आकर खड़ा हो गया
कुछ लोग वॉक कर रखे थे तो कुछ सेल्फी ले रहे थे। ज्यादातर यहाँ भीड़ रहती है पर अभी थोड़ी कम है ये झील बहुत गहरी और बहुत बड़ी है जितनी दूर तक नजर दौड़ाता हूँ उतनी ही दूर तक ये नजर आती है शाम के समय ये खामोश सी लगती है पानी भी जैसे ठहरा हुआ सा है मेरी तरह। कुछ देर खड़े रहकर झील को निहारने के बाद मैं पास रखी बैंच पर जा बैठा
अपना मोबाइल निकाला फिर उसे कॉल किया आज भी रिंग बज बजकर बन्द हो गई रोज की तरह आज भी उसने फोन नही उठाया। वो बिल्कुल सही है आखिर क्यों उठाये वो मेरा फोन ,क्यों करे मुझसे कोई भी बात।
क्या मैंने उसकी कोई बात सुनी थी एक पल के लिए भी नही सोचा और बस सुना दिया था अपना फैसला। उसकी भीगती पलके सिसकती आवाज टूटता दिल कुछ नजर नही आ रहा था मुझे। इतना ज्यादा गुस्सा इतनी ज्यादा नाराज़गी थी कि मैं उसकी ओर देख भी नही रहा था बस बेरुखी से कह दिया चली जाओ।
उस दिन किसी बेवकूफ की तरह कोर्ट में बैठे हुए मैं आस्था का इंतजार करता रहा शाम के 5 बज गए थे पर आस्था नही आई। बहुत गुस्सा आया था मुझे उस पर।
5 जनवरी की तारीख मिली थी हमे, आखिरकार वो दिन आ गया था जिसका मैं इतने वक्त से इंतजार कर रहा था ऑफिस गया तो था पर लंच से पहले ही अपना जरूरी काम पूरा कर बाय विजय बस विजय से इतना कहा और अपनी कार में बैठकर कोर्ट के लिए निकल गया। 11 से 1 बज गये और 1 से 4 आस्था नही आई मैं बार- बार उसे कॉल करता रहा प्लीज़ फोन उठाओ प्लीज़ पर उसने फोन नही उठाया। कोर्ट बन्द हो गया मैं घर के लिए निकल गया। झूठी निकली वो विश्वास करना ही नही चाहिए था मुझे उस पर मन ही मन आस्था के दिये धोके पर न जाने क्या - क्या सोच रहा था।
घर पहुंचते ही मैं सीधे अपने बेडरूम में गया आस्था बैठी हुई थी क्यों नही आयीं तुम मैं वहां तुम्हारा इंतजार करता रहा बार- बार तुम्हे फोन भी लगाया मैंने तुम पर विश्वास किया और तुमने, क्यों किया ऐसा मैं गुस्से में चिल्लाये जा रहा था पर आस्था ने कोई जवाब नही दिया। पांच दिनों तक हमारे बीच खामोशी पसरी रही मैं इतना नाराज था कि उसके कुछ कहने पर भी मैं उसका कोई जवाब नही दे रहा था हर वक्त आस्था को देखकर बस गुस्सा आ रहा था और बर्दाश नही हो रहा था मुझसे , नही सम्हाला जा रहा मुझसे मेरा गुस्सा मेरी नाराज़गी इसलिए शाम को मैंने आस्था को कह दिया चली जाओ इस घर से और मेरी लाइफ वो चली गई।कोई अफसोस नही हो रहा तब मुझे उसके चले जाने का।
चलो भई अब रात होने लगी है मेरे पास बैठे शख्स ने अपनी फैमिली से कहा तो मैं अपने कल से बाहर आ गया। घर आकर सुबह की तरह मैं अपने मोबाइल स्क्रीन पर फिर आज की डेट देखने लगा क्या आस्था भी देख रही होगी आज की तारीख। आज हमारी शादी को 6 महीने हो गए है। मुझे याद है कैसे मैं उससे रूढली बिहेव कर रहा था नही करना चाहता था मैं ये शादी , मेरे पापा की मुझ पर धोपी हुई मर्ज़ी थी ये। आस्था मुझसे बात करने की कोशिश करती और मैं उससे दूर भागता रहता मुझे नही पसन्द थी आस्था। क्योंकि मैं तो अपनी कलीग नित्या को लाइक करता था स्मार्ट इंटेलिजेंट खूबसूरत। पर मेरे प्रमोशन की वजह से मुझे जयपुर आना पड़ा और साथ मे आस्था को भी लाना पड़ा खैर अब आस्था सब जान गई थी। उसने दोस्ती का हाथ बढ़ाया और मुझे भरोसा दिलाया कि उसकी वजह से मुझे कोई प्रॉब्लम नही होगी। धीरे - धीरे मुझे भी आस्था अच्छी लगने लगी पर एक दोस्त की तरह। हम दोनों एक अच्छे दोस्त बनकर ही तो साथ रहे थे इतने दिन।एक दिन जब आस्था फ्लॉवर पॉट के फ्लॉवर बदल रही थी तब मैं भी उसकी हेल्प करते हुए उससे बातें करने लगा कुछ कहना है आस्था ने कहा वो समझ गई थी कि मैं कुछ कहना चाहता हूं मैंने थोड़े धीमे लफ़्ज़ों में कहा हाँ वो 5 जनवरी को तुम्हे कोर्ट आना पड़ेगा हम दोनों को साइन करना होगा ना। आस्था ने मुस्कुराते हुए हाँ कह दिया और मैं खुश हो गया। मुझे आस्था पर पूरा भरोसा था कि वो कोर्ट जरूर आएगी पर ऐसा हुआ नही।उस दिन सुबह जब आस्था घर छोड़कर जा रही थी तब वो मुझे कुछ कहना चाहती थी पर मैं इतना नाराज था कि मैं उसकी कोई बात सुनने को राज़ी नही था उसकी आँखे भीगी थी शायद इसलिए कि हमारे बीच जो दोस्ती का रिश्ता बना था अब वो भी नही रहा था। वो जा चुकी थी और मैं अब अकेला था। मुझे नही पता था कि मेरी कौन सी चीज़ कहाँ रखी है मैं कबर्ड में अपनी शर्ट ढूंढ रहा था तब मेरे हाथ एक बहुत खूबसूरत कार्ड लगा मैंने खोलकर पढ़ा
"रिश्ता हमसफ़र का है पर वो मेरा दोस्त बना है।
मेरा दिल कहता है क्या ये उसने कभी नही सुना है।"
कार्ड में नीचे की तरफ बहुत खूबसूरती से सजाते हुए पार्थ लिखा हुआ था मैं पढ़कर परेशान हो गया क्या मतलब है इसका। थोड़ा घबरा सा गया था मैं कहीं , इसलिए मैंने दोबारा उसे पढ़ा इस वक्त मुझे जो समझ आ रहा था वही सच था आस्था मुझे चाहने लगी थी ये मुझे कभी पता ही नही चला क्योंकि उसने मुझे पता चलने ही नही दिया और मैंने भी शायद कभी देखने की कोशिश ही नही की। शी लव्स मी। इसलिए तो वो उस दिन कोर्ट नही आई क्योंकि वो मुझसे अलग नही होना चाहती थी नही देना चाहती थी मुझे डिवॉर्स। वो जानती थी कि अगर तलाक हो गया तो हम हमेशा के लिये अलग हो जायेंगे। जानबूझकर न सही पर मैंने उसका दिल तोड़ा है मैं ये नही समझ पाया कि सब जानते हुए भी कैसे वो मुझे चाहने लगी लेकिन ये जरूर समझ गया कि कितना मुश्किल रहा होगा उसके लिए जब मैंने उसे डिवोर्स के लिए कोर्ट बुलाया था हम जिसे चाहते है उससे दूर होना आसान नही होता उसने जरूर कोशिश की होगी उस दिन आने की पर दिल के आगे हार गई होगी। मैं नासमझ निकला वो इतने कम समय में मुझे कितना समझने लगी थी और मैं कुछ भी न समझा साथ रहते हुए भी मैं उसकी आँखें भी न पढ़ सका वो आँखें जिनमे शायद मेरा ही चेहरा था आस्था के चले जाने के बाद मुझे एक बात अच्छी तरह समझ आ गई कि मैं नित्या को लाइक जरूर करता था पर प्यार नही।
मैं ये नही बता सकता कि मैं अभी आस्था को लेकर क्या सोचता हूँ क्या महसूस करता हूँ क्योंकि मैं खुद भी नही जानता पर मैं चाहता हूं कि आस्था वापस आ जाये।
आज ऑफिस जाने से पहले मैंने फिर उसे कॉल किया फिर  मोबाइल रिंग बस बजे जा रही थी निराश होकर मैं फोन कट करने लगा पर कॉल रिसीव हो गया हैलो आस्था सामने से कोई जवाब नही आया आय नो तुम मुझे सुन रही हो
सॉरी मैंने तुम पर इतना गुस्सा किया उसके लिए और एक दोस्त होकर भी तुम्हें समझ न सका उसके लिए भी।
मुझे नही पता कि एक हसबैंड चाहता है के नही की उसकी वाईफ लौट आये पर पार्थ जरूर चाहता है कि उसकी दोस्त वापस आ जाये वो कोशिश करना चाहता है एक नए रिश्ते मैं आगे बढ़ने की किसी के साथ चलने की पर उसके लिए उसकी दोस्त का लौट आना जरूरी है आओगी ना।








तेरे मेरे रास्ते



गाड़ी न छूट जाए इसलिए मैंने टैक्सी वाले भईया को गाड़ी जरा तेज चलाने को कहा हम टाइम पर स्टेशन पहुंच गए थे प्लेटफॉर्म की तरफ जाते हुए मेरे कदम जितने तेज थे मनस्वी के उतने ही धीमे। प्लेटफॉर्म नम्बर 3 पर ट्रेन आने वाली थी
इसलिए हम वही बैंच पर जा बैठे और ट्रेन का इंतजार करने लगे। कुछ देर में पता चला कि यमुना एक्सप्रेस 20 मिनिट की देरी से आएगी। मैं बैंच से पीछे टिक्कर बैठ गया मनस्वी मुझे एक टक देखे जा रही थी मैं जानता था पर मैंने मनस्वी की नजर से नजर नही मिलाई। क्योंकि अगर नजर मिलाता तो भावुक हो जाता और शायद खुद को सम्हाल न पाता। नाराज़ हो नही तो मनस्वी ने पूछा तो मैंने उत्तर देते हुए कहा। मैं और मनस्वी अभी कितने पास बैठे हुए थे पर फिर भी हमारे बीच दूरी थी वो दूरी जो धीरे - धीरे हमारे बीच आ गई और हम समझ भी नही सके।
आज हम दोनों जैसे खामोश है ऐसे हमेशा नही रहते थे एक वक्त वो भी था जब इंगेजमेंट के बाद फोन पर घन्टो हम बातें किया करते थे और कभी - कभी इस फोन की वजह से हमारे बीच मीठी नोकझोंक भी हो जाती। मेरा कॉल क्यों रिजीव नही किया तुमने मैं बिज़ी थी यार अच्छा मुझ से ज्यादा इम्पोर्टेन्ट काम था तुम्हे मतलब मेरी कोई फिक्र नही तब मनस्वी नाराज़ होते हुए कहती हाँ नही है बस और फिर मैं ज़ोर से हसने लगता। तब हमें एक - दूसरे की बातें बुरी नही लगती थी। शादी के बाद भी सब कुछ ठीक ही तो था।
मुझे ब्लैक कलर कभी पसन्द नही था पर जब मनस्वी मेरे लिए बड़े प्यार से ब्लैक कलर की शर्ट लाई तो मैंने उसे पहना मनस्वी के लिए और मनस्वी को भी कुकिंग कुछ खास पसन्द नही लेकिन फिर भी मुझे खुश करने के लिए उसने मेरी फेवरेट गुजिया बनाई हाँ गुजिया बनाने में उसे बड़ी परेशानी हुई पर उसने कोशिश की। शुरुआती दिनों में हमारा रिश्ता उतना ही खूबसूरत था जितना की आसमान में चमकता हुआ चाँद। जब कभी मैं अपना लेपटॉप लिए ऑफिस का कोई काम करता तो मनस्वी मुझे खूब तंग करती कभी मेरे सामने आकर मुस्काती , गाने गाती तो कभी होले- होले अपनी उंगलियों को मेरे हाथों पे चलाती।पर इसका बदला मैं भी उससे ले लेता था जब वो अपने किसी काम में बिज़ी होती या माँ के साथ किचन में होती तब मैं भी उसे परेशान करता कभी फूल फेंककर उसकी पीठ पर मारते हुए उसे छेड़ता तो कभी बेवजह ही चिल्लाता मेरे मोबाइल का चार्जर कहाँ है मिल नही रहा मनस्वी मनस्वी और जब मनस्वी आती तो मैं झट से उसका हाथ पकड़कर उसे अपनी ओर खींच लेता उसकी जुल्फों को सहलाते हुए उसकी तारीफ में प्यार भरी शायरी सुनाता तो कभी उसका हाथ पकड़ उसके साथ नाचने लगता जैसे कि सारा प्यार अभी ही उमड़ रहा हो। वो समझ जाती की मैं उसे जानबूझकर परेशान कर रहा हूँ इसलिए पहले मुस्कुराती और फिर हाथ छुड़ाकर इतराते हुए चली जाती।
प्यार ऐसा ही होता है शरारती मीठा - मीठा सा।
एक बार मनस्वी और मैं छत पर तारे देख रहे थे अच्छा लगता था मनस्वी को तारे देखना। उसके साथ - साथ मैं भी तारों को बड़े गौर से देखने लगा हम भी इन तारों की तरह हमेशा साथ रहेंगे मैंने पूछा तो मनस्वी ने मेरा हाथ थामते हुए हाँ में सिर हिला दिया।
मुझे कुछ आवाज सी आई देखा तो मनस्वी बैग से कुछ निकाल रही थी मैंने यहाँ - वहाँ देखा और फिर अपने मोबाइल में टाइम देखा तो 2 बजकर 15 मिनिट हो रहे थे बस पांच मिनिट और इंतजार करना था ट्रेन के आने का।
जब वक्त आगे बढ़ता है तो थोड़े बदलाव भी आते है हमारी शादी को 6 महीने से ज्यादा समय हो गया था। पहले हम एक - दूसरे की कुछ आदतों को ही जानते थे पर अब हर एक आदत से वाकिफ हो गए थे। हमारी आदतें ही थी जो एक- दूसरे को खटकने लगी थी। मुझे सुबह का सूरज देखना अच्छा लगता था इसलिए सुबह जल्दी उठकर खिड़कियाँ खोल दिया करता था ताकि उसकी रोशनी मुझ पर पड़े पर मनस्वी इस बात से नाराज़ होने लगी थी क्योंकि रोशनी की वजह उसकी नींद खराब हो जाती थी। मैं जानता था कि मनस्वी को कुकिंग में इंट्रेस्ट नही है पर मैं उससे उमीद करने लगा था कि वो भी माँ की तरह मेरे लिए मेरी पसन्द का खाना बनाये। एक बार घर मैं एक फैमली फंक्शन था मैं मनस्वी के लिए एक साड़ी लाया था हमारे बहुत से रिश्तेदार आज आने वाले थे इसलिए मैं चाहता था कि मनस्वी यही साड़ी पहने पर उसने मेरी बात नही मानी और जब उसने मेरी बात नही मानी तो गुस्से में मैं भी कल देर से आया मुझे पता था कि मनस्वी की फ्रेंड ने हमे डिनर के लिए इनवाइट किया है पर मैं फिर भी देर से घर पहुंचा मनस्वी नाराज हुई।
उसकी आदत गुस्से में चिल्लाने की थी और मेरी आदत गुस्से में खामोश हो जाने की। एक तरफ अब हमारी जिम्मेदारियां बढ़ने लगी थी मनस्वी पर घर की और मुझ पर मेरे काम की और साथ ही हमारे रिश्तें जो हम से जुड़े हुए है उनके लिए भी हमारे कुछ फ़र्ज कुछ जिम्मेदारियां थी उनकी ओर भी हमे ध्यान देना था। दूसरी तरफ हम दोनों की मेल न खाती आदतें जो पहले इतनी बड़ी प्रॉब्लम नही थी जितनी अब हो गई थी मनस्वी अब हर बात पर चिड़ने लगी थी शायद इसलिए कि सब कुछ पहले जैसा क्यों नही मैंने कहा भी हमेशा सब कुछ एक जैसा नही रह सकता बदलाव आते है। ये बात मैं समझ गया था।
अब पहले की तरह मैं उसकी हर बात का ख्याल नही रख पाता और न ही पहले की तरह हर रोज़ एक गुलाब लाता हुँ जो पहले लाकर मैं उसे दिया करता था और कहता था माय स्पेशल माय लाइफ। क्योंकि मैं भूल जाता हूँ और कभी इतना बीज़ी हो जाता हूँ कि घर भी लेट ही पहुँचता हुँ। लेकिन इसका मतलब ये नही कि अब वो प्यार नही, प्यार है पर सिर्फ प्यार ही नही हमे हमारे रिश्ते में समझदार भी होना पड़ता है।
मुझे पता है की जब बदलाव होता है तो हमारे लिए उसे एक्सेप्ट करना थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन सभी की जिंदगी में बदलाव आते ही है और हमे उसे समझना पड़ता है।
कल जब घर आया तो मनस्वी नाराज़ सी नजर आई पहले तो मैंने कोशिश की के न पूछूं पर खुदको रोक न सका क्या हुआ तुम ऐसे चुप क्यों बैठी हो , कुछ पहले जैसा नही है मेरी लाइफ पूरी बदल गई है मैं बिल्कुल भी खुश नही हुँ मैं ऐसे नही रह सकती ये कहकर वो रोने लगी। मैं क्या कहता इस वक्त कुछ कहना समझाना या समझना सब बेबुनियाद सा लग रहा था। मनस्वी को लगता है कि उसकी लाइफ बदल गई क्यों क्या मेरी लाइफ पहले जैसे है अगर वो पत्नी बनी तो मैं भी तो पति बना उसकी जिम्मेदारियां बढ़ी तो क्या मेरी नही बढ़ी।
मुझे भी आदत नही थी किसी के साथ अपना रूम शेयर करनी की लेकिन जब मनस्वी आई और उसने अपने हिसाब से रूम डेकोरेट किया तब मैंने तो कुछ नही कहा जबकि जो पेंट उसने वॉल पर कराया वो मुझे खास पसन्द नही था। जब रिश्ता जुड़ता है हम साथ रहते है तो हमे एक - दूजे की आदतों को भी एक्सेप्ट करना होता है अपनी आदतों को बदल दे ये जरूरी नही है पर कुछ नई आदतों को अपना लें तो उसमें कोई बुराई भी नही है ये सिर्फ मेरा मानना है सब ऐसा सोचे ये जरूरी नही।
मैं और मनस्वी हमारे रिश्ते को सम्हाल न सके हम प्यार तो बहुत करते है एक - दूजे से पर फिर भी साथ चलते हुए हमारे रास्ते आज अलग हो रहे है मनस्वी कुछ दिनों के लिए अपने मायके जा रही है या फिर हमेशा के लिए मैंने उसे रोकने की कोई कोशिश नही की।क्यों नही की पता नही। जब हम एक रास्ते पर साथ चल रहे होते है तो हमारा टकरा जाना स्वभाविक है मगर हाथ छूट जाए तो इसका मतलब ये है कि हाथ कसकर थामा ही नही था
ज़ोर से आवाज करती आ रही ट्रेन ने मुझे मेरे वर्तमान में ला दिया मैं मनस्वी का ट्रोली बैग खिंचते हुए आगे बढ़ा पर मनस्वी बैठी रही मनस्वी उठो ट्रेन जा रही है छूट जाएगी उठो मैं कहता रहा वो नही उठी ट्रेन चली गई मैं मनस्वी के पास जाकर खड़ा हो गया वो गर्दन झुकाये बैठी रही मनस्वी क्या हुआ वो तेजी से उठकर मुझसे लिपट गई उसके आँसुओ से मेरे कंधे की शर्ट गीली हो गई थी मैंने प्यार से कहा माय स्पेशल माय लाइफ।
मनस्वी और मेरे हाथ छुटे नही बस उंगलियां जरा फिसल गईं थी।





रिश्ता



क्या कोई हमे तभी अच्छा लगता है जब उससे हमारा कोई रिश्ता हो , क्या हम फ़िक्र उसी की करते है जो हमारा कुछ लगता हो। क्या ये जरूरी है कि अगर किसी से हमारा कोई रिश्ता नही है तो हम उसका ख्याल मन में नही ला सकते उसकी परवाह नही कर सकते।
ये सवाल मेरे मन में यूँहीं नही आया है शोभना की कही बातों ने मुझे ये सोचने पर मजबूर कर दिया है। जब किसी का किसी से कोई रिश्ता होता है तब ही कोई किसी की परवाह करता है
मैं नही पर लोग ऐसा ही सोचते है शोभना का ऐसा कहना कहीं न कहीं मेरे लिए एक सवाल की तरह ही था। कि आखिर क्या रिश्ता है मेरा अनन्दिता से।
एक साल पहले मेरा प्रमोशन हुआ और मैं जबलपुर से भोपाल शिफ्ट हो गया। नई जगह नया ऑफिस और नए कलीग्स।
बॉस ने मुझे सबसे इंट्रोड्यूज कराया। मैं कल ही पूरे स्टाफ मैम्बर से मिल चुका था पर कोई एक है जिससे शायद कल मेरी मुलाक़ात नही हुई थी। वो अनन्दिता है जो कल ऑफिस नही आई थी। मैंने जब अनन्दिता को पहली बार देखा तो उसकी छवि मेरी आँखों मे ठहर गई। ऑफिस के सभी लोगो से मुझे अनन्दिता बहुत अलग सी लगी। न बहुत स्टाइलिश न बहुत सिम्पल एक अलग ही रूप है अनन्दिता का, जो शायद मुझे अच्छा लगा। वैसे मेरी अनन्दिता से बात बहुत कम ही होती थी क्योंकि हम दोनों का काम अलग था पर लंच सब साथ में करते है तो इस बहाने मेरी थोड़ी बहुत बातचीत अनन्दिता से हो जाया करती थी। कभी बातों से वो समझदार लगी तो कभी थोड़ी सी नादान।ऑफिस में नीलम ही अनन्दिता की ज्यादा करीबी दोस्त है मैंने जब कभी भी अनन्दिता को नीलम से बात करते देखा है तब मुझे वो बेफिक्र सी नजर आई है। एक अच्छे दोस्त का साथ ऐसा ही होता है।
कुछ वक्त के लिए ही सही हमे बेफ़िक्र कर देता है।
हम ऑफिस मेंबर्स की हर वीक बॉस के साथ मीटिंग जरूर होती है इस बार की मीटिंग में बॉस ने सभी को अलग- अलग सब्जेक्ट्स पर प्रजेंटेशन तैयार करने को दी है। ये पहली बार हुआ की अनन्दिता मुझसे हेल्प लेने आई मैं तब मीटिंग के बाद अपने कदम केबिन की ओर बढ़ा रहा था कि अनन्दिता ने मुझे रोकते हुए कहा विक्रांत सर मुझे आपकी हेल्प चाहिए।
आप मेरी हेल्प करेंगे ये पूछते वक्त अनन्दिता की आँखे कितनी मासूस सी लग रही थी मैंने कुछ पूछा नही बस फ़ौरन ओके कह दिया।
दरसल अनन्दिता को अपनी प्रजेंटेशन तैयार करने में मेरी मदद चाहिए थी मेरा वर्क एक्सपीरियंस ज्यादा है और अनन्दिता को साल भर भी नही हुआ ऑफिस जोइन किये
बस यही सोचकर अनन्दिता ने मुझसे हेल्प ली क्योंकि वो अपने काम को बेहतर से बेहतर करना चाहती थी।
इसी दौरान मैंने जाना कि अनन्दिता बहुत ऑनिस्ट और मेहनती भी है मैं अपने लेपटॉप पर हमारे वर्क से रिलेटिड
एक - एक पॉइंट को समझाता गया और अनन्दिता ध्यान से सब समझती गई वो कितना समझ पाई ये तो प्रजेंटेशन के वक्त ही पता चलेगा।
सारे ऑफिस मेम्बर्स मीटिंग रूम में आकर बैठ गए थे और बॉस का वेट कर रहे थे कुछ मिनिट बाद बॉस आये और प्रजेंटेशन स्टार्ट हुई अनुज के बाद अनन्दिता आई अभी उसने सबसे पहले मेरे और नीलम की ओर देखा तो हम दोनों
ने ही उसे इशारे में ऑल द बेस्ट कहा। उस वक्त मुझे नही पता था कि मेरी नजर भले ही सामने थी पर शायद एक दो नजरें मुझ पर भी थी। अनन्दिता की प्रेजेंटेशन अच्छी रही जिसके लिए उसने मुझे बाद में बड़े ही सौम्य तरीके से थैंक्यू कहा।
अब ऐसा नही था कि हमारे बीच कोई बहुत अच्छी दोस्ती हो गई या अनन्दिता बहुत फ्रेंक हो गई थी अभी भी पहले जैसे ही लंच में थोड़ी बहुत बातचीत होती थी वो भी अपने वर्क से रिलेटिड। बस इतना जरूर था कि एक - दूसरे को देखकर एक छोटी सी स्माइल जरूर कर देते थे हेलो या गुड मॉर्निंग के तौर पर।
दो - चार दिनों से अनन्दिता ऑफिस में नजर नही आई नीलम से पता चला कि वो बीमार है और उसने एक सप्ताह की छुट्टी ली हुई है ये सुनकर मुझे बहुत ज्यादा तो नही पर थोड़ी सी फिक्र अनंदिता की जरूर हुई। एक सप्ताह बाद जब अनन्दिता ऑफिस आई तो उसके नजर आते ही मैंने पूछ लिया आर यू ओके अनन्दिता, अपनी पलकों को झपकाकर और सिर को हिलाकर बड़ी ही नापी- तोली हुई मुस्कुराहट के साथ अनन्दिता ने हाँ कहा। अनन्दिता मुझे कुछ अपसेट सी लगी इसलिए मैंने उसे कुछ हेल्थ टिप्स दी वही हेल्थ टिप्स जो शोभना मुझे देती है जिसे सुनकर मेरे चहरे पर हँसी आ जाती है , अनन्दिता भी मुस्कुरा उठी। मैं अपने केबिन की ओर बढ़ गया पर न जाने क्यों मेरे कुछ कलीग्स की नजरें अनन्दिता की तरफ थी।
जो चेहरा हमेशा शान्त और सौम्य नजर आता हो और अचानक उस पर एक उदासी भरी फ़िक्र दिखाई दे तो कैसा लगता है कुछ दिनों से मैं देख रहा हूँ कि अनन्दिता कुछ ऐसी ही नजर आ रही है। शायद वो किसी बात को लेकर बहुत परेशान है। वैसे तो किसी की निज़ी जिंदगी में दखल देना सही नही होता है पर अनन्दिता एक अच्छी लड़की है उसे इस तरह परेशान देख मुझे अच्छा नही लग रहा था लेकिन ऐसे कैसे मैं उससे उसकी परेशानी की वजह पूछ सकता हूँ इसलिए अनन्दिता से तो नही पर कल जब नीलम एक क्लाइंट की फाइल लेकर मुझे देने आई तो, तब मैंने बात ही बात में नीलम से अनन्दिता का ज़िक्र किया नीलम शायद अनन्दिता ठीक नही है मुझे लगता है कि शायद वो किसी वजह से परेशान है क्या तुम्हें भी ऐसा लगा। हाँ कुछ फैमली प्रोबल्स की वजह से वो परेशान है बात हुई थी मेरी उससे नीलम ने जवाब देते हुए कहा।
शाम को घर पर डिनर करते वक्त मुझे पता नही क्यों  अनन्दिता का ख्याल आ गया आज लंच टाइम में कितनी अपसेट लग रही थी वो। मैंने शोभना को भी अनन्दिता के बारे में बताया शोभना ने कहा प्रॉब्लम्स तो सभी की लाइफ में आती है शोभना की बात सुन मैं खामोश रहा और कुछ सोचने लगा।
शोभना ने कहा तो सही है पर मुझे अनन्दिता की परवाह हो रही है इसलिए अगले दिन ऑफिस पहुंचते ही मैं सीधा जाकर अनन्दिता से मिला बिना कुछ पूछे मैंने उससे कहना शुरू कर दिया प्रॉब्लम्स हमारी लाइफ का हिस्सा है इसलिए ज्यादा परेशान होना सही नही हर प्रॉब्लम का सॉल्यूशन होता है।
ठीक है अनन्दिता। मैं जानता था कि इस समय मेरे कुछ कलीग्स जोकि शोधकर्ता बने हुए थे उनकी शक भारी आंखे मुझ पर टिक्की हुई थी तो भी मैं अनन्दिता से जाकर मिला।
मैं सिर्फ इतना चाहता था कि अनन्दिता अपनी परेशानियों से लड़ना सीखे।
कुछ लोगो की आदत बातें बनाने की होती है बस वही मेरे साथ हुआ। हाँ अनन्दिता मुझे अच्छी लगती है क्योंकि वो अच्छी है मुझे कभी उसमे कोई बनावट नजर नही आई उसके चेहरे से उसकी आँखों में हमेशा सच्चाई ही दिखी है मुझे।
अनन्दिता से मेरा कोई रिश्ता नही न तो दोस्ती का और ना ही किसी और तरह का।कोई हमे उसकी अच्छाई से अच्छा लग सकता है हमे उसकी परवाह हो सकती है इसके लिए किसी रिश्ते का होना जरूरी नही।
आज भले ही भावुकता में आकर शोभना ने मुझसे सवाल किया है पर मैं जानता हूँ कि मुझे उसे कुछ समझाने की जरूरत नही, पत्नी है वो मेरी जोकि मुझे अच्छी तरह जानती है।














एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE