दिनभर में जो कुछ भी बिता होता है उसे दिन अपने साथ लेकर डुब जाता है हमारे दिन की सारी बातें गुजरे पल में बदल जाती है दिनभर की भागदौड़ थकान शाम की ठंडक में कहीं पनाह लेने लगती है वैसे शाम को हम वापसी का वक्त भी कह सकते है सुबह से अपने घर से निकले लोग शाम को घर लौट आते है दाना ढूंढने गए पंछी भी शाम तक अपने घोसलें में वापस आ जाते है। पर क्या सभी घर वापस लौटते है शायद नही, होते है कुछ मेरी तरह जो कभी नही लौटते।
अपने से हुए कुछ शिकवे गिले हमें चाहकर भी कभी वापस लौटने नही देते मुश्किल होता है उस बीते वक्त की कड़वाहट को अपने दिल से मिटा पाना। ऐसा नही है कि मुझे कभी अपनो की याद आती ही नही। आती है याद अपने बिते बचपन की कुछ खुशी के पलों की तब आँख भर आती है मेरी, लेकिन साथ ही बीतें पलों की कुछ कड़वी बातें भी मुझे याद आ जाती है और एक आँसू दर्द का भी मेरी आँखों से निकल जाता है।
जब सब साथ होते है अच्छा लगता है लेकिन कभी -कभी यही साथ परेशानी की वजह बन जाता है। हम सब साथ रहा करते थे ताऊजी चाचाजी पापा और पापा के कज़िन बड़े ताऊजी। हम एक छत के नीचे साथ नही थे पर हमारे घर पास- पास थे इसलिए हम सब भाई - बहनों का बचपन साथ ही गुजरा है तब खूब मज़ा आता था साथ मे खूब मस्ती किया करते थे हम। लेकिन बचपन हमेशा तो नही रहता एक दिन सब बड़े और समझदार हो जाते है हम भी हो गए थे तब मन की मासूमियत कम हो गई थी और हम से हम सब मैं पर आ गये थे।
ताऊजी के बेटे अमित भईया की सरकारी नौकरी थी और चाचाजी का बेटा धैर्य चाचाजी के साथ उनके बिज़नेस में हेल्प करने लगा था पलक दीदी की शादी के बाद बड़े ताऊजी ने अपने बड़े- बड़े सपने वैभव को सौंप दिए थे उम्र में वैभव भले ही हम सबसे छोटा था लेकिन बड़े ताऊजी उसे बड़ी पोस्ट पर देखना चाहते थे इसलिए उसे कॉम्पेटिटिव एग्जाम की तैयारी में लगा दिया था या ये कहूँ की उस पर बोझ डाल दिया था और इन सबके बीच मैं था जोकि ग्रेजुएट तो था लेकिन फिलहाल कुछ नही कर रहा था मतलब ना तो मैं किसी तरह का बिज़नेस कर रहा था ना ही कोई ऐसी जॉब जिसमे मैं किसी अच्छी बड़ी पोस्ट पर था मेरी अपनी कोई पहचान नही थी अभी मैं कुछ नही था। इसलिए कभी पापा के गुस्से का सामना करना पड़ता तो कभी अपनो के ताने भरी बातों से गुजरना पड़ता लेकिन मैं हमेशा की तरह कुछ नही कहता। कहता भी क्या जब कोई तुम्हे समझना ही नही चाहता तो समझाना कैसा।
पापा को तो मुझे छोड़कर बाकी सब होशियार ही नज़र आते थे मेरा जब भी रिजल्ट आता मैं हमेशा डाँट खाता क्योंकि मेरे मार्क्स कम होते थे पढ़ाई में ज़्यादा मन नही लगता था मेरा। मैं न तो बिज़नेस करना चाहता था और न ही सरकारी नौकरी मैं तो आर्टिस्ट बनना चाहता था काम चाहे जो भी हो उसमे समय और मेहनत दोनों लगते है मेरा एक अच्छा और क़ामयाब आर्टिस्ट बनना इतना भी आसान नही था। लेकिन उस वक्त कोई मुझे समझना ही नही चाहता था मेरे वो भाई जो बचपन मे मेरे बिना कभी कोई खेल शुरू नही करते थे अब मेरे बिना ही वो सेलिब्रेशन कर लिया करते थे। बल्कि हाल अब तो ये था कि मौका मिलने पर वो मुझे ये जरूर एहसास दिलाते की वो कितना आगे है मुझसे और मैं कितना पीछे रह गया। बुरा लगता था मुझे ये सोचकर नही की मैं सबसे पीछे रह गया बल्कि ये सोचकर कि मेरे अपने कितना बदल गए है। जब हमारे अपने हमे छोटा महसूस कराने लगे तब वो अपने से नही पराये से लगने लगते है। सबके साथ होते हुए भी मैं अकेला था बिल्कुल अकेला। सिर्फ माँ ही थी जो मुझे समझती थी। और पापा उन्होंने कभी मेरा सपोर्ट किया ही नही वो हमेशा बस मेरे भाइयों की तारीफ़ किया करते और कहते रहते की मुझे भी उनकी तरह आगे बढ़ना चाहिए नाकि समय बर्बाद करना चाहिए हाँ आर्टिस्ट बनने के लिए मैं दिनरात जो मेहनत कर रहा था वो उन्हें समय की बर्बादी ही तो लगती थी मेरी फैमली में मैं ही था जो आर्टिस्ट बनने चला था और किसी ने ये राह कभी चुनी ही नही थी। वक्त आगे बढ़ रहा था और साथ ही सबकी बेरुखी भी।
अपनो की बेरुख़ी तेज़ धूप से भी ज्यादा तीखी होती है ये उस खीर की तरह होती है जिसमे शक्कर तो बहुत होती है पर उसकी मिठास कहीं गुम हो जाती है। कठिन दौर था वो मेरे लिए एक तरफ मेरे करियर की मुश्किलें और दूसरी तरफ मेरे अपनो की मुझसे दूरियाँ। ऐसा लग रहा था जैसे किसी रास्ते पर एक ओर तूफान हो ओर दूसरी ओर तेज़ बारिश और बीच मे मैं था जो अकेले चला जा रहा था। लेकिन कहते है ना कि वक्त की
एक ख़ासियत होती है वक्त अच्छा हो या बुरा वो कट जाता है।
मुश्किलों भरे बादल अब धीरे- धीरे छटने लगे थे उम्मीद का राहत भरा सूरज नजऱ आने लगा था खुदको तराशने के लिए कभी इस शहर से उस शहर घुमा अलग- अलग लोगो के साथ काम किया बहुत कुछ सीखा मैंने और एक दिन बतौर आर्टिस्ट मुझे एक बड़ा कॉन्ट्रैक्ट मिला जिसके लिए मुझे उदयपुर आना पड़ा पिछले 12 साल से मैं यही रह रहा हूँ यहाँ की कला यहाँ की खूबसूरती सब कुछ मेरे मन मे बस गया है। एक आर्टिस्ट होने के तौर पर नई- नई चीजें सीखता रहता हूँ कुछ नया कुछ अलग करने की कोशिश करता रहता हूँ और जब थक जाता हूँ तो यहाँ आ जाता हूँ अच्छा लगता है कुछ देर यहाँ रुककर, दिल और दिमाग की थकान कम हो जाती है और मन को थोड़ी राहत मिल जाती है।

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