कच्ची कैरी



सूरज आसमान में धीरे- धीरे ऊपर चढ़ रहा था और सुबह अब दोपहर में बदल गई थी दोपहर की वजह से पेड़ कुछ अलसाये से हो गए थे हर एक पत्ती खोमोश थी जैसे कि सारे के सारे पेड़ सो गए हो और इतनी गहरी नींद में की मेरे आने का उन्हें एहसास ही नही हुआ क्या इतनी जल्दी भूल गए ये मुझे। आम बाग में मैं जब भी आता था तब आम के ये पेड़ हवा से झूमते नजऱ आते थे मुझे लगता मानो मेरे आने से ये मुस्कुरा रहे हो दादाजी के साथ मैं भी आम बाग का खूब ख्याल रखता था
आम बाग में जब भी कैरियाँ आतीं तो उसकी महक कुछ ऐसी फैलती की बाग से गुजरते लोगों के मुंह मे पानी आ जाता और मन कैरी खाने को ललचा जाता। वैसे हमारे आम बाग के आम का स्वाद आस - पड़ोस के लोगो को भी भरपूर मिलता था क्योंकि दादाजी कहते थे कि हर चीज़ मिलबांट कर खानी चाहिए फिर वो भले ही बाग के आम ही क्यों न हो। इसलिए बाग के आम सभी के घर पहुंचाये जाते थे लेकिन थी एक चोरनी जिसे कच्ची कैरियाँ चुराकर खाना अच्छा लगता था।
मेरी बचपन की दोस्त मीरु।
मानस इन आम के पेडों को ही देखते रहेगा कि अपने दादाजी से भी मिलेगा कापती सी आवाज़ में दादाजी ने कहा उनके बाल पहले से और ज्यादा सफेद हो गए थे, चेहरे पर झुर्रियाँ भी दिख रही थीं और अब वो छड़ी का सहारा लेकर चल रहे थे अरे देख क्या रहा है तेरा दादा अब बुढ़ा हो गया है मैं दादाजी के गले लग गया और थोड़ा सा इमोशनल हो गया। बचपन से ही मैं अपने दादाजी के बहुत करीब रहा हूँ अपनी हर बात सिर्फ दादाजी को ही बताता था अभी भी हम दोनों ने ढेर सारी बातें की और अपने सीक्रेट्स भी शेयर करें।आज बचपन से जुड़ी न जाने कितनी बातें याद आई और उन यादों में मीरु भी थी कैसी होगी वो।
सुबह- सुबह कोयल की आवाज़ कानों में जैसे कोई मीठा रस घोलती हुई सीधे मेरे मन तक जा पहुँची और मेरी आँख खुल गई। आज दादी ने मेरे लिए खीर बनाई और वैसे ही खिलाई जैसे बचपन में खिलाया करतीं थी आसमान में सूरज ऊपर चढ़ गया था अब दोपहर हो आई थी खिड़की के पास खड़ा होकर मैं बाग की तरफ ही देख रहा था मुझे अचानक पत्ते हिलते नजर आए ऐसा लगा जैसे कोई है वहाँ मैं जल्दी से बाग की ओर गया आसमानी रंग की साड़ी जिस पर सफेद फूल बने थे पहने एक लड़की थी जो पत्थर मार कर पेड़ से कैरियाँ तोड़ने की कोशिश कर रही थी कौन हो तुम बिना पूछे हमारे बाग में कैसे आईं वो मेरी ओर पलटी और बोली क्यों आपकी इजाज़त लेनी पड़ेगी। बड़ी - बड़ी आँखों वाली ये लड़की कुछ पहचानी सी लग रही है मीरु क्या ये मीरु है हाँ मानस तुम्हारे सामने खड़ी ये लड़की मीरु ही है मुझे पता चला कि बाग का पुराना पहरेदार आया हुआ है तो आ गई मैं। बचपन की आदत गई नही कैरियाँ चुराने ने की , तुम्हारी आदत भी तो नही गई चोर को पकड़ने की। जब बचपन के दोस्तों से मुलाक़ात होती है तो ऐसा लगता है जैसे हम अपने बचपन मे दोबारा लौट गये हो बचपन को याद करते हुए हम एक बार फिर उस पल को जी रहे थे मैं और मीरु।
बचपन में मीरु जब भी कैरियाँ तोड़ने आती तो मैं मीरु चोरनी को तुरन्त पकड़ने पहुंच जाता। दरसल आम बाग घर के पीछे ही है मैं और दादाजी खिड़की में से ही आम बाग पर नज़र रखे रहते थे मुझे पता रहता था कि मीरु कब आने वाली है तभी तो खिड़की में से देखते रहता और जैसे ही वो आती जाकर उसे पकड़ लेता दो - तीन बातें सुनाता चोरनी कहकर चिल्लाता और एक भी कैरी लेने नही देता बोल पहले खेलेंगी मेरे साथ तभी कैरी ले जाने दूँगा वो पहले लड़ती- झगड़ती और फिर उसे हाँ कहना ही पड़ता। हम दिनभर आम बाग में यहाँ - वहाँ खूब दौड़ लगाते साथ खेलते और फिर कैरियाँ भी तोड़ते कब दोपहर से शाम हो जाती पता ही नही चलता।
मोबाइल रिंग बजी तो मैं और मीरु वापस अपने वर्तमान में आ गये। मीरा के घर से कॉल था। मीरु सॉरी अब तो तुम बड़ी हो गई हो मीरा कल भी आओगी न। पहले तो मीरा ने कुछ सोचा और फिर हाँ कह दिया और जाते हुए बोली मानस तुम अभी भी मुझे मीरु ही कहो।
शाम गहरी हो रही थी और अंधेरे बढ़ रहा था मैं आँगन वाले झूले पर बैठा हुआ आसमान देख रहा था अभी आसमान एक दम खाली था एक भी तारा दिखाई नही दे रहा था और मैं आसमान में तारे ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा था पर मुझे मीरु की बात याद आ गई जब मैं स्कूल में कभी उसे मीरु कहता था तो कैसे गुस्सा हो जाती थी वैसे भी मीरु की हर बात में मुँह फुला लेनी की आदत थी हाँ अब हम थोड़े बडे हो गए थे वो फोर्टिन की हो गई थी और मैं फिफ्टीन का। आम बाग में बैठे हुए हम सिर्फ कैरियाँ ही नही तोड़ते थे बल्कि कभी - कभार पढ़ाई भी कर लिया करते थे उस वक्त हम बेस्ट फ्रेंड जैसे ही थे मीरु का मेरे घर भी आना - जाना रहता था क्योंकि मीरु की दादी भी मेरी दादी के गाँव से ही थी वो जब भी आतीं मीरु को साथ लातीं। दोनों दादियाँ बैठकर बातें करती रहती और मैं और मीरु झूले पर साथ में झूलते रहते पर ये साथ ज्यादा दिन का नही था मेरे टेंथ के एग्जाम होते ही मैं और मम्मी मुम्बई चले गए थे पापा के पास। अब 9 साल बाद लौटा हूँ वो भी सिर्फ कुछ दिनों के लिए।
जब किसी खास अपने से मिलने वाले हो तो वो इंतज़ार भी मीठा सा लगने लगता है क्योंकि मिलने की वो खुशी इतनी ज्यादा होती है कि इंतज़ार का समय भी छोटा लगने लगता है। कुछ देर से आम बाग में बैठा हुआ मैं मीरु का इंतज़ार कर रहा था सोच रहा था की उसे कितनी सारी बातें बतानी है कितना कुछ पूछना है। तभी मीरु आ गई मानस मीरु ने पुकारा लाइट पिंक कलर की साड़ी पहने मीरु मेरे सामने खड़ी थी तुम्हे अभी भी ये कलर पसन्द है मीरु, हाँ पसन्द है मेरे पूछने पर मीरु ने कहा। खूबसूरत लग रही हो मैंने छेड़ने वाले अंदाज़ में कहा थैंक्यू मानस मीरु ने इतराते हुए बोली। इसके बाद मैंने मीरु को बताना शुरू कर दिया कि यहाँ से जाने के बाद मैंने किस स्कूल में एडमिशन लिया किस कॉलेज में पढ़ाई की कहाँ जॉब करता हूँ अब मेरी नई- नई होबिस क्या है मेरे मुम्बई के दोस्त कैसे है मैं बोलता जा रहा था और मीरु चुपचाप बस मुझे सुन रही थी। मीरु बस सुनती ही जाओगी क्या? तुम भी तो कुछ बताओ। अच्छा बताओ अपनी मैरिड लाइफ में तुम खुश हो ना मीरु एक फिक्रमंद दोस्त की तरह मैंने पूछा उससे। धीरे से मुस्कुराते हुए मीरु ने कहा मानस मेरा डिवोर्स हो गया है। अजित ने मीरु को कभी एक्सेप्ट किया ही नही था वाईफ होते हुए भी वो कुछ नही थी उसके लिए क्योंकि वो अपनी ज़िंदगी किसी और के साथ जीना चाहता था जब मीरु की कोई भी कोशिश काम न आ सकी तो उसने अजित के फैसले को मंजूरी दे दी। एक मुस्कुराते हुए चेहरे के पीछे क्या है ये समझ पाना वाकई मुश्किल होता है। जब हम अपने बीते दुख के पलों को याद करते है या किसी से बयां करते है तो चहरे पर वो दर्द झलक आता है जो दिल मे छुपा होता है पर मीरु वो एक दम शांत दिख रही थी बिल्कुल किसी शांत बहती नदी की तरह। पक्षियों की चहचहाहट और पत्तियों की सरसराहट की आवाज शाम को झूले पर खामोश बैठा मैं साफ सुन पा रहा था। जब कोई भी रिश्ता टूटता है तो घायल हमेशा मन ही होता है क्योंकि हर रिश्ता दिल से ही जुड़ा होता है इसलिए रिश्ते के टूट जाने पर सबसे ज्यादा दुख भी दिल को ही पहुँचता है।
रात काफी गहरा गई थी पर मेरी आँखों से जैसे नींद कहीं गायब थी उस रात भी ऐसे ही जागता रहा था मैं। एक साल पहले, तब आने वाला था मै लेकिन जब फोन पर दादी ने कहा मीरु की शादी है तो मैं नही आ सका। अभी न मेरी आँखों मे नींद है और न ही मन में सुकून , है तो ज़ेहन में ढेर सारी बातें जो मुझे बेचैन किये हुए है समझ नही आ रहा है मैं क्या करूँ। दिल और दिमाग़ के बीच चलती लड़ाई में आखिर रात में मुझे  नींद आ ही गई। अब सिर्फ दो दिन रह गए है मेरे मुम्बई वापस लौटने में बीते तीन दिनों में मेरी मीरु से कोई बात नही हुई इसलिए मैंने खुद उसे कल मिलने बुला लिया।
सुबह - सुबह की पेड़ों की ठंडी हवा मेरे दिल और दिमाग को ठंडक पहुँचा रही थी मैं आम के पेड़ से कैरियाँ तोड़ रहा था ये सुबह - सुबह किसके लिए कैरियाँ तोड़ रहे हो मीरु ने पीछे से आवाज़ लगाते हुए पूछा मैंने पलट कर कहा तुम्हारे लिए।
अच्छा कहते हुए मीरु मेरे पास आ गई मैंने मीरु के हाथों को थाम लिया हाँ मीरु और मैं चाहता हूं कि मैं हमेशा ऐसे ही तुम्हारे लिए कैरियाँ तोड़ता रहूँ और तुम्हारे हाथो को ऐसे ही थामे रहूँ क्या दो अच्छे दोस्त अच्छे हमसफ़र नही बन सकते।
मीरु की ठहरी हुई पलकों और खामोश लब्ज़ों में छुपी हाँ को मैंने महसूस कर लिया था इस वक्त मैं और मीरु चुप थे लेकिन हमारी खामोशी वो बात कर रही थी। मौसम बदल गया तेज़ हवा चल रह थी पेड़ो से पत्ते टूटकर मुझ पर और मीरु पर गिरने लगे थे लग रहा था मानो, जैसे हमारे इस बदलते रिश्ते से खुश होकर वो हम पर बरस पड़ें हो।








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