सूरज ढल गया था शाम धीरे- धीरे गहरा रही थी तेज रफ़्तार से दौड़ती मेरी कार में एफ एम रेडियो ऑन था एक के बाद एक लेटिस्ट सॉन्ग चल रहे थे मैं सॉन्ग सुन तो रहा था पर शायद ज्यादा ध्यान से नही इसलिए बार- बार चेनल बदले जा रहा था लेकिन इस बार मैंने गाना नही बदला 'तन्हा दिल तन्हा सफर ढूंढे तुझे फिर क्यों नजर' रेडियो पर चल रहे इस गाने को सुनना मुझे अच्छा लग रहा था ऐसा लग रहा था जैसे की ये सॉन्ग मेरे लिए ही प्ले किया हो। मैंने अपनी गाड़ी की रफ़्तार जरा कम कर ली इस गाने के साथ मेरा मन भी कहीं खोने लगा ख्यालों की कुछ धुंधली परछाइयाँ मुझे भी हल्की- हल्की नजर आ रही थी और फिर अचानक एक पल में ही सब गायब सा हो गया साथ ही रेडियो पर दूसरा गाना शुरू हो गया मैंने रेडियो ऑफ कर दिया। वैसे मैं लेक के करीब पहुँच ही गया था सड़क किनारे अपनी गाड़ी लगाकर मैं भी सब की तरह इस सुंदर डिजाइन किए हुए फुटपाथ पर आकर खड़ा हो गया
कुछ लोग वॉक कर रखे थे तो कुछ सेल्फी ले रहे थे। ज्यादातर यहाँ भीड़ रहती है पर अभी थोड़ी कम है ये झील बहुत गहरी और बहुत बड़ी है जितनी दूर तक नजर दौड़ाता हूँ उतनी ही दूर तक ये नजर आती है शाम के समय ये खामोश सी लगती है पानी भी जैसे ठहरा हुआ सा है मेरी तरह। कुछ देर खड़े रहकर झील को निहारने के बाद मैं पास रखी बैंच पर जा बैठा
अपना मोबाइल निकाला फिर उसे कॉल किया आज भी रिंग बज बजकर बन्द हो गई रोज की तरह आज भी उसने फोन नही उठाया। वो बिल्कुल सही है आखिर क्यों उठाये वो मेरा फोन ,क्यों करे मुझसे कोई भी बात।
क्या मैंने उसकी कोई बात सुनी थी एक पल के लिए भी नही सोचा और बस सुना दिया था अपना फैसला। उसकी भीगती पलके सिसकती आवाज टूटता दिल कुछ नजर नही आ रहा था मुझे। इतना ज्यादा गुस्सा इतनी ज्यादा नाराज़गी थी कि मैं उसकी ओर देख भी नही रहा था बस बेरुखी से कह दिया चली जाओ।
उस दिन किसी बेवकूफ की तरह कोर्ट में बैठे हुए मैं आस्था का इंतजार करता रहा शाम के 5 बज गए थे पर आस्था नही आई। बहुत गुस्सा आया था मुझे उस पर।
5 जनवरी की तारीख मिली थी हमे, आखिरकार वो दिन आ गया था जिसका मैं इतने वक्त से इंतजार कर रहा था ऑफिस गया तो था पर लंच से पहले ही अपना जरूरी काम पूरा कर बाय विजय बस विजय से इतना कहा और अपनी कार में बैठकर कोर्ट के लिए निकल गया। 11 से 1 बज गये और 1 से 4 आस्था नही आई मैं बार- बार उसे कॉल करता रहा प्लीज़ फोन उठाओ प्लीज़ पर उसने फोन नही उठाया। कोर्ट बन्द हो गया मैं घर के लिए निकल गया। झूठी निकली वो विश्वास करना ही नही चाहिए था मुझे उस पर मन ही मन आस्था के दिये धोके पर न जाने क्या - क्या सोच रहा था।
घर पहुंचते ही मैं सीधे अपने बेडरूम में गया आस्था बैठी हुई थी क्यों नही आयीं तुम मैं वहां तुम्हारा इंतजार करता रहा बार- बार तुम्हे फोन भी लगाया मैंने तुम पर विश्वास किया और तुमने, क्यों किया ऐसा मैं गुस्से में चिल्लाये जा रहा था पर आस्था ने कोई जवाब नही दिया। पांच दिनों तक हमारे बीच खामोशी पसरी रही मैं इतना नाराज था कि उसके कुछ कहने पर भी मैं उसका कोई जवाब नही दे रहा था हर वक्त आस्था को देखकर बस गुस्सा आ रहा था और बर्दाश नही हो रहा था मुझसे , नही सम्हाला जा रहा मुझसे मेरा गुस्सा मेरी नाराज़गी इसलिए शाम को मैंने आस्था को कह दिया चली जाओ इस घर से और मेरी लाइफ वो चली गई।कोई अफसोस नही हो रहा तब मुझे उसके चले जाने का।
चलो भई अब रात होने लगी है मेरे पास बैठे शख्स ने अपनी फैमिली से कहा तो मैं अपने कल से बाहर आ गया। घर आकर सुबह की तरह मैं अपने मोबाइल स्क्रीन पर फिर आज की डेट देखने लगा क्या आस्था भी देख रही होगी आज की तारीख। आज हमारी शादी को 6 महीने हो गए है। मुझे याद है कैसे मैं उससे रूढली बिहेव कर रहा था नही करना चाहता था मैं ये शादी , मेरे पापा की मुझ पर धोपी हुई मर्ज़ी थी ये। आस्था मुझसे बात करने की कोशिश करती और मैं उससे दूर भागता रहता मुझे नही पसन्द थी आस्था। क्योंकि मैं तो अपनी कलीग नित्या को लाइक करता था स्मार्ट इंटेलिजेंट खूबसूरत। पर मेरे प्रमोशन की वजह से मुझे जयपुर आना पड़ा और साथ मे आस्था को भी लाना पड़ा खैर अब आस्था सब जान गई थी। उसने दोस्ती का हाथ बढ़ाया और मुझे भरोसा दिलाया कि उसकी वजह से मुझे कोई प्रॉब्लम नही होगी। धीरे - धीरे मुझे भी आस्था अच्छी लगने लगी पर एक दोस्त की तरह। हम दोनों एक अच्छे दोस्त बनकर ही तो साथ रहे थे इतने दिन।एक दिन जब आस्था फ्लॉवर पॉट के फ्लॉवर बदल रही थी तब मैं भी उसकी हेल्प करते हुए उससे बातें करने लगा कुछ कहना है आस्था ने कहा वो समझ गई थी कि मैं कुछ कहना चाहता हूं मैंने थोड़े धीमे लफ़्ज़ों में कहा हाँ वो 5 जनवरी को तुम्हे कोर्ट आना पड़ेगा हम दोनों को साइन करना होगा ना। आस्था ने मुस्कुराते हुए हाँ कह दिया और मैं खुश हो गया। मुझे आस्था पर पूरा भरोसा था कि वो कोर्ट जरूर आएगी पर ऐसा हुआ नही।उस दिन सुबह जब आस्था घर छोड़कर जा रही थी तब वो मुझे कुछ कहना चाहती थी पर मैं इतना नाराज था कि मैं उसकी कोई बात सुनने को राज़ी नही था उसकी आँखे भीगी थी शायद इसलिए कि हमारे बीच जो दोस्ती का रिश्ता बना था अब वो भी नही रहा था। वो जा चुकी थी और मैं अब अकेला था। मुझे नही पता था कि मेरी कौन सी चीज़ कहाँ रखी है मैं कबर्ड में अपनी शर्ट ढूंढ रहा था तब मेरे हाथ एक बहुत खूबसूरत कार्ड लगा मैंने खोलकर पढ़ा
"रिश्ता हमसफ़र का है पर वो मेरा दोस्त बना है।
मेरा दिल कहता है क्या ये उसने कभी नही सुना है।"
कार्ड में नीचे की तरफ बहुत खूबसूरती से सजाते हुए पार्थ लिखा हुआ था मैं पढ़कर परेशान हो गया क्या मतलब है इसका। थोड़ा घबरा सा गया था मैं कहीं , इसलिए मैंने दोबारा उसे पढ़ा इस वक्त मुझे जो समझ आ रहा था वही सच था आस्था मुझे चाहने लगी थी ये मुझे कभी पता ही नही चला क्योंकि उसने मुझे पता चलने ही नही दिया और मैंने भी शायद कभी देखने की कोशिश ही नही की। शी लव्स मी। इसलिए तो वो उस दिन कोर्ट नही आई क्योंकि वो मुझसे अलग नही होना चाहती थी नही देना चाहती थी मुझे डिवॉर्स। वो जानती थी कि अगर तलाक हो गया तो हम हमेशा के लिये अलग हो जायेंगे। जानबूझकर न सही पर मैंने उसका दिल तोड़ा है मैं ये नही समझ पाया कि सब जानते हुए भी कैसे वो मुझे चाहने लगी लेकिन ये जरूर समझ गया कि कितना मुश्किल रहा होगा उसके लिए जब मैंने उसे डिवोर्स के लिए कोर्ट बुलाया था हम जिसे चाहते है उससे दूर होना आसान नही होता उसने जरूर कोशिश की होगी उस दिन आने की पर दिल के आगे हार गई होगी। मैं नासमझ निकला वो इतने कम समय में मुझे कितना समझने लगी थी और मैं कुछ भी न समझा साथ रहते हुए भी मैं उसकी आँखें भी न पढ़ सका वो आँखें जिनमे शायद मेरा ही चेहरा था आस्था के चले जाने के बाद मुझे एक बात अच्छी तरह समझ आ गई कि मैं नित्या को लाइक जरूर करता था पर प्यार नही।
मैं ये नही बता सकता कि मैं अभी आस्था को लेकर क्या सोचता हूँ क्या महसूस करता हूँ क्योंकि मैं खुद भी नही जानता पर मैं चाहता हूं कि आस्था वापस आ जाये।
आज ऑफिस जाने से पहले मैंने फिर उसे कॉल किया फिर मोबाइल रिंग बस बजे जा रही थी निराश होकर मैं फोन कट करने लगा पर कॉल रिसीव हो गया हैलो आस्था सामने से कोई जवाब नही आया आय नो तुम मुझे सुन रही हो
सॉरी मैंने तुम पर इतना गुस्सा किया उसके लिए और एक दोस्त होकर भी तुम्हें समझ न सका उसके लिए भी।
मुझे नही पता कि एक हसबैंड चाहता है के नही की उसकी वाईफ लौट आये पर पार्थ जरूर चाहता है कि उसकी दोस्त वापस आ जाये वो कोशिश करना चाहता है एक नए रिश्ते मैं आगे बढ़ने की किसी के साथ चलने की पर उसके लिए उसकी दोस्त का लौट आना जरूरी है आओगी ना।

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