बारिश की बूंदे



पानी की छोटी - छोटी बूंदे जब आसमान से ज़मीन पर आकर गिरती है तो मौसम का मिज़ाज ही बदल देती है नमी के साथ हवाओं में ठंडक घुल जाती है और भीगती मिट्टी की सोंधी खुशबू मन मे किसी मिश्री की तरह घुल जाती है मन बड़ा ही मीठा मीठा सा हो जाता है। ये मीठा - मीठा सा मन चाय के साथ कुछ गरमा - गर्म मिल जाये इसकी ख़्वाईश करने लगता है। वैसे मेरी प्यारी वाइफ़ समीक्षा बहुत समझदार है वो मेरे मन को अच्छी तरह पढ़ लेती है तभी तो मेरे बिना कहे सब समझ लेती है इसलिए जब भी बादल गरजता है और पानी बूंदों में बरसता है तो वो किचन की ओर चल पड़ती है और फिर किचन से आती महक ये पैगाम मुझ तक लाती है कि सब्र रखो आपके मन की ख़्वाईश बहुत जल्द ही पूरी होने वाली है।
मैं तब तक खिड़की के पास जा खड़ा हुआ बारिश की बूंदे हवा के साथ खिड़की से अंदर आकर मुझे भी छू रही थी इन ठंडी बूंदों की छुहन मुझे अच्छी लग रही थी जैसे मन को कोई सुकून मिल रहा हो शायद इन बूंदों में कोई जादू है जिसके तन को छूते ही मन खुशी का अनुभव करने लगता है।
बाहर कॉलोनी के कुछ बच्चे बारिश में उछल - उछलकर भीग रहे थे कभी एक दूसरे के पीछे दौड़ लगाते तो कभी बारिश के पानी को हाथों में इकट्ठा कर एक दूसरे पर उछालते। हम भी तो ऐसा ही करते थे मैं मानसी और हार्दिक भईया।
जब भी बारिश होती हम तीनों घर के आँगन में खूब दौड़ लगाते और खूब भीगते , बारिश के ठंडे- ठंडे पानी मे भीगने का मज़ा ही कुछ और होता है और ठहरे हुए पानी मे छपाक- छपाक करने में तो मज़ा और दुगुना हो जाता है। माँ और दादी चाहे कितनी भी आवाज लगा ले पर जब तक मन न भर जाए हम बारिश में भीगते रहते और जब भीगते- भीगते देर हो जाती और पानी तब भी बरसता रहता तो मैं एक डिटेक्टिव की तरह पूछता भईया हम जब घर के शॉवर में देर तक नहाते है तो छत की टँकी खाली हो जाती है पर अभी कितनी देर से हम बारिश के पानी मे नहा रहे है पर पानी अभी भी आ रहा है आसमान की टँकी में क्या बहुत सारा पानी है।
तब भईया मेरी बात पर जोर से हँस पड़ते और किसी बड़े व्यक्ति की तरह समझदार बनते हुए कहते अरे बुद्धू
आसमान में कोई टँकी थोड़ी न है वहाँ तो बादलों में पानी भरा होता है बहुत सारा पानी, जो कभी खत्म नही होता तब मानसी भी अपनी आंखों को बड़ा कर भईया की हाँ में हाँ मिलाते हुए बड़ा सा हूँहूहूहू कर देती। उस वक्त तो मैं कुछ भी नही कहता पर मुझे भईया की बातों पर जरा भी भरोसा नही होता अरे इन्हें खुद भी ज्यादा कुछ मालूम नही है पर बनते ऐसे जैसे सब पता है मैं मन में यही सोचता, दरसल मुझे मैं अपने आप में बड़ा ही होशियार लगा करता था। इसलिए तो अपनी कागज की नाव मैं खुद ही बनाता था भईया और मानसी तो उनकी नाव को पानी से भरे टब में चलाते पर मैं तो अपनी नाव सड़क में जो गड्ढ़ा हो जाता है ना जिसमे बारिश से पानी भर जाता है उसी में चलाया करता था पता नही क्या खुशी मिलती थी मुझे गड्ढ़े में अपनी नाव दौड़ा ने में।
वैसे तो बारिश में घर से बाहर ही मज़ा आता है लेकिन जब झमा- झम बारिश धीमी- धीमी फुआरो में बदल जाती और बारिश में नहाते भीगते उछल - कूद करके मन भर जाता तो पूरे भीगे- भागे हम घर मे चले आते हम इतने भीगे रहते की हमे देखते ही दादी नाराज़ होने लगती भर गया मन के और भिगोगे बारिश में बताओ, अरे ठंड बैठ जाएगी बहु तो तुम्हे डाँटती नही बस ये कहते हुए तौलिया हमारे सिर पर रगड़ने लगती। हार्दिक भईया और मानसी दादी की बात सुनते रहते पर मैं मुझे तो रसोई से आती बड़ी अच्छी महक अपनी ओर खींच लेती मैं भीगा हुआ गीले कपड़ो में रसोई में जाता तो माँ
पकोड़े तलती नजर आती मैं उनकी साड़ी के पल्लू को पकड़ खुदको उसमे लपेट लेता और कहता माँ मेरे लिए बना रही हो ना माँ कहती नही तो , नही मेरे लिए ही बना रही हो ये कहते हुए थोड़ा इतरा कर उनका प्यारा बच्चा बनकर मैं माँ को लाड़ दिखाते हुए दोनों हाथों से उन्हें पकड़ लेता माँ मुझे पहले गोद में उठाती और फिर अपने पास बैठा लेती और अपने हाथ से मुझे प्याज के पकौड़े खिलातीं मैं बड़ा खुश होता। माँ के हाथों से बने प्याज पकौड़े और आलू पूरी मेरी फेवरेट थी दरसल मेरी ही नही हम तीनों भाई- बहन की ही फेवरेट थी माँ के हाथों से बने खाने का स्वाद ही अलग होता है जो किसी और के हाथो से बने खाने से कभी मैच नही हो सकता।
बचपन मे इसलिए भी मुझे बारिश की बूंदे बड़ी पसन्द थी क्योंकि जब आसमान से ये बूंदे बरसती तो माँ हमेशा हमारे लिए गरमा - गर्म पकौड़े जो तलती थी।
ये खिड़की में धुँआ क्यों नज़र आ रहा है ओह ! समीक्षा मेरी धर्म पत्नी गर्म चाय का कप लिए खड़ी है सॉरी समी मेरा ध्यान कहीं और था। वाह गरमा- गरम चाय उसके साथ पकोड़े भी मुड़ और भी अच्छा हो गया मेरी वाइफ़ के हाथों में जादू है मैंने समीक्षा की तारीफ करते हुए कहा तो समीक्षा मुस्कुरा दी। वो अपनी तारीफ़ से खुश होकर नही मुस्कुराई बल्कि मेरे इस तरह तारीफ़ करने पर मुस्कुराई क्योंकि वो अच्छी तरह जानती है कि मैंने जो भी कहा सिर्फ उसे खुश करने के लिए कहा वरना मुझे तो जादू माँ के हाथों में ही लगता है और सच कहूं तो ये बारिश की बूंदे मुझे माँ की याद दिलाती है उनके हाथों से बने पकौड़े आलू पूरी खाकर जो खुशी मिलती थी वो अब नही मिलती। मैं कभी - कभी सोचता हूँ कि हम क्यों बड़े हो गए कितना अच्छा होता कि हम छोटे ही रहते मैं भईया मानसी हम खूब मस्ती करते खूब उछल- कूद करते और माँ हमारे लिए आलू पूरी बनाती और उतने ही प्यार से हमे खिलाती जैसे बचपन मे खिलाया करती थी।
भले ही बारिश की ये बूंदे किसी को अपने प्यार मेरा मतलब अपने प्रेमी या प्रेमिका की याद दिलाती हो पर मुझे तो ये अपने परिवार अपने बचपन की याद दिलाती है सड़क के उस गड्ढ़े की भी जिसमे नाव चलाना मेरे लिए खुशी की बात हुआ करती थी।





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