कल जब घर से कॉल आया तो पहली फ्लाइट पकड़ कर सीधा घर आ पहुंचा। ये बाहर वाला गेट अभी भी वही पुराना है खोलने पर आवाज जरूर करता है इतने दिनों में पापा ने इसे चेंज क्यों नही कराया । बाउंड्री वॉल के पास लाइन से अभी भी फूलों के पौधे लगे हुए है और ये अमरूद का पेड़ कितना बड़ा हो गया है जब इसमें पहली बार अमरूद आये थे तो कितना खूश हुआ था मैं। आज भी पेड़ पर चढ़कर अमरूद तोड़ने को जी कर रहा है मैंने अपनी शर्ट की बाहों को फोल्ड किया और पेड़ पर चढ़ गया कुछ अमरूद तोड़े की माँ बाहर आ गई ।
आशु बेटा आते ही अमरूद तोड़ने लगे। मैं मुस्कुराया और पेड़ से नीचे उतर आया। माँ मुझे देखकर खुश हुई पर मैं खुश न हो सका माँ के काले बाल सफेद हो गए थे और उनकी आंखों के नीचे काले घेरे आ गए थे ऐसा लग रहा है जैसे कई दिनों से माँ सोई न हो। पापा कहाँ है मैंने पूछा तो माँ ने कहा अंदर है अपने रूम में। हॉल में अपना बैग रख मैं पापा के रूम में चला गया उनसे मिलने। रूम में खामोशी सी छाई हुई थी खिड़की से होते हुए रोशनी कमरे में आ रही थी पर फिर भी थोड़ा अंधेरा सा था। पापा तकिये का सहारा लिए टिककर बैड पर बैठे हुए थे मुझे देखते ही बहुत खुश हो गए मेरी ओर पापा ने हाथ बढ़ाया तो मैंने उनका हाथ थाम लिया और वहीं उनके पास बैठ गया। आप ठीक है हाँ मैंने पूछा तो पापा ने कहा। लेकिन उनकी हाँ मुझे ना सी लग रही थी कितने कमज़ोर से लग रहे है पापा उनके चेहरे पर मुझे थकान नज़र आ रही थी कई मिलों अकेले चलने के बाद जब हम थककर ठहरते है तो
हमारी सारी थकान सिमट कर हमारे चेहरे पर आ जाती है और हमारा हाल बयाँ कर देती है पापा भी ऐसे ही लग रहे थे थके हुए। मैं कुछ देर पापा के पास बैठा रहा और वो सवाल करते रहे मैं कैसा हूँ मेरा ऑफिस का काम कैसा चल रहा है मैं अपना ख्याल रखता हूँ कि नही और भी बहुत कुछ।
शाम को डिनर के बाद अपने कमरे में बैठा हुआ मैं उसे गौर से देख रहा था सब कुछ वैसा ही रखा है मेरा डेक्सटॉप मेरी गिटार मेरी बुक्स मेरा हर सामान वहीं है जहाँ था।
कितना नाराज़ था मैं तब पापा से नही जाना चाहता था अपने घर से अपने शहर से दूर। लेकिन पापा यही चाहते थे कि मैं एक अच्छी यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी करूँ इसलिए भेज दिया था मुझे घर से सबसे दूर। मैं मन ही मन दुखी था कहना चाहता था कि मैं नही जाना चाहता पर नही कह सका। दिल्ली में मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की और फिर बैंगलोर चला गया। इन दस सालों में मैं घर नही आया। फोन पर माँ से बात होती रहती थी पर कुछ दिनों तक मैंने पापा से बात नही की थी क्योंकि मैं उनसे नाराज था कुछ वक्त तक घर से दूर दूसरे शहर में मुझे अच्छा तो नही लग रहा था पर धीरे- धीरे वहां की आदत हो गई। उसके बाद बैंगलोर में मैंने एक कम्पनी जॉइन करली और वही रहने लगा जैसे अपने घर अपने शहर को भूल ही गया। दो दिन पहले जब माँ ने फ़ोन पर कहा आशु बेटा कुछ दिनों के लिए घर आ जाओ मैं कुछ पल खामोश रहा न हाँ कहा और न ही ना कह सका अपना ख्याल रखना कहकर माँ ने फ़ोन रख दिया। मैं अपने कैबिन में बैठे हुए सोचने लगा कि मैं क्यों कुछ नही बोल पाया क्या मैं अपने घर नही जाना चाहता क्या मैं अब बदल गया हूँ वो आशुतोष नही रहा जिसे अपने घर अपने शहर से लगाव था। खुद से कई सवाल करने के बाद मैंने टिकिट बुक कराई और अपने घर आ पहुँचा। मैं एक सप्ताह के लिए आया हूँ चार रोज बीत गए है और मैंने ये महसूस किया कि मेरे आने से माँ - पापा बहुत खुश है और पापा की तबियत भी धीरे- धीरे ठीक हो रही है। इसलिये तो माँ ने मुझे बुलाया दरसल कुछ वक्त से पापा को कुछ हेल्थ प्रॉबलम्स होने लगी थी जिसकी वजह से माँ भी थोड़ी परेशान थी मेरे घर आने के बाद ही मुझे सब मालूम हुआ। वक्त ऐसे निकल गया जैसे कि हाथों से रेत। कल मैं चला जाऊँगा और सब कुछ मिस करूँगा माँ रोज मेरी पसंद का ही खाना बनाती है मैं रोज पापा के साथ बैठकर चेस खेलता हूँ
परसो चौपाटी भी गया था शहर की गलियां अभी भी मुझे पहचानती है सब कुछ उतना ही अपना सा है जितना पहले था। शाम को जब माँ मेरे पास आकर बैठीं तो मैं उनकी गोद मे सिर रखकर लेट गया वो अपने हाथों की उंगलियों से मेरे बालों को सहलाये जा रही थी मैं उन्हें अपने ऑफ़िस के बारे में बैंगलोर के बारे में बता रहा था वो सुनती जा रही थी मेरी हर बात को। माँ मुझे पैकिंग करनी है कल निकलना है ना। मेरे बालो को सहलाते माँ के हाथ कुछ पल के लिए रुक गए कुछ कहा नही पर शायद कुछ कहना था। शाम को डिनर के वक्त माँ - पापा दोनों ही ये जताने की कोशिश कर रहे थे कि वो खुश है शायद इसलिए की मैं फ़िक्र न करूं। रात को नींद नही आ रही थी तो उठकर बाहर आ गया। देखा तो माँ- पापा भी लॉन में थे मैं उन्हें देखकर वापस रूम में आ गया आज शायद उन्हें भी नींद नही आ रही। सुबह अपने सामान के साथ मैं जाने के लिए खड़ा था और टैक्सी का वेट कर रहा था पापा कह रह थे अपना ख्याल रखना ठीक से रहना माँ- पापा दोनों बहुत कुछ कह रहे थे और बार- बार मुझे देखे जा रहे थे। टैक्सी आ गई थी और अपना सामान रख मैं उसमे बैठ गया माँ की आँखे थोड़ी नम थी लेकिन फिर भी उन्होंने मुस्कुराते हुए मुझे बाय किया और पापा वो सिर्फ मुझे देख रहे थे ऐसा लगा जैसे पापा कुछ कहना चाहते थे पर नही कह पाए । जो पापा कह ना सके वो मैं समझ गया था इसलिए लौट आया। लौट आया अपने घर हमेशा के लिए।

No comments:
Post a Comment