फूल







कई साल बाद आज अपने गाँव जा रहा हूँ गाँव की तो बात ही अलग है शहर के शोरगुल के विपरीत शांत वातावरण , पेड़ो की शुद्ध ठंड़ी हवा जो तन को छुते ही मन को सुकून पहुँचा दे। गाड़ी में बैठे- बैठे मुझे आज वो पल याद आ रहे है जो मैंने अपने गाँव में बिताये है। खिड़की से बाहर देख रहा हूँ तो सब कुछ वैसा ही लग रहा है जैसा पहले था कच्ची- पक्की सड़क, सड़क किनारे खेत, खेतो में काम करते लोग कुछ नही बदला। जैसे ही मेरी गाड़ी गाँव की सीमा पर पहुँची मैंने ड्राईवर से कहा- हाँ भईया ये जो मोड़ दिख रहा है जहाँ बोर्ड लगा है, लिखा है ग्राम सुहानपुर यही मेरा गाँव है गाड़ी इसी रास्ते पर ले चलो। इसी रास्ते पर थोड़े आगे जाकर मेरा स्कूल है पर इससे पहले कुछ और भी है जो रास्ते में पड़ता है एक बाग जिससे मेरी खास याद जुड़ी हुई है।
गाँव में घूमते-घामते आखिर मैं वहाँ आ ही गया जहाँ मुझे आना था मेरा घर , जहाँ कभी मैं और मेरा परिवार रहता था। जो सामान जहाँ जैसा छोड़कर गये थे सब वैसा ही है। मैंने घर में रखी लकड़ी की अल्मारी भी खोलकर देखी कुछ थोड़ा बहुत सामान है इसमे। सामान के बीच मेरे हाथ आई किताब।
ये किताब तब की है जब मैं दसवी कक्षा में था मैंने किताब के पन्नो को पलटना शुरू किया और तब हाथ आया एक फूल एक सूखा फूल। इस फूल से मेरी एक खास याद जुड़ी हुई है।
ये बात तब की है जब मैं स्कूल में पढ़ता था
मेरी ही क्लास में एक लड़की थी रिमझिम। जोकि मुझे अच्छी लगती थी। और रिमझिम को अच्छे लगते थे फूल वो भी फूलबाग के। हमारे स्कूल से कुछ दूर पर फूलो का बाग था उस बाग में बड़े ही खूबसूरत फूल लगते थे। मैं हर रोज फूलो की चोरी करता और रोज
रिमझिम को फूलबाग के खूबसूरत फूल लाकर देता। रिमझिम फूल लेकर बड़ी खुश हो जाती। ये सिलसिला
हर रोज का हो गया था। पर रोज -रोज चोरी करना कोई आसान बात तो है नही। कोई रोज फूल चुरा रहा है इस बात की खबर बृजेश काका जोकि वहाँ के
चौकीदार थे उन्हें हो गई थी। फिर क्या था बाग का पहरा बढ़ गया। और मेरे लिए फूल चुरा पाना थोड़ा मुश्किल हो गया। एक दिन मैं हर रोज की तरह सुबह जल्दी अपने दोस्त के साथ फूल तोड़ने चला गया। मेरा दोस्त मेरी मदद के लिए सड़क किनारे खड़ा हो गया ताकि अगर कोई आये तो वो मुझे बता सके और मैं बाग के अंदर चला गया मैं सिर्फ एक ही फूल तोड़ पाया था की आवाज आई चोर-चोर , चोर- चोर मैने देखा काका डंडा लेकर मेरी ओर ही आ रहे थे तब हालात ये थे की मैं आगे दौड़ रहा था और काका मेरे पीछे। उस दिन तो पूरे बाग के चक्कर ही लगा दिये थे मैंने। और मेरा दोस्त उसने तो ऐसी दोस्ती निभाई की मुझे छोड़कर भाग गया। खैर मैं भी जैसे- तैसे बचकर भाग निकला। और अच्छा ये था की काका ने अपना नजर वाला चश्मा नही पहना हुआ था इसलिए वो मुझे पहचान ना सके। मैं काका से तो बच निकला था पर अपने घर पर फस गया था क्योंकि पिताजी ने जो , मुझे इतनी सुबह बाहर से आते देख लिया था मैंने फूल तो छिपा लिया था पर पिताजी के सवाल से न बच सका। मैं पिताजी से बहुत डरता था उनके सामने तो मेरी आवाज भी नही निकलती थी। जब उन्होंने पूछा की कहाँ से आ रहे हो तब मैंने हिम्मत कर धीमी आवाज में उत्तर देते हुए कहा- पिताजी मैं टहलने गया था आप ही कहते है ना हमे सुबह जल्दी उठकर टहलना चाहिये सुबह उगते हुए सूरज को देखना चाहिए।
मैंने ये कह तो दिया पर डर के मारे मेरा दिल जोर- जोर से धड़के जा रहा था क्योंकि पिताजी से झूठ बोलना आसान नही है वो तो मेरी किस्मत अच्छी थी की पिताजी ने मेरी बात पर भरोसा कर लिया और मैं बाल-बाल बच गया।
आज जब मैं स्कूल पहुँचा तो मैं मन ही मन इस बात से खुश हो रहा था की चाहे कितनी भी परेशानी आई पर मैं रिमझिम के लिए फूल ले ही आया और मैंने उसे दे भी दिया और हर बार की तरह वो फूल लेकर बड़ी खुश भी हुई। उस दिन के बाद भी मैं रिमझिम के लिए फूल लाता रहा।
पर एक दिन ऐसा आया की रिमझिम मेरे लिए फूल लेकर आई थी। उस दिन मैं गाँव छोड़कर शहर जा रहा था पिताजी की सरकारी नौकरी थी उनका तबादला शहर हो गया था और इसलिए हम जा रहे थे। उस दिन रिमझिम ने मुझे फूलबाग का फूल लाकर दिया था जिसे मैंने अपनी किताब के पन्नो के बीच रख लिया था। हमारी ये फूल की कहानी उस दिन खत्म हो गई। आज रिमझिम कहाँ है ये तो मुझे नही पता पर फूल बाग में फूल अभी भी खिले हुए है।


शिकायत



कभी न कभी एक दिन ऐसा जरूर आता है जब हमारे अपनो को हमसे और हमे उनसे कोई शिकायत जरूर होती है। जिसे हम कभी ज़ाहिर कर भी देते है और कभी नही भी करते है। मैं जब छोटी थी तब मुझे अपने मम्मी पापा से शिकायत थी की वो मुझे टाइम ही नही देते  हर वक्त बस बिज़ी रहते है दोनो ही अपना-अपना अलग बिज़नेस कर रहे थे। और सबसे आगे जाने की होड़ में लगे हुए थे। ना उनके पास एक दूसरे के लिए समय था और ना ही मेरे लिए। उन्हें देखकर में यही सोचती थी के मैं कभी किसी बिज़नेस मेन से शादी नही करूँगी और ना ही मैं खुद कभी कोई भी बिज़नेस करूँगी। पर जैसे - जैसे बड़ी होती गई मुझ पर अपनी फैमली, सोसायटी का प्रभाव पड़ने लगा। मैं भी उनकी तरह बहुत प्रैक्टिकल हो गई। और एक दिन मेरी शादी हो गई प्रनव से। प्रनव भी बिज़नेस करते है जिससे मुझे अब कोई शिकायत नही थी हो भी क्यों क्योंकि मैं खुद भी यही कर रही थी। मैने शादी के पहले ही अपना खुद का बिज़नेस स्टार्ट कर दिया था जिसमे पापा ने मेरी हेल्प की थी। प्रनव को भी इससे कोई प्रोब्लम नही थी। अब हाल ये था की मैं तो हर वक्त बिज़ी थी मुझे लगा की प्रनव भी पापा की तरह होंगे बिल्कुल प्रैक्टिकल इसलिए मैं कभी ये नही सोचती थी की वो मेरा साथ चाहते है या मेरा साथ देना चाहते है।
ऐसा कई बार हो जाता था की मैं कभी-कभी ऑफिस से आने में लेट हो जाती थी तब प्रनव मुझे जागे ही मिलते थे कभी लेपटॉप पर काम करते तो कभी फोन पर किसी से बात करते तब मुझे यही लगता था की वो बिज़नेस से जुड़ा अपना कुछ काम कर रहे होंगे।
मेरे लेट आने पर प्रनव ये जरूर पूछते थे की तुमने डिनर कर लिया और तब मेरा जवाब हाँ होता था। फिर मैं भी यही सवाल उनसे कर लेती थी तब उनका हाँ ऐसा लगता था मानो जैसे हाँ में कुछ और कह गये हो। जो शायद मुझे तब समझ नही आता था।
मैंने देखा है की अक्सर त्यौहारो पर ऐसा हो जाता था के पापा को बिज़नेस मीटिंग के लिए शहर से बाहर जाना पड़ जाता था। पापा कभी भी मीटिंग केंसिल नही करते थे। और मैं ठहरी पापा की बेटी मैं भी काम को ज्यादा इम्पोर्टेंस देती थी। इसलिए चाहे कुछ भी हो मैं कभी कोई मीटिंग कोई काम केंसिल नही करती थी। पर प्रनव अलग निकले वो तो त्यौहारो के समय अपने वर्कर्स को भी तीन दिन पहले से ही छुट्टी दे देते है और खुद भी घर पर रहते है।
दिवाली का दिन था मैं घर पर ही थी पूजा शुरू होने वाली थी अचानक मुझे कुछ काम आ गया और मुझे जाना पड़ा। मैं कुछ ही देर में वापस आ गई थी पर मेरे पहुँचने के पहले ही पूजा हो गई थी। ये प्रनव और मेरी साथ में दिवाली की पहली पूजा थी मुझे लगा प्रनव शायद कुछ कहेंगे पर वो कुछ नही बोले। हमारी जिंदगी इसी तरह आगे बढ़ती रही और शादी को पूरे एक साल होने वाले थे।
मैंने अपने घर में ये देखा था की मम्मी पापा अपनी शादी की सालगिरह पर पार्टी देते थे और अपने सारे रिश्तेदारों और खास कर अपने बिज़नेस से जुड़े लोगों को ,पार्टनर्स को जरूर बुलाते थे। मुझे लगा की मुझे भी यही करना चाहिए प्रनव और मैं भी बिजनेस से जुड़े अपने फ़्रेंड्स को ,जान पहचान वालो को पार्टी में बुलाएंगे जोकि हमारे लिए अच्छा ही होगा। ये फैसला मैने खुद ही ले लिया था मुझे लगा प्रनव को इससे कोई प्रॉब्लम नही होगी मैंने तैयारी भी शुरू कर दी थी पर जब प्रनव को मैंने बताया तब वो इस बात से खुश नजर नही आये। और बिना कुछ बोले अपनी मीटिंग के लिए चले गये। मैं भी अपने ऑफिस आ गई मन नही था मेरा। पर मैं फिर भी आ गई।
आज मेरी निशि से बात हुई उसने बताया की उसके पति और उसका हमेशा झगड़ा होता रहता है उन दोनो को एक दूसरे से हमेशा शिकायतें ही रहती है।
निशि से बात करने के बाद आज मैं खुद के और प्रनव के बारे में सोच रही हूँ। मैं हर वक्त बस प्रैक्टिकल होकर ही जीती रही बिना ये जाने की प्रनव क्या सोचते है अपने काम को लेकर , रिश्तो को लेकर। उन्हें मुझसे कोई शिकायत तो नही मैंने ये कभी नही सोचा। और उन्होंने कोई शिकायत कभी की भी नही।
आज मुझे दादी माँ की बात याद आ रही है वो कहती थी के "अगर कोई शिकायत नही करता तो इसका मतलब ये नही के उसे कोई शिकायत नही " बस वो कहना नही चाहता। मैं जानती थी के कही न कही गलती मुझसे ही हुई है मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया था आज मैं जल्दी घर पहुँच गई ताकि प्रनव से बात कर सकूँ। उनके आते ही मैंने बात करना शुरू कर दिया प्रनव मुझे हैरान नजरो से देख रहे थे डिनर के बाद जब प्रनव बाहर गार्डन के झूले पर बैठे हुए थे तब मैं भी उनके पास जाकर बैठ गई आज हम बहुत देर तक साथ बैठे रहे बिना कुछ कहे चुपचाप।
 रात भर मैं यही सोचती रही की प्रनव कितने अलग है उन्हें मेरी फिक्र है मेरे लेट हो जाने पर वो मेरा इंतजार करते, काम न होते हुए भी वो लेपटॉप लेकर बैठ जाते ताकि मेरे आने तक जागे रहे। बस कभी कहते नही की मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था। कभी-कभी वो डिनर के लिये भी मेरा इंतजार करते थे पर हो ऐसा जाता था की उस दिन या तो में बाहर से कुछ खाकर आती थी या फिर लेट हो जाती थी। मैं पूजा में तक उनके साथ नही थी। पर प्रनव ने कभी कोई शिकायत ही नही की। लेकिन आज मुझे खुद, खुद से शिकायत है मैंने प्रनव और अपने रिश्ते को कोई महत्व ही नही दिया। रोना आ रहा था मुझे , ये सोचकर की मैं कितनी नादान थी जो प्रनव को समझ ही ना सकी।
सुबह मैंने प्रनव से बात करने की कोशिश की पर वो मुझसे नजर ही नही मिला रहे थे न कुछ कह रहे थे।
शिकायत तो थी उन्हें मुझसे बस वो कह नही रहे थे। मैंने ही रिश्ता ऐसा बनाया की वो अपना हक समझ मुझसे कुछ भी नही कहते।
फिर मैंने ही थोडी तेज आवाज में शब्दो पर जोर देते हुए कहा- नाराज है मुझसे, अगर कुछ शिकायत है तो कहते क्यों नही आप चुप क्यों रहते हो , मुझे पता है की कुछ शिकायते है आपको मुझसे बस आप कह नही रहे। बस इतना कह मैं चेहरा उदास कर चुपचाप बैठ
गई।
तब जाकर प्रनव बोले - शिकायत है नही , शिकायत थी वो भी तुम्हारी नादानी से तुम से नही।
धीरे -धीरे सब ठीक हो गया। वो शिकायतें जो कभी प्रनव ने की ही नही वो भी खत्म हो गई और जो मुझे खुद से थी वो भी।

अब मैंने हर वक्त प्रैक्टिकल होकर जीना छोड़ दिया है। मैं कोशिश करती हूँ कि ज्यादा से ज्यादा समय प्रनव के साथ रहूँ ताकि अब कोई शिकायत अगर हो  तो वो मुझसे कह सके अपने मन में ना रखे।




उलझन



रविवार का दिन यानी छुट्टी वाला दिन ऑफिस जाने की कोई चिंता नही। सुबह का चमकता सूरज निकल गया था उसकी किरणें खिड़की से होती हुई मेरे चेहरे पर पड़ रही थी जोकि की मुझे नींद से जगाने की कोशिश कर रही थी और मैं जागा भी। उठकर घड़ी में
देखा तो आठ बज रहे थे नताशा मुझसे पहले जाग चुकी थी और शायद किचन में थी। मैं अलसाया सा
अंगड़ाइयां लेते हुए जैसे-तैसे उठकर ब्रश कर हॉल में पहुँचा और सोफे पर जा बैठा। नताशा ने चाय लाकर मेरे सामने रख दी। मैंने चाय का कप उठाते हुए पूछा- तुमने चाय पीली। हाँ कहते हुए नताशा ने कहा तुम तैयार हो जाओ जब तक मैं अपना काम खत्म कर लेती हूँ। हम दोनो हर सन्डे को बाहर घूमने जाते है।
आज भी जायेंगे। 
मैं तैयार होने के बाद हॉल में आकर अखबार पढ़ने लगा क्योंकि अभी नताशा तैयार हो रही है जिसमे उसे काफी वक्त लगता है। इसलिए तब तक मैं अखबार ही पढ़ लेता हूँ। अखबार पढ़ना शुरू ही किया था कि डोर बेल की आवाज आई। मैंने उठकर दरवाजा खोला सामने पोस्टमेन था उसने मुझे नताशा के नाम का लेटर थमाया रजिस्टर पर साइन लिए और चला गया।नताशा के लिए उसके ऑफिस से लेटर आया था
उसका प्रमोशन लेटर। जिसमे लिखा था की उसका प्रमोशन जबलपुर हुआ है। मैंने लेटर अखबार के बीच में रख दिया। नताशा तैयार होकर आ गई थी हम दोनो घर से निकल गये। आज हम खुशी पार्क गये थे।
बहुत अच्छि जगह है ये। इसे बहुत ही बढ़िया तरह से तैयार किया गया है। यहाँ आकर हर इंसान खुशी ही महसूस करता है। बस शायद मैं ही नही कर पा रहा था।
जब हम कहीं बाहर से वापस घर आते है तो काफी थका महसूस करते है। कुछ यही हाल हमारा भी है नताशा तो थकान की वजह से जल्दी सो गई। पर मुझे
नींद नही आ रही थी। मैं काफी रात तक जागा रहा।
सुबह जब ऑफिस के लिए निकल रहा था। तब नताशा ने मुझे अपना प्रमोशन लेटर दिखाया। लेटर देखते ही मैं अपनी लड़खड़ाई जबान में बोला- अरे ये लेटर सॉरी मैं तुम्हे बताना भूल गया था ये कल आया था। अच्छा हुआ की तुम्हारे हाथ में आ गया। वैसे congratulation तुम्हारा प्रमोशन हो गया।
नताशा ने बहुत ही छोटी सी मुस्कान के साथ थैंक्यू कहा और फिर हम दोनो ऑफिस के लिए निकल गये।
मेरा आज ऑफिस में मन नही लग रहा था इसलिए मैं घर जल्दी आ गया। आज मन में कई सवाल उठ रहे है
जिनमें मैं खुद को उलझा महसूस कर रहा हूँ।
दो साल हो गये है हमारी शादी को। हमारा रिश्ता और पति पत्नी से अलग है ये एक उलझा हुआ सा रिश्ता है। हमारे रिश्ते में समझ की कोई कमी नही है समझ तो बहुत है कभी भी ऐसा नही हुआ के किसी भी वजह से हमारे बीच थोड़ी भी बहस हुई हो। हमने कभी भी एक दूसरे से किसी भी बात की कोई शिकायत ही नही की इसलिए के हम एक दूसरे को
बहुत अच्छे से समझते है। " ऐसा नही है शायद इसलिए के हम एक दूसरे पर अपना हक ही नही समझते " साथ रहते हुए भी हमारे बीच फासले रहे।
दोस्ती , प्यार ,अपनापन ये हमारे रिश्ते में कभी नही रहा। हम एक दूसरे के लिए अगर कुछ भी करते है तो अपनी जिम्मेदारी समझकर करते है अपना मानकर
कर नही। मैं नताशा से शादी नही करना चाहता था।
क्योंकि मैं किसी और को पसन्द करता था। नताशा
करियर में आगे बढ़ना चाहती थी। वो भी शादी से खुश नही थी। पर फैमली के आगे हमारी नही चली और हमारी शादी हो गई। नताशा ने मुझसे पहले ही कह दिया था की मैं कभी भी उसके कैरियर के आड़े नही आऊंगा। मैने भी ये कहते हुए हाँ कह दिया था की मुझे उससे कोई मतलब नही वो जो चाहे करे।
मैंने कभी भी उसकी लाइफ में कोई दखल नही दिया।
पर आज मैं उलझन में पड़ गया हूँ क्योंकि मैं क्या महसूस कर रहा हूँ वो मैं नही समझ पा रहा। कल मैंने
नताशा का प्रमोशन लेटर अखबार में छिपा दिया मैंने 
ऐसा क्यों किया मुझे समझ ही नही आ रहा। एक डर सा लग रहा है इस बात का के क्या नताशा चली जायेगी। मैं चाहता हूँ के वो ना जाये। पर मैं ऐसा क्यों चाहता हूँ जबकि हम दोनो के इस रिश्ते में कुछ ऐसा नही है जिसके लिए हम साथ रहे। हम तो हर सन्डे भी साथ घूमने सिर्फ इसलिए जाते है ताकि ऑफिस स्ट्रेस को कम कर अपने माइंड को थोड़ा फ्रेश कर सके। वो खामोश रिश्ता जिसमे हम जरूरत से ज्यादा एक दूसरे से बात तक भी नही करते क्या इस रिश्ते में भी कुछ ऐसा है जो हमे बांधे हुए है। शायद है। मैं नताशा को चाहता हूँ के नही ये तो नही पता पर उसके बगेर नही रह सकता ये जरूर समझ गया हूँ।
रात को डिनर के वक्त मैं नताशा से बात करना चाह रहा था जानना चाहता था की क्या वो जबलपुर जाने वाली है पर मैं नही पूछ सका पर फिर मैंने हिम्मत कर पूछ ही लिया क्या तुम जबलपुर जा रही हो। नताशा ने कहा -तुम क्या चाहते हो। मैंने घबराते हुए कह दिया मुझे कोई प्रॉब्लम नही है तुम जो चाहे फैसला लो। मैंने ऐसे जताया जैसे उसके जाने से मुझे कोई फर्क नही पड़ता। जबकि मन तो मना कर देने का था पर जब मैंने कभी अपना कोई हक समझा ही नही तो आज कैसे रोकलूँ।
आज मंडे है नताशा आज जा रही है। अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए वो मेरा सारा समान ठीक से जमाकर और मुझे बताकर जा रही है। की कौनसी चीज़ किस जगह रखी है। मैं भी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए उसे स्टेशन छोड़ने जा रहा हूँ कैसी उलझन है रोकना चाहता हूँ पर छोड़ने जा रहा हुँ  बहुत कुछ कहना चाहता हूँ पर खामोश हूँ। मैं नताशा को स्टेशन छोड़ आया रुका नही क्योंकि
उसे जाते हुए नही देख पाता। शाम हो गई थी मैं
घर आकर चुपचाप गुमसुम सा सिर झुकाए आँखे बंदकर बैठ गया। कुछ आवाज सी कानो में पड़ी मैंने देखा तो  टेबल पर चाय से भरा कप रखा हुआ था। और जब नजर उठाकर सामने देखा तो नताशा खड़ी हुई थी। ना होते हुए भी कुछ तो था हमारे रिश्ते मैं जिसकी वजह से नताशा आज नही जा सकी।

स्कूल में बचपन



बचपन , जीवन का वो हिस्सा है जो सबसे खूबसूरत माना जाता है किसी को कुछ याद हो न हो अपना बचपन सभी को याद होता है जब भी कभी किसी से ये पूछा जाता है कि अगर कुछ ऐसा हो जाये जिससे उसे अपने बीते कल को जीने का फिर से मौका मिल जाये तो वो किस पल को दोबारा जीना चाहेंगे। तब उत्तर यही होता है -बचपन। हम सब अपने बचपन को ही दोबारा जीना चाहते है पता है क्यों क्योंकि बचपन सबसे मासूम होता है बहुत मासूम।
आज नकुल का स्कूल में पहला दिन है मैंने रात को ही अलार्म सेट कर दिया था ताकि मैं सुबह जल्दी उठ जाऊ। उठते ही मैंने सारा काम जल्दी-जल्दी खत्म किया खुद भी तैयार हुई और नकुल का टिफिन तैयार किया और साथ ही उसका बैग भी जमाया पर सबसे मुश्किल नकुल को उठाना है और उसकी आँखो से नींद उड़ाना आखिर बच्चा है। बच्चे स्कूल में भी आधे नींद में रहते है। पर जैसे तैसे मैने नकुल की आँखो से नींद उड़ाई। उसे तैयार किया और हम पहुँचे स्कूल।
नन्हे- नन्हे छोटे- छोटे बच्चे बहुत ही प्यारे इन्हें देख मन इतना खुश हुआ की क्या कहूँ। नकुल भी अपनी उम्र के बच्चो को देख बड़ा खुश हो गया। पहले लग रहा था की पता नही ये स्कूल में रुकेगा भी के नही पर अब लग रहा है कि शायद रुक जायेगा। मैंने यहां की टीचर से बात करली थी की मैं कुछ वक्त यही स्कूल में रुकुंगी। मैं टीचर्स के स्टाफ रूम में बैठ गई और रूम की खिड़की से बाहर देखती रही। छोटे - छोटे बच्चे प्रेयर के लिए लाइन से खड़े हुए अपने दोनो हाथो को जोड़कर प्रेयर कर रहे वो कभी हिलते डुलते तो कभी अपनी लाइन से निकल कर दुसरो की लाइन में जाते ।
और टीचर को देखते ही बिल्कुल मासूम बनकर खड़े हो जाते। प्रेयर खत्म होते ही बच्चे अपनी क्लास में पहुँच गये। और फिर शुरू हुई पढ़ाई A फॉर एप्पल ,B फॉर बॉल शुरू में बच्चे बड़े उत्साह से पढ़ाई करते है। 
लेकिन कुछ ही देर बाद कोई बच्चा रोने लगता है ये कहकर की मम्मी के पास जाना है तो कोई बच्चा कहता है की उसकी तबियत खराब है अब उसे घर जाना है। फिर उनकी मेम बड़े प्यार से उन्हें मनाती है कई तरह की बाते बनाती। जिससे कुछ देर बच्चे बेहल जाते है। पढ़ाई के बाद समय होता है खेलने का।
लंच टाइम। बच्चे टिफिन फिनिश कर खेलने में लग जाते है और खूब उधम मचाते है। स्कूल में बच्चो को लंच टाइम ही सबसे ज्यादा पसन्द होता है। भागते दौड़ते एक दूसरे को पकड़ते। हस्ते मुस्कुराते हर बात से अंजान गम खुशी अच्छा बुरा कुछ भी नही पता।
चिंता फिक्र सबसे दूर अपने में ही मस्त और हर पल खुश। ना पढ़ाई की टेंशन ना करियर की और न ही किसी और चीज की बस हर पल मौज़ मस्ती और खूब खेलना। 
अपनी मीठी आवाज में मेम मेम बोलते 
और मासूम निगाहों से उन्हें देखते तोतली आवाज में मेम से कई तरह के सवाल पूछते कभी किसी बात पर खिलखिलाकर जोर से हँसने लगते तो कभी मुँह बनाकर रोने लगते। इन्हें देख ऐसा लगा जैसे ढेर सारे तारे एक साथ ज़मी पर आ गये। और सब चमचमा रहे हो। वैसे नकुल भी स्कूल आकर खुश था वो रोया नही। बैल बजी और सभी बच्चो के चहरे पर मुस्कान आ गई छुट्टी जो हो गई। सभी हस्ते मुस्कुराते बाहर आये जँहा उनके माता पिता उन्हें लेने के लिए खड़े थे सब दौड़कर अपने पेरेंट्स के पास गये और एक दूसरे को बाय कहकर घर चले गये।इन्हें देख मुझे तो अपना बचपन याद आ गया। सच में मैं भी इन्ही बच्चो की तरह मासूम और बड़ी  प्यारी थी अपने बचपन में। वैसे सभी का बचपन मासुमियत से भरा होता है जिसमे थोड़ी बहुत शैतानी भी शामिल है। है ना ☺️

हर बात से अंजान भोला मासुमियत भरा मन ऐसा होता है बचपन।

मेरी टीचर



कहते है बिना गुरु के ज्ञान नही मिलता अगर आप ज्ञान चाहते है शिक्षा चाहते है तो गुरु का होना जरूरी है। आज जब ऑफिस से घर आया तब मेरे बेटे ने मुझसे कहा कि पापा आपको पता है कल टीचर्स डे है हमारे स्कूल में कल टीचर्स डे मनाया जायेगा। मैं भी अपनी टीचर के लिए फूल ले जाऊंगा। मैने कहा हाँ बेटा जरूर ले जाना। इतनी बात कह वो अपने खेल में लग गया पर मुझे तो अपना बिता कल याद आ गया।
और याद आई अपनी टीचर की। लीना मेम मेरी फेवरेट टीचर। लीना मेम बहुत ही स्वीट मेम थी। मुझे आज भी याद है जब पापा मुझे होस्टल छोड़ने गये थे मैं बहुत नाराज था क्योंकि मुझे होस्टल में नही रहना था। मैं बहुत जिद कर रहा था और बार-बार पापा का हाथ छुड़ा कर भागने की कोशिश कर रहा था। मैं भागा कि सामने लीना मेम आ गई मैं उनसे टकरा गया। मेम ने मुझे रोते देख लिया था उन्होंने पहले मुझे चुप कराया और फिर पापा के पास ले गई। आप बस 5 दिन यहाँ रहकर देखो अगर आपको यहाँ अच्छा नही लगा तो मैं खुद आपको आपके घर छोड़कर आउंगी। बस इतना कहकर लीना मेम चली गई। मैं होस्टल में
रह गया अपने मन से नही बल्कि पापा आखिरकार मुझे छोड़ ही गये। सुबह जब रेडी होकर मैं अपने रूम से बाहर आया तो लीना मेम मुझे बाहर मिली उन्होंने मुझे मेश ,होस्टल और स्कूल की क्लासेस सब के बारे में अच्छे से समझा दिया। और यहाँ के रूल्स भी बताये। मेश का नाश्ता मुझे ज्यादा पसन्द तो नही आया पर भुख भी लग रही थी इसलिए मैंने खा लिया।
और उदास मन लिए जैसे - तैसे अपनी क्लास में पहुँचा बैल बज गई थी मेम आने वाली थी सबने बुक निकाल कर सामने रखली। थोड़ी देर में मेम भी आ  गईं ये कोई और नही लीना मेम ही थी पहले मैं यही सोच रहा था की मेम शायद केयर टेकर है जब कि वो यहाँ टीचर है। लीना मेम सभी बच्चो को बहुत ही प्यार से पढ़ाती थी मुझे उनकी क्लास अटेंड करना अच्छा लगने लगा। पढ़ाई में कमजोर बच्चो को लीना मेम एक्सट्रा क्लास लेकर पढाती थी धीरे-धीरे मुझे यहाँ अच्छा लगने लगा था क्योंकि हमारा स्कूल दूर था इसलिए हमारी टीचर्स के लिए भी वही पास में होस्टल था लीना मेम शाम को होस्टल के ही गार्डन में कुछ और टीचर्स के साथ मुझे अक्सर दिखा करती थी मैं भी मेम को देखकर वहाँ चला जाता था क्योंकि मुझे मेम के पास रहना अच्छा लगता था। मेम भी मुझे अपने पास बहुत ही प्यार से बैठाती थी। मैं मेम से अपनी हर बात शेयर करने लगा था मेम ने मुझे हमेशा मोटिवेट किया , क्या सही है क्या गलत ये भी मुझे मेम ने ही बताया। मेम मुझसे हमेशा कहती थी कभी भी कोशिश करना मत छोडना प्रयत्न करते रहो। और हार मत मानो रुको मत चलते रहो अपने आपको इतना सरल रखो के कभी उलझो नही मेम की सारी बाते मैंने ध्यान से सुनी। एक बार मैंने भी टीचर्स डे पर मेम को गुलाब दिया था बड़े ही खुश होते हुए तब मेम ने कहा था कि ये फूल भले ही मुझे मत दो अगर तुम मुझे कुछ देना ही चाहते हो तो बस ये करना के अपने जीवन में एक अच्छे और सफल  इंसान बनने की कोशिश करना और हो सके तो कभी किसी की पढ़ाई के लिए सहायता जरूर करना। बस यही बहुत है। मेम की बाते आज भी याद है। मैने पूरी कोशिश की उनके बताये रास्ते पर चलने की और एक अच्छा इंसान बनने की।
गुरु वो प्रकाश है जिसकी चमक से बच्चो का भविष्य उज्वल होता है। गुरु वो है जो हमे अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाते है। गुरु ज्ञान का सागर है।
अपने गुरु का हमेशा आदर करे।

कृष्ण जन्मोत्सव



भारत में कृष्ण जन्मोत्सव का बड़ा महत्व है। इस उत्सव को सभी बड़े जोर शोर से मनाते है। और कृष्ण
भक्ति में डुबे नजर आते है। वैसे तो ये उत्सव पूरे भारत में सभी जगह मनाया जाता है। पर इसका सबसे ज्यादा प्रभाव मथुरा और वृन्दावन में देखने को मिलता है। यहाँ कृष्ण जन्मोत्सव बड़े ही विशाल और भव्य तरीके से मनाया जाता है। दूर -दूर से लोग यहाँ कृष्ण के जन्म उत्सव में शामिल होने आते है। इस दिन सभी कृष्ण के रंग में रंगे नजर आते है। ये सभी जानते है कि कृष्ण जी का जन्म भादो मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को हुआ था। हर साल इसी दिन कृष्ण जन्मोत्सव कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है मंदिरो में बड़े ही श्रद्धा भाव से कृष्ण जी का भजन पूजन किया जाता है।
कृष्ण जी के लिए सुन्दर पालना सजाया जाता है और उस पालने में मोहनी सूरत वाले नन्हे से मोरपंख वाले कान्हा जी को बैठाया जाता। सभी श्रद्धालु पालने की डोर पकड़ कर पालना झूलाते है और उस आनंद को
प्राप्त करते है जो आनन्द माँ यशोधा को प्राप्त होता था जब वह नन्हे से बाल गोपाल को पालने में झुलाती थी और साथ ही कान्हा जी को उनका सबसे प्रिय माखन भी खिलाया जाता है। इस दिन एक और खास बात होती है वो ये की इस दिन दही हांडी भी फोड़ी जाती है। जगह -जगह आज दही हांडी फोड़ने की 
प्रतियोगिता रखी जाती है इस प्रतियोगिता में गोविंदाओं की टोली होती है ( प्रतियोगिता में हिस्सा लेने वाला समूह) अलग-अलग जगह से ये टोलियां प्रतियोगिता में हिस्सा लेने आती है। दर्शको की भी बड़ी भीड़ होती है सभी के अंदर उत्साह नजर आता है। वाकई में बड़ा मजा आता है दही हांडी प्रतियोगिता 
देखने में फूलो से सजी और दही से भरी मटकी को ऊँचाई पर बांधा जाता है टोली के गोविंदा एक दूसरे का सहारा लेकर ऊँचाई पर बंधी दही हांडी तक पहुँचने की कोशिश करते है इसमे वे कई बार असफल भी होते है पर आखिर
में कोई एक टोली सफल हो ही जाती है और गोविंदा
दही से भरी मटकी को फोड़ ही देते है। और फिर सब  खुशी से नाचने लगते है गोविंदा आला रे आला तेरी  मटकी सम्हाल ब्रिज बाला। सच में जो मजा इसे देखने में है उसे शब्दो में बताया ही नही जा सकता इसलिए  एक बार तो इस प्रतियोगिता को देखने जाना ही चाहिए तो जरूर जाए। 
वैसे सभी को पता है कि कृष्ण जी का जन्म रात्रि 12 बजे हुआ था इसलिए आज भी जन्माष्टमी के दिन सभी मंदिरो में घरो में रात्रि 12 बजे तक सभी लोग जागते है भजन पूजन करते है और कृष्ण जी का जन्म होते ही सभी खुशियां मनाने लगते है और फिर सभी बालगोपाल के दर्शन करते है यह उत्सव पूरी रात्रि तक चलता है। इस वक्त भक्तो के चहरे पर जो खुशी
और जो उत्साह नजर आता है वह देखने लायक होता
है सभी कृष्ण भक्ति में डूबे नाचते गाते कान्हा के जन्म की खुशी मनाते दिखाई देते है। नन्द के आनंद भयो जय हो नन्द लाल की हाथी घोड़ा पालकी जय हो नन्द लाल की, जय यशोदा लाल की।
मेरी ओर से आप सभी को कृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाये 🌼जय श्री कृष्णा🌼

एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE