पापा का प्यार




पापा का प्यार,
                      पापा का प्यार कैसा होता है।
जिस तरह माँ  का प्यार होता है वैसा या उससे थोड़ा अलग। पापा का प्यार थोड़ा अलग होता है जोकि 
शब्दो में कम जाहिर होता है लेकिन एहसास में ज्यादा होता है। ये मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ये मैने खुद महसूस किया है। और ये मैंने पिता बनने के बाद ही जाना है।
मैं जब हर रोज शाम को ऑफिस से घर आता हूँ तो 
मेरे घर में आते ही मुझे जो आवाज सबसे पहले सुनाई 
देती है वो है- पापा। जोकि मेरी चार साल की बेटी की 
होती है मुझे देखते ही वो तुरन्त आकर मुझसे लिपट
जाती है और मैं उसे गोद में उठा लेता हूँ। उसकी मीठी
आवाज कानो में पड़ते ही मैं बाहर की सारी परेशानियां कुछ समय के लिए पूरी तरह भूल जाता हूँ
मेरी बेटी दिनभर की सारी बाते बड़े ही चाओ से मुझे बताती है कि उसने आज क्या किया, क्या हुआ सब कुछ। उसके चहरे की ओर देखते हुए मैं चुपचाप उसकी बाते सुनता रहता हूं जब बाते करते हुए वो खिलखिला कर जोर से हँसती है तब उसे देखकर मेरी दिनभर की सारी थकान मानो छु हो जाती है। मुझे 
ऐसा लगता है की मेरी सारी दुनिया अब मेरी बच्ची में 
ही सिमट गई है। मुझे हर वक्त उसका ख्याल रहता है
उसके वर्तमान से ज्यादा मुझे उसके भविष्य की चिंता
रहती है। मैं मन ही मन बहुत कुछ सोचता रहता हूँ
पर अपने मन की बात मैं किसी को भी नही बताता।
मैं अपनी बेटी से बहुत प्यार करता हूँ उसके साथ 
खेलता हूँ हँसता हूँ उसके साथ खाना खाता हूँ मैं सिर्फ
उसका पिता नही हूँ मैं कभी- कभी उसका अच्छा दोस्त भी बन जाता हूँ ताकि जब कभी उसे अपने मन की कोई बात बतानी हो तो वो आसानी से मुझे बता सके।मैं उसे ज्यादा समय तो नही दे पाता पर जितना भी समय दे पाता हूँ उसी में मैं उसे ज्यादा से ज्यादा खुशी देने की कोशिश करता हूँ। एक पिता क्या महसूस करता है ये मैंने पिता बनकर ही जाना है।
 आज जब मैं खुद को देखता हूँ तो यही सोचता हूँ कि
क्या मैं अपने पापा जैसा हूँ पर मुझे लगता है की मैं
उनसे थोड़ा अलग हूँ। जब मैं छोटा था तब मेरे पापा कैसे थे ये जानने के लिए हमे थोड़ा पीछे जाना होगा।हमारे परिवार में हम चार सदस्य थे मम्मी पापा मैं और
मेरी छोटी बहन। मेरे पापा जरा शांत स्वभाव के थे पर घर के फैसले वही लिया करते थे। पापा जब शाम को
ऑफिस से घर आते थे तब हम अच्छे बच्चे की तरह
पढ़ाई करने बैठ जाते थे पापा आकर सबसे पहले एक नजर हमे देखते और फिर उसके बाद ही जाकर वो
आराम से बैठते और फिर माँ पापा को पानी लाकर
देती। पापा ने कभी भी हमको किसी बात के लिए डांटा
नही पर फिर भी हम उनसे डरते थे। हम क्यों डरते थे
पता नही। मुझे याद है जब मेरी बहन रुचि को उसकी दोस्त की एक ड्रेस बड़ी भा गई थी वैसे ही ड्रेस लेनी की उसने पापा से खूब जिद भी की थी पर पापा ने उसे वो ड्रेस नही दिलायी रुचि रोई भी और पापा से गुस्सा
भी बहुत हुई थी पापा ने ड्रेस क्यों नही दिलाई थी पता नही। लेकिन जब वही रुचि बड़ी हुई तब कॉलेज की फ्रेशर पार्टी में जाने के लिये पापा ने उसके बिना मांगे ही उसे बहुत सुन्दर ड्रेस लेकर दी थी। जिसे देख रुचि बड़ी खुश हुई थी और उसके चहरे की खुशी को बड़ी ही चुप निगाहों से पापा  देख रहे थे। ये तो थी रुचि की बात। पर मेरे साथ क्या हुआ था पता है।
   मैं साईकिल चलाना सिख रहा था पापा मेरी मदद
कर रहे थे उन्होंने साईकिल पीछे से पकड़ी हुई थी मैं
धीरे- धीरे साइकिल चलाकर आगे बढ़ रहा था पर कुछ दूर जाकर गिर पड़ा। मैंने पीछे मुडकर देखा तो
पापा दूर खड़े हुए थे मुझे गुस्सा आ गया की उन्होंने
आखिर साइकिल क्यों छोड़ी मैं उनकी वजह से गिर
गया था। इस बात से मैं उनसे मन ही मन गुस्सा हो गया था। पापा के मन में हमारे लिए क्या है ये हम
समझ ही नही पाते थे उन्होंने घर के कुछ नियम भी
बना रखे थे जो मुझे बिल्कुल पसन्द नही थे। मुझे तो
लगता था के पापा को हमसे ज्यादा प्यार ही नही है।
लेकिन बड़े होते- होते मुझे एहसास होने लगा था की
पापा हमे कितना चाहते है।
मैने जब कॉलेज जाना शुरू किया था तब दो दिन ही हुऐ होंगे मुझे बस से कॉलेज जाते हुए शाम को जब मैं कॉलेज से घर आया तो घर के आँगन में गाड़ी खड़ी हुई थी जोकि पापा ने मेरे लिए ली थी मैंने पापा से कहा
नही था की मुझे इसकी जरूरत है बस मैंने मन में सोचा ही था लेकिन पापा को कैसे पता चला पता नही। पापा ने कभी अपने प्यार को जाहिर नही होने दिया उन्होंने कभी नही कहा की वो हमसे बहुत प्यार करते है पर मुझे पता चल गया था की पापा हमसे बहुत प्यार करते है बस कहते ही नही है।
बचपन में उन्होंने रुचि को ड्रेस इसलिए नही दिलाई
थी क्योंकि वो चाहते थे की रुचि ये समझ जाये की
हर ख्वाइश पूरी नही होती कुछ ख्वाईशें अधूरी भी रह
जाती है हमे उन अधूरी ख्वाईशो के साथ जीना आना
चाहिए। और उन्होंने मेरी साइकिल इसलिए छोड़ी थी
क्योंकि वो मुझे ये एहसास कराना चाहते थे की मुझे
आगे अकेले ही चलना है और अगर मैं गिर जाऊ तो
मुझे कैसे फिर से खड़े होना है ये मुझे आना चाहिए। पापा ने बचपन में बहुत कुछ सिखाया है जो तब समझ नही आता था पर अब समझ में आने लगा है। पापा फिक्र तो हमारी बहुत करते थे बस कहते ही नही थे उनके घर के बनाये नियम मुझे आज याद आते
है वो हमारे अच्छे भविष्य के लिए थे समय का मूल्य,
अनुशाशन, धैर्य  ये सब पापा ने हमे सिखा दिया था सच में पापा का प्यार अलग होता है जो दिखता
नही है पर होता है। बस समझने में थोड़ा समय लग जाता है। पापा का व्यवहार हमारे साथ भले ही एक दोस्त की तरह नही था पर फिर भी वो हमे बड़ी अच्छी
तरह समझते थे। "पिता की फिक्र और उनका प्यार मैं 
आज अच्छी तरह जान गया हूँ। क्योंकि आज मैं एक पिता बन गया हूँ।"












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