इंतजार

   

 इंतजार कितना मुश्किल होता है ना। अगर वो कुछ
कुछ पलो का हो या कुछ घन्टो का तो हम जैसे-तैसे
समय काट ही लेते है लेकिन अगर वो कुछ सालो का
हो तो बिल्कुल आसान नही होता। पर ना चाहते हुए भी कभी-कभी हमारे पास  यही एक रास्ता रह जाता है। इंतजार इंतजार और बस इंतजार।

जैसे ही सुबह का अलार्म बजता है मेरा घर में ही दौड़
लगाना शुरू हो जाता है माँ को पूज करनी होती है तो
पूजा की तैयारी करने में मैं उनकी मदद करती हूँ  पापा
को पौधे लगाना पसन्द है उन्होंने कई अलग-अलग
किस्म के गुलाब के पौधे लगा रखे है पौधों की देख
रेख करने में मैं पापा की हेल्प करती हूँ। फिर घर का
काम जोकि मुझे 10 बजे से पहले ही खत्म करना होता
है जिसमे माँ भी मेरी मदद करती है मुझसे ज्यादा उन्हें
फिक्र होती की मैं कॉलेज के लिए लेट ना हो जाऊ। माँ
और पापा दोनो ही मुझे बहुत प्यार करते है और मेरी
फिक्र भी। वो पूरी कोशिश करते है की मुझे अकेलापन
महसूस ना हो उनकी इस कोशिश को देखते हुए मैं भी
उन्हें अपने मन की बात जाहिर नही होने देती और हर पल उनके साथ  खुशी से रहती हूँ।
 आज बहुत दिनों बाद रेशमा से बात हुई पिछले दिनों
को याद कर खूब हँस रहे थे हम दोनो। लेकिन जैसे ही
उसने रुपद का जिक्र किया मैं आगे कोई बात ही नही कर पाई। मैंने फोन रख दिया और कुछ पुरानी तस्वीरे
निकाल कर देखने लगी इन तस्वीरों में कुछ तस्वीरे
तब की भी है जब हम सारे कॉलेज फ़्रेंड साथ में पिकनिक पर गए थे खूब घूमे थे हम सब उस दिन।
बारिश का मौसम , खूबसूरत जगह, पौधों की पत्तियों
पर ठहरा हुआ पानी ,सब कुछ बहुत अच्छा लग रहा था। और साथ में हम सब की मौज़ मस्ती जो मन को और प्रसन्न किये जा रही थी सच में दोस्तो के साथ घूमने जाने का मजा ही कुछ और होता है।
लेकिन उस दिन जो सबसे ज्यादा खास हुआ वो ये
कि रुपद ने मुझे प्रपोज किया और मैने हाँ कह दिया।
हमारे प्यार की ये गाड़ी दो साल चली और फिर
अपने आखरी स्टेशन पर पहुँच गई यानी के शादी।
वैसे रुपद के माता पिता को मैं ज्यादा पसन्द नही आई
लेकिन फिर भी उन्होंने हमारा रिश्ता स्वीकार कर
लिया और हम साथ में रहने लगे तब तक हमारी जॉब भी लग गई। मैं प्राइवेट कॉलेज में बतौर टीचर जॉब करने लगी और रुपद की जॉब एक कम्पनी में लगी।
    रुपद जितना मुझे प्यार करते है उतना ही प्यार मैं भी उन्हें करती हूँ शादी को 6 महीने होने जा रहे थे।
इन 6 महीनों में हमारा रिश्ता और भी मजबूत हो गया
और रुपद के घर वाले से भी मेरा रिश्ता धीरे-धीरे जुड़ने लगा था मैंने सोचा नही था के रुपद इतने केयरिंग होंगे लेकिन शादी के बाद मुझे एहसास हुआ की वो मेरी कितनी परवाह करते है रुपद को सरप्राइस
देना बड़ा अच्छा लगता है वो मुझे कुछ न कुछ
सरप्राइस देते रहते है मैं भी उनके लिए शायरियां
लिखती हूँ और फिर उन्हें सुनाती हूँ मुझे शायरियां
पसन्द है उनका मन हो न हो पर वो मेरा मन रखने के
लिए मेरी शायरियां जरूर सुनते है और फिर तारीफ
करते है जोकि मुझे सुनकर बड़ा अच्छा लगता है।
सन्डे को हम सब घर में ही थे मैंने रुपद के पसन्द का ही
नाश्ता बनाया था उस दिन रुपद ने एक और सरप्राइस
दिया रुपद ने बताया उनका प्रमोशन हो गया है रुपद
का सपना था की वो एक बड़ी कम्पनी में जाये जहाँ वो
अपनी काबिलियत को साबित कर सके और आज वो
मौका उन्हें मिला। रुपद के इस सरप्राइस ने माँ और
पापा के साथ मुझे भी उदास कर दिया। सबका एक
सपना होता है अपने करियर को लेकर रुपद का वही सपना पूरा होने जा रहा था जिसमे में मैं रुकावट नही बनना चाहती थी रुपद ने मुझसे कहाँ भी के अगर
मेरा मन नही है तो वो नही जायेंगे पर मैंने उन्हें नही रोका बस रात भर जाग कर उन्हें देखती रही और सोच रही थी इतने दिनों में मुझे रुपद की कितनी आदत सी हो गई है कैसे रहूंगी मैं इनके बगेर यही सोचते हुए मेरी आँख लग गई और मैं सो गई। दो दिनो के बाद रुपद चले गये। रुपद 5 साल के लिए विदेश गये थे पर वँहा की कम्पनी को उनका काम पसन्द आया इसलिए वो दो साल और वहाँ रुक गये।7 साल हो गए उन्हें गये हुए। इन 7 सालो में मेरा रिश्ता माँ पापा के साथ बहुत गहरा हो गया है बस कमी है तो रुपद की। मैं हर पल
उन्हें याद करती हूँ माँ पापा के साथ-साथ मैं भी उनका
बेसब्री से इंतजार कर रही हूँ रुपद से फोन पर बात होती रहती है पर सिर्फ फोन पर बात करने से ही मेरे मन
को सुकुन नही मिलता साथ होने वाली बात अलग होती है। आज मैं भले ही घर वालो के साथ हँसते मुस्कुराते रहूँ पर मुझे उनकी कमी महसूस होती है और मैं अकेले में रो भी लेती हूँ। जब मैं किसी जोड़े को
साथ- साथ घूमते हुए हँसते हुए देखती हूँ तब मुझे रुपद की याद आ जाती है और मैं यही सोचती हूँ की वो कब
आएंगे ये इंतजार कम खत्म होगा और कब हम भी ऐसे साथ में मुस्कुरायेंगे।  ये 7 साल बड़ी ही मुश्किल
से मैने उनके इंतजार में बिताये है। अब मन बस यही कहता है की ये इंतजार अब जल्दी खत्म हो जाये और
रुपद वापस आ जाये।
           तेरी यादे कर रही है बेकरार
           हर लम्हे में है तेरा इंतजार
          खामोश मन की सुन ले पुकार
          तन्हा दिल को है तेरा इंतजार
         

नया घर और डर

गाड़ी से सामान लाकर घर में रखा जा रहा है पलक
पूरे घर में यहाँ से वहाँ दौड़ लगा रही है वो बड़ी खुश
है। और खुशी की वजह ये है की हम नये घर में आ 
गये है नये घर की खुशी हमे भी है पर साथ ही पुराना
घर छोड़ने का थोड़ा दुख भी है। उस घर से हमारी 
बहुत सी यादे जो जुड़ी हुई है। जोकि बहुत ही मीठी यादे है। पर फिलहाल यादो पर विराम लगाते हुए मैं
अपना काम शुरू कर लेती हूँ। घर में सामान की
सेटिंग। कौन सा सामान कहाँ अच्छा लग रहा है कैसे
रखना है मैं और ऋषि हम दोनो मिल कर यही सोच
रहे है धीरे-धीरे हम दोनो ने सामान की सेटिंग कर ही
ली बस कुछ तस्वीरे ही है जो दीवार पर लगानी है
इस बात पर मेरी और ऋषि की थोड़ी बहस भी हो गई
पर फिर हम दोनो ने मिलकर डिसाइड कर ही लिया
की हम तस्वीरों को हॉल की साइड वाली दीवार पर
लगाएंगे। चलो खूब मेहनत और थकान के बाद घर में
सारे समान की सेटिंग हो ही गई। पलक का रूम भी
अच्छे से तैयार कर दिया है क्योंकि मैडम भले ही अभी
सिर्फ 11 साल की है पर उसे सब परफेक्ट चाहिए वो बात अलग है की वो खुद ही बाद में पूरे रूम की हालत बिगाड़ देगी। वैसे मुझे मेरे नये घर में गार्डन ही है जो बोहोत भा रहा है मैंने यहाँ फूलो वाले पौधे लगाये है। देखते ही देखते पूरा एक सप्ताह हो गया है हमे यहाँ आये हुए। सुबह का सूरज निकल गया है और ये इशारा कर रहा है की मैं झटपट अपना काम शुरू करूँ क्योंकि ऋषि को ऑफिस और पलक को स्कूल जाना है। ऋषि के ऑफिस जाने के बाद मैं पलक को स्कूल बस में बैठाकर घर आ पलक के रूम की
सफाई करने लगी।तभी मुझे ऐसा एहसास हुआ की
जैसे कोई हॉल में है मुझे किसी के कदमो की आहट
सुनाई दे रही थी मैं तुरन्त हॉल में गई यहाँ वहाँ देखा
तो कोई नही था मैं इसे अपना वहम मानकर वापस
अपने काम में लग गई। रात को सारे काम से निपट मैं
हॉल की लाइट बंद कर अपने रुम में जा रही थी की
खिड़की की आवाज ने मुझे रोक लिया हॉल की
खिड़की खुली थी और उसी की ही आवाज आ रही थी
मैं खिड़की बंद करने गई। खिड़की बंद करते वक्त मेरी नजर गार्डन पर पड़ी मैने वहाँ किसी को देखा मैं घबरा
गई जल्दी से बाहर की लाइट ऑन की और जब मैने दुबारा वहाँ देखा तो कोई नही दिखा। तब मैंने सोचा की यहाँ वाकई में कोई था या मैं बेवजह ही डर गई।
ज्यादा ना सोचते हुए मैं अपने रूम में जाकर सो गई।
पर सच कहुँ तो मेरे मन में ना जाने कैसे-कैसे ख्याल
आ रहे थे और वही सोचते-सोचते मेरी आँख लग गई।
सुबह मेरी नींद जरा जल्दी खुल गई मैने सोचा उठ ही
जाती हूँ क्योंकि सुबह काम भी ज्यादा होता है मैं
उठकर रूम से बाहर आई हॉल की तरफ जा रही थी
की मुझे पलक के रूम से कुछ आवाज सुनाई दी मुझे
लगा पलक जाग गई है मैने पलक के रूम का दरवाजा
खोला देखा पलक तो सो रही है मुझे लगा की शायद
पलक की आवाज मेरे कानो में गूंजने लगी है इसीलिए
मुझे आवाज सुनाई दी। जबकि पलक सो रही है।
सुबह के 9 बज गये थे ऋषि ऑफिस के लिए निकल
गये थे पलक स्कूल के लिए तैयार हो रही थी लेकिन
वो मेरे पास आकर कहती है की उसकी तबियत ठीक
नही है वो आज स्कूल नही जाएगी। उसका चेहरा
देख लग रहा था की वो झूठ बोल रही है पर मैने उससे
पूछा नही और ठीक है बोल कर मैने उसे उसके रूम
में भेज दिया। वो अपना नाश्ता भी अपने रूम में ही ले
गई। मुझे पलक का बर्ताव कुछ अलग सा लग रहा है
पूरा दिन आज वो रूम में ही है बाहर ही नही आयी
और ना मुझे अपने रूम में आने दे रही है मुझे चिंता
सी होने लगी और थोड़ा डर सा भी लगने लगा आखिर हो क्या रहा है पहले मुझे घर में किसी के होने का एहसास हुआ और अब पलक ना जाने इसे क्या हो गया। मैं पलक के लिए जूस बनाकर उसके रुम की ओर ही आ रही थी तब मुझे कोई परछाई सी नजर आई। मैं दौड़कर पलक के रूम में गई और तब जो देखा वह देख में चोंक गई।
            पलक के रूम में एक छोटी सी बच्ची थी जो
करीब 5 साल की होगी। मासूम सा चेहरा थोड़े बिखरे से बाल वाइट कलर की फ्रॉक जोकि थोड़ी मेली से हो गई थी। कुछ ऐसी हालत में थी वो बच्ची। वो मुझे देख छिपने लगी। उस वक्त मेरे दिमाग में ना जाने कितने
सवाल आये जिनके जवाब मुझे ही ढूंढने है। पलक से
मैने उसके बारे में जाना वो लड़की दो दिन से घर में
है और हमे पता ही नही है। पलक को भी कल रात में
इसके बारे में पता चला। घर में जो घटनाएं हो रही थी
वो सब इसी की वजह से हो रही थी किसी के होने का
एहसास , रात में गार्डन में किसी का दिखना , और
पलक के रूम से किसी की आवाज आना। और मैं ना
जाने मन क्या- क्या सोचे जा रही थी। पलक ने
मुझे बताया की ये लड़की खो गई है ये अपने घर से
अकेली ही पार्क जाने के लिए निकली थी पर रास्ता
भटक जाने की वजह से ये यहाँ आ पहुँची और हमारे
घर में आकर छिप गई। पलक की बात सुनने के बाद
पहले तो मैने उस पर गुस्सा किया की उसने हमे
बताया क्यों नही पर फिर बाद में मैंने उसे प्यार से
समझाया की उसे हमसे ये बात नही छिपानी चाहिए
थी। मैंने ऋषि को फोन कर घर बुलाया सारी बात
बताई और फिर हम दोनो ने पुलिस को इसकी
जानकारी दी और उस बच्ची के माता- पिता को ढूंढा।
हम सब की कोशिशो ने उस बच्ची को वापस अपने
घर वालो से मिला दिया और तब जाकर मैंने चेन की
साँस ली। हम घर आ गये।मैं ऋषि और पलक हम
तीनो हॉल में बैठे हुए थे मैं बैठे- बैठे यही सोच रही थी की नये घर में आये ज्यादा वक्त भी नही हुआ और मैंने
यहाँ डर भी महसूस कर लिया। खैर अंत भला तो सब भला अब सब कुछ ठीक हो गया है और हम हमारे नये घर में खुश है।





पापा का प्यार




पापा का प्यार,
                      पापा का प्यार कैसा होता है।
जिस तरह माँ  का प्यार होता है वैसा या उससे थोड़ा अलग। पापा का प्यार थोड़ा अलग होता है जोकि 
शब्दो में कम जाहिर होता है लेकिन एहसास में ज्यादा होता है। ये मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ये मैने खुद महसूस किया है। और ये मैंने पिता बनने के बाद ही जाना है।
मैं जब हर रोज शाम को ऑफिस से घर आता हूँ तो 
मेरे घर में आते ही मुझे जो आवाज सबसे पहले सुनाई 
देती है वो है- पापा। जोकि मेरी चार साल की बेटी की 
होती है मुझे देखते ही वो तुरन्त आकर मुझसे लिपट
जाती है और मैं उसे गोद में उठा लेता हूँ। उसकी मीठी
आवाज कानो में पड़ते ही मैं बाहर की सारी परेशानियां कुछ समय के लिए पूरी तरह भूल जाता हूँ
मेरी बेटी दिनभर की सारी बाते बड़े ही चाओ से मुझे बताती है कि उसने आज क्या किया, क्या हुआ सब कुछ। उसके चहरे की ओर देखते हुए मैं चुपचाप उसकी बाते सुनता रहता हूं जब बाते करते हुए वो खिलखिला कर जोर से हँसती है तब उसे देखकर मेरी दिनभर की सारी थकान मानो छु हो जाती है। मुझे 
ऐसा लगता है की मेरी सारी दुनिया अब मेरी बच्ची में 
ही सिमट गई है। मुझे हर वक्त उसका ख्याल रहता है
उसके वर्तमान से ज्यादा मुझे उसके भविष्य की चिंता
रहती है। मैं मन ही मन बहुत कुछ सोचता रहता हूँ
पर अपने मन की बात मैं किसी को भी नही बताता।
मैं अपनी बेटी से बहुत प्यार करता हूँ उसके साथ 
खेलता हूँ हँसता हूँ उसके साथ खाना खाता हूँ मैं सिर्फ
उसका पिता नही हूँ मैं कभी- कभी उसका अच्छा दोस्त भी बन जाता हूँ ताकि जब कभी उसे अपने मन की कोई बात बतानी हो तो वो आसानी से मुझे बता सके।मैं उसे ज्यादा समय तो नही दे पाता पर जितना भी समय दे पाता हूँ उसी में मैं उसे ज्यादा से ज्यादा खुशी देने की कोशिश करता हूँ। एक पिता क्या महसूस करता है ये मैंने पिता बनकर ही जाना है।
 आज जब मैं खुद को देखता हूँ तो यही सोचता हूँ कि
क्या मैं अपने पापा जैसा हूँ पर मुझे लगता है की मैं
उनसे थोड़ा अलग हूँ। जब मैं छोटा था तब मेरे पापा कैसे थे ये जानने के लिए हमे थोड़ा पीछे जाना होगा।हमारे परिवार में हम चार सदस्य थे मम्मी पापा मैं और
मेरी छोटी बहन। मेरे पापा जरा शांत स्वभाव के थे पर घर के फैसले वही लिया करते थे। पापा जब शाम को
ऑफिस से घर आते थे तब हम अच्छे बच्चे की तरह
पढ़ाई करने बैठ जाते थे पापा आकर सबसे पहले एक नजर हमे देखते और फिर उसके बाद ही जाकर वो
आराम से बैठते और फिर माँ पापा को पानी लाकर
देती। पापा ने कभी भी हमको किसी बात के लिए डांटा
नही पर फिर भी हम उनसे डरते थे। हम क्यों डरते थे
पता नही। मुझे याद है जब मेरी बहन रुचि को उसकी दोस्त की एक ड्रेस बड़ी भा गई थी वैसे ही ड्रेस लेनी की उसने पापा से खूब जिद भी की थी पर पापा ने उसे वो ड्रेस नही दिलायी रुचि रोई भी और पापा से गुस्सा
भी बहुत हुई थी पापा ने ड्रेस क्यों नही दिलाई थी पता नही। लेकिन जब वही रुचि बड़ी हुई तब कॉलेज की फ्रेशर पार्टी में जाने के लिये पापा ने उसके बिना मांगे ही उसे बहुत सुन्दर ड्रेस लेकर दी थी। जिसे देख रुचि बड़ी खुश हुई थी और उसके चहरे की खुशी को बड़ी ही चुप निगाहों से पापा  देख रहे थे। ये तो थी रुचि की बात। पर मेरे साथ क्या हुआ था पता है।
   मैं साईकिल चलाना सिख रहा था पापा मेरी मदद
कर रहे थे उन्होंने साईकिल पीछे से पकड़ी हुई थी मैं
धीरे- धीरे साइकिल चलाकर आगे बढ़ रहा था पर कुछ दूर जाकर गिर पड़ा। मैंने पीछे मुडकर देखा तो
पापा दूर खड़े हुए थे मुझे गुस्सा आ गया की उन्होंने
आखिर साइकिल क्यों छोड़ी मैं उनकी वजह से गिर
गया था। इस बात से मैं उनसे मन ही मन गुस्सा हो गया था। पापा के मन में हमारे लिए क्या है ये हम
समझ ही नही पाते थे उन्होंने घर के कुछ नियम भी
बना रखे थे जो मुझे बिल्कुल पसन्द नही थे। मुझे तो
लगता था के पापा को हमसे ज्यादा प्यार ही नही है।
लेकिन बड़े होते- होते मुझे एहसास होने लगा था की
पापा हमे कितना चाहते है।
मैने जब कॉलेज जाना शुरू किया था तब दो दिन ही हुऐ होंगे मुझे बस से कॉलेज जाते हुए शाम को जब मैं कॉलेज से घर आया तो घर के आँगन में गाड़ी खड़ी हुई थी जोकि पापा ने मेरे लिए ली थी मैंने पापा से कहा
नही था की मुझे इसकी जरूरत है बस मैंने मन में सोचा ही था लेकिन पापा को कैसे पता चला पता नही। पापा ने कभी अपने प्यार को जाहिर नही होने दिया उन्होंने कभी नही कहा की वो हमसे बहुत प्यार करते है पर मुझे पता चल गया था की पापा हमसे बहुत प्यार करते है बस कहते ही नही है।
बचपन में उन्होंने रुचि को ड्रेस इसलिए नही दिलाई
थी क्योंकि वो चाहते थे की रुचि ये समझ जाये की
हर ख्वाइश पूरी नही होती कुछ ख्वाईशें अधूरी भी रह
जाती है हमे उन अधूरी ख्वाईशो के साथ जीना आना
चाहिए। और उन्होंने मेरी साइकिल इसलिए छोड़ी थी
क्योंकि वो मुझे ये एहसास कराना चाहते थे की मुझे
आगे अकेले ही चलना है और अगर मैं गिर जाऊ तो
मुझे कैसे फिर से खड़े होना है ये मुझे आना चाहिए। पापा ने बचपन में बहुत कुछ सिखाया है जो तब समझ नही आता था पर अब समझ में आने लगा है। पापा फिक्र तो हमारी बहुत करते थे बस कहते ही नही थे उनके घर के बनाये नियम मुझे आज याद आते
है वो हमारे अच्छे भविष्य के लिए थे समय का मूल्य,
अनुशाशन, धैर्य  ये सब पापा ने हमे सिखा दिया था सच में पापा का प्यार अलग होता है जो दिखता
नही है पर होता है। बस समझने में थोड़ा समय लग जाता है। पापा का व्यवहार हमारे साथ भले ही एक दोस्त की तरह नही था पर फिर भी वो हमे बड़ी अच्छी
तरह समझते थे। "पिता की फिक्र और उनका प्यार मैं 
आज अच्छी तरह जान गया हूँ। क्योंकि आज मैं एक पिता बन गया हूँ।"












बरसात





गर्मी के बाद जब बरसात का मौसम आता है तब दिल को बड़ी राहत सी महसूस होती है ठंडी-ठंडी बूंदे जब चेहरे पर पड़ती है तो उन बूंदो का ठंडा एहसास मन को सुकुन पहुँचाने वाला होता हैं। सच में ये बरसात बड़ी कमाल की होती है बिना किसी वजह के चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान ला देती है। और बच्चे जितना मजा लेते है इस मौसम का उतना तो शायद ही और कोई ले पाता हो। ये मौसम ही ऐसा है जो सभी के दिल को भाता है पर शायद नही। कुछ लोग ऐसे भी है जिन्हें बरसात ज्यादा अच्छी नही लगती है उन्हें तो ये
समस्यां लगती है ये कहानी ऐसी ही एक लड़की नैना की है जिसे बरसात समस्या लगती है। तो कहानी शुरू करते है।हाँ तो बात उन दिनों की है जब नैना की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी और वो नौकरी की तलाश में थी नैना कई
जगह कोशिश कर चुकी थी पर कही भी बात ना बनी।
नैना ने अपनी नौकरी के विषय में विनोद अंकल जो की
उसके पापा के दोस्त है उन्हें भी बताया था। उन्होंने
नैना को फोन कर बताया की उनके ऑफिस में असिस्टेंट का एक पद खाली है वो चाहे तो उस पद हेतु आवेदन कर सकती है नैना आवेदन कर देती है। उसे दो दिन बाद इंटरव्यू के लिए बुलाया जाता है। दो दिन
हो जाते है नैना इंटरव्यू देने जाने के लिए तैयार हो रही होती है क्योंकि बरसात का समय है और कल बारिश भी हुई थी ये सोचते हुए नैना बारिश से बचने के लिए
अपने साथ छाता भी रख लेती है। नैना घर से निकल जाती है बस स्टॉप घर से थोड़ा दूर था इसलिए नैना को वहाँ तक पैदल चलकर जाना था वैसे नैना को पैदल चलना बुरा नही लगता है पर बरसात के समय पैदल चलना उसे बिल्कुल पसन्द नही है। दरसल नैना को बरसात का ये मौसम कुछ खास पसन्द नही है उसे तो ये समस्या ही लगती है बरसात के बाद कई जगहों
पर थोड़ी गन्दगी सी फैल जाती है सड़क अगर खराब हो तो उस पर चलना बड़ा मुश्किल हो जाता है बस इसीलिए नैना को भी बरसात के समय सड़क पर पैदल चलना पसंद नही है पर अभी तो उसे चलना ही पड़ेगा बस स्टॉप तक जो जाना है। नैना घर से निकलने के बाद जब थोड़ा आगे पहुँचती है तब उसे सड़क पर जगह- जगह पड़ा कचरा नजर आता है जोकि बारिश की वजह से बहकर सड़क पर आया था साथ ही सड़क पर कहीं-कहीं गड्ढे भी थे जिनमे बारिश का पानी भर गया था जिसकी वजह से वहाँ से निकलने में थोड़ी दिक्कत हो रही थी। नैना जैसे तैसे चिडचिड़ाते हुए बस स्टॉप पहुँच जाती है जहाँ कुछ देर इंतजार करने के बाद बस आ जाती है और नैना बस में बैठ चली जाती है। ऑफिस पहुचने पर नैना को पता
चलता है की उसके पहुँचने से पहले ही किसी और व्यक्ति का चयन हो चुका है। इसलिए अब उसका इंटरव्यू नही होगा यह सुन नैना थोड़ी उदास हो जाती है। और ऑफिस से बाहर आ जाती है बाहर धीमे- धीमे बारिश हो रही थी यह देख नैना तुरन्त बैग से अपना छाता निकालती है छाता लगाकर बस स्टॉप की ओर जाती है। नैना को बारिश में भीगने से डर लगता है वह आज तक कभी-भी बारिश में नही भीगी
उसे डर रहता है की कही कोई इंफेक्शन नही हो जाये या कही बारिश में भीगने से वो बीमार ना हो जाये और
ना जाने कितनी बाते नैना सोचती है जिसकी वजह से
उसने कभी बरसात का मजा ही नही लिया। पर क्या
नैना का कभी मन नही हुआ की वो भी कभी बारिश का
मजा ले। खैर अभी तो नैना का मन थोड़ा उदास है उदास मन से नैना धीरे- धीरे चलते हुए बस स्टॉप पहुँच जाती है और वहाँ लोहे की बनी बेंच पर जाकर बैठ जाती है और बस के आने का इंतजार करने लगती है  बारिश की वजह से और भी कई लोग वहाँ आ जाते है। बादल की गड़गड़ाहट के साथ
तेज बरसात होने लगती है सड़क पर कुछ लोग बारिश से बचने के लिए यहाँ- वहाँ छिपते नजर आ रहे थे कुछ सड़क किनारे बनी दुकानों  की छतो के नीचे  आसरा ले रहे थे तो कुछ ऐसे भी थे जो खुशी-खुशी बारिश में भीग रहे थे कुछ स्कूल के बच्चे थे जोकि शायद स्कूल से छुट्टी के बाद घर जा रहे थे पर फिर रुककर बारिश में भीगने का मजा लेने लगे और
पानी से भरे गड्ढ़े में कूद-कूद कर खेलने भी लगे इससे उन्हें कौन से आनन्द की प्राप्ति हो रही थी ये सिर्फ वही जानते है कुछ कॉलेज के लड़के लड़कियां भी बड़े हस्ते मुस्कुराते हुए आराम से भीगते हुए जा रहे थे जैसे कि उन्हें भीगते हुए जाने में बड़ा मजा आ रहा हो
ऐसे और भी कई लोग थे जो पानी में भीगते हुए जा रहे थे उनके चेहरे की खुशी से ऐसा लग रहा था जैसे की उन्हें इस बरसात का इंतजार था नैना बड़े ही ध्यान से
ये सब देख रही थी नैना के बगल में ही वहाँ बेंच पर बैठा एक शक्स फोन पर किसी से बात कर रहा था वो बाते नैना को भी सुनाई दे रही थी। वह शक्स फोन पर किसी से कुछ सवाल कर रहा था सामने वाले व्यक्ति का उत्तर सुनने के बाद वह कहता है कि अगर आपको को कुछ अच्छा लगता है तो उसे मान लेने में कोई बुराई नही है मन को बांधकर रखने से सब सही रहे ये जरूरी तो नही इसलिए कभी - कभी मन की बातो को भी मान लेना चाहिए खुलकर जी लेना चाहिए क्या पता ये पल फिर दुबारा मिले न मिले। नैना भी उस शक्स की बातो को सुन रही होती है। उसे तो ऐसा लग रहा था जैसे की वह शक्स ये सारी बाते उसी से कह रहा हो
 इतनी बात होती है और बस आ जाती है नैना बस में बैठती है और पूरे रास्ते उस शक्स की बातो को सोचते हुए जाती है नैना समझ जाती है कि वो भी कही न कही अपने मन की बातो को अनसुना कर रही है नैना को भी बारिश अच्छी
लगती है उसे भी बरसात में भीगना पसन्द है लेकिन फिर भी उसने खुद को ये समझा रखा है की उसे बरसात पसन्द ही नही है और वो भी क्यों क्योंकि  उसने अपने दिमाग में बारिश से पैदा होने वाली समस्याओ की लंबी लिस्ट जो बना रखी है।
लेकिन अब नैना को समझ आ गया है की कभी- कभी अपने मन का भी कर लेना चाहिए। उदास नैना अब थोड़ा खुश हो जाती है और बस से उतरने के बाद वो अपना छाता बैग से नही निकालती बल्कि भीगते हुए घर तक चलकर जाती है वो भी बिना चिड़चिड़ाये जबकि सड़क थोड़ी खराब थी। पर नैना को अभी वहाँ से निकलना बिल्कुल बुरा नही लग रहा था। वो खुश थी इतना ही नही घर पहुचने के बाद भी अपने घर की छत पर नैना खूब उछल-  उछल कर बरसात के पानी में भीगती है और पानी की ठंडी बूंदो को हाथो
में ले उसकी शीतलता को महसूस करती है। बरसात की ये बूंदे आज नैना के मन को भी खुशी दे रही थी।
नैना यह अच्छी तरह समझ गई थी के बदलते मौसम से थोड़ी दिक्कते तो आती है पर इसका मतलब ये नही के हम मौसम को पसन्द ही न करे  अब नैना को भी बरसात के मौसम का इंतजार रहेगा उसमे झूमकर
नाचने के लिये।
और साथ ही हम सब को भी।











याद है



आज मुझे अपनी गाड़ी का धीमी गति से चलना अच्छा
लग रहा था गाड़ी धीमे-धीमे चल रही थी और मैं कार
की खिड़की से बाहर की ओर बड़े ही शांत भाव से देख रहा था पेड़ो की हिलती पत्तियां, सड़क पर चलती गाड़िया, फुटपाथ पर चलते लोग आज ये सब देख मुझे बहुत अच्छा लग रहा था ऐसा नही था के मैं ये रोज नही देख पाता। ऑफिस जाते वक्त मुझे ये रोज ही नजर आता है पर आज की बात ही अलग है क्योंकि आज एहसास अलग है आज फिर सब कुछ अपना सा लग रहा है ये कॉलेज की ओर जाता रास्ता भी। इतने सालो बाद आज अपने कॉलेज ही तो जा रहा हूं मैं।आज कॉलेज में ओल्ड स्टूडेंट्स मिट नाम से प्रोग्राम रखा गया है जिसमें सत्र 93 बेच के सभी स्टूडेंट्स को बुलाया गया है। जहाँ आकर सभी अपने बीते पलो को एक बार फिर से जीने वाले है और बहुत सी यादो को याद भी करने वाले है। मैं गाड़ी में बैठे- बैठे सोच रहा था की अब तो बहुत कुछ बदल गया होगा कॉलेज में।शायद अब वहाँ कुछ भी अपना सा न लगे। मैं अपनी सोच में डूबा हुआ था की तभी गाड़ी रुक जाती है मैं कुछ सवाल करता उसके पहले ही ड्रायवर ने कहा - सर कॉलेज आ गया। मैं गाड़ी से उतरा उतरते ही मेरी नजर कॉलेज का जो बाहर वाला गेट था उस पर पड़ी वो बिल्कुल वैसा ही था जैसा पहले था कोई बदलाव नही था उसमे। मैं आगे बढ़ा आगे बढ़ते वक्त मुझे वो दिन याद आ रहे थे जब मैं बड़े इतराते हुए कॉलेज में इंटर होता था मैं और मेरे दोस्त ऐसा समझते थे जैसे मानो इस पूरे कॉलेज पर हमारा ही अधिकार हो। क्या सोचते थे ना हम। खैर अपनी यादो को रोकते हुए मैं  गेट से अन्दर गया। मेन गेट से अंदर होते ही मुझे सबसे पहले पार्किंग वाली जगह नजर आई वही जगह जहाँ कभी मैं अपने दोस्तो के साथ बैठा करता था हम सब के पास तो गाड़ी नही थी पर दो तीन दोस्त थे जिनके पास गाड़ी थी जिसका लाभ हम सब मिलकर लिया करते थे पार्किंग एरिया से थोड़ा आगे चलकर सीधे हाथ पर कॉलेज की बिल्डिंग का पहला गेट आता है जहाँ अंदर जाते ही बड़ा सा नोटिस बोर्ड नजर आता है जिस पर होने वाले कार्यक्रम, एग्जाम कोई नया नियम सब की सूचना दी जाती थी कोई खास नोटिस लगने पर  तो यहाँ पल भर में भीड़ इकट्ठा हो जाती थी आज भी इस पर कई सारे नोटिस लगे हुए है। पर आज इस नोटिस में क्या लिखा है ये जानने की कोई जल्दी मुझे नही है। नोटिस बोर्ड देख प्रिंसिपल डिपार्टमेंट के सामने से होता हुआ मैं हॉल में जा पहुँचा जहाँ मुझे पहुँचना था वहाँ पहले से ही कई पुराने स्टूडेंट मौजूद थे  जिनमे कुछ मेरे दोस्त भी थे जिन्हें देख मेरी आँखो को राहत मिली
क्योंकि हॉल में आते ही मेरी आँखे उन्ही को ढूंढ रही थी हम सब दोस्त एक दूसरे को देख खुश हुए आपस में गले मिले और फिर बैठकर बाते करने लगे। शुरुआत में तो हम ऐसे पेशा रहे थे जैसे कॉलेज फ़्रेंड नही साथ काम करने वाले सहकर्मी हो। लेकिन कब तक ऐसे सम्हल- सम्हल कर बात करते थोड़ी देर में ही अपने पुराने रंग में आ ही गये। और शुरू कर दिया
एक दूसरे की खिल्ली उड़ाना फिर वापस से वही मजाक मस्ती का माहौल जम गया जो तब हुआ करता था। मुझे अच्छी तरह याद है कैसे उस समय सबका अपना- अपना ग्रुप होता था। और हाँ झगड़ा भी कोई दो लोगों के बीच नही बल्कि दो ग्रुप के बीच चलता था। मेरे ग्रुप में हम आठ दोस्त थे दीपक, पंकज, आशीष, अरुण, विकास, शीतल, मालिनी, और मैं सागर गुप्ता। हम सब कॉलेज में साथ-साथ ही घुमा करते थे याद है मुझे किस तरह क्लास से ज्यादा समय तो हम कैंटीन में बैठकर गुजारा करते थे खूब गप्पे लड़ाना इसकी उसकी बाते करना , टेबल बजाबजा कर गाने गाना, अपने टीचर्स
की नकल करना, शीतल और मालिनी तो दूसरे ग्रुप की लड़कियों की बुराई करने में लगी रहती थी कितना इतराती है ना वो ,कैसे चलती है पता नही खुद को क्या समझती है। मुझे तो बिल्कुल पसन्द नही है वो। ऐसा मालिनी कहती और शीतल हाँ-हाँ  करती। हमे तो खूब हँसी आती थी दोनो की बातो पर । मालिनी को गुस्सा बहुत आता था और शीतल शीतल ही थी शीतल किसी पर भी ज्यादा ध्यान नही देती थी देती भी कैसे उसका सारा ध्यान विकास पर जो केंद्रित था।
पूरी क्लास की नजर इन दोनो पर रहती थी और ये दोनो थे की एक दूसरे की आँखो में खोये रहते थे। हमारे ग्रुप में यही एक जोड़ा था बाकी सब सिंगल थे।
पंकज और दीपक को सिर्फ अपने भविष्य की चिंता थी उन्हें अपना करियर बनाना था इसलिए वो प्रेम के चक्कर में पड़े ही नही। और आशीष अरुण दोनो को कभी किसी लड़की ने कोई भाव ही नही दिया। पर मेरे सारे दोस्त दिल के बड़े सच्चे थे मुझे आज भी याद है जब दी हुई तारीख पर फीस जमा करनी थी और घर में किसी परेशानी के चलते आशीष के पास फीस के पूरे पैसे नही थे मैं अरुण विकास हम तीनो अपने- अपने पैसे मिलाकर आशीष की फीस भरने जा रहे थे
तभी मालिनी सामने आ खड़ी हुई चेहरे पर झूठा गुस्सा दिखते हुए आशीष की ओर देखते हुए बोली कही जाने की जरूरत नही है मैने तेरी फीस भर दी है पर तु ये मत समझना के पैसे वापस नही करने पड़ेंगे।
तेरे पास जैसे ही पैसे आये चुपचाप दे देना समझा। मैं और शीतल लायब्रेरी जा रहे है तुम लोग कैंटीन जाओ हम थोड़ी देर में वही आ जायेंगे इतना कहकर वो चली गई। हम कुछ भी नही कह पाये बस खड़े रह गये। इस बात से याद आया मालिनी नही आई क्या उसे नही बुलाया गया है। मालिनी ने पीछे से आवाज लगाते हुए कहा आई हूँ मैं भी बस तुझे दिखी ही नही। मैं मुस्कुराया और जाकर मालिनी से मिला मालिनी साड़ी में अच्छी लग रही थी हम सबको लगता था के ये कभी शादी नही करेगी पर शुक्र है भगवान का के अजित इसे मिल गया उसने इसके मन के फैसले को बदल ही दिया और आखिर शादी कर ही ली।पंकज अरुण आशीष मैं मालिनी दीपक हम सब आ चुके थे और याद कर रहे थे कि कैसे क्लास में प्रेजेंट सर बोल कर एक दूसरे की अटेंडेंस लगवा दिया करते थे। मैं और विकास तो ज्यादातर क्लास से बाहर ही रहते थे। और एंवल फंक्शन उसमे तो क्या मजे करते थे याद है शीतल और विकास ने क्या कपल डांस किया था बेचारी शीतल विकास ने उसे इतना बुरा गिराया था कि पूरे 15 दिनों तक ठीक से चल भी नही पाई थी वो। खूब गुस्सा हुई थी वो विकास से पर विकास ने उसे बड़े प्यार से मना भी लिया था। अपने सारे दोस्तो में मैं ही था जो थोड़ा ज्यादा मस्तीखोर था मेरी वजह से भी मेरे दोस्तो को खूब डाट भी पड़ी। ऐसे ही हस्ते लड़ते
मौज करते कॉलेज की पढ़ाई पूरी हो गई थी फिर शुरू हुआ हमारा करियर शुरुआती साल मुशकिल भरे रहे
पर मेहनत और कोशिश से हमने अपने सारे सपने तो नही पर कुछ सपने जरूर पूरे कर लिए थे मालिनी ही हम सब में ज्यादा लक्की रही उसके सपने हमसे पहले पूरे हुए। आज भी इतने सालो बाद मिलने पर हम लोगों में कुछ नही बदला सारी आदते वैसी की वैसी ही है। बस अभी कमी हमे विकास और शीतल की महसूस हो रही है विकास पूरे एक घन्टे लेट आया
बोहोत खुशी हुई आज उससे मिल कर थोडा बदल गया है विकास पहले जैसा बिल्कुल नही है उसके चेहरे की मुस्कुराहट पहले से कम हो गई है इसकी वजह हम सबको पता है इसलिए हमने उससे कुछ नही पूछा। शीतल और विकास का रिश्ता कॉलेज की पढ़ाई के साथ ही खत्म हो गया था शीतल के घर वालो ने उसकी शादी कही और करवा दी। और फिर विकास के पापा ने भी अपने दोस्त की बेटी से विकास की शादी करा दी पर शायद विकास खुश नही है अभी भी उसके मन में कही ना कही शीतल ही है।हम सब यही चाहते है की विकास लाइफ में आगे बड़े और खुश रहे। और साथ ही यही कामना है की हम लोगों की ये दोस्ती हमेशा बरकरार रहे अपनी इन कॉलेज लाइफ की यादो को कभी ना भूले। सच में कॉलेज टाइम के पल बहुत ही खूबसूरत पल होते है। इन्हें कभी नही भुलाया जा सकता जब कभी भी दिमाग सवाल करेगा तो मन बस यही कहेगा याद है। हर बात याद है।





एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE