मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े नही ये मन ठंडी- ठंडी लस्सी चाह रहा है सोफ़े पर ज़रा बेढंगे तरीके से लेटे अलसाये हुए उत्पल को कुछ ऐसा ही ख्याल आ रहा है पर करे तो क्या करे आलस ने कुछ इस कदर जकड़ा हुआ है कि बेचारे उत्पल में इतनी शक्ति ही नही है कि वो किचन तक चलकर जा सके और खुदके लिए लस्सी बना सके और इतनी हिम्मत भी नही है कि मम्मी को कह सके कि मम्मी ज़रा हमारे लिए लस्सी बना लाना , पता है ना कि अगर मम्मी को आडर दिए तो क्या होगा।उत्पल तो मम्मी को आडर ना दे सका पर मम्मी का आडर जरूर आ गया था उत्पल के लिए। उत्पल ऐ उत्पल जाओ तो ज़रा छत पे कपड़े सुख गए होंगे उठाके लेके आओ। बस मम्मी हमें काम ही बताती रहती है अरे! मन तो एक कदम चलने का भी नही हो रहा है थोड़ा चिढ़ते हुए अलसाई सी आवाज़ में उत्पल बोला, मम्मी ने फिर आवाज़ लगाई उत्पल गए कि नही हाँ , हाँ जा रहे है , पता है नही गए तो का हालात करेंगी हमारी।मम्मी ने भी ना रोज़ की ड्यूटी लगा दी है जैसे हमारी "छत पे जाओ सूखे कपड़े लेके आओ जैसे कि ये काम हमारा ही है, बस इसलिये ही तो आये है इस दुनिया मे" बड़बड़ाते हुए उत्पल छत पर आ गया। कितनी तेज़ धूप पड़ रही है अगर थोड़ी भी देर ज्यादा रुक गया तो इन कपड़ो की तरह मैं भी सुख जाऊँगा। उत्पल जल्दी- जल्दी रस्सी पर टंगे कपड़े उतारने लगा और तभी उसे बगल वाले पड़ोसी की छत पर कोई नज़र आया, ये कौन है नंदी तो नही दिख रही कोई और है " अब उत्पल रस्सी से धीरे - धीरे कपड़े उतार रहा था और नज़र उसकी बगल वाली छत पर ही थी" उस लड़की पर जिसने "हरे रंग का सलवार सूट पहना हुआ था अपने भूरे बालों की उसने चोटी गुथी हुई थी कानों में झुमके थे और एक हाथ में मैटल की चूड़ियां डाली हुई थी" ये छत पर सूखे कपड़े लेने नही आई थी बल्कि गीले कपड़ों को रस्सी पर डालने आई थी। एक - एक कपड़े को ऐसे निचोड़कर डाल रही थी जैसे कोई बड़ी गहरी दुश्मनी हो उनसे। उत्पल का ध्यान अभी भी बगल वाली छत पर ही था सूरज की चमक कुछ- कुछ उत्पल की आँखों मे भी अभी दिख रही थी और उसमें नन्दी की आवाज़ कानों में पड़ गई और आँखों की सारी चमक गायब हो गई। पूर्वा दीदी ,पूर्वा दीदी चलो तुमको पापा याद किये है अच्छा पूर्वा ने कहा ठीक है चलो कहकर पूर्वा चली गई पर उत्पल ने नन्दी यानी नन्दिनी को आवाज़ देकर रोक लिया ऐ नन्दी कौन है ये , नन्दी ने बड़े इतराते हुए उत्पल को देखा और बोली नन्दी नही नन्दिनी पापा ही हमको बस नन्दी बुला सकते है और ये हमारी दीदी है कहकर गर्दन में झटका देकर नन्दी चली गई।
ओह! तो इस मुट्टू कि दीदी है वो। उत्पल कपड़े सूखे नही क्या , हाँ मम्मी सुख गये आवाज़ देते हुए उत्पल बोला और जल्दी से कपड़े लेकर मम्मी के पास पहुँच गया ये लो मम्मी सब सुख गये। अगर रोज़ बागीचे में चम्पा का फूल देख रहे हो और अचानक उसकी जगह गुलाब का फूल आ जाये, वो भी लाल गुलाब तो कैसा लगेगा " शायद मन थोड़ा मेहका मेहका सा लगेगा जैसे उत्पल का है , अचानक मार्च के महीने में उसे सावन के आ जाने का एहसास हो रहा है मानो जैसे शीतल पवन की लहरें बार- बार उत्पल के मन को छूकर जा रही हो और पूर्वा का ख्याल ला रही हो जोकि उत्पल को बड़ा ही अच्छा लग रहा था।" अगले दिन उत्पल साहब के तो तेवर ही बदल गए सुबह जल्दी उठ गए वो भी मम्मी के बिना जगाये,नहा लिए तैयार भी हो गए और सुबह से अब तक पाँच बार छत पर जाकर भी आ गए कभी पौधों में पानी देने के बहाने कभी अचार रखने के बहाने तो कभी ये देखने के बहाने की मौहल्ले के कबूतर आये क्या छत पर उन्हें उत्पल दाना डालता है ना , वैसे कबूतरों को भी ये आज ही मालूम हुआ कि उत्पल उनकी फ़िक्र करता है। फ़िक्र तो उत्पल की मम्मी को भी हो रही थी उत्पल को देखकर , जे हमारे लड़के को का हो गया है हमारे बिना कहे कैसे हमारे काम मे हाथ बटा रहा है सुबह से " अचार भी रह आया छत पर, पेड़ों को पानी भी दे दिया और कपड़े भी सूखने डाल आया बात का है। उत्पल ऐ उत्पल इधर आओ उत्पल तुरन्त मम्मी के पास आकर खड़ा हो गया हाँ मम्मी कहो, का बात है बेटा आज बिना कहे तुमने काम मे हमारी मदद भी कर दी सुबह जल्दी उठ भी गए " अपनी भौहों को ऊपर उचकाकर मम्मी ने पूछा। बात कोई बात नही है मम्मी इतनी गर्मी है ना ,तुम अकेले काम करोगी तो बीमार हो जाओगी हमको चिंता हो रही थी इसलिये हम मदद कर रहे थे और रोज़ करेंगे। उत्पल की बात सुन मम्मी तो खुसी से इमोशनल हो गई। तुमको हमारी कित्ती फिकर है हम तो तुमको कामचोर समझते थे हमारा लाडला बेटा। ये सारी मेहनत जिसके लिए हो रही थी वो तो दिखी नही पर मम्मी जरूर खुस हो गई।
दिन तो उम्मीद में ही निकल गया पर शाम को उत्पल की आँखों को थोड़ा सुकून मिला जब पूर्वा अपनी बहन के साथ छत पर बातें करती दिखाई दी। पूर्वा किसी बात पर खूब हँसे जा रही थी उसे देखकर उत्पल भी मुस्कुराये जा रहा था। कि तभी नन्दी की नजर उस पर पड़ गई " दीदी चलो अब चलते है यहाँ से शाम हो गई है ना, यहाँ शाम को कौए मंडराने लगते है। ये तीखे से अंदाज़ में नन्दी ने जिसकी ओर इशारा किया था वो समझ गया था कि हाँ ये मीठे वचन मेरे लिए ही है पर इससे हौसला कम नही हुआ उत्पल का क्योंकि वो जानता है कि राह चाहे जो भी हो अड़चने तो आती ही है उनके डर से रास्ते पर आगे बढ़ना रोक थोड़ी देंगे। 4-5 दिनों तक उत्पल ने बड़े जतन किये की किसी बहाने ही सही पूर्वा का ध्यान उसकी ओर आ सके ,और ऐसा हुआ भी कल शाम जब मौहल्ले के बच्चों को इकट्ठा कर उत्पल छत पर पतंग उड़ा रहा था तब पूर्वा भी उत्पल की पतंगबाज़ी को देख रही थी बच्चे खुश होकर चिल्ला रहे थे भईया वो वाली पतंग , अब वो पतंग काटो " उत्पल एक के बाद एक पैच लड़ाए जा रहा था और दूसरों की पतंग काटे जा रहा था पूर्वा ये सब देख बड़ी खुश हो रही थी तभी उत्पल ने पुर्वा की ओर देखा और आँखों का ये पैच भी लड़ ही गया और फिर पतंग कट गई जोकि पूर्वा की छत पर जा गिरी। ये पतंग नही थी ये तो उत्पल का दिल था जो पतंग बनके पूर्वा के पास जा पहुँचा।" अब उत्पल और पूर्वा के बीच थोड़ी बातचीत शुरू हो गई थी जो धीरे- धीरे थोड़े से ज्यादा की ओर बढ़ रही थी पहले कुछ मिनट बातें होती थी जो अब घन्टों में बदलने लगी थी नन्दी ज्यादा खुश तो नही थी इसकी दोस्ती से पर उत्पल ने उसे खुश करने का उपाय भी ढूंढ लिया था वो रोज़ नन्दी को टैक्स देता कभी चॉकलेट कभी कुल्फ़ी तो कभी समोसे , अब पूर्वा से बात करनी है तो टैक्स तो देना होगा। मेहनत का फल हमेशा मिलता है उत्पल ने जिन पौधों को पानी देना शुरू किया था अब उनमे कलियाँ आ गई थी बस फूल का खिलना बाकी था उत्पल को बड़ी जल्दी है फूल के खिलने की, कब ये फूल खिले और वो पूर्वा को उसे दे सके। ये लड़कपन का प्यार भी बड़ा नादानी भरा होता है जिसमे समझ और समझदारी जैसे शब्दों की कोई जगह नही होती। आज जब उत्पल और पूर्वा छत पर साथ बैठे हुए थे हाँ साथ मे बैठे हुए थे दोनों की छत इतनी पास है कि उत्पल आराम से पड़ोस की छत पर चला जाता है। शाम को दोनों साथ बैठे हुए थे और बातें हो रही थी पूर्वा इतराकर पूछ रही थी तुम्हारे पौधों में फूल कब खिलेंगे , जल्दी ही खिल जाएंगे जैसे ही खिलेंगे हम तुमको लाकर दे देंगे उत्पल ने कहा। तुमको हमारी कौन सी बात ज्यादा अच्छी लगती है , हमको हमको तुम्हारी बातें बहुत अच्छी लगती है जैसे वो गाना गाने वाली गुड़िया होती है ना बिल्कुल वैसे , उत्पल की बात सुन पूर्वा ज़ोर से हँसने लगी अच्छा ! और क्या अच्छा लगता है। और और तुम्हारी आँखें ये हमको नाँव के जैसे लगती है जिसमे ना हम बैठे हुए है उत्पल की बात सुन पूर्वा ने आँखों को मटकाते हुए पूछा सच्ची में, हाँ सच्ची में उत्पल ने बड़े विश्वास के साथ कहा। उत्पल ऐ उत्पल अरे लगता है मम्मी आवाज लगा रही है कल मिलते है कहकर उत्पल जल्दी से कूदकर अपनी छत पर चला गया। पूर्वा को उत्पल के ऐसे एकदम से चले जाने से थोड़ा बुरा लगा अभी तो और कित्ती सारी बातें करनी थी चला गया पागल कहीं का, पर रोक भी तो नही सकती थी।
मेहनत हमेशा रंग लाती है कली खिलकर फूल बन जाती है उत्पल के पौधों में लगी कलियाँ खिल गई थी उत्पल इन खिले फूलों को देख बड़ा खुश हुआ उसका मन बिल्कुल भी नही था कि इन फूलों को तोड़े पर पूर्वा की खातिर उसने एक फूल तोड़ ही लिया। देखो तो आज हम तुम्हारे लिए क्या लाये है, क्या? लाये हो। उत्पल ने हाथ आगे बढ़ाकर फूल पूर्वा को दिया "अरे! फूल खिल गया हमे ना गुलाब के फूल बहुत पसन्द है खुश होते हुए पूर्वा ने कहा।" उत्पल थोड़ा हिचकिचाते बोला अपने बालों में लगा लो। हाँ लगा लेंगे ज़रा शर्माते हुए पूर्वा बोली। अच्छा घूमने चलोगी हमारे साथ उत्पल ने पूछा तो पूर्वा पूछते हुए बोली पर कहाँ , कानपुर का मेला दिखाएंगे तुम्हें। दोपहर के 3 बजे ईमली के पेड़ के नीचे नीली शर्ट में खड़ा उत्पल किसी देसी फ़िल्म के हीरो से कम नही लग रहा था कम तो पुर्वा भी नही लग रही थी गुलाबी पटियाला सलवार सूट में और उसके भूरे बालों की खजूरी चोटी भी बड़ी जच रही थी। पूर्वा को आता देख उत्पल खुश हो गया और नन्दी को देख खुद से मन मे बोला गुलाब के साथ काँटे तो रहते ही है। फिर चेहरे पर मुस्कान लाते हुए बोला आ गए तुम लोग हमें लगा पता नही कित्ती देर इंतजार करना पड़ेगा, चले फिर। जितना उत्पल ने सोचा था उससे भी कई ज्यादा मज़ा आया मेला घूमने में बस थोड़े पैसे खर्च हो गए उस बात का थोड़ा दुख हो रहा था पर खुशी इस बात की थी कि पूर्वा और उसने साथ में झूला झूला वो पल जैसे उत्पल के आँखों मे ठहर सा गया हो। अब तो दोनों की दुनिया जैसे बदल ही गई थी मानो कोई रंगबिरंगी दुनिया हो जिसमे चेहकती चिड़ियों की आवाज़ आसपास उड़ती तितलियाँ खिलते लाल- गुलाबी फूल और मुस्कुराते हुए पूर्वा और उत्पल के चेहरे। इन कुछ दिनों में मेला ही नही और भी बहुत सी जगहें उत्पल और पूर्वा साथ में घूम लिए थे पर सबसे अच्छा पूर्वा को घाट पर लगा। घाट की सीढ़ियों पर बैठकर बहते गंगा के पानी को देखना भला किसे अच्छा नही लगता, कुछ तो बात है जो यहाँ आकर मन को वो एहसास होता है जो सिर्फ माँ की गोद मे सिर रखने पर मिलता है ,पुर्वा को भी सब की तरह यहाँ आकर एक अपनापन सा लगता है जैसे कोई रिश्ता हो इस जगह से। कल की बात है पूर्वा और उत्पल घाट पर बैठे बातें कर रहे थे उत्पल उसे अपने कॉलेज की बातें बता रहा था बी.ए 2nd ईयर के सबसे होशियार स्टूडेंट है हम और क्रिकेट में भी हम बहुत अच्छे है सबसे अच्छी बेटिंग हमारी ही तो है पूरी टीम मे। उत्पल खुद की तारीफ़ पर तारीफ़ किये जा रहा था और पूर्वा अच्छा, सच में , वाह कितनी बढ़िया बात है कहती जा रही थी। ये वही हो रहा था कि तुम फेंक लो हम भी लपेट रहे है दोनों बहनें पूर्वा और नन्दी उत्पल की बातें सुनती फिर एक दूसरे को देखती और शरारती अंदाज़ में धीरे से मुस्कुराती। उन्हें देख उत्पल कुछ - कुछ समझ गया था अरे! लगता है हमने कुछ ज्यादा ही बोल दिया पर तुम भी तो कुछ बोल ही नही रही हो ,तुम्हें भी तो अपने बारे में कुछ बताना चाहिए। हम , हमे कुछ ज्यादा आता नही है बस मेहंदी अच्छी लग लेते है और अलग - अलग डिजाइन की चोटी बना लेते है और आम के पेड़ से कैरी तोड़ना आता है हमको। पूर्वा की बात सुन पहले तो उत्पल चुप रहा फिर बोला अरे वाह! ये तो बहुत अच्छी बात है। और पढ़ाई मे तुम कैसी हो उत्पल ने पूछा तो पूर्वा थोड़ा हिचकिचाते हुए बोली वैसे तो हम पढ़ाई में ठीक ही है पर क्या हुआ न कि पिछली बार हम ठीक से तैयारी नही कर पाए थे तो बारहवीं में फेल हो गए थे पर इस बार हमने खूब मेहनत की है पर , पर क्या उत्पल ने पूछा। हमारे पापा बोले है कि अगर इस बार हम पास नही हुए तो वो हमारा रिसता तय कर देंगे। पूर्वा की बात सुन उत्पल को ऐसा लगा जैसे उसके शीशे रूपी दिल मे अचानक से कोई दरार आ गई हो।
आज का सूरज शायद किसी ओर दिशा से निकला है तभी तो उत्पल मन्दिर में भगवान जी के सामने हाथ जोड़े खड़ा है इतनी प्रार्थना तो उत्पल ने कभी खुद के लिए भी नही की थी जिनती पूर्वा के लिए कर रहा था हे भगवान प्लीज़ उसे पास करा देना हम दो नारियल चढ़ाएंगे हमारी विनती सुन लेना भगवान प्लीज़। इधर पूर्वा थोड़ी गुस्साई सी यहाँ से वहाँ , वहाँ से यहाँ छत पर टहलती हुई बगल वाली छत पर बार-बार देखे जा रही थी पता नही कहाँ चला गया सुबह से देख रहे है पर दिख ही नही रहा, लो अब आ रहा है कहाँ थे सुबह से पूर्वा ने इतराते हुए उत्पल से पूछा " वो हम कुछ काम से गये थे क्यों ? तुम हमको मिस कर रहीं थी क्या।" अपनी भौहों को सिकोड़ते हुए ज़रा शरारती अंदाज में उत्पल ने पूछा। हम भला क्यों याद करेंगे कहकर पूर्वा थोड़ा दूर जाकर खड़ी हो गई। नन्दी ये तुम्हारी दीदी मुँह फुलाकर वहाँ क्यों खड़ी हो गई , आज दीदी का बर्थडे है नन्दी धीरे से बोली ओह! ये बात है। रात को छुपते- छुपाते नन्दी के साथ मिलकर उत्पल ने पूर्वा का जन्मदिन मनाया वो भी उसका पसन्दीदा पाइनेपल केक लाकर और साथ में गिफ्ट भी दिया देखो हम तुम्हारे लिए क्या लाये है , अरे वाह! मोती की माला खुश होते हुए पूर्वा बोली। कैसी है उत्पल ने पूछा बहुत ही अच्छी है पहन लेते है कहकर पूर्वा ने झट से माला पहन ली। पूर्वा को इतना खुश देख उत्पल को भी बड़ी खुशी हो रही थी "नन्दी भी खुश थी आखिर अपनी पसंद का केक जो मिल गया था।" सुबह उत्पल ज़रा देर से जागा रात को बर्थडे मनाने के चक्कर मे काफी दौड़- भाग जो हो गई थी। दोपहर से शाम हो गई शाम से रात और रात से सुबह ना नन्दी दिखाई दी और ना पूर्वा, देखत- देखते अब तो तीन दिन हो गये थे कहाँ गायब हो गई ये दोनों बहनें उत्पल मन ही मन सोचकर थोड़ा परेशान हो रहा था और फिर शाम को पूर्वा दिख ही गई कुछ उदास सी लग रही थी। उत्पल कुछ कहता उसके पहले पूर्वा ही बोल पड़ी वो हम तुम्हारा ही इंतजार कर रहे थे कुछ बताना था हाँ हाँ बताओ उत्पल बोला। वो कल हमारे पापा आ रहे है हमे लेने के लिए कल हम घर चले जायेंगे। पर तुम तो पूरी छुट्टी यही रहने वाली थीं ना उत्पल ने पूछा तो पूर्वा बोली हाँ रहने वाले थे पर हमारा रिजल्ट गया है , तो उत्पल बोला। तो तो क्या तुम्हें बताये थे ना हमारे पापा हमारा रिसता पक्का कर देंगे कहीं। कर दिया उन ने हमारा रिसता पक्का। तो तुम फेल उत्पल बोल ही रहा था कि पूर्वा गुस्सा करती हुई बोली हाँ हाँ नही हो पाए हम पास तुम भी हमको ताने दे दो नही मिलेंगे कभी तुमसे और रोते हुए चली गई। ये क्या हुआ उत्पल को लगा जैसे किसी ने बड़े वाले झूले में बैठाकर तेज़- तेज़ घुमा दिया हो इसलिए उसे कुछ समझ ही नही आ रहा कि सिर घूम रहा है या वो खुद गोल -गोल घूमें जा रहा है। उत्पल ऐसे उदास होकर बैठ गया जैसे कोई उसे ठेंगा दिखा कर चला गया हो। इसे कहते है सारे किये कराए पर पानी फिर जाना।
धत हमारे कितने पैसे खर्च हो गए इस लड़की की चक्कर मे, इसके साथ - साथ उस नन्दी के भी नख़रे झेलने पड़े सो अलग। थोड़ा अच्छे से पढ़ाई नही कर सकती थी गलती खुदकी और गुस्सा हम पर होकर चली गई। ये भूरे बालों वाली लड़कियाँ बड़ी चंट होती है अब नही करेंगे भरोसा किसी भूरे बाल वाली लड़की पर।






