एक चुटकी प्रेम



मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े नही ये मन ठंडी- ठंडी लस्सी चाह रहा है सोफ़े पर ज़रा बेढंगे तरीके से लेटे अलसाये हुए उत्पल को कुछ ऐसा ही ख्याल आ रहा है पर करे तो क्या करे आलस ने कुछ इस कदर जकड़ा हुआ है कि बेचारे उत्पल में इतनी शक्ति ही नही है कि वो किचन तक चलकर जा सके और खुदके लिए लस्सी बना सके और इतनी हिम्मत भी नही है कि मम्मी को कह सके कि मम्मी ज़रा हमारे लिए लस्सी बना लाना , पता है ना कि अगर मम्मी को आडर दिए तो क्या होगा।उत्पल तो मम्मी को आडर ना दे सका पर मम्मी का आडर जरूर आ गया था उत्पल के लिए। उत्पल ऐ उत्पल जाओ तो ज़रा छत पे कपड़े सुख गए होंगे उठाके लेके आओ। बस मम्मी हमें काम ही बताती रहती है अरे! मन तो एक कदम चलने का भी नही हो रहा है थोड़ा चिढ़ते हुए अलसाई सी आवाज़ में उत्पल बोला, मम्मी ने फिर आवाज़ लगाई उत्पल गए कि नही हाँ , हाँ जा रहे है , पता है नही गए तो का हालात करेंगी हमारी।मम्मी ने भी ना रोज़ की ड्यूटी लगा दी है जैसे हमारी "छत पे जाओ सूखे कपड़े लेके आओ जैसे कि ये काम हमारा ही है, बस इसलिये ही तो आये है इस दुनिया मे" बड़बड़ाते हुए उत्पल छत पर आ गया। कितनी तेज़ धूप पड़ रही है अगर थोड़ी भी देर ज्यादा रुक गया तो इन कपड़ो की तरह मैं भी सुख जाऊँगा। उत्पल जल्दी- जल्दी रस्सी पर टंगे कपड़े उतारने लगा और तभी उसे बगल वाले पड़ोसी की छत पर कोई नज़र आया, ये कौन है नंदी तो नही दिख रही कोई और है " अब उत्पल रस्सी से धीरे - धीरे कपड़े उतार रहा था और नज़र उसकी बगल वाली छत पर ही थी" उस लड़की पर जिसने "हरे रंग का सलवार सूट पहना हुआ था अपने भूरे बालों की उसने चोटी गुथी हुई थी कानों में झुमके थे और एक हाथ में मैटल की चूड़ियां डाली हुई थी" ये छत पर सूखे कपड़े लेने नही आई थी बल्कि गीले कपड़ों को रस्सी पर डालने आई थी। एक - एक कपड़े को ऐसे निचोड़कर डाल रही थी जैसे कोई बड़ी गहरी दुश्मनी हो उनसे। उत्पल का ध्यान अभी भी बगल वाली छत पर ही था सूरज की चमक कुछ- कुछ उत्पल की आँखों मे भी अभी दिख रही थी और उसमें नन्दी की आवाज़ कानों में पड़ गई और आँखों की सारी चमक गायब हो गई। पूर्वा दीदी ,पूर्वा दीदी चलो तुमको पापा याद किये है अच्छा पूर्वा ने कहा ठीक है चलो  कहकर पूर्वा चली गई पर उत्पल ने नन्दी यानी नन्दिनी को आवाज़ देकर रोक लिया ऐ नन्दी कौन है ये , नन्दी ने बड़े इतराते हुए उत्पल को देखा और बोली नन्दी नही नन्दिनी पापा ही हमको बस नन्दी बुला सकते है और ये हमारी दीदी है कहकर गर्दन में झटका देकर नन्दी चली गई। 

ओह! तो इस मुट्टू कि दीदी है वो। उत्पल कपड़े सूखे नही क्या , हाँ मम्मी सुख गये आवाज़ देते हुए उत्पल बोला और जल्दी से कपड़े लेकर मम्मी के पास पहुँच गया ये लो मम्मी सब सुख गये। अगर रोज़ बागीचे में चम्पा का फूल देख रहे हो और अचानक उसकी जगह गुलाब का फूल आ जाये, वो भी लाल गुलाब तो कैसा लगेगा " शायद मन थोड़ा मेहका मेहका सा लगेगा जैसे उत्पल का है , अचानक मार्च के महीने में उसे सावन के आ जाने का एहसास हो रहा है मानो जैसे शीतल पवन की लहरें बार- बार उत्पल के मन को छूकर जा रही हो और पूर्वा का ख्याल ला रही हो जोकि उत्पल को बड़ा ही अच्छा लग रहा था।" अगले दिन उत्पल साहब के तो तेवर ही बदल गए सुबह जल्दी उठ गए वो भी मम्मी के बिना जगाये,नहा लिए तैयार भी हो गए और सुबह से अब तक पाँच बार छत पर जाकर भी आ गए कभी पौधों में पानी देने के बहाने कभी अचार रखने के बहाने तो कभी ये देखने के बहाने की मौहल्ले के कबूतर आये क्या छत पर उन्हें उत्पल दाना डालता है ना , वैसे कबूतरों को भी ये आज ही मालूम हुआ कि उत्पल उनकी फ़िक्र करता है। फ़िक्र तो उत्पल की मम्मी को भी हो रही थी उत्पल को देखकर , जे हमारे लड़के को का हो गया है हमारे बिना कहे कैसे हमारे काम मे हाथ बटा रहा है सुबह से " अचार भी रह आया छत पर, पेड़ों को पानी भी दे दिया और कपड़े भी सूखने डाल आया बात का है। उत्पल ऐ उत्पल इधर आओ उत्पल तुरन्त मम्मी के पास आकर खड़ा हो गया हाँ मम्मी कहो, का बात है बेटा आज बिना कहे तुमने काम मे हमारी मदद भी कर दी सुबह जल्दी उठ भी गए " अपनी भौहों को ऊपर उचकाकर मम्मी ने पूछा। बात कोई बात नही है मम्मी इतनी गर्मी है ना ,तुम अकेले काम करोगी तो बीमार हो जाओगी हमको चिंता हो रही थी इसलिये हम मदद कर रहे थे और रोज़ करेंगे। उत्पल की बात सुन मम्मी तो खुसी से इमोशनल हो गई। तुमको हमारी कित्ती फिकर है हम तो तुमको कामचोर समझते थे हमारा लाडला बेटा। ये सारी मेहनत जिसके लिए हो रही थी वो तो दिखी नही पर मम्मी जरूर खुस हो गई। 

दिन तो उम्मीद में ही निकल गया पर शाम को उत्पल की आँखों को थोड़ा सुकून मिला जब पूर्वा अपनी बहन के साथ छत पर बातें करती दिखाई दी। पूर्वा किसी बात पर खूब हँसे जा रही थी उसे देखकर उत्पल भी मुस्कुराये जा रहा था। कि तभी नन्दी की नजर उस पर पड़ गई " दीदी चलो अब चलते है यहाँ से शाम हो गई है ना, यहाँ शाम को कौए मंडराने लगते है। ये तीखे से अंदाज़ में नन्दी ने जिसकी ओर इशारा किया था वो समझ गया था कि हाँ ये मीठे वचन मेरे लिए ही है पर इससे हौसला कम नही हुआ उत्पल का क्योंकि वो जानता है कि राह चाहे जो भी हो अड़चने तो आती ही है उनके डर से रास्ते पर आगे बढ़ना रोक थोड़ी देंगे। 4-5 दिनों तक उत्पल ने बड़े जतन किये की किसी बहाने ही सही पूर्वा का ध्यान उसकी ओर आ सके ,और ऐसा हुआ भी कल शाम जब मौहल्ले के बच्चों को इकट्ठा कर उत्पल छत पर पतंग उड़ा रहा था तब पूर्वा भी उत्पल की पतंगबाज़ी को देख रही थी बच्चे खुश होकर चिल्ला रहे थे भईया वो वाली पतंग , अब वो पतंग काटो " उत्पल एक के बाद एक पैच लड़ाए जा रहा था और दूसरों की पतंग काटे जा रहा था पूर्वा ये सब देख बड़ी खुश हो रही थी तभी उत्पल ने पुर्वा की ओर देखा और आँखों का ये पैच भी लड़ ही गया और फिर पतंग कट गई जोकि पूर्वा की छत पर जा गिरी। ये पतंग नही थी ये तो उत्पल का दिल था जो पतंग बनके पूर्वा के पास जा पहुँचा।"  अब उत्पल और पूर्वा के बीच थोड़ी बातचीत शुरू हो गई थी जो धीरे- धीरे थोड़े से ज्यादा की ओर बढ़ रही थी पहले कुछ मिनट बातें होती थी जो अब घन्टों में बदलने लगी थी नन्दी ज्यादा खुश तो नही थी इसकी दोस्ती से पर उत्पल ने उसे खुश करने का उपाय भी ढूंढ लिया था वो रोज़ नन्दी को टैक्स देता कभी चॉकलेट कभी कुल्फ़ी तो कभी समोसे , अब पूर्वा से बात करनी है तो टैक्स तो देना होगा। मेहनत का फल हमेशा मिलता है उत्पल ने जिन पौधों को पानी देना शुरू किया था अब उनमे कलियाँ आ गई थी बस फूल का खिलना बाकी था उत्पल को बड़ी जल्दी है फूल के खिलने की, कब ये फूल खिले और वो पूर्वा को उसे दे सके। ये लड़कपन का प्यार भी बड़ा नादानी भरा होता है जिसमे समझ और समझदारी जैसे शब्दों की कोई जगह नही होती। आज जब उत्पल और पूर्वा छत पर साथ बैठे हुए थे हाँ साथ मे बैठे हुए थे दोनों की छत इतनी पास है कि उत्पल आराम से पड़ोस की छत पर चला जाता है। शाम को दोनों साथ बैठे हुए थे और बातें हो रही थी पूर्वा इतराकर पूछ रही थी तुम्हारे पौधों में फूल कब खिलेंगे , जल्दी ही खिल जाएंगे जैसे ही खिलेंगे हम तुमको लाकर दे देंगे उत्पल ने कहा। तुमको हमारी कौन सी बात ज्यादा अच्छी लगती है , हमको हमको तुम्हारी बातें बहुत अच्छी लगती है जैसे वो गाना  गाने वाली गुड़िया होती है ना बिल्कुल वैसे , उत्पल की बात सुन पूर्वा ज़ोर से हँसने लगी अच्छा ! और क्या अच्छा लगता है। और और तुम्हारी आँखें ये हमको नाँव के जैसे लगती है जिसमे ना हम बैठे हुए है उत्पल की बात सुन पूर्वा ने आँखों को मटकाते हुए पूछा सच्ची में, हाँ सच्ची में उत्पल ने बड़े विश्वास के साथ कहा। उत्पल ऐ उत्पल अरे लगता है मम्मी आवाज लगा रही है कल मिलते है कहकर उत्पल जल्दी से कूदकर अपनी छत पर चला गया। पूर्वा को उत्पल के ऐसे एकदम से चले जाने से थोड़ा बुरा लगा अभी तो और कित्ती सारी बातें करनी थी चला गया पागल कहीं का, पर रोक भी तो नही सकती थी। 

मेहनत हमेशा रंग लाती है कली खिलकर फूल बन जाती है उत्पल के पौधों में लगी कलियाँ खिल गई थी उत्पल इन खिले फूलों को देख बड़ा खुश हुआ उसका मन बिल्कुल भी नही था कि इन फूलों को तोड़े पर पूर्वा की खातिर उसने एक फूल तोड़ ही लिया। देखो तो आज हम तुम्हारे लिए क्या लाये है, क्या? लाये हो। उत्पल ने हाथ आगे बढ़ाकर फूल पूर्वा को दिया "अरे! फूल खिल गया हमे ना गुलाब के फूल बहुत पसन्द है खुश होते हुए पूर्वा ने कहा।" उत्पल थोड़ा हिचकिचाते बोला अपने बालों में लगा लो। हाँ लगा लेंगे ज़रा शर्माते हुए पूर्वा बोली। अच्छा घूमने चलोगी हमारे साथ उत्पल ने पूछा तो पूर्वा पूछते हुए बोली पर कहाँ , कानपुर का मेला दिखाएंगे तुम्हें। दोपहर के 3 बजे ईमली के पेड़ के नीचे नीली शर्ट में खड़ा उत्पल किसी देसी फ़िल्म के हीरो से कम नही लग रहा था कम तो पुर्वा भी नही लग रही थी गुलाबी पटियाला सलवार सूट में और उसके भूरे बालों की खजूरी चोटी भी बड़ी जच रही थी। पूर्वा को आता देख उत्पल खुश हो गया और नन्दी को देख खुद से मन मे बोला गुलाब के साथ काँटे तो रहते ही है। फिर चेहरे पर मुस्कान लाते हुए बोला आ गए तुम लोग हमें लगा पता नही कित्ती देर इंतजार करना पड़ेगा, चले फिर। जितना उत्पल ने सोचा था उससे भी कई ज्यादा मज़ा आया मेला घूमने में बस थोड़े पैसे खर्च हो गए उस बात का थोड़ा दुख हो रहा था पर खुशी इस बात की थी कि पूर्वा और उसने साथ में झूला झूला वो पल जैसे उत्पल के आँखों मे ठहर सा गया हो। अब तो दोनों की दुनिया जैसे बदल ही गई थी मानो कोई रंगबिरंगी दुनिया हो जिसमे चेहकती चिड़ियों की आवाज़ आसपास उड़ती तितलियाँ खिलते लाल- गुलाबी फूल और मुस्कुराते हुए पूर्वा और उत्पल के चेहरे। इन कुछ दिनों में मेला ही नही और भी बहुत सी जगहें उत्पल और पूर्वा साथ में घूम लिए थे पर सबसे अच्छा पूर्वा को घाट पर लगा। घाट की सीढ़ियों पर बैठकर बहते गंगा के पानी को देखना भला किसे अच्छा नही लगता, कुछ तो बात है जो यहाँ आकर मन को वो एहसास होता है जो सिर्फ माँ की गोद मे सिर रखने पर मिलता है ,पुर्वा को भी सब की तरह यहाँ आकर एक अपनापन सा लगता है जैसे कोई रिश्ता हो इस जगह से। कल  की बात है पूर्वा और उत्पल घाट पर बैठे बातें कर रहे थे उत्पल उसे अपने कॉलेज की बातें बता रहा था बी.ए 2nd ईयर के सबसे होशियार स्टूडेंट है हम और क्रिकेट में भी हम बहुत अच्छे है सबसे अच्छी बेटिंग हमारी ही तो है पूरी टीम मे। उत्पल खुद की तारीफ़ पर तारीफ़ किये जा रहा था और पूर्वा अच्छा, सच में , वाह कितनी बढ़िया बात है कहती जा रही थी। ये वही हो रहा था कि तुम फेंक लो हम भी लपेट रहे है दोनों बहनें पूर्वा और नन्दी उत्पल की बातें सुनती फिर एक दूसरे को देखती और शरारती अंदाज़ में धीरे से मुस्कुराती। उन्हें देख उत्पल कुछ - कुछ समझ गया था अरे! लगता है हमने कुछ ज्यादा ही बोल दिया पर तुम भी तो कुछ बोल ही नही रही हो ,तुम्हें भी तो अपने बारे में कुछ बताना चाहिए। हम , हमे कुछ ज्यादा आता नही है बस मेहंदी अच्छी लग लेते है और अलग - अलग डिजाइन की चोटी बना लेते है और आम के पेड़ से कैरी तोड़ना आता है हमको। पूर्वा की बात सुन पहले तो उत्पल चुप रहा फिर बोला अरे वाह! ये तो बहुत अच्छी बात है। और पढ़ाई मे तुम कैसी हो उत्पल ने पूछा तो पूर्वा थोड़ा हिचकिचाते हुए बोली वैसे तो हम पढ़ाई में ठीक ही है पर क्या हुआ न कि पिछली बार हम ठीक से तैयारी नही कर पाए थे तो बारहवीं में फेल हो गए थे पर इस बार हमने खूब मेहनत की है पर , पर क्या उत्पल ने पूछा। हमारे पापा बोले है कि अगर इस बार हम पास नही हुए तो वो हमारा रिसता तय कर देंगे। पूर्वा की बात सुन उत्पल को ऐसा लगा जैसे उसके शीशे रूपी दिल मे अचानक से कोई दरार आ गई हो। 

आज का सूरज शायद किसी ओर दिशा से निकला है तभी तो उत्पल मन्दिर में भगवान जी के सामने हाथ जोड़े खड़ा है इतनी प्रार्थना तो उत्पल ने कभी खुद के लिए भी नही की थी जिनती पूर्वा के लिए कर रहा था हे भगवान प्लीज़ उसे पास करा देना हम दो नारियल चढ़ाएंगे हमारी विनती सुन लेना भगवान प्लीज़। इधर पूर्वा थोड़ी गुस्साई सी यहाँ से वहाँ , वहाँ से यहाँ छत पर टहलती हुई बगल वाली छत पर बार-बार देखे जा रही थी पता नही कहाँ चला गया सुबह से देख रहे है पर दिख ही नही रहा, लो अब आ रहा है कहाँ थे सुबह से पूर्वा ने इतराते हुए उत्पल से पूछा " वो हम कुछ काम से गये थे क्यों ? तुम हमको मिस कर रहीं थी क्या।" अपनी भौहों को सिकोड़ते हुए ज़रा शरारती अंदाज में उत्पल ने पूछा। हम भला क्यों याद करेंगे कहकर पूर्वा थोड़ा दूर जाकर खड़ी हो गई। नन्दी ये तुम्हारी दीदी मुँह फुलाकर वहाँ क्यों खड़ी हो गई , आज दीदी का बर्थडे है नन्दी धीरे से बोली ओह! ये बात है। रात को छुपते- छुपाते नन्दी के साथ मिलकर उत्पल ने पूर्वा का जन्मदिन मनाया वो भी उसका पसन्दीदा पाइनेपल केक लाकर और साथ में गिफ्ट भी दिया देखो हम तुम्हारे लिए क्या लाये है , अरे वाह! मोती की माला खुश होते हुए पूर्वा बोली। कैसी है उत्पल ने पूछा बहुत ही अच्छी है पहन लेते है कहकर पूर्वा ने झट से माला पहन ली। पूर्वा को इतना खुश देख उत्पल को भी बड़ी खुशी हो रही थी "नन्दी भी खुश थी आखिर अपनी पसंद का केक जो मिल गया था।" सुबह उत्पल ज़रा देर से जागा रात को बर्थडे मनाने के चक्कर मे काफी दौड़- भाग जो हो गई थी। दोपहर से शाम हो गई शाम से रात और रात से सुबह ना नन्दी दिखाई दी और ना पूर्वा, देखत- देखते अब तो तीन दिन हो गये थे कहाँ गायब हो गई ये दोनों बहनें उत्पल मन ही मन सोचकर थोड़ा परेशान हो रहा था और फिर शाम को पूर्वा दिख ही गई कुछ उदास सी लग रही थी। उत्पल कुछ कहता उसके पहले पूर्वा ही बोल पड़ी वो हम तुम्हारा ही इंतजार कर रहे थे कुछ बताना था हाँ हाँ बताओ उत्पल बोला। वो कल हमारे पापा आ रहे है हमे लेने के लिए कल हम घर चले जायेंगे। पर तुम तो पूरी छुट्टी यही रहने वाली थीं ना उत्पल ने पूछा तो पूर्वा बोली हाँ रहने वाले थे पर हमारा रिजल्ट गया है , तो उत्पल बोला। तो तो क्या तुम्हें बताये थे ना हमारे पापा हमारा रिसता पक्का कर देंगे कहीं। कर दिया उन ने हमारा रिसता पक्का। तो तुम फेल उत्पल बोल ही रहा था कि पूर्वा गुस्सा करती हुई बोली हाँ हाँ नही हो पाए हम पास तुम भी हमको ताने दे दो नही मिलेंगे कभी तुमसे और रोते हुए चली गई। ये क्या हुआ उत्पल को लगा जैसे किसी ने बड़े वाले झूले में बैठाकर तेज़- तेज़ घुमा दिया हो इसलिए उसे कुछ समझ ही नही आ रहा कि सिर घूम रहा है या वो खुद गोल -गोल घूमें जा  रहा है। उत्पल ऐसे उदास होकर बैठ गया जैसे कोई उसे ठेंगा दिखा कर चला गया हो। इसे कहते है सारे किये कराए पर पानी फिर जाना। 

धत हमारे कितने पैसे खर्च हो गए इस लड़की की चक्कर मे, इसके साथ - साथ उस नन्दी के भी नख़रे झेलने पड़े सो अलग। थोड़ा अच्छे से पढ़ाई नही कर सकती थी गलती खुदकी और गुस्सा हम पर होकर चली गई। ये भूरे बालों वाली लड़कियाँ  बड़ी चंट होती है अब नही करेंगे भरोसा किसी भूरे बाल वाली लड़की पर। 




 

 


 

खामोश मन




जिस तरह समुद्र की गहराई नापना आसान नही है वैसे ही मन की गहराई को जान पाना भी सरल नही है। बोलने में कितना छोटा सा शब्द लगता है "मन" पर है समुद्र की तरह विशाल , कभी तेज़ - तेज़ लहरें उठती है तो कभी एकदम शांत हो जाता है ज़रा मौसम बदला की ये घबरा जाता है कभी - कभी तो लगता है कितना नाजुक है मन,  पर जाने क्यों कभी - कभी कठोर हो जाता है। पत्थरों के बीच अकेली बैठी मानवी खुद से ही सब कहे जा रही थी। क्लास में मन नही लगा तो तबियत खराब होने का बहाना बना मानवी यहाँ चली आई। मानवी अक्सर यहाँ आती है खासकर तब जब उसका मन उदास होता है। मुश्किलें सभी की लाइफ में होती है बस फर्क इतना है कि किसी की लाइफ में ज्यादा होती है तो किसी की लाइफ में कम और मानवी उनमें से ही एक है जिसकी लाइफ में मुश्किलें थोड़ी ज्यादा है।" उम्मीद लगाना ही बेकार है जब भी उम्मीद लगाई है वो टूटी ही तो है शायद कभी कुछ नही बदलेगा मन ही मन मानवी सोचें जा रही थी।"  पता था हमे की तुम यहीं मिलोगी पलक ने आवाज देते हुए कहा मानवी ने मुड़कर देखा तो अक्षत और पलक दोनों चलते हुए मानवी की ओर ही आ रहे थे। देख क्या रही हो मैडम हमे अच्छी तरह मालूम है कि तुम्हें इन पथरों से और सामने दिख रहे इस पानी से बड़ा लगाव है, हाँ सही है अब आ गए हो तो बैठ भी जाओ मानवी मुस्कुराकर बोली। पलक और अक्षत के आते ही मानवी का मूड ही बदल गया कुछ पल पहले उदास बैठी मानवी अब अपने दोस्तों के साथ बातें करती हुई खिलखिला कर हँस रही थी ये दोस्त ही तो है जिनके साथ होने पर मानवी अपनी हर परेशानी भूल जाती है। ओह! नो मैं तो भूल ही गई पलक परेशान होते हुए बोली, क्या? हुआ क्या भूल गई मानवी ने पूछा? मुझे घर जल्दी जाना था मम्मा ने जल्दी आने को कहा था तुम लोग बातें करो मैं चलती हूँ कल मिलेंगे बाय। 
पलक चली गई थी और मानवी कुछ कह नही रही थी अक्षत ने कुछ देर इंतज़ार किया और जब मानवी कुछ नही बोली तो उसने खुद ही पूछ लिया " तो क्यों? उदास हो कुछ हुआ क्या? मानवी ऐसे चुप मत बैठो बताओ क्या हुआ अक्षत ने जिद्द करते हुए पूछा? मानवी ने अक्षत को देखा और बोली वही जो हमेशा होता है मैंने फिर से कोई उम्मीद लगा ली थी, और वो टूट गई हे ना अक्षत बोला। "मानवी ने कभी भी अपनी परेशानियों को साफ - साफ तौर पर नही बताया पर फिर भी अक्षत उसकी आधी- अधूरी बातों को अच्छे से समझ लेता है। मन की बातें कह देने से मन हल्का हो जाता है अगर भरोसा करती हो मुझ पर तो मुझसे कह सकती हो अक्षत ने कहा।" मानवी ने अक्षत को देखा और दोबारा नज़रें सामने कर ली " मैं जब छोटी थी तब मेरी ढेर सारी ख्वाइशें थी कुछ ख्वाइशें ऐसी थी जो पूरी हो सकती थी और कुछ ऐसी जिनका पूरा होना ज़रा मुश्किल था जब थोड़ी बड़ी हुई तो वो ख्वाइशें आधी हो गयीं,  और जब और बड़ी हुई तो गिनती की कुछ ख्वाइशें रह गयी 'कुछ को मैंने पूरी करने की कोशिश की और कुछ को छोड़ दिया ' क्यों अक्षत ने पूछा? "अपने अपनो के लिए, हमारे अपनो को बुरा न  लगे बस इसलिए हम हमारी कुछ ख्वाइशों को छोड़ देते है या भूल जाते है मैंने भी भुला दिया" मानवी ने कहा। 
तो इसलिए उदास हो कि कोई ख्वाइश पूरी नही हुई या कुछ और, नही इसलिये उदास नही हूँ अक्षत के पूछने पर मानवी बोली, वो तो आज कहते - कहते मानवी रुक गई और कुछ नही बोली। कुछ देर बाद हवायें चलने लगी जो धीरे- धीरे तेज़ होती जा रही थी शायद मौसम खराब हो रहा है हमे अब चलना चाहिए अक्षत ने कहा, हाँ चलो चलते है मानवी बोली।अक्षत और मानवी जैसे ही थोड़ा आगे चले हवा और तेज़ चलने लगी अक्षत ने मानवी का हाथ कसकर पकड़ लिया मानवी जल्दी चलो शायद मौसम ज्यादा ही खराब हो रहा है दोनों जल्दी से पार्किंग एरिया में पहुँचे और वहीं पास में बनी चाय की गुमठी के नीचे जाकर खड़े हो गए अक्षत अभी भी मानवी का हाथ थामे हुए था, मानवी ने भी हाथ छुड़ाया नही वो भी अक्षत के हाथ को थामे रही। डूबते को जैसे तिनके का सहारा होता है वैसी ही ये छोटी सी चाय की गुमठी भी इस वक्त झील घूमने आए कुछ लोगो का सहारा बनी हुई थी कुछ देर बाद हवा थम गई और सब अपने- अपने रास्ते चले गए। 
घर आने के बाद मानवी अपने कमरे में ही रही दोपहर से शाम हो गई और शाम से रात मानवी कमरे से बाहर नही आई शायद अकेले बैठकर अपनी उलझी हुई जिंदगी के थागों को सुलझाने की कोशिश कर रही थी आज जब अक्षत ने कहा कि अपने मन की बात कहकर मन हल्का कर लेना चाहिए तो एक पल के लिए लगा कह दूँ सब कुछ, अपनी परेशानियाँ अपनी उलझने पर फिर लगा क्या बता देना सही होगा? और फिर मैंने कुछ नही कहा। वैसे भी क्या? बताती की कुछ दिनों में मेरे पेरेंट्स का डिवोर्स होने वाला है, जिन्होंने अपनी आधी जिंदगी लड़ते- झगड़ते बिता दी अब वो अपनी बाकी की लाइफ़ अलग होकर जीने वाले है और मुझे एक बड़ा फैसला लेना है कि मैं डिवोर्स के बाद किसके साथ रहूँगी अपनी माँ के साथ या अपने पापा के साथ। बचपन मे मैं जब भी अपनी दोस्त मीनू के पेरेंट्स को देखती तो यही सोचती के मेरे पैरेंट्स ऐसे खुश क्यों नही रहते है वो क्यों? हमेशा लड़ते रहते है , बचपन से देखा है पापा का हर छोटी- छोटी बात पर गुस्सा करना।पापा का ऐसे हर बात पर गुस्सा करना माँ को बिल्कुल अच्छा नही लगता था और इसलिए दोनों के बीच बहस होने लगती थी और मैं चुपचाप देखती रहती थी कर भी क्या सकती थी? हाँ एक कोशिश मैं हमेशा करती रही वो थी उनकी दोस्ती कराने की " हर फ्रेंडशिप डे पर मैं दो फ्रेंडशिप बेंड लाती माँ और पापा को एक - दूसरे को पहनाने को कहती वो ऐसा करते भी और फिर 4-5 दिन घर मे बड़ी शांति रहती प्यारभरा माहौल रहता और छठवें दिन वो शांति , वो प्यार वापस बहस में बदल जाता। बचपन में बड़ी तमन्ना थी कि हम भी फैमिली वैकेशन पर जाये साथ मे मज़े करे पर ऐसा पॉसिबल ही नही हो सका क्योंकि मेरे पेरेंट्स को एक- दूसरे का साथ ज़रा भी नही भाता था मेरे स्कूल के फंक्शन में या तो माँ आती थी या पापा और कभी दोनों साथ आ भी जाते तो लगता कोई अजनबी है जो साथ मे बैठे हुए है। बहुत बुरा लगता था मुझे उन्हें ऐसे देखकर जिस तरह एक पौधे को फलने- फूलने के लिये समय- समय पर पानी और खाद की जरूरत होती है उसी तरह एक रिश्ते के फलने- फूलने के लिए उसमें प्यार, अपनेपन और विश्वास कि जरूरत होती है जोकि मेरे पेरेंट्स के रिश्ते में शायद कभी था ही नही। जब कभी कुछ दिनों तक वो झगड़ते नही अच्छे से बात भी करते तो एक उम्मीद जग जाती की अब सब ठीक रहेगा , पर कुछ दिनों बाद वो उम्मीद टूट जाती और ऐसे ही हर बार मेरी उम्मीद टूटती रही और कुछ नही बदला। 
जब रिश्ते टूटते है तो बहुत बुरा लगता है मुझे भी लगा, जब माँ और पापा का डिवॉर्स हुआ, पर शायद उनके लिए यही सही भी था। वैसे भी जिस रिश्ते में एक - दूसरे के लिए कोई लगाव कोई जुड़ाव ही ना हो वो रिश्ता रहता भी कब तक। अब मैं और माँ अलग घर मे रहते है इस बदले हुए घर और जिंदगी में बदली हुई चीजों को ऐक्सेप्ट करने में थोड़ा वक्त लग रहा है पर धीरे - धीरे आदत हो ही जायेगी, अपने माँ पापा के डिवोर्स का असर मानवी के मन पर बहुत गहरा हुआ वो कुछ दिनों तक कॉलेज भी नही गई और ना ही किसी से कोई बात की। आज दस दिन बाद मानवी कॉलेज गई जहाँ कोई बड़ी बेसब्री से उसके आने का इंतजार कर रहा था। कहाँ थी? इतने दिनों से कॉलेज क्यों ? नही आ रही थी कितनी फ़िक्र हो रही थी मुझे तुम्हारी , अक्षत सवाल पे सवाल पूछता जा रहा था तब मानवी अक्षत को रोकते हुए बोली अक्षत मैं ठीक हूँ। सच तुम सच मे ठीक हो ना कहते हुए अक्षत ने मानवी के हाथों को थाम लिया और कहने लगा  मानवी तुम अकेली नही हो मैं हूँ तुम्हारे साथ हमेशा , हर कंडीशन में, भरोसा है ना मुझ पर। मानवी ने पलके झपकाते हुए सिर हिला दिया। मानवी जब भी अक्षत के साथ होती है वो अपनी सारी परेशानियाँ भूल जाती है और उसे यकीन होने लगता की आज चाहे जैसा हो कल अच्छा ही होगा।
हम चाहें या ना चाहें पर जो भी हमारे आस- पास होता है उसका असर हम पर होता ही है। अपने माता पिता के रिश्ते की कड़वाहट कहीं ना कहीं मानवी के मन में भी घुल गई है।
अक्षत का साथ मानवी को अच्छा लगता है और वो ये भी जानती है कि अक्षत उसके लिए क्या महसूस करता है पर वो अपने इस दोस्ती के रिश्ते को किसी और रिश्ते में नही बदलना चाहती क्योंकि वो डरती है के कहीं उसका और अक्षत का रिश्ता भी टूट गया तो। 


 
 
 

आसमा के नीचे



हर पल ये सोचते हुए की अब वक्त बदलेगा , वक्त ही गुजर गया पर कुछ नही बदला जो जैसा था वो वैसा ही रहा ,हालात भी वैसे ही है कुछ भी तो नही हुआ, शायद ये सोचना ही गलत था मेरा, की वक्त बदलेगा वक्त नही बदला पर वक्त ने मुझे बदल दिया। मुड़ ऑफ था किसी काम मे मन भी नही लग रहा था तो टेरिस पर चला आया। सच मे ऊँचाई पर आकर जब नीचे की ओर देखते है ना ,तो सब कुछ बहुत छोटा नज़र आता है इतना छोटा की कभी - कभी तो नज़र ही नही आता। पर इसका मतलब ये नही की वो है नही, वो होता है पर जो ऊँचाई पर है उसे वो दिखाई नही देता या ये कहे कि वो देखना नही चाहता क्योंकि उसकी नज़र में वो खुद सबसे बड़ा बन जाता है। 

एक साल पहले जब कॉल आया -  हेलो, येस आई एम अपूर्व जोशी येस ओह! ओके थैंक्यू  कुछ इस तरह बात हुई थी मेरी और फाइनल इंटरव्यू हुआ और मैं सिलेक्ट हो गया। बड़ी कोशिशों के बाद जब कुछ मन चाहा मिल जाये तो पाँव जमीं पर कहाँ पड़ते है वो तो हवाओं से बात करने लगते है मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही था। लंबे इंतजार के बाद मैंने एक बड़ी कम्पनी में वो पोस्ट हासिल की थी जो मैं चाहता था। अब हर दिन मेरा बिजी था मैं मन लगाकर अपना काम कर रहा था जो भी प्रोजेक्ट, टास्क मुझे दिये जा रहे थे मैं उन्हें वक्त से पहले कम्प्लीट कर रहा था काफी कम वक्त में मैं बहुत तेज़ी से सिख रहा था। मेरी इस ग्रोथ से सब सरप्राइसड़ थे इतनी जल्दी बहुत कुछ सिख लिया है तुमने मेरे सीनियर ने मुझसे कहा, अपनी तारीफ सुनकर मैं मुस्कुरा दिया। जब मैं कॉलेज में था तब अपने पड़ोस में रहने वाले विक्की भईया से बड़ा इम्प्रेस था उनकी पर्सनालिटी ड्रेसअप क्या? एटीट्यूट था उनका। कभी - कभी बाल्कनी में बैठे लैपटॉप चलाते दिखाई देते थे कभी - कभार छत पर टहलते हुए दिख जाते थे तो थोड़ी बहुत बात हो जाती थी उनसे, एक बार उन्होंने कहा था एक बार एक अच्छी कम्पनी में जॉब लग जाती है तो बस तरक्की ही तरक्की। 

जब मेरी जॉब लगी तब मुझे विक्की भईया की बात याद आई थी और मुझे पूरा यकीन था कि यहाँ रहकर मेरी प्रोग्रेस जरूर  होगी। आखिर इतनी बड़ी कंपनी और एक्सपिरियंसड लोग जो है मेरे आस - पास। जब हम स्मार्ट पर्सन्स के बीच काम करते है तो हमारा नॉलेज बढ़ता है और मैं जानता था कि मैं ऐसे ही लोगो के बीच हूँ वैसे मैं भी कम टेलेंटेड नही था मेरी स्किल्स भी अच्छी थी और मैंने हर वक्त कोशिश की अपना बेस्ट देने की और कुछ वक्त तक सब कुछ अच्छा रहा। 

हर चमकती चीज़ सोना नही होती दूर से जो नजर आता है वही पास जाकर भी दिखाई दे ऐसा जरूरी नही। ये मान लेना कि सब कुछ बहुत अच्छा है ये हमारी ग़लतफ़हमी भी हो सकती है। आजकल मुझे ऑफिस में कुछ अजीब लगने लगा था या शायद मैंने अब इस बात को नोटिस करना शुरू किया था वैसे मेरे कुछ कलीग्स अच्छे थे सबसे अच्छी दोस्ती हो गई थी मेरी, पर सीनियर पोस्ट पर जो थे उनका बिहेवियर ज़रा अलग था। जाने क्यों वो थोड़े उखड़े- उखड़े से रहते थे और कुछ तो ऐसे पेशाते थे जैसे वही बॉस हो। ये मेरी पहली जॉब थी इसलिए ऑफिस के माहौल के बारे मुझे ज्यादा नॉलेज नही थी। मेरे कलीग्स को देखा था मैंने , सीनियर्स के इर्दगिर्द होते हुए उनकी तारीफ करते हुए और कुछ को बुराइयाँ करते हुए। शुरू में तो मुझे ये सब कुछ समझ ही नही आया पर धीरे- धीरे समझ आने लगा था कि चाहे आप जहां हो पर जिनका ओहदा आपसे ज्यादा हो उन्हें आपको खुश रखकर चलना होगा। काम ही नही मीठी बातें भी आनी चाहिये। पर ना मुझे झूठी तारीफे करना आता था और ना ही मक्खन लगी बातें मुझे सिर्फ मेरा काम करना आता था जिसके लिए मुझे अपॉइंट किया गया था। मुझे लगता था मेरे अपने फील्ड में बेहतर होने से , इंटेलिजेंट होने से सब मुझे लाइक करेंगे पर ऐसा हुआ नही बल्कि मेरे अपने कुछ कलीग्स मुझसे चिढ़ा करते थे और सबसे ज्यादा तो मेरे टीम लीड ही मुझसे चिढ़े रहते थे जोकि मुझसे उम्र में काफी सीनियर थे। ना जाने क्यों पर हर वक्त वो कुछ उखड़े नजर आते थे। जब कभी प्रोजेक्ट में कहीं कन्फ्यूजन होने पर मैं कोई सवाल कर लेता तो वो ऐसे मुझे घूरते जैसे मैंने कोई गुनाह कर दिया हो। अब जो ऑफिस में देख रहा था वो मेरी कल्पना से बिल्कुल अलग था विक्की भईया को देखकर में जितना खुश होता था अब खुदको उस जगह पाकर भी मुझे कोई खुशी नही हो रही थी। अब समझ आया कि कभी- कभी जब विक्की भईया ऑफिस से लौटते थे तो अपसेट क्यों नज़र आते थे शायद उनके साथ भी ऐसा ही कुछ होता होगा जहाँ कुछ लोग बेवजह ही उनसे चिढ़ते होंगे , उन्हें देखकर तानाकशी करते होंगे , कोशिश करते होंगे उनके कॉन्फिडेंस को कम करने की।

"तुम आगे बढ़ना चाहोगे पर लोग तुम्हे पीछे खिंचने की कोशिश करेंगे और ये एक बार नही बार- बार होगा" ये विक्की भईया ने कहा था उस दिन वो उदास थे हाथ मे फर्स्ट ईयर की बुक लिए जब मैं टेरिस पर पहुँचा तो वो खामोश अकेले किसी फिक्र में बैठे हुए थे हेलो भईया कहते हुए मैं उनके पास जाकर बैठ गया, वो हल्का सा मुस्कुरा दिए फिर हमने कुछ देर तक बात की और - और बातों ही बातों में उन्होंने कहा था जितनी मेहनत तुम आगे बढ़ने के लिए करोगे उतनी ही कोशिशें लोग तुम्हें पीछे धकेलने के लिए करेंगे, बड़ी कंपनीज़ में जॉब पाना ही मुश्किल नही रहता वहाँ टिके रहना भी मुश्किल होता है। उस वक्त विक्की भईया की बातें मुझे इतनी ज्यादा समझ नही आई थी। आज जब खुद उस जगह पर हूँ तो सब कुछ समझ पा रहा हूँ कि ऑफिस लाइफ़ सोचने में तो बड़ी अच्छी लगती है पर जीने में उतनी आसान नही होती। एक साल आज पूरा हो गया मुझे इस कम्पनी को जॉइन किये इस एक साल में मैंने बहुत कुछ देखा और सीखा, प्रोफेशनल लाइफ में कोई दोस्त या साथी नही होता हर एक आपका कॉम्पेटिटर होता है। मेरे इस एक साल के एक्सपीरियंस ने मुझे कुछ हद तक बदल दिया है मैं पहले जितना फ्रेंक नही हूँ और ना ही उतना सिंपल। "जो कमियाँ देखना चाहते हो वहाँ कितनी भी कोशिश कर लो उन्हें खूबियाँ  नज़र आएँगी ही नही"। मैंने सालभर बहुत मेहनत की , कोशिश की अपनी बेस्ट परफॉमेंस देने की और मैने दी भी, जो भी प्रोजेक्ट मुझे दिए गए मैंने उन्हें वक्त से पहले पूरा किया, अपने आपको भी बदला अपना स्टाइल अपना लुक बिल्कुल प्रोफेशनल , जैसा वो चाहते थे वैसा बना पर फिर भी कुछ नही हुआ इतनी मेहनत और कोशिशों के बाद भी मुझे टर्मिनेशन लेटर दे दिया गया। मैंने अपने बॉस से बात भी की पर कुछ नही हुआ वो कुछ नही समझे , समझते भी कैसे जो खुद ऊँचाई पर खड़े होते है उन्हें जमीन पर चलने वाले नजर कहाँ आते है।

दुख इस बात का नही है कि जॉब चली गई , दुख इस बात का है कि इतनी मेहनत करने और काबिल होने के बावजूद हमे वो नही मिलता जो हम डिज़र्व करते है। विक्की भईया के साथ भी ऐसा ही हुआ था जो आज मेरे साथ हुआ और सिर्फ मैं ही नही मुझ जैसे और भी होंगे जिन्हें ऐसे एक्सपीरियंस मिले होंगे। खैर ये मेरी पहली जॉब थी जिसमे मुझे वो एक्सपीरियंस हुए जो शायद फ्यूचर में मुझे काफी काम आएंगे। मैंने इस एक साल में कुछ खोया नही बल्कि पाया है लोगो को करीब से जाना है समझा है ऑफिस लाइफ को जिया है और एक बात मुझे अच्छी तरह समझ आ गई कि कुछ भी आसान नही होता और हमारे सपनो जैसा कुछ भी नही होता, वो अलग होता है बिल्कुल अलग। 

रात होती है तो सवेरा भी होता है, अंधेरे के बाद उजाला भी होता है और हर दिन के बाद एक नया दिन शुरू जरूर होता है इस आसमा के नीचे जी रहे लोगों की ज़िंदगी में हर पल बहुत कुछ होता है। 

 वैसे मैंने दूसरी कम्पनीज़ में जॉब के लिए अप्लाय कर दिया था और दो दिन बाद मैं जॉइन भी कर लूँगा। जहाँ फिर एक नई कम्पनी नया ऑफिस नये कलीग्स होंगे , कुछ नई प्रॉबलम्स होंगी और मिलेंगे नये एक्सपीरियंस इसी आसमा के नीचे।

 

 

ओस की बूंदे



गुलाबी ठंड की दस्तक से मौसम जरा बदल गया है सुबह - शाम की ये हल्की - हल्की ठंड का एहसास ऐसा लगता है जैसे कोई होले- होले से गुदगुदी कर रहा हो, गार्डन की घास पर जमी ओस की बूंदें तो ऐसी लग रहीं थी जैसे मोतियों की कोई चादर हो जिस पर भूवी होले - होले बड़े प्यार से अपना एक - एक कदम रख रही थी ओस से भीगी हुई घास जब भूवी के पैरों के तलवों को लगती तो ये ठंडा कोमल स्पर्श भूवी को बड़ा अच्छा लगता ,तभी तो भूवी धीरे- धीरे कदमों को आगे बढ़ाते हुए गार्डन में टहल रही है। वैसे आजकल उसे ओस में भीगी घास पर चलना पसन्द आने लगा है तभी भूवी सुबह - सुबह गार्डन में कभी टहलती नज़र आती है तो कभी पौधों की पत्तियों पर ठहरी ओस की बूंदों से खेलती दिखाई देती है। ये भूवी कुछ बदली सी नज़र आने लगी है क्या ? हो गया है इसे, अपनी भौहों को ज़रा सिकोड़ते हुए दरवाज़े के पास खड़ी भूवी की माँ भूवी को देखकर यही सोच रही थी। भूवी बेटा कॉलेज नही जाना हे क्या? आज ,माँ ने आवाज़ लगाते हुए कहा , हाँ माँ जाना हे ना आ रही हूँ भूवी जवाब देते हुए बोली। 

कुछ देर बाद भूवी तैयार होकर आईने के सामने खड़ी थी कभी अपने बालों को ठीक करती तो कभी अपने चेहरे को निहारती ये सोचकर कि मैं अच्छी तो लग रही हूँ ना। होता है होता है जब नया - नया कॉलेज जॉइन किया हो तब ऐसा ही होता है अभी दो महीने ही तो हुए है भूवी को कॉलेज जाना शुरू किए हुए। ये नई- नई कॉलेज लाइफ भूवी के मन को बड़ी भा रही है और भाये भी क्यों ना अब स्कूल जैसा थोड़ी ना है जो ड्रेसकोड में जाना है अब तो भूवी रोज़ अलग- अलग अपने पसन्द की ड्रेस  पहनकर जाती है और हल्का - फुल्का मेकअप भी कर लिया करती है , कॉलेज में आ गए है स्कूल में नही है अब, अरे बड़े हो गए है हम इतना तो चलता है जब से भूवी की दोस्त ने भूवी से कहा है बस उसके बाद से ही भूवी का ये हल्का - फुल्का मेकअप शुरू हो गया है। भूवी , भूवी बेटा माँ ने आवाज़ लगाई तो भूवी तुरन्त कमरे से बाहर आ गई , कितना टाइम लगता है तुझे तैयार होने में चल अब जल्दी से नाश्ता करले वरना तेरे पापा को देर हो जाएगी, भूवी ने जल्दी- जल्दी नाश्ता किया बाय मम्मा कहा और पापा के साथ चली गई। हर रोज़ भूवी को उसके पापा ही कॉलेज छोड़ने जाते है क्योंकि भूवी का कॉलेज उनके ऑफ़िस के रास्ते मे ही पड़ता है। 

हाय श्रेया हाय निधि , हाय भूवी आ गई मैडम हम तेरा ही वेट कर रहे थे चल क्लास में चलते है पर अभी तो पूरे दस मिनिट बाकी है क्लास शुरू होने में भूवी ने इतराते हुए कहा , मैडम हमे लास्ट वाली बैंच पर बैठने का कोई शौक नही है ओके तो चलो अब बोलते हुए निधि श्रेया और भूवी को क्लास में ले आई और कुछ देर बाद क्लास शुरू हो गई। एक के बाद एक लैक्चर चलते रहे और इतना सारा पढ़ने के बाद भूवी का चेहरा जो कॉलेज आते वक्त फूल की तरह खिला हुआ था वो अब पढ़ाई रूपी धूप से थोड़ा सा मुरझा गया था पर ज्यादा देर तक नही। फोर्थ पीरियड पूरा होने पर जब बेल बजी तो भूवी के चेहरे पर  हल्की- हल्की ताज़गी आ गई कैमिस्ट्री का पीरियड जो शुरू हो गया था। कैमिस्ट्री भूवी का फेवरेट सब्जेक्ट है जो कि शुरू से तो नही था बस अभी - अभी कुछ दिनों से फेवरेट बना है वरना पहले तो कैमिस्ट्री भूवी को बड़ा ही झंझट भरा लगता था पर अब इंट्रेस्टिंग लगने लगा है। सर आये और क्लास शुरू हुई सर जो भी बोर्ड पर समझाते या कहते भूवी बड़े ध्यान से उसे सुनती और समझती भूवी का क्लास में इतना मन लगता कि वो एक बार भी अपने फ्रेंड्स की ओर नज़र घूमाकर भी नही देखती और जब क्लास खत्म हो जाती तो चिढ़ते हुए भूवी कहती ये कैमेस्ट्री का पीरियड इतनी जल्दी खत्म क्यों हो जाता है भूवी कहती तो उसकी सहेलियाँ हँसने लगती हाँ , हाँ प्रिंसिपल से जाकर कहेंगे की कैमेस्ट्री की क्लास का टाइम बड़ा दिया जाए क्योंकि ऐसा भूवी मैडम चाहती है और तब भूवी मुस्कुरा देती। 

जिंदगी में जब कुछ नई चीज़ो की दस्तक होती है जिनसे हम पहले कभी रूबरू न हुए हो तो मन कुछ उलझा- उलझा सा  लगने लगता है जैसे भूवी जो करीब एक घन्टे से अपने नये स्मार्ट फ़ोन में उलझी हुई है एक घन्टे की मेहनत के बाद भूवी ने अपने नए फ़ोन के सारे फीचर्स को अच्छी तरह समझ लिया पर उसके मन का क्या ? मन तो अभी भी उलझा - उलझा सा है। जिन नये एहसासों ने भूवी के मन को घेरे रखा है उनको भूवी कैसे समझेगी और सुलझाएगी। आज कॉलेज के कॉमन रूम में बैठी ये तीनों सहेलियाँ असाइंमेंट तैयार करने में लगी है , भूवी ने तो क्लासेस भी अटेंट नही की उसे केमिस्ट्री का ये असाइंमेंट सबसे अच्छा जो बनाना है दो दिनों से भूवी पूरी मेहनत से बस इस असाइंमेंट को बनाने में ही लगी हुई है केमिस्ट्री की पीरियड की बेल बजते ही भूवी खुश होते हुए क्लास में चली गई उसे पूरा यकीन है कि सर को उसका असाइंमेंट ही सबसे अच्छा लगेगा पर ऐसा हुआ नही रुद्र सर ने जब सबके असाइंमेंट देखे और कहा- सबने मेहनत अच्छी की है सबके असाइंमेंट बढ़िया है पर सबसे अच्छा जिसका असाइंमेंट है , सर ने इतना कहा कि भूवी खुश हो गई लेकिन जैसे ही सर ने नाम लिया नेहा भूवी का मन दुखी हो गया। शाम तक भूवी उदास रही सिर्फ इस बात के लिए की सर उसके असाइंमेंट से ज्यादा खुश नही हुए। रात को अपने बेड पर लेटे हुए भूवी सोचती रही कि वो ऐसा क्या करें कि रुद्र सर उससे खुश हो जाये और इतने सारे स्टूडेंट्स के बीच वो उसे याद रख पाए सोचते - सोचते भूवी की आँख लग गई। 

तीन दिन बाद - आज टीचर्स डे है सब अपने - अपने फेवरेट टीचर्स के लिए कुछ न कुछ जरूर लेकर आएंगे मैं क्या लूँ आईने के सामने बैठी खुदको देखते हुए भूवी बोली। एक घन्टे बाद भूवी कॉलेज में थी हर एक स्टूडेंट्स के हाथ मे कुछ न कुछ नज़र आ रहा था किसी के हाथ मे फूल था तो किसी के हाथ मे ग्रीटिंग कार्ड भूवी के पास भी कुछ था जो वो अपने सबसे खास टीचर के लिए लाई थी पूरे कॉलेज में भूवी की आँखें यहाँ से वहाँ अपने टीचर को ही तलाश रही थी कि तभी स्टाफ रूम के बाहर उसकी तलाश पूरी हो गई और झट से दौड़ती हुई सर के पास पहुँची और तेज़ आवाज़ में मुस्कुराकर बोली हैप्पी टीचर्स डे सर और फूलों से भरा बुके सर के हाथ मे दे दिया। थैंक्यू भूवी इतना सुंदर बुके, ये मेरे फेवरेट फ्लॉवर है रुद्र सर ने कहा। सच में मुझे तो पता ही नही था ये फूल मुझे भी बहुत पसंद है कहते हुए भूवी का चेहरा भी फूलों की तरह खिल उठा इसके बाद भूवी ने बुके तो सर को दे दिया पर उन फूलों की महक भूवी के मन मे रह गई। 

आगे भी ऐसा ही चलता रहा भूवी केमिस्ट्री के सब्जेक्ट में मन लगाकर मेहनत करती ताकि उसके मार्क्स सबसे अच्छे आये और सर खुश हो जाये। क्लास में भूवी सर के ओर देखती रहती। सर जो - जो कहते उस हर एक बात को फॉलो करती। अब तो भूवी को घर पर होते हुए भी रुद्र सर का ख्याल रहता था। भूवी ने जो आजकल थोड़ा बन सवरकर कॉलेज जाना शुरू किया है वो सब भी रुद्र सर के लिये ही है। शाम के वक्त घर के गार्डन के झूले पर हाथ मे गुलाब का फूल लिए भूवी खुद से बातें कर रही थी रुद्र सर कितने अच्छे लगते है ना , कितने अच्छे से पढ़ाते है आई लाइक रुद्र सर , पर मैं उन्हें कैसे बताऊँ क्या? वो मुझे लाइक करते है। करते है नही करते है , करते है नही करते है कहते हुए भूवी फूल की एक - एक पंखुड़ी को तोड़े जा रही थी और तोड़ते - तोड़ते भूवी ने सारी पंखुड़ियाँ तोड़ दी और फिर उन पंखुड़ियों से खेलने लगी। इस नादानी भरी उम्र में भूवी कच्चे धागे में प्यार के मोती पुरो रही थी पर ये प्रेम की माला बनेगी भी या बनने से पहले ही टूट जाएगी।

अब भूवी का अपने मन की बात अपने मन मे रखना मुश्किल हो रहा था वो जल्द से जल्द रुद्र सर को सब कुछ कह देना चाहती थी पर दिल की बात कहना इतना आसान नही होता और भूवी के लिए तो ये और भी मुश्किल था वो हर बार कोशिश करती पर कहते - कहते रुक जाती है लेकिन आज  भूवी ने सोच लिया था कि कल अपने जन्मदिन पर वो सर से बात जरूर करेगी। आज भूवी बहुत खूबसूरत लग रही थी भूवी ने अपने पापा की गिफ्ट की हुई ड्रेस पहनी थी क्लास में सब ने भूवी को बर्थडे विशेस दी हैप्पी बर्थडे भूवी , मेनी हैप्पी रिटर्न्स ऑफ द डे भूवी,  हैप्पी बर्थडे माय स्वीट फ्रेंड , थैंक्यू थैंक्यू , थैंक्यू माय फ्रेंड्स मुस्कुराते हुए भूवी ने सबको थैंक्यू कहा और फिर क्लास शुरू हो गई लेकिन भूवी को तो रुद्र सर की क्लास का इंतजार था जोकि 2 घन्टे बाद खत्म हुआ क्लास शुरू हुई सर ने आते ही पढ़ाना शुरू कर दिया, कितनी देर हो गई सर ने एक बार भी मेरी तरफ देखा नही , अगर वो देखेंगे नही तो उन्हें कैसे पता चलेगा कि आज मेरा बर्थडे भूवी मन ही मन खुद से कह रही थी। पूरा पीरियड निकल गया पर रुद्र सर ने एक बार भी भूवी की ओर नही देखा इस बात का भूवी को बहुत बुरा लगा वो उदास हो गई अब मैं सर से कभी बात नही करूंगी उनकी तरफ़ देखूँगी भी नही भूवी मन ही मन गुस्सा कर रही थी पर ये गुस्सा जल्दी शांत भी हो गया क्योंकि भूवी सर से नाराज़ कैसे रह सकती है भला। आज भूवी सर से बात नही कर पाई लेकिन उसने ठान लिया है कि वो कल जरूर बात करेगी। अगले दिन वाइट् सूट और रेड दुपट्टे में भूवी बहुत प्यारी लग रहती थी कॉलेज के पार्किंग एरिया में बैठी भूवी बार- बार अपने हाथ मे पहनी घड़ी देख रही थी। 4 बज गये थे कुछ देर में रुद्र सर चलकर आये और अपनी कार का दरवाजा खोलने लगे तभी आवाज आई सर , सर ने मुड़कर देखा तो भूवी खड़ी थी। भूवी तुम , क्या?  हुआ कुछ पूछना था सर ने पूछा। नही कुछअ कुछ कहना था कहते हुए भूवी की जबान लड़खड़ा रही थी और हाथ काँप रहे थे। कुछ कहना है ,क्या? कहना है भूवी तुम ठीक हो ना देखो कुछ बताना चाहती हो तो बता सकती हो सर ने कहा तब भूवी ने अपने बैग से रेड रोज़ निकाला और सर की ओर हाथ बढ़ाकर बोली आय लाइक यु सर आप बहुत अच्छे लगते है मुझे, पता है केमिस्ट्री मुझे बिल्कुल अच्छा नही लगता था पर जब से आपने पढ़ाया तब केमिस्ट्री मुझे अच्छा लगने लगा है और पता है मुझे भी ओस की बूंदे अच्छी लगने लगी है आपने सही कहा था ओस की बूंदे मोतियों की तरह लगती है बिल्कुल मोती जैसी कहते हुए भूवी की आँखों से आँसू झलक गए। 

भूवि की बात सुन रुद्र सर हैरान रह गए उन्हें समझ नही आ रहा था कि वो क्या कहे। भूवि हम बाद में बात करेंगे अभी तुम घर जाओ ठीक है। अगले दिन रुद्र सर एक दोस्त के साथ भूवी के घर पहुँचे ,घर के गार्डन मे लगे झूले पर भूवी और सर साथ मे बैठे हुए थे सर भूवी से कुछ कह रहे थे। जो अभी तुम्हारी उम्र है ये उम्र बहुत नादानीभरी होती है इस वक्त हमारी पसन्द - नापसन्द सब बदलने लगती है, कुछ बातें मन को लुभाने लगती है मन नई- नई ख्वाइशें करने लगता और ऐसा इस उम्र में सबके साथ होता। जब मैं कॉलेज में था तो तुम्हारे जैसा ही था नादानी से भरा। मुझे नन्दिनी मेम बहुत अच्छी लगती थी वो मेरी फेवरेट थी तब मेरी सोच तुम्हारे जैसी ही थी लेकिन कुछ साल बाद मुझे एहसास हुआ थी कि नन्दिनी मेम सिर्फ मुझे अच्छी लगती थी बाकी तो मैं ही कुछ और सोच बैठा था क्योंकि उस वक्त मेरी  समझ कम थी मुझे लगा था कि मैं नन्दिनी मेम को चाहने लगा हूँ जबकि ऐसा था ही नही ये तो मेरे नासमझ मन की ग़लतफ़हमी थी जिसे मैं सच मान बैठा था तुम्हारी तरह, रुद्र सर ने भूवी से कहा तो भूवी सर की ओर देखने लगी और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। भूवि किसी का अच्छा लगने का मतलब उससे प्यार हो जाना नही होता जब तुम बड़ी हो जाओगी समझदार हो जाओगी तो समझ जाओगी मेरी तरह, रुद्र सर मुस्कुराते हुए बोले। सॉरी सर मुझसे गलती हो गई कहकर भूवी ज़ोर- ज़ोर से रोने लगी। अरे! भूवी देखो ऐसे मत   रोओ प्लीज़ चलो आँसू पोछो गुड़ गर्ल अब इनसे मिलो ये रिया है मेरी मंगेतर। हाय भूवी जो हुआ वो सब भूल जाओ और अपने करियर पर फोकस करो ओके हम दोनों तुम्हें इनवाइट करने आये है रिया ने कहा। भूवी शादी में आओगी ना सर ने पूछा , हाँ भूवी बोली। अहाँ ऐसे नही मुस्कुराकर बोलो रुद्र सर ने कहा, ओके सर भूवी मुस्कुराकर बोली।  

मासूम दिल जब कोई ख्वाइश कर बैठता है और वो ख्वाईश पूरी ना हो तो दिल तो दुखता ही है भूवी का दिल भी दुख रहा था अब ये ख्वाईश सही थी या गलत ये उसे नही पता बस भूवी इतना जानती है कि एक ख्वाईश थी जो पूरी न हो सकी। सुबह जल्दी उठकर भूवी गार्डन में पौधों के पास खड़ी थी फूलों पर पड़ी ओस को हाथों से छूकर देख रही थी कितनी सुन्दर लगती है ना ये ओस की बूंदे मोतियों के जैसी। 


अप्रैल फूल भाग -2


जब किसी झूठ से पर्दा उठता है तो अक्सर ऐसी खमोशी देखने को मिलती है जैसी अभी वैदिक और रिमझिम के बीच है वैदिक जो कहना चाहता था उसने कह दिया और रिमझिम उसने सब कुछ चुपचाप सुन लिया कुछ भी नही बोली वैसे ही जैसे उस शाम कुछ नही कहा था उसने , जब वैदिक ने पूछा था उससे मेरी दोस्त बनोगी तब रिमझिम ने कुछ नही कहा था। दिनभर की तपती धूप के बाद एक ठंडी शाम थी, वो शाम जिसमे रिमझिम के लिए कुछ सुकून के पल होते है दिनभर के काम और थकान के बाद रिमझिम कुछ पल खुदको रिलैक्स करने के लिए रोज़ शाम को छत पर टहलने जरूर जाती है और कुछ देर वही बैठी रहती है अच्छा लगता है उसे बादलों में शाम के रंग को चढ़ते देखना पक्षियों के झुंड को वापस अपने घर लौटते देखना और जब शाम गहरी होकर रात में बदलने लगे तब आसमान में धीरे- धीरे चमकते हुए निकलते तारों को देखना। रिमझिम तारों को बड़े ही गौर से देखती है वो ये मानती है कि इन सब के बीच एक तारा वो भी है जो सबके साथ चमक रही है। क्योंकि वैदिक आया हुआ है इसलिए रिमझिम ने अपने शाम को छत पर जाने का समय जरा लेट कर दिया रिमझिम नही चाहती कि उसके सुकून के पलों में उसके अलावा कोई और भी हो। हर रोज की तरह रिमझिम अपने तय समय पर अभी छत पर आई हुई थी कुछ ही देर हुई होगी की वैदिक भी आ गया शायद उसने रिमझिम को देखा नही था, लगता है मेरी इस बार की छुट्टियाँ ऐसे ही जाने वाली है अपने दोस्त के बिना, मैं कितना बोर हो रहा हूँ बिल्कुल अच्छा नही लग रहा मुझे, सच मे किसी दोस्त का होना कितना जरूरी होता है कहते हुए वैदिक छत से नीचे रास्ते पर साइकिल चलाते हुए बच्चों को देख रहा था। और जब पीछे मुड़ा तो उसे रिमझिम नज़र आई अरे रिमझिम तुम यहीं थी मुझे पता ही नही चला। हाँ वो मैं शाम को थोड़ा टहलने के लिए आ जाया करती हूँ। आना भी चाहिए वैसे भी शाम के वक्त खुले आसमान के नीचे कितना सुकून मिलता है , है ना वैदिक ने कहा। हाँ , अच्छा लगता है रिमझिम बोली। वैदिक कुछ उदास सा चेहरा बनाकर बैठ गया, क्या? हुआ तुम अपने दोस्त को बहुत मिस कर रहे हो क्या, हाँ वो होता तो मैं इस तरह अकेले बैठा नही होता। तुम बोर नही होती हो क्या ऐसे अकेले - अकेले रहकर वैदिक ने पूछा। नही मुझे बुरा नही लगता रिमझिम ने कहा तो वैदिक हँसते हुए बोला हाँ तुम तो हो ही अलग इसके बाद रिमझिम कुछ देर ही रुकी और फिर जाने लगी तब वैदिक  ने उसे रोकते हुए कहा रिमझिम रुको कुछ पूछना है तुमसे , मेरी दोस्त बनोगी कुछ दिनों के लिये ही सही।  रिमझिम ना कुछ बोली और ना ही ऐसे भाव उसके चेहरे पर दिखे जिससे ये अंदाजा लगाया जाए की शायद रिमझिम हाँ कह दे। अगली सुबह वैदिक दरवाजे की और ध्यान लगाए बैठा था रिमझिम स्कूल जाने से पहले चाबी हमेशा देकर जाती है तो जैसे ही रिमझिम सीढ़ियों से उतरती दिखाई दी वैदिक झट से दरवाजे के पास पहुँच गया चाबी लेते हुए बोला तो फिर क्या सोचा तुमने रिमझिम ने छोटी सी मुस्कान के साथ सिर हिला दिया और वैदिक खुश हो गया। शाम को वैदिक और रिमझिम छत पर एक साथ थे रिमझिम ने वैदिक को पहले ही कुछ रूल्स बता दिए जो उसे दोस्त बनकर फॉलो करने थे हम सिर्फ दोस्त है पर बहुत पक्के वाले दोस्त नही , बात करते वक्त अपनी भाषा का ध्यान रखना है , और हाँ हम सिर्फ कुछ दिनों के लिए फ्रेंड्स बने है, और मुझे मज़ाक ज्यादा पसंद नही ठीक है, वैदिक ने सारी बात सुनने के बाद कहा बिल्कुल सारी बातों का ध्यान रखा जाएगा तो फ्रेंड्स कहते हुए वैदिक ने अपना हाथ आगे बढ़ाया रिमझिम ने बहुत सोचते हुए अपना हाथ बढ़ाया और हैंडशेक करते हुए बोली ओके फ्रेंड्स। फिर दोनों बैठकर बातें करने लगे रिमझिम तुम स्कूल में कैसी थी शरारती थी या अभी की तरह शांत सीधी रिमझिम बोली मैं और बच्चों जैसी ही थी सिंपल सी। पर मैं तो बड़ा ही शरारती था बहुत मस्ती करता था और किसी से भी डरता नही था। अच्छा पर एक बार आँटी ने मुझे बताया था जब तुम स्कूल में थे तो एक बड़ी क्लास के बच्चे ने तुमसे तुम्हारा लंचबॉक्स छुड़ा लिया था बड़ा ही बदमाश था वो , उसके डर से अगले दिन तुम स्कूल ही नही जा रहे थे रिमझिम हँसते हुए बोली,ऐसा कुछ नही हुआ था वो तो माँ को गलतफ़हमी हो गई थी छोड़ो इस बात को अपनी  कॉलेज लाइफ के बारे में बताओ कुछ अच्छा पहले मैं ही बताता हूँ कहते हुए वैदिक ने खुद पहले बोलना शुरू कर दिया और साथ ही खुद की तारीफ करना भी, वैदिक बोलता जा रहा था और रिमझिम उसकी बातों पर धीरे- धीरे अपना सिर हिलाए जा रही थी मैं बहुत ही अच्छा स्टूडेंट था मेरा सारा फोकस हमेशा मेरी पढ़ाई पर रहा टॉप 10 स्टूडेंट्स की लिस्ट में मेरा नाम भी था। जैसा मैं कॉलेज में था वैसा ही मैं अपने ऑफ़िस में हूँ मेरा सारा फोकस सिर्फ और सिर्फ अपने काम पर रहता है मैं हमेशा बेस्ट परफॉर्मेंस देना चाहता हूँ , गुड़ रिमझिम ने कहा। तुम भी तो कुछ बताओ तब रिमझिम बोली मैं , मैं बहुत होशियार स्टूडेंड नही थी बस ठीक थी और जॉब तो तुम्हें पता ही है तुम्हारी जॉब से मेरी जॉब बिल्कुल अलग है। हाँ और बोरिंग भी वैदिक मुस्कुराते हुए धीरे से बोला। हर रोज़ की तरह आज की शाम भी आगे बढ़ चली थी और रात हो गई थी वैदिक हॉल में बैठे हुए टीवी देख रहा था पर उसके दिमाग मे शायद कुछ और ही चल रहा था रिमझिम भी अपने स्टडी टेबल के पास हाथों में बुक लिए कुछ पढ़ रही थी पर बार - बार उसे वैदिक की बातें याद कर हँसी आ रही थी कैसे खुद की तारीफ करें जा रहा था वो सच भी बोल रहा था कि सब झूठ था खैर मुझे क्या करना सोचते हुए रिमझिम ने वापस अपना ध्यान किताब में लगा लिया। जब नई - नई दोस्ती होती है तो बातें भी ढेर सारी होती है वैदिक और रिमझिम रोज शाम को मिलते और खूब बातें भी किया करते वैसे ज्यादा बातें वैदिक ही करता पर रिमझिम भी अब थोड़ा- थोड़ा फ्रैंक होने लगी थी, जब हम किसी से ज्यादा मिलने लगते है उसके साथ वक्त बिताने लगते है उससे बातें करने लगते है तो हमारे मन मे उसके लिए झिझक अपने आप ही धीरे- धीरे कम होने लगती है रिमझिम के साथ भी ऐसा ही हो रहा था सम्हल- सम्हल कर ही सही पर अब रिमझिम थोड़ी बहुत मन की बात वैदिक से करने लगी थी वो शायद इसलिए भी क्योंकि वैदिक की कुछ बातें ऐसी थी जो रिमझिम की सोच से काफी मिलती- जुलती थी। कल जब वैदिक रिमझिम को अपने दोस्त विवान और खुदके स्कूल टाइम के कुछ मज़ेदार किस्से बता रहा था तब कहते- कहते वो रुक गया उसकी नज़र आसमान की ओर थी देखो पंछी कैसे दिनभर की सैर के बाद अब अपने घर लौट रहे है आकाश में उड़ते ये  पंछी एक साथ कितने अच्छे लगते है ना और इनका तालमेल इतना अच्छा होता है कि इतने सारे होते हुए भी ये आपस में टकराते नही है एक ही गति से एक साथ बस उड़ते चले जाते है ,हाँ सही कह रहे हो रिमझिम बोली। 

आज की सुबह रिमझिम के लिए सरप्राइजिंग रही हुआ ये की जब रोज़ की तरह रिमझिम फूल तोड़ने छत पर आई तो उसे वैदिक दिखाई दिया वो भी फूल तोड़ते हुए। रिमझिम , देखो आज तुम्हारा काम मैंने कर लिया ,हाँ वो तो देख रहीं हूँ पर तुम यहाँ कैसे तुम्हें तो शायद देर से जागने की आदत है ना। नही तो मैं तो रोज़ जल्दी जागता हूँ बस आज नींद और ज्यादा जल्दी खुल गई वैसे भी हम सभी को सुबह जल्दी उठना चाहिए सूरज को निकलते हुए सवेरा होते हुए खुद अपनी आँखों से देखना चाहिए , क्यों रिमझिम ने पूछा। क्योंकि इससे मन को खुशी मिलती है और पॉज़िटिव एनर्जी फील होती है , और सवेरा तो नई शुरुआत को लाता है नई शुरुआत के लिए तो जल्दी जागना ही चाहिये, हाँ प्यारी सी स्माइल के साथ रिमझिम ने कहा। अच्छा इतने फूल काफी है या और तोड़ने है वैदिक ने रिमझिम से पूछा हाँ बस इतने बहुत रिमझिम बोली। अगर रोज़ सुबह इन खिले हुए खूबसूरत फूलों को देखें इनकी महकती खुशबू को महसूस करें तो दिन तो बहुत खुशनुमा बीतेगा, तभी तुम धूप में भी होंठो पर हल्की सी मुस्कान लिए इतने आराम से चलकर आती जैसे कि कोई प्रॉब्लम नही है तुम खुश हो, तो ये है राज़। क्या राज़ रिमझिम ने हैरान होते हुए पूछा तब वैदिक बोला तुम्हारी सुबह की शुरुआत इन सुंदर फुलों के साथ होती है मन अपने आप खुशी से भर जाता होगा और फिर सारा दिन अच्छा ही जाता होगा कोई प्रॉब्लम भी तुम्हे प्रॉब्लम की तरह नही लगती होगी सब इज़ी सा लगता होगा है ना वैदिक ने एक होशियार समझदार लड़के की तरह पूछा। जी आपका ये गणित बिल्कुल सही है कहकर रिमझिम जोर से हँसने लगी साथ मे वैदिक भी हँसने लगा अब फूल तो मैंने तोड़ लिए पर तुम्हारा आज का दिन भी हर दिन की तरह जाना चाहिये महकता हुआ कहते हुए वैदिक ने मोगरे के कुछ फूल रिमझिम के ऊपर पर फेंक दिये रिमझिम हँसते - हँसते रुक गई , सॉरी गलती से हो गया मुझसे वैदिक ने थोड़ा सीरियस होते हुए कहा रिमझिम ने भी कुछ फूल लिए और वैदिक पर उछाल दिए कहते हुए की तुम्हारा दिन भी क्यों बुरा जाए ईट्स ओके मैंने बुरा नही माना कहकर रिमझिम चली गई पर वैदिक वही खड़ा रहा रिमझिम को जाते हुए देखता रहा। शाम को रिमझिम छत पर अकेले ही टहल रही थी जाने क्यों वैदिक आज छत पर आया ही नही , ये पहली बार था जब रिमझिम को अकेले होने पर थोड़ा बुरा सा लग रहा था रिमझिम कभी आसमान की ओर देखती तो कभी उसकी नज़र सीढ़ियों पर जा ठहरती, कुछ देर टहलने के बाद रिमझिम वहीं छत के एक कोने में जा बैठी और फिर अपनी डायरी उठाकर कुछ लिखने लगी हाँ आज रिमझिम डायरी भी साथ लेकर आई थी  ये डायरी ही तो है जो रिमझिम की सबसे अच्छी दोस्त है अपने दिल की बड़ी से लेकर हर छोटी से छोटी बात रिमझिम इसी से तो कहती है। अगले दिन वैदिक किसी सुपरफास्ट ट्रेन की तरह सारे घर में यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ दौड़े जा रहा था अपनी माँ के जन्मदिम को स्पेशल बनाने के लिए वैदिक और उसका दोस्त विवान जोकि अपने ट्रिप से अब लौट आया था दोनों मिलकर घर को सजाने में लगे हुए थे रिमझिम ने भी स्कूल से आने के बाद वैदिक के काम मे उसका हाथ बटाया शाम तक सब रेडी हो गया। एक घन्टे बाद सब हॉल में इकट्ठा थे वैदिक ने पार्टी में बस कुछ खास लोगो को ही इनवाइट किया था और बाकी सब घर के ही लोग थे विवान और रिमझिम भी घर के लोगों में ही तो आते है। केक कट होने वाला था पर रिमझिम अभी तक नीचे आई नही थी वैदिक ने दरवाजे के पास आकर ऊपर देखते हुए आवाज़ लगाई रिमझिम जल्दी आओ केक कट होने वाला है हाँ , हाँ आ रही हूँ कहते हुए रिमझिम सीढ़ियों के पास आई और सीढियाँ उतरने लगी वैदिक ने जब उसे देखा तो देखता ही रह गया पहली बार रिमझिम को इस तरह तैयार हुए साड़ी पहने जो देखा था। क्या हुआ रिमझिम ने वैदिक के पास आकर पूछा ,  कुछ नही वैदिक ने कहा। जैसा वैदिक ने सोचा था पार्टी वैसी ही रही तुलसी जी खुश भी थी और थोड़ी शर्मा भी रही थी मेरी नही तेरी उम्र है बेटा बर्थडे पार्टी करने की सुबह से वो वैदिक से यही कहे जा रहीं थी पर वैदिक ने तो ठान लिया था कि इस बार माँ के जन्मदिम को खास बनाना है। 

अगर हम समय को रोकना चाहें तो क्या रुकेगा बिल्कुल नही उसका काम तो चलने का है और वो चलता जाएगा तीन दिन बित गए थे इन तीन दिनों में वैदिक कुछ बदला हुआ सा लगा रिमझिम से जब भी बातें करता तो कुछ अलग ही लगता जैसे उसके मन में कुछ चल रहा हो। पहले तो उसकी बातों में कुछ- कुछ झूठ भी घुला हुआ सा नज़र आता था पर अब तो हर एक शब्द सच्चा सा लग रहा था कल रात की बात है वैदिक को घर मे अच्छा नही लग रहा था तो छत पर चला आया रिमझिम ने उसे जाते देख लिया था तो वो भी पीछे - पीछे चली आई क्या? हुआ वैदिक तुम ठीक तो हो कुछ परेशान हो क्या ? तुम्हें यहाँ आते हुए देखा तो पूछने चली आई , हाँ ठीक हूँ सब ठीक है बस घर के अंदर अच्छा नही लग रहा था इन तारों के बीच खुली हवा में साँस लेना चाहता था तो आ गया। मैं बचपन मे बहुत शरारती था बहुत मस्ती किया करता था मुझे ना दूसरे को बेवकूफ बनाने में बड़ा मज़ा आता था क्योंकि मेरे लिए वो खेल था तब मैं ये नही समझ पाता था कि खेल तो वो मेरे लिए है सामने वाले के लिए तो वो सच ही है ना। तो तुम बचपन की शरारत को याद करके दुखी हो रहे हो बचपन मे तो सभी शैतानी करते है छोड़ों मत सोचों बीती बातों को, देखो तारों को कितनी तेज़ चमक रहे है तुम कौनसा वाला तारा हो वो जो धीमे - धीमे चमक रहा है या वो जो तेज चमक रहा है मैं तो वो वाला तारा हूँ जो चाँद के पास है कहकर रिमझिम हँसने लगी तो वैदिक ज़रा सा मुस्कुरा दिया। आज वैदिक को आये 13 दिन हो गए है शाम को छत पर वैदिक बड़ी ही बेसब्री से रिमझिम के आने का वेट कर रहा था कुछ देर बाद रिमझिम आ गई। कुछ कहना था तुमसे झिझकते हुए वैदिक बोला , हाँ कहो ना रिमझिम ने कहा। इसके बाद वैदिक ने रिमझिम को सब सच-  सच बता दिया कि ये दोस्ती और जो दोस्त बनकर इतनी सारी बातें उसने रिमझिम से की वो सब कुछ झूठ था ये तो बस एक मज़ाक था जोकि कुछ ज्यादा ही आगे बढ़ गया सॉरी मेरा इरादा तुम्हें हर्ट करने का नही था मुझसे गलती हो गई सॉरी। 1 अप्रैल वाले दिन जब उस बच्चे ने वैदिक को अप्रैल फूल बनाया था तभी वैदिक के दिमाग मे भी ये आइडिया आया था। कि क्यों ? ना इस बोरिंग रिमझिम को भी अप्रैल फूल बनाया जाए बड़ा मज़ा आएगा बस यही सोचकर वैदिक ने ये नाटक शुरू किया था जोकि आज खत्म हो गया। जब सब कुछ साफ- साफ हो जाता है तब भी एक शांति सी छा जाती है वैदिक कह कर चुप हो गया था मन ही मन उसे बहुत बुरा लग रहा था रिमझिम से आँखे मिलाने की भी हिम्मत नही हो रही थी उसकी और रिमझिम सब कुछ सुनकर खामोश खड़ी थी। 15 मिनट की खामोशी के बाद रिमझिम बोली वैदिक मेरे दोस्त बनोगे चाहो तो मेरी डायरी और पढ़ सकते हो कहते हुए रिमझिम मुस्कुरा दी। आँटी के कहने पर जब तुम मेरे रूम में फूल लेने गए थे तब तुमने मेरी डायरी भी देखी थी है ना और शायद उसे पढ़ा भी था इसीलिए तुम्हारी बातें कुछ- कुछ वैसी थी जैसा की डायरी में लिखा हुआ था मैं तो पहले ही समझ गई थी इतनी भी बुद्धू नही हूँ जितना कि समझते हो और हाँ मेरे लिए ये दोस्ती अभी भी है। इतना तो जान लिया है तुम्हें, कि तुम झूठे हो या सच्चे हो पर दोस्त तो तुम अच्छे हो। मुझे स्कूल भी जाना है बाय कहकर रिमझिम चली गई। इसके बाद के दो दिन वैदिक और रिमझिम ने अच्छे और सच्चे दोस्त की तरह बिताए और फिर फाइनली वो दिन आ गया जिस दिन वैदिक को वापस जाना था। रिमझिम कुछ कहना था तुमसे वैदिक बोला, फिर से अब क्या कहना है रिमझिम ने पूछा। कुछ सेकेंड सोचने के बाद वैदिक बोला कुछ नही जब नेक्स्ट टाइम आऊँगा तब कहूँगा , ठीक है अब जाओ स्टेशन नही तो तुम्हारी ट्रेन छूट जाएगी रिमझिम ने मुस्कुराते हुए कहा। जाते - जाते वैदिक ने दोबारा पलट कर माँ और रिमझिम को देखा और फिर चला गया। वैसे जाते वक्त वैदिक खुश नज़र नही आ रहा था थोड़ा उदास था वो , ये सोचकर कि रिमझिम को देखे बिना कहीं मन कैसे लगेगा अब इस सारे नाटक के चक्कर मे वैदिक रिमझिम को तो फ़ूल नही बना पाया पर खुद जरूर अपना मन हार गया अब रिमझिम अच्छी जो लगने लगी थी उसे। 


 

अप्रैल फूल




मार्च की धूप भी मई - जून की धूप से कुछ कम नही लग रही है दोपहर के 3 बज रहे है दूर - दूर तक रास्ते पर कोई नज़र नही आ रहा वैसे भी किसकी हिम्मत होगी ऐसी दोपहर में घर से बाहर आने की, सिवाय इसके खिड़की से बाहर देखते हुए वैदिक बोला। जाने किस तरह की है ये लड़की इतनी धूप में हाथ में छाता लिए कैसे धीरे- धीरे चलकर आराम से आ रही है। धूप से जैसे इसे कोई फर्क ही नही पड़ रहा। रिमझिम को कॉलोनी में आये दो साल हो गए है पर अभी तक शायद ही कोई जान पाया हो की रिमझिम है कैसी?, क्योंकि मैं भी अपनी छुट्टियों में ही कुछ दिनों के लिए अपने घर आता हूँ इसलिए बातचीत तो मेरी भी कभी ज्यादा हुई नही है रिमझिम से पर मुझे लगता है कि ये अपने काम को लेकर कुछ ज्यादा ही डेडिकेटिंग है तभी तो फेस्टिवल या समर वैकेशन पर कभी अपने घर नही जाती और शायद कुछ ज्यादा ही सिंपल है हमेशा एक जैसी ही तो नज़र आती है कोई चेंज नही कहते हुए वैदिक ने खिड़की बंद कर ली।  
रिमझिम छाता ताने धूप में चलते हुए घर के पास आ पहुँची उसने अपना छाता बंद किया और दरवाज़ा खटखटाने वाली थी कि उससे पहले ही दरवाज़ा खुल गया। वैदिक, हाय कब आये तुम ,वैदिक चाबी देते हुए बोला रात में ही आया हूँ। ओह! अच्छा। वैसे अच्छा हुआ तुम आ गए आंटी तुम्हे मिस कर रहीं थी कहकर रिमझिम सीढियाँ चढ़कर ऊपर वाले फ्लोर पर चली गई। रिमझिम को वैदिक की मम्मी ने ऊपर वाला फ्लोर किराए पर दिया हुआ है वैसे तो वैदिक की मम्मी अजनबियों पर भरोसा नही करती है पर जब रिमझिम उनसे मिली तो शायद रिमझिम उन्हें भरोसेमंद लगी। रिमझिम है भी बहुत ही ईनामदार भरोसे के क़ाबिल ,वैदिक की माँ तुलसी जी कभी - कभार रिमझिम को भी मार्केट के थोड़े बहुत सामान की लिस्ट थमा दिया करतीं है और रिमझिम स्कूल से आते हुए लिस्ट में लिखे सामान को लेकर आती है। इस तरह रिमझिम तुलसी आँटी की कुछ- कुछ कामो में मदद कर दिया करती है वैसे भी रिमझिम के अलावा और कोई रहता भी तो नही जिससे वो अपने ये छोटे- मोटे काम करा सकें वैदिक दिल्ली में रखकर जॉब करता है और वैदिक के पापा ऑफिस के कामो से ज्यादातर टूर पर ही रहते है इस तरह तुलसी जी अकेली ही रहती है वो तो रिमझिम जब से आई है तब से उन्हें अकेलेपन का एहसास नही हुआ उन्हें वो किसी अपने की तरह लगती है तभी तो तुलसी जी भी रिमझिम का बड़ा ख्याल रखती है जब भी खाने में कुछ स्पेशल बनाती है तो रिमझिम को आवाज जरूर लगाती है। 
शाम को वैदिक छत पर टहलते हुए गाने सुन रहा था रिमझिम रस्सी पर से सूखे कपड़े उठा रही थी रिमझिम तुम्हें धूप बहुत पसंद है वैदिक ने पूछा,  ऐसा क्यों पूछ रहे हो रिमझिम बोली। वो तुम रोज़ धूप में इतने आराम से चलकर आती हो तो देखकर लगा शायद तुम्हे गर्मी में भी धूप अच्छी लगती है। वैदिक की बात सुन रिमझिम ज़रा सा मुस्कुरा दी। स्कूल की टीचर्स को छुट्टियाँ नही मिलती क्या? वैदिक ने फिर पूछा , मिलती है पर स्कूल में समर क्लासेस भी होती है तो कुछ टीचर्स छुट्टी पर नही जाते  रिमझिम जवाब देते हुए बोली। और शायद उन कुछ टीचर्स में से तुम वो टीचर हो जो कभी छुट्टी पर नही जाती, है ना वैदिक ने हँसते हुए कहा तो रिमझिम ने बड़े धीरे से हूँहहह कह दिया इसके बाद वैदिक रिमझिम से समरक्लासेस के बारे में पूछने लगा और फिर अपने ऑफिस की बातें रिमझिम को बताने लगा तब उसकी बातों पर विराम लगाते हुए रिमझिम बोली वो मुझे और भी बहुत काम है तो मैं कभी और तुम्हारी बातें रिमझिम ने इतना कहा तो वैदिक बोला हाँ , हाँ जाओ वो मुझे खुद भी एक इम्पोर्टेन्ट कॉल करना है , ओके रिमझिम बोलकर चली गई। मुझे और भी बहुत काम है वैदिक रिमझिम की नकल करते हुए बोला, जैसे मैं तो बहुत फ्री हूँ मुझ जैसे स्मार्ट लड़के की बातें इसे इंटरेस्टिंग नही लगी तो बाकी सबकी बातें तो इसे बोरिंग ही लगती होंगी तभी इसका इतने दिनों में कोई फ्रेंड नही बना जबकि खुद बोरिंग है। ये विवान भी ना इसे अभी ही ट्रिप पर जाना था कोई बात करने वाला भी नही है बोर हो रहा हूँ मैं। वैदिक जब भी अपने घर आता है तो बचपन के दोस्त विवान के साथ खूब मज़े करता है लेकिन इस बार वैदिक ने अपने आने की ख़बर विवान को दी नही सोचा सरप्राइज देगा पर उसे खुद ही यहाँ आकर सरप्राइज़ मिल गया जब उसे मालूम हुआ कि विवान तो किसी ट्रिप पर गया है।
सुबह की ठंडी हवा में वॉक करते हुए वैदिक का मन जोकि कल अपने दोस्त को मिस करते हुए उदास हो रहा था वो अभी ज़रा हैप्पी हैप्पी सा था सुबह की ठंडी- ठंडी हवा में जादू ही कुछ ऐसा होता है कि तन को छूते ही मन को तरोताजा कर देती है।  तभी तो वैदिक रोज सुबह की वॉक पर जरूर जाता है वैदिक वॉक से लौट रहा था और तभी कॉलोनी के एक बच्चे ने उसे आवाज़ लगाई भईया, भईया वैदिक आवाज सुनकर पलटा हाँ क्या हुआ , अरे भईया आपका मोबाइल गिर गया है खबराते हुए उस बच्चे ने कहा , वैदिक जल्दी से रास्ते पर देखने लगा अप्रैल फूल बनाया कहते हुए वो बच्चा जोर से हँसने लगा और फिर दौड़कर अपने दोस्तो के पास चला गया। ओह! तो आज 1 अप्रैल है बचपन मे हमने भी सबको खूब अप्रैल फूल बनाया है  कहते हुए वैदिक मुस्कुराया और घर के अंदर आ गया , वैदिक मम्मी सुबह की पूजा की तैयारी कर रही थी वैदिक को देखते ही बोली वैदिक बेटा ऊपर जाकर रिमझिम के कमरे से फूल ले आना वो टेबल पर रखकर गई है बस आज मुझे देना भूल गई ये ले चाबी जा लेआ। अरे माँ मैं अभी तो आया हूँ अच्छा ठीक है लेकर आता हूँ वैदिक ने ताला खोला और कमरे के अन्दर आ गया पूरा कमरा बहुत अच्छे से जमा हुआ था हर चीज़ अपनी जगह पर थी कुछ भी बिखरा हुआ नही था। टेबल पर एक छोटी सी टोकरी में फूल भी रखे हुए थे वैदिक टेबल के पास पहुँचा टेबल पर कुछ किताबें रेसेपी बुक ड्रॉइंग शीट्स कलर्स  और एक सुंदर सी अलार्म घड़ी थी। वैदिक ने टेबल पर रखी बुक्स उठाकर देखी और वापस वैसे ही रख दी जैसी वो रखी हुई थी और फिर फूलों की टोकरी लेकर चला गया। 
आज वैदिक को आये 13 दिन हो गए हैं वैदिक और रिमझिम दोनों एक साथ छत पर थे दिन ढल गया था और शाम हो गई थी एक गहरी खामोश शाम, ना पेड़ों के पत्ते हिल रहे थे ना हवा चल रही थी और ना पक्षियों की कोई आवाज थी रिमझिम और वैदिक दोनों के चेहरे के भाव भी ज़रा गम्भीर थे और दोनों ही खमोश थे। 


[ पूरी कहानी अगले भाग में]

जाने छुपा कहाँ वो रास्ता


जाने छुपा कहाँ है वो रास्ता जो जाता है वहाँ, जहाँ मंज़िल है मेरी , जहाँ मेरा छोर है। बीचों- बीच मे हूँ खड़ा, देख रहा हूँ यहाँ - वहाँ जाने वो किस ओर है। आखिर क्यों ये धुंध छाई है दिखता नही कुछ साफ दिखाई है, ये कोहरा है छाया या मुझसे रस्ता है भुलाया। मैं अकेला रास्ते अनेक इनमें से कैसे चुनूँ कोई एक। कैसे जानूँ कैसे पहचानूँ सब ओर नज़र घुमा रहा हूँ सारे रास्ते एक जैसे ही पा रहा हूँ। क्या करूँ ? सही रास्ता ढूँढ़ने की कोशिश करूँ या किसी भी एक रास्ते पर चल पडूँ। जैसे ही कदम बढ़ा रहा हूँ मैं थोड़ा- थोड़ा डरता जा रहा हूँ। मन मेरा हिचकियाँ खा रहा है पूछ रहा है मुझसे - तू सही तो जा रहा है। शंकाये भर- भरकर मस्तिष्क में आ रही है एक - एककर वो मेरे मन से कुछ कहती जा रही है। अब थोड़ा घबराया सा इस सोच में पड़ा हूँ ये मैं कहाँ खड़ा हूँ , धुँआ- धुँआ सा सब नज़र है आता ना जाने कौन सा रास्ता किधर को है जाता। कितनी उलझन है भाई आख़िर क्यों? किसी को मंजिल की राह सीधे- सीधे नज़र नही आई। मुश्किल है मंजिलों के रास्ते पाना , बड़ा कठिन है अनजानी राहों पे जाना। भले ही डरते - डरते मैंने एक कदम ही है आगे बढ़ाया, पर मैं भी हूँ अब ज़िद पे आया। "ढूंढ़ लूँगा मैं वो रास्ता छिपा चाहे वो जिस ओर है जो जाता है वहाँ ,जहाँ मंजिल है मेरी , जहाँ मेरा छोर है।" 


बस के इंतज़ार में


ठंडी हवा ज़रा भी हाथों से टकराती तो सारे बदन में कपकपी सी दौड़ जाती लग रहा था जैसे बस स्टेशन पर नही किसी बर्फीले पहाड़ पर बैठा हूँ जहाँ हर तरफ ठंडी ठंडी और बहुत ठंडी हवाएँ चल रही है और मैं ठंड से काँपे जा रहा हूँ हाँ मेरा हाल सचमुच कुछ ऐसा ही तो हो रहा था। बस स्टेशन पर बैठे हुए मुझे बहुत ठंड लग रही थी वैसे मेरे आस- पास जो लोग थे वो भी मेरी तरह ठंड से काँप रहे थे पर फिर भी मुझे लग रहा था जैसे ये ठंडी हवाएँ मुझे ही परेशान कर रही हों, मैंने अपने पैरों को सिकोड़ लिया और अपने हाथों को जैकेट की पॉकेट में डालकर बैठ गया ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है जब भी मुझे कहीं जाना होता है ये मौसम खराब हो जाता है पिछली बार बारिश की वजह से ट्रेन लेट आयी और अब कोहरे ने बस का टाइम बदल दिया। लगभग 20 मिनिट गुज़र चुके थे देखते- देखते सूर्यदेव आँखों से औझल हो गए और शाम ने बादलों पर अपना रंग चढ़ाना शुरू कर दिया हवा अब और भी ठंडी हो गई थी। मैं और बाकी सारे यात्री खामोश से बैठे नजरों को ईथर- उधर दौड़ाते हुए वक्त काटने की कोशिश कर रहे थे तुम आजकल के नौजवान तो जाने कैसे हो छोटी सी बात पर भी ऐसे मुँह लटकाकर बैठ जाते हो जैसे कोई बहुत ही बड़ी बात हो गई हो मेरे पास ही बगल में बैठे अंकल जी ने कहा तो मैं ज़रा सा मुस्कुरा दिया बिल्कुल ऐसे जैसे मुझे जबरन मुस्कुराने को कहा गया हो। देख रही हैं आशा जी आज की युवा पीढ़ी को, कितनी कमज़ोर है मन से भी और तन से भी अंकल जी ने अपने हाथ मे पकड़े हुए पर्स में देखते हुए कहा तो मैंने थोड़ा चिढ़ते हुए पूछ लिया अच्छा कैसे?। तब अंकल जी बोले, बस देर से आएगी ये जानकर तुम ऐसे उदास होकर बैठ गए हो जैसे बस नही मानो तुम्हारी प्रेमिका हो जिसने वादा तो 4 बजे आने का किया था पर आ 5 बजे रही है और देखो ज़रा खुदको ठंड से कैसे काँप रहे हो जैसे साठ साल की उम्र मेरी नही तुम्हारी हो गई हो। अंकल जी की बात सुन मुझे हँसी आ गई जाने क्यों मुझे अपनापन लगा और मैं थोड़ा सा मुहँ बनाते हुए बोला बस के लिए अभी 1 घन्टे हमे इंतज़ार करना है वो भी ऐसी ठंड में ये जानकर कौन खुश होगा भला और आप कह रहे है कि हम आजकल के नौजवान बड़े कमज़ोर है तो अंकल जी आप बताइये जब आप हमारी उम्र में थे तो कैसे? थे अपनी भौंहों को ऊपर उचकाते हुए मैंने पूछा। हम , हम तो बहुत स्ट्रॉग थे बल्कि अभी भी है ही। तुम जैसे ठंड से काँप रहे हो ना, अरे ऐसी ठंड में हम तो स्वेटर ही नही पहना करते थे और ठंड हमारा कुछ भी नही बिगाड़ पाती थी और उदास होना क्या होता है जैसे हमे पता ही नही था। अंकल ने कहा तो उनकी बातों पर मैं डाउट करते हुए बोला अच्छा सच में तब अंकल बोले हाँ , हाँ सच मे। अच्छा और कैसे थे आप मतलब क्या - क्या खूबियाँ रही है आप मे। अब खुद के मुहँ से खुदकी क्या तारीफ़ करें पर जो सच है वो सच है। मैं बचपन से ही बड़ा निडर था किसी से भी नही डरता था पिताजी से भी नही, जबकि पिताजी सख्त स्वभाव के थे उन्होंने जो कह दिया तो बस वही होना है लेकिन मैं भी ज़िद्दी स्वभाव का था इसलिए अपने भाई - बहनों में सबसे ज्यादा पनिशमेंट मुझे ही मिला करती थी। लेकिन स्कूल में मैं मास्टरजी का बड़ा ही चहेता था होनहार स्टूडेंट जो था मुझे मेरा गाँव, गाँव का घर , स्कूल , मेरे दोस्त सब बहुत अच्छे लगते थे पर मेरे बारहवीं पास करते ही पिताजी हम सबको लेकर शहर में आ गये। कुछ दिनों तक गाँव की याद आई पर धीरे- धीरे शहर की आदत हो गई और फिर कॉलेज में एडमिशन हो गया था तो पढ़ाई में भी बिज़ी हो गये। ओह! तो क्या आपने सिर्फ़ पढ़ाई और पढ़ाई की है, कॉलेज लाइफ इंजॉय नही की क्या? अच्छा ये तो बताइए आप कॉलेज कैसे जाया करते थे स्मार्ट कूल बॉय की तरह या फिर सिंसियर स्टूडेंट की तरह। नही नही हम तो हमेशा अच्छे स्टूडेंट की तरह ही कॉलेज जाते थे और एक दम साधारण रहते थे पर फिर भी जब हम क्लास में इंटर हुआ करते थे तो कितनी ही नजरें अपने - आप हमारी ओर मुड़ जाया करतीं थी पर मजाल है जो हमारी नज़र किसी की ओर हो जाये। क्यों? आपको किसी से दोस्ती करना पसंद नही था क्या या फिर आप अकड़ू थे मैंने पूछा। अरे! नही ऐसी कोई बात नही थी दरसल पिताजी ने पहले ही सख्ती से साफ कह दिया था कि शहर आये है इसका मतलब ये नही की यहाँ के रंग-  ठंग में ढल कर बिगड़ जायें और अपने संस्कार ही भूल जाये कॉलेज पढ़ाई करने जाना है दोस्ती यारी करने नही। ओह तो आपका कोई फ्रेंड नही था और जब कोई फ्रेंड ही नही था तो गर्लफ्रैंड क्या होगी मैंने थोड़ा धीमे शब्दों में कहा। तब अंकल जी ने मेरी ओर देखा और कहने लगे न , ना उदास मत हो कहानी तो अभी बाकी है। मैं झट से खुश होते हुए बोला हाँ तो फिर सुनाइये ना। हाँ तो सुनो, जब हम अपनी क्लास में होते थे तो बिल्कुल एक सभ्य स्टुडेंट की तरह पढ़ाई किया करते थे और जैसे ही क्लास से निकलकर केंटीन की और बढ़ते तो घनश्याम से बस श्याम रह जाते, बचपन मे मैंने कब पिताजी की सारी बातें मानी थी जो अब मानता। वो जो कहते थे वो मैं करता था पर जो मेरा मन कहता था मैं वो भी किया करता था। एक या दो नही हमारे बहुत सारे दोस्त थे और सबके -सब शैतान शरीफ़ कोई भी नही था सिवाये हमारे, तभी तो जिम्मेदारी भरा काम हमे ही सौंपा जाता था। जिम्मेदारी भरा काम, ये कौन सा काम था मैंने अंकल जी से पूछा तब अंकल जी मुस्कुराते हुए बोले अब लग रहा है कि तुमने अपनी कॉलेज लाइफ में कोई जिम्मेदारी वाला काम नही किया। मैंने पूछा क्यों , तभी तो सवाल कर रहे हो ना अंकल जी बोले। अरे भई अपने दोस्तों के प्रेम पत्रों का आदान- प्रदान करना बड़ी ही जिम्मेदारी का काम होता है जोकि हर किसी को नही सौंपा जाता जिस पर भरोसा होता है उसे ही ये काम दिया जाता है, अपने दोस्तों में मैं ही सबसे ज्यादा भरोसेमन्द था , मेरे दोस्तों को इस बात का पूरा यकीन था कि मैं उनके लेटर्स कभी खोलकर नही पढूँगा। सच मे आपने कभी कोई लेटर खोलकर नही देखा था मैंने ज़रा शक्की निगाहों से देखते हुए पूछा तब अंकल जी बोले नही , नही हम अपने दोस्तों का यकीन कैसे तोड़ सकते थे भला। मतलब आप तो वाकई में एक बहुत ही ईमानदार दोस्त रहे है वैसे आपने भी कभी खुदके हाथों से किसी के लिए स्नेह भरा पत्र लिखा था कि नही। साफ - साफ पुछलो ना कि हमारी कोई प्रेमिका थी कि नही, नही थी। पर कोई तो होगी ना जो आपको अच्छी लगी होगी जिसे देखते ही आपके मन की कलियाँ खिल उठती होंगी, हाँ आपके चेहरे के एक्सप्रेशन्स देखकर लग रहा है कि कोई तो थी देखिए कैसी  धीमी- धीमी मुस्कान आ रही है होंठो पर अब बता भी दीजिए। तब अंकल जी हल्के से इतराने वाले एक्सप्रेशन देते हुए बोले अगर ये अभी भी वही कॉलेज वाला वक्त होता तो हम बताते नही क्योंकि हमने तो तब भी किसी को अपने मन की खबर होने नही दी थी पर चलो आज तुम्हें बताते है तो सुनो- उसका नाम लता था भूरी- भूरी आँखें भूरे- भूरे बाल और पतली सी उसकी आवाज़, क्लास की टॉपर थी वो, पर क्लास में किसी से ज्यादा बात नही करती थी बस उसकी दो- तीन सहेलियाँ थी जो साये की तरह हर पल उसके साथ ही रहती थी और उन्ही के साथ वो ग्रूप स्टडी किया करती थी। इसलिए उससे बात हो पाना जैसे ना के बराबर ही रहता था।वो तो जब हमारे सीनियर्स की फेरवल पार्टी थी तब लता और मैंने ही एंकरिंग की थी उसी दौरान थोड़ी बहुत बात - चीत हुई थी हमारी। उस दिन लता ने जो हरे रंग की साड़ी पहनी थी उसमे वो बहुत सुंदर लग रही थी मन कर था कि उसकी तारीफ कर दूँ पर फिर मैं हिचकिचा गया। आपने लता जी को अपने मन की बात कब?  बताई। हमारे सीनियर के फेयरवेल से खुद हमारा फेयरवेल आ गया पर अपने मन की बात कहने की हिम्मत मैं जुटा ही नही पाया लता क्या कहेगी इस बात की फिक्र से ज्यादा डर इस बात का था कि पिताजी को पता चल गया तो क्या होगा। फिर। फिर क्या ग्रैजुएशन पूरा हो गया और सब अपने - अपने रास्ते चले गये। ओह! मैंने निराशा के भाव से कहा। अभी 15 मिनट और थे बस आने में मैं उठा और हम दोनों के लिए चाय ले आया। आपके पर्स में जो तस्वीर लगी हुई है जिन्हें आप आशा जी कह रहे है वो आपकी वाइफ की है , है ना। हाँ कहते हुए अंकल जी ने अपना पर्स निकाला और मुझे तस्वीर दिखाते हुए बोले ये हमारी पत्नी की फ़ोटो है। हमारी अरेंज मैरिज हुई थी आशा जी से शादी के बाद ही हमने ये जाना कि लता सिर्फ पसन्द थी हमारी, जो आँखों को भा गई थी कुछ और ज़्यादा था ही नही और आशा जी वो तो जब से जीवन मे आई तो ऐसा लगा ही नही की हम दो अजनबी है जो अभी - अभी एक रिश्ते में बंधे हो लगा जैसे हम हमेशा से साथ ही तो थे। मतलब आपको आपकी रियल ड्रीम गर्ल मिल गई थी। हाँ मिल गई थी और उनके आने से हमारी दुनिया पूरी तरह बदल गई थी जो भी हमे देखता हमारी खूब तारीफ करता कि वाह! क्या जोड़ी है और हम खुशी से मुस्कुरा देते और ऐसे ही खुशी - खुशी कई साल हमने साथ बिता दिये। स्वीट स्टोरी मैंने स्माइल करते हुए कहा और फिर रास्ते की ओर देखने लगा। कुछ पल चुप बैठा रहा इसके बाद मैंने अंकल जी से पूछा अंकल आप घर देर से पहुँचेंगे तो क्या आँटी आप पर नाराज होंगी मेरे ऐसा पूछने पर वो बोले नही जब मैं घर पहुँचूँगा तो ना कोई नाराज़ होने वाला होगा और ना ही ये पूछने वाला की देर कैसे हो गई। क्यों ? मैंने पूछा। अंकल जी चेहरे के भाव अब अचानक बदले नज़र आये।उन्होंने कहा क्योंकि चार साल पहले ही आशा जी हम से दूर हो गयीं वो हमे छोड़कर चलीं गयी, पर लगता नही है कि वो हमारे पास नही है हमे तो हर पल साथ होने का एहसास होता है। अंकल की बात सुन मैं ज़रा दुखी हो गया बहुत बुरा लग रहा था मुझे उनके लिए, स्वीट स्टोरी का शायद ये सेड टर्न था। आपको आंटीजी की याद आती होगी ना, नही बिल्कुल नही याद तो तब आयेगी जब मैं उन्हें भूलूँगा और आशा जी,  वो तो कभी हमें खुदको भुलाने नही देंगी गहरी साँस भरते हुए अंकल जी ने कहा। मैं फिर कुछ पल खामोश होकर बैठ गया पर अंकल कुछ गुनगुना रहे थे शायद आँटी को याद कर गुनगुनाने लगे। फिर कुछ देर बाद मुझसे बोले अरे! इतना दुखी सा चेहरा मत बनाओ देखो शाम कितनी सुहानी लग रही है और तुम्हारी बस भी आने ही वाली है तो अब खुश हो जाओ हँसते हुए अंकल ने कहा तो मैं उनकी ओर देखने लगा। ओह हो ऐसे क्यों देख रहे हो, तुम आजकल के बच्चे भी ना बड़ी जल्दी इमोशनल हो जाते हो चलो एक राज़ की बात बताता हूँ हमारे दोस्तों के जो प्रेमपत्र थे ना वो सब हमने चोरी से पढ़ लिये थे और एक बार हमने भी लता को प्रेम पत्र देने की कोशिश की थी पर वो गलती से उसकी सहेली आशा के पास पहुँच गया , फिर क्या हुआ । फिर , प्यार हुआ इकरार हुआ और आशा जी और हमारी शादी हो गई। अंकल की बात सुन मैं कुछ कन्फ्यूज़ सा हो गया वो ऐसे आराम से कह रहे थे जैसे उन्होंने कुछ अजीब कहा ही न हो , लो भई बस आ गई चलो अब। आज आशा जी बड़ा नाराज़ होंगी हम पर। क्या?  मैंने चौंकते हुए कहा तब अंकल जी मुझे देखते हुए बोले बेटा ऐसी ठंड में बैठकर 1 घन्टे बस का इंतज़ार करना कोई आसान थोड़ी ना है इसलिए मैं तुम्हें कहानी सुनाने लगा, इससे हम दोनों का वक्त भी कट गया और ठंड का एहसास भी जरा कम रहा। अब कहानी में कही सारी बातें हमेशा सच्ची हो ऐसा जरूरी तो नही, सामने वाला हमारी कहानी मन लगा के सुने इसलिए बहुत कुछ खुद की तरफ से भी जोड़ना पड़ता है फिर चाहे वैसा हुआ हो या ना हुआ हो कहकर अंकल जी ज़ोर से मुस्कुरा दिये पहले तो उनकी बात सुन मैं सोच में पड़ गया और फिर सब समझ आते ही मैं भी धीरे से मुस्कुरा दिया। अंकल जी से मेरी ये मुलाकात बड़ी दिलचस्प रही और यादगार भी। 

छोटी सी आशा





गुनगुनाती हुई मेहक छत की दीवार पर चित्र बनाते हुए अपने चित्रकारी के हुनर को निशु दीदी को दिखा रही थी मेहक ने चित्र पूरा कर जब निशु दीदी से पूछा की चित्र कैसा लग रहा है तो निशु दीदी मुस्कुराते हुए बोलीं अरे वाह ! मेहक कितना सुंदर चित्र बनाया है बड़ा ही अच्छा लग रहा है तुम तो बहुत होशियार हो निशु दीदी के ये कहने पर मेहक खुशी से उछल पड़ी और बड़े प्यार से बोली तो फिर मैं और बनाऊ तब मेहक को समझाते हुए निशु बोली तुम सब कुछ आज ही बना लोगी तो फिर कल क्या बनाओगी और तुम्हारे ये छोटे - छोटे हाथ भी तो थक जायेंगे ना।किसी बड़े की तरह सोचने की एक्टिंग करते हुए मेहक बोली हाँ वो तो है तभी मेहक की माँ ने मेहक को आवाज लगाई तो मेहक झट से दौड़ती हुई अपनी माँ के पास चली गई। 
मेहक के जाने के बाद निशु उसकी बनाई ड्रॉइंग में कुछ सुधार करने लगी , मेहक ने अपनी ड्रॉइंग में छत के पास वाला आम का पेड़ बनाया था और वो चिड़िया जिसे वो रोज़ देखती है पेड़ की टहनी पर बैठे हुए। मेहक का बनाया हुआ पेड़ कुछ - कुछ आम के पेड़ के जैसा था पर उस पर बैठी चिड़िया आम के पेड़ वाली चिड़िया से मेल नही खा रही थी जिसमें निशु ने सुधार कर उसे सुंदर चिड़िया में बदल दिया। निशु रोज़ यही करती है मेहक जो भी बनाती है वो पहले उसकी तारीफ करती है और फिर बातों ही बातों में उसकी ड्रॉइंग को ठीक भी करती है। जब से निशा आई है तब से निशु दीदी , निशु दीदी करते हुए मेहक निशा के आस- पास ही रहती है। मेहक अनिता की बेटी है जिसे निशा की माँ वैजंती ने घर की रेख- देख के लिए नौकरी पर रखा है अब इस उम्र में अकेले पूरे घर को सम्हालना निशा की माँ के लिए थोड़ा मुश्किल हो रहा था तब निशा ने ही कहा था माँ आप अपनी मदद के लिए किसी को नौकरी पर रख लो ना तब निशा की बात मानकर वैजंती जी ने अपने आस- पड़ोस और जान- पहचान के लोगो से बात की और तब अनिता घर आई।  अनिता के आने से वैजंती जी को बड़ा सहारा मिला और घर में रौनक भी बढ़ गई क्योंकि अनिता रोज़ अपनी बेटी को भी अपने साथ लाती है जिसके आने से वैजंती जी और उनके पति दोनों का ही मन लगा रहता है और अब तो निशा भी आ गई है भले ही कुछ दिनों के लिए आई है पर अपनी बेटी के आने से निशा के मम्मी - पापा दोनों ही बहुत खुश है और मेहक भी क्योंकि निशु दीदी के आने से मेहक को कितने सारे ड्रॉइंग कलर्स जो मिले है। घर आने के बाद जब निशा अपने कमरे में बैग से सामान निकाल रही थी तब दरवाजे के पास खड़े होकर मेहक निशा को बड़े ही ध्यान से टुकुर- टुकुर देखे जा रही थी और जब निशा के पास मेहक ने कलर्स देखे तो खुशी से आँखें बड़ी करती हुई बोली कलर, मेहक के बोलने पर निशा ने मेहक की ओर देखा तो मेहक किसी मासूम बच्चे की तरह बिल्कुल चुपचाप खड़ी हो गई,  निशा ने मेहक को अपने पास बुलाया इधर आओ मेहक तुम्हें कलर्स पसन्द है मेहक ने तुरंत अपना सिर हिला दिया तुम्हें ड्रॉइंग करना आता है हाँ मैं बहुत अच्छा चित्र बनाती हूँ निशा के पूछने पर मेहक बोली, अच्छा तो मुझे बनाकर दिखाना फिर मैं तुम्हें कलर्स दूँगी ठीक है। बस तब से मेहक रोज ही निशु दीदी को अपनी चित्रकारी दिखाती रहती है और निशा उसकी खूब तारीफ़ करती है। अपने प्रॉमिस को पूरा करते हुए निशा ने मेहक को कलर्स और साथ मे ड्रॉइंग बुक भी दी है जिसे लेकर मेहक बहुत खुश है , तब से निशु दीदी उसे और भी अच्छी लगने लगी है अरे भई कलर जो दिए है दीदी ने। बच्चों का मन कितना भोला होता है ना, ज़रा से अपनेपन छोटी सी खुशी से भी कितना खुश हो जाता है। निशा मेहक से बातें करती है उसके साथ खेलती है उसे ड्रॉइंग करना सिखाती है,  इससे मेहक को कितनी खुशी मिलती है उसका खिलखिलाता हुआ चेहरा मीठी सी मुस्कान ये साफ कह रही है कि छोटी सी मेहक निशु दीदी के आने से और भी ज्यादा मेहक रही है। अब तो निशा को भी मेहक से बहुत लगाव हो गया है उसकी भोली- भोली सी बातें और छोटी- छोटी ख्वाइशें सुन निशा को हँसी आ जाती है और कभी आँख भी भर आती है क्योंकि मेहक को देखकर निशा को अक्सर अपना बचपन याद आ जाता है बचपन मे उसकी भी कुछ नन्ही सी आशायें थी जो पूरी ना हो सकी क्योंकि उस वक्त हालात बहुत अलग थे जब हालात सही नही होते तो ख्वाइशें छोटी हो या बड़ी सब सिमट जाया करतीं है जैसे उनकी पूरी हो पाने की कोई उम्मीद ही ना हो। 
कल जब निशा कैनवास पर पेंटिंग कर रही थी तो,  तब मेहक खामोशी के साथ ध्यान लगाकर निशा को देख रही थी निशु दीदी कैसे ब्रश को कैनवास पर चला रही है कैसे कलर कर रही है, बीच - बीच में मेहक कुछ - कुछ पूछ भी रही थी और निशा उसको समझाती जा रही थी दीदी ये दोनों कलर को क्यों?  मिलाया, ऐसे कलर मिलाकर भी रंग भरते है क्या ? हाँ ऐसे भी रंग भरते है दो अलग- अलग कलर्स को मिलाने से एक नया कलर बन जाता है और पेंटिंग में जहाँ उसकी जरूरत होती है हम उसे वहाँ भर देते है मेहक को समझाते हुए निशा बोली। इसके बाद निशा ने मेहक से कुछ देर तक कोई बात नही की क्योंकि उसका सारा ध्यान अब पेंटिंग बनाने में था निशा जब भी पेंटिंग करती है तो उसमें इस तरह खो जाती है की उसके आस- पास की किसी भी चीज़ पर उसका कोई ध्यान नही होता। बचपन से ही निशा को पेंटिंग का बड़ा शौक रहा है उस वक्त निशा के पास ना अच्छे कलर्स हुआ करते थे और ना ही पेंटिंग ब्रश। निशा के पास थोड़े खराब हो चुके पुराने पेंटिंग ब्रशेस थे जोकि उसे उसकी किसी सहेली ने दिये थे निशा उन्हें अच्छे से सम्हाल कर रखती और बड़े चाव से मन लगाकर उन्ही पेंटिंग ब्रशेस से पेंटिंग किया करती जबकि निशा उस वक्त ये भी नही जानती थी कि ब्रश से पेंटिंग करते समय उसे किस तरह पकड़ना होता है और अलग - अलग तरह के ब्रश आखिर होते क्यों है कैसे उनसे पेंटिंग की जाती है वो कुछ भी नही जानती थी पर फिर भी किसी भी सादे कागज़ पर ,तो कभी कॉपी के पीछे के पन्नो पर या घर की दीवार पर वो कुछ भी बनाती और उसमें रंग भरने लगती तब कोई नही जानता था कि निशा का ये शौक उसे एक दिन आर्टिस्ट बना देगा। पेन्टिंग पूरी होने के बाद निशा थोड़ा दूर खड़े होकर अपनी बनाई पेंटिंग को देखने लगी तभी मेहक बोल पड़ी निशु दीदी ये बना लिए आपने , ये पूरा बन गया ना, हाँ पेंटिंग पूरी हो गई देखो कैसी बनी है , मेहक कैनवास पर नजरें टिकाकर गौर से देखने लगी अरे ! इसमें तो एक लड़की बनी है ये तो मेरे जैसे दीवार पर कुछ बना रही है इसकी फ्रॉक भी मेरी फ्रॉक जैसी है , हाँ ये पूरी तुम्हारे जैसी ही है मेहक निशा ने मेहक के गालों को छूते हुए कहा। अच्छा ये पूरी मेरे जैसी है मैं मम्मी को भी बता कर आऊँ मेहक ने कहा छोटी सी स्माइल देते हुए निशा बोली ठीक है जाओ बता दो। अगले दिन निशा छत पर पौधों में पानी डाल रही थी और साथ ही मेहक के आने का इंतज़ार कर रही थी मेहक अभी तक ऊपर क्यों नही आई नीचे हॉल में खेलने तो नही लग गई कुछ देर इंतजार करने के बाद निशा मेहक को देखने हॉल में चली आई यहाँ निशा के मम्मी- पापा और पड़ोस वाली आंटी साथ  बैठ कर कुछ बात कर रहे थे पर निशा को मेहक उनके आसपास हॉल में कहीं नजर नही आई निशा ने किचन में अनिता के पास भी देखा पर मेहक वहाँ भी नही थी निशा जब अपने कमरे में गई तो मेहक उसे वहाँ मिली वो निशा के पेंटिंग के सामान को देख रही थी पेंटिंग ब्रश को कैनवास पर चलाते हुए झूठ- मुठ की पेंटिंग कर रही थी मेहक तुम यहाँ हो निशा ने कहा तो मेहक निशा को देखकर चौंक गई और जल्दी से ब्रश को स्टूल पर रख दिया। निशा मेहक के पास गई और बोली तुम्हें ब्रश से पेंटिंग करनी है चलो मैं सिखाती हूँ। आज निशा और मेहक दोनों ने साथ मिलकर पेंटिंग की जिसमे मेहक को बड़ा मज़ा आया वो बहुत खुश हुई और उसे खुश होता देख निशा के मन को सुकून सा मिल रहा था मेहक और निशा का कोई रिश्ता नही है ना मेहक निशा की रिश्तेदार लगती है ना ही बहन और ना ही दोस्त लेकिन फिर भी मेहक को खुश करके निशा को खुशी मिलती है हमारा बिता कल जब हमें किसी के आज में नज़र आता है तो ना होते हुए भी उससे हमारा नाता सा जुड़ जाता है वो हमें अपना सा लगने लगता है। मेहक को खुशी देकर उसकी छोटी सी ख्वाइश पूरी कर निशा को ऐसा लगता गया जैसे उसने खुदको कोई खुशी दी हो उसने मेहक की नही बल्कि खुदकी किसी ख्वाइश को पूरा किया हो। 
जब बचपन मे छोटे से मन की कोई छोटी सी आशा पूरी होती है तो उसकी खुशी के आगे सारी दुनिया की दौलत भी बड़ी फीकी सी नज़र आती है। निशा इस बात को अच्छी तरह समझती है इसलिए मेहक को वो खुशी देने की कोशिश करती है जो उसका मन चाहता है क्योंकि सभी की आशायें पूरी नही होती,  होते है कुछ लोग जिनकी छोटी - छोटी आशायें भी अधूरी रह जाती है।निशा की तरह। 
वक्त बहुत तेज़ी से गुज़रता है ये 15 दिन कैसे बीत गए पता ही नही चला अपने लौटने की तैयारी करती हुई निशा मन ही मन यही सोच रही है बैग में सामान रखते हुए निशा का मन भारी सा हो रहा था जब कई दिनों बाद हम घर लौटते है तो मन कितना खुश होता है और वही मन घर से जाते वक्त कितना उदास हो जाता है वैसे उदास तो निशा के घर वालों का भी मन भी हो रहा है पर वो फिर भी मुस्कुरा रहे है ताकि निशा दुखी ना हो। निशा जो भी पेंटिंग का सामान अपने साथ लाई थी वो सब आज उसने मेहक को दे दिया ये लो मेहक ये सब तुम रखलो ये मेरी तरफ़ से गिफ्ट है तुम्हारे लिये, ये सब रख लूँ मेहक खुश होते हुए बोली, हाँ मुस्कुराते हुए निशा ने कहा।मेरे पास भी गिफ्ट है  कहते हुए मेहक ने एक कागज़ निशा को दिया जिसमे मेहक ने ड्रॉइंग की थी निशा ने खुश होते हुए अपना गिफ्ट अपने पास सम्हाल कर रख लिया। निशा जब गाड़ी में बैठी तो मेहक ज़ोर- ज़ोर से चिल्लाकर कह रह थी बाय निशु दीदी , बाय निशु दीदी जल्दी आना निशा की गाड़ी जब तक दिखती रही मेहक उछल- उछल कर कहती रही बाय निशु दीदी बाय और निशा चली गई मेहक को कुछ पलों की छोटी- छोटी खुशियाँ देकर।

आईना




इस आईने के सामने मैं रोज़ खड़ा होता हूँ रोज़ खुदको देखता हूँ खुदकी तारीफ भी करता हूँ पर आज, आज बात अलग है आज आईने में सिर्फ मैं नज़र आ रहा हूँ मैं निखिल , निखिल व्यास। कितने दिनों बाद मैंने अपनी फेवरेट टीशर्ट पहनी है अपने उसी अंदाज में तैयार हुआ हूँ जिस तरह मैं रहा करता था। ये सही है कि वक्त के साथ हम बदल जाते है और कुछ जगाहों पर हमें खुदको बदलना भी पड़ता है क्योंकि हमें दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलना होता है पर सबके साथ चलने की कोशिश में हम खुदको ही कही पीछे छोड़ आते है खुद ही खुदको भूल जाते है , और जीने लगते है एक ऐसी ज़िंदगी जिसमे हर एक के लिए हमारी पहचान अलग- अलग होती है। कुछ ऐसे ही तो जीने लगा था मैं। 
चार साल पहले जब मैं पटना आया तब मैं निखिल ही था पर धीरे- धीरे बदलने लगा सबसे पहले तो मैं ओम अंकल का किरायेदार बना वो भी अच्छा और सभ्य किरायेदार। दरसल जब यहाँ आया तो मुझे जल्दी में कोई अच्छा रूम किराये पर मिल ही नही रहा था और जो मिल रहे थे वो मेरे बजट से बाहर थे तब मेरे एक दोस्त ने मुझे ओम अंकल का पता दिया और मैं यहाँ आ पहुँचा ओम अंकल किराये पर रूम तो देते है पर यहाँ रहने की कुछ कंडीशन्स भी थी मुझे रूम की जरूरत थी इसलिए मैंने अपना सिर हाँ में हिला दिया। ओम अंकल को नेक और सभ्य किरायेदार चाहिए था और मैं बन गया। वैसे ऐसा नही है कि मैं एक अच्छा लड़का नही हूँ बस मेरे जीने का तरीका थोड़ा अलग था लेकिन मुझे ओम अंकल के सामने ये साबित करने के लिए की मैं अच्छा और सभ्य लड़का हूँ उनके सभी रूल्स को खुशी के साथ फॉलो करना पड़ा। ये मेरे बदलने की पहली शुरुआत थी। बचपन से बड़े होने तक हमारी लाइफ में बहुत कुछ होता है जो पहली बार होता है और उसका अनुभव हमे हमेशा याद रहता है जैसे पहली बार स्कूल जाना , पहली बार साइकिल चलाना, पहली बार कॉलेज जाना और पहली बार ऑफिस जाना। यहाँ आने के दो दिन बाद ही मुझे ऑफिस जॉइन करना था ये मेरी पहली जॉब थी और आज पहला दिन। जब पहली बार कॉलेज गया था तो मन ही मन  बड़ा खुश था और थोड़ा सा डरा हुआ भी कि ना जाने जो नए दोस्त बनेंगे वो कैसे होंगे, टीचर्स कैसे होंगे ज्यादा स्ट्रिक्ट हुए तो उस दिन की तरह मैं आज भी थोड़ा नर्वस था पर जब ऑफ़िस स्टाफ से अपने बॉस से मिला तो नर्वसनेस ज़रा कम हो गई। शुरू के कुछ दिनों तक मैं ट्रेनिंग पर रहा मुझे सिखाया गया समझाया गया कि काम कैसे करना है और उसके बाद शुरू हुआ मेरा हार्डवर्क। मैं अपने काम को बेहतर तरीके से करने की कोशिश किया करता था पर फिर भी मुझसे कुछ गलतियाँ हो जाया करती थी और फिर एक बार मेरे बॉस ने मुझे केबिन में बुलाकर समझाया कि मुझे अपने आपको थोड़ा बदलना होगा। मैं बदला भी। मेरा बिहेवियर पूरी तरह प्रोफेशनल हो गया था और मैं अब ज्यादा प्रैक्टिकल होकर सोचने लगा था और मेरे बॉस वो मेरे इस बदले हुए बिहेवियर से खुश थे मैंने अपनी पहली जॉब के दौरान बहुत कुछ सीखा जो मेरी दूसरी जॉब के वक्त मेरे बहुत काम आया। जैसे - जैसे हम अपनी लाइफ में आगे बढ़ते जाते है वैसे- वैसे ही हम बदलते भी जाते है ,धीरे- धीरे अब तो मेरी आदतें भी बदल गई थी प्रोफेशनल लाइफ होती ही ऐसी है जो हमे पूरी तरह बदल कर रख देती है। पर अब कोई और भी था जिसका मेरे जीवन पर असर हो रहा था। ऑफ़िस इवेंट के दौरान हुई दिव्यांशा और मेरी छोटी सी मुलाकात एक लंबे रिलेशनशिप में बदल गई। दिव्यांशा बहुत प्यारी है इंटेलिजेंट है फिक्र करती है मेरी, जिस तरह मैं उसके लिए बहुत खास हूँ उसी तरह वो भी बहुत अहम है मेरे लिए। वैसे तो हम दोनों में अंडरस्टैंडिंग अच्छी है पर कभी - कभी उसकी ख्वाइशों के चलते मुझे उसके मन के मुताबिक़ चलना पड़ता है। दिव्यांशा के मेरे लाइफ में आने पर कुछ - कुछ है ऐसा जो बदला है कुछ नई आदतें शामिल हुई तो कुछ बदल गईं। मेरा शेड्यूल मेरी डाइट मेरी वीकेंड प्लांनिग क्या होनी चाहिए कैसी होनी चाहिए मेरा लुक कैसा होना चाहिए मुझसे ज्यादा इन सब बातों पर दिव्यांशा का ध्यान होता है और बातों ही बातों में वो मुझे समझाती भी रहती है कि ऐसा ठीक रहेगा वैसा ठीक रहेगा कभी - कभी तो उसकी बातों को सुन मुझे हँसी आ जाती है और कभी मैं चुप सा हो जाता हूँ। मैं अक्सर तब चुप हो जाया करता हूँ जब मैं कुछ कहना नही चाहता। वैसे हम क्या चाहते है क्या नही चाहते है इसकी परवाह शायद ही कोई करता हो क्योंकि मैंने अभी तक जो जाना और समझा है उससे यहीं मालूम हुआ है कि सबको फर्क इस बात से पड़ता है की वो क्या चाहते है जैसे कि मेरे फ्रेंड्स, वो हमेशा ये चाहते थे कि मैं भी उनके तरह सोचूँ ,  वैसे रहूँ जैसे वो रहते है  जबकि सच कहूँ तो मुझे उनके थोट्स उनका स्टाइल थोड़ा कम पसन्द था लेकिन फिर भी मैं थोड़ा बहुत उनके जैसे रहने की कोशिश करता था क्योंकि मुझे अपने दोस्तों के साथ रहना था हाँ मेरी चॉइस उनसे अलग थी और मेरी पसन्द को लेकर एक- दो बार मेरे दोस्तों ने मेरा मज़ाक भी उड़ाया उनका इरादा मेरी इंसल्ट करना भले ही नही था पर मुझे चिढ़ाने का जरूर था और मैं चिढ़ा भी था चिढ़ा तो मैं तब भी था जब मेरे ऑफ़िस के कलीग्स को मेरे काम करने के तरीके से प्रॉब्लम होने लगी थी वो बेवज़ह मुझसे ज़रा नाराज़ से रहते और उनके ऐसे बिहेवियर का असर कुछ- कुछ मेरे वर्क पर भी हो रहा था और फिर आखिर मेरे सीनियर्स ने मुझे प्रॉब्लम का सॉल्यूशन दिया। और मैने वैसा ही किया जो उन्होंने कहा था । मैंने अपने कलीग्स के तौर तरीकों को भी अपने काम मे कुछ - कुछ जगाहों पर शामिल करना शुरू कर दिया और कुछ छोटे- मोटे सब्जेक्ट्स पर मैं उनके साथ डिस्कशन भी करने लगा था धीरे- धीरे सब नॉर्मल हो गया। इस तरह मैं सबके लिए खुदको थोड़ा- थोड़ा बदलता गया। ओम अंकल के लिए मैं उनका अच्छा किरायेदार बन गया, दिव्यांशा के लिए अच्छा बॉयफ्रेंड , दोस्तों का उनके जैसा दोस्त और अपने कलीग्स के लिए उनका अच्छा साथी। मैं बदला जरूर पर पूरी तरह नही बस सबके लिए अलग- अलग किरदार में जीने लगा था ना मैंने अपनी पसंद बदली ना ही अपनी सोच बस जब जिसके साथ रहता उस वक्त के लिए थोड़ा सा खुदको बदल लेता पर इस सबके बीच मैं खुदको वक्त नही दे पा रहा था ना ही खुदके लिए अपनी ख़्वाइशों के लिए जी पा रहा था मैं जब भी आईने के सामने खड़ा होकर तैयार होता हूँ तो मुझे आईने में कभी एक इंजीनियर नज़र आता तो कभी दिव्यांशा का बॉयफ्रेंड कभी विशाल अर्जुन का दोस्त तो कभी अपने ऑफ़िस के साथियों का कलीग, निखिल तो जैसे आजकल दिखता ही नही। ये आईना ही तो है जो मुझे बता रहा है कि मैं क्या? था क्या? हूँ और अब क्या? हो गया हूँ। ऊब गया था मैं , ऐसा लग रहा था जैसे मैं जो हूँ वो मैं हूँ ही नही। अब मैं कुछ वक्त बस खुदके साथ रहना चाहता था। इसलिए जब ओम अंकल कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर गए तो मैंने भी ऑफिस से छुट्टी ले ली हाँ मैं अभी भी ओम अंकल का किरायेदार हूँ यहाँ रहते - रहते अब मुझे यहीं रहने की आदत हो गई है और शायद लगाव भी, इसलिए मैंने कोई और घर ढूंढा ही नही। जब हम जानते हो कि अभी आने वाले कुछ दिन बड़े मौज़ के निकलने वाले है तो ये सोचकर ही मन कितना खुश हो जाता है अब दस दिनों तक मैं सिर्फ मैं रहने वाला हूँ अपनी मनमर्जी से जीने वाला हूँ और इस बीच कोई भी मुझे डिस्टर्ब नही करेगा दिव्यांशा भी नही। इसलिए तो आज मैंने अपनी फेवरेट टीशर्ट पहनी मेरा फेवरेट कलर जो मेरे दोस्तों को बिल्कुल भी पसन्द नही था पर मुझे , आज भी ये कलर उतना ही पसन्द है। आज सब कुछ मेरी मनमर्ज़ी का, कितना आज़ाद और कितना हल्का महसूस कर रहा हूँ मैं, जैसे किसी बोझ तले जी रहा था और अब हर एक साँस सुकून भरी है। 
ये सच है कि कभी अपनो के लिए तो कभी मजबूरी में हमें खुद को थोड़ा बदलना पड़ता है पर फिर भी हमे खुदके लिए वो कुछ पल चुरा लेने चाहिए जो सिर्फ हमारे हो जहाँ हम वैसे नही जी रहे हो जैसा कोई हमसे चाहता है बल्कि वैसे जी रहे हो जैसा हम चाहते है,  हम वो हो जो हम है वो नही जो कोई और हमे बनाना चाहता है। दिन में हम आईने के सामने चाहे जितने बार खड़े हो पर एक बार तो ऐसा हो कि सामने हमे सिर्फ हम ही नज़र आये बिना किसी बदलाव बिना किसी बनावट के एक दम असली।  

एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE