खामोश मन




जिस तरह समुद्र की गहराई नापना आसान नही है वैसे ही मन की गहराई को जान पाना भी सरल नही है। बोलने में कितना छोटा सा शब्द लगता है "मन" पर है समुद्र की तरह विशाल , कभी तेज़ - तेज़ लहरें उठती है तो कभी एकदम शांत हो जाता है ज़रा मौसम बदला की ये घबरा जाता है कभी - कभी तो लगता है कितना नाजुक है मन,  पर जाने क्यों कभी - कभी कठोर हो जाता है। पत्थरों के बीच अकेली बैठी मानवी खुद से ही सब कहे जा रही थी। क्लास में मन नही लगा तो तबियत खराब होने का बहाना बना मानवी यहाँ चली आई। मानवी अक्सर यहाँ आती है खासकर तब जब उसका मन उदास होता है। मुश्किलें सभी की लाइफ में होती है बस फर्क इतना है कि किसी की लाइफ में ज्यादा होती है तो किसी की लाइफ में कम और मानवी उनमें से ही एक है जिसकी लाइफ में मुश्किलें थोड़ी ज्यादा है।" उम्मीद लगाना ही बेकार है जब भी उम्मीद लगाई है वो टूटी ही तो है शायद कभी कुछ नही बदलेगा मन ही मन मानवी सोचें जा रही थी।"  पता था हमे की तुम यहीं मिलोगी पलक ने आवाज देते हुए कहा मानवी ने मुड़कर देखा तो अक्षत और पलक दोनों चलते हुए मानवी की ओर ही आ रहे थे। देख क्या रही हो मैडम हमे अच्छी तरह मालूम है कि तुम्हें इन पथरों से और सामने दिख रहे इस पानी से बड़ा लगाव है, हाँ सही है अब आ गए हो तो बैठ भी जाओ मानवी मुस्कुराकर बोली। पलक और अक्षत के आते ही मानवी का मूड ही बदल गया कुछ पल पहले उदास बैठी मानवी अब अपने दोस्तों के साथ बातें करती हुई खिलखिला कर हँस रही थी ये दोस्त ही तो है जिनके साथ होने पर मानवी अपनी हर परेशानी भूल जाती है। ओह! नो मैं तो भूल ही गई पलक परेशान होते हुए बोली, क्या? हुआ क्या भूल गई मानवी ने पूछा? मुझे घर जल्दी जाना था मम्मा ने जल्दी आने को कहा था तुम लोग बातें करो मैं चलती हूँ कल मिलेंगे बाय। 
पलक चली गई थी और मानवी कुछ कह नही रही थी अक्षत ने कुछ देर इंतज़ार किया और जब मानवी कुछ नही बोली तो उसने खुद ही पूछ लिया " तो क्यों? उदास हो कुछ हुआ क्या? मानवी ऐसे चुप मत बैठो बताओ क्या हुआ अक्षत ने जिद्द करते हुए पूछा? मानवी ने अक्षत को देखा और बोली वही जो हमेशा होता है मैंने फिर से कोई उम्मीद लगा ली थी, और वो टूट गई हे ना अक्षत बोला। "मानवी ने कभी भी अपनी परेशानियों को साफ - साफ तौर पर नही बताया पर फिर भी अक्षत उसकी आधी- अधूरी बातों को अच्छे से समझ लेता है। मन की बातें कह देने से मन हल्का हो जाता है अगर भरोसा करती हो मुझ पर तो मुझसे कह सकती हो अक्षत ने कहा।" मानवी ने अक्षत को देखा और दोबारा नज़रें सामने कर ली " मैं जब छोटी थी तब मेरी ढेर सारी ख्वाइशें थी कुछ ख्वाइशें ऐसी थी जो पूरी हो सकती थी और कुछ ऐसी जिनका पूरा होना ज़रा मुश्किल था जब थोड़ी बड़ी हुई तो वो ख्वाइशें आधी हो गयीं,  और जब और बड़ी हुई तो गिनती की कुछ ख्वाइशें रह गयी 'कुछ को मैंने पूरी करने की कोशिश की और कुछ को छोड़ दिया ' क्यों अक्षत ने पूछा? "अपने अपनो के लिए, हमारे अपनो को बुरा न  लगे बस इसलिए हम हमारी कुछ ख्वाइशों को छोड़ देते है या भूल जाते है मैंने भी भुला दिया" मानवी ने कहा। 
तो इसलिए उदास हो कि कोई ख्वाइश पूरी नही हुई या कुछ और, नही इसलिये उदास नही हूँ अक्षत के पूछने पर मानवी बोली, वो तो आज कहते - कहते मानवी रुक गई और कुछ नही बोली। कुछ देर बाद हवायें चलने लगी जो धीरे- धीरे तेज़ होती जा रही थी शायद मौसम खराब हो रहा है हमे अब चलना चाहिए अक्षत ने कहा, हाँ चलो चलते है मानवी बोली।अक्षत और मानवी जैसे ही थोड़ा आगे चले हवा और तेज़ चलने लगी अक्षत ने मानवी का हाथ कसकर पकड़ लिया मानवी जल्दी चलो शायद मौसम ज्यादा ही खराब हो रहा है दोनों जल्दी से पार्किंग एरिया में पहुँचे और वहीं पास में बनी चाय की गुमठी के नीचे जाकर खड़े हो गए अक्षत अभी भी मानवी का हाथ थामे हुए था, मानवी ने भी हाथ छुड़ाया नही वो भी अक्षत के हाथ को थामे रही। डूबते को जैसे तिनके का सहारा होता है वैसी ही ये छोटी सी चाय की गुमठी भी इस वक्त झील घूमने आए कुछ लोगो का सहारा बनी हुई थी कुछ देर बाद हवा थम गई और सब अपने- अपने रास्ते चले गए। 
घर आने के बाद मानवी अपने कमरे में ही रही दोपहर से शाम हो गई और शाम से रात मानवी कमरे से बाहर नही आई शायद अकेले बैठकर अपनी उलझी हुई जिंदगी के थागों को सुलझाने की कोशिश कर रही थी आज जब अक्षत ने कहा कि अपने मन की बात कहकर मन हल्का कर लेना चाहिए तो एक पल के लिए लगा कह दूँ सब कुछ, अपनी परेशानियाँ अपनी उलझने पर फिर लगा क्या बता देना सही होगा? और फिर मैंने कुछ नही कहा। वैसे भी क्या? बताती की कुछ दिनों में मेरे पेरेंट्स का डिवोर्स होने वाला है, जिन्होंने अपनी आधी जिंदगी लड़ते- झगड़ते बिता दी अब वो अपनी बाकी की लाइफ़ अलग होकर जीने वाले है और मुझे एक बड़ा फैसला लेना है कि मैं डिवोर्स के बाद किसके साथ रहूँगी अपनी माँ के साथ या अपने पापा के साथ। बचपन मे मैं जब भी अपनी दोस्त मीनू के पेरेंट्स को देखती तो यही सोचती के मेरे पैरेंट्स ऐसे खुश क्यों नही रहते है वो क्यों? हमेशा लड़ते रहते है , बचपन से देखा है पापा का हर छोटी- छोटी बात पर गुस्सा करना।पापा का ऐसे हर बात पर गुस्सा करना माँ को बिल्कुल अच्छा नही लगता था और इसलिए दोनों के बीच बहस होने लगती थी और मैं चुपचाप देखती रहती थी कर भी क्या सकती थी? हाँ एक कोशिश मैं हमेशा करती रही वो थी उनकी दोस्ती कराने की " हर फ्रेंडशिप डे पर मैं दो फ्रेंडशिप बेंड लाती माँ और पापा को एक - दूसरे को पहनाने को कहती वो ऐसा करते भी और फिर 4-5 दिन घर मे बड़ी शांति रहती प्यारभरा माहौल रहता और छठवें दिन वो शांति , वो प्यार वापस बहस में बदल जाता। बचपन में बड़ी तमन्ना थी कि हम भी फैमिली वैकेशन पर जाये साथ मे मज़े करे पर ऐसा पॉसिबल ही नही हो सका क्योंकि मेरे पेरेंट्स को एक- दूसरे का साथ ज़रा भी नही भाता था मेरे स्कूल के फंक्शन में या तो माँ आती थी या पापा और कभी दोनों साथ आ भी जाते तो लगता कोई अजनबी है जो साथ मे बैठे हुए है। बहुत बुरा लगता था मुझे उन्हें ऐसे देखकर जिस तरह एक पौधे को फलने- फूलने के लिये समय- समय पर पानी और खाद की जरूरत होती है उसी तरह एक रिश्ते के फलने- फूलने के लिए उसमें प्यार, अपनेपन और विश्वास कि जरूरत होती है जोकि मेरे पेरेंट्स के रिश्ते में शायद कभी था ही नही। जब कभी कुछ दिनों तक वो झगड़ते नही अच्छे से बात भी करते तो एक उम्मीद जग जाती की अब सब ठीक रहेगा , पर कुछ दिनों बाद वो उम्मीद टूट जाती और ऐसे ही हर बार मेरी उम्मीद टूटती रही और कुछ नही बदला। 
जब रिश्ते टूटते है तो बहुत बुरा लगता है मुझे भी लगा, जब माँ और पापा का डिवॉर्स हुआ, पर शायद उनके लिए यही सही भी था। वैसे भी जिस रिश्ते में एक - दूसरे के लिए कोई लगाव कोई जुड़ाव ही ना हो वो रिश्ता रहता भी कब तक। अब मैं और माँ अलग घर मे रहते है इस बदले हुए घर और जिंदगी में बदली हुई चीजों को ऐक्सेप्ट करने में थोड़ा वक्त लग रहा है पर धीरे - धीरे आदत हो ही जायेगी, अपने माँ पापा के डिवोर्स का असर मानवी के मन पर बहुत गहरा हुआ वो कुछ दिनों तक कॉलेज भी नही गई और ना ही किसी से कोई बात की। आज दस दिन बाद मानवी कॉलेज गई जहाँ कोई बड़ी बेसब्री से उसके आने का इंतजार कर रहा था। कहाँ थी? इतने दिनों से कॉलेज क्यों ? नही आ रही थी कितनी फ़िक्र हो रही थी मुझे तुम्हारी , अक्षत सवाल पे सवाल पूछता जा रहा था तब मानवी अक्षत को रोकते हुए बोली अक्षत मैं ठीक हूँ। सच तुम सच मे ठीक हो ना कहते हुए अक्षत ने मानवी के हाथों को थाम लिया और कहने लगा  मानवी तुम अकेली नही हो मैं हूँ तुम्हारे साथ हमेशा , हर कंडीशन में, भरोसा है ना मुझ पर। मानवी ने पलके झपकाते हुए सिर हिला दिया। मानवी जब भी अक्षत के साथ होती है वो अपनी सारी परेशानियाँ भूल जाती है और उसे यकीन होने लगता की आज चाहे जैसा हो कल अच्छा ही होगा।
हम चाहें या ना चाहें पर जो भी हमारे आस- पास होता है उसका असर हम पर होता ही है। अपने माता पिता के रिश्ते की कड़वाहट कहीं ना कहीं मानवी के मन में भी घुल गई है।
अक्षत का साथ मानवी को अच्छा लगता है और वो ये भी जानती है कि अक्षत उसके लिए क्या महसूस करता है पर वो अपने इस दोस्ती के रिश्ते को किसी और रिश्ते में नही बदलना चाहती क्योंकि वो डरती है के कहीं उसका और अक्षत का रिश्ता भी टूट गया तो। 


 
 
 

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