मार्च की धूप भी मई - जून की धूप से कुछ कम नही लग रही है दोपहर के 3 बज रहे है दूर - दूर तक रास्ते पर कोई नज़र नही आ रहा वैसे भी किसकी हिम्मत होगी ऐसी दोपहर में घर से बाहर आने की, सिवाय इसके खिड़की से बाहर देखते हुए वैदिक बोला। जाने किस तरह की है ये लड़की इतनी धूप में हाथ में छाता लिए कैसे धीरे- धीरे चलकर आराम से आ रही है। धूप से जैसे इसे कोई फर्क ही नही पड़ रहा। रिमझिम को कॉलोनी में आये दो साल हो गए है पर अभी तक शायद ही कोई जान पाया हो की रिमझिम है कैसी?, क्योंकि मैं भी अपनी छुट्टियों में ही कुछ दिनों के लिए अपने घर आता हूँ इसलिए बातचीत तो मेरी भी कभी ज्यादा हुई नही है रिमझिम से पर मुझे लगता है कि ये अपने काम को लेकर कुछ ज्यादा ही डेडिकेटिंग है तभी तो फेस्टिवल या समर वैकेशन पर कभी अपने घर नही जाती और शायद कुछ ज्यादा ही सिंपल है हमेशा एक जैसी ही तो नज़र आती है कोई चेंज नही कहते हुए वैदिक ने खिड़की बंद कर ली।
रिमझिम छाता ताने धूप में चलते हुए घर के पास आ पहुँची उसने अपना छाता बंद किया और दरवाज़ा खटखटाने वाली थी कि उससे पहले ही दरवाज़ा खुल गया। वैदिक, हाय कब आये तुम ,वैदिक चाबी देते हुए बोला रात में ही आया हूँ। ओह! अच्छा। वैसे अच्छा हुआ तुम आ गए आंटी तुम्हे मिस कर रहीं थी कहकर रिमझिम सीढियाँ चढ़कर ऊपर वाले फ्लोर पर चली गई। रिमझिम को वैदिक की मम्मी ने ऊपर वाला फ्लोर किराए पर दिया हुआ है वैसे तो वैदिक की मम्मी अजनबियों पर भरोसा नही करती है पर जब रिमझिम उनसे मिली तो शायद रिमझिम उन्हें भरोसेमंद लगी। रिमझिम है भी बहुत ही ईनामदार भरोसे के क़ाबिल ,वैदिक की माँ तुलसी जी कभी - कभार रिमझिम को भी मार्केट के थोड़े बहुत सामान की लिस्ट थमा दिया करतीं है और रिमझिम स्कूल से आते हुए लिस्ट में लिखे सामान को लेकर आती है। इस तरह रिमझिम तुलसी आँटी की कुछ- कुछ कामो में मदद कर दिया करती है वैसे भी रिमझिम के अलावा और कोई रहता भी तो नही जिससे वो अपने ये छोटे- मोटे काम करा सकें वैदिक दिल्ली में रखकर जॉब करता है और वैदिक के पापा ऑफिस के कामो से ज्यादातर टूर पर ही रहते है इस तरह तुलसी जी अकेली ही रहती है वो तो रिमझिम जब से आई है तब से उन्हें अकेलेपन का एहसास नही हुआ उन्हें वो किसी अपने की तरह लगती है तभी तो तुलसी जी भी रिमझिम का बड़ा ख्याल रखती है जब भी खाने में कुछ स्पेशल बनाती है तो रिमझिम को आवाज जरूर लगाती है।
शाम को वैदिक छत पर टहलते हुए गाने सुन रहा था रिमझिम रस्सी पर से सूखे कपड़े उठा रही थी रिमझिम तुम्हें धूप बहुत पसंद है वैदिक ने पूछा, ऐसा क्यों पूछ रहे हो रिमझिम बोली। वो तुम रोज़ धूप में इतने आराम से चलकर आती हो तो देखकर लगा शायद तुम्हे गर्मी में भी धूप अच्छी लगती है। वैदिक की बात सुन रिमझिम ज़रा सा मुस्कुरा दी। स्कूल की टीचर्स को छुट्टियाँ नही मिलती क्या? वैदिक ने फिर पूछा , मिलती है पर स्कूल में समर क्लासेस भी होती है तो कुछ टीचर्स छुट्टी पर नही जाते रिमझिम जवाब देते हुए बोली। और शायद उन कुछ टीचर्स में से तुम वो टीचर हो जो कभी छुट्टी पर नही जाती, है ना वैदिक ने हँसते हुए कहा तो रिमझिम ने बड़े धीरे से हूँहहह कह दिया इसके बाद वैदिक रिमझिम से समरक्लासेस के बारे में पूछने लगा और फिर अपने ऑफिस की बातें रिमझिम को बताने लगा तब उसकी बातों पर विराम लगाते हुए रिमझिम बोली वो मुझे और भी बहुत काम है तो मैं कभी और तुम्हारी बातें रिमझिम ने इतना कहा तो वैदिक बोला हाँ , हाँ जाओ वो मुझे खुद भी एक इम्पोर्टेन्ट कॉल करना है , ओके रिमझिम बोलकर चली गई। मुझे और भी बहुत काम है वैदिक रिमझिम की नकल करते हुए बोला, जैसे मैं तो बहुत फ्री हूँ मुझ जैसे स्मार्ट लड़के की बातें इसे इंटरेस्टिंग नही लगी तो बाकी सबकी बातें तो इसे बोरिंग ही लगती होंगी तभी इसका इतने दिनों में कोई फ्रेंड नही बना जबकि खुद बोरिंग है। ये विवान भी ना इसे अभी ही ट्रिप पर जाना था कोई बात करने वाला भी नही है बोर हो रहा हूँ मैं। वैदिक जब भी अपने घर आता है तो बचपन के दोस्त विवान के साथ खूब मज़े करता है लेकिन इस बार वैदिक ने अपने आने की ख़बर विवान को दी नही सोचा सरप्राइज देगा पर उसे खुद ही यहाँ आकर सरप्राइज़ मिल गया जब उसे मालूम हुआ कि विवान तो किसी ट्रिप पर गया है।
सुबह की ठंडी हवा में वॉक करते हुए वैदिक का मन जोकि कल अपने दोस्त को मिस करते हुए उदास हो रहा था वो अभी ज़रा हैप्पी हैप्पी सा था सुबह की ठंडी- ठंडी हवा में जादू ही कुछ ऐसा होता है कि तन को छूते ही मन को तरोताजा कर देती है। तभी तो वैदिक रोज सुबह की वॉक पर जरूर जाता है वैदिक वॉक से लौट रहा था और तभी कॉलोनी के एक बच्चे ने उसे आवाज़ लगाई भईया, भईया वैदिक आवाज सुनकर पलटा हाँ क्या हुआ , अरे भईया आपका मोबाइल गिर गया है खबराते हुए उस बच्चे ने कहा , वैदिक जल्दी से रास्ते पर देखने लगा अप्रैल फूल बनाया कहते हुए वो बच्चा जोर से हँसने लगा और फिर दौड़कर अपने दोस्तो के पास चला गया। ओह! तो आज 1 अप्रैल है बचपन मे हमने भी सबको खूब अप्रैल फूल बनाया है कहते हुए वैदिक मुस्कुराया और घर के अंदर आ गया , वैदिक मम्मी सुबह की पूजा की तैयारी कर रही थी वैदिक को देखते ही बोली वैदिक बेटा ऊपर जाकर रिमझिम के कमरे से फूल ले आना वो टेबल पर रखकर गई है बस आज मुझे देना भूल गई ये ले चाबी जा लेआ। अरे माँ मैं अभी तो आया हूँ अच्छा ठीक है लेकर आता हूँ वैदिक ने ताला खोला और कमरे के अन्दर आ गया पूरा कमरा बहुत अच्छे से जमा हुआ था हर चीज़ अपनी जगह पर थी कुछ भी बिखरा हुआ नही था। टेबल पर एक छोटी सी टोकरी में फूल भी रखे हुए थे वैदिक टेबल के पास पहुँचा टेबल पर कुछ किताबें रेसेपी बुक ड्रॉइंग शीट्स कलर्स और एक सुंदर सी अलार्म घड़ी थी। वैदिक ने टेबल पर रखी बुक्स उठाकर देखी और वापस वैसे ही रख दी जैसी वो रखी हुई थी और फिर फूलों की टोकरी लेकर चला गया।
आज वैदिक को आये 13 दिन हो गए हैं वैदिक और रिमझिम दोनों एक साथ छत पर थे दिन ढल गया था और शाम हो गई थी एक गहरी खामोश शाम, ना पेड़ों के पत्ते हिल रहे थे ना हवा चल रही थी और ना पक्षियों की कोई आवाज थी रिमझिम और वैदिक दोनों के चेहरे के भाव भी ज़रा गम्भीर थे और दोनों ही खमोश थे।
[ पूरी कहानी अगले भाग में]

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