जाने छुपा कहाँ है वो रास्ता जो जाता है वहाँ, जहाँ मंज़िल है मेरी , जहाँ मेरा छोर है। बीचों- बीच मे हूँ खड़ा, देख रहा हूँ यहाँ - वहाँ जाने वो किस ओर है। आखिर क्यों ये धुंध छाई है दिखता नही कुछ साफ दिखाई है, ये कोहरा है छाया या मुझसे रस्ता है भुलाया। मैं अकेला रास्ते अनेक इनमें से कैसे चुनूँ कोई एक। कैसे जानूँ कैसे पहचानूँ सब ओर नज़र घुमा रहा हूँ सारे रास्ते एक जैसे ही पा रहा हूँ। क्या करूँ ? सही रास्ता ढूँढ़ने की कोशिश करूँ या किसी भी एक रास्ते पर चल पडूँ। जैसे ही कदम बढ़ा रहा हूँ मैं थोड़ा- थोड़ा डरता जा रहा हूँ। मन मेरा हिचकियाँ खा रहा है पूछ रहा है मुझसे - तू सही तो जा रहा है। शंकाये भर- भरकर मस्तिष्क में आ रही है एक - एककर वो मेरे मन से कुछ कहती जा रही है। अब थोड़ा घबराया सा इस सोच में पड़ा हूँ ये मैं कहाँ खड़ा हूँ , धुँआ- धुँआ सा सब नज़र है आता ना जाने कौन सा रास्ता किधर को है जाता। कितनी उलझन है भाई आख़िर क्यों? किसी को मंजिल की राह सीधे- सीधे नज़र नही आई। मुश्किल है मंजिलों के रास्ते पाना , बड़ा कठिन है अनजानी राहों पे जाना। भले ही डरते - डरते मैंने एक कदम ही है आगे बढ़ाया, पर मैं भी हूँ अब ज़िद पे आया। "ढूंढ़ लूँगा मैं वो रास्ता छिपा चाहे वो जिस ओर है जो जाता है वहाँ ,जहाँ मंजिल है मेरी , जहाँ मेरा छोर है।"
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