परदेस




देर रात तक जागना और फिर सुबह उठकर भागना
दिनभर ऑफिस में कम्प्यूटर के सामने बैठ काम में  लगे रहना और ऑफिस से फ्री होने के
बाद या तो बाहर ही कुछ खा लेना या फिर घर पहुँच
कर सेंडविच बनाकर खाना। ऐसी ही चल रही है
मेरी लाइफ। मैं जब यहाँ आया था तो सच कहुँ बड़ा ही खुश था खुशी इस बात की थी की मैं अपने घर से वो पहला बंदा हूँ जो परदेस आकर रह रहा है। मुझे यहाँ की लाइफ स्टाइल बड़ी पसन्द आई यहाँ
सबको अपने मन का करने की पूरी आजादी है न कोई
रोक न कोई टोक। सब अपना जीवन अपने तरीके से
जीते है कोई किसी की लाइफ में दखल नही देता।
मैंने भी यहाँ आकर खुद को बड़ा ही आजाद महसूस किया। दिन भले ही मेरा ऑफिस के नाम है पर शाम तो मेरी अपनी ही रहती है। मेरे यहाँ नये दोस्त भी बन
गये है जिनके साथ मैं कभी क्लब तो कभी किसी होटेल तो कभी किसी नई जगह जाता रहता हूँ।
बड़ा मजा आता है। और मुझे इस बात की कोई फिक्र
भी नही रहती की घर लेट पहुँचने पर डाट पड़ेगी यहाँ मुझे कोई डाँटने वाला नही है इसलिए खूब अपने मन की कर रहा हूँ और बड़े मज़े से रह रहा हूँ।
शुरू के कुछ दिनों तक ऐसा ही रहा। लेकिन धीरे-धीरे सब बदलने लगा। काम का दबाव बढ़ गया था मेरा
पार्टी और क्लब में जाना कम हो गया था यूँ कहुँ के बंद
ही हो गया था। जितनी जल्दी मुझे नये दोस्त मिले थे
उतनी ही जल्दी वो मुझसे दूर भी हो गये। दिनभर ऑफिस में इतना थक जाता हूँ के जब वापस आता हूँ
तो कुछ और काम करने की मेरी हिम्मत ही नही होती
कभी सेंडविच बनाकर खा लेता हूँ तो कभी पिज्जा या बर्गर ऑडर कर मंगवा लेता हूँ। और कभी मन हो जाये तो अकेले ही किसी पास के रेस्तरां में चला जाता हूँ। मेरा मन पहले जितना खुश नही है मुझे घर की अपने परिवार की याद आती है यहाँ मैं खुद को अकेला महसूस करने लगा हुँ। अगर में अभी घर पर होता तो
माँ मेरी पसन्द का ही खाना बनाकर मुझे खिला रही होती। मुझे यहाँ रहते एक साल होने वाला है पर मुझे यहाँ कुछ भी अपना सा नही लगता सब कुछ पराया सा लगता है जब कभी रात को घर लेट पहुँचता था तो पापा बहुत डाट लगाते थे और यहाँ तो कोई नही है जो लेट आने पर मुझे डाटे या मेरी फिक्र करे।
मैं अपने परिवार को तो याद करता ही हूँ पर साथ ही मुझे अपने शहर अपने देश की भी याद आती है।
हमारे यहाँ साल भर ही त्यौहारों की रोनक रहती है।
दिवाली होली ईद लोहड़ी क्रिसमस सभी त्यौहार बड़ी
खुशी के साथ मनाते है। साल का पता ही नही चलता के कब बीत गया। हर मकर सक्रांति पर तो क्या पतंग बाजी होती है इस बार मैंने बड़ा ही मिस किया मैं तो सबसे बड़ी वाली पतंग लाकर उड़ाता था और तिल के लड्डू अपने दोस्तो के साथ खूब खाता था।
बहुत कुछ याद करता हूँ। सड़क किनारे लगे ठेले की चाट, चौपाटी की पावभाजी, और इन सबसे ज्यादा माँ
के हाथ की बनी दालबाटी जो खाकर मजा आ जाता  था।
और जब कभी गाँव जाता था तो वहाँ के हरे भरे खेतो में घूमघूम कर मोबाइल से खूब फोटो लेता था। बारिश के समय खेतो की जो गीली मिट्टी होती है उसकी एक अलग सी सोंदी सी खुशबू आती है जो मुझे बड़ी अच्छी लगती थी।
वैसे तो अब मैं ज्यादा कहीं जाता नही हूँ पर जब कभी बाहर कहीं अपने कलीग्स के साथ जाता हूँ और मुझे कोई अपने देश का व्यक्ति नजर आ जाता है तो कोई रिश्ता न होते हुए भी वो मुझे अपना सा लगता है और एक खुशी सी होती है उसे देखकर। मैं भले ही यहाँ परदेस में हूँ पर हर वक्त
मेरे ख्याल में मेरा देश और मेरे अपने ही रहते है।
मैं दुनिया के किसी भी कोने में चला जाऊँ पर मेरे दिल में मेरे अपने और मेरा अपना देश ही बसता है। वैसे मेरा मन तो यहाँ नही लग रहा पर अभी कुछ वक्त और यहाँ रुकना पड़ेगा उसके बाद में अपने देश अपने घर वापस लौट जाऊंगा।
वैसे यहाँ मुझे जगजीत जी की वो गजल भी याद आ रही है हम तो है परदेस में, देस में निकला होगा चाँद।



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