मैं जब भी कभी किसी प्रेमी जोड़े को साथ में घूमते हुए देखती हूँ तब उन्हें देखकर मुझे अच्छा तो लगता है पर
सच कहुँ तो उनसे थोड़ी ईर्ष्या भी होती है।
ईर्ष्या की वजह यही है की वो कितने लक्की है ना जो वो साथ - साथ है। और एक हम है जो किसी अपने के
होते हुए भी अकेले और तन्हा है क्योंकि हमारे दरमियाँ अभी दूरियाँ है। मैं जानती हूँ जितना मैं निमेष को याद करती हूँ उतना ही वो भी मुझे याद करता होगा। पर मजबूरी ये है की चाहते हुए भी हम नही मिल सकते।
निमेष और मैं एक ही स्कूल में साथ- साथ थे और कॉलेज में भी हम साथ- साथ ही रहे। स्कूल हो या कॉलेज सबका अपना एक फ़्रेंड्स ग्रुप अलग ही होता है। मेरा भी था। जिसमें निमेष भी था स्कूल टाइम में हम दोनो सिर्फ फ़्रेंड्स थे। पर हम दोनो की
बॉन्डिंग शुरू से ही काफी अच्छी थी हमारे रिश्ते में बदलाव तब आया जब हम कॉलेज में थे। मैंने और निमेष ने एक ही कॉलेज में एडमिशन लिया था हालाकि की वहाँ नये फ़्रेंड्स बन गये थे पर क्योंकि मैं और निमेष स्कूल फ़्रेंड्स थे तो हम साथ में ज्यादा रहा करते थे साथ में क्लास अटेंड करना साथ में केंटीन जाना साथ में पढ़ना। हमारा ज्यादा समय साथ में ही गुजरता था। हम दोनो को ही एक दूसरे की एक आदत
सी होने लगी थी बस इस बात का खुद हमे ही नही पता था। सेकेंड ईयर के एग्जाम चल रहे थे मेरे फ़्रेंड्स और मैं हम सभी एग्जाम के बाद कॉलेज की केंटीन में जाकर जरूर बैठते थे वहीं बैठकर एग्जाम का डिस्कशन भी करते थे एक दिन ऐसे ही हम सब साथ में कैटीन में बैठकर कुछ डिस्कस कर रहे थे हम सभी अपनी बातो में लगे हुए थे बस निमेष ही था जो ना जाने कहाँ खोया हुआ था वो कुछ बोल ही नही रहा था मैंने उससे पूछा भी पर उसने मुझे कुछ नही बताया।
दो दिन हो गये थे निमेष मुझसे ठीक से बात ही नही कर रहा था और उसका चुप रहना मुझे बिल्कुल भी अच्छा नही लग रहा था मुझसे और रुका न गया मैंने
ज़िद कर उससे पूछ ही लिया की वो क्यों परेशान है
निमेष ने बहुत ही गम्भीर होकर कहा- हम दोनो हमेशा साथ-साथ रहते है क्या तुम्हे मेरा साथ अच्छा लगता है मैंने झट से कहा हाँ। निमेष ने फिर कहा क्या हमारा साथ हमेशा के लिए हो सकता है क्या तुम अपनी पूरी लाइफ मेरे साथ स्पेंड कर सकती हो। मैं उसकी बात सुनकर बस खामोश सी खड़ी रह गई
कुछ समझ ही नही आ रहा था क्या कहूँ। उस वक्त मैंने कुछ नही कहा। पर अगले दिन जब मैं निमेष से
मिली तब मैंने उससे नाराज होते हुए कहा हाँ हाँ हाँ।
और बस यहीं से शुरुआत हुई एक नये रिश्ते की।
पहले जैसे हम अभी भी साथ साथ रहते थे पर अब
एहसास बदल गये थे। अचानक से जिंदगी कुछ ज्यादा ही खूबसूरत हो गई थी हम दोनो ही खुश थे
पर ये खुशी कुछ दिनों की ही थी। पढ़ाई पूरी हो गई थी लास्ट ईयर में कॉलेज में ही एक बड़ी कम्पनी में सिलेक्शन के लिए इंटरव्यू था जिसमे निमेष का सिलेक्शन हो गया था पर मेरा सिलेक्शन नही हो सका। निमेष चेन्नई चला गया उसके जाने से मुझे बुरा तो लग रहा था पर फिर भी मैंने उसे मुस्कुराते हुए बाय किया। उसके अच्छे करियर के लिए उसका जाना जरूरी था ये बात मुझे अच्छी तरह मालूम थी। इसीलिए जब निमेष उदास चेहरा बनाये मुझसे नजरे चुरा रहा था ये सोचकर की अपना करियर बनाने के लिए वो मुझे छोड़कर जा रहा है तब मैंने उसे ये क्लीयर कर दिया था की उसे ऐसा कुछ भी सोचने की जरूरत नही है कुछ सालो की ही बात है मैं उसका इतना इंतजार तो कर ही सकती हूँ।
निमेष के जाने के बाद मैंने भी जॉब के लिए एक कम्पनी में एप्लाय
कर दिया और मुझे भी वहाँ से जोईनिंग लेटर मिल गया। और मैं यहाँ पुणे आ गई। मैंने खूद को बीज़ी कर रखा है ताकि निमेष की ज्यादा याद ना आये। पर सच कहुँ तो एक भी दिन ऐसा नही गया होगा जब मैंने उसे मिस न किया हो। उसकी बातो को याद कर कभी चहरे पर हँसी आ जाती है तो कभी आँखो में पानी भी आ जाता है। ये दूरियां भी बड़ी कमाल की होती है
कभी अच्छी भी लगती है और कभी बुरी भी। ये मुझे अच्छी तब लगती है जब निमेष मुझे मिस कर रहा होता है और बुरी तब लगती है जब मुझे उसकी कमी
खल रही होती है। दूरियों का एहसास भी अजीब होता है। दिल में एक खट्टा मीठा सा दर्द देती है ये दूरियां।वैसे फोन पर हम दोनो की बात हो जाती है पर साथ होने की बात अलग होती है। मगर हाँ, दूर रहकर ही ये जाना जा सकता है की किसी की आपकी लाइफ में क्या एहमियत है और वो आपके लिये क्यों जरूरी है।
इसलिए दूरियां भी है जरूरी। वैसे हमें एक- दूसरे से दूर हुए तीन साल हो गये है। बस एक साल और बाकी है एक साल बाद निमेष लौट आयेगा और मैं भी यहां से वापस चली जाऊँगी। फिर खत्म हो जाएंगी ये दूरियाँ।

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