मुलाकात- भाग 2



पिछले भाग में हमने जाना की अपने भाई की शादी में अनिकेत की मुलाकात उसी लड़की से होती है जिसे
उसने मार्केट की शॉप पर देखा था। दोनो की इस छोटी
सी मुलाकात का अनिकेत पर क्या असर हुआ और क्या उनकी दुबारा मुलाकात हुई। ये हम जानेंगे कहानी के इस भाग में।
तो चलिये कहानी शुरू करते है।
अनिकेत के भाई की शादी बड़े अच्छे से सम्पन हो जाती है। नई दुल्हन का गृहप्रवेश भी हो जाता है। घर में सब नई
बहु के आने से खुश है अनिकेत भी भाभी
के आने से खुश तो था पर शायद उसके दिमाग में कुछ
चल रहा था कहीं ना कहीं उस मुलाकात का उस पर कुछ असर सा हो रहा था। उसे रह रहकर उस लड़की
का ख्याल आ रहा था। कुछ दिनों तक ऐसे ही चलता रहा ।अनिकेत यहाँ-वहाँ मन लगाने की पूरी कोशिश कर रहा था पर बार-बार उस लड़की
का चेहरा उसकी आँखो के सामने आ रहा था और
साथ ही उसे इस बात का अफसोस दिला रहा था कि
जाते-जाते उसने उस लड़की से उसका नाम जानने की कोशिश भी नही की।अब अनिकेत के मन में एक बेचैनी सी हो रही थी यह बेचैनी थी उसका नाम जानने की उसके बारे में जानने की और शायद उसे एक बार देखने की। ना उसे कुछ अच्छा लग रहा था और नाहि उसका कही मन लग रहा था अनिकेत यह तय नही कर पा रहा था की वह
उस लड़की के बारे में जानने की कोशिश करे या नही।
दिल और दिमाग दोनो ही अलग - अलग दिशा में
जा रहे थे हाँ और ना के बीच फसा अनिकेत हाँ को चुनता है यानी दिल की बात सुनता है वह ठान लेता है की वह उस लड़की के बारे में जरूर मालूम करेगा।
अब सवाल ये था की वह पता कैसे लगाये। काफी देर
सोचने के बाद अनिकेत जाता है भईया भाभी के पास
उनकी शादी की तस्वीरे देखने। तस्वीरों में वह उस लड़की को ही खोज रहा था मेहनत रंग लाती है और
शादी में आये लोगों के बीच बैठी वह एक तस्वीर में नजर आ जाती है। अनिकेत बातो को गोल-गोल घुमाकर
इसकी उसकी बाते कर अपनी भाभी से उस लड़की के बारे में जानने का प्रयास करता है यह सोच कर की शायद इन्हे पता हो की ये कौन है। अंधेरे में चलाया गया अनिकेत का ये तीर निशाने पर लगता है  भाभी से बातो ही बातो मे पता चलता है कि वह लड़की उनकी बहन पूजा की दोस्त है और उसका नाम नूपुर है। वह उनके घर कभी कभी आती- जाती भी रहती है। यह सब सुन खुशी से अनिकेत की आँखो में मानो तारे चमकने लगते है और नूपुर नाम  सोचते ही उसे कानो में घुंगरू की झंकार सी सुनाई देने लगती है। उसे इस बात से थोड़ा सुकुन मिलता है की उस लड़की के बारे कुछ तो पता चला।
अब अनिकेत ये सोच रहा था कि नूपुर से मिले तो मिले कैसे। उसे अच्छी तरह पता था कि भाभी की बहन पूजा ही है जिसके सहारे वो नूपुर तक पहुँच सकता है। और इसके लिए उसे पहले पूजा से दोस्ती करनी पड़ेगी जोकि मुश्किल बिल्कुल नही है क्योंकि
वो रिश्तेदार है मिलना जुलना होता ही रहता है और वो कभी-कभार भाभी से मिलने आ ही जाती है। बस अपनी योजना के अनुसार अनिकेत ने पूजा से दोस्ती कर ही ली। दोनो अच्छे दोस्त बन गये। अब अनिकेत
ऐसा मौका तलाश रहा था जिससे वह नूपुर से मिल पाये। और वो मौका मिल जाता है पूजा के जन्मदिन पर। पूजा के घर एक छोटी सी पार्टी रखी जाती है जिसमे वह अपने सारे दोस्तो को बुलाती है। और ये सलाह अनिकेत ही पूजा को देता है। पार्टी शुरू होती है पूजा के सारे दोस्त आ जाते है बस नूपुर ही अब तक नही आई थी जिसके आने का इंतजार पूजा से ज्यादा अनिकेत कर रहा था। पर कुछ देर बाद वो आ
जाती है नूपुर को देख अनिकेत के दिल की धड़कने
थोड़ी तेज हो जाती है। उन तेज धड़कनो के साथ वो बड़े ही प्यार से नूपुर को निहार रहा होता है।पूजा पहले ही अनिकेत को अपने दोस्तो से मिला चुकी होती है बस नूपुर ही रह गई थी नूपुर के आते ही वो उसे भी अनिकेत से मिलवाती है। नूपुर और अनिकेत दोनो एक दूसरे की ओर देखते है नूपुर का चेहरा देख अनिकेत को साफ पता चल रहा था की उसे वो मुलाकात याद है। वो दोनो पहले मिल चुके है  ये बात बस पूजा को नही पता थी।अनिकेत नूपुर से कुछ कहना चाह रहा था पर कह न सका। लेकिन पूरे
समय उसकी निगाहे नूपुर पर ही टिकी थी। बाद में हिम्मत कर वो नूपुर से जाकर पूछ ही लेता है- क्या हम दोस्त बन सकते है। नूपुर को भी अनिकेत शायद अच्छा लगा इसलिए वो कुछ पल सोचती है और फिर सिर हिलाते हुए हाँ कह देती है इसके बाद दोनो के बीच कुछ देर बाते भी होती है कुछ समय बाद पार्टी खत्म होती है और नूपुर चली जाती है।
क्योकि अब अनिकेत और नूपुर की दोस्ती हो चुकी थी इसलिए इनका मिलना जुलना भी शुरू हो गया था
कभी मार्केट तो कभी पार्क तो कभी कही इनकी मुलाकात होने लगी थी पर कभी भी दोनो अकेले नही मिले पूजा भी उनके साथ रहती थी। जिसे अनिकेत ही बुलाता था वो नही चाहता था के नूपुर किसी भी तरह से असहज महसूस करे। धीरे-धीरे  अनिकेत ने नूपुर से जुड़ी हर बात जान ली थी जैसे उसकी पसन्द उसकी आदते उसकी ख्वाईशें सब अब तो अनिकेत उसके मन की बातो को भी समझने लगा था हर दिन के साथ नूपुर के लिए उसका प्यार बढ़े चला जा रहा था अनिकेत के  दिल में क्या है इस बात से नूपुर अंजान नही थी उसने अनिकेत की आँखो में खुद के लिए प्यार बहुत पहले ही देख लिया था वो अच्छी तरह जानती थी की अनिकेत उसे कितना चाहता है और उसकी कितनी परवाह करता है। वो तो बस इंतजार कर रही है के अनिकेत कब उससे अपने दिल की बात कहेगा। पर अनिकेत है के कुछ कह ही नही रहा था।
और कुछ दिनों से दोनो की मुलाकात भी नही हुई थी।
अनिकेत किसी वजह से मिलने नही आ पा रहा था पर इससे नूपुर जरूर परेशान हो गई थी। उसे अनिकेत को देखने की आदत जो पड़ गई थी उसके ना देख से वो थोड़ी सी बेचैन हो जाती है। जब उसकी अनिकेत से फोन पर बात होती तो वो उस पर थोड़ा गुस्सा भी करती है और फिर उसे मिलने के लिए कहती है। शाम को अनिकेत और नूपुर दोनो झील के पास चौपाटी वाली जगह पर मिलते है अनिकेत ने पूजा को भी आने को कहा था पर वो कुछ काम आ जाने के वजह से नही आ पाती। इस बार नूपुर और अनिकेत दोनो अकेले थे अनिकेत को हल्की सी घबराहट हो रही थी और मन में थोड़ी उतलपुथल सी भी मची थी कुछ ऐसा ही हाल नूपुर का भी था उनके आस पास चौपाटी पर और भी कई लोग थे जोकि आपस में खूब बाते की किये जा रहे थे पर वो दोनो खामोश बैठे हुए थे कुछ बोल ही नही रहे थे नूपुर ने ही फिर बात करना शुरू किया वो भी इधर- उधर की बातो से तभी अनिकेत चाय के स्टॉल पर जाता है
और दोनो के लिए चाय ले आता है दोनो चाय का ग्लास पकड़े हुए थे और झील की ओर देखे जा रहे थे दोनो को ही एक दूसरे से बहुत कुछ कहना था पर कह ही नही पा रहे थे ये जहाँ खड़े थे वहाँ से झील की ओर देखने पर शाम का नजारा बहुत सुन्दर दिखाई दे रहा था नूपुर ये अनिकेत को बता रही थी और तभी दोनो की नजरे आपस में टकरा जाती है और दिल की बात आँखो से बया हो जाती है दोनो एक दूसरे को देखे जा रहे थे तभी अनिकेत अचानक से कहता है की शाम ज्यादा हो गई है हमे चलना चाहिए। अनिकेत नूपुर को घर छोड़ते हुए अपने घर चला जाता है। इधर नूपुर समझ नही पा रही थी की आखिर अनिकेत उसे अपने दिल की बात क्यों नही कह रहा। उधर अनिकेत भी परेशान था वो नूपुर को सब बताना तो चाहता है पर उसे डर है की कही वो नाराज ना हो जाये अगर वो नाराज हो गई तो जो दोस्ती का रिश्ता है शायद वह भी न रहे और अनिकेत नूपुर को खोना नही चाहता।इसलिए वह कुछ नही कह रहा।उस के बाद  कुछ दिनों तक दोनो की आपस में कोई बात नही होती और एक शाम नूपुर अनिकेत को फोन कर कहती है की वो उसका वही इंतजार कर रही है जहाँ  उनकी पहली मुलाकात हुई थी आवाज से ऐसा लग रहा था जैसे नूपुर रो रही हो
अनिकेत घबरा जाता है और जल्दी से अथिति मैरिज
गार्डन पहुँच जाता है वो जैसे ही वहाँ पहुँचता है उसे नूपुर सामने ही खड़ी मिलती है उसी साड़ी में जो उसने तब पहनी हुई थी जब वो दोनो पहली बार मिले थे अनिकेत समझ जाता है के नूपुर सब जान गई है वैसे अब कुछ कहना जरूरी तो नही था पर फिर भी अनिकेत प्यार भरे अंदाज में आखिरकार आज नूपुर से दिल की बात कह ही देता है जिसे सुन नूपुर तो अपनी खुशी सम्हाल ही नही पाती दोनो एक दूसरे का हाथ थामते है और उसी समय जोरो से बारिश होने लगती है इस बार ये बारिश मौसम की वजह से कम इनकी इस मुलाकात की वजह से ज्यादा हो रही थी
ये बारिश थी प्यार की जिसमे नूपुर और अनिकेत भीगे
जा रहे थे नूपुर के पास छाता था वही छाता जो उसे अनिकेत ने दिया था और आज दोनो उस छाता के नीचे थे। नूपुर अनिकेत को भीगने से बचा रही थी पर अनिकेत आज भीगना चाहता था इस मौसम की बारिश में। प्यार की बारिश में । एहसास की बारिश में।








मुलाकात



जून का महिना सूरज के तीखे तेवर गर्मी इतनी के घर से बाहर निकलने का ख्याल भी डरा रहा है। और ऐसे में अगर बाहर जाना पड़े तो मन में गुस्सा तो आयेगा ही
पर क्या करे। जब घर में शादी हो तो काम भी कई होते है और घर से बाहर भी जाना पड़ता है  फिर चाहे
तापमान कितना भी हो। ऐसे में डर से नही पूरी हिम्मत
के साथ कड़कती धूप में घर से बाहर निकलना पड़ता
है और सूरज का सामना भी करना पड़ता है।
आज ऐसी ही हिम्मत अनिकेत ने भी की। वह इस धूप में अपनी गाड़ी से मार्केट जा रहा है अनिकेत
के बड़े भाई अमित की शादी है उन्ही  की वजह से
अनिकेत को इस चिलचिलाती धूप में मार्केट जाना पड़
रहा है। वरना अनिकेत तो धूप में निकले ही ना। उसे
डर रहता है की कही वह इस धूप से काला ना पड़
जाये। अनिकेत बहुत ही गोरा है उसे अपने गोरे होने पर बडा घमंड भी है।वह अपनी चचेरी बहन को इसी बात पर तो चिडाता है की वह उससे ज्यादा गोरा है।
दोपहर हो चुकी थी अनिकेत मार्केट जाने के लिए निकल गया था। अमित ने पहले ही शेरवानी पसन्द
कर बुक कर दी थी जिसे आज लेकर आना था उसे ही लेने अनिकेत मार्केट की उस शॉप पर गया है जहाँ
अमित ने शेरवानी बुक की है। धूप में जाते ही अनिकेत को ऐसा महसूस होता है जैसे वह तवे पर रखी रोटी की
तरह सिक रहा हो। वह बस यही प्रार्थना कर रहा होता है कि जल्दी से वह मार्केट पहुँच जाये। गर्म हवाओ की लपटे अनिकेत को छुकर गुजर रही होती है
जिस्से अनिकेत को सूरज की तपिश का और अधिक
अहसास हो रहा होता है। धूप और गर्मी से परेशान होते -होते
आखिर में अनिकेत मार्केट की शॉप पर पहुँच ही जाता है। जहाँ जाकर उसे थोड़ी राहत मिलती है। लेकिन उसका चेहरा तब थोड़ा उतर जाता है जब उसे पता
चलता है कि अभी कपड़े पूरी तरह तैयार नही हुए है
शॉप वाले भईया बताते है की उसे थोड़ी देर इंतजार करना पड़ेगा। अनिकेत मुँह लटकाकर दरवाजे के पास रखी कुर्सी पर बैठ जाता है।
और शॉप में बैठे हुए वह बाहर की ओर देखने लगता है। शॉप का दरवाजा काँच का बना होता है इसलिए अनिकेत को बाहर का नजारा साफ नजर आ रहा होता है। बैठे-बैठे उसके दिमाग में अपने भाई की शादी के ख्याल चल रहे होते है। कुछ समय बाद जब वह
गौर से बाहर देखता है तो दिखाई देता है के धूप गायब सी हो गई है आसमान में थोड़े बादल भी छा गये है।काली घटाये भी नजर आ रही है।
मौसम सुहावना सा हो गया है बाहर का सुहावना सा मौसम देखकर
परेशान अनिकेत के मन को कुछ सुकुन सा मिलता है।
वह अभी भी बाहर की ओर ही देख रहा होता है और
इतने में ही कुछ ऐसा हो जाता है जिसकी वजह से
अभी- अभी मिला सुकुन कही गायब हो जाता है।

होता दरसल ऐसा है कि अनिकेत जिस शॉप में बैठा
होता है उस शॉप के सामने भी एक शॉप होती है। और
जब वह बाहर देख रहा होता है तब उसे नजर आती है
एक लड़की। जो सामने वाली शॉप के बाहर खड़ी थी।जी हाँ एक लड़की जोकी सफेद
आसमानी दुपट्टा ओढे हुए होती है उसे देख ऐसा लगता है जैसे आसमान को दुपट्टा बनाये उसने ओढ़ लिया हो
उसकी आँखो में लगा गहरा काजल ऐसा लग रह था
जैसे आसमान में ये काली घटाये इसी के काजल से ही
छाई हुई है। उसके कानो में सुनहरे रंग की बालिया उसके सिर हिलाकर बात करने से ऐसे हिल रही थी
जैसे हवा के झोको से लेहरा रही हो। उसे देख कर तो
अनिकेत का दिल जैसा था वैसा थमा सा रह गया।
वो लड़की मुस्कुराते हुई अपनी साथ वाली लड़की से
कह रही थी जल्दी चलो बारिश की बूंदे आ रही है।
बाहर हल्की सी बारिश की बूंदे आना शुरू हो गई थी।
कुछ बूंदे उस लड़की के चेहरे पर भी आ गिरी थी जिससे उस लड़की को कैसा लगा पता नही पर अनिकेत को जरूर ये सब देख अच्छा लग रहा था।
अनिकेत बस उधर देखे जा रहा था तभी शॉप पर काम करने वाले एक भईया आते है और अनिकेत को
एक बेग थमाते हुए कहते है ये लीजिये आपका सामान।बेग लेते हुए जब वह दुबारा बाहर देखता है
तो उसे सामने वाली शॉप पर कोई नजर नही आता।
अनिकेत मन में  कुछ सोचता है और फिर वो अपने घर के लिए निकल जाता है। अनिकेत घर तो आ जाता है पर उसे बार-बार अभी भी  उस लड़की का ख्याल आ रहा होता है।खैर बाद में वो शादी के कामो
में  व्यस्त हो जाता है। और शाम को उसका सारा ध्यान अपने भाई को तैयार कराने में और खुद तैयार होने में रहता है मतलब की वह बार-बार देख रहा होता है कि
भईया कैसे लग रहे है कपड़े उन पर जच रहे है की नही साफा ठीक से पहना है की नही। सहज महसूस
हो रहा है या नही। अपने भईया का ख्याल अनिकेत ऐसे रख रहा था मानो वही बडा भाई हो। भाई के तैयार
हो जाने के बाद बारी आती है अनिकेत की ।
बड़े भाई की शादी की खुशी ही कुछ और होती है अनिकेत तो ऐसे तैयार हो रहा था जैसे की आज तो  भईया की सारी सालियो के उसे देखकर होश ही उड़
जाएंगे। और वो उसके इर्द-गिर्द घूमती नजर आएंगी।
तैयार होते वक्त कुछ ऐसे ख्याल ही तो अनिकेत के
दिमाग में पक रहे थे आईने में बार-बार खुद को निहारने और इस बात पर यकीन हो जाने की वह अच्छा लग रहा है के बाद ही अनिकेत अपने कमरे से बाहर आता है। अनिकेत को पूरा यकीन है की आज तो उसे देख कर कई लड़कियों के दिलो की धड़कने बढ़ ही जायेगी।
अनिकेत के अलावा बाकी सारे बाराती भी तैयार हो चुके होते है साथ ही बारात के निकलने का समय भी हो जाता है। कुछ ही देर में बारात अतिथि मैरिज गार्डन पहुँच जाती है।जहाँ बाराती जमकर नाचते है
अनिकेत तो खूब ही नाचा। नाच-नाच कर पसीने से तर-बतर  हो गया था। बारात स्वागत द्वार पर पहुचती
है बारातियो का स्वागत कर उन्हें अंदर लाया जाता है।वर माला होती है और सब नये जोड़े के साथ फोटो
खीचा रहे होते है अनिकेत भी उस खूबसूरत स्टेज पर
अपने भाई के बगल में ही खड़ा था। और तब अनिकेत की नजर सामने कुर्सी पर बैठी हुई लड़की पर पड़ती है। जो अनिकेत भाई की सालियो के होश उड़ाने वाला
था खुद उसके होश उड़े दिखाई दे रहे थे। ब्लैक रेड साड़ी पहने हुए आँखो में गहरा काजल लगाये मुस्कुराते हुए अपने चेहरे पर आगे आ रहे बालो को अपनी उंगली में फसाकर कान के पीछे ले जाते हुए जो लड़की सामने नजर आ रही थी ये वही थी जो अनिकेत को
शॉप पर दिखी थी। अनिकेत को तो यकीन ही नही हो रहा था की वह उसके सामने है। अनिकेत उसे देखे जा रहा था और पलभर में वह उसकी आँखो से ओझल हो जाती है। अनिकेत यहाँ-वहाँ उसे ढूंढने लगता है वह कुछ बेचैन सा हो जाता है इतने सारे लोगों के बीच उसकी निगाहे बस उस लड़की को ही तलाश रही थी
उसकी तलाश बाहर स्वागत द्वार पर जाकर खत्म होती है जहा वो खड़ी होती है अकेली।
अनिकेत को उसके मिल जाने की खुशी भी होती है
और साथ ही फिक्र भी क्योकी इतनी रात को वो वँहा
अकेली खड़ी थी। अनिकेत खुद को रोक नही पाता है
और उसके पास जाकर पूछ ही लेता है - सुनिये
लड़की अनिकेत की ओर पलट कर देखती है
अनिकेत चेहरे पर एक सभ्य लड़के वाले भाव के साथ धीमे स्वरों में कहता है मुझे  पूछने का कोई हक तो नही है पर माफ
कीजिये आप यहाँ अकेले क्यों खड़ी है। वो क्या है के
यह बाहर कोई भी नही है आप अकेली खडी दिखाई दी तो मैने सिर्फ इसलिए पूछ लिया।
लड़की ने उत्तर देते हुए कहा मेरे भाई मुझे लेने आने वाले है मैं उनका इंतजार कर रही हूँ।
अनिकेत ने पूछा आपको बुरा तो नही लगा मैने इस तरह आप से पूछ लिया। प्लीज़ आप गलत मत समझियेगा
लड़की ने कहा- नही मैं कुछ गलत नही समझ रही
वैसे आप दुल्हे के भाई है ना
अनिकेत आश्चर्य से उसकी ओर देखते हुए कहता है हाँ। अनिकेत की आँखो में सवाल था पर उसने पूछा
नही।
दोनो चुपचाप खड़े थे और बादल मुस्कुरा दिया। अरे भाई शाम को जो हल्की सी बूंदे पानी की आई थी अब
वो तेज होकर दोबारा आ रही थी। यानी बारिश होने लगी थी। वैसे होनी ही थी शाम से ही मौसम ऐसा ही था। कोई ये ना सोचे के इन दोनो की मुलाकात होने पर बादल पानी बरसा रहा है ये तो पूरी तरह मौसम की वजह से ही है। अनिकेत जल्दी से अंदर जाता है और कुछ ही समय में वापस आ जाता है आते वक्त उसके हाथ में छाता होता है।
लड़की को भी उसके भाई लेने आ जाते है। और वो
चली जाती है जाते वक्त उसके हाथ में होता है छाता।
ऐसी थी उनकी ये पहली मुलाकात।
पर कहानी अभी बाकी है आगे क्या होता है ये आप जानेंगे अगली पोस्ट में ।
तो जरूर पढ़े कहानी का अगला भाग।



मदर्स डे




आज मैं और अंकित दोनो ही बहुत खुश है हम दोनो ने
मिलकर आज माँ के लिए कुछ खास सोचा है। आज मदर्स डे जो है। वैसे ये जरूरी नही के सिर्फ इसी दिन ही हम अपनी माँ के लिए कुछ खास करे। हमें अपनी
माँ को खुशी देने और उनके लिए कुछ करने के लिए
किसी खास दिन के इंतजार की जरूरत नही। हम जब चाहे तब ही उनके लिए कुछ न कुछ कर सकते है।
क्योंकि माँ तो हमे प्यार देने के लिए किसी दिन का
इंतजार नही करती वह तो रोज ही हम पर अपना
प्यार लुटाती है हमारे लिए कुछ न कुछ करती रहती
है। सच में माँ बड़ी ही प्यारी होती है। जिस तरह माँ
हर पल हमारी ही परवाह करती है उसी तरह हमे भी कोशिश करनी चाहिए के हम भी उनका ख्याल रख
सके। उन्हें खुशी दे सके उनके कुछ सपनो को पूरा कर
सके।
आज ऐसी ही कोशिश मैं और अंकित भी करने जा रहे
है हम माँ को ऐसी जगह ले जा रहे है जहाँ  जाकर
उन्हें खुशी जरूर मिलेगी। और शायद उनका सपना
भी कुछ हद तक पूरा हो सके ऐसी मुझे उम्मीद है।
माँ पूरे रास्ते यही पूछती रही की कहा जा रहे है पर
मैंने और मेरे भाई अंकित ने माँ को कुछ भी नही बताया हम बस मुस्कुराते रहे। और आधे घंटे में  ही
हम वहाँ पहुच गये। हम गाड़ी से उतरे थोड़े आगे बड़े
और माँ ने दीवार पर लगे बोर्ड पर पढ़ लिया। संगीत
शिक्षा। यही तो लाये है हम माँ को। हमने माँ का हाथ
थामा और उन्हें अपने साथ अंदर ले गये। वहाँ की
मैडम से हम पहले ही मिल चुके थे इसलिए हम सीधे
ऑफिस में चले गये माँ को मैडम से मिलवाया। और
फिर उनका नाम दर्ज कराया। आज से माँ भी यहाँ
संगीत सीखने आएंगी। माँ को संगीत पसंद है मैंने उन्हें
गाते हुए देखा है  लेकिन घर परिवार की जिम्मेदारी के
चलते वो कभी अपनी कला को निखार ना सकी।
आज उनमे पहले जैसा उत्साह तो नही है पर धीरे-धीरे उनमें फिर से वही उत्साह आ जायेगा। उन्हें अपनी
कला को प्रदर्शित करने का मौका मिलेगा। क्योंकि
यहाँ कलाकारों का आत्मविशवास बढ़ाने के लिए
स्टेज प्रोग्राम भी कराए जाते है। माँ भले ही बड़ी
गायिका ना बन सके पर यहाँ सबके सामने गाना गाने
से उन्हें खुशी जरूर मिलेगी। और उनकी खुशी से हमे
खुशी मिलेगी।
संगीत शिक्षा केंद्र से निकलने के बाद हम माँ को
उनकी फ़्रेंड से मिलाने ले गये वहाँ हम काफी देर रुके।
उसके बाद हम और भी कई जगह गये जहाँ जाकर माँ को अच्छा लगता है। दिन भर घूमने के बाद हम शाम
को घर पहुचे। मैने और अंकित ने माँ के लिए खाना बनाया। जिसे खाने के बाद माँ ने हमारी खूब तारीफ की। कितना अच्छा है ना सब कुछ पर आज से कुछ साल पहले ऐसा नही था।
मैं और अंकित हम दोनो जब छोटे थे सब कुछ ठीक
था पापा की अच्छी जॉब थी माँ हाउस वाइफ थी सबका
खूब ख्याल रखती सब अच्छा चल रहा था पर एक
दुर्घटना ने सब बदल दिया। पापा का एक्सीडेंट हो
गया था उनकी हालत काफी  खराब थी ऐसी स्थिति में
सारी जिम्मेदारिया माँ के कन्धों पर आ गई। माँ स्कूल
में पढाने लगी और शाम को बच्चो की ट्यूशन क्लास
लेने लगी। पापा का ईलाज हमारे स्कूल और घर का
खर्च सब माँ ही सम्हाल रही थी माँ ने हर कोशिश की
के पापा ठीक हो सके पर वो उन्हें  बचा ना सकी और
पापा हम सब को छोड़ कर चले गये। उस वक्त माँ
अंदर से पूरी तरह टूट चुकी थी पर उन्होने हमे
कभी भी टूटने नही दिया।जिंदगी में कई मुश्किलो के
बावजूद उन्होंने हमारी परवरिश में कोई कमी ना आने
दी। माँ ने हमे कभी अकेले न होने दिया वो हमेशा
हमारे साथ रही। पर एक वक्त ऐसा आया जब हमने
उन्हें अकेला छोड़ दिया। अपने-अपने स्वार्थ के कारण
मैं और अंकित उन्हें छोड़कर चले गये। मुझे अपना
करियर बनाना था और अंकित को शहर से बाहर जाकर पढ़ाई करनी थी। हम चले गये माँ अकेली रह
गई। तीन साल बाद हम वापस आये वो भी तब जब  वो बीमार हो गयी थी । माँ की अचानक तबियत
खराब हो गई थी मुझे और अंकित को जब पता चला
हम माँ के पास आ गये। मैं तो घबरा ही गई थी क्योंकि
मेरे ऑफिस में ही काम करने वाली निर्मला आंटी को
कुछ समय पहले ही दिल का दोहरा पड़ा था।वो भी
अकेले ही रहती थी उनके बच्चे विदेश में थे। और
अकेलेपन के चलते उनकी ये हालत हुई थी। यही
सोचकर मैं घबरा गई थी की माँ भी अकेले रहती है
कही उन्हें तो कुछ नही भगवान की कृपा थी के माँ
ठीक थी बस वो पहले से थोड़ी कमजोर हो गई थी
और इसीलिए उन्हें बुखार आ गया था और वो बीमार
हो गयी थी। मुझे और अंकित को देखते ही मानो वो ठीक ही हो गई थी। मैने तय कर लिया था कि अब मैं माँ को छोड़ कर कही नही जाउंगी। उन्हें खो देने के
डर ने हमे उनके पास ला दिया। और अपनी गलती
का एहसास दिला दिया। अब मैं और अंकित यही माँ
के पास है यही रहकर जॉब कर रहे है।
जब माँ बिना स्वार्थ के अपना पूरा जीवन हमे खुशियां
देने में लगा देती है तो क्या हम उनकी खुशी के लिए
उनके साथ नही रह सकते। ना जाने उनके कितने
सपने थे जो उन्होंने हमारे लिए छोड़ दिये। उन्हें पूरा नही किया सिर्फ हमारे लिए ताकि हमारी परवरिश अच्छे से हो सके और आज
हम उनके लिए कुछ नही छोड़ सकते। इस तरह की
ना जाने कितनी बाते मेरे दिल में चल रही थी
बस तब से मैं और अंकित माँ के साथ है उनका ख्याल
रखते है और उन्हें तन्हा नही रहने देते। हर त्यौहार
साथ में मनाते है। खुश है और आज मदर्स डे मना रहे
है। और माँ के चेहरे पर आई खुशी को निहार रहे है।
उनसे कह रहे है हैप्पी मदर्स डे माँ।





चीकू



हर रोज की तरह आज भी मैं बाहर घर के बागीचे में
बैठकर अखबार पढ़ रहा था। खबरें आज की भी वैसी
ही थी जैसी रोज की होती हैं। कुछ खास नया नही था
पड़ोस का लड़का राहुल रोज सुबह टहलने जाता है।
यहाँ से निकलते हुए वह मुझे गूड मोर्निंग शर्मा अंकल
जरूर कहता है। मैं भी कह देता हूँ गूड मोर्निंग बेटा।
मैं अखबार पढ़कर रखु  उसके पहले राधा चाय लाकर
रख देती हैं। हम दोनो साथ बैठकर चाय पीते है
राधा हमेशा से ही मेरे साथ ही चाय पीती है। उसने
आज तक कभी अकेले चाय नही पी।
आज भी हम दोनो साथ बैठकर चाय पी रहे थे। और
यहाँ-वहाँ की बाते कर रहे थे। तभी एक युवती की आवाज आती है वह चीकू, चीकू बोलकर आवाज
लगाये जा रही थी। शायद उसे चीकू लेना होगा इसलिये वह चीकू वाले भईया को रोकने के लिए इस तरह से
आवाज लगा रही थी। मैं और राधा उसकी ओर देख
रहे थे। उसने हम से भी पूछा आपने चीकू को यहाँ से
जाते देखा है। हमने कह दिया नही। हमे तो समझ
ही नही आ रहा था की वह किसके बारे में पूछ रही है।
तभी एक बच्चा दौड़ता हुआ आता है और उस युवती
से लिपट जाता है। वह  उसे डाटते हुए कहती है कहाँ
चले गये थे तुम चीकू।
चीकू उस बच्चे का नाम चीकू था। कैसे-कैसे नाम रखने
लगे है लोग चीकू। शायद अब किसी का नाम अंगूर भी सुनने को मिले। खैर वह बच्चा दिखने में बड़ा
प्यारा था। घुंघराले बाल , हल्की भूरी सी आँखे।
चेहरा मासूम था पर उसकी आँखो में शैतानी अलग ही
नजर आ रही थी। वह युवती जिस तरह उस बच्चे को
डांट रही थी उससे साफ पता चल रहा था की वह
उसकी माँ है। वो उसे डांटते हुए अपने साथ ले जाती
है। मैं और राधा उन दोनो को देखे जा रहे थे। तभी
राहुल वॉक से वापस लौटते हुए  नजर आया उसी से
पता चला की ये नये पड़ोसी है।
अगली सुबह वह बच्चा चीकू हमारे घर के बागीचे में
आ जाता है उसे बागीचे में लगे फूल अच्छे लग रहे
होते है उनमें से एक फूल वह राधा से मांगने लगता है।
राधा मना नही कर पाती है। लेकिन वह उसके सामने
शर्त रखती है कि चीकू उसके पास आकर बैठे उससे
दोस्ती करे तोहि वह उसे फूल देगी। चीकू राधा की
बात मान लेता है। और उसके पास आकर बैठ जाता
है। राधा और चीकू दोनो की दोस्ती हो जाती है। राधा
रोज कुछ न कुछ चीकू के लिए बनाती और बड़े प्यार
से उसे खिलाती। चीकू मुझे भी अच्छा लगने लगा था।
चीकू अपने दोस्तो को भी साथ लेकर आता था।
बच्चो के आने से बगीचे में रोनक सी आ गई थी। अब
राधा के साथ मैं भी चीकू के आने का इंतजार करता
बस राधा पर जाहिर नही होने देता।
चीकू रोज आता और राधा के साथ खूब खेलता मस्ती
करता। अब तो मैं भी धीरे-धीरे उनके खेल में शामिल
हो गया था। चीकू की वजह से मैं और राधा जाने
कितने दिनों बाद खुलकर हँसे थे। चीकू ने अपनी
शरारतो और मस्ती से हमारे मन की उन कलियों को
फिर से खिला दिया था जोकि कई दिनों पहले मुरझा
चुकी थी।
राधा की मुलाकात चीकू की माँ निधि से भी होती रहती
है। निधि से राधा को पता चला की चीकू के पापा  नही
है। कुछ महीनों पहले ही एक दुर्घटना में निधि और चीकू ने उन्हें खो दिया। निधि और उसके पति की
लव मैरिज थी घर वालो ने उन्हें स्वीकार नही किया था।
वे इतने नाराज थे कि उन्होंने निधि का चेहरा तक नही
देखा था। निधि के पति की जॉब दूसरे शहर में ही थी
इसलिये वो वही रहने चले गये थे। और अब
निधि वापस इस शहर में आई है। चीकू के पिता का
परिवार यही रहता है। पर अभी तक निधि उनसे
मिलने नही गई। इतनी बड़ी बात वह उन्हें कैसे बताएगी। और सब जान कर उनकी हालत क्या होगी
यही सब सोच कर वह अभी तक उनके पास नही गई।
  निधि की सारी बात सुनाने के बाद राधा गंभीर सोच
में पड़ गई थी। मुझे पता था के उसके दिमाग में कौन
सी बात चल रही है पर मैंने कुछ नही कहाँ।
राधा को सिद्धार्थ की याद आ गई थी शायद उसका
मन सिद्धार्थ से मिलने का भी कर रहा हो। पर वो कहाँ
है कैसा है हमे नही पता था। पाँच साल हो गये थे।
सिद्धार्थ को घर से गये हुए। ना हमे उसकी कोई खबर
थी ना उसे हमारी। राधा तो रोज ही अपने बेटे को याद
करती है पर मेरे सामने कुछ नही कहती।
उस दिन गुस्से में मैंने उसे घर से जाने को कह दिया
था। सारे रिश्ते तोड़ दिये थे पर क्या उसे हमसे मिलने
की हमे मनाने की कोशिश नही करनी चाहिए थी।
मैंने गुस्से में घर से निकलने को क्या कह दिया वह घर छोड़कर ही चला गया। एक बार भी नही सोचा के
के उसके चले जाने से हमें कितनी तकलीफ होगी।
राधा ही नही मुझे भी उसकी बहुत याद आती है।
मेरा मन भी उससे मिलने को तड़पता है पर शायद वो
हमे भूल गया।
आज जब भी चीकू को देखता हूँ  ऐसा लगता है जैसे
सिद्धार्थ वापस से छोटा होकर मेरे पास आ गया हो।राधा भी इसीलिए तो चीकू को इतना प्यार करती है।
क्योंकि चीकू कुछ-कुछ वैसा ही लगता है जैसा सिद्धार्थ
बचपन में लगता था। घुंघराले बाल, हल्की भूरी सी
आँखे, मासूम सा चेहरा। सिद्धार्थ की झलक नजर
आती है उसमे। चीकू कुछ वक्त के लिए ही सही चाहे
फूल तोड़ने आये या राधा के पास खेलने आये उसके
आने से हमे खुशी मिलती है। आज काफी देर से मैं
और राधा बागीचे में बैठे हुए थे पर
आज सुबह से ही चीकू नजर नही आया और बच्चो
के साथ खेलता हुआ भी नही दिखाई दिया। नही तो
रोज सुबह से ही यहाँ-वहाँ दौड़ता मस्ती करता नजर
आता है वह बीमार नही था बस आज उसका मन
खेलने को नही कर रहा था ऐसा उसके दोस्तो ने
बताया। हम दोनो उठकर घर के अंदर जा ही रहे थे
कि तभी चीकू आ गया उसे देख हमारा चेहरा खिल
उठा। चीकू ने आकर राधा का हाथ पकड़ा और हमसे
उसके घर चलने की जिद करने लगा। हमने उससे
बहाने भी बनाये पर वह नही माना। और हमे लेही
गया। हम उसके घर पँहुचे देखा निधि कुछ काम कर
रही थी शायद घर की सफाई कर रही थी। निधि जैसे
ही पलटी हमने देखा उसकी आँखो में आँसू थे। वह
एकदम खामोश थी वह जैसे ही हमारी ओर थोड़ा आगे बड़ी मैं और राधा भी खामोश हो गये। कहने को
शायद अब कुछ ना था। जो देखा उसके बाद मैं और राधा तो पूरी तरह टूट चुके थे। यकीन ही नही हो रहा
था कि हमारा बेटा हमसे इतनी दूर चला गया की जँहा से कभी वापस नही आ सकता।
निधि घर की सफाई नही कर रही थी दरसल वह तो
सिद्धार्थ की तस्वीर को साफ कर रही थी उस तस्वीर
पर माला चढ़ाते हुए उसकी आँखे भर आई थी। और
जब वह पलटकर आगे बढ़ी। तब हमारी नजर उस
तस्वीर पर पडी जिसे देख कुछ कहने या पूछने की
हालत में हम नही थे जो भी कहाँ निधि ने कहा हम तो बस सुने जा रहे थे।
निधि की कभी हिम्मत ना हो सकी के वह हमे आकर
बता सके की सिद्धार्थ हमसे बहुत दूर जा चुका है।
वो सिद्धार्थ के बारे में बताना चाहती थी और चीकू को
हमसे मिलाना भी चाहती थी इसलिए वह पड़ोसी
बनकर यहां रहने आई। चीकू को रोज राधा से मिलने
निधि ही भेजा करती थी। ताकि चीकू हमारे करीब आ
सके। हमारे साथ घुलमिल सके। निधि को डर था कि
हम चीकू को अपना मानेंगे या नही। इसीलिए निधि
सीधे हमारे पास नही आई। बल्कि एक पड़ोसी बनकर
यहाँ रहने आई।
निधि की सारी बात सुनने के बाद क्या कहूँ कुछ समझ
ही नही आ रहा था। अपने बेटे को खो देने का गम
मुझे अंदर ही अंदर तोड़े जा रहा था। जब चीकू की ओर मैंने देखा लगा सिद्धार्थ सामने आ गया उसे सीने
से लगा आज एक पिता खूब रोया इतना रोया की जैसे
आज उसकी जिंदगी ही खत्म हो गई हो। आज एक पिता की जिंदगी वाकई खत्म हो चुकी थी जो जिंदा थे वो चीकू के दादाजी थे।
कुछ महीने बीत चुके थे हमारी जिंदगी कुछ बदल चुकी थी। हमारी बेरंग जिंदगी में चीकू ही अपनी मुस्कान से
रंग भरे जा रहा था अब ये मेरा नही चीकू का घर था
जहाँ उसके दादाजी,  उसकी दादी, उसकी माँ और
खुद चीकू रहता था। हम सब साथ थे।
और साथ थी सिद्धार्थ की यादे।






एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE