किरायेदार


मन की ख्वाईश आज पूरी होने जा रही थी तालियों की गड़गड़ाहट सुन खुशी से आँखों मे पानी भर आया प्रतियोगिता के खास गेस्ट के हाथों मुकुन्द की टीम को ट्रॉफी दी जा रही थी की अचानक जो गेस्ट थे वो बाबूजी की आवाज़ में बोलने लगे मुकुन्द , मुकुन्द, मुकुन्द बेटा और मुकुन्द की नींद खुल गई बाबूजी अभी भी ज़ोर - ज़ोर से मुकुन्द को आवाज़ लगा रहे थे जी बाबूजी आ रहा हूँ नींद से जागते ही मुकुन्द बोला। क्रिकेट से अति लगाव के कारण मुकुन्द सपना भी अक्सर क्रिकेट मैच का ही देखता है जिसमें विजेता उसकी टीम ही रहती है और मुकुन्द बहुत खुश लेकिन रोज़ की तरह आज भी मुकुन्द का सुन्दर सपना टूट गया और बाबूजी की आवाज़ ने वास्तविक भोर में मुकुन्द को नींद से जगा ही दिया। अलसाया सा मुकुन्द बिस्तर से उठा और बाबूजी के पास जा पहुँचा थोड़ा खीजते हुए बोला बाबूजी अभी तो 5 ही बजे रहे है दस बजे जाना होता है दुकान ,मैं रोज़ समय पर जाता हूँ ना।  बाबूजी, बाबूजी बनकर थोड़ी कड़क आवाज़ में बोले आज भी समय पर पहुँचो इसलिए ही जल्दी जगाया है तुम्हे। आज 1 तारीख है पता है ना पहले कहाँ जाना है अब मुकुन्द की अलसाई आँखें पूरी तरह खुल गयीं थी और आज्ञाकारी बेटे की तरह जी बाबूजी कहकर मुकुन्द ने अपनी गर्दन हिला दी और रसोईघर ने चला गया बाबूजी के लिए चाय जो बनानी थी रोज़ बेटे के हाथों से बनी चाय ही तो पीते है बाबूजी। परिवार में इन दोनों के अलावा है ही कौन? बस बिरजू काका है जो घर का और बाबूजी का ख्याल रखते है मुकुन्द जब भी दुकान पर होता है तो ये सोचकर उसकी फ़िक्र कम हो जाती है कि काका है ना घर पर वो बाबूजी का ख्याल रख लेंगे। कुछ काम ऐसे होते है जो हमें झंझट भरे लगते है और इसलिए हमें पसन्द भी नही होते ऐसे ही काम में से एक काम मुकुन्द का भी है जो उसे बिल्कुल पसंद नही पर करना उसे ही पड़ता है।मन में थोड़ा चिड़चिड़ाते हुए मुकुन्द तुलसी नगर आ पहुँचा। अक्सर जब उस जगह लौटते है जहाँ कभी हम रहा करते थे तो जाने कितनी यादें हमारे पीछे दौड़ आती है और एक - एक कर बीते वक्त की बातें याद दिलाती है जैसे कि मानो दिमाग कोई टेप हो और उसमें लगी यादों की कैसेट हर एक कदम के साथ रिवाइंड होती जा रही हो। वैसे मुकुन्द ने अपना बचपन ही यहाँ के दोस्तों के साथ खेलकर बिताया है क्योंकि बारहवीं पास करने के बाद मुकुन्द विजय कॉलोनी अपने नये घर जा पहुँचा था। मुक्कू अरे ओह मुक्कू जी विक्रम चाचा, कैसे हो भई और तुम्हारे बाबूजी कैसे है सब बढ़िया है और बाबूजी भी ठीक है बड़े बदल गए हो पैर छूकर आशीर्वाद नही लोगे। माफ करना चाचा कहकर मुकुन्द ने झट से पैर छू लिये जीते रहो कहकर चाचा जी ने भी आशीर्वाद दे दिया। इससे पहले की चाचा जी कुछ और बातें करते अच्छा चलता हूँ फिर जल्दी दुकान पर भी पहुँचना है कहकर मुकुन्द अपने घर की ओर बढ़ गया। मुकुन्द जैसे ही घर के बाहर पहुँचा आँगन में खेलते हुए बच्चे तुंरत दौड़कर घर मे जा पहुँचे अपनी मम्मी से कहने की मुकुन्द भईया आये है किराया लेने, बड़े ही होशियार बच्चे है देखते ही पहचान लेते है की कौन किस काम से आया है। मुकुन्द अपने घर को गौर से देख रहा था बाबूजी ने इस दो मंजिला मकान को इस तरह बनवाया था कि नीचे वाले हिस्से में दो अलग - अलग किरायेदार को रखा जा सके और ऊपर वाले हिस्से में वो अपने परिवार के साथ रह सके लेकिन नए घर में शिफ्ट हो जाने पर उन्होंने ऊपर वाले फ्लोर को भी दो हिस्सों में कर दिया ताकि ऊपर भी दो किरायेदार रह सके। मुकुन्द को किरायेदारों से किराया लेने आना बिल्कुल भी अच्छा नही लगता क्योंकि कुछ किराएदार तारीख पर किराया देते ही नही बल्कि उसकी जगह कई सारे बहाने सुना देते है अब तो मुकुन्द को भी सब अच्छी तरह रट गया है कि कौन क्या कहने वाला है या क्या बहाना देने वाला है। वैसे पहले किराया लेने बाबूजी ही आया करते थे और कोई भी उन्हें किसी तरह का बहाना नही दे पाता था पर जब से उनके घुटनों में दर्द शुरू हुआ है तब से मुकुन्द को ही आना पड़ता है अब सीधे - साधे मुकुन्द को बाबूजी की तरह रुआब से खड़े होकर कड़क आवाज़ में बात करना कहाँ आता है इसलिए किरायेदारों को भी मुकुन्द को देखकर कोई फिक्र नही होती। आँगन में खड़े 5 मिनट से ज्यादा हो गये थे पर न तो वर्मा जी और ना ही प्रकाश जी कोई भी घर से बाहर नही आये ये देखते हुए मुकुन्द को आवाज़ लगाना ही पड़ा वर्मा अंकल , प्रकाश  जी दो मिनट बाद मुस्कुराते हुए वर्मा अंकल बाहर आये अरे मुकुन्द आओ बैठो जी नही शुक्रिया आप बस किराया देदें मैं ज़रा जल्दी में हूँ बेटा वो तो इस बार थोड़ा लेट हो जायेगा क्यों ? इस बार भी आपके यहाँ किसी की शादी थी मुकुन्द ने पूछा। किसी बहुत ही समझदार और चतुर व्यक्ति की तरह वर्मा अंकल फिर मुस्कुराये और बोले नही बेटा वो क्या है कि मेरे गाँव वाले चाचा जी की तबियत खराब हो गई थी तो वहाँ जाना पड़ा पर तुम फिक्र मत करो 10 या 15 तारीख तक मे खुद आकर किराया दे दूँगा वैसे भी 10 तारीख से पहले आप किराया देते ही कब है मुकुन्द बोला। वर्मा अंकल और मुकुन्द की आवाज़ सुन किरायेदार प्रकाश की पत्नी भी बाहर आ गई। मुकुन्द किराया माँगे उससे पहले प्रकाश की पत्नी बोल पड़ी भईया वो तो घर पर नही है और उन्हें तनख्वाह तो लेट ही मिलती है पर जब वो शाम को आयेंगे तो मैं बता दूँगी उन्हें की आप आये थे प्रकाश की पत्नी बड़ी ही सीधी - साधी है तीन साल पहले जब दोनों यहाँ रहने आये थे तब प्रकाश ने अपनी पत्नी को समझाया था कि मुकुन्द अगर किराया लेने आये तो क्या कहना है बस तब से प्रकाश की पत्नी ये एक ही डायलॉग रिपीट किये जा रही है और मुकुन्द सुने जा रहा है और हर बार की तरह मुकुन्द भी यही कहता है ठीक है प्रकाश जी से कहना घर आकर किराया दे जायें। मुकुन्द अगर गुस्से में दो- चार बातें कहना भी चाहे तो प्रकाश की पत्नी का घबराया सहमा सा चेहरा देख बेचारा कुछ नही कहता क्योंकि मुकुन्द को देख वो ऐसे डर जाती है जैसे कोई थानेदार हो जो प्रकाश को पकड़ ले जायेगा। बस जब प्रकाश किराया देने जाता है तो मुकुन्द उसे ही दो - तीन बातें सुना देता है जिसका असर प्रकाश पर किसी तिनके जितना भी नही होता। नीचे वाले कितायेदारों ने अपने नियम पर चलते हुए इस बार भी तारीख पर किराया नही दिया अब ये ऊपर वाले जाने क्या करेंगे किराया देंगे या ये भी तारीख आगे सरका देंगे सोचते हुए मुकुन्द सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। मुकुन्द जब ऊपर पहुँचा तो कमला आंटी पहले से ही दरवाजे के पास खड़ी हुईं थी और बिना माँगे उन्होंने किराये के पैसे दे दिये कमला आँटी पिछले 7 साल से अपने दोनों बेटों के साथ यहाँ रह रही है अब तो बड़ा बेटा विनीत भी नौकरी करने लगा है आँटी बस आप ही है जो हमेशा समय पर किराया देती है मुकुन्द बोला। किराया मिल जाने पर मुकुन्द की निराश हो चुकी आंखों में थोड़ी चमक दिखाई दी ठीक वैसी ही जैसी दिनभर दुकान पर एक भी कस्टमर न आने के बाद अचानक शाम को किसी कस्टमर के आ जाने पर होती है।अब बस नये किरदार और रह गए है दो महीने पहले ही तो आये है। क्योंकि दो महीने का तो एडवांस लेते है तो इस तरह से ये मेरा पहली बार ही होगा नये किरायेदार के यहाँ जाना चलो इन्हें भी देख लेते है ये किस प्रकार के है। दरवाजा तो खुला दिख रहा है पर कोई दिखाई नही दे रहा। शुक्ला अंकल ,कोई है घर मे मुकुन्द ने आवाज लगाई। सलवार सूट पहने कन्धों पर लाल चुन्नी डाले एक लड़की दरवाज़े पर आई अपनी पलकों को झपकाते हुए बोली जी कहिये मुकुन्द ने उसकी की ओर देखा  लड़की नेे बालों का जुड़ा बनाया हुआ था और अपनी भूरी आँखों को बड़ा कर वो मुकुन्द को घूर रही थी। उसे इस तरह खुद को घूरते देख मुकुन्द की तो आवाज़ जैसे गले मे ही अटक गई ज़नाब कुछ बोल ही नही पा रहे थे लग रहा था जैसे मुकुन्द किरायेदार हो और वो लड़की मकान मालिक ।आपको किससे मिलना है लड़की ने दोबारा पूछा। जी ,कहते हुए मुकुन्द ज़रा होश में आया जी शुक्ला अंकल है घर पर, मैं घर का किराया लेने आया हूँ। उसने फिर मुकुन्द को घूरा और पूछा आप मुकुन्द जी है,  हाँ मुकन्द ने कहा। वो तो ऑफ़िस चले गये पर शाम को लौटते वक्त आपकी दुकान पर जाने का कह रहे थे अच्छा मुकुन्द बोला। ठीक है वैसे आप कौन मुकुन्द का सवाल पूरा होने के पहले वो बोल पड़ी मैं उनकी बेटी हूँ।ओह! मुुकुन्द हल्का सा मुस्कुराते हुए बोला और चला गया। मुकुन्द का ध्यान जाने आज कहाँ था कस्टमर ने माँगी कोई और बुक थी पर मुकुन्द ने उसे प्रतियोगी परीक्षा की बुक उठाकर देदी। विनोद जोकि मुकुन्द की शॉप पर हेल्पर का काम करता है वो मुकुन्द को देख चिंतित हो रहा था कि आज भईया कहाँ खोए से है वो तब और भी हैरत में पड़ गया जब उसने मुकुन्द भईया को एक किताब पढ़ते देखा वरना इतने वक्त से रोज़ किताबो के बीच है कितनी किताबें बेंचते है कितनी किताबें कस्टमर के कहने पर ऑर्डर करके बुलवाते है पर कभी भईया ने किसी भी किताब को खोलकर दो लाइन भी न पढ़ी होगी आज क्या?  हो गया। 

 रात को घड़ी की सूई धीरे चल रही थी या मुकुन्द की नींद उड़ गई थी कुछ समझ नही आ रहा था वो जब भी आँखें बंद करता तो झट से उसकी आँखें खुल जातीं मानो आँखें बंद करते ही कोई भूत नज़र आ गया हो। आखिर क्या है जो मुकुन्द को परेशान कर रहा है।मुकुन्द की परेशानी जानने के लिए सब कुछ रिवाइंड करना होगा हाँ समस्या यही से शुरू हुई सुबह जब मुकुन्द शुक्ला जी की बेटी से बात कर जाने लगा तो चलते हुए उसके कदम कुछ धीमे पड़ गये मुड़कर देखा था उसने दरवाज़े की तरफ़ और मुड़ते ही मुकुन्द की काली आँखें भूरी आँखों से जा टकराई जिसका गहरा प्रभाव सीधा मुकुन्द के दिल पर हुआ लगा जैसे पहली ही बोल में कोई नया खिलाड़ी आउट हो गया।मुकुन्द के यूँ पलटकर देखने पर दरवाज़े पर खड़ी शुक्ला जी की बेटी थोड़ा सा मुस्कुरा दी। अब वो मुस्कुराई लेकिन मुकुन्द के लिए जैसे कोई आफत सी लाई क्योंकि ऐसा पहली बार जो हुआ मुकुन्द के साथ कि उसकी नजरें किसी से इस तरह टकराई और उसके पलटने पर लड़की मुस्कुराई। मुकुन्द घबरा गया और जल्दी से दुकान पर आ गया।दिनभर मुकुन्द बेचैन सा रहा मन मे होती हलचल वो समझ नही पा रहा था जाने क्यों ख़्याल भूरी आँखों का ही आ रहा था। तभी तो मुकुन्द ने आज पहली बार किताब उठाई ये सोचकर कि मन बहल जाएगा पर ऐसा हो नही पाया नींद लाने लिए जब भी मुकुन्द आँखें बंद करता तो बार- बार उसे वो भूरी आँखें ही दिखाई पड़ती। बेचारा मुकुन्द बड़ा परेशान हो गया ये सोचकर कि आख़िर उसे क्या हो गया। गया  था घर का किराया लेने जोकि मिल नही पाया उल्टा भोला - भाला सा दिल था वो भी शायद किराये पर दे आया।  

अब तो मुकुन्द ने सोच लिया है कि भले ही तारीख़ 1 की जगह 10 हो जाये पर अब वो कभी न दोबारा किराया लेने शुक्ला जी के घर जाये।

No comments:

Post a Comment

एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE