कभी - कभी




        कभी - कभी जाने क्यों कुछ अजीब लगता है
        कभी सब सही तो , कभी गलत लगता है।
        कभी सब अपना तो, कभी पराया लगता है।
        कभी अच्छा तो , कभी सब बेकार लगता है।
        कभी कोई पास तो , कभी दूर लगता है।
        कभी जाना कोई तो , कोई अनजाना सा लगता है।
        कभी सब सच तो , कभी सब झूठ लगता है।
        कभी मुश्किल कुछ तो , कुछ आसान लगता है।
        कभी कोई खुश तो , कोई कभी नाराज़ सा लगता है।
        कभी मन उत्साहित तो , कभी हताश लगता है।
        कभी दिन नया तो , कभी वही पुराना सा लगता है।
        कभी कुछ भागता हुआ तो , कभी ठहरा सा लगता है।
        कभी जैसे कैद तो , कभी आजाद सा लगता है।
        कभी हर पल ख़ुशनुमा तो , कभी उदास लगता है।
        कभी - कभी जाने क्यों कुछ अजीब लगता है।
       
        

माफ़ी



सूरज ढल गया था शाम धीरे- धीरे गहरा रही थी तेज रफ़्तार से दौड़ती मेरी कार में एफ एम रेडियो ऑन था एक के बाद एक लेटिस्ट सॉन्ग चल रहे थे मैं सॉन्ग सुन तो रहा था पर शायद ज्यादा ध्यान से नही इसलिए बार- बार चेनल बदले जा रहा था लेकिन इस बार मैंने गाना नही बदला 'तन्हा दिल तन्हा सफर ढूंढे तुझे फिर क्यों नजर' रेडियो पर चल रहे इस गाने को सुनना मुझे अच्छा लग रहा था ऐसा लग रहा था जैसे की ये सॉन्ग मेरे लिए ही प्ले किया हो। मैंने अपनी गाड़ी की रफ़्तार जरा कम कर ली इस गाने के साथ मेरा मन भी कहीं खोने लगा ख्यालों की कुछ धुंधली परछाइयाँ मुझे भी हल्की- हल्की नजर आ रही थी और फिर अचानक एक पल में ही सब गायब सा हो गया साथ ही रेडियो पर दूसरा गाना शुरू हो गया मैंने रेडियो ऑफ कर दिया। वैसे मैं लेक के करीब पहुँच ही गया था सड़क किनारे अपनी गाड़ी लगाकर मैं भी सब की तरह इस सुंदर डिजाइन किए हुए फुटपाथ पर आकर खड़ा हो गया
कुछ लोग वॉक कर रखे थे तो कुछ सेल्फी ले रहे थे। ज्यादातर यहाँ भीड़ रहती है पर अभी थोड़ी कम है ये झील बहुत गहरी और बहुत बड़ी है जितनी दूर तक नजर दौड़ाता हूँ उतनी ही दूर तक ये नजर आती है शाम के समय ये खामोश सी लगती है पानी भी जैसे ठहरा हुआ सा है मेरी तरह। कुछ देर खड़े रहकर झील को निहारने के बाद मैं पास रखी बैंच पर जा बैठा
अपना मोबाइल निकाला फिर उसे कॉल किया आज भी रिंग बज बजकर बन्द हो गई रोज की तरह आज भी उसने फोन नही उठाया। वो बिल्कुल सही है आखिर क्यों उठाये वो मेरा फोन ,क्यों करे मुझसे कोई भी बात।
क्या मैंने उसकी कोई बात सुनी थी एक पल के लिए भी नही सोचा और बस सुना दिया था अपना फैसला। उसकी भीगती पलके सिसकती आवाज टूटता दिल कुछ नजर नही आ रहा था मुझे। इतना ज्यादा गुस्सा इतनी ज्यादा नाराज़गी थी कि मैं उसकी ओर देख भी नही रहा था बस बेरुखी से कह दिया चली जाओ।
उस दिन किसी बेवकूफ की तरह कोर्ट में बैठे हुए मैं आस्था का इंतजार करता रहा शाम के 5 बज गए थे पर आस्था नही आई। बहुत गुस्सा आया था मुझे उस पर।
5 जनवरी की तारीख मिली थी हमे, आखिरकार वो दिन आ गया था जिसका मैं इतने वक्त से इंतजार कर रहा था ऑफिस गया तो था पर लंच से पहले ही अपना जरूरी काम पूरा कर बाय विजय बस विजय से इतना कहा और अपनी कार में बैठकर कोर्ट के लिए निकल गया। 11 से 1 बज गये और 1 से 4 आस्था नही आई मैं बार- बार उसे कॉल करता रहा प्लीज़ फोन उठाओ प्लीज़ पर उसने फोन नही उठाया। कोर्ट बन्द हो गया मैं घर के लिए निकल गया। झूठी निकली वो विश्वास करना ही नही चाहिए था मुझे उस पर मन ही मन आस्था के दिये धोके पर न जाने क्या - क्या सोच रहा था।
घर पहुंचते ही मैं सीधे अपने बेडरूम में गया आस्था बैठी हुई थी क्यों नही आयीं तुम मैं वहां तुम्हारा इंतजार करता रहा बार- बार तुम्हे फोन भी लगाया मैंने तुम पर विश्वास किया और तुमने, क्यों किया ऐसा मैं गुस्से में चिल्लाये जा रहा था पर आस्था ने कोई जवाब नही दिया। पांच दिनों तक हमारे बीच खामोशी पसरी रही मैं इतना नाराज था कि उसके कुछ कहने पर भी मैं उसका कोई जवाब नही दे रहा था हर वक्त आस्था को देखकर बस गुस्सा आ रहा था और बर्दाश नही हो रहा था मुझसे , नही सम्हाला जा रहा मुझसे मेरा गुस्सा मेरी नाराज़गी इसलिए शाम को मैंने आस्था को कह दिया चली जाओ इस घर से और मेरी लाइफ वो चली गई।कोई अफसोस नही हो रहा तब मुझे उसके चले जाने का।
चलो भई अब रात होने लगी है मेरे पास बैठे शख्स ने अपनी फैमिली से कहा तो मैं अपने कल से बाहर आ गया। घर आकर सुबह की तरह मैं अपने मोबाइल स्क्रीन पर फिर आज की डेट देखने लगा क्या आस्था भी देख रही होगी आज की तारीख। आज हमारी शादी को 6 महीने हो गए है। मुझे याद है कैसे मैं उससे रूढली बिहेव कर रहा था नही करना चाहता था मैं ये शादी , मेरे पापा की मुझ पर धोपी हुई मर्ज़ी थी ये। आस्था मुझसे बात करने की कोशिश करती और मैं उससे दूर भागता रहता मुझे नही पसन्द थी आस्था। क्योंकि मैं तो अपनी कलीग नित्या को लाइक करता था स्मार्ट इंटेलिजेंट खूबसूरत। पर मेरे प्रमोशन की वजह से मुझे जयपुर आना पड़ा और साथ मे आस्था को भी लाना पड़ा खैर अब आस्था सब जान गई थी। उसने दोस्ती का हाथ बढ़ाया और मुझे भरोसा दिलाया कि उसकी वजह से मुझे कोई प्रॉब्लम नही होगी। धीरे - धीरे मुझे भी आस्था अच्छी लगने लगी पर एक दोस्त की तरह। हम दोनों एक अच्छे दोस्त बनकर ही तो साथ रहे थे इतने दिन।एक दिन जब आस्था फ्लॉवर पॉट के फ्लॉवर बदल रही थी तब मैं भी उसकी हेल्प करते हुए उससे बातें करने लगा कुछ कहना है आस्था ने कहा वो समझ गई थी कि मैं कुछ कहना चाहता हूं मैंने थोड़े धीमे लफ़्ज़ों में कहा हाँ वो 5 जनवरी को तुम्हे कोर्ट आना पड़ेगा हम दोनों को साइन करना होगा ना। आस्था ने मुस्कुराते हुए हाँ कह दिया और मैं खुश हो गया। मुझे आस्था पर पूरा भरोसा था कि वो कोर्ट जरूर आएगी पर ऐसा हुआ नही।उस दिन सुबह जब आस्था घर छोड़कर जा रही थी तब वो मुझे कुछ कहना चाहती थी पर मैं इतना नाराज था कि मैं उसकी कोई बात सुनने को राज़ी नही था उसकी आँखे भीगी थी शायद इसलिए कि हमारे बीच जो दोस्ती का रिश्ता बना था अब वो भी नही रहा था। वो जा चुकी थी और मैं अब अकेला था। मुझे नही पता था कि मेरी कौन सी चीज़ कहाँ रखी है मैं कबर्ड में अपनी शर्ट ढूंढ रहा था तब मेरे हाथ एक बहुत खूबसूरत कार्ड लगा मैंने खोलकर पढ़ा
"रिश्ता हमसफ़र का है पर वो मेरा दोस्त बना है।
मेरा दिल कहता है क्या ये उसने कभी नही सुना है।"
कार्ड में नीचे की तरफ बहुत खूबसूरती से सजाते हुए पार्थ लिखा हुआ था मैं पढ़कर परेशान हो गया क्या मतलब है इसका। थोड़ा घबरा सा गया था मैं कहीं , इसलिए मैंने दोबारा उसे पढ़ा इस वक्त मुझे जो समझ आ रहा था वही सच था आस्था मुझे चाहने लगी थी ये मुझे कभी पता ही नही चला क्योंकि उसने मुझे पता चलने ही नही दिया और मैंने भी शायद कभी देखने की कोशिश ही नही की। शी लव्स मी। इसलिए तो वो उस दिन कोर्ट नही आई क्योंकि वो मुझसे अलग नही होना चाहती थी नही देना चाहती थी मुझे डिवॉर्स। वो जानती थी कि अगर तलाक हो गया तो हम हमेशा के लिये अलग हो जायेंगे। जानबूझकर न सही पर मैंने उसका दिल तोड़ा है मैं ये नही समझ पाया कि सब जानते हुए भी कैसे वो मुझे चाहने लगी लेकिन ये जरूर समझ गया कि कितना मुश्किल रहा होगा उसके लिए जब मैंने उसे डिवोर्स के लिए कोर्ट बुलाया था हम जिसे चाहते है उससे दूर होना आसान नही होता उसने जरूर कोशिश की होगी उस दिन आने की पर दिल के आगे हार गई होगी। मैं नासमझ निकला वो इतने कम समय में मुझे कितना समझने लगी थी और मैं कुछ भी न समझा साथ रहते हुए भी मैं उसकी आँखें भी न पढ़ सका वो आँखें जिनमे शायद मेरा ही चेहरा था आस्था के चले जाने के बाद मुझे एक बात अच्छी तरह समझ आ गई कि मैं नित्या को लाइक जरूर करता था पर प्यार नही।
मैं ये नही बता सकता कि मैं अभी आस्था को लेकर क्या सोचता हूँ क्या महसूस करता हूँ क्योंकि मैं खुद भी नही जानता पर मैं चाहता हूं कि आस्था वापस आ जाये।
आज ऑफिस जाने से पहले मैंने फिर उसे कॉल किया फिर  मोबाइल रिंग बस बजे जा रही थी निराश होकर मैं फोन कट करने लगा पर कॉल रिसीव हो गया हैलो आस्था सामने से कोई जवाब नही आया आय नो तुम मुझे सुन रही हो
सॉरी मैंने तुम पर इतना गुस्सा किया उसके लिए और एक दोस्त होकर भी तुम्हें समझ न सका उसके लिए भी।
मुझे नही पता कि एक हसबैंड चाहता है के नही की उसकी वाईफ लौट आये पर पार्थ जरूर चाहता है कि उसकी दोस्त वापस आ जाये वो कोशिश करना चाहता है एक नए रिश्ते मैं आगे बढ़ने की किसी के साथ चलने की पर उसके लिए उसकी दोस्त का लौट आना जरूरी है आओगी ना।








तेरे मेरे रास्ते



गाड़ी न छूट जाए इसलिए मैंने टैक्सी वाले भईया को गाड़ी जरा तेज चलाने को कहा हम टाइम पर स्टेशन पहुंच गए थे प्लेटफॉर्म की तरफ जाते हुए मेरे कदम जितने तेज थे मनस्वी के उतने ही धीमे। प्लेटफॉर्म नम्बर 3 पर ट्रेन आने वाली थी
इसलिए हम वही बैंच पर जा बैठे और ट्रेन का इंतजार करने लगे। कुछ देर में पता चला कि यमुना एक्सप्रेस 20 मिनिट की देरी से आएगी। मैं बैंच से पीछे टिक्कर बैठ गया मनस्वी मुझे एक टक देखे जा रही थी मैं जानता था पर मैंने मनस्वी की नजर से नजर नही मिलाई। क्योंकि अगर नजर मिलाता तो भावुक हो जाता और शायद खुद को सम्हाल न पाता। नाराज़ हो नही तो मनस्वी ने पूछा तो मैंने उत्तर देते हुए कहा। मैं और मनस्वी अभी कितने पास बैठे हुए थे पर फिर भी हमारे बीच दूरी थी वो दूरी जो धीरे - धीरे हमारे बीच आ गई और हम समझ भी नही सके।
आज हम दोनों जैसे खामोश है ऐसे हमेशा नही रहते थे एक वक्त वो भी था जब इंगेजमेंट के बाद फोन पर घन्टो हम बातें किया करते थे और कभी - कभी इस फोन की वजह से हमारे बीच मीठी नोकझोंक भी हो जाती। मेरा कॉल क्यों रिजीव नही किया तुमने मैं बिज़ी थी यार अच्छा मुझ से ज्यादा इम्पोर्टेन्ट काम था तुम्हे मतलब मेरी कोई फिक्र नही तब मनस्वी नाराज़ होते हुए कहती हाँ नही है बस और फिर मैं ज़ोर से हसने लगता। तब हमें एक - दूसरे की बातें बुरी नही लगती थी। शादी के बाद भी सब कुछ ठीक ही तो था।
मुझे ब्लैक कलर कभी पसन्द नही था पर जब मनस्वी मेरे लिए बड़े प्यार से ब्लैक कलर की शर्ट लाई तो मैंने उसे पहना मनस्वी के लिए और मनस्वी को भी कुकिंग कुछ खास पसन्द नही लेकिन फिर भी मुझे खुश करने के लिए उसने मेरी फेवरेट गुजिया बनाई हाँ गुजिया बनाने में उसे बड़ी परेशानी हुई पर उसने कोशिश की। शुरुआती दिनों में हमारा रिश्ता उतना ही खूबसूरत था जितना की आसमान में चमकता हुआ चाँद। जब कभी मैं अपना लेपटॉप लिए ऑफिस का कोई काम करता तो मनस्वी मुझे खूब तंग करती कभी मेरे सामने आकर मुस्काती , गाने गाती तो कभी होले- होले अपनी उंगलियों को मेरे हाथों पे चलाती।पर इसका बदला मैं भी उससे ले लेता था जब वो अपने किसी काम में बिज़ी होती या माँ के साथ किचन में होती तब मैं भी उसे परेशान करता कभी फूल फेंककर उसकी पीठ पर मारते हुए उसे छेड़ता तो कभी बेवजह ही चिल्लाता मेरे मोबाइल का चार्जर कहाँ है मिल नही रहा मनस्वी मनस्वी और जब मनस्वी आती तो मैं झट से उसका हाथ पकड़कर उसे अपनी ओर खींच लेता उसकी जुल्फों को सहलाते हुए उसकी तारीफ में प्यार भरी शायरी सुनाता तो कभी उसका हाथ पकड़ उसके साथ नाचने लगता जैसे कि सारा प्यार अभी ही उमड़ रहा हो। वो समझ जाती की मैं उसे जानबूझकर परेशान कर रहा हूँ इसलिए पहले मुस्कुराती और फिर हाथ छुड़ाकर इतराते हुए चली जाती।
प्यार ऐसा ही होता है शरारती मीठा - मीठा सा।
एक बार मनस्वी और मैं छत पर तारे देख रहे थे अच्छा लगता था मनस्वी को तारे देखना। उसके साथ - साथ मैं भी तारों को बड़े गौर से देखने लगा हम भी इन तारों की तरह हमेशा साथ रहेंगे मैंने पूछा तो मनस्वी ने मेरा हाथ थामते हुए हाँ में सिर हिला दिया।
मुझे कुछ आवाज सी आई देखा तो मनस्वी बैग से कुछ निकाल रही थी मैंने यहाँ - वहाँ देखा और फिर अपने मोबाइल में टाइम देखा तो 2 बजकर 15 मिनिट हो रहे थे बस पांच मिनिट और इंतजार करना था ट्रेन के आने का।
जब वक्त आगे बढ़ता है तो थोड़े बदलाव भी आते है हमारी शादी को 6 महीने से ज्यादा समय हो गया था। पहले हम एक - दूसरे की कुछ आदतों को ही जानते थे पर अब हर एक आदत से वाकिफ हो गए थे। हमारी आदतें ही थी जो एक- दूसरे को खटकने लगी थी। मुझे सुबह का सूरज देखना अच्छा लगता था इसलिए सुबह जल्दी उठकर खिड़कियाँ खोल दिया करता था ताकि उसकी रोशनी मुझ पर पड़े पर मनस्वी इस बात से नाराज़ होने लगी थी क्योंकि रोशनी की वजह उसकी नींद खराब हो जाती थी। मैं जानता था कि मनस्वी को कुकिंग में इंट्रेस्ट नही है पर मैं उससे उमीद करने लगा था कि वो भी माँ की तरह मेरे लिए मेरी पसन्द का खाना बनाये। एक बार घर मैं एक फैमली फंक्शन था मैं मनस्वी के लिए एक साड़ी लाया था हमारे बहुत से रिश्तेदार आज आने वाले थे इसलिए मैं चाहता था कि मनस्वी यही साड़ी पहने पर उसने मेरी बात नही मानी और जब उसने मेरी बात नही मानी तो गुस्से में मैं भी कल देर से आया मुझे पता था कि मनस्वी की फ्रेंड ने हमे डिनर के लिए इनवाइट किया है पर मैं फिर भी देर से घर पहुंचा मनस्वी नाराज हुई।
उसकी आदत गुस्से में चिल्लाने की थी और मेरी आदत गुस्से में खामोश हो जाने की। एक तरफ अब हमारी जिम्मेदारियां बढ़ने लगी थी मनस्वी पर घर की और मुझ पर मेरे काम की और साथ ही हमारे रिश्तें जो हम से जुड़े हुए है उनके लिए भी हमारे कुछ फ़र्ज कुछ जिम्मेदारियां थी उनकी ओर भी हमे ध्यान देना था। दूसरी तरफ हम दोनों की मेल न खाती आदतें जो पहले इतनी बड़ी प्रॉब्लम नही थी जितनी अब हो गई थी मनस्वी अब हर बात पर चिड़ने लगी थी शायद इसलिए कि सब कुछ पहले जैसा क्यों नही मैंने कहा भी हमेशा सब कुछ एक जैसा नही रह सकता बदलाव आते है। ये बात मैं समझ गया था।
अब पहले की तरह मैं उसकी हर बात का ख्याल नही रख पाता और न ही पहले की तरह हर रोज़ एक गुलाब लाता हुँ जो पहले लाकर मैं उसे दिया करता था और कहता था माय स्पेशल माय लाइफ। क्योंकि मैं भूल जाता हूँ और कभी इतना बीज़ी हो जाता हूँ कि घर भी लेट ही पहुँचता हुँ। लेकिन इसका मतलब ये नही कि अब वो प्यार नही, प्यार है पर सिर्फ प्यार ही नही हमे हमारे रिश्ते में समझदार भी होना पड़ता है।
मुझे पता है की जब बदलाव होता है तो हमारे लिए उसे एक्सेप्ट करना थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन सभी की जिंदगी में बदलाव आते ही है और हमे उसे समझना पड़ता है।
कल जब घर आया तो मनस्वी नाराज़ सी नजर आई पहले तो मैंने कोशिश की के न पूछूं पर खुदको रोक न सका क्या हुआ तुम ऐसे चुप क्यों बैठी हो , कुछ पहले जैसा नही है मेरी लाइफ पूरी बदल गई है मैं बिल्कुल भी खुश नही हुँ मैं ऐसे नही रह सकती ये कहकर वो रोने लगी। मैं क्या कहता इस वक्त कुछ कहना समझाना या समझना सब बेबुनियाद सा लग रहा था। मनस्वी को लगता है कि उसकी लाइफ बदल गई क्यों क्या मेरी लाइफ पहले जैसे है अगर वो पत्नी बनी तो मैं भी तो पति बना उसकी जिम्मेदारियां बढ़ी तो क्या मेरी नही बढ़ी।
मुझे भी आदत नही थी किसी के साथ अपना रूम शेयर करनी की लेकिन जब मनस्वी आई और उसने अपने हिसाब से रूम डेकोरेट किया तब मैंने तो कुछ नही कहा जबकि जो पेंट उसने वॉल पर कराया वो मुझे खास पसन्द नही था। जब रिश्ता जुड़ता है हम साथ रहते है तो हमे एक - दूजे की आदतों को भी एक्सेप्ट करना होता है अपनी आदतों को बदल दे ये जरूरी नही है पर कुछ नई आदतों को अपना लें तो उसमें कोई बुराई भी नही है ये सिर्फ मेरा मानना है सब ऐसा सोचे ये जरूरी नही।
मैं और मनस्वी हमारे रिश्ते को सम्हाल न सके हम प्यार तो बहुत करते है एक - दूजे से पर फिर भी साथ चलते हुए हमारे रास्ते आज अलग हो रहे है मनस्वी कुछ दिनों के लिए अपने मायके जा रही है या फिर हमेशा के लिए मैंने उसे रोकने की कोई कोशिश नही की।क्यों नही की पता नही। जब हम एक रास्ते पर साथ चल रहे होते है तो हमारा टकरा जाना स्वभाविक है मगर हाथ छूट जाए तो इसका मतलब ये है कि हाथ कसकर थामा ही नही था
ज़ोर से आवाज करती आ रही ट्रेन ने मुझे मेरे वर्तमान में ला दिया मैं मनस्वी का ट्रोली बैग खिंचते हुए आगे बढ़ा पर मनस्वी बैठी रही मनस्वी उठो ट्रेन जा रही है छूट जाएगी उठो मैं कहता रहा वो नही उठी ट्रेन चली गई मैं मनस्वी के पास जाकर खड़ा हो गया वो गर्दन झुकाये बैठी रही मनस्वी क्या हुआ वो तेजी से उठकर मुझसे लिपट गई उसके आँसुओ से मेरे कंधे की शर्ट गीली हो गई थी मैंने प्यार से कहा माय स्पेशल माय लाइफ।
मनस्वी और मेरे हाथ छुटे नही बस उंगलियां जरा फिसल गईं थी।





एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE