यहां वहां गिरता गुलाल चेहरा तो रंगा ही संग में रंग दिये एक दूजे के बाल क्या हुड़दंड मची हुई है कि क्या कहो बिना भांग पिये ही होली का नशा सभी पर जमकर चढ़ गया है। होली है ही ऐसी की सब कुछ भूलकर बस सभी का एक ही टारगेट होता है कि आज तो मैं ऐसा रंग लगाऊंगा सबको की कई दिनों तक छूटेगा ही नही। ये एक अलग ही जंग होती है सबकि आपस मे की मेरा रंग सबसे ज्यादा पक्का है और मैंने ही सबसे ज्यादा रंग लगाया सबको। ये भी जीत होती है जिसकी बहुत खुशी होती है। यहां सब जोरो शोरो से होली खेल रहे थे अरे नही नही ये रंग मत डालो यार छूटेगा नही। भिगो दिया पूरा मुझे अब मैं बाल्टी भरकर रंग डालूंगा , कहीं किसी के दौड़ने की आवाज तो कहीं जोर - जोर से हँसने की। तरह - तरह की आवाजें उसके कानों में पढ़ रही थी जो छुपकर कमरे में बंद होकर बैठी थी इस डर से की कहीं कोई उस पर भी रंग न डाल दे। रागिनी हमेशा ऐसे ही होली पर खुद को बंदकर बैठ जाती है जिन होली के रंगों से लोग खुदको पूरी तरह रंग लेते है उन रंगों से रागिनी ने खुदको बचा रखा है। उसे न जाने क्यों इन रंगों से डर लगता है।
बचपन मे भी रागिनी अपने भाई - बहनों से भागती फिरती थी वो दोनों जमकर होली खेलते और रागिनी को भी रंग लगाने की कोशिश करते। और रागिनी वो कभी माँ के पीछे छिपती तो कभी दादी के पीछे। और जब से बड़ी हुई तो अपने कमरे में बंद होकर बैठ जाती है। क्या रागिनी का कभी मन नही किया कि वो भी सबके साथ होली खेले। जिस तरह वो चुपके- चुपके खिड़की में से सबको होली खेलते हुए देखती है उससे तो लगता है की थोड़ा बहुत मन तो रागिनी का करता है पर क्या करे रंगों से भी डरता है। और ये मन इसलिए डरता है क्योंकि रागिनी ने कभी गुलाल हाथ मे लेकर उसका एहसास ही नही किया की इनका एहसास कितना प्यारा है न कभी खुदने किसी को रंग लगाया न किसी को खुदको लगाने दिया।
तो पता कैसे चलेगा कि रंग लगाने में क्या मज़ा है।
सच कहूं तो रागिनी ने बेवजह खुदको बांधे रखा है लेकिन कोई है जोकि इस बार रागिनी को रंग लगाने वाला है क्योंकि घर मे और कोई तो रागिनी का गुस्सा सहने नही वाला एक निशांत ही है जोकि पूरी तरह तैयार है उसका गुस्सा सहने के लिए। निशांत रागिनी का बचपन का दोस्त भी है और पड़ोसी भी। कई सालों बाद वो घर वापस लौटा है। निशांत ने रागिनी के भाई- बहन के साथ मिलकर कुछ तिगडम जमाया रागिनी को कैसे भी करके कमरे से बाहर आने को मजबूर कर लिया
रागिनी डरते- डराते जैसे ही बाहर आई तीनो ने मिलकर रागिनी पर ढेर सारा रंग उढेल दिया। रागिनी सिर से लेकर पैर तक पूरी रंग में सराबोर हो गई थी और रागिनी ने फिर खूब गुस्सा किया निशांत चुपचाप खड़े रहकर सुनता रहा और रागिनी जैसे ही चुप हुई उसने मुठी भरकर गुलाल रागिनी पर डाल दिया और कहा अब क्या करोगी। रागिनी को जोर से गुस्सा आ गया और उसने भी पास ही रखा गुलाल का थाल उठाया और पूरा निशांत पर फेक दिया फिर क्या था निशांत ने फिर रागिनी पर रंग डाला तो रागिनी ने भी ढेर सारे रंग से निशांत को रंग दिया। निशांत और रागिनी ने एक दूसरे के पीछे दौड़ लगाना शुरू कर दिया बिल्कुल बचपन की तरह।रागिनी ने बचपन मे निशांत के साथ होली खेली है उस वक्त निशांत ही एक लौता दोस्त था रागिनी का और उसके चले जाने के बाद रागिनी ने होली खेलना बन्द कर दिया था क्योंकि और कोई दोस्त उसका था नही और उसके भाई - बहन तब बहुत ज्यादा छोटे थे। तो बस ऐसे धीरे- धीरे रागिनी रंगों से दूर हो गई। लेकिन निशांत ने आज फिर रागिनी को रंगों के पास ला दिया रागिनी का जो डरा हुआ सा मन था वो गुलाल के लगते ही गुलाबी हो गया। इसलिए तो रागिनी सबके साथ मिलकर होली खेल रही है रागिनी के छोटे भाई- बहन भी खुश है की इतने सालों बाद ही सही रागिनी ने उनके साथ होली खेली तो। फाइनली रागिनी ने देर से ही सही रंगों से खुदको रंग लिया जो कोशिश आज निशांत ने की वो कोशिश अगर पहले किसी ने की होती तो रागिनी इतने वक्त तक रंगों से दूर नही रहती।
रागिनी ने बेवजह अपने मन को इस बात से बाँधे रखा था की उसे होली पसन्द नही है और फिर ये मान भी लिया। लेकिन आज रागिनी ने अपने मन को आजाद कर दिया और ये जान लिया कि होली के रंग सिर्फ तन को ही नही हमारे मन को भी रंगते है। और मन को रंगना बहुत जरूरी है क्योंकि ये हमे खुशी देता है।
कुछ रंग खुशी का , कुछ रंग साथ का
कुछ रंग प्यार का , कुछ रंग इकरार का
कुछ रंग उमंग का , कुछ रंग एहसास का
कुछ रंग चाहत का , कुछ रंग जज़्बात का
कुछ रंग उम्मीदों का, कुछ रंग विश्वास का
कुछ रंग ख्वाइशों का , कुछ रंग तमन्नाओं का
कुछ रंग खुदको भी , ये रंग है गुलाल का।

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