अस्तित्व




सुचित्रा एक टक दीवार पर लगी उस फैमिली फ़ोटो को घूरे जा
रही थी आखिर वो इतने ध्यान से क्या देख रही थी ऐसा लग रहा था जैसे कुछ समझने की कोशिश कर रही थी कुछ ऐसा था जो उसे आज इस तस्वीर में नजर आ गया उसकी आँखों से छलकते आँसू और होंठों पर आती छोटी सी मुस्कान कुछ ऐसा ही इशारा कर रहे थे।
सुचित्रा की शादी को सात साल हो गए है इन सात सालों में उसने अपना हर रिश्ता बहुत अच्छे से निभाया है और हर फर्ज पूरा किया है सबके साथ रहते हुए उसे कभी कोई प्रॉब्लम नही हुई। पर ऐसा होता है कि जब हम सब के लिए जीने लगते है 
तब हम खुद लिए जीना भूल जाते है सुचित्रा के साथ भी ऐसा ही हो रहा था एक पत्नी एक बहु और एक माँ इन सब रिश्तों के बीच सुचित्रा कहीं खोती जा रही है उसकी अपनी ख्वाइशें अपने सपने खुद की पहचान कहीं गुम सी होती जा रही है।
सुचित्रा ने पहले कभी ऐसे नही सोचा था पर जब से उसकी मुलाकात कामिनी से हुई है तब से सुचित्रा के दिमाग मे एक लड़ाई सी चल रही है। कामिनी सुचित्रा की दूर वाली फ्रेंड है
दूर वाली फ्रेंड मतलब वो फ्रेंड जोकि की क्लासमेट थी और उसकी सुचित्रा से थोड़ी बहुत बातचीत होती रहती थी।
कामिनी एक बड़ी सी कम्पनी में अच्छी पोस्ट पर है उसकी लाइफ स्टाइल सुचित्रा की लाइफ स्टाइल से अलग है तो बस जब वो सुचित्रा से मिली तो उसकी बड़ी- बड़ी बातों ने सुचित्रा
को कहीं न कहीं फिक्र में डाल दिया।
और तब से ही सुचित्रा के मन मे कई सवाल उठ रहे थे रोज की तरह सुचित्रा ने आज भी अपनी मम्मी जी के लिए ग्रीन टी बनाई तो पर आज उसका स्वाद अलग था पापाजी को न्यूज़ पेपर भी आज सुचित्रा ने ऐसे ही दे दिया जबकि वो हमेशा पहले सुविचार पढ़कर सुनाती है और फिर न्यूज़ पेपर देती है।
आज सुचित्रा क्यों बदली हुई सी लग रही थी। विक्रम से भी सुचित्रा ने नही पूछा कि आज किसी मीटिंग के लिए जल्दी तो नही जाना है और निधि के भी कोई भी नखरे न सुनते हुए सुचित्रा ने उसे तैयार कर स्कूल पहुँचा दिया। न तो आज सुचित्रा गुनगुनाते दिखी न मुस्कुराते देखी बस दिखी तो खोई सी। जब हमारे अंदर लड़ाई चल रही होती और हम खुद ही खुद से सवाल कर रहे हो तो ये बड़ी दुविधा वाली स्थिति होती है हम सही गलत के बीच उलझ से जाते है। सुचित्रा का मन अभी ऐसे ही उलझ रहा है खुदके खड़े किए सवालों में।
कुछ दिनों तक ऐसे ही चलता रहा। घर वालों को भी सुचित्रा का बर्ताव थोड़ा बदला हुआ सा लग तो रहा था पर उन्होंने ये मानकर तसल्ली कर ली के शायद सुचित्रा की तबियत ठीक नही इसलिए जब सुचित्रा ने आजकल अपने कमरे से बाहर निकलना कम कर दिया तो किसी ने कोई सवाल नही किया।
पर यहाँ एक और सवाल सुचित्रा के सामने आ गया घर वालो में से किसी का उससे कुछ न पूछना उसे ये एहसास दिला रहा था कि शायद किसी को उसकी कोई फिक्र नही।
अब सुचित्रा मन ही मन कई सारी बातें सोचकर दुखी होए जा रही थी। सुचित्रा हॉल में लगी उस फैमिली फोटो को देख रही है जिसमे वो सबके साथ है वो इस वक्त तस्वीर में खुदको ही
देख रही है क्या अस्तित्व है मेरा , क्या पहचान है कोई वजूद है भी के नही , बस खुदको देख यही पूछ रही थी।
दो दिन बाद जब सोसाइटी में महिला दिवस पर कार्यक्रम रखा गया तो उसमें सुचित्रा ने भी एक कविता पढ़ी लेकिन सुचित्रा हैरान तब हुई जब विक्रम ने भी अपने मन की कुछ बातें कही।
 घर की दहलीज़ से लेकर घर के हर एक कोने में बस तुम्हारा
 ही एहसास
 सुबह से लेकर शाम तक सबकी ज़ुबान पर रहता तुम्हारा ही
 तो नाम है
 हमारा अस्तित्व तुम हो , तुम्हारा अस्तित्व हम है
 तुमने ही आकर हम सबको को दी एक नई पहचान है।
 घर का विश्वास हो तुम , तुम ही हम सबका अभिमान हो
 फिर भी न जाने क्यों आज तुम परेशान हो।
विक्रम ने जो कहा उसकी उसकी गहराई किसी को समझ आई हो या नही पर सुचित्रा अच्छी तरह समझ गई थी।
विक्रम को सुनने के बाद सुचित्रा का मन भर आया उसने कार्यक्रम में खुद को सम्हाल लिया पर घर पहुंचकर वो खुदको रोक न सकी और उसकी आँखों से आँसू झलक ही गए।
वो दीवार पर लगी उस तस्वीर में फिर खुदको देख रही है ऐसा लग रहा है जैसे तस्वीर की सुचित्रा आज सामने खड़ी सुचित्रा को उसका अस्तित्व उसका वजूद क्या है ये बता रही है।
ये दृश्य बड़ा ही सुंदर है जहां तस्वीर में पूरा परिवार सुचित्रा के साथ है वही तस्वीर के सामने भी सब सुचित्रा के साथ ही खड़े है।
सुचित्रा के मन के हर एक सवाल का जवाब आज मिल गया है
सब तुम्हे पहचाने ये जरूरी नही तुम जिनके साथ हो वो तुम्हे जाने ये जरूरी है। घर के हर एक हिस्से में सुचित्रा की ही महक है बाहर नेम प्लेट पर नाम भले ही सुचित्रा का न लिखा हो पर घर ये सुचित्रा का ही है।

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