रिश्ता



क्या कोई हमे तभी अच्छा लगता है जब उससे हमारा कोई रिश्ता हो , क्या हम फ़िक्र उसी की करते है जो हमारा कुछ लगता हो। क्या ये जरूरी है कि अगर किसी से हमारा कोई रिश्ता नही है तो हम उसका ख्याल मन में नही ला सकते उसकी परवाह नही कर सकते।
ये सवाल मेरे मन में यूँहीं नही आया है शोभना की कही बातों ने मुझे ये सोचने पर मजबूर कर दिया है। जब किसी का किसी से कोई रिश्ता होता है तब ही कोई किसी की परवाह करता है
मैं नही पर लोग ऐसा ही सोचते है शोभना का ऐसा कहना कहीं न कहीं मेरे लिए एक सवाल की तरह ही था। कि आखिर क्या रिश्ता है मेरा अनन्दिता से।
एक साल पहले मेरा प्रमोशन हुआ और मैं जबलपुर से भोपाल शिफ्ट हो गया। नई जगह नया ऑफिस और नए कलीग्स।
बॉस ने मुझे सबसे इंट्रोड्यूज कराया। मैं कल ही पूरे स्टाफ मैम्बर से मिल चुका था पर कोई एक है जिससे शायद कल मेरी मुलाक़ात नही हुई थी। वो अनन्दिता है जो कल ऑफिस नही आई थी। मैंने जब अनन्दिता को पहली बार देखा तो उसकी छवि मेरी आँखों मे ठहर गई। ऑफिस के सभी लोगो से मुझे अनन्दिता बहुत अलग सी लगी। न बहुत स्टाइलिश न बहुत सिम्पल एक अलग ही रूप है अनन्दिता का, जो शायद मुझे अच्छा लगा। वैसे मेरी अनन्दिता से बात बहुत कम ही होती थी क्योंकि हम दोनों का काम अलग था पर लंच सब साथ में करते है तो इस बहाने मेरी थोड़ी बहुत बातचीत अनन्दिता से हो जाया करती थी। कभी बातों से वो समझदार लगी तो कभी थोड़ी सी नादान।ऑफिस में नीलम ही अनन्दिता की ज्यादा करीबी दोस्त है मैंने जब कभी भी अनन्दिता को नीलम से बात करते देखा है तब मुझे वो बेफिक्र सी नजर आई है। एक अच्छे दोस्त का साथ ऐसा ही होता है।
कुछ वक्त के लिए ही सही हमे बेफ़िक्र कर देता है।
हम ऑफिस मेंबर्स की हर वीक बॉस के साथ मीटिंग जरूर होती है इस बार की मीटिंग में बॉस ने सभी को अलग- अलग सब्जेक्ट्स पर प्रजेंटेशन तैयार करने को दी है। ये पहली बार हुआ की अनन्दिता मुझसे हेल्प लेने आई मैं तब मीटिंग के बाद अपने कदम केबिन की ओर बढ़ा रहा था कि अनन्दिता ने मुझे रोकते हुए कहा विक्रांत सर मुझे आपकी हेल्प चाहिए।
आप मेरी हेल्प करेंगे ये पूछते वक्त अनन्दिता की आँखे कितनी मासूस सी लग रही थी मैंने कुछ पूछा नही बस फ़ौरन ओके कह दिया।
दरसल अनन्दिता को अपनी प्रजेंटेशन तैयार करने में मेरी मदद चाहिए थी मेरा वर्क एक्सपीरियंस ज्यादा है और अनन्दिता को साल भर भी नही हुआ ऑफिस जोइन किये
बस यही सोचकर अनन्दिता ने मुझसे हेल्प ली क्योंकि वो अपने काम को बेहतर से बेहतर करना चाहती थी।
इसी दौरान मैंने जाना कि अनन्दिता बहुत ऑनिस्ट और मेहनती भी है मैं अपने लेपटॉप पर हमारे वर्क से रिलेटिड
एक - एक पॉइंट को समझाता गया और अनन्दिता ध्यान से सब समझती गई वो कितना समझ पाई ये तो प्रजेंटेशन के वक्त ही पता चलेगा।
सारे ऑफिस मेम्बर्स मीटिंग रूम में आकर बैठ गए थे और बॉस का वेट कर रहे थे कुछ मिनिट बाद बॉस आये और प्रजेंटेशन स्टार्ट हुई अनुज के बाद अनन्दिता आई अभी उसने सबसे पहले मेरे और नीलम की ओर देखा तो हम दोनों
ने ही उसे इशारे में ऑल द बेस्ट कहा। उस वक्त मुझे नही पता था कि मेरी नजर भले ही सामने थी पर शायद एक दो नजरें मुझ पर भी थी। अनन्दिता की प्रेजेंटेशन अच्छी रही जिसके लिए उसने मुझे बाद में बड़े ही सौम्य तरीके से थैंक्यू कहा।
अब ऐसा नही था कि हमारे बीच कोई बहुत अच्छी दोस्ती हो गई या अनन्दिता बहुत फ्रेंक हो गई थी अभी भी पहले जैसे ही लंच में थोड़ी बहुत बातचीत होती थी वो भी अपने वर्क से रिलेटिड। बस इतना जरूर था कि एक - दूसरे को देखकर एक छोटी सी स्माइल जरूर कर देते थे हेलो या गुड मॉर्निंग के तौर पर।
दो - चार दिनों से अनन्दिता ऑफिस में नजर नही आई नीलम से पता चला कि वो बीमार है और उसने एक सप्ताह की छुट्टी ली हुई है ये सुनकर मुझे बहुत ज्यादा तो नही पर थोड़ी सी फिक्र अनंदिता की जरूर हुई। एक सप्ताह बाद जब अनन्दिता ऑफिस आई तो उसके नजर आते ही मैंने पूछ लिया आर यू ओके अनन्दिता, अपनी पलकों को झपकाकर और सिर को हिलाकर बड़ी ही नापी- तोली हुई मुस्कुराहट के साथ अनन्दिता ने हाँ कहा। अनन्दिता मुझे कुछ अपसेट सी लगी इसलिए मैंने उसे कुछ हेल्थ टिप्स दी वही हेल्थ टिप्स जो शोभना मुझे देती है जिसे सुनकर मेरे चहरे पर हँसी आ जाती है , अनन्दिता भी मुस्कुरा उठी। मैं अपने केबिन की ओर बढ़ गया पर न जाने क्यों मेरे कुछ कलीग्स की नजरें अनन्दिता की तरफ थी।
जो चेहरा हमेशा शान्त और सौम्य नजर आता हो और अचानक उस पर एक उदासी भरी फ़िक्र दिखाई दे तो कैसा लगता है कुछ दिनों से मैं देख रहा हूँ कि अनन्दिता कुछ ऐसी ही नजर आ रही है। शायद वो किसी बात को लेकर बहुत परेशान है। वैसे तो किसी की निज़ी जिंदगी में दखल देना सही नही होता है पर अनन्दिता एक अच्छी लड़की है उसे इस तरह परेशान देख मुझे अच्छा नही लग रहा था लेकिन ऐसे कैसे मैं उससे उसकी परेशानी की वजह पूछ सकता हूँ इसलिए अनन्दिता से तो नही पर कल जब नीलम एक क्लाइंट की फाइल लेकर मुझे देने आई तो, तब मैंने बात ही बात में नीलम से अनन्दिता का ज़िक्र किया नीलम शायद अनन्दिता ठीक नही है मुझे लगता है कि शायद वो किसी वजह से परेशान है क्या तुम्हें भी ऐसा लगा। हाँ कुछ फैमली प्रोबल्स की वजह से वो परेशान है बात हुई थी मेरी उससे नीलम ने जवाब देते हुए कहा।
शाम को घर पर डिनर करते वक्त मुझे पता नही क्यों  अनन्दिता का ख्याल आ गया आज लंच टाइम में कितनी अपसेट लग रही थी वो। मैंने शोभना को भी अनन्दिता के बारे में बताया शोभना ने कहा प्रॉब्लम्स तो सभी की लाइफ में आती है शोभना की बात सुन मैं खामोश रहा और कुछ सोचने लगा।
शोभना ने कहा तो सही है पर मुझे अनन्दिता की परवाह हो रही है इसलिए अगले दिन ऑफिस पहुंचते ही मैं सीधा जाकर अनन्दिता से मिला बिना कुछ पूछे मैंने उससे कहना शुरू कर दिया प्रॉब्लम्स हमारी लाइफ का हिस्सा है इसलिए ज्यादा परेशान होना सही नही हर प्रॉब्लम का सॉल्यूशन होता है।
ठीक है अनन्दिता। मैं जानता था कि इस समय मेरे कुछ कलीग्स जोकि शोधकर्ता बने हुए थे उनकी शक भारी आंखे मुझ पर टिक्की हुई थी तो भी मैं अनन्दिता से जाकर मिला।
मैं सिर्फ इतना चाहता था कि अनन्दिता अपनी परेशानियों से लड़ना सीखे।
कुछ लोगो की आदत बातें बनाने की होती है बस वही मेरे साथ हुआ। हाँ अनन्दिता मुझे अच्छी लगती है क्योंकि वो अच्छी है मुझे कभी उसमे कोई बनावट नजर नही आई उसके चेहरे से उसकी आँखों में हमेशा सच्चाई ही दिखी है मुझे।
अनन्दिता से मेरा कोई रिश्ता नही न तो दोस्ती का और ना ही किसी और तरह का।कोई हमे उसकी अच्छाई से अच्छा लग सकता है हमे उसकी परवाह हो सकती है इसके लिए किसी रिश्ते का होना जरूरी नही।
आज भले ही भावुकता में आकर शोभना ने मुझसे सवाल किया है पर मैं जानता हूँ कि मुझे उसे कुछ समझाने की जरूरत नही, पत्नी है वो मेरी जोकि मुझे अच्छी तरह जानती है।














मेरा मन



        मेरा मन उदास है जाने क्यों कुछ तो बात है।
        न दिल टूटा है न किसी का साथ छूटा है
        फिर भी ना जाने क्यों ये मन रूठा है।
        न जाने किस गम में ये डूबे जा रहा है
        बात कुछ नही है फिर भी ऊबे जा रहा है।
        चंचल बन यहाँ वहाँ घूम रहा है
        न जाने ये मनवा क्या ढूंढ रहा है।
        कभी मुस्का रहा है तो कभी गुस्सा दिखा रहा है
        पता नही मेरे मन को क्या हुए जा रहा है।
        कभी बेचैन तो कभी परेशान डोल रहा है
        न जाने ये आजकल कौनसी भाषा बोल रहा है।
        कुछ - कुछ ये मन बदल रहा है
        मेरे ईशारों पर बिल्कुल नही चल रहा है।
        खामोशियों के ये पंख लगा रहा है
        नाराजगियों के वन में उड़ें जा रहा है।
        न कुछ कह रहा है न कुछ बता रहा है
        जाने किन सवालों में उलझते जा रहा है।
        नादान मन बावरा हुए जा रहा है
        परेशानी नही है तो भी गम किये जा रहा है।
        बदला कुछ नही वही दिन वही रात है फिर भी
        मेरा मन उदास है जाने क्यों कुछ तो बात है।

कुछ रंग खुदको



यहां वहां गिरता गुलाल चेहरा तो रंगा ही संग में रंग दिये एक दूजे के बाल क्या हुड़दंड मची हुई है कि क्या कहो बिना भांग पिये ही होली का नशा सभी पर जमकर चढ़ गया है। होली है ही ऐसी की सब कुछ भूलकर बस सभी का एक ही टारगेट होता है कि आज तो मैं ऐसा रंग लगाऊंगा सबको की कई दिनों तक छूटेगा ही नही। ये एक अलग ही जंग होती है सबकि आपस मे की मेरा रंग सबसे ज्यादा पक्का है और मैंने ही सबसे ज्यादा रंग लगाया सबको। ये भी जीत होती है जिसकी बहुत खुशी होती है। यहां सब जोरो शोरो से होली खेल रहे थे अरे नही नही ये रंग मत डालो यार छूटेगा नही। भिगो दिया पूरा मुझे अब मैं बाल्टी भरकर रंग डालूंगा , कहीं किसी के दौड़ने की आवाज तो कहीं जोर - जोर से हँसने की। तरह - तरह की आवाजें उसके कानों में पढ़ रही थी जो छुपकर कमरे में बंद होकर बैठी थी इस डर से की कहीं कोई उस पर भी रंग न डाल दे। रागिनी हमेशा ऐसे ही होली पर खुद को बंदकर बैठ जाती है जिन होली के रंगों से लोग खुदको पूरी तरह रंग लेते है उन रंगों से रागिनी ने खुदको बचा रखा है। उसे न जाने क्यों इन रंगों से डर लगता है।
बचपन मे भी रागिनी अपने भाई - बहनों से भागती फिरती थी वो दोनों जमकर होली खेलते और रागिनी को भी रंग लगाने की कोशिश करते। और रागिनी वो कभी माँ के पीछे छिपती तो कभी दादी के पीछे। और जब से बड़ी हुई तो अपने कमरे में बंद होकर बैठ जाती है। क्या रागिनी का कभी मन नही किया कि वो भी सबके साथ होली खेले। जिस तरह वो चुपके- चुपके खिड़की में से सबको होली खेलते हुए देखती है उससे तो लगता है की थोड़ा बहुत मन तो रागिनी का करता है पर क्या करे रंगों से भी डरता है। और ये मन इसलिए डरता है क्योंकि रागिनी ने कभी गुलाल हाथ मे लेकर उसका एहसास ही नही किया की इनका एहसास कितना प्यारा है न कभी खुदने किसी को रंग लगाया न किसी को खुदको लगाने दिया।
तो पता कैसे चलेगा कि रंग लगाने में क्या मज़ा है।
सच कहूं तो रागिनी ने बेवजह खुदको बांधे रखा है लेकिन कोई है जोकि इस बार रागिनी को रंग लगाने वाला है क्योंकि घर मे और कोई तो रागिनी का गुस्सा सहने नही वाला एक निशांत ही है जोकि पूरी तरह तैयार है उसका गुस्सा सहने के लिए। निशांत रागिनी का बचपन का दोस्त भी है और पड़ोसी भी। कई सालों बाद वो घर वापस लौटा है। निशांत ने रागिनी के भाई- बहन के साथ मिलकर कुछ तिगडम जमाया रागिनी को कैसे भी करके कमरे से बाहर आने को मजबूर कर लिया
रागिनी डरते- डराते जैसे ही बाहर आई तीनो ने मिलकर रागिनी पर ढेर सारा रंग उढेल दिया। रागिनी सिर से लेकर पैर तक पूरी रंग में सराबोर हो गई थी और रागिनी ने फिर खूब गुस्सा किया निशांत चुपचाप खड़े रहकर सुनता रहा और रागिनी जैसे ही चुप हुई उसने मुठी भरकर गुलाल रागिनी पर डाल दिया और कहा अब क्या करोगी। रागिनी को जोर से गुस्सा आ गया और उसने भी पास ही रखा गुलाल का थाल उठाया और पूरा निशांत पर फेक दिया फिर क्या था निशांत ने फिर रागिनी पर रंग डाला तो रागिनी ने भी ढेर सारे रंग से निशांत को रंग दिया। निशांत और रागिनी ने एक दूसरे के पीछे दौड़ लगाना शुरू कर दिया बिल्कुल बचपन की तरह।रागिनी ने बचपन मे निशांत के साथ होली खेली है उस वक्त निशांत ही एक लौता दोस्त था रागिनी का और उसके चले जाने के बाद रागिनी ने होली खेलना बन्द कर दिया था क्योंकि और कोई दोस्त उसका था नही और उसके भाई - बहन तब बहुत ज्यादा छोटे थे। तो बस ऐसे धीरे- धीरे रागिनी रंगों से दूर हो गई। लेकिन निशांत ने आज फिर रागिनी को रंगों के पास ला दिया रागिनी का जो डरा हुआ सा मन था वो गुलाल के लगते ही गुलाबी हो गया। इसलिए तो रागिनी सबके साथ मिलकर होली खेल रही है रागिनी के छोटे भाई- बहन भी खुश है की इतने सालों बाद ही सही रागिनी ने उनके साथ होली खेली तो। फाइनली रागिनी ने देर से ही सही रंगों से खुदको रंग लिया जो कोशिश आज निशांत ने की वो कोशिश अगर पहले किसी ने की होती तो रागिनी इतने वक्त तक रंगों से दूर नही रहती।
रागिनी ने बेवजह अपने मन को इस बात से बाँधे रखा था की उसे होली पसन्द नही है और फिर ये मान भी लिया। लेकिन आज रागिनी ने अपने मन को आजाद कर दिया और ये जान लिया कि होली के रंग सिर्फ तन को ही नही हमारे मन को भी रंगते है। और मन को रंगना बहुत जरूरी है क्योंकि ये हमे खुशी देता है।
      कुछ रंग खुशी का ,  कुछ रंग साथ का
      कुछ रंग प्यार का  , कुछ रंग इकरार का
      कुछ रंग उमंग का ,  कुछ रंग एहसास का
      कुछ रंग चाहत का , कुछ रंग जज़्बात का
      कुछ रंग उम्मीदों का, कुछ रंग विश्वास का
      कुछ रंग ख्वाइशों का , कुछ रंग तमन्नाओं का
      कुछ रंग खुदको भी , ये रंग है गुलाल का।

   

अस्तित्व




सुचित्रा एक टक दीवार पर लगी उस फैमिली फ़ोटो को घूरे जा
रही थी आखिर वो इतने ध्यान से क्या देख रही थी ऐसा लग रहा था जैसे कुछ समझने की कोशिश कर रही थी कुछ ऐसा था जो उसे आज इस तस्वीर में नजर आ गया उसकी आँखों से छलकते आँसू और होंठों पर आती छोटी सी मुस्कान कुछ ऐसा ही इशारा कर रहे थे।
सुचित्रा की शादी को सात साल हो गए है इन सात सालों में उसने अपना हर रिश्ता बहुत अच्छे से निभाया है और हर फर्ज पूरा किया है सबके साथ रहते हुए उसे कभी कोई प्रॉब्लम नही हुई। पर ऐसा होता है कि जब हम सब के लिए जीने लगते है 
तब हम खुद लिए जीना भूल जाते है सुचित्रा के साथ भी ऐसा ही हो रहा था एक पत्नी एक बहु और एक माँ इन सब रिश्तों के बीच सुचित्रा कहीं खोती जा रही है उसकी अपनी ख्वाइशें अपने सपने खुद की पहचान कहीं गुम सी होती जा रही है।
सुचित्रा ने पहले कभी ऐसे नही सोचा था पर जब से उसकी मुलाकात कामिनी से हुई है तब से सुचित्रा के दिमाग मे एक लड़ाई सी चल रही है। कामिनी सुचित्रा की दूर वाली फ्रेंड है
दूर वाली फ्रेंड मतलब वो फ्रेंड जोकि की क्लासमेट थी और उसकी सुचित्रा से थोड़ी बहुत बातचीत होती रहती थी।
कामिनी एक बड़ी सी कम्पनी में अच्छी पोस्ट पर है उसकी लाइफ स्टाइल सुचित्रा की लाइफ स्टाइल से अलग है तो बस जब वो सुचित्रा से मिली तो उसकी बड़ी- बड़ी बातों ने सुचित्रा
को कहीं न कहीं फिक्र में डाल दिया।
और तब से ही सुचित्रा के मन मे कई सवाल उठ रहे थे रोज की तरह सुचित्रा ने आज भी अपनी मम्मी जी के लिए ग्रीन टी बनाई तो पर आज उसका स्वाद अलग था पापाजी को न्यूज़ पेपर भी आज सुचित्रा ने ऐसे ही दे दिया जबकि वो हमेशा पहले सुविचार पढ़कर सुनाती है और फिर न्यूज़ पेपर देती है।
आज सुचित्रा क्यों बदली हुई सी लग रही थी। विक्रम से भी सुचित्रा ने नही पूछा कि आज किसी मीटिंग के लिए जल्दी तो नही जाना है और निधि के भी कोई भी नखरे न सुनते हुए सुचित्रा ने उसे तैयार कर स्कूल पहुँचा दिया। न तो आज सुचित्रा गुनगुनाते दिखी न मुस्कुराते देखी बस दिखी तो खोई सी। जब हमारे अंदर लड़ाई चल रही होती और हम खुद ही खुद से सवाल कर रहे हो तो ये बड़ी दुविधा वाली स्थिति होती है हम सही गलत के बीच उलझ से जाते है। सुचित्रा का मन अभी ऐसे ही उलझ रहा है खुदके खड़े किए सवालों में।
कुछ दिनों तक ऐसे ही चलता रहा। घर वालों को भी सुचित्रा का बर्ताव थोड़ा बदला हुआ सा लग तो रहा था पर उन्होंने ये मानकर तसल्ली कर ली के शायद सुचित्रा की तबियत ठीक नही इसलिए जब सुचित्रा ने आजकल अपने कमरे से बाहर निकलना कम कर दिया तो किसी ने कोई सवाल नही किया।
पर यहाँ एक और सवाल सुचित्रा के सामने आ गया घर वालो में से किसी का उससे कुछ न पूछना उसे ये एहसास दिला रहा था कि शायद किसी को उसकी कोई फिक्र नही।
अब सुचित्रा मन ही मन कई सारी बातें सोचकर दुखी होए जा रही थी। सुचित्रा हॉल में लगी उस फैमिली फोटो को देख रही है जिसमे वो सबके साथ है वो इस वक्त तस्वीर में खुदको ही
देख रही है क्या अस्तित्व है मेरा , क्या पहचान है कोई वजूद है भी के नही , बस खुदको देख यही पूछ रही थी।
दो दिन बाद जब सोसाइटी में महिला दिवस पर कार्यक्रम रखा गया तो उसमें सुचित्रा ने भी एक कविता पढ़ी लेकिन सुचित्रा हैरान तब हुई जब विक्रम ने भी अपने मन की कुछ बातें कही।
 घर की दहलीज़ से लेकर घर के हर एक कोने में बस तुम्हारा
 ही एहसास
 सुबह से लेकर शाम तक सबकी ज़ुबान पर रहता तुम्हारा ही
 तो नाम है
 हमारा अस्तित्व तुम हो , तुम्हारा अस्तित्व हम है
 तुमने ही आकर हम सबको को दी एक नई पहचान है।
 घर का विश्वास हो तुम , तुम ही हम सबका अभिमान हो
 फिर भी न जाने क्यों आज तुम परेशान हो।
विक्रम ने जो कहा उसकी उसकी गहराई किसी को समझ आई हो या नही पर सुचित्रा अच्छी तरह समझ गई थी।
विक्रम को सुनने के बाद सुचित्रा का मन भर आया उसने कार्यक्रम में खुद को सम्हाल लिया पर घर पहुंचकर वो खुदको रोक न सकी और उसकी आँखों से आँसू झलक ही गए।
वो दीवार पर लगी उस तस्वीर में फिर खुदको देख रही है ऐसा लग रहा है जैसे तस्वीर की सुचित्रा आज सामने खड़ी सुचित्रा को उसका अस्तित्व उसका वजूद क्या है ये बता रही है।
ये दृश्य बड़ा ही सुंदर है जहां तस्वीर में पूरा परिवार सुचित्रा के साथ है वही तस्वीर के सामने भी सब सुचित्रा के साथ ही खड़े है।
सुचित्रा के मन के हर एक सवाल का जवाब आज मिल गया है
सब तुम्हे पहचाने ये जरूरी नही तुम जिनके साथ हो वो तुम्हे जाने ये जरूरी है। घर के हर एक हिस्से में सुचित्रा की ही महक है बाहर नेम प्लेट पर नाम भले ही सुचित्रा का न लिखा हो पर घर ये सुचित्रा का ही है।

बदलाव



हर रोज़ की तरह आज की सुबह भी वैसी ही है मैं नींद से जागा ब्रश किया यहाँ से वहाँ घर के अंदर ही टहल लिया और फिर वही कम चीनी और अदरक की चाय उसी कप में जिसमे मैं रोज पीता हुँ फिर ऑफिस के लिए तैयार हुआ दिनभर ऑफिस में रहा और शाम को घर आ गया। सब कुछ रोज़ की
तरह कुछ अलग नही। हर वक्त सब कुछ एक जैसा अच्छा नही लगता थोड़ा बदलाव तो जरूरी है जिस तरह हमे खाने में अलग- अलग टेस्ट चाहिए होता है उसी तरह ज़िन्दगी का टेस्ट भी बदलना चाहिए।
आज की सुबह मेरे लिए हर सुबह से बिल्कुल अलग है क्योंकि आज बहुत कुछ अलग और नया है आज मैं अपने रोज़ के टाइम से थोड़े पहले जागा खिड़की खोलकर वहीं पास ही खड़ा रहा आज पहली बार मैंने सुबह की ठंडक को महसूस किया सूरज भी अभी - अभी निकलकर सीधे मुझ पर ही चमक रहा है ऐसा लग रहा है जैसे सारी रोशनी मुझ पर ही बिखेर रहा है। सूरज की रोशनी लेने के बाद मैंने एफ एम ऑन किया एक के बाद एक एनर्जी से भरे गाने सुनते हुए मैंने थोड़ी एक्सरसाइज की। और आज चाय में चीनी जरा सी बढ़ाते हुए
थोड़ी ईलायची भी मिला दी और अपने उस नए मिक्की माउस वाले कप में चाय लेकर एक - एक घुट बड़ा स्वाद लेकर
मैंने अपनी चाय खत्म की और फिर मैं ऑफिस के लिए तैयार हुआ वैसे तो मैं रोज ऐसे ही तैयार होता हुँ बस आज थोड़ा ज्यादा बनठन गया। ऑफिस पहुँचते ही अपने कलीग्स को रोज़ की तरह हैलो गुडमोर्निंग कहा बस अंदाज आज अलग था। और आज मैंने अपने डेक्स पर भी कुछ चेंजेस किये बहुत ज्यादा नही बस थोड़ा सा बदलाव ताकि कुछ अलग लगे।शाम को डिनर मैं मैंने आज दाल भी ली दाल मुझे पसंद नही है पर टेस्ट करने के बाद लगा कि दाल इतनी बुरी भी नही लगती।
ऐसे ही छोटे- छोटे बदलाव के साथ मैंने अपने नजरिये में भी थोड़ा बदलाव किया। क्योंकि हमेशा एक जैसी सोच एक जैसा नज़रिया लेकर हम नही चल सकते। वक्त बदलता है इसलिए
वक्त बदलने के साथ हमे अपनी सोच में परिवर्तन लाने होते है। यहां पर बदलाव जरूरी हो जाता है। पहले मैं अपने कलीग
उपेन जोकि मेरा अच्छा दोस्त भी है उसके बारे में यही सोचता था कि ये सबसे कितनी बाते करता है मुझे उसका इतना ज्यादा बातें करना पसंद नही था तब मैं नया ही था ऑफिस में। अब मुझे दो साल हो गए है इन दो साल मैं मैंने उसे जान लिया है और अब मेरा उसे देखने का नज़रिया भी बदल गया है। उपेन सात साल से इस कंपनी में है वो अकेला रहता है बाहर ज्यादा उसकी किसी से दोस्ती है नही बस ऑफिस के साथियों के साथ ही उसकी अच्छी बॉन्डिंग है तो बस उन्ही से ही खूब बातें किये करता है लेकिन इसका मतलब ये नही की वो अपने काम को लेकर सीरियस नही है वो हर काम को बहुत अच्छे से करता है उसके जीने का तरीका अलग है वो गपशप करते हुए हस्ते मुस्कुराते हुए अपने काम को करता है न कि बहुत टेंशन लेते हुए। किसी के बारे में अगर जानना है तो अपना नज़रिया बदलकर देखो तो शायद बेहतर तरीके से जान पाओगे। नज़रिए के साथ हमारी सोच में बदलाव भी चाहिए माना की हमारे अपने कुछ नियम होते है जिनके अनुसार हम चलते है
पर कभी - कभी उन नियमो से हमे खुद को आजाद करना चाहिए। हर वक्त खुदको बांधे रखना सही नही है। भले ही मुझे नीला रंग अच्छा न लगता हो पर कभी - कभी तो मैं उसे ट्राय कर ही सकता हूँ माना कि मुझे डांस नही आता पर सबके साथ मिलकर थोड़ा थिरक जाने में क्या बुराई है। मुझे चुप रहना अच्छा लगता है पर मैं हर वक्त ही चुप रहूँ तो ये अच्छा नही लगेगा। अगर कई सालों तक हम घर मैं एक ही तरह का पेंट कराए तो क्या कुछ अलग लगेगा। नही कुछ अलग नही लगेगा जरूरी है कि कुछ नया किया जाए
ऐसी ही लाइफ है उसमें भी हमे कुछ नये बदलाव करते रहना चाहिए अपने आप मे अपनी सोच अपना नज़रिया वक्त के साथ इनमे भी बदलाव करने चाहिए।
मैंने तो अभी कुछ दिनों में काफी कुछ नया कर लिया है घर में कुछ चेंजेस किये है अपनी आदतों में भी थोड़ा बदलाव किया है अपनी एक रंग की लाइफ को मैंने थोड़ा रंगीन कर लिया है।
कुछ वक्त पहले मुझे सब कुछ बोरिंग सा लगने लगा था पर मैंने कुछ बदलाव करते हुए सब मे एक नयापन ला दिया है
इसलिए कुछ भी ऐसा नही है जोकि मुझे अच्छा न लग रहा हो सब कुछ बहुत इंट्रस्टिंग सा लग रहा है और मेरे मन को खुशी दे रहा है सच मे लाइफ नई- नई सी लगने लगती है।
इसलिए मैं यही कहूँगा कि बदलाव अच्छे है।





एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE